भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण उपकर अधिनियम, 1996
(1996 का अधिनियम संख्यांक 28)
[19 अगस्त, 1996]
भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार (नियोजन तथा सेवा-शर्त विनियमन)
अधिनियम, 1996 के अधीन गठित भवन और अन्य सन्निर्माण
कर्मकार कल्याण बोर्डों के संसाधनों का संवर्धन करने की
दृष्टि से नियोजकों द्वारा उपगत सन्निर्माण
की लागत पर उपकर के उद्ग्रहण
और संग्रहण का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण उपकर अधिनियम, 1996 है ।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह 3 नवम्बर, 1995 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) बोर्ड" से भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार (नियोजन तथा सेवा-शर्त विनियमन) अधिनियम, 1996 (1996 का 27) की धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन किसी राज्य सरकार द्वारा गठित भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण बोर्ड अभिप्रेत है ;
(ख) निधि" से किसी बोर्ड द्वारा गठित भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण निधि अभिप्रेत है ;
(ग) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(घ) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं तथा भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार (नियोजन तथा सेवा-शर्त विनियमन) अधिनियम, 1996 (1996 का 27) में परिभाषित हैं, वहीं अर्थ हैं, जो उस अधिनियम में हैं ।
3. उपकर का उद्ग्रहण और संग्रहण-(1) भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार (नियोजन तथा सेवा-शर्त विनियमन) अधिनियम, 1996 (1996 का 27) के प्रयोजनों के लिए उपकर का उद्ग्रहण और संग्रहण किसी नियोजक द्वारा उपगत सन्निर्माण की लागत के दो प्रतिशत से अनधिक किन्तु एक प्रतिशत से अन्यून ऐसी दर से किया जाएगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, समय-समय पर, विनिर्दिष्ट करे ।
(2) उपधारा (1) के अधीन उद्गृहीत उपकर, प्रत्येक नियोजक से ऐसी रीति से और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, संगृहीत किया जाएगा, जिसके अन्तर्गत है किसी सरकार के या किसी पब्लिक सेक्टर उपक्रम के भवन या अन्य सन्निर्माण कार्य की बाबत स्रोत पर कटौती या किसी स्थानीय प्राधिकारी के माध्यम से, जहां ऐसे भवन या अन्य सन्निर्माण कार्य का अनुमोदन ऐसे स्थानीय प्राधिकारी द्वारा किया जाना अपेक्षित है, अग्रिम संग्रहण ।
(3) उपधारा (2) के अधीन संगृहीत उपकर के आगम, संग्रहण करने वाले स्थानीय प्राधिकारी या राज्य सरकार द्वारा ऐसे उपकर का संग्रहण करने में हुए व्यय की, जो संगृहीत रकम के एक प्रतिशत से अधिक नहीं होगा, कटौती करने के पश्चात्, बोर्ड को संदत्त किए जाएंगे ।
(4) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन उद्ग्रहणीय उपकर, जिसके अन्तर्गत ऐसे उपकर का अग्रिम संदाय है, अंतिम निर्धारण किए जाने के अधीन रहते हुए, अंतवर्लित भवन या अन्य सन्निर्माण कार्य की मात्रा के आधार पर, ऐसी एक समान दर या दरों पर, जो विहित की जाएं, संगृहीत किया जा सकेगा ।
4. विवरणियों का दिया जाना-(1) प्रत्येक नियोजक, ऐसी विवरणी, ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी को, ऐसी रीति से और ऐसे समय पर देगा, जो विहित किया जाए ।
(2) यदि भवन या अन्य सन्निर्माण कार्य करने वाला कोई व्यक्ति, जो धारा 3 के अधीन उपकर का संदाय करने के लिए दायी है, उपधारा (1) के अधीन कोई विवरणी देने में असफल रहता है, तो ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी, ऐसे व्यक्ति को ऐसी सूचना देगा जिसमें उससे ऐसी तारीख के पूर्व, जो उस सूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, ऐसी विवरणी देने की अपेक्षा की जाए ।
5. उपकर का निर्धारण-(1) ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी, जिसको धारा 4 के अधीन विवरणी दी गई है, ऐसी जांच करने या कराने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे और अपना यह समाधान हो जाने के पश्चात् कि विवरणी में दी गई विशिष्टियां सही हैं, नियोजक द्वारा संदेय उपकर की रकम का, आदेश द्वारा, निर्धारण करेगा ।
(2) यदि धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी को विवरणी नहीं दी गई है तो वह, ऐसी जांच करने या कराने के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, नियोजक द्वारा संदेय उपकर की रकम का, आदेश द्वारा, निर्धारण करेगा ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किए गए निर्धारण के आदेश में वह तारीख विनिर्दिष्ट की जाएगी जिसके भीतर उपकर का नियोजक द्वारा संदाय किया जाएगा ।
6. छूट देने की शक्ति-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी राज्य में किसी नियोजक या नियोजकों के किसी वर्ग को इस अधिनियम के अधीन संदेय उपकर के संदाय से छूट दे सकेगी यदि ऐसा उपकर उस राज्य में प्रवृत्त किसी तत्स्थानी विधि के अधीन पहले से ही उद्गृहीत और संदेय है ।
7. प्रवेश करने की शक्ति-राज्य सरकार का कोई ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी जो उस सरकार द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से सशक्त किया गया है,-
(क) किसी ऐसे स्थान में, जहां वह इस अधिनियम के प्रयोजनों को, जिनके अन्तर्गत धारा 4 के अधीन किसी नियोजक द्वारा दी गई किन्हीं विशिष्टियों के सही होने का सत्यापन है, कार्यान्वित करने के लिए प्रवेश करना आवश्यक समझे, ऐसी सहायता के साथ, यदि कोई हो, जो वह ठीक समझे, उचित समय पर प्रवेश कर सकेगा ;
(ख) ऐसे स्थान के भीतर कोई ऐसी बात कर सकेगा, जो इस अधिनियम के अधीन उसके कर्तव्यों के उचित निर्वहन के लिए आवश्यक हो ; और
(ग) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा, जो विहित की जाएं ।
8. उपकर के संदाय में विलम्ब पर संदेय ब्याज-यदि कोई नियोजक, धारा 3 के अधीन संदेय उपकर की किसी रकम का निर्धारण आदेश में निर्दिष्ट समय के भीतर संदाय करने में असफल रहता है तो ऐसा नियोजक, संदत्त की जाने वाली रकम पर, ऐसी तारीख से जिसको ऐसा संदाय शोध्य है, ऐसी रकम का वास्तव में संदाय किए जाने तक की अवधि में समाविष्ट प्रत्येक मास या किसी मास के भाग के लिए दो प्रतिशत की दर से ब्याज का संदाय करने का दायी होगा ।
9. विनिर्दिष्ट समय के भीतर उपकर का संदाय न करने के लिए शास्ति-यदि किसी नियोजक द्वारा धारा 3 के अधीन संदेय उपकर की किसी रकम का धारा 5 के अधीन किए गए निर्धारण आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख के भीतर संदाय नहीं किया जाता है तो यह समझा जाएगा कि वह बकाया है और इस निमित्त विहित प्राधिकारी, ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे, ऐसे नियोजक पर ऐसी शास्ति अधिरोपित कर सकेगा, जो उपकर की रकम से अधिक नहीं होगी :
परन्तु ऐसी शास्ति अधिरोपित करने के पूर्व ऐसे नियोजक को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा और यदि ऐसी सुनवाई के पश्चात् उक्त प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यतिक्रम किसी अच्छे और पर्याप्त कारण से था तो इस धारा के अधीन कोई शास्ति अधिरोपित नहीं की जाएगी ।
10. अधिनियम के अधीन शोध्य रकम की वसूली-किसी नियोजक से इस अधिनियम के अधीन शोध्य कोई रकम (जिसके अंतर्गत कोई ब्याज या शास्ति है), उसी रीति से वसूल की जा सकेगी जैसे भू-राजस्व की बकाया वसूल की जाती है ।
11 अपील-(1) धारा 5 के अधीन किए गए निर्धारण के किसी आदेश से या धारा 9 के अधीन शास्ति अधिरोपित करने के लिए किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई नियोजक, ऐसे समय के भीतर जो विहित किया जाए, ऐसे अपील अधिकारी को ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से अपील कर सकेगा, जो विहित की जाए ।
(2) उपधारा (1) के अधीन की गई प्रत्येक अपील के साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए ।
(3) उपधारा (1) के अधीन किसी अपील के प्राप्त होने के पश्चात्, अपील प्राधिकारी, उस मामले में अपीलार्थी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् अपील का यथासंभव शीघ्रता के साथ, निपटारा करेगा ।
(4) इस धारा के अधीन अपील में पारित प्रत्येक आदेश अन्तिम होगा और उसे किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
12. शास्ति-(1) जो कोई, इस अधिनियम के अधीन कोई विवरणी देने की बाध्यता के अधीन होते हुए, कोई ऐसी विवरणी देगा जिसके बारे में वह जानता है या उसके पास विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(2) जो कोई, इस अधिनियम के अधीन उपकर का संदाय करने का दायी होते हुए, ऐसे उपकर के संदाय का जानबूझकर या साशय अपवंचन करेगा या अपवंचन करने का प्रयत्न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मस तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(3) कोई भी न्यायालय, इस धारा के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार के अधीन किए गए परिवाद पर ही करेगा, अन्यथा नहीं ।
13. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के लिए दायी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, कंपनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है ; और
(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
14. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) वह रीति जिससे और वह समय जिसके भीतर धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन उपकर का संग्रहण किया जाएगा ;
(ख) धारा 3 की उपधारा (4) के अधीन उद्ग्रहणीय अग्रिम उपकर की दर या दरें ;
(ग) धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन दी जाने वाली विवरणियों की विशिष्टियां, वह अधिकारी या प्राधिकारी, जिसको ऐसी विवरणियां दी जाएंगी तथा ऐसी विवरणियां देने की रीति और समय ;
(घ) वे शक्तियां, जिनका धारा 7 के अधीन किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा प्रयोग किया जा सकेगा ;
(ङ) वह प्राधिकारी, जो धारा 9 के अधीन शास्ति अधिरोपित कर सकेगा ;
(च) वह प्राधिकारी, जिसको धारा 11 की उपधारा (1) के अधीन अपील फाइल की जा सकेगी और वह समय जिसके भीतर और वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे ऐसी अपील फाइल की जा सकेगी;
(छ) वह फीस, जो धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन अपील के साथ होगी ; और
(ज) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
15. निरसन और व्यावृत्ति-(1) भवन और अन्य सन्निर्माण कर्मकार कल्याण उपकर तीसरा अध्यादेश, 1966 (1966 का अध्यादेश सं० 2) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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