एशियाटिक सोसाइटी अधिनियम, 1984
(1984 का अधिनियम संख्यांक 5)
[23 मार्च, 1984]
एशियाटिक सोसाइटी नामक संस्था को, जिसका रजिस्ट्रीकृत
कार्यालय इस समय कलकत्ता में है, राष्ट्रीय महत्व
की संस्था घोषित करने के लिए और
उससे संबंधित कतिपय विषयों
का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम एशियाटिक सोसाइटी अधिनियम, 1984 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. एशियाटिक सोसाइटी की राष्ट्रीय महत्व की संस्था के रूप में घोषणा-स्वर्गीय विलियम जोन्स ने 15 जनवरी, 1784 को कलकत्ता में एक संस्था की स्थापना की थी, जिसका नाम अब एशियाटिक सोसाइटी है और जिसके उद्देश्य ऐसे हैं जो उसे राष्ट्रीय महत्व की संस्था बनाते हैं, अतः यह घोषित किया जाता है कि उक्त एशियाटिक सोसाइटी राष्ट्रीय महत्व की संस्था है ।
3. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) ज्ञापन" से सोसाइटी का संगम-ज्ञापन अभिप्रेत है ;
(ख) विहित" से इस अधिनियम के अधीन नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ग) विनियम" के अन्तर्गत कोई ऐसा नियम या विनियम है (चाहे उसका कोई भी नाम हो) जिसे सोसाइटी, वैस्ट बंगाल सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1961 (1961 का वैस्ट बंगाल ऐक्ट 26) के अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों के प्रयोग में बनाने के लिए सक्षम है, किन्तु इसके अन्तर्गत ऐसी कोई उपविधि या स्थायी आदेश नहीं है, जो विनियमों के अधीन दिन प्रतिदिन के प्रशासन के संचालन के लिए बनाया गया हो ।
(घ) सोसाइटी" से एशियाटिक सोसाइटी अभिप्रेत है, जो वैस्ट बंगाल सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1961(1961 का वैस्ट बंगाल ऐक्ट 26) के अर्थ में सोसाइटी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय कलकत्ता में है ।
4. केन्द्रीय सरकार द्वारा सोसाइटी को अनुदान, उधार आदि-सोसाइटी को अपने कृत्यों का, जिनके अन्तर्गत विशिष्टतः अनुसंधान, साहित्यिक पुस्तकाल्य, वैज्ञानिक और संग्रहालय संबंधी कार्यकलाप, पाण्डुलिपियों, सिक्कों और कलाकृतियों का संग्रहण तथा नियतकालिक पत्रिकाओं, पुस्तकों और अन्य साहित्य का प्रकाशन है, दक्षतापूर्वक निर्वहन करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा विधि द्वारा इस निमित्त सम्यक् विनियोग किए जाने के पश्चात्, सोसाइटी को प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसी धनराशियां अनुदान के रूप में, उधार के रूप में या अन्यथा दे सकेगी जो वह आवश्यक समझे ।
5. सोसाइटी के लेखाओं की लेखापरीक्षा-(1) सोसाइटी उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगी और लेखाओं का वार्षिक विवरण, जिसके अन्तर्गत तुलनपत्र है, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगी, जिसे भारत का नियन्त्रक-महालेखापरीक्षक अनुमोदित करे ।
(2) सोसाइटी के लेखाओं की लेखापरीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा की जाएगी और ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय सोसाइटी द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को और सोसाइटी के लेखाओं की लेखापरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति को ऐसी लेखापरीक्षा के संबंध में वही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे, जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखापरीक्षा के संबंध में होते हैं और विशिष्टतया बहियों, लेखाओं, सम्बद्ध वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्रों के पेश किए जाने की मांग करने और सोसाइटी के कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित सोसाइटी के लेखा और उनकी लेखापरीक्षा रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष भेजी जाएगी और वह उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
6. वार्षिक रिपोर्ट-सोसाइटी केन्द्रीय सरकार को प्रत्येक वर्ष ऐसे समय पर, जो निदेशित किया जाए, अपनी वार्षिक रिपोर्ट, पूर्व वर्ष के दौरान के अपने क्रियाकलापों, नीतियों और कार्यक्रमों का पूरा विवरण देते हुए देगी और केन्द्रीय सरकार उसे संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
7. सोसाइटी की कतिपय कार्रवाइयों के लिए केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन का आवश्यक होना-सोसाइटी, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय,-
(क) उन प्रयोजनों में से, जिनके लिए इसकी स्थापना की गई है, या जिनके लिए इसका इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पूर्व उपयोग किया जा रहा है, किसी का परिवर्तन, विस्तार या न्यूनन नहीं करेगी, अथवा स्वयं को पूर्णतः या भागतः, किसी अन्य संस्था या सोसाइटी के साथ समामेलित नहीं करेगी; या
(ख) किसी रीति से ज्ञापन या विनियमों का परिवर्तन या संशोधन नहीं करेगी; या
(ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे अर्जन के लिए विनिर्दिष्ट रूप में उपबंधित धन से सोसाइटी द्वारा अर्जित किसी सम्पत्ति का विक्रय नहीं करेगी या उसका अन्यथा व्ययन नहीं करेगी :
परन्तु ऐसा कोई अनुमोदन ऐसी किसी जंगम सम्पत्ति या किसी वर्ग की जंगम सम्पत्ति की दशा में, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए, आवश्यक नहीं होगा; या
(घ) विघटित नहीं की जाएगी ।
8. योजना बोर्ड-(1) केन्द्रीय सरकार, सोसाइटी के विकास कार्यक्रमों के बारे में योजना बनाने और उनके क्रियान्वयन तथा सोसाइटी से संबंधित अन्य विषयों के संबंध में उसे सलाह देने के प्रयोजन के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक बोर्ड की स्थापना करेगी जिसका नाम योजना बोर्ड (एशियाटिक सोसाइटी) होगा ।
(2) बोर्ड में अध्यक्ष और ऐसे अन्य सदस्य होंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएं ।
(3) ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त बनाए, बोर्ड को अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(4) बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, उनके कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, उनमें आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति, उनको संदेय भत्ते, यदि कोई हों, और उनसे संबंधित अन्य विषय ऐसे होंगे जो विहित किए जाएं ।
9. समितियां-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उतनी समितियों का गठन कर सकेगी, जितनी और जब वह आवश्यक समझे, जिसमें उतने व्यक्ति होंगे जितने वह उनमें नियुक्त करना ठीक समझे और प्रत्येक ऐसी समिति को निम्नलिखित सभी या कोई कर्तव्य समनुदेशित कर सकेगी, अर्थात् :-
(क) प्रत्येक वित्तीय वर्ष के प्रारम्भ के पूर्व यथासंभव केन्द्रीय सरकार को उस वर्ष के दौरान, जिसके लिए केन्द्रीय सरकार निधियों की व्यवस्था करती है, सोसाइटी द्वारा जिम्मा लिए जाने के लिए तय पाए गए कार्य के कार्यक्रमों को दर्शित करने वाले विवरणों और ऐसे कार्य के संबंध में साधारण वित्तीय प्राक्कलनों को तैयार करना और उन्हें केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करना; और
(ख) ऐसे कार्य के कार्यक्रमों का विस्तृत रूपरेखा के आधार पर परिनिर्धारण ।
(2) उपधारा (1) के अधीन गठित समिति, इस धारा के अधीन किसी विषय के संबंध में अपने कृत्यों का निर्वहन करने में, केन्द्रीय सरकार को बोर्ड द्वारा धारा 8 के अधीन किसी विषय के संबंध में दी गई सलाह का, यदि कोई हो, सम्यक् ध्यान रखेगी ।
(3) जहां सोसाइटी उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी समिति द्वारा सुझाए गए किसी कार्य का जिम्मा लेने के लिए सहमत नहीं होती है, वहां केन्द्रीय सरकार को ऐसे सहमत न होने के लिए अपने कारण देगी ।
(4) उपधारा (1) के अधीन गठित समिति द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, ऐसी समिति के सदस्यों को संदेय भत्ते, यदि कोई हों, और ऐसी समिति से संबंधित अन्य विषय ऐसे होंगे, जो विहित किए जाएं ।
10. किए गए कार्य का पुनर्विलोकन, आस्तियों का निरीक्षण, आदि-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक समिति का गठन कर सकेगी जिसमें उतने व्यक्ति होंगे जितने वह-
(क) सोसाइटी द्वारा किए गए कार्य और उसके द्वारा की गई प्रगति का पुनर्विलोकन करने;
(ख) उसके भवनों, उपस्कर और अन्य आस्तियों का निरीक्षण करने;
(ग) सोसाइटी द्वारा किए गए कार्य का मूल्यांकन करने ;
(घ) ऐसे किसी विषय पर, जो केन्द्रीय सरकार की राय में सोसाइटी के कार्य के संबंध में महत्व का है, साधारणतया सरकार को सलाह देने,
के प्रयोजन के लिए उसमें नियुक्त करना ठीक समझे और समिति उस पर अपनी रिपोर्ट ऐसी रीति से, जो केन्द्रीय सरकार निदेशित करे, प्रस्तुत करेगी ।
(2) समिति के सदस्यों द्वारा अनुसरण की जाने वाले प्रक्रिया, उनको संदेय भत्ते, यदि कोई हों, और समिति से संबंधित अन्य विषय ऐसे होंगे, जो विहित किए जाएं ।
(3) समिति को, उपधारा (4) के उपबन्धों और ऐसे किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त बनाए, अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(4) पुनर्विलोकन, निरीक्षण या मूल्यांकन कराए जाने के आशय की सूचना प्रत्येक मामले में सोसाइटी को दी जाएगी और सोसाइटी ऐसे किसी प्रतिनिधि को नियुक्त करने के लिए हकदार होगी जिसे उपस्थित होने का और ऐसे पुनर्विलोकन, निरीक्षण या मूल्यांकन में सुनवाई का अधिकार होगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) में निर्दिष्ट समिति की किसी रिपोर्ट में प्रकट किए गए ऐसे पुनर्विलोकन, निरीक्षण या मूल्यांकन के परिणाम के प्रति निर्देश से सोसाइटी के प्रधान को सम्बोधित कर सकेगी और प्रधान, केन्द्रीय सरकार को उस सम्बन्ध में की गई कार्रवाई की, यदि कोई हो, सूचना देगा ।
(6) जब केन्द्रीय सरकार ने उपधारा (5) के अनुसरण में किसी विषय के संबंध में सोसाइटी के प्रधान को सम्बोधित किया है और प्रधान उसके संबंध में केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में युक्तियुक्त समय के भीतर कार्रवाई नहीं करता है तो केन्द्रीय सरकार, सोसाइटी की ओर से दिए गए किसी स्पष्टीकरण या अभ्यावेदन पर विचार करने के पश्चात्, ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह रिपोर्ट में दिए गए किसी विषय के संबंध में आवश्यक समझती है ।
11. सोसाइटी द्वारा समितियों को सुविधाओं का दिया जाना-सोसाइटी, धारा 8 के अधीन गठित बोर्ड को और धारा 9 या धारा 10 के अधीन गठित प्रत्येक समिति को, अपने कर्तव्यों का पालन करने में उन्हें समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, सभी आवश्यक सुविधाएं देने के लिए आबद्ध होगी ।
12. सोसाइटी को निदेश देने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि लोक हित में ऐसा करना आवश्यक है तो लेखबद्ध किए जाने वाले और सोसाइटी को संसूचित किए जाने वाले कारणों से, सोसाइटी को ऐसे निदेश दे सकेगी, जो वह ठीक समझे और ऐसे निदेशों में सोसाइटी से निम्नलिखित की अपेक्षा करने वाले निदेश सम्मिलित होंगे-
(क) ऐसी अवधि के भीतर जो निदेशों में विनिर्दिष्ट की जाए, ज्ञापन का संशोधन करना या कोई विनियम बनाना या उसका संशोधन करना ;
(ख) सोसाइटी द्वारा जिम्मा लिए गए या जिम्मा लिए जाने वाले कार्य को ऐसी रीति से, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करना ठीक समझे, पूर्विकता देना ।
(2) इस धारा के अधीन जारी किए गए निदेश, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या सोसाइटी के ज्ञापन अथवा विनियमों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
13. नियंत्रण के कृत्यों को ग्रहण करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की राय में,-
(i) सोसाइटी ने न्यायोचित या युक्तियुक्त कारण के बिना धारा 10 की उपधारा (6) या धारा 12 के अधीन जारी किए गए किसी निदेश को प्रभावी करने में व्यतिक्रम किया है; या
(ii) सोसाइटी की परिषद् ने सोसाइटी या उसके किसी भाग के सम्बन्ध में शक्तियों का अतिक्रम या दुरुपयोग किया है,
तो केन्द्रीय सरकार, लिखित आदेश द्वारा सोसाइटी को निदेश दे सकेगी कि वह आदेश में विनिर्दिष्ट की जाने वाली अवधि के भीतर उपधारा (2) में निर्दिष्ट कोई नियुक्ति करने के विरुद्ध केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में हेतुक दर्शित करे ।
(2) यदि उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किसी आदेश द्वारा नियत की गई अवधि के भीतर, केन्द्रीय सरकार के समाधानप्रद रूप में हेतुक दर्शित नहीं किया जाता है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित और उसके लिए कारण बताते हुए आदेश द्वारा सोसाइटी के किसी क्रियाकलाप का दो वर्ष से अनधिक की ऐसी अवधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी ।
(3) उपधारा (2) के अधीन जारी किए गए आदेश में विनिर्दिष्ट अवधि के दौरान,-
(क) जहां आदेश में किसी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा सोसाइटी का प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए उपबन्ध किया गया है वहां-
(i) परिषद् के सदस्यों के रूप में, पद धारण करने वाले सभी व्यक्तियों के, जिनके अन्तर्गत प्रधान है, बारे में यह समझा जाएगा कि उन्होंने उस रूप में अपने पद रिक्त कर दिए हैं ;
(ii) उपधारा (2) के अधीन सोसाइटी का प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए नियुक्त व्यक्ति, सोसाइटी के सम्बन्ध में, चाहे किसी बैठक या अन्यथा सोसाइटी के प्रधान या परिषद् की सभी शक्तियों का प्रयोग और सभी कर्तव्यों का पालन करेगा या करेंगे ;
(ख) जहां आदेश में किसी व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा सोसाइटी के किसी क्रियाकलाप का प्रबन्ध ग्रहण करने के लिए उपबन्ध किया गया है वहां इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति अकेले उन क्रियाकलापों के सम्बन्ध में प्रधान या परिषद् की सभी शक्तियों का प्रयोग करने और सभी कर्तव्यों का पालन करने के लिए हकदार होगा या होंगे ।
14. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध ज्ञापन या विनियमों या वैस्ट बंगाल सोसाइटीज रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1961 (1961 का वैस्ट बंगाल ऐक्ट 26) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में इससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
15. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(i) धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन बोर्ड द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया से सम्बन्धित विषय;
(ii) धारा 8 की उपधारा (4) के अधीन बोर्ड के सदस्यों की पदावधि, उनके कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, उनमें आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति, उनको संदेय भत्ते, यदि कोई हों, और उनसे सम्बन्धित अन्य विषय ;
(iii) धारा 9 की उपधारा (4) के अधीन समिति द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, समिति के सदस्यों को संदेय भत्ते, यदि कोई हों, और समिति से संबंधित अन्य विषय ;
(iv) धारा 10 की उपधारा (2) के अधीन, समिति के सदस्यों द्वारा अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया, उनको संदेय भत्ते, यदि कोई हों, और समिति से संबंधित अन्य विषय;
(v) कोई अन्य विषय, जो इस अधिनियम के अधीन किया जाना अपेक्षित है या जिसके संबंध में इस अधिनियम के अधीन नियम बनाए जा सकते हैं ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगा । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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