एशियाई विकास बैंक अधिनियम, 1966
(1966 का अधिनियम संख्यांक 18)
[29 मई, 1966]
एशियाई विकास बैंक की स्थापना और उसके कार्य करने के लिए
हुए अन्तरराष्ट्रीय करार को कार्यान्वित करने
तथा तत्संसक्त विषयों के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सत्रहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) यह अधिनियम एशियाई विकास बैंक अधिनियम, 1966 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि सन्दर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) “करार" से एशियाई विकास बैंक के नाम से ज्ञात अन्तरराष्ट्रीय निकाय की स्थापना और उसके कार्य करने के लिए हुआ करार अभिप्रेत है ;
(ख) “बैंक" से करार के अधीन स्थापित एशियाई विकास बैंक अभिप्रेत है ।
3. बैंक को संदाय-(1) भारत की संचित निधि में से ऐसी सब धनराशियां जो निम्नलिखित के संदाय के लिए समय-समय पर अपेक्षित हों, इस निमित्त विधि द्वारा सम्यक् विनियोग संसद् द्वारा किया जाने के पश्चात् संदत्त की जाएगी, -
(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा बैंक को करार के अनुच्छेद 5 के पैरा 1, 2 और 3 के अधीन संदेय अभिदाय ;
(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा बैंक को करार के अनुच्छेद 16 के अधीन संदेय कमीशन, फीसें या अन्य प्रभार ;
(ग) केन्द्रीय सरकार द्वारा बैंक को करार के अनुच्छेद 25 के पैरा 1 के अधीन संदेय धनराशियां ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार ऐसा करना ठीक समझे तो वह ऐसे प्ररूप में, जिसे वह ठीक समझे, ऐसे कोई ब्याजरहित और अपरक्राम्य नोट या अन्य बाध्यताएं, जिनके लिए कि करार के अनुच्छेद 6 के पैरा 3 में उपबन्ध है, सृष्ट कर सकेगी और बैंक को पुरोधृत कर सकेगी ।
4. बैंक के लिए रिजर्व बैंक का निक्षेपधारी होना-बैंक की भारतीय करेंसी धृतियों का निक्षेपधारी भारतीय रिजर्व बैंक होगा ।
5. बैंक को प्रास्थिति और कुछ उन्मुक्तियों, छूटों और विशेषाधिकारों का तथा उसके आफिसरों और कर्मचारियों को कुछ उन्मुक्तियों, छूटों और विशेषाधिकारों का प्रदान किया जाना-(1) किसी अन्य विधि में किसी तत्प्रतिकूल बात के होते हुए भी, करार के वे उपबन्ध जो अनुसूची में उपवर्णित हैं, भारत में विधि का बल रखेंगे :
परन्तु करार के अनुच्छेद 56 की किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह-
(क) सीमाशुल्क से मुक्त माल का भारत में आयात करने का हक, वहां उसके पश्चात्वर्ती विक्रय पर किसी निर्बन्धन के बिना, बैंक को देती है ; अथवा
(ख) बैंक को उन शुल्कों या करों से कोई छूट प्रदान करती है जो बेचे गए माल की कीमत के भाग हैं ; अथवा
(ग) बैंक को उन शुल्कों या करों से कोई छूट प्रदान करती है जो की गई सेवाओं के प्रभारों के सिवाय वास्तव में कुछ नहीं है ।
(2) केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अनुसूची का संशोधन किन्हीं ऐसे संशोधनों के अनुरूपतः कर सकेगी जो करार के उन उपबन्धों में, जो अनुसूची में उपवर्णित हैं, सम्यक् रूप से किए और अंगीकृत किए जाएं ।
6. नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
[7. धारा 5 के अधीन निकाली गई अधिसूचनाओं और धारा 6 के अधीन बनाए गए नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन निकाली गई प्रत्येक अधिसूचना और धारा 6 के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम निकाली या बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखी जाएगा/रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस अधिसूचना या नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगी/होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह अधिसूचना जारी नहीं की जानी चाहिए या नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगी/जाएगा । किन्तु अधिसूचना या नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।]
अनुसूची
(धारा 5 देखिए)
करार के वे उपबन्ध जो विधि का बल रखेंगे
अध्याय 8
प्रास्थिति, उन्मुक्तियां, छूटें, और विशेषाधिकार
अनुच्छेद 48
अध्याय का प्रयोजन
बैंक को उसके प्रयोजन की पूर्ति और उसे सौंपे गए कृत्यों का कार्यान्वयन प्रभावी तौर पर करने में समर्थ बनाने के लिए इस अध्याय में उपवर्णित प्रास्थिति, उन्मुक्तियां, छूटें और विशेषाधिकार हर एक सदस्य के राज्यक्षेत्र में बैंक को दिए जाएंगे ।
अनुच्छेद 49
विधिक प्रास्थिति
बैंक को पूर्ण वैधिक व्यक्तित्व और विशिष्टत :-
(i) संविदा करने ;
(ii) स्थावर और जंगम संपत्ति का अर्जन और व्ययन करने ; तथा
(iii) विधिक कार्यवाहियां संस्थित करने,
की पूर्ण सामर्थ्य प्राप्त होगी ।
अनुच्छेद 50
न्यायिक कार्यवाहियों से उन्मुक्ति
1. बैंक हर प्ररूप की विधिक प्रक्रिया से उन्मुक्ति का उपभोग उन दशाओं में के सिवाय करेगा जो धन उधार लेने, बाध्यताओं की प्रत्याभूति देने, या प्रतिभूतियों का क्रय और विक्रय या विक्रय का निम्नांकन करने की उसकी शक्तियों के प्रयोग से या के संसंग में उद्भूत हों । इन दशाओं में सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय में बैंक के विरुद्ध अनुयोग उस देश के राज्यक्षेत्र में लाए जा सकेंगे जिसमें बैंक का प्रधान कार्यालय या शाखा कार्यालय हो, या जिसमें बैंक ने आदेशिका की तामील या आदेशिका की सूचना के प्रतिग्रहनार्थ कोई अभिकर्ता नियुक्त किया हो, या जिसमें बैंक ने प्रतिभूतियां पुरोधृत या प्रत्याभूत की हों ।
2. इस अनुच्छेद के पैरा 1 के उपबंधों के होते हुए भी, बैंक के विरुद्ध कोई भी अनुयोग किसी सदस्य द्वारा, या किसी सदस्य के किसी अभिकरण या माध्यम द्वारा या किसी ऐसी सत्ता या व्यक्ति द्वारा जो किसी सदस्य की या किसी सदस्य के अभिकरण या माध्यम की ओर से प्रत्यक्षतः या परतः कार्य कर रहा हो या उससे दावा व्युत्पन्न करता हो, नहीं लाया जाएगा । बैंक और उसके सदस्यों के बीच संविदाओं को निपटाने के लिए सदस्य ऐसी विशेष प्रक्रियाओं का आश्रय लेंगे जो इस करार में या बैंक की उपविधियों और विनियमों में या बैंक से की गई संविदाओं में विहित हों ।
3. बैंक की संपत्ति तथा आस्तियां, वे चाहे जहां भी स्थित हों और चाहे किसी के भी द्वारा धारित हों, बैंक के विरुद्ध अंतिम निर्णय के परिदान के पहले के सब प्रकार के अभिग्रहण, कुर्की या निष्पादन से उन्मुक्त रहेंगी ।
अनुच्छेद 51
आस्तियों की उन्मुक्ति
बैंक की संपत्ति तथा आस्तियां, वे चाहे जहां भी स्थित हों और चाहे किसी के भी द्वारा धारित हों कार्यपालक या विधायी अनुयोग द्वारा की जाने वाली तलाशी, अधिग्रहण, अधिहरण, स्वत्वहरण, अथवा किसी भी अन्य रूप के ग्रहण या पुरोबंध से उन्मुक्त रहेंगी ।
अनुच्देद 52
अभिलेखागारों की उन्मुक्ति
बैंक के अभिलेखागार, और साधारण तौर पर वे सब दस्तावेजें जो उसकी हैं या उसके द्वारा धारित हैं, वे चाहे जहां स्थित हों, अनतिक्रमणीय होंगी ।
अनुच्छेद 53
आस्तियों की निर्बन्धनों से मुक्ति
इस करार के उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए, बैंक की सब संपत्ति और आस्तियां किसी भी प्रकृति के निर्बन्धनों, विनियमनों, नियंत्रणों और अधिस्थगनों से वहां तक मुक्त रहेंगी जहां तक कि बैंक के प्रयोजन और कृत्यों को प्रभावी तौर पर कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हो ।
अनुच्छेद 54
संसूचनाओं के लिए विशेषाधिकार
बैंक की शासकीय संसूचनाओं के प्रति हर एक सदस्य ऐसा व्यवहार करेगा जो उस व्यवहार से कम अनुकूल न हो जो वह सदस्य किसी अन्य सदस्य की शासकीय संसूचनाओं के प्रति करता है ।
अनुच्छेद 55
बैंक कार्मिक की उन्मुक्तियां और विशेषाधिकार
बैंक की ओर से कार्य विशेष का पालन करने वाले विशेषज्ञों सहित बैंक के सब गवर्नरों, निदेशकों, अनुकल्पों, आफिसरों और कर्मचारियों-
(i) को अपने द्वारा पदीय हैसियत से किए गए कार्यों के बारे में विधिक प्रक्रिया से तब के सिवाय उन्मुक्ति प्राप्त रहेगी जबकि बैंक ने उन्मुक्ति अधित्यक्त कर दी हो ;
(ii) को उस दशा में, जिसमें कि वे स्थानीय नागरिक या राष्ट्रिक न हों, उत्प्रवास संबंधी निर्बन्धनों, अन्यदेशियों के रजिस्ट्रीकरण की अपेक्षाओं और राष्ट्रीय सेवा की बाध्यताओं से वही उन्मुक्तियां और विनिमय-विनियमों के संबंध में वही सुविधाएं दी जाएंगी जो कि सदस्यों द्वारा अन्य सदस्यों के तुल्य पंक्ति वाले प्रतिनिधियों, पदधारियों और कर्मचारियों को दी जाती हैं; तथा
(iii) के प्रति यात्रा-सुविधाओं के बारे में वही व्यवहार किया जाएगा जो कि सदस्यों द्वारा अन्य सदस्यों के तुल्य पंक्ति वाले प्रतिनिधियों, पदधारियों और कर्मचारियों के प्रति किया जाता है ।
अनुच्छेद 56
कराधान से छूट
1. बैंक, उसकी आस्तियां, संपत्ति, आय और उसकी क्रियाएं और संव्यवहार सब कराधान से और सब सीमाशुल्कों से छूट-प्राप्त होंगे । बैंक किसी भी कर या शुल्क के संदाय, विधारण या संग्रहण की बाध्यता से भी छूट प्राप्त होगा ।
2. बैंक के निदेशकों, अनुकल्पों, आफिसरों या कर्मचारियों को, जिनके अंतर्गत बैंक की ओर से कार्य विशेष का पालन करने वाले विशेषज्ञ भी आते हैं, बैंक द्वारा संदत्त संबलमों और उपलब्धियों पर या के बारे में कोई कर तब के सिवाय उद्गृहीत नहीं किया जाएगा जबकि कोई सदस्य अपने अनुसमर्थन या प्रतिग्रहण की लिखत के साथ यह घोषणा निक्षिप्त कर दे कि वह सदस्य अपने नागरिकों या राष्ट्रिकों को बैंक द्वारा संदत्त संबलमों और उपलब्धियों पर कर लगाने का अधिकार अपने तथा अपने राजनीतिक उपखंडों के लिए प्रतिधारित करता है ।
3. बैंक द्वारा पुरोधृत किसी बाध्यता या प्रतिभूति पर, जिसके अंतर्गत उस पर का लाभांश या ब्याज आता है, चाहे वह बाध्यता या प्रतिभूति किसी के भी द्वारा धारित हो, किसी भी किस्म का कोई भी कर उद्गृहीत नहीं किया जाएगाद्भद्भ
(i) जो ऐसी बाध्यता या प्रतिभूति के विरुद्ध केवल इस कारण विभेद करता है कि वह बैंक द्वारा पुरोधृत की गई है ; अथवा
(ii) यदि ऐसे कराधान के लिए अधिकारिता-विषयक एकमात्र आधार वह स्थान या करेंसी जिसमें वह पुरोधृत संदेय या संदत्त की जाती है, अथवा बैंक द्वारा रखे गए कार्यालय या कारबार के स्थान की स्थिति हो ।
4. बैंक द्वारा प्रत्याभूत किसी बाध्यता या प्रतिभूति पर, जिसके अंतर्गत उस पर का लाभांश या ब्याज आता है, चाहे वह बाध्यता या प्रतिभूति किसी के भी द्वारा धारित हो, किसी किस्म का कोई भी कर उद्गृहीत नहीं किया जाएगा-
(i) जो ऐसी बाध्यता या प्रतिभूति के विरुद्ध केवल इस कारण विभेद करता हो कि वह बैंक द्वारा प्रत्याभूत की गई है, अथवा
(ii) यदि ऐसे कराधान के लिए अधिकारिता-विषयक एकमात्र आधार बैंक द्वारा रखे गए कार्यालय या कारबार के स्थान की स्थिति हो ।
। । । । ।
अनुच्छेद 58
उन्मुक्तियों, छूटों और विशेषाधिकारों का अधित्यजन
बैंक इस अध्याय के अधीन प्रदत्त विशेषाधिकारों, उन्मुक्तियों और छूटों में से किसी का भी अधित्यजन, किसी भी दशा या अवस्था में, ऐसी रीति से और ऐसी शर्तों पर, जिन्हें वह बैंक के सर्वोत्तम हित में समुचित अवधारित करे, स्वविवेक से कर सकेगा ।
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