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विक्षुब्ध क्षेत्र (विशेष न्यायालय) अधिनियम, 1976 ( Disturbed Areas (Special Courts) Act, 1976 )


 

विक्षुब्ध क्षेत्र (विशेष न्यायालय) अधिनियम, 1976

(1976 का अधिनियम संख्यांक 77)

[11 जून, 1976]

कुछ क्षेत्रों में कुछ अपराधों के शीघ्र विचारण के

लिए और उससे सम्बन्धित विषयों का

उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के सत्ताईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विक्षुब्ध क्षेत्र (विशेष न्यायालय) अधिनियम, 1976 है ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और विभिन्न राज्यों के लिए या उनके विभिन्न भागों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) संहिता" से दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) अभिप्रेत है ;

(ख) विक्षुब्ध क्षेत्र" से धारा 3 के अधीन विक्षुब्ध क्षेत्र के रूप में घोषित क्षेत्र अभिप्रेत है ;

(ग) किसी विक्षुब्ध क्षेत्र के सम्बन्ध में, विक्षोभ की अवधि" से वह अवधि अभिप्रेत है जिसके दौरान वह धारा 3 के प्रयोजनों के लिए विक्षुब्ध क्षेत्र है ;

(घ) अनुसूचित अपराध" से अनुसूची में विनिर्दिष्ट ऐसा कोई अपराध अभिप्रेत है जो धारा 3 में यथानिर्दिष्ट किसी विक्षोभ का भाग है या उससे पैदा हुआ है या उससे सम्बन्धित है ;

(ङ) विशेष न्यायालय" से धारा 4 के अधीन गठित कोई विशेष न्यायालय अभिप्रेत है ;

(च) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किन्तु इसमें परिभाषित नहीं हैं और संहिता में परिभाषित हैं, वे ही अर्थ होंगे जो उनके संहिता में हैं ।

3. किसी क्षेत्र के विक्षुब्ध क्षेत्र के रूप में घोषणा-(1) जहां राज्य सरकार का समाधान हो जाता है कि राज्य के किसी क्षेत्र में विभिन्न धार्मिक, मूलवंशीय, भाषायी या प्रादेशिक समूहों या जातियों या संप्रदायों के सदस्यों के बीच मतभेदों या विवादों के कारण लोक शांति और प्रशांति बड़े पैमाने पर-

(i) विक्षुब्ध हुई थी, या

(ii) विक्षुब्ध हो रही है,

वहां वह राजपत्र में अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकेगा कि ऐसा क्षेत्र विक्षुब्ध क्षेत्र है ।

                (2) किसी क्षेत्र की बाबत उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में वह अवधि विनिर्दिष्ट की जाएगी जिसके दौरान वह क्षेत्र इस धारा के प्रयोजनों के लिए विक्षुब्ध क्षेत्र होगा और जहां राज्य सरकार का समाधान हो जाता है कि उस क्षेत्र में लोक शांति और प्रशांति का ऐसा विक्षोभ, जैसा उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, ऐसी अधिसूचना के जारी किए जाने से पहले की किसी तारीख से हुआ था वहां अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अवधि उस तारीख से प्रारम्भ हो सकेगी :

                परन्तु-

(क) कोई भी अवधि, जो अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से तीन मास से अधिक पहले की तारीख से प्रारम्भ हो, उसमें विनिर्दिष्ट नहीं की जाएगी ; और

(ख) ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अवधि का उतना भाग जितना अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख से पश्चात् का है, प्रथमतः तीन मास से अधिक नहीं होगा किन्तु यदि राज्य सरकार की राय में ऐसे क्षेत्र में लोक शांति और प्रशांति का ऐसा विक्षोभ जैसा उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, जारी रहता है तो राज्य सरकार ऐसी अवधि को समय-समय पर एक बार में अधिक से अधिक तीन मास की किसी अवधि तक बढ़ाने के लिए ऐसी अधिसूचना को संशोधित कर सकेगी :

परन्तु यह और कि जहां राज्य सरकार का समाधान हो जाता है कि ऐसे क्षेत्र में लोक शान्ति और प्रशान्ति का ऐसा विक्षोभ जैसा उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, विद्यमान नहीं है तो वह उस क्षेत्र के सम्बन्ध में उस उपधारा के अधीन जारी की गई अधिसूचना को (उसमें विनिर्दिष्ट अवधि को मूल या पूर्वगामी परन्तुक के अधीन संशोधित), सीमित करने के लिए, संशोधित करेगी ।

4. विशेष न्यायालयों का गठन-(1) राज्य सरकार विक्षुब्ध क्षेत्रों में किए गए अनुसूचित अपराधों का शीघ्र विचारण करने के प्रयोजनों के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे विक्षुब्ध क्षेत्र या क्षेत्रों में या उनके सम्बन्ध में, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, इतने विशेष न्यायालय गठित कर सकेगी जितने आवश्यक हैं ।

(2) विशेष न्यायालय एकल न्यायाधीश से गठित होगा जो राज्य सरकार की प्रार्थना पर उच्च न्यायालय नियुक्त करेगा ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा में नियुक्त" शब्द का वही अर्थ होगा जो उसका संहिता की धारा 9 के स्पष्टीकरण में है ।

(3) विशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए कोई व्यक्ति अर्ह न होगा जब तक कि वह :-

                (क) उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति के लिए अर्ह नहीं है, अथवा

                (ख) कम से कम एक वर्ष की अवधि तक सेशन न्यायाधीश या अपर सेशन न्यायाधीश नहीं रह चुका है ।

                (4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी व्यक्ति ऐसी आयु, जिसमें किसी राज्य में सेशन न्यायाधीशों को  सेवा-निवृत्त होना पड़ता है, प्राप्त कर लेने के पश्चात्, उस राज्य में विशेष न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किए जाने और ऐसा न्यायाधीश होने के लिए पात्र नहीं होगा ।

5. विशेष न्यायालयों की अधिकारिता-(1) संहिता या किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी भी विक्षुब्ध क्षेत्र में, उस अवधि के दौरान जब वह विक्षुब्ध क्षेत्र है, किसी भी समय किया गया कोई अनुसूचित अपराध, विक्षुब्ध क्षेत्र में या उस क्षेत्र के सम्बन्ध में, जिसमें अपराध किया गया है, गठित विशेष न्यायालय द्वारा ही विचारणीय होगा, चाहे विचारण ऐसी अवधि के दौरान हो या उसके पश्चात् ।

                (2) किसी अनुसूचित अपराध का विचारण करते समय विशेष न्यायालय अनुसूचित अपराध से भिन्न किसी ऐसे अपराध का भी विचारण कर सकेगा जिसका आरोप अभियुक्त पर, संहिता के अधीन, एक ही विचारण में लगाया जा सकता है, किन्तु यह तब जब कि ऐसा अपराध अनुसूचित अपराध से संसक्त हो ।

6. विशेष न्यायालयों की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) प्रत्येक अनुसूचित अपराध संज्ञेय होगा ।

                (2) विशेष न्यायालय किसी अनुसूचित अपराध का संज्ञान-

(क) जहां संहिता के अधीन ऐसा अपराध, संहिता की धारा 209 के अधीन सेशन न्यायालय को सुपुर्द किए जाने पर अनन्य रूप से उसी के द्वारा विचारणीय अपराध है वहां, इस प्रकार कर सकेगा मानो विशेष न्यायालय सेशन न्यायालय है ;

(ख) किसी अन्य दशा में तथ्यों के बारे में पुलिस की रिपोर्ट पर कर सकेगा जिसके साथ लोक अभियोजक का इस प्रभाव का प्रमाणपत्र भी हो कि वह अपराध अनन्य रूप से विशेष न्यायालय द्वारा विचारणीय है ।

(3) जहां कोई अनुसूचित अपराध संहिता के अधीन अनन्य रूप से सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध है वहां विशेष न्यायालय को सेशन न्यायालय की सब शक्तियां होंगी और वह ऐसे अपराध का विचारण, यावत्शक्य सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए संहिता में विहित प्रक्रिया के अनुसार इस प्रकार करेगा, मानो वह विशेष न्यायालय सेशन न्यायालय हो ।

                (4) जहां कोई अनुसूचित अपराध ऐसा अपराध है जो तीन वर्ष से अधिक की अवधि के कारावास से दण्डनीय है किन्तु संहिता के उपबन्धों के अनुसार जो अनन्य रूप से सेशन न्यायालय द्वारा विचारणीय अपराध नही है, वहां उस अपराध का संज्ञान करने पर विशेष न्यायालय, संहिता की धारा 207 के अधीन मजिस्ट्रेट के कृत्यों का पालन कर सकेगा और तत्पश्चात् ऐसे अपराध का विचारण, सेशन न्यायालय के समक्ष विचारण के लिए संहिता में विहित प्रक्रिया के अनुसार इस प्रकार करेगा मानो विशेष न्यायालय सेशन न्यायालय हो और वह मामला संहिता के उपबन्धों के अधीन विचारण के लिए उसे सुपुर्द किया गया हो ।

                (5) जहां कोई अनुसूचित अपराध अधिक से अधिक तीन वर्ष की अवधि के कारावास से या जुर्माने से अथवा दोनों से दण्डनीय है वहां संहिता की धारा 260 की उपधारा (1) में अथवा धारा 262 में किसी बात के होते हुए भी, विशेष न्यायालय उस अपराध का विचारण संहिता में विहित प्रक्रिया के अनुसार संक्षेपतः कर सकेगा और संहिता की धारा 263 से 265 तक के उपबन्ध यावत्शक्य ऐसे विचारण को लागू होंगे :

                परन्तु यदि इस उपधारा के अधीन संक्षिप्त विचारण के दौरान विशेष न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि मामले का स्वरूप ऐसा है कि उसका संक्षिप्ततः विचारण करना अवांछनीय है, तो विशेष न्यायालय किन्हीं साक्षियों को जिनकी परीक्षा की जा चुकी है, पुनः बुलाएगा और मामले की ऐसे अपराध के विचारण के लिए संहिता के उपबन्धों द्वारा उपबन्धित रीति से पुनः सुनवाई प्रारम्भ करेगा और उक्त उपबन्ध विशेष न्यायालय को और उसके सम्बन्ध में उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे किसी मजिस्ट्रेट को और उसके सम्बन्ध में लागू होते हैं :

                परन्तु यह और कि यदि इस धारा के अधीन संक्षिप्त विचारण में दोषसिद्धि की जाती है तो विशेष न्यायालय के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह अधिक से अधिक दो वर्ष की अवधि के कारावास का दण्डादेश दे ।

                (6)  विशेष न्यायालय, ऐसे व्यक्ति का साक्ष्य प्राप्त करने की दृष्टि से, जिसका किसी अपराध से प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः सम्पृक्त या संसर्गित होने का संदेह है, ऐसे व्यक्ति को इस शर्त पर क्षमा प्रदान कर सकता है कि वह अपराध के और उस अपराध को करने से सम्पृक्त अन्य प्रत्येक व्यक्ति के सम्बन्ध में, चाहे वह उसके करने में मुख्य कर्ता रहा हो या दुष्प्रेरक, अपने निजी ज्ञान से सभी परिस्थितियों को पूर्ण और सही रूप में प्रकट करे और इस प्रकार प्रदान की गई क्षमा संहिता की धारा 308 के प्रयोजनार्थ, संहिता की धारा 307 के अधीन प्रदान की गई समझी जाएगी ।

7. मामलों को नियमित न्यायालयों को अंतरित करने की शक्ति-जहां किसी अपराध का संज्ञान करने के पश्चात् विशेष न्यायालय की यह राय है कि वह अपराध अनुसूचित अपराध नहीं है वहां वह, इस बात के होते हुए भी कि उसे मामले का विचारण करने की अधिकारिता नहीं है, मामले को विचारण के लिए ऐसे किसी न्यायालय को अंतरित करेगा जिसे संहिता के अधीन अधिकारिता है और वह न्यायालय जिसे मामला अंतरित किया जाता है, मामले में ऐसे कार्यवाही कर सकेगा मानो उसने अपराध का संज्ञान किया हो ।

8. अपील और पुनरीक्षण-उच्च न्यायालय, संहिता के अध्याय 29 और 30 द्वारा उच्च न्यायालय को प्रदत्त सब शक्तियों का, जहां तक वे लागू हों, प्रयोग इस प्रकार कर सकेगा मानो विशेष न्यायालय उस उच्च न्यायालय की अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर मामलों का विचारण करने वाला सेशन न्यायालय हो ।

9. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-(1) इस अधिनियम के उपबन्ध, संहिता या किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे, किन्तु इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा उपबन्धित है उसके सिवाय, संहिता के उपबन्ध, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत नहीं हैं, विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को लागू होंगे और संहिता के उक्त उपबन्धों के प्रयोजनों के लिए विशेष न्यायालय, सेशन न्यायालय समझा जाएगा और विशेष न्यायालय के समक्ष अभियोजन संचालित करने वाला व्यक्ति लोक अभियोजक समझा जाएगा ।

(2) विशेषतया और उपधारा (1) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, संहिता की धारा 326 और 475 के उपबन्ध विशेष न्यायालय के समक्ष कार्यवाहियों को यावत्शक्य लागू होंगे और इस प्रयोजन के लिए उन उपबन्धों में मजिस्ट्रेट के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे विशेष न्यायालय के प्रति निर्देश हैं ।

10. व्यावृत्ति-(1) इस अधिनियम की कोई भी बात नौसेना, सेना अथवा वायुसेना या संघ के किसी अन्य सशस्त्र बल से सम्बन्धित किसी विधि के अधीन किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा प्रयोक्तव्य अधिकारिता पर, या उनको लागू प्रक्रिया पर, प्रभाव नहीं डालेगी ।

(2) शंकाओं के निराकरण के लिए यह घोषित किया जाता है कि ऐसी किसी विधि के प्रयोजन के लिए जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, विशेष न्यायालय को मामूली दण्ड न्याय का न्यायालय समझा जाएगा ।

 

 

अनुसूची

[धारा 2 (घ) देखिए]

1. भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के निम्नलिखित उपबन्धों के अधीन अपराध :-

धारा 120ख ;

धाराएं 143 से 145 तक, 147, 148, 151 से 155 तक, 157, 158 और 160 ;

धाराएं 182, 183, 186 से 190 तक ;

धाराएं 193 से 195 तक, 199, 201 से 203 तक, 211 से 214 तक, 216, 216क और 225 ;

धाराएं 295 से 298 तक ;

धाराएं 302, 303, 304, 307, 308, 323 से 335 तक, 341 से 348 तक, 352 से 358 तक, 363 से 369              तक और 376 ;

धाराएं 379, 380, 382, 384 से 387 तक, 392 से 399 तक, 402, 411, 412, 426, 427, 431, 435, 436, 440, 447 से 462 तक ;

धाराएं 504 से 506 तक तथा धारा 509 ।

2. आयुध अधिनियम, 1959 (1959 का 54) के निम्नलिखित उपबन्धों के अधीन अपराध-

धाराएं 25 से 30 तक ।

3. भारतीय विस्फोटक अधिनियम, 1884 (1884 का 4) के निम्नलिखित उपबन्धों के अधीन अपराध :-

धारा 6 (3) और धारा 8 (2) ।

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