एलकाक एशडाउन कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन) अधिनियम, 1973
(1973 का अधिनियम संख्यांक 56)
[14 दिसम्बर, 1973]
सामान्यतया देश की और विशेषतया रक्षा विभाग की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए
अत्यावश्यक माल के युक्तिसंगत तथा समन्वित विकास और उत्पादन को
सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए एलकाक एशडाउन कम्पनी
लिमिटेड के उपक्रमों के अर्जन का तथा उससे संबंधित
या उसके आनुषंगिक विषयों का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
एलकाक एशडाउन कम्पनी लिमिटेड, नौका निर्माण, पोतों की मरम्मत और समुद्री डीजल इंजिनों के उत्पादन में लगी हुई थी तथा हल्की और भारी संरचनाओं, पारेषण लाइन टावरों, रेलवे पाइंटों और क्रासिंगों, धूसर ढलवां लोहे जैसे माल के उत्पादन में भी जो देश की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए आवश्यक हैं तथा सामुद्रिक और अन्य उद्योगों द्वारा अपेक्षित अन्य माल के भी उत्पादन में लगी हुई थी;
और कम्पनी को भारी नुकसान होने के फलस्वरूप मुम्बई स्थित उच्च न्यायालय द्वारा कम्पनी के परिसमापन के लिए आदेश किया गया है;
और कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों का कार्य 1971 की जनवरी के बाद से बिल्कुल ही बन्द हो गया है;
और कम्पनी के स्वामित्वाधीन उपक्रमों को चालू करना अत्यंत आवश्यक है ताकि कम्पनी द्वारा उत्पादित किए जाने वाले माल के उत्पादन और प्रदाय के रुक जाने से सामान्यतया देश के और विशेषतया रक्षा विभाग के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े;
अतः भारत गणराज्य के चौबीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम एलकाक एशडाउन कम्पनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन) अधिनियम, 1973 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है जिसको यह अधिनियम प्रवृत्त हो;
(ख) कम्पनी" से एलकाक एशडाउन कम्पनी लिमिटेड अभिप्रेत है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित एक कम्पनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय महाराष्ट्र राज्य में है;
(ग) न्यायालय" से मुम्बई स्थित उच्च न्यायालय अभिप्रेत है;
[(गक) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(गख) कंपनी के उपक्रम" से अभिप्रेत है, -
(i) कंपनी के स्वामित्वाधीन और गुजरात राज्य में भावनगर में अवस्थित औद्योगिक यूनिट (जिसे इसमें इसके पश्चात् भावनगर यूनिट कहा गया है); और
(ii) कंपनी के स्वामित्वाधीन महाराष्ट्र राज्य में मुम्बई में अवस्थित औद्योगिक यूनिट (जिसे इसमें इसके पश्चात् मुम्बई यूनिट कहा गया है);]
(घ) इसमें प्रयुक्त किन्तु अपरिभाषित और कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित शब्दों और पदों के वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं ।
3. कम्पनी के उपक्रमों का केन्द्रीय सरकार में निहित होना-नियत दिन से ही कम्पनी के उपक्रम इस अधिनियम के आधार पर, केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) यह समझा जाएगा कि कम्पनी के उपक्रमों के अन्तर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा जंगम और स्थावर सभी सम्पत्ति, रोकड़-बाकी, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा ऐसी सम्पत्ति में या उससे पैदा होने वाले अन्य समस्त अधिकार और हित, जो नियत दिन से ठीक पूर्व [उपक्रमों के संबंध मेंट भारत में या भारत से बाहर कम्पनी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण के अधीन थे तथा सभी लेखा बहियां, रजिस्टर और उससे संबंधित सभी प्रकार की अन्य सब दस्तावेज हैं ।
[स्पष्टीकरण: शकाओं के निराकरण के लिए यह घोषित किया जाता है कि कम्पनी के उपक्रम" पद के अन्तर्गत निम्नलिखित नहीं हैं, अर्थात्: -
(क) कम्पनी को देय ऋण; और
(ख) कम्पनी द्वारा अपने अंशधारकों की निदेशकों से वसूल की जा सकने वाली धनराशियां ।]
(2) उन उपक्रमों के, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं यथापूर्वोक्त अन्तर्गत समस्त सम्पत्ति ऐसे निहित होने के आधार पर किन्हीं न्यासों, बाध्यताओं, बंधकों, भारों, धारणाधिकारों और उसे प्रभावित करने वाले अन्य विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएगी और कोई कुर्की, व्यादेश या किसी भी न्यायालय की कोई डिक्री अथवा आदेश, जो ऐसी सम्पत्ति के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बन्धित करे, वापस ले लिया गया समझा जाएगा ।
(3) यदि नियत दिन को कम्पनी के उपक्रमों के किसी कारबार के संबंध में कोई वाद, अपील या किसी भी प्रकार की अन्य कार्यवाही कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध लम्बित हो तो कम्पनी के उपक्रमों के अन्तरण के अथवा इस अधिनियम में किसी बात के कारण उसका उपशमन नहीं होगा, वह बंद नहीं होगी या किसी भी प्रकार उस पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा किन्तु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध जारी रखी जा सकेगी, चलाई जा सकेगी और प्रवृत्त की जा सकेगी ।
5. उपक्रमों और उनसे संबंधित दस्तावेजों का कब्जा देने का कर्तव्य-(1) किसी न्यायालय की किसी डिक्री, निर्णय या आदेश के अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी कम्पनी का रिसीवर, शासकीय समापक या कोई अन्य व्यक्ति, जिसके कब्जे या अभिरक्षा में अथवा जिसके नियंत्रणाधीन कम्पनी के उपक्रम या उनका कोई भाग हो, कम्पनी के उपक्रमों का अथवा उनके ऐसे भाग को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हो, कब्जा तुरन्त केन्द्रीय सरकार को दे देगा ।
(2) जिस किसी रिसीवर, शासकीय समापक या अन्य व्यक्ति के कब्जे में या उसकी अभिरक्षा या नियंत्रण के अधीन कम्पनी के उन उपक्रमों से संबंधित, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कोई बहियां, दस्तावेज या अन्य कागजपत्र नियत दिन को हों वह उक्त बहियों, दस्तावेजों या अन्य कागज-पत्रों का लेखा-जोखा केन्द्रीय सरकार को या ऐसे व्यक्ति को देने के दायित्वाधीन होगा जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।
(3) केन्द्रीय सरकार उन उपक्रमों का कब्जा प्राप्त करने के लिए, जो धारा 3 के अधीन उसमें निहित हो गए हैं, सभी आवश्यक कार्यवाहियां कर सकेगी या करा सकेगी ।
6. विशिष्टियां देने का कर्तव्य-(1) कम्पनी केन्द्रीय सरकार को, इतनी अवधि के अन्दर जितनी वह सरकार इस निमित्त अनुज्ञात करे, कम्पनी की उन समस्त सम्पत्तियों और आस्तियों की जो नियत दिन को उन उपक्रमों से संबंधित हों जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, एक पूरी तालिका देगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कम्पनी की इतनी बाध्यता का, जितनी रिसीवर के कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में कम्पनी की सम्पत्तियों और आस्तियों से संबंधित हो, निर्वहन उसके द्वारा किया जाएगा और बाध्यता के उतने भाग का, जितना शासकीय समापक के कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में सम्पत्तियों और आस्तियों से संबंधित हो, निर्वहन शासकीय समापक द्वारा किया जाएगा ।
7. रकम का संदाय-(1) कम्पनी के उपक्रम केन्द्रीय सरकार को धारा 3 के अधीन अन्तरित और उसमें निहित किए जाने के लिए केन्द्रीय सरकार एक करोड़ रुपए की राशि कम्पनी के नाम न्यायालय में नकद जमा करेगी ।
(2) शंकाओं का निवारण करने के लिए घोषित किया जाता है कि उन उपक्रमों के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कम्पनी के दायित्वों की पूर्ति उपधारा (1) में निर्दिष्ट रकम से की जाएगी ।
(3) उन उपक्रमों के संबंध में, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, कम्पनी के दायित्वों की पूर्ति करने में न्यायालय उपधारा (1) में निर्दिष्ट रकम का वितरण, कम्पनी के लेनदारों के बीच, चाहे प्रतिभूत हों या अप्रतिभूत, उनके अधिकारों और हितों के अनुसार करेगा, और यदि ऐसे वितरण के पश्चात् कोई अधिशेष बच जाए तो उसे कम्पनी के अभिदाताओं के बीच ऐसे अभिदाताओं के अधिकारों और हितों के अनुसार करेगा ।
8. उपक्रमों का प्रबंध और प्रशासन-उन उपक्रमों का, जो धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, प्रबंध केन्द्रीय सरकार की ओर से ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय द्वारा (जिसके अन्तर्गत ऐसी एक या अधिक सरकारी कम्पनियां भी होंगी जो चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ पर विद्यमान हों, या उसके पश्चात् निगमित हों) किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित नामनिर्देशित किए जाएं, और ऐसा व्यक्ति या ऐसे व्यक्तियों का निकाय प्रबंध को ऐसे विनियमों के अनुसार चलाएगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाएं ।
[8क. भावनगर यूनिट का राज्य सरकार में निहित होना-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश देगी कि भावनगर यूनिट की सभी आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी जंगम और स्थावर संपत्ति, रोकड़बाकी, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा भावनगर यूनिट की ऐसी संपत्ति में, या उससे पैदा होने वाले अन्य समस्त अधिकार और हित, जो धारा 3 के अधीन केंद्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, केंद्रीय सरकार में निहित रहने के बजाय, या तो अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख को या उसके बाद की ऐसी तारीख को जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, गुजरात राज्य सरकार (जिसे इसमें इसके पश्चात् राज्य सरकार कहा गया है) में निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां भावनगर यूनिट की आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी जंगम और स्थावर संपत्ति, रोकड़बाकी, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा भावनगर यूनिट की ऐसी संपत्ति में, या उससे पैदा होने वाले अन्य समस्त अधिकार और हित, उपधारा (1) के अधीन, राज्य सरकार में निहित हो जाते हैं वहां वह सरकार, ऐसे निहित होने की तारीख से ही ऐसे यूनिट की स्वामी हो गई समझी जाएगी और उस यूनिट के संबंध में केंद्रीय सरकार के अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, राज्य सरकार के अधिकार और दायित्व हो गए समझे जाएंगे ।
8ख. मुम्बई यूनिट का सरकारी कंपनी में निहित होना-(1) धारा 3 और धारा 4 में किसी बात के होते हुए भी, केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश देगी कि मुम्बई यूनिट की सभी आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी जंगम और स्थावर संपत्ति, रोकड़बाकी, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा मुम्बई यूनिट की ऐसी संपत्ति में, या उससे पैदा होने वाले अन्य समस्त अधिकार और हित, जो धारा 3 के अधीन केंद्रीय सरकार में निहित हो गए हैं, केंद्रीय सरकार में निहित रहने के बजाय, या तो अधिसूचना के प्रकाशन की तारीख को या उसके बाद की ऐसी तारीख को जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, मझगांव डॉक लिमिटेड में, जो एक सरकारी कंपनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय महाराष्ट्र राज्य में है (जिसे इसमें इसके पश्चात् सरकारी कंपनी कहा गया है), निहित हो जाएंगे ।
(2) जहां मुम्बई यूनिट की आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी जंगम और स्थावर संपत्ति, रोकड़बाकी, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा मुम्बई यूनिट की ऐसी संपत्ति में, या उससे पैदा होने वाले समस्त अधिकार और हित, उपधारा (1) के अधीन सरकारी कंपनी में निहित हो जाते हैं, वहां वह कंपनी, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, ऐसे यूनिट की स्वामी हो गई समझी जाएगी और उस यूनिट के संबंध में केंद्रीय सरकार के अधिकार और दायित्व, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, सरकारी कंपनी के अधिकार और दायित्व हो गए समझे जाएंगे ।
8ग. धारा 8क के अधीन भावनगर यूनिट के निहित हो जाने पर कतिपय कर्मचारियों के नियोजन का बना रहना-(1) जहां भावनगर यूनिट की आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी जंगम और स्थावर संपत्ति, रोकड़बाकी, आरक्षित निधियां, विनिधान तथा भावनगर की संपत्ति में, या उससे पैदा होने वाले अन्य अधिकार और हित, धारा 8क के अधीन राज्य सरकार में निहित हो जाते हैं वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो ऐसे निहित होने की तारीख से ठीक पूर्व, उस यूनिट में नियोजित किया गया है, ऐसे निहित होने की तारीख से ही, राज्य सरकार का कर्मचारी हो जाएगा, और राज्य सरकार के अधीन पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद या सेवा धारण करेगा जो उसे उस दशा में अनुज्ञेय होते जब ऐसा निधान न हुआ होता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक राज्य सरकार के अधीन उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता या जब तक उसका पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तें राज्य सरकार द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जाती ।
(2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, भावनगर यूनिट में नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का राज्य सरकार को अंतरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(3) जहां किसी सेवा-संविदा के निबंधनों के अधीन या अन्यथा कोई ऐसा व्यक्ति, जिसकी सेवाएं इस अधिनियम के उपबंधों के कारण राज्य सरकार को अंतरित हो जाती हैं, किसी बकाया वेतन या मजदूरी का या न ली गई किसी छुट्टी के लिए किन्हीं संदायों का या अन्य ऐसे किसी संदाय का, जो उपदान या पेंशन के रूप में संदाय नहीं है, हकदार है वहां ऐसा व्यक्ति अपना दावा केंद्रीय सरकार के विरुद्ध प्रवर्तित कर सकेगा किंतु राज्य सरकार के विरुद्ध नहीं ।
8घ. धारा 8क के अधीन उपक्रमों के निहित हो जाने की दशा में भविष्य निधि और अन्य निधि का अंतरण-(1) जहां भावनगर यूनिट में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि या कोई अन्य निधि स्थापित की गई है वहां ऐसे अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन राज्य सरकार को अंतरित हो गई हैं संबंधित धनराशि राज्य सरकार को अंतरित और उसमें निहित हो जाएगी ।
(2) उन धनराशियों के संबंध में, जो उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार को अंतरित हो गई हैं, उस सरकार द्वारा इस प्रकार अंतरित अधिकारियों और कर्मचारियों के फायदे के लिए ऐसी रीति से, जो राज्य सरकार समय-समय पर विनिश्चित करे, कार्रवाई की जाएगी ।
8ङ. संविदाओं आदि की व्यावृत्ति-ऐसी सभी संविदाएं, विलेख, बंधपत्र, करार और किसी भी प्रकार की अन्य लिखतें जिनमें, केंद्रीय सरकार, धारा 8क के अधीन राज्य सरकार में निहित भावनगर यूनिट के संबंध में एक पक्षकार है और जो उक्त यूनिट के, राज्य सरकार में निहित होने की तारीख के ठीक पूर्व अस्तित्व में हैं या प्रभावशील हैं, उस दिन से ही, राज्य सरकार के विरुद्ध, या उसके पक्ष में, पूर्णतया प्रवृत्त और प्रभावशील होंगी, और उसी प्रकार पूर्णतया और प्रभावशील रूप से प्रवर्तित की जा सकेंगी मानो केंद्रीय सरकार के बजाय राज्य सरकार उसमें एक पक्षकार थी ।
8च. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि धारा 8क, धारा 8ख, धारा 8ग, धारा 8घ और धारा 8ङ के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, कठिनाई को दूर कर सकेगी:
परंतु ऐसा कोई आदेश एलकाक एशडाउन कंपनी लिमिटेड (उपक्रमों का अर्जन) संशोधन अधिनियम, 1988 के प्रवृत्त होने से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।]
9. शास्तियां-(1) कोई व्यक्ति जो-
(क) अपने कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण के अधीन कम्पनी के उपक्रमों की भागरूप सम्पत्ति को रखता है उस सम्पत्ति को केन्द्रीय सरकार से सदोष विधारित रखेगा; या
(ख) कम्पनी के जो उपक्रम इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित हो गए हैं उनकी भागरूप किसी सम्पत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा; या
(ग) किसी दस्तावेज को जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हो जानबूझकर, विधारित करेगा या धारा 5 की उपधारा (2) द्वारा यथा अपेक्षित केन्द्रीय सरकार को देने में, असफल रहेगा; या
(घ) धारा 6 के अधीन यथा अपेक्षित तालिका देने में जानबूझकर असफल रहेगा; या
(ग) ऐसी तालिका देने के लिए अपेक्षित होने पर उसमें कोई ऐसी विशिष्टियां देगा जो मिथ्या हैं और जिनका मिथ्या होना वह जानता है या जिनके मिथ्या होने का वह विश्वास करता है या जिनके सही होने का वह विश्वास नहीं करता है,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से अथवा दोनों से, दण्डनीय होगा:
परन्तु इस उपधारा के खण्ड (क) या खण्ड (ख) या खण्ड (ग) के अधीन किसी अपराध का विचारण करने वाला न्यायालय, अभियुक्त व्यक्ति को सिद्धदोष ठहराते समय उसे आदेश दे सकेगा कि वह सदोष विधारित या सदोष अभिप्राप्त किसी सम्पत्ति या जानबूझकर विधारित या न दी गई किसी दस्तावेज को न्यायालय द्वारा नियत किए जाने वाले समय के अन्दर दे दे या वापस कर दे ।
(2) कोई न्यायालय इस धारा के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का संज्ञान केन्द्रीय सरकार की या उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व मंजूरी से ही करेगा अन्यथा नहीं ।
10. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति जो उस अपराध के किए जाने के समय कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे:
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; तथा
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
11. सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार के अथवा कम्पनी के उपक्रमों के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने वाले किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध न होगी ।
12. विनियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, धारा 8 में निर्दिष्ट विषयों के बारे में विनियम बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । वह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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