वायु निगम (उपक्रमों का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 1994
(1994 का अधिनियम संख्यांक 13)
[21 मार्च, 1994]
इंडियन एयरलाइंस और एयर इंडिया के उपक्रमों के क्रमशः इंडियन
एयरलाइंस लिमिडेट और एयर इंडिया लिमिडेट के रूप में बनाई
गई और रजिस्ट्रीकृत कम्पनियों को अंतरण का और उनमें
निहित होने का तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक
विषयों का उपबंध करने और साथ ही वायु
निगम अधिनियम, 1953 का निरसन
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के पैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम वायु निगम (उपक्रमों का अंतरण और निरसन) अधिनियम, 1994 है ।
(2) यह 29 जनवरी, 1994 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार धारा 3 के अधीन, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे;
(ख) कंपनी" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन बनाया गया और रजिस्ट्रीकृत इंडियन एयरलाइंस लिमिटेड" या एयर इंडिया लिमिटेड" अभिप्रेत है;
(ग) निगमों" से अभिप्रेत हैं वायु निगम अधिनियम, 1953 (1953 का 27) की धारा 3 के अधीन स्थापित इंडियन एयरलाइंस" और एयर इंडिया" और निगम" से अभिप्रेत है इन निगमों में से कोई निगम ।
3. निगमों के उपक्रमों का कंपनियों में निहित होना-ऐसी तारीख को जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे,-
(क) इंडियन एयरलांइस का उपक्रम, इंडियन एयरलाइंस लिमिटेड को; और
(ख) एयर इंडिया का उपक्रम, एयर इंडिया लिमिटेड को,
अंतरित और उसमें निहित हो जाएगा ।
4. उपक्रमों का कंपनियों में निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) किसी निगम के उपक्रम के बारे में, जो धारा 3 के अधीन किसी कंपनी को अंतरित और उसमें निहित हो जाता है, यह समझा जाएगा कि उसके अंतर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा किसी भी प्रकृति की और कहीं भी स्थित सभी जंगम और स्थावर, पूर्ण स्वामिक स्थावर या वैयक्तिक, मूर्त या अमूर्त, कब्जे या आरक्षण में की, वर्तमान या
समय
समाश्रित संपत्तियां, जिनके अंतर्गत भूमि, संकर्म, कर्मशालाएं, वायुयान, रोकड़ बाकी, पूंजी, आरक्षितियां, आरक्षित निधियां, विनिधान, अभिधृतियां, पट्टे और बही ऋण और ऐसी संपत्ति से उत्पन्न होने वाले सभी अन्य अधिकार और हित हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व उस निगम के उपक्रम के संबंध में, भारत में या भारत के बाहर निगम के स्वामित्व, कब्जे या शक्ति में थे और उससे संबंधित सभी लेखां बहियां और दस्तावेज हैं और यह भी समझा जाएगा कि उसके अंतर्गत उस निगम के उपक्रम के संबंध में निगम के किसी भी प्रकार के उस विद्यमान सभी ऋण, दायित्व और बाध्यताएं हैं ।
(2) सभी संविदाएं और काम करने के बारे में ठहराव, जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान हैं और निगम को प्रभावित कर रहे हैं, जहां तक उनका संबंध उस निगम के उपक्रम से है; प्रभावी नहीं रहेंगे या उस निगम के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं रहेंगे तथा उस कंपनी के विरुद्ध या उसके पक्ष में जिसमें वह उपक्रम इस अधिनियम के आधार पर निहित हो गया है उनका वैसा ही पूर्ण बल और प्रभाव होगा तथा उन्हें वैसे ही पूर्ण और प्रभावी रूप से प्रवर्तित किया जाएगा मानो निगम के स्थान पर उसमें कंपनी को नामित किया गया हो या वह उसमें एक पक्षकार हो ।
(3) निगम द्वारा या उसके विरुद्ध उसके उपक्रम के संबंध में नियत दिन के ठीक पूर्व लंबित या विद्यमान कोई कार्यवाही या वादहेतुक उस दिन से उस कम्पनी द्वारा या उसके विरुद्ध, जिसमें वह इस अधिनियम के आधार पर निहित हो गया है, उसी प्रकार चालू रखा जा सकेगा और प्रवर्तित किया जा सकेगा जिस प्रकार वह उस निगम द्वारा या उसके विरुद्ध तब प्रवर्तित किया गया होता जब यह अधिनियम पारित नहीं किया गया होता और वह उस निगम द्वारा या उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं रहेगा ।
5. अनुज्ञप्तियां आदि का कंपनियों को दिया गया समझा जाना-नियत दिन से, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन उस निगम के कार्यकलापों और कारबार के संबंध में, निगम को दी गई सभी अनुज्ञप्तियां, अनुज्ञापत्र, कोटा और छूट, उस कम्पनी को दी गई समझी जाएंगी जिसमें उस निगम का उपक्रम निहित हो गया है ।
6. कर छूट या फायदे का प्रभावी बना रहना-(1) जहां, आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अधीन किसी निगम को किसी कर से छूट दी गई है या उसकी बाबत कोई निर्धारण किया गया है या किसी शेष अवक्षयण या विनिधान मोक या अन्य मोक या हानि का, यथास्थिति, मुजरा या अग्रनयन करके कोई फायदा पहुंचाया गया है या उसे वह उपलब्ध है वहां ऐसी छूट, निर्धारण या फायदा उस कम्पनी के संबंध में प्रभावी बना रहेगा जिसमें उस निगम का उपक्रम निहित हो गया है ।
(2) जहां किसी निगम द्वारा किया गया कोई संदाय, आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के किसी उपबंध के अधीन स्रोत पर कर की कटौती से छूट प्राप्त है वहां कर से ऐसी छूट वैसे ही उपलब्ध रहेगी मानो निगम को लागू किए गए उक्त अधिनियम के उपबंध उस कम्पनी के संबंध में प्रवर्तन में हों जिसमें उस निगम का उपक्रम निहित हो गया है ।
(3) धारा 3 के निबंधनों के अनुसार उपक्रम या उसके किसी भाग के अंतरण और निहित होने का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह पूंजी अभिलाभ के प्रयोजनों के लिए आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अर्थ में अंतरण है ।
7. प्रत्याभूति का प्रवर्तन में रहना-निगम के संबंध में या उसके पक्ष में किसी ऋण या पट्टा-वित्तपोषण की बाबत दी गई कोई प्रत्याभूति उस कम्पनी के संबंध में प्रवर्तन में बनी रहेगी जिसमें उस निगम का उपक्रम इस अधिनियम के आधार पर निहित हो गया है ।
8. निगम के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के बारे में उपबंध-(1) किसी निगम का ऐसा प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी (बोर्ड के निदेशक, अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक या ऐसे किसी अन्य व्यक्ति के सिवाय जो निगम के संपूर्ण कारबार या कार्यकलाप या उसके भाग का प्रबंध करने का हकदार है) जो नियत दिन के ठीक पूर्व उसके नियोजन में सेवारत है, जहां तक ऐसा अधिकारी या अन्य कर्मचारी उस उपक्रम के संबंध में जो इस अधिनियम के आधार पर किसी कम्पनी में निहित हो गया है, नियोजित है, नियत दिन से ही, यथास्थिति, उस कम्पनी का जिसमें उपक्रम निहित हो गया है अधिकारी या अन्य कर्मचारी हो जाएगा और उसी अवधि तक, उसी पारिश्रमिक पर, उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर, उन्हीं बाध्यताओं पर और छुट्टी यात्रा, भाड़ा, बीमा, अधिवार्षिता स्कीम, भविष्य निधि, अन्य निधि, सेवानिवृत्ति, पेंशन, उपदान, और अन्य फायदों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ उसमें अपना पद या सेवा धारण करेगा जो वह उस निगम के अधीन उस दशा में धारण करता यदि निगम का उपक्रम, कम्पनी में निहित नहीं हुआ होता और वह कम्पनी के, यथास्थिति, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के रूप में ऐसा करता रहेगा, अथवा नियत दिन से छह मास की अवधि की समाप्ति तक करता रहेगा, यदि ऐसा अधिकारी या अन्य कर्मचारी ऐसी अवधि के भीतर अपना यह विकल्प करता है कि वह कम्पनी का अधिकारी या अन्य कर्मचारी नहीं होना चाहता है ।
(2) जहां किसी निगम का कोई अधिकारी या अन्य कर्मचारी, उपधारा (1) के अधीन उस कम्पनी के, जिसमें उस निगम का उपक्रम निहित हो गया है नियोजन या सेवा में न रहने का विकल्प करता है वहां ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने अपना पद त्याग दिया है ।
(3) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी निगम के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की सेवाओं का किसी कम्पनी को अंतरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा, न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(4) ऐसे अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जो नियत दिन के पूर्व किसी निगम की सेवा से निवृत्त हो गए हैं, और किन्हीं प्रसुविधाओं, अधिकारों या विशेषाधिकारों के हकदार हैं, उस कम्पनी से जिसमें उस निगम का उपक्रम निहित हो गया है, वैसी ही प्रसुविधाएं, अधिकार या विशेषाधिकार पाने के हकदार होंगे ।
(5) निगम के भविष्य निधि या पाइलट समूह बीमा और अधिवर्षिता स्कीम संबंधी न्यास और अधिकारियों या कर्मचारियों के कल्याण के लिए सृजित कोई अन्य निकाय, कम्पनी में अपने कृत्यों का निर्वहन वैसे ही करते रहेंगे जैसे कि वे निगम में अब तक किया करते थे । भविष्य निधि या पाइलट समूह बीमा और अधिवार्षिता स्कीम के संबंध में दी गई कोई कर छूट, कम्पनी की बाबत लागू रहेगी ।
(6) इस अधिनियम या कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या किसी निगम के विनियमों में किसी बात के होते हुए भी, बोर्ड का कोई निदेशक, अध्यक्ष, प्रबंध-निदेशक या कोई अन्य व्यक्ति जो उस निगम के संपूर्ण कारबार और कार्यकलाप का या उसके पर्याप्त भाग का प्रबंध करने का हकदार है, पद की हानि या उस निगम के साथ उसके द्वारा की गई किसी प्रबंध संविदा के समय-पूर्व पर्यवसान की बाबत, यथास्थिति, उस निगम या कम्पनी से कोई प्रतिकर पाने का हकदार नहीं होगा ।
9. निदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-केन्द्रीय सरकार किसी ऐसी कम्पनी द्वारा अपने कृत्यों के प्रयोग और पालन के बारे में उस कम्पनी को निदेश दे सकेगी और वह कम्पनी ऐसे किन्हीं निदेशों को प्रभावी करने के लिए आबद्ध होगी ।
10. कठिनाइयों को दूर करने का शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित ऐसे आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी:
परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रवृत्त होने से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
11. 1953 के अधिनियम 27 का निरसन और निगमों का अस्तित्व में न रहना-(1) नियत दिन को, वायु निगम अधिनियम, 1953 निरसित हो जाएगा ।
(2) निगम, वायु निगम अधिनियम, 1953 के निरसित होने से, अस्तित्व में नहीं रहेंगे ।
12. निरसन और व्यावृत्ति-(1) वायु निगम (उपक्रमों का अंतरण और निरसन) अध्यादेश, 1994 (1994 का अध्यादेश संख्यांक 4) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) वायु निगम (उपक्रमों का अंतरण और निरसन ) अध्यादेश, 1994 (1994 का अध्यादेश संख्यांक 4) के ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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