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पशुओं में संक्रामक और सांसर्गिक रोगों का निवारण और नियंत्रण अधिनियम, 2009 ( Prevention and Control of Infectious and Contagious Diseases in Animals Act, 2009 )


 

पशुओं में संक्रामक और सांसर्गिक रोगों का निवारण और नियंत्रण अधिनियम, 2009

(2009 का अधिनियम संख्यांक 27)

[20 मार्च, 2009]

पशुओं को प्रभावित करने वाले संक्रामक और सांसर्गिक रोगों के निवारण, नियंत्रण

 और उन्मूलन के लिए, एक राज्य से दूसरे राज्य में ऐसे रोगों के प्रादुर्भाव

 या फैलने को रोकने और पशुओं तथा पशु उत्पादों

के आयात और निर्यात को सुकर बनाने के लिए

भारत भी अन्तरराष्ट्रीय बाध्यताओं को पूरा

करने तथा उससे संबंधित या उसके

आनुषंगिक विषयों का उपबंध

 करने के लिए

अधिनियम

पशुओं के संक्रामक और सांसर्गिक रोगों के कारण देश में बहुत आर्थिक हानि हुई है, इनमें से कुछ रोग, जनता के लिए गंभीर संकट का रूप ले रहे हैं;

और ऐसे अनेक पशु रोगों का टीकाकरण कार्यक्रमों के न्यायवत् कार्यान्वयन द्वारा या वैज्ञानिक आधारों पर अन्य समुचित और समय पर उपाय करके बड़े पैमाने पर निवारण किया जा सकता है;

और ऐसे उपाय, पशुओं और पशु उत्पादों के आयात और निर्यात को सुकर बनाने और उन्हें अन्तरराष्ट्रीय पद्धतियों के अनुरूप रखने के लिए आवश्यक हैं;

और यह अनुभव किया गया है कि भारत से पशुओं के संक्रामक और सांसर्गिक रोगों का निवारण, नियंत्रण और उन्मूलन राष्ट्रीय स्तर पर करना होगा जिससे ऐसे रोगों से देश की अर्थव्यवस्था पर होने वाले प्रतिकूल प्रभाव से बचा सके और इस प्रयोजन के लिए नियंत्रण प्रक्रियाओं में सामंजस्य बिठाना होगा और पशु रोगों के अन्तरराज्यीय संचरण को रोकना होगा;

और राष्ट्रीय स्तर पर इसकी व्यवस्था राज्य सरकारों को सक्रिय रूप से सम्मिलित करते हुए, विशिष्टतया उन ऐहतियाती उपायों के संबंध में जिनका कतिपय संक्रामक और सांसर्गिक रोगों की बाबत उनकी अधिकारिता के भीतर किया जाना अपेक्षित है और समय पर समुचित उपायों को अपनाते हुए उनके अपने-अपने क्षेत्रों के बाहर पशुओं के आने-जाने का विनियमन करते हुए की जानी है;

और भारत, आफिस इन्टरनेशनल डेस एपिजूटीस, पेरिस का सदस्य देश है और उक्त संगठन की सामान्य बाध्यताओं, विनिश्चयों और सिफारिशों को लागू करना तथा उक्त संगठन द्वारा नियत की गई अन्तरराष्ट्रीय पशु स्वास्थ्य संहिता का पालन करना आवश्यक है;

भारत गणराज्य के साठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पशुओं में संक्रामक और सांसर्गिक रोगों का निवारण और नियंत्रण अधिनियम, 2009 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे; और भिन्न-भिन्न राज्यों के लिए या उसमें के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों के लिए और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और इस अधिनियम के ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी प्रतिनिर्देश का किसी राज्य या क्षेत्र या उपबंध के संबंध में यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह, ऐसे राज्य या क्षेत्र में, यथास्थिति, इस अधिनियम या उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रतिनिर्देश है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) पशु" से अभिप्रेत है, -

                (i) ढोर, भैंस, भेड़, बकरी, याक, मिथुन;

(ii) कुत्ता, बिल्ली, सुअर, घोड़ा, ऊंट, गधा, खच्चर, कुक्कुट, मधुमक्खी; और

(iii) ऐसा कोई अन्य पशु या पक्षी जिसे केन्द्रीय सरकार अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे;

(ख) जांच पड़ताल चौकी" से इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए पशुओं की जांच पड़ताल करने के लिए निदेशक द्वारा उस रूप में स्थापित कोई स्थान अभिप्रेत है;

(ग) सक्षम अधिकारी" से धारा 17 के अधीन सक्षम अधिकारी के रूप में अधिसूचित कोई व्यक्ति या सरकार का अधिकारी अभिप्रेत है;

(घ) अनिवार्य टीकाकरण" से अभिप्रेत है किसी पशु को किसी ऐसे अनुसूचित रोग का कोई टीका लगाना जिसकी बाबत इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन टीका आज्ञापक बनाया गया है;

(ङ) नियंत्रित क्षेत्र" से ऐसा कोई स्थानीय क्षेत्र अभिप्रेत है, जिसे धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन राज्य सरकार द्वारा उस रूप में घोषित किया गया है;

(च) त्रुटिपूर्ण वैक्सीन" से ऐसा कोई वैक्सीन अभिप्रेत है, जिसकी अवधि समाप्त हो गई है, सील टूटी हुई है, जो संदूषित, अनुपयुक्त रूप से भंडारित, लेबल रहित या विकृत लेबल के साथ है;

(छ) राज्य के संबंध में निदेशक" से पशुपालन विभाग या पशु चिकित्सा सेवा या दोनों का ऐसा भारसाधक अधिकारी अभिप्रेत है जिसे इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए राज्य सरकार द्वारा उस रूप में अधिसूचित किया गया है;

(ज) मुक्त क्षेत्र" से ऐसा कोई नियंत्रित क्षेत्र अभिप्रेत है जिसे धारा 6 की उपधारा (5) अधीन उस रूप में घोषित किया गया है;

(झ) संक्रामित पशु" से ऐसा पशु अभिप्रेत है जो किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित है;

(ञ) संक्रामित क्षेत्र" से धारा 20 के अधीन उस रूप में घोषित क्षेत्र अभिप्रेत है;

(ट) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(ठ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ड) प्रकाशन" के अंतर्गत मीडिया या समाचारपत्र या किसी अन्य जन संपर्क मीडिया और किसी क्षेत्र में ऊंची आवाज में तथा ढोल पीट कर की गई घोषणा जैसे स्थानीय संचार माध्यमों से सूचना का प्रचार-प्रसार है;

(ढ) करंतीन कैम्प" से ऐसा स्थान अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए पशुओं और पक्षियों को करंतीन करने के लिए घोषित किया गया है;

(ण) अनुसूचित रोग" से ऐसा कोई रोग अभिप्रेत है जो अनुसूची में सम्मिलित है;

(त) पशु चिकित्सक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसके पास मान्यताप्राप्त पशु चिकित्सा अर्हता है और जिसे तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन पशु रोगों का उपचार करने के लिए अनुज्ञात किया गया है;

(थ) पशु चिकित्सा अधिकारी" से कोई ऐसा अधिकारी अभिप्रेत है जिसे धारा 3 के खंड (ख) के अधीन राज्य सरकार द्वारा उस रूप में नियुक्त किया गया है;

(द) किसी ग्राम के संबंध में ग्राम अधिकारी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसे राज्य सरकार द्वारा विहित अर्हताओं के अनुसार उस रूप में प्राधिकृत या अभिहित किया गया है ।

अध्याय 2

अनुसूचित रोगों का नियंत्रण

3. पशु चिकित्सा अधिकारियों की नियुक्ति-राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, -

(क) उतने व्यक्तियों को, जितने वह उचित समझे, निरीक्षण करने के लिए और उनकी अपनी-अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं को विनिर्दिष्ट करते हुए पशु चिकित्सकों के रूप में नियुक्त कर सकेगी; और

(ख) उतने पशु चिकित्सकों को, जितने वह उचित समझे, पशु चिकित्सा अधिकारियों के रूप में नियुक्त कर सकेगी, जो अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेंगे, जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

4. अनुसूचित रोगों की रिपोर्ट करने की बाध्यता-(1) किसी ऐसे पशु का जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित है, प्रत्येक स्वामी या उस पशु का भारसाधक कोई अन्य व्यक्ति, गैर सरकारी संगठन, लोक निकाय या ग्राम पंचायत, इस तथ्य की ग्राम अधिकारी या ग्राम पंचायत प्रभारी को रिपोर्ट करेगा, जो निकटतम उपलब्ध पशु चिकित्सक को लिखित में उसकी रिपोर्ट कर सकेगा ।

(2) ग्राम अधिकारी किसी रोग के फैलने की रिपोर्ट करने के लिए अपनी अधिकारिता के भीतर आने वाले क्षेत्र का दौरा करेगा

(3) प्रत्येक पशु चिकित्सक, उपधारा (1) के अधीन किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर या अन्यथा, यदि उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई पशु किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित है, मामले की रिपोर्ट पशु चिकित्सा अधिकारी को करेगा ।

(4) जहां किसी राज्य में किसी पशु के संबंध में अनुसूचित रोग की कोई घटना हुई है वहां निदेशक, ऐसे राज्यों के, जो उस स्थान के ठीक पड़ोसी हैं, जहां ऐसी घटना हुई है, निदेशकों को रोग को फैलने से रोकने के लिए समुचित निवारक उपाय करने के लिए सूचना भेजेगा ।

5. संक्रामित पशुओं को अलग रखने का कर्तव्य-(1) किसी ऐसे पशु का प्रत्येक स्वामी या भारसाधक व्यक्ति, जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है, कि वह किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित है, ऐसे पशु को अलग रखेगा और उसे ऐसे सभी अन्य पशुओं से, जो स्वास्थ हैं, दूर स्थान पर रखेगा और संक्रामित पशु को किसी अन्य पशु के संपर्क में आने से रोकने के लिए सभी संभव उपाय करेगा ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी पशु का स्वामी या भारसाधक या उस पर नियंत्रण रखने वाला अन्य व्यक्ति उस पशु को परिरुद्ध करेगा और उसे सामान्य स्थान पर चरने या किसी सामान्य स्रोत से, जिसके अंतर्गत पात्र, तालाब, झील या नदी भी है, पानी पीने से निवारित करेगा ।

(3) नगरपालिका, पंचायत या अन्य स्थानीय प्रशासन द्वारा सभी अन्य संक्रामित पशुओं को अलग रखा जाएगा ।

6. नियंत्रित क्षेत्रों और मुक्त क्षेत्रों की अधिसूचना-(1) राज्य सरकार, किसी अनुसूचित रोग को निवारित, नियंत्रित या उन्मूलन करने के उद्देश्य से, अधिसूचना द्वारा, किसी क्षेत्र को, किसी ऐसे अधिसूचित रोग की बाबत, जो पशु की किन्हीं जातियों और किन्हीं ऐसी अन्य जातियों को प्रभावित कर रहा है, जिन्हें उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट रोग होने की संभावना है, नियंत्रित क्षेत्र के रूप में घोषित कर सकेगी ।

(2) राज्य सरकार उपधारा (1) के अधीन जारी अधिसूचना का सार देशी भाषा में किसी स्थानीय समाचारपत्र में तथा उस क्षेत्र में ऊंची आवाज में और ढोल पीटकर घोषणा द्वारा प्रकाशित करवाएगी ।

(3) जहां कोई अधिसूचना उपधरा (1) के अधीन जारी की गई है वहां नियंत्रित क्षेत्र में उक्त जातियों के सभी पशुओं को, उस रोग के लिए अनिवार्य टीका लगाया जाएगा और उस रोग के लिए ऐसे अन्य उपाय ऐसी रीति में और ऐसे समय के भीतर किए जाएंगे जो राज्य सरकार लोक सूचना द्वारा निदेश दे ।

(4) राज्य सरकार आवश्यक वैक्सीन उपलब्ध कराएगी और किसी ऐसे पशु के लिए जिसे उपधारा (3) के अधीन टीका लगाया जाना अपेक्षित है, प्रत्येक स्वामी या भारसाधक व्यक्ति के लिए, यह आबद्धकर होगा कि वह उस पशु को अनिवार्य रूप से टीका लगवाए ।

(5) जहां निदेशक से प्राप्त रिपोर्ट पर या अन्यथा, राज्य सरकार का यह समाधान हो जाता है कि किसी नियंत्रित क्षेत्र में ऐसा कोई अनुसूचित रोग, जो पशु की किसी जाति को प्रभावित कर रहा है, अब नहीं रह गया है, वहां वह, अधिसचूना द्वारा, उस क्षेत्र को पशु की विशिष्ट जातियों के संबंध में उस रोग की बाबत मुक्त क्षेत्र के रूप में घोषित कर सकेगी ।

(6) जहां उपधारा (5) के अधीन कोई अधिसूचना जारी की गई है, वहां उन जातियों के किसी पशु या अन्य संकटग्रस्त जातियों के किसी पशु को, जिसके संबंध में वह मुक्त क्षेत्र है, तब तक मुक्त क्षेत्र में प्रवेश नहीं करने दिया जाएगा जब तक कि उस विशिष्ट रोग के लिए उसे टीके द्वारा सम्यक् रूप से असंक्रामित न कर दिया गया हो ।

7. नियंत्रित क्षेत्र से पशुओं के आने-जाने पर प्रतिषेध-(1) जहां धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन किसी क्षेत्र को पशुओं की किन्हीं जातियों को प्रभावित करने वाले किसी रोग के संबंध में नियंत्रित क्षेत्र के रूप में घोषित करने वाली अधिसूचना जारी की गई है, वहां उन जातियों का कोई पशु उस स्थान से नहीं ले जाया जाएगा, जहां उसे रखा गया है ।

(2) निदेशक, किसी क्षेत्र की बाबत किसी अनुसूचित रोग के नियंत्रण, निवारण या उन्मूलन के प्रयोजन के लिए, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, उसमें विनिर्दिष्ट किन्हीं जातियों के सभी पशुओं के उस स्थान से, जहां उन्हें रखा गया है किसी उन्य स्थान पर आने-जाने को प्रतिषिद्ध कर सकेगा ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) की कोई बात, निम्नलिखित को प्रतिषिद्ध करने वाली नहीं समझी जाएगी-

(क) उसमें निर्दिष्ट किसी पशु का उस स्थान से, जहां उसे रखा गया है, उस निकटतम स्थान को ले जाना, जहां उसको टीका लगाया जा सकेगा जब तक पशु को टीका लगाकर असंक्रमीकरण के प्रयोजन के लिए ले जाया रहा है; या

(ख) किसी ऐसे पशु को ले जाना जहां तक वह टीकाकरण के विधिमान्य प्रमाणपत्र के साथ है जिसमें यह उपदर्शित किया गया है कि पशु को विशिष्ट रोग से सम्यक् रूप से असंक्रामित कर दिया गया है और उस पर ऐसे टीककारण का उचित चिह्न लगा हुआ है ।

8. टीकाकरण चिह्नांकन करना और टीका प्रमाणपत्र जारी किया जाना-(1) किसी पशु को ऐसे व्यक्ति द्वारा टीका लगाया जा सकेगा, जो तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन टीका लगाने और टीका प्रमाणपत्र जारी करने के लिए सक्षम है ।

(2) जहां किसी पशु को उपधारा (1) के उपबंधों के अनुपालन में किसी अनुसूचित रोग के लिए टीका लगाया गया है वहां पशु को टीका लगाने वाला व्यक्ति छाप लगाकर, टेटू लगाकर या कर्ण टैगिंग द्वारा या किसी ऐसी अन्य रीति में जो निदेशक, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, निदेश करे, चिह्न लगवाएगा और जब तक निदेशक द्वारा अन्यथा रूप में विनिर्दिष्ट न किया जाए, उसे हटाया नहीं जाएगा ।

(3) टीका प्रमाणपत्र जारी करने वाला प्राधिकारी टीका लगाने की तारीख, वैक्सीन के विनिर्माण और उसकी अवधि के अवसान की तारीख और वह तारीख, जिस तक पशु का टीका, विशिष्ट वैक्सीन के साथ मान्य होगा, विनिर्दिष्ट करेगा ।

9. टीका प्रमाणपत्र की अंतर्वस्तु-इस अधिनियम के अधीन जारी प्रत्येक टीका प्रमाणपत्र ऐसे प्ररूप में होगा और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

10. नियंत्रित क्षेत्र और मुक्त क्षेत्र में पशुओं का प्रवेश और उससे निकासी-(1) जहां कोई क्षेत्र, धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन पशुओं की किन्हीं जातियों को प्रभावित करने वाले किसी रोग की बाबत नियंत्रित क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है, वहां उन जातियों का कोई पशु धारा 16 में यथा उपबंधित के सिवाय, उस क्षेत्र से न तो बाहर भेजा जाएगा और न ही उसमें लाया जाएगा ।

(2) निदेशक, राजपत्र में और देशी भाषा में कम से कम एक दैनिक स्थानीय समाचारपत्र में सम्यक् रूप से प्रकाशित सूचना द्वारा उपधारा (1) में अंतर्विष्ट प्रतिषेध को पशुओं की किन्हीं अन्य जातियों तक विस्तारित कर सकेगा, यदि उन जातियों के पशुओं के भी उस रोग से संक्रामित होने की संभावना है ।

(3) माल या पशुओं का कोई वाहक, धारा 16 के उपबंधों का अनुपालन किए बिना भू-मार्ग, समुद्र मार्ग या वायु मार्ग से किसी पशु को नियंत्रित क्षेत्र, मुक्त क्षेत्र या संक्रामित क्षेत्र से बाहर नहीं ले जाएगा ।

(4) उपधारा (1) से उपधारा (3) की कोई बात उन उपधाराओं में निर्दिष्ट किसी पशु के, रेल द्वारा ऐसे क्षेत्र से जिसे, तत्समय नियंत्रित क्षेत्र या संक्रामित क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है, होकर वहन को तब तक लागू नहीं होगी जब तक पशु की उस क्षेत्र के भीतर किसी स्थान पर उतराई (चाहे वह किसी भी प्रयोजन या अवधि के लिए हो) न की गई होः

परन्तु राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह घोषणा कर सकेगी कि राज्य के भीतर किसी स्थानीय क्षेत्र में से इस प्रकार वहन किए जाने वाले पशु की कोई जातियां ऐसे अनुसूचित रोग से ऐसी रीति में और ऐसे समय के भीतर जो उक्त अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, सम्यक् रूप से असंक्रामित की जाएंगी और उस क्षेत्र में होकर रेल द्वारा पशुओं के परिवहन के लिए टीका प्रमाणपत्र एक पूर्वापेक्षा होगीः

परन्तु यह और कि जहां पहले परन्तुक में निर्दिष्ट कोई अधिसूचना जारी की गई है वहां राज्य सरकार का यह दायित्व होगा कि वह उस तथ्य को संबद्ध रेल प्राधिकारियों को सूचित करे, जिससे वे राज्य के उस स्थानीय क्षेत्र से होकर पशु का परिवहन करने के पूर्व उसके असंक्रामण के बारे में अपना समाधान कर सकें ।

11. नियंत्रित क्षेत्रों के संबंध में ऐहतियाती उपाय-कोई व्यक्ति-

(क) धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचित किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित या संक्रामित होने की युक्तियुक्त संभावना वाले किसी जीवित या मृत पशु को, 

(ख) ऐसे किसी भी प्रकार के चारे, बिछौने या अन्य सामग्री को, जो ऐसे रोग से संक्रामित किसी पशु के संसर्ग में रही है या किसी रीति में अधिसूचित रोग से प्रभावित हो सकती है, या

(ग) पशु शव, खाल या ऐसे पशु के किसी अन्य भाग या उत्पाद को,  नियंत्रित क्षेत्र से बाहर नहीं ले जाएगा ।

12. नियंत्रित क्षेत्रों में बाजारों, मेलों, प्रदर्शनी आदि का प्रतिषेध-कोई व्यक्ति, संगठन या संस्था, नियंत्रित क्षेत्र के भीतर कोई पशु बाजार, पशु मेला, पशु प्रदर्शनी नहीं लगाएगी और ऐसा कोई अन्य क्रियाकलाप नहीं करेगी जिसमें पशुओं की किन्हीं जातियों का समहू में सम्मिलित या इक्ट्ठा होना अंतर्वलित हैः

परन्तु सक्षम अधिकारी स्वप्ररेणा से या इस निमित्त उसे किए गए आवेदन पर, ऐसे मामले में पशुओं की किन्हीं जातियों के संबंध में प्रतिषेध को शिथिल कर सकेगी, जहां उन जातियों के पशुओं को अनुसूचित रोग होने की संभावना नहीं है और उनमें उस रोग को ग्रहण करने की क्षमता नहीं है, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में ऐसी शिथिलता प्रदान करना आवश्यक है ।

13. बाजार और अन्य स्थानों में संक्रामित पशुओं को लाने का प्रतिषेध-कोई व्यक्ति किसी ऐसे पशु को, जिसके बारे में उसका अनुसूचित रोग से संक्रामित होना ज्ञात है, बाजार, मेले, प्रदर्शनी या पशुओं के अन्य जमाव या किसी सार्वजनिक स्थान पर नहीं लाएगा या लाने का प्रयास नहीं करेगा ।

14. जांच पड़ताल चौकी और करंतीन कैम्प-(1) निदेशक राज्य के भीतर उतने करंतीन कैम्प और जांच पड़ताल चौकियां स्थापित कर सकेगा, जितने-

(क) ऐसे पशुओं के निरोध के लिए जो किसी अनुसूचित रोग से ग्रस्त हैं या ऐसे पशुओं के निरोध के लिए अपेक्षित हैं, जो ऐसे किसी संक्रामित पशु के संसर्ग में आ चुके हैं या उसके सामीप्य में रखे गए हैं;

(ख) ऐसे पशुओं की जातियों से संबंधित किसी पशु के, जिसके बारे में धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना या धारा 7 की उपधारा (2) के अधीन किया गया आदेश प्रवर्तन में है, किसी नियंत्रित क्षेत्र या संक्रामित क्षेत्र या मुक्त क्षेत्र में प्रवेश या उससे निकासी को रोकने को सुनिश्िचत करने के लिए अपेक्षित हैं ।

(2) किसी ऐसे पशु जिसे निरुद्ध करना, जिसका निरीक्षण करना, टीका लगाना या चिह्नांकित करना अपेक्षित है, ऐसी अवधि के लिए करंतीन कैम्प में रखा जा सकेगा जो सक्षम अधिकारी निदेश दे ।

(3) प्रत्येक ऐसा पशु, जो करंतीन कैम्प में निरुद्ध है, कैम्प के भारसाधक व्यक्ति की अभिरक्षा में होगा और उसे टीका लगाया जाएगा तथा चिह्नांकित किया जाएगा ।

(4) करंतीन कैम्प का भारसाधक अधिकारी किसी पशु की केन्द्र से निर्मुक्ति के समय ऐसे प्ररूप में, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए, पशु को भारसाधन में लेने वाले व्यक्ति को एक अनुज्ञापत्र देगा और प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, किसी सक्षम अधिकारी द्वारा जब कभी ऐसा करने की अपेक्षा की जाए, अनुज्ञापत्र पेश करने के लिए आबद्ध होगा ।

15. जांच पड़ताल चौकी और करंतीन कैम्पों में पशुओं का निरीक्षण और निरोध-(1) किसी जांच पड़ताल चौकी या करंतीन कैम्प का प्रत्येक भारसाधक व्यक्ति जांच पड़ताल चौकी पर या करंतीन कैम्प में रोके गए या उसमें निरुद्ध किसी पशु का निरीक्षण करेगा ।

(2) जांच पड़ताल चौकी या करंतीन कैम्प में निरीक्षण के प्रयोजन के लिए या अनिवार्य टीकाकरण पशुओं का चिह्नांकन करने के लिए पशु के निरीक्षण की रीति और निरोध की अवधि और वह प्ररूप और रीति, जिसमें किसी पशु की बाबत प्रवेश के लिए अनुज्ञापत्र जारी किया जा सकेगा वह होगी, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।

16. नियंत्रित और मुक्त क्षेत्रों में टीका लगे पशुओं का प्रवेश और उनसे उनकी निकासी-धारा 10 में किसी बात के होते हुए भी, पशुओं की ऐसी जातियों से संबंधित किसी पशु को, जिसकी बाबत कोई क्षेत्र किसी अनुसूचित रोग के संबंध में नियंत्रित या मुक्त क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है, जिसे उस रोग के लिए सम्यक् रूप से टीका लगाया जा चुका है, नियंत्रित क्षेत्र या मुक्त क्षेत्र में प्रवेश करने या वहां से बाहर ले जाने के लिए या किसी अन्य स्थान से बाहर ले जाने के लिए, इस आशय का प्रमाणपत्र पेश किए जाने पर अनुज्ञात किया जाएगा कि उस रोग के लिए टीका लगाया जा चुका है और उसके पश्चात् कम से कम इक्कीस दिन की अवधि व्यपगत हो चुकी है ।

17. सक्षम अधिकारियों की नियुक्ति-राज्य सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों के उचित कार्यान्वयन के लिए, अधिसूचना द्वारा, किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग या किसी कर्तव्य का निर्वहन करने के लिए सक्षम अधिकारी के रूप में प्राधिकृत कर सकेगी जो अपनी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

18. वाहकों की सफाई और विसंक्रामण-(1) प्रत्येक सामान्य वाहक चाहे वह जलयान है या यान, उस जलयान या यान में किसी पशु के परिवहन के ठीक पूर्व और पश्चात् और इस प्रकार किसी स्थान को भी, जहां पशु अभिवहन में रखा गया है, साफ और विसंक्रामित किया जाएगा ।

(2) जहां पशु की किन्हीं जातियों को प्रभावित करने वाले किसी ऐसे अनुसूचित रोग की बाबत किसी क्षेत्र को नियंत्रित क्षेत्र या मुक्त क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है वहां निदेशक, राजपत्र में और देशी भाषा में एक स्थानीय समाचारपत्र में सम्यक् रूप से प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे प्रत्येक यान के स्वामी को, जिसमें उन जातियों से संबंधित कोई पशु वहन किया गया, उस यान को उचित रूप में स्वच्छ और विसंक्रामित करने का निदेश दे सकेगा ।

19. प्रवेश और निरीक्षण की शक्तियां-कोई पशु चिकित्सा अधिकारी या अन्य सक्षम अधिकारी इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए नियमों या किए गए आदेशों के उपबंधों का ऐसे अनुपालन के लिए उत्तरदायी व्यक्तियों द्वारा अनुपालन सुनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए, किसी भूमि या भवन या स्थान, जलयान या यान में प्रवेश कर सकेगा और उसका निरीक्षण कर सकेगा ।

 

अध्याय 3

संक्रामित क्षेत्र

20. संक्रामित क्षेत्रों की घोषणा-यदि पशु चिकित्सा अधिकारी का, किसी पशु चिकित्सक से रिपोर्ट की प्राप्ति पर या अन्यथा, यह समाधान हो जाता है कि उसकी अधिकारिता के भीतर आने वाले किसी स्थान या परिसर में कोई पशु किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित हो गया है या किसी ऐसे पशु को, जिसके बारे में उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह इस प्रकार संक्रामित है, वहां रखा गया है तो वह अधिसूचना द्वारा और देशी भाषा में कम से कम एक स्थानीय समाचारपत्र में प्रकाशन द्वारा तथा ऊंची आवाज में और ढोल पीटकर घोषणा द्वारा ऐसे क्षेत्र को, जिसे वह उचित समझे (जिसके अंतर्गत पूर्वोक्त स्थान या परिसर भी है) संक्रामित क्षेत्र घोषित कर सकेगा ।

21. संक्रामित क्षेत्रों की घोषणा का प्रभाव-(1) जहां किसी क्षेत्र को धारा 20 के अधीन संक्रामित क्षेत्र के रूप में घोषित किया गया है, वहां इस अधिनियम के सभी उपबंध, जो नियंत्रित क्षेत्र के संबंध में लागू होते हैं, उसके संबंध में यथा आवश्यक परिवर्तन सहित इस प्रकार लागू होंगे मानो नियंत्रित क्षेत्र" शब्दों के स्थान पर संक्रामित क्षेत्र" शब्द रखे गए हों ।

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल डाले बिना निम्नलिखित और उपबंध संक्रामित क्षेत्र के संबंध में लागू होंगे, अर्थात्ः-

(क) उस क्षेत्र में प्रत्येक ऐसे पशु के संबंध में, जो किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित है या जिसके संक्रामित होने का युक्तियुक्त विश्वास है, पशु का स्वामी या भारसाधक अन्य व्यक्ति तुरन्त पशु चिकित्सक से उसका उपचार करवाएगा;

(ख) सभी वस्तुओं को, जिनके खंड (क) में निर्दिष्ट किसी पशु के संसर्ग में आने की संभावना है, उपचारित किया जाएगा या ऐसी रीति में व्ययनित किया जाएगा, जो पशु चिकित्सक निदेश दे;

(ग) प्रत्येक पशु चिकित्सक को निरीक्षण के प्रयोजन के लिए किसी ऐसे स्थान या परिसर में प्रवेश करने की शक्ति होगी, जहां कोई पशु रखा गया है या उसके रखे जाने की संभावना है;

(घ) खंड (क) में निर्दिष्ट पशु का स्वामी या भारसाधक कोई अन्य व्यक्ति तुरन्त पशु को अलग करेगा और ऐसे अन्य उपाय भी करेगा, जो रोग के निवारण, उपचार या नियंत्रण के लिए आवश्यक हो, जो पशु चिकित्सक निदेश दे ।

22. संक्रामित क्षेत्र की अधिसूचना को वापस लेना-यदि पशु चिकित्सा अधिकारी का, ऐसी जांच के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि किसी संक्रामित क्षेत्र में अनुसूचित रोग से किसी पशु के संक्रामित होने के बारे में अब कोई आंशका या खतरा नहीं है तो वह, अधिसूचना द्वारा, और देशी भाषा में स्थानीय समाचारपत्र में प्रकाशन द्वारा घोषित कर सकेगा कि वह क्षेत्र पूर्वोक्त के अनुसार संक्रामित क्षेत्र नहीं रह गया है, तत्पश्चात् धारा 21 में निर्दिष्ट सभी निर्बंधन लागू नहीं होंगे ।

अध्याय 4

संक्रामित पशु

23. संक्रामित पशुओं का अलग रखा जाना, उनका परीक्षण और उपचार-(1) जहां पशु चिकित्सक के पास, किसी रिपोर्ट की प्राप्ति पर या अन्यथा, यह विश्वास करने का कारण है कि कोई पशु अनुसूचित रोग से संक्रामित है, वहां वह लिखित में आदेश द्वारा ऐसे पशु के स्वामी या ऐसे अन्य व्यक्ति को, जिसके भारसाधन में ऐसा पशु है, -

(क) उसे अन्य स्पष्ट रूप से स्वस्थ पशुओं से अलग रखने; या

(ख) ऐसा उपचार कराने के लिए, जो उन परिस्थितियों में अपेक्षित हो, निदेश दे सकेगा ।

(2) जहां उपधारा (1) के अनुसरण में ऐसी कोई कार्रवाई की गई है, वहां पशु चिकित्सक, तुरंत ऐसे रोग की घटना की विस्तृत रिपोर्ट पशु चिकित्सा अधिकारी को देगा ।

(3) पशु चिकित्सा अधिकारी, पशु चिकित्सक से ऐसी रिपोर्ट प्राप्त होने पर, यथासंभव शीघ्र, उस पशु की तथा साथ ही किसी ऐसे अन्य पशु की, जो उसके सम्पर्क में आया हो, जांच करेगा और उस प्रयोजन के लिए, उस पशु को ऐसी जांच और चिकित्सीय परीक्षा के लिए भेजेगा, जो उन परिस्थितियों के अधीन अपेक्षित हो ।

(4) यदि ऐसी जांच और परीक्षण के पश्चात्, पशु चिकित्सा अधिकारी की यह राय हो कि ऐसा पशु किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित नहीं है, तो वह लिखित में एक प्रमाणपत्र जारी करेगा कि पशु किसी ऐसे रोग से संक्रामित नहीं है ।

24. पशुओं से नमूनों का लिया जाना-(1) जहां पशु चिकित्सा अधिकारी यह अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि वह पशु, जिसके किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित होने का संदेह है या ऐसे संक्रामण का खतरा है, वास्तव में संक्रामित है या उस अनुसूचित रोग की, जिससे पशु संक्रामित है, प्रकृति अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक समझता है, वहां वह ऐसे अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए, जिन्हें वह उन परिस्थितियों के अधीन आवश्यक समझे, पशु से ऐसे नमूने ले सकेगा, जो अपेक्षित हों ।

(2) पशु चिकित्सा अधिकारी या कोई अन्य सक्षम अधिकारी ऐसे पशु से यह अभिनिश्िचत करने के प्रयोजन से कि क्या पशु को किसी रोग का टीका लगाया गया है या क्या पशु को टीका लगाया जाना उसे असंक्रामित करने में प्रभावी हो गया है, नमूने ले सकेगा और ऐसे नमूनों की ऐसी रीति में परीक्षा करेगा, जो वह आवश्यक समझे ।

25. संक्रामित पशु के लिए सहज मृत्यु का आश्रय लेना-यदि पशु चिकित्सा अधिकारी यह आवश्यक समझता है कि किसी पशु की, जो अनुसूचित रोग से संक्रामित है, क्षेत्र के अन्य पशुओं में रोग को फैलने से रोकने के लिए या यदि रोग पशु संबंधी महत्व का है तो लोक स्वास्थ्य की संरक्षा करने के लिए सहजमृत्यु का आश्रय लेना आवश्यक होगा, तो वह तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, लिखित में आदेश द्वारा, पशु की सहजमृत्यु के लिए और अपने समाधानप्रद रूप में तत्काल उसके शव की अंत्येष्टि करने का निदेश दे सकेगा ।

26. शव का निपटारा-प्रत्येक व्यक्ति, जिसके कब्जे में किसी पशु का शव (या उसका कोई भाग) है, जो उसकी मृत्यु के समय किसी अनुसूचित रोग से संक्रामित था या उसके संक्रामित होने का संदेह था, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, उसका निपटारा करेगा ।

27. पशु चिकित्सा अधिकारी और पशु चिकित्सक की शव परीक्षा करने की शक्तियां-(1) जहां पशु चिकित्सा अधिकारी या किसी पशु चिकित्सक के पास यह विश्वास करने का कारण है कि किसी पशु की मृत्यु किसी अनुसूचित रोग के संक्रामण द्वारा हुई है, वहां वह पशु की शव परीक्षा करेगा या कराएगा और उस प्रयोजन के लिए वह जहां अपेक्षित हो, किसी ऐसे पशु के शव को खोदकर भूमि से बाहर निकलवाएगा, तत्पश्चात् शव की आवश्यक परीक्षा और शव परीक्षण के पश्चात् समुचित अंत्येष्टि कराएगा ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक परीक्षा और शव परीक्षा ऐसी रीति से की जाएगी और शव परीक्षण की रिपोर्ट ऐसे प्ररूप में होगी, जो विहित की जाए ।

28. कतिपय पशुओं का अभिग्रहण और उनको हटाना-जहां ऐसा कोई पशु, जो संक्रामित है या जिसके संक्रामित होने का संदेह है जिसका कोई भी व्यक्ति स्वामी होने का दावा नहीं करता है, या जहां ऐसे पशु के संबंध में दिए गए किसी विधिमान्य आदेश या निदेश का, स्वामी या अन्य व्यक्ति द्वारा, जिसके नियंत्रण में ऐसा कोई पशु है, तत्परता से अनुपालन नहीं किया जाता है, वहां पशु चिकित्सा अधिकारी या किसी अन्य सक्षम अधिकारी को, ऐसे पशु को अभिग्रहण करने, और उसे एकांत या अलग स्थान पर हटाने का, जो वह उचित समझे, विकल्प होगा ।

अध्याय 5

प्रवर्तन और शास्तियां

29. आदेशों का प्रवर्तन और खर्चों की वसूली-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम, अधिसूचना, सूचना, अध्यपेक्षा, आदेश या निदेश द्वारा किसी व्यक्ति से, -

(क) किसी पशु, किसी पशु के शव या ऐसी अन्य वस्तु के संबंध में, जो उसकी अभिरक्षा या भारसाधन में है, कोई उपाय या किसी बात को करने की अपेक्षा की जाती है तो उस व्यक्ति द्वारा तत्परता से कार्रवाई की जाएगी;

(ख) कोई ऐसा पशु जो भटका हुआ है या जिसका कोई स्वामी नहीं है, ऐसे पशु शव या उसके भाग की दशा में, कोई उपाय या किसी बात को करने की अपेक्षा की जाती है, यथास्थिति, नगरपालिका या पंचायत द्वारा अपने खर्चे पर तत्परता से कार्रवाई की जाएगी ।

(2) यदि उपधारा (1) में यथनिर्दिष्ट उपाय ऐसे समय के भीतर नहीं किए जाते हैं, जो इस प्रयोजन के लिए अनुज्ञात किया जाए, तो सूचना, अध्यपेक्षा, आदेश या निदेश जारी करने वाला प्राधिकारी, यथास्थिति, ऐसे व्यक्ति या नगरपालिका या पंचायत के खर्चे पर, जिससे या जिनसे ऐसे उपाय करने की अपेक्षा थी, उपायों को करवाएगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन किए गए किन्हीं उपायों के खर्चे, यथास्थिति, संबद्ध व्यक्ति या नगरपालिका या पंचायत से किसी न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माने की वसूली के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) द्वारा उपबंधित रीति में इस प्रकार वसूलनीय होंगे, मानो ऐसे खर्चे किसी न्यायालय द्वारा अधिरोपित जुर्माने हों ।

30. ग्राम अधिकारी, आदि द्वारा सहायता करना-सभी नगरपालिका, पंचायत या ग्राम अधिकारी और राज्य सरकार के ग्रामीण और डेयरी विकास, राजस्व, कृषि, पशुपालन और पशु चिकित्सा विभागों के सभी अधिकारी-

(क) ऐसे पशु चिकित्सा अधिकारी और ऐसे पशु चिकित्सक को, जिसकी अधिकारिता उस क्षेत्र में है, उक्त क्षेत्र में, किसी पशु या पशुओं की किसी जाति में किसी अनुसूचित रोग के होने की तत्काल सूचना देने;

(ख) किसी अनुसूचित रोग के होने या फैलने को रोकने के लिए सभी आवश्यक उपाय करने; और

(ग) पशु चिकित्सा अधिकारी और पशु चिकित्सक को इस अधिनियम के अधीन उनके कर्तव्यों के निवर्हन में या उनकी शक्तियों के प्रयोग में सहायता करने, के लिए आबद्ध होंगे ।

31. प्राधिकार के बिना टीका प्रमाणपत्र जारी करने या त्रुटिपूर्ण टीका लगाने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति-

(क) उस निमित्त किसी प्राधिकार या सक्षमता के बिना, या

(ख) ऐसा टीका लगाने के पश्चात् जिसका किसी रीति में दोषपूर्ण होना ज्ञात है, कोई टीका प्रमाणपत्र जारी करता है, तो वह ऐसे अपराध का दोषी होगा, जो पांच हजार रुपए के जुर्माने से या जुर्माने का संदाय न किए जाने की दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी, और किसी पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में, दस हजार रुपए के जुर्माने से या ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा ।

32. शास्तियां-कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के उपबंधों का उल्लंघन करता है या सक्षम अधिकारी को उसके कर्तव्यों के निर्वहन में बाधा पहुंचाता है ऐसे किसी अपराध का दोषी होगा, जो जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का हो सकेगा और शास्ति का संदाय करने में असफल रहने की दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि एक मास तक की हो सकेगी; और किसी पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में (चाहे वह उसी उपबंध या इस अधिनियम के किन्हीं अन्य उपबंधों के अधीन है, धारा 31 और धारा 33 के मामले के सिवाय) दो हजार रुपए के जुर्माने से या शास्ति का संदाय न किए जाने की दशा में, कारावास से, जिसकी अवधि दो मास तक की सकेगी, दंडनीय होगा ।

33. संक्रामित पशु या शव को नदी, आदि में फेंकने के लिए शास्ति-जो कोई, किसी पशु शव या शव के किसी भाग को, जिसका मृत्यु के समय उसे संक्रामित होना ज्ञात था, किसी नदी, झील, नहर या किसी अन्य जलाशय में डालता है, डलवाता है या डलवाने को अनुज्ञात करता है तो वह ऐसे किसी अपराध का दोषी होगा और दोषसिद्धि पर, पहले अपराध की दशा में, दो हजार रुपए के जुर्माने से या जुर्माने का संदाय न करने की दशा में, एक मास के कारावास से और पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि की दशा में पांच हजार रुपए के जुर्माने से या कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास तक की हो सकेगी, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

34. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कम्पनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगेः

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत या रजिस्ट्रीकृत समझी गई कोई सहकारी सोसाइटी, फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और

(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

अध्याय 6

रोगकारक जीव, आदि के संबंध में एहतियाती उपाय

35. रोगकारक जीव के बच निकलने का निवारण-(1) ऐसी प्रत्येक संस्था, प्रयोगशाला या क्लीनिक में, जो वैक्सीन, सीरा, निदान या रसोचिकित्सा ओषधियों से संबंधित विनिर्माण, परीक्षण या अनुसंधान में लगे हैं और जिनका उद्देश्य किसी अनुसूचित रोग का निवारण या उपचार करना है, निम्नलिखित के लिए पर्याप्त एहतियाती उपाय किए जाएंगे-

(क) यह सुनिश्चित करना कि किसी अनुसूचित रोग के रोगकारक जीव बच निकल न पाएं या अन्यथा निर्मुक्त न हो पाएं;

(ख) किसी ऐसे बच निकलने या निर्मुक्त होने से सरंक्षा करना; और

(ग) ऐसे बच निकलने की दशा में प्रत्येक संबद्ध व्यक्ति को चेतावनी देना और उसे सुरक्षित करना ।

(2) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे प्रत्येक पशु की-

(क) जिसका उपधारा (1) में यथानिर्दिष्ट विनिर्माण, परीक्षण या अनुसंधान के लिए उपयोग किया गया है; या

(ख) जिससे किसी अनुसूचित रोग के होने या उसके संचरित होने की संभावना है,

तुरंत सहज मृत्यु कारित की जाएगी और उसे उस उपधारा में निर्दिष्ट, यथास्थिति, संस्था, प्रयोगशाला या क्लीनिक के भारसाधक या उन पर नियंत्रण रखने वाले व्यक्ति द्वारा व्ययन किया जाएगा ।

(3) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी संस्था, प्रयोगशाला या क्लीनिक का भारसाधक है या उन पर नियंत्रण रखता है, उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंधों का अनुपालन करेगा; और अननुपालन की दशा में, वह ऐसे अपराध का दोषी होगा, जो जुर्माने से, जो बीस हजार रुपए तक का हो सकेगा या कारावास से जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या दोनों से, दंडनीय होगा और यदि स्थापन टीका या ओषधि का वाणिज्यिक रूप से विनिर्माण कर रहा है तो एक वर्ष की अवधि तक अनुज्ञप्ति के अस्थायी निलंबन की शास्ति भी अधिरोपित की जा सकेगी ।

अध्याय 7

प्रकीर्ण

36. प्रत्यायोजन की शक्ति-राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी को, धारा 42 की उपधारा (2) के अधीन नियम बनाने की शक्तियों के सिवाय, इस अधिनियम द्वारा या तद्धीन उसे प्रदत्त सभी या किन्हीं शक्तियों को, प्रत्यायोजित कर सकेगी ।

37. अधिकारियों और प्राधिकारियों का सरकार के नियंत्रण के अधीन कृत्य करना-इस अधिनियम के अधीन सभी अधिकारी और प्राधिकारी अपनी ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन, जो इस अधिनियम द्वारा या तद्धीन उनको प्रदत्त या उन पर अधिरोपित किए गए हैं ऐसे आदेशों के अनुसार करेंगे, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो, समय-समय पर केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा किए जाएं ।

38. अनुसूची का संशोधन करने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, अनुसूची में किसी पशु रोग को जोड़ सकेगी या उसमें से उसका लोप कर सकेगी और उक्त रोग को अधिसूचना की तारीख से, अनुसूची में जोड़ा गया या उससे लोप किया गया समझा जाएगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, जारी किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

39. निदेश जारी करने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, पशुओं के किसी संक्रामक या सांसर्गिक रोग के निवारण, नियंत्रण और उन्मूलन के उद्देश्य से, राज्य सरकार या इस अधिनियम के अधीन अन्य प्राधिकारियों को, समय-समय पर, ऐसे निदेश जारी कर सकेगी, जिनके अंतर्गत अनुसूचित रोगों और टीकाकरण के संबंध में ऐसी विवरणी और आंकड़े प्रस्तुत करने के लिए निदेश भी हैं, जो वह ठीक समझे और प्रत्येक ऐसे निदेश का अनुपालन किया जाएगा ।

40. कतिपय व्यक्तियों का लोक सेवक होना-प्रत्येक सक्षम अधिकारी, निदेशक और पशु चिकित्सा अधिकारी को, जब वे इस अधिनियम के अधीन किसी शक्ति का प्रयोग या किसी कर्तव्य का निर्वहन कर रहे हों, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थान्तर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।

41. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधनियम के उपबंधों से असंगत न हों, और जो उसे उक्त कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:

परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश इसके किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

42. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए पूर्व प्रकाशन की शर्त के अधीन रहते हुए, नियम अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) धारा 9 के अधीन टीका प्रमाणपत्र का प्ररूप और वे विशिष्टियां, जो ऐसे प्रमाणपत्र में अंतर्विष्ट होंगी;

(ख) धारा 26 की अधीन शवों के निपटान की रीति;

(ग) धारा 27 की उपधारा (1) के अधीन परीक्षा और शव परीक्षा करने की रीति तथा उपधारा (2) के अधीन शव परीक्षा की रिपोर्ट का प्ररूप;

(घ) ऐसा कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए या जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार द्वारा नियम बनाना अपेक्षित हो ।

43. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति-(1) राज्य सरकार, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन से, नियम अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) धारा 14 की उपधारा (4) के अधीन किसी करंतीन कैंप के भारसाधक अधिकारी द्वारा अनुदत्त किए जाने वाले अनुज्ञापत्र का प्ररूप;

(ख) किसी जांच पड़ताल चौकी या किसी करंतीन कैंप में अनिवार्य टीका लगाने और पशुओं का चिह्नांकन करने के लिए किसी पशु के निरीक्षण की रीति तथा निरोध की अवधि और धारा 15 की उपधारा (2) के अधीन प्रवेश अनुज्ञापत्र का प्ररूप और उसके जारी करने की रीति;

(ग) कोई अन्य विषय, जिसकी बाबत राज्य सरकार द्वारा नियम बनाए जाने हैं या बनाए जाएं ।

44. नियमों का सदनों के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं जो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभावी हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभावी होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(2) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।

45. निरसन और व्यावृत्ति-इस अधिनियम के प्रारंभ पर, -

(i) ग्लैण्डर और फार्सी अधिनियम, 1899 (1899 का 13);

(ii) डूरीन अधिनियम, 1910 (1910 का 5); और

(iii) किसी राज्य की कोई अन्य तत्स्थानी विधि, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत है, निरसित हो जाएगीः

परन्तु इस धारा की कोई बात-

(क) विधि के किसी ऐसे उपबंध के पहले से प्रवर्तन या तद्धीन सम्यक् रूप से की गई या सहन की गई किसी बात पर प्रभाव नहीं डालेगी;

(ख) विधि के किसी ऐसे उपबंध के अधीन अर्जित, प्रोद्भूत या उपगत किसी अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता या दायित्व पर प्रभाव नहीं डालेगी;

(ग) विधि के किसी ऐसे उपबंध के विरुद्ध किए गए किसी अपराध के संबंध में उपगत किसी शास्ति, समपहरण या दंड पर प्रभाव नहीं डालेगी; या

(घ) यथापूर्वोक्त किसी ऐसे अधिकार, विशेषाधिकार, बाध्यता, दायित्व, शास्ति, समपहरण या दंड के संबंध में किसी अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार पर प्रभाव नहीं डालेगी; और प्रत्येक ऐसा अन्वेषण, विधिक कार्यवाही या उपचार जारी रह सकेंगे, संस्थित या प्रवृत्त रह सकेंगे और कोई ऐसी शास्ति, समपहरण और दंड इस प्रकार अधिरोपित किए जा सकेंगे मानो विधि के पूर्वोक्त उपबंध जारी रहे थे:

परन्तु यह और कि विधि के किसी ऐसे उपबंध के अधीन की गई कोई बात या कोई कार्रवाई, जिसके अंतर्गत निकाली गई कोई अधिसूचना, किया गया आदेश, जारी की गई सूचना या रसीद या की गई घोषणा भी है, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं है, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई, किया गया, निकाली गई, किया गया, जारी की गई या की गई समझी जाएगी और तद्नुसार तब तक प्रवृत्त रहेगी जब तक कि इस अधिनियम के अधीन की गई किसी बात या की गई किसी कार्रवाई द्वारा उसे अधिक्रान्त न कर दिया गया हो ।

 

अनुसूची

[धारा 2(ण) और धारा 38 देखिए]

(क) बहु जातीय रोग

1. एंथ्रेक्स ।

2. ओजेस्की रोग ।

3. ब्लूटंग ।

4. ब्रसेलोसिस ।

5. क्राइमीन कांगो हैमरेज ज्वर ।

6. एकीनोकोकोसिस/हाईडेटिडोसिस ।

7. खुरपका और मुंहपका रोग ।

8. हर्टवाटर ।

9. जापानी एनसीफैलीटिस ।

10. लैप्टोस्पाइरोसिस ।

11. नई वर्ल्ड स्क्रूवर्म (कोचलियोंमाईया होमिनीवोरेक्स) ।

12. पुरानी वर्ल्ड स्क्रूवर्म (चैरीसोमिया बैजीआना) ।

13. पैराट्यूबरक्यूलोसिस ।

14. क्यू फीवर ।

15. रैबीज ।

16. रिफ्ट वैली ज्वर ।

17. पशुप्लेग ।

18. ट्राइकीनैलोसिस ।

19. टुलारेमिया ।

20. वैसीकुलर स्टोमैटीटिस ।

21. वेस्ट नाईल ज्वर ।

                (ख) पशु रोग

1. बोवाईन अनाप्लास्मोसिस ।

2. बोवाईन बेबीसिओसिस ।

3. बोवाईन जैनीटल कैम्पीलोबैक्टीरियोसिस ।

4. बोवाईन स्पोंगिफार्म एनसीफालोपैथी ।

5. बोवाईन ट्यूबरक्यूलोसिस ।

6. बोवाईन वायरल डायरिया ।

7. संसर्गजन्य बोवाईन फ्लूरोन्यूमोनिया ।

8. एनजूटिक बोवाईन ल्यूकोसिस ।

9. हीमोरैजिक सैस्टीसीमिया ।

10. संक्रामक बोवाईन राइनोट्रेचिटिस/संक्रामक पस्टूलर वलवोवेजीनिटिस ।

11. लम्पी स्किन रोग ।

12. मालीगनेंट कैटराहल ज्वर ।

13. थाईलीरिओसिस ।

14. ट्राइकोमोनोसिस ।

15. ट्रायपानोसीमोसिस ।

(ग) भेड़ और बकरी रोग

1. कैपरीन आर्थराईटिस/एनसीफेलिटिस ।

2. संसर्गजन्य अगलाकटिया ।

3. संसर्गजन्य कैपरीन प्लूरोनिमोनिया ।

4. एनजूटिक अबार्शन आफ ऐवीस (ओवाईन क्लामाईडियोसिस) ।

5. मैदी-विसना ।

6. नाईरोबी भेड़ रोग ।

7. ओवाईन एपीडीडायमिटिस (ब्रूसेला ओवीस) ।

8. पेस्टे डेस पेटीट्स रूमिनेंट्स ।

9. सालमोनेलोसिस (एस० एबोर्टयूसोविस) ।

10. स्क्रेपी ।

11. भेड़ पाक्स और बकरी पाक्स ।

(घ) अश्व रोग

1. अफ्रीकन मेट्रीटिस बीमारी ।

2. संसर्गजन्य मेट्रीटिस मैटरीटिस ।

3. डूरीन ।

4. अश्व एनसीफालोमाईलिटिस (पूर्वी) ।

5. अश्व एनसीफालोमाईलिटिस (पश्चिमी) ।

6. अश्व संक्रामक एनीमिया ।

7. अश्व इंफ्लूएंजा ।

8. अश्व पाइरोप्लासमोसिस ।

9. अश्व रायनोन्यूमोनिटिस ।

10. अश्व वायरल आरटेरिटस ।

11. ग्लैंडर्स ।

12. सूरा (ट्राइपानोसोमा ईवानसी) ।

13. वेनीजूएलन अश्व एनसीफालोमाईलिटिस ।

(ङ) स्वाईन रोग

1. अफ्रीकन स्वाईन ज्वर ।

2. क्लासीकल स्वाईन ज्वर ।

3. निपाह वायरस एनसीफालीटिस ।

4. पोरसिन सिसटीसरकोसिस ।

5. पोरसिन रिपरोडक्िटव और रेस्िपरेटरी सिंड्रोम ।

6. स्वाइन वेसीकुलर रोग ।

7. ट्रांसमिसिबल गैस्ट्राइनटेरीटिस ।

(च) एवीयन रोग

1. एवीयन क्लेमाइडियोसिस ।

2. एवीयन संक्रामक ब्रोंकाइटिस ।

3. एवीयन संक्रामक लैरिंगोट्राचीटिस ।

4. एवीयन माईकोप्लासमोसिस (एमरू गालीसेप्टीकम) ।

5. एवीयन माईकोप्लासमोसिस (एमरू सायनोवि) ।

6. डक वायरस हैपेटाइटिस ।

7. फाउल कोलेरा ।

8. फाउल टाइफाइड ।

9. उच्च पैथोंजनिक एवियन इंफ्लूएंजा और कुक्कुट में निम्न पैथोजनिक एवियन इंफ्लूएंजा ।

10. संक्रामक सर्ल रोग (गंबोरो रोग) ।

11. मारेक रोग ।

12. न्यूकैसल रोग ।

13. पुलोरम रोग ।

14. टर्की रिनोट्राचीटिस ।

(छ) लैगोमोर्फ रोग

1. मायोक्सोमाटोसिस ।

2. रैबीट हेमरेजिक रोग ।

(ज) मधुमक्खी रोग

1. मधुमक्खी की अकारापीसोसिस ।

2. मधुमक्खी का अमेरिकन फाउलब्रूड ।

3. मधुमक्खी का यूरोपियन फाउलब्रूड ।

4. स्माल हाइव बीटल इनफेस्टेशन (एथीना ट्यूमीडा) ।

5. मधुमक्खी का ट्रोपिलाएलप्स इनफैस्टेशन ।

6. मधुमक्खी का वारूसिस ।

(झ) मछली रोग

1. एपीजूटिक हैमाटोपोयटिक नैकरोसिस ।

2. संक्रामक हैमाटोपोयटिक नैकरोसिस ।

3. स्िप्रंग वायमिया आफ कार्प ।

4. वायरल हैमोरहैजिक सैप्टीसीमिया ।

5. संक्रामक पैनाक्रिएटिक नैकरोसिस ।

6. संक्रामक सालमन एनीमिया ।

7. एपीजूटिक अल्सरएटिव सिंड्रोम ।

8. बैक्टीरियल किडनी रोग (रैनीबैक्टीरियम सालमोनीनरम) ।

9. गायरोडेक्टाईलोसिस (गायरोडेक्टाइलोसिस सालारिस) ।

10. रैड सी ब्रीम इरीडोवायरल रोग ।

(ञ) मौलक्स रोग

1. बोनामिया ओस्ट्रिया से संक्रमण ।

2. बोनामिया एक्सीटिओसा से संक्रमण ।

3. मार्टलिया रेफ्रीनजैंस से संक्रमण ।

4. माइक्रोसायटोस मैकीनी से संक्रमण ।

5. पर्किनसस मैरीनस से संक्रमण ।

6. पर्किनसस आलसेनी से संक्रमण ।

7. एक्सनोहालीयोटिस कालीफोर्निनसिस से संक्रमण ।

(ट) क्रसटेशियन रोग

1. तौरा सिंड्रोम ।

2. व्हाईट स्पॉट रोग ।

3. येलोहेड रोग ।

4. टेट्राहीड्रल बाक्यूलोवायरोसिस (बाकलोवायरस पीनियल) ।

5. स्फैरीकल बाक्यूलोवायरोसिस (पैनासिस मोनोडोन-टाइप बाक्लोवायरस) ।

6. संक्रामक हाइपोडर्मल और हाइमैटोपायोटिक नैक्रोसिस ।

7. क्रायफिश प्लेग (एपहैनोमायसिस एसटासी) ।

(ठ) अन्य रोग

1. कैमलपाक्स ।

2. लैशमानियोसिस ।

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