रेल दावा अधिकरण अधिनियम, 1987
(1987 का अधिनियम संख्यांक 54)
[23 दिसंबर, 1987]
रेल प्रशासन को रेल द्वारा वहन के लिए सुपुर्द किए गए जीवजंतुओं या माल की हानि,
नाश, नुकसान, क्षय या अपरिदान के लिए अथवा किराए या भाड़े के प्रतिदाय के
लिए अथवा रेल दुर्घटनाओं [या अनपेक्षित घटनाओं] के परिणामस्वरूप
यात्रियों की मृत्यु या उनको होने वाली क्षति के लिए प्रतिकर के
लिए रेल प्रशासन के विरुद्ध दावों की जांच और उनका
अवधारण करने के लिए एक रेल दावा अधिकरण
की स्थापना का तथा उससे संबंधित या
उसके आनुषंगिक विषयों का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम रेल दावा अधिकरण अधिनियम, 1987 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) आवेदन" से धारा 16 के अधीन किया गया आवेदन अभिप्रेत है;
(ख) नियत दिन" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जिससे धारा 3 के अधीन दावा अधिकरण की स्थापना की जाती है;
(ग) न्यायपीठ" से दावा अधिकरण का न्यायपीठ अभिप्रेत है;
(घ) अध्यक्ष" से दावा अधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;
(ङ) दावा अधिकरण" से धारा 3 के अधीन स्थापित रेल दावा अधिकरण अभिप्रेत है;
(च) न्यायिक सदस्य" से इस अधिनियम के अधीन दावा अधिकरण के सदस्य के रूप में नियुक्त किया गया उसका सदस्य अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत ऐसा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष भी है जिसके पास धारा 5 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट कोई अर्हता है;
(छ) सदस्य" से दावा अधिकरण का सदस्य (चाहे वह न्यायिक हो या तकनीकी) अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत अध्यक्ष और उपाध्यक्ष भी हैं;
(ज) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(झ) विहित" से नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ञ) रेल अधिनियम" से भारतीय रेल अधिनियम, 1890 (1890 का 9) अभिप्रेत है;
(ट) नियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम अभिप्रेत हैं;
(ठ) तकनीकी सदस्य" से अभिप्रेत है दावा अधिकरण का ऐसा सदस्य जो न्यायिक सदस्य नहीं है, और इसके अंतर्गत ऐसा अध्यक्ष या उपाध्यक्ष भी है, जिसके पास धारा 5 की उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट कोई अर्हता है;
(ड) उपाध्यक्ष" से दावा अधिकरण का उपाध्यक्ष अभिप्रेत है ।
स्पष्टीकरण-इस अधिनियम में उपाध्यक्ष के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह प्रत्येक उपाध्यक्ष के प्रति निर्देश है;
[(ढ) अनपेक्षित दुर्घटना" का वही अर्थ है जो रेल अधिनियम, 1989 (1989 का 24) की धारा 123 के खंड (ग) में है;]
[(ण)] उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किंतु रेल अधिनियम, या उसके अधीन बनाए गए नियमों में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम या उक्त नियमों में हैं ।
अध्याय 2
रेल दावा अधिकरण और उसके न्यायपीठों की स्थापना
3. रेल दावा अधिकरण की स्थापना-केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा एक दावा अधिकरण की स्थापना इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन उसे प्रदत्त अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करने के लिए करेगी जिसका नाम रेल दावा अधिकरण होगा ।
4. दावा अधिकरण और उसके न्यायपीठों की संरचना-(1) दावा अधिकरण में एक अध्यक्ष, चार उपाध्यक्ष और उतने न्यायिक और तकनीकी सदस्य होंगे जितने केंद्रीय सरकार ठीक समझे और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, दावा अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसके न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ।
(2) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, न्यायपीठ में एक न्यायिक सदस्य और एक तकनीकी सदस्य होगा ।
(3) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष, -
(क) उस न्यायपीठ के जिसमें उसकी नियुक्ति की गई है, न्यायिक सदस्य या तकनीकी सदस्य के कृत्यों का निर्वहन करने के अतिरिक्त किसी अन्य न्यायपीठ के न्यायिक सदस्य या तकनीकी सदस्य के कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा;
(ख) उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य का एक न्यायपीठ से दूसरे न्यायपीठ को स्थानांतरण कर सकेगा;
(ग) एक न्यायपीठ में नियुक्त उपाध्यक्ष या न्यायिक सदस्य या तकनीकी सदस्य को दूसरे न्यायपीठ के, यथास्थिति, उपाध्यक्ष या न्यायिक सदस्य या तकनीकी सदस्य के कृत्यों का भी निर्वहन करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा ।
(4) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष या अध्यक्ष द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य सदस्य के लिए यह सक्षम होगा कि वह एकल सदस्य वाले न्यायपीठ के रूप में कार्य करे और ऐसे वर्ग के मामलों या ऐसे वर्ग के मामलों से संबंधित ऐसे विषयों की बाबत, जिन्हें अध्यक्ष साधारण या विशेष आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, दावा अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करे:
परंतु यदि किसी ऐसे मामले या विषय की सुनवाई के किसी प्रक्रम पर, अध्यक्ष, या ऐसे सदस्य को यह प्रतीत होता है कि ऐसा मामला या विषय ऐसी प्रकृति का है कि उसकी सुनवाई दो सदस्यों वाले किसी न्यायपीठ द्वारा की जानी चाहिए तो ऐसा मामला या विषय, यथास्थिति, अध्यक्ष द्वारा अंतरित किया जा सकेगा या ऐसे न्यायपीठ को, जो अध्यक्ष ठीक समझे, अंतरित किए जाने के लिए उसको निर्देशित किया जा सकेगा ।
(5) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, न्यायपीठ ऐसे स्थान पर अधिविष्ठ होंगे जो केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
5. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) कोई व्यक्ति, अध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह, -
(क) किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है; या
(ख) कम से कम दो वर्ष तक उपाध्यक्ष का पद धारण कर चुका है ।
(2) कोई व्यक्ति, उपाध्यक्ष के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह, -
(क) किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या होने के लिए अर्हित है; या
(ख) भारतीय विधिक सेवा का सदस्य रहा है और उस सेवा के ग्रेड 1 में कोई पद या कोई उच्चतर पद कम से कम पांच वर्ष तक धारण कर चुका है; या
(ग) कम से कम पांच वर्ष तक ऐसा सिविल न्यायिक पद धारण कर चुका है, जिसका वेतनमान भारत सरकार के संयुक्त सचिव के वेतनमान से कम नहीं है; या
(घ) कम से कम पांच वर्ष तक रेल प्रशासन के अधीन ऐसा पद धारण कर चुका है; जिसका वेतनमान भारत सरकार के संयुक्त सचिव के वेतनमान से कम नहीं है और जिसे रेल से संबंधित दावों और वाणिज्यिक विषयों के नियमों और प्रक्रिया का पर्याप्त ज्ञान और अनुभव है; या
(ङ) कम से कम तीन वर्ष की अवधि तक न्यायिक सदस्य या तकनीकी सदस्य के रूप में पद धारण कर चुका है ।
(3) कोई व्यक्ति, न्यायिक सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा, जब वह, -
(क) किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है या होने के लिए अर्हित है; या
(ख) भारतीय विधिक सेवा का सदस्य रहा है और उस सेवा के ग्रेड 1 में कोई पद कम से कम तीन वर्ष तक धारण कर चुका है; या
(ग) कम से कम तीन वर्ष तक ऐसा सिविल न्यायिक पद धारण कर चुका है जिसका वेतनमान भारत सरकार के संयुक्त सचिव के वेतनमान से कम नहीं है ।
(4) कोई व्यक्ति तकनीकी सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब वह कम से कम तीन वर्ष तक रेल प्रशासन के अधीन ऐसा पद धारण कर चुका है, जिसका वेतनमान भारत सरकार के संयुक्त सचिव के वेतनमान से कम नहीं है और जिसे रेल से संबंधित दावों और वाणिज्यिक विषयों के नियमों और प्रक्रिया का पर्याप्त ज्ञान और अनुभव है ।
(5) उपधारा (6) के उपबंधों के अधीन पहले रहते हुए, अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
(6) अध्यक्ष के रूप में किसी व्यक्ति की नियुक्ति भारत के मुख्य न्यायमूर्ति के परामर्श के बिना नहीं की जाएगी ।
6. कुछ परिस्थितियों में उपाध्यक्ष का अध्यक्ष के रूप में कार्य करना या उसके कृत्यों का निर्वहन करना-(1) अध्यक्ष की मृत्यु, पदत्याग के कारण या अन्यथा उसके पद में हुई रिक्ति की दशा में, उपाध्यक्षों में से ऐसा कोई उपाध्यक्ष, जिसे केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा जिस तारीख को ऐसी रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त नया अध्यक्ष अपना पद ग्रहण करता है ।
(2) जब अध्यक्ष अनुपस्थिति, बीमारी के कारण या किसी अन्य कारण से अपने कृत्यों का निर्वहन करने में असमर्थ हो तब उपाध्यक्षों में से ऐसा कोई उपाध्यक्ष जिसे केंद्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त प्राधिकृत करे, उस तारीख तक अध्यक्ष के कृत्यों का निर्वहन करेगा जिस तारीख को अध्यक्ष अपना कार्यभार ग्रहण करता है ।
7. पदावधि-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य, ऐसी तारीख से, जिसको वह अपना पद ग्रहण करता है, पांच वर्ष की अवधि तक अथवा-
(क) अध्यक्ष की दशा में, पैंसठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक, और
(ख) उपाध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य की दशा में, बासठ वर्ष की आयु प्राप्त कर लेने तक,
इनमें से जो भी पूर्वतर हो, उस रूप में अपना पद धारण करेगा ।
8. पदत्याग और हटाया जाना-(1) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य, राष्ट्रपति को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लिखित सूचना द्वारा अपना पद त्याग सकेगा:
परंतु अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य; जब तक कि उसे राष्ट्रपति द्वारा उससे पहले पदत्याग करने के लिए अनुज्ञा नहीं दी जाती है, ऐसी सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास का अवसान होने तक या उसके पदोत्तरवर्ती के रूप में सम्यक् रूप से नियुक्त व्यक्ति द्वारा अपना पद ग्रहण कर लेने तक या उसकी पदावधि का अवसान होने तक, इनमें से जो भी पूर्वतम हो; अपना पद धारण करता रहेगा ।
(2) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, उसके पद से, उच्चतम न्यायालय के किसी न्यायाधीश द्वारा ऐसी जांच किए जाने के पश्चात् जिसमें ऐसे अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य को उसके विरुद्ध लगाए गए आरोपों की सूचना दे दी गई हो उन आरोपों के संबंध में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिया गया हो, साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर, राष्ट्रपति द्वारा किए गए आदेश से ही हटाया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
(3) केंद्रीय सरकार, उपधारा (2) में निर्दिष्ट अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के कदाचार या असमर्थता का अन्वेषण करने के लिए नियमों द्वारा प्रक्रिया विनियमित कर सकेगी ।
9. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों के वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें-अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिनके अंतर्गत पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे हैं) ऐसी होंगी जो विहित की जाएं:
परंतु अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य के वेतन और भत्तों में तथा सेवा के अन्य निबंधनों और शर्तों में उसकी नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।
10. अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, आदि द्वारा ऐसे अध्यक्ष या उपाध्यक्ष, आदि न रहने पर पद धारण करने के संबंध में उपबंध-पद पर न रह जाने पर, -
(क) दावा अधिकरण का अध्यक्ष, भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन और नियोजन के लिए पात्र नहीं होगा;
(ख) उपाध्यक्ष इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, दावा अधिकरण के अध्यक्ष के रूप में अथवा तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित किसी अन्य अधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किंतु भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन के लिए पात्र नहीं होगा;
(ग) (अध्यक्ष या उपाध्यक्ष से भिन्न) कोई सदस्य, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, अध्यक्ष या उपाध्यक्ष के रूप में या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित किसी अन्य अधिकरण के अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त होने का पात्र होगा, किंतु भारत सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन किसी अन्य नियोजन के लिए पात्र नहीं होगा;
(घ) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य दावा अधिकरण के समक्ष उपसंजात नहीं होगा, कार्य नहीं करेगा या अभिवचन नहीं करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, भारत सरकार के अधीन या किसी राज्य सरकार के अधीन नियोजन के अंतर्गत भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकरण के अधीन अथवा भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन अथवा सरकार के स्वामित्व वाले या उसके द्वारा नियंत्रित किसी निगम या सोसाइटी के अधीन नियोजन है ।
11. अध्यक्ष की वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां-अध्यक्ष न्यायपीठों पर ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का प्रयोग करेगा जो नियमों के अधीन उसमें निहित की जाएं:
परंतु अध्यक्ष को अपनी ऐसी वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों को, जिन्हें वह उचित समझे, दावा अधिकरण के उपाध्यक्ष या किसी अन्य अधिकारी को इस शर्त के अधीन रहते हुए प्रत्यायोजित करने का प्राधिकार होगा कि उपाध्यक्ष या ऐसा अधिकारी, ऐसी प्रत्यायोजित शक्तियों का प्रयोग करते समय, अध्यक्ष के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करता रहेगा ।
12. दावा अधिकरण के कर्मचारिवृंद-(1) केंद्रीय सरकार ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों का प्रकार और प्रवर्ग अवधारित करेगी जो दावा अधिकरण को उसके कृत्यों का निर्वहन करने में सहायता करने के लिए अपेक्षित हों और दावा अधिकरण के लिए ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की व्यवस्था करेगी जो वह ठीक समझे ।
(2) दावा अधिकरण के अधिकारी और अन्य कर्मचारी अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे ।
(3) दावा अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।
अध्याय 3
दावा अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार
13. दावा अधिकरण की अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार-(1) दावा अधिकरण, नियत दिन से ही, ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग करेगा जो उस दिन के ठीक पूर्व, रेल अधिनियम के उपबंधों के अधीन नियुक्त किसी सिविल न्यायालय या दावा आयुक्त द्वारा प्रयोक्तव्य थीं, अर्थात्: -
(क) निम्नलिखित के दावों की बाबत रेल अधिनियम के अध्याय 7 के अधीन वाहक के रूप में रेल प्रशासन के उत्तरदायित्व के संबंध में, -
(i) किसी रेल प्रशासन को रेल द्वारा वहन के लिए सुपुर्द किए गए जीवजंतुओं या माल की हानि, नाश, नुकसान, क्षय या अपरिदान के लिए प्रतिकर;
(ii) रेल अधिनियम की धारा 82क या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन संदेय प्रतिकर; और
(ख) किराए या उसके भाग के प्रतिदाय के लिए या किसी रेल प्रशासन को रेल द्वारा वहन किए जाने के लिए सुपुर्द किए गए जीवजंतुओं या माल की बाबत संदत्त भाड़े के प्रतिदाय के लिए दावों के संबंध में ।
[(1क) दावा अधिकरण, रेल अधिनियम, 1989 (1989 का 24) की धारा 124क के उपबंधों के प्रारंभ की तारीख से ही, ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का भी प्रयोग करेगा जो उस तारीख के ठीक पूर्व किसी सिविल न्यायालय द्वारा उक्त अधिनियम की धारा 124क या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रेल प्रशासन द्वारा अब संदेय प्रतिकर के दावों की बाबत प्रयोक्तव्य हैं ।]
(2) [रेल अधिनियम, 1989 (1989 का 24)] और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध, जहां तक हो सके, इस अधिनियम के अधीन दावा अधिकरण द्वारा किसी दावे की जांच या उसके अवधारण को लागू होंगे ।
14. न्यायपीठों के बीच कार्य का वितरण-(1) जहां किन्हीं न्यायपीठों का गठन किया जाता है वहां केंद्रीय सरकार, समय-समय पर, अधिसूचना द्वारा, न्यायपीठों के बीच दावा अधिकरण के कार्य के वितरण के बारे में उपबंध कर सकेगी और ऐसे विषय विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिनके संबंध में प्रत्येक न्यायपीठ द्वारा कार्रवाई की जा सकेगी ।
(2) यदि ऐसा कोई प्रश्न उठता है कि कोई विषय न्यायपीठ को आबंटित कार्यक्षेत्र के भीतर आता है या नहीं, तो उस पर अध्यक्ष का विनिश्चय अंतिम होगा ।
स्पष्टीकरण-शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि विषय" पद के अंतर्गत धारा 20 के अधीन आवेदन भी है ।
15. अधिकारिता का वर्जन-नियत दिन से ही, किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी को धारा 13 की [उपधारा (1) और उपधारा (1क)] में निर्दिष्ट विषयों की बाबत कोई अधिकारिता, शक्ति या प्राधिकार नहीं होगा या वह उसका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ।
अध्याय 4
प्रक्रिया
16. दावा अधिकरण को आवेदन-(1) ऐसा कोई व्यक्ति, जो धारा 13 की उपधारा (1) [या उपधारा (1क)] में निर्दिष्ट विषयों की बाबत कोई अनुतोष प्राप्त करना चाहता है, दावा अधिकरण को आवेदन कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन ऐसे प्ररूप में होगा और उसके साथ ऐसे दस्तावेजें या अन्य साक्ष्य और ऐसे आवेदन को फाइल करने की बाबत ऐसी फीस तथा आदेशिकाओं की तामील या निष्पादन के लिए ऐसी अन्य फीस होगी जो विहित की जाए:
परंतु ऐसी कोई फीस धारा 13 की [यथास्थिति, उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (ii) या उपधारा (1क)] के अधीन आवेदन की बाबत संदेय नहीं होगी ।
17. परिसीमा-(1) दावा अधिकरण-
(क) धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) के अधीन दावा के लिए आवेदन तब तक ग्रहण नहीं करेगा, जब तक कि आवेदन उस तारीख से, जिसको प्रश्नगत माल रेल प्रशासन को रेल द्वारा वहन के लिए सुपुर्द किया गया था, तीन वर्ष के भीतर नहीं किया जाता है;
(ख) धारा 13 की [यथास्थिति, उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (ii) या उपधारा (1क)] के अधीन दावा के लिए आवेदन तब तक ग्रहण नहीं करेगा, जब तक कि आवेदन दुर्घटना के घटित होने के एक वर्ष के भीतर नहीं किया जाता है;
(ग) धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन दावा के लिए आवेदन तब तक ग्रहण नहीं करेगा, जब तक कि आवेदन उस तारीख से, जिसको किराया या भाड़ा रेल प्रशासन को संदत्त किया जाता है, तीन वर्ष के भीतर नहीं किया जाता है:
परंतु धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (क) के उपखंड (i) में निर्दिष्ट किसी दावा के लिए कोई आवेदन दावा अधिकरण को, उस तारीख के पश्चात्, जिसको रेल अधिनियम की धारा 78ख के अधीन दावे की सूचना दी गई थी, अगले तीन मास के अवसान तक नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के पश्चात् आवेदन तभी ग्रहण किया जा सकेगा जब आवेदक दावा अधिकरण का यह समाधान कर देता है कि ऐसी अवधि के भीतर आवेदन न करने का उसके पास पर्याप्त हेतुक था ।
18. दावा अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) दावा अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा, किंतु वह नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों द्वारा मार्गदर्शित होगा और इस अधिनियम के और किन्हीं नियमों के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, दावा अधिकरण को अपनी प्रक्रिया का विनियमन करने की शक्ति होगी जिसके अंतर्गत अपनी जांच करने का स्थान और समय नियत करना भी है ।
(2) दावा अधिकरण प्रत्येक आवेदन का विनिश्चय यथासंभव शीघ्रता से करेगा और सामान्यतया प्रत्येक आवेदन का विनिश्चय दस्तावेजों और लिखित व्यपदेशनों और शपथपत्रों का परिशीलन करके और ऐसे मौखिक तर्क की, जो दिए जाएं, सुनवाई करने के पश्चात् किया जाएगा ।
(3) दावा अधिकरण को, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए किसी वाद का विचारण करते समय निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) किसी व्यक्ति को समन करना तथा हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अपेक्षा करना;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;
(च) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;
(छ) किसी आवेदन को त्रुटियों के कारण खारिज करना या उसका एक पक्षीय रूप से विनिश्चय करना;
(ज) किसी आवेदन को त्रुटि के कारण खारिज करने के किसी आदेश को या अपने द्वारा एक-पक्षीय रूप से पारित किसी आदेश को अपास्त करना;
(झ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
19. विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार और उपस्थापन अधिकारी-(1) दावा अधिकरण को आवेदन करने वाला कोई व्यक्ति दावा अधिकरण के समक्ष अपना मामला प्रस्तुत करने के लिए स्वयं हाजिर हो सकेगा या वह अपनी पसंद के किसी विधि व्यवसायी की सहायता ले सकेगा ।
(2) रेल प्रशासन एक या अधिक विधिक व्यवसायियों को या अपने किसी अधिकारी को उपस्थापन अधिकारियों के रूप में कार्य करने के लिए नियुक्त कर सकेगा और उसके द्वारा इस प्रकार प्राधिकृत किया गया प्रत्येक व्यक्ति, किसी आवेदन की बाबत उसका मामला दावा अधिकरण के समक्ष प्रस्तुत कर सकेगा ।
20. एक न्यायपीठ से दूसरे न्यायपीठ को मामले अंतरित करने की अध्यक्ष की शक्ति-किसी भी पक्षकार के आवेदन पर, और पक्षकारों को सूचना देने के पश्चात् और पक्षकारों में से ऐसे पक्षकारों की, जिनकी वह सुनवाई करना चाहता है, सुनवाई के पश्चात् या ऐसी सूचना दिए बिना स्वप्रेरणा से अध्यक्ष एक न्यायपीठ के समक्ष लंबित किसी मामले को निपटाए जाने के लिए किसी अन्य न्यायपीठ को अंतरित कर सकेगा ।
21. बहुमत द्वारा विनिश्चय का किया जाना-यदि किसी न्यायपीठ के सदस्यों में किसी प्रश्न पर कोई मतभेद है तो वे ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का जिन पर उनमें मतभेद है उल्लेख करेंगे और अध्यक्ष को निर्देश करेंगे जो या तो स्वयं प्रश्न या प्रश्नों की सुनवाई करेगा या उस मामले को ऐसे प्रश्न या प्रश्नों पर अन्य सदस्यों में से किसी एक या अधिक सदस्यों द्वारा सुनवाई के लिए निर्देशित करेगा और ऐसे प्रश्न या प्रश्नों का विनिश्चय ऐसे सदस्यों के, जिन्होंने उस मामले की सुनवाई की है, जिसके अंतर्गत वे सदस्य भी हैं जिन्होंने प्रथमतः उस मामले की सुनवाई की थी, बहुमत के अनुसार किया जाएगा ।
22. दावा अधिकरण के आदेशों का निष्पादन-(1) इस अधिनियम के अधीन दावा अधिकरण द्वारा किया गया आदेश दावा अधिकरण द्वारा सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादित किया जाएगा और, इस प्रयोजन के लिए, दावा अधिकरण को सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां प्राप्त होंगी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, दावा अधिकरण अपने द्वारा किए गए किसी आदेश को स्थानीय अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को पारेषित कर सकेगा और ऐसा सिविल न्यायालय आदेश का निष्पादन ऐसे करेगा मानो वह उस न्यायालय द्वारा की गई कोई डिक्री हो ।
अध्याय 5
अपील
23. अपील-(1) उपधारा (2) में यथाउपबंधित के सिवाय और सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में या किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, अपील दावा अधिकरण के प्रत्येक आदेश के विरुद्ध, जो अंर्तवर्ती आदेश नहीं है, उस उच्च न्यायालय में होगी जिसकी उस स्थान पर अधिकारिता है जहां न्यायपीठ अवस्थित है ।
(2) दावा अधिकरण द्वारा पारित किसी आदेश के विरुद्ध कोई अपील पक्षकारों की सहमति से नहीं की जाएगी ।
(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील उस आदेश की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर की जाएगी जिस आदेश के विरुद्ध अपील की गई है ।
अध्याय 6
प्रकीर्ण
24. लंबित मामलों का अंतरण-(1) [यथास्थिति, नियत दिन या धारा 13 की उपधारा (1क) के उपबंधों के प्रारंभ की तारीख] के ठीक पूर्व किसी न्यायालय, दावा आयुक्त या अन्य प्राधिकारी के समक्ष लंबित प्रत्येक ऐसा वाद, दावा या (अपील से भिन्न) अन्य विधिक कार्यवाही जो ऐसा वाद, दावा या कार्यवाही है, जिसमें वह वाद हेतुक, जिस पर वह आधारित है ऐसा है कि वह यदि ऐसे 1[यथास्थिति, नियत दिन या धारा 13 की उपधारा (1क) के उपबंधों के प्रारंभ की तारीख] के पश्चात् उद्भूत होता, तो ऐसे दावा अधिकरण की अधिकारिता के भीतर होता 1[यथास्थिति, उस दिन या तारीख] को ऐसे अधिकरण को अंतरित हो जाएगी ।
(2) जहां कोई वाद, दावा या अन्य विधिक कार्यवाही, उपधारा (1) के अधीन किसी न्यायालय, दावा आयुक्त या अन्य प्राधिकारी से दावा अधिकरण को अंतरित हो जाती है, वहां-
(क) ऐसा न्यायालय, दावा आयुक्त या अन्य प्राधिकारी ऐसे अंतरण के पश्चात् यथाशीघ्र ऐसे वाद, दावा या अन्य कार्यवाही के अभिलेख दावा अधिकरण को भेजेगा;
(ख) दावा अधिकरण, ऐसे अभिलेखों की प्राप्ति पर, ऐसे वाद, दावा या अन्य कार्यवाही में, जहां तक हो सके, उसी रीति से जिससे किसी आवेदन की दशा में कोई कार्यवाही की जाती है, और उस प्रक्रम से, जिस पर वह ऐसे अंतरण से पहले था, या किसी पूर्वतर प्रक्रम से या नए सिरे से, जो अधिकरण ठीक समझे, आगे कार्यवाही कर सकेगा ।
25. दावा अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों का न्यायिक कार्यवाहियां होना-दावा अधिकरण के समक्ष सभी कार्यवाहियां भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193, धारा 219 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाहियां समझी जाएंगे ।
26. दावा अधिकरण के सदस्यों और कर्मचारिवृंद का लोक सेवक होना-दावा अधिकरण का अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्य तथा अधिकारी और अन्य कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
27. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केंद्रीय सरकार या अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य अथवा अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्य द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।
28. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंध, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
29. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:
परंतु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से तीन वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
30. नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात्: -
(क) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या अन्य सदस्यों के कदाचार या उनकी असमर्थता के अन्वेषण के लिए धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन प्रक्रिया;
(ख) धारा 9 के अधीन अध्यक्ष, उपाध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन तथा भत्ते और उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें (जिसके अंतर्गत, पेंशन, उपदान और अन्य सेवानिवृत्ति फायदे भी हैं);
(ग) वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियां जिनका अध्यक्ष धारा 11 के अधीन न्यायपीठों पर प्रयोग कर सकेगा;
(घ) धारा 12 की उपधारा (3) के अधीन दावा अधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन तथा भत्ते और उनकी सेवा की शर्तें;
(ङ) धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन का प्ररूप, आवेदन के साथ दिए जाने वाले दस्तावेज और अन्य साक्ष्य और ऐसे आवेदन को फाइल करने की बाबत फीस तथा आदेशिकाओं की तामील और उसके निष्पादन के लिए फीस;
(च) वे नियम जिनके अधीन रहते हुए दावा अधिकरण को धारा 18 की उपधारा (1) के अधीन अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी और वे अतिरिक्त विषय जिनमें दावा अधिकरण उस धारा की उपधारा (3) के खंड (i)के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा;
(छ) कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
[30क. भूतलक्षी प्रभाव से नियम बनाने की शक्ति-धारा 30 की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन नियम बनाने की शक्ति के अंतर्गत ऐसे नियमों को या उनमें से किसी नियम को भूतलक्षी रूप से किसी ऐसी तारीख से बनाने की शक्ति भी होगी, जो उस तारीख से पूर्वतर न हो जिसको इस अधिनियम को राष्ट्रपति की अनुमति प्राप्त हुई हो किन्तु किसी ऐसे नियम को ऐसा कोई भूतलक्षी प्रभाव नहीं दिया जाएगा जिससे किसी ऐसे व्यक्ति के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े जिसे ऐसा नियम लागू होता हो ।]
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