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उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 ( Consumer Protection Act, 1986 (Repealed) )


 

उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986

(1986 का अधिनियम संख्यांक 68)

[24 दिसम्बर, 1986]

उपभोक्ताओं के हितों के श्रेष्ठतर संरक्षण के लिए और उस

प्रयोजन हेतु उपभोक्ता परिषदों की तथा उपभोक्ता

विवादों के निपटारे हेतु अन्य प्राधिकरणों

की स्थापना करने के लिए और उससे

संबंधित विषयों के लिए

उपबंध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के सैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार, प्रारंभ और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 है ।

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे और विभिन्न राज्यों और इस अधिनियम के विभिन्न उपबन्धों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।

(4) केन्द्रीय सरकार द्वारा, अधिसूचना द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय, यह अधिनियम सभी माल और सेवाओं को लागू होगा ।

2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

 [(क) समुचित प्रयोगशाला" से ऐसी कोई प्रयोगशाला या संगठन अभिप्रेत है जो-

(i) केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्यताप्राप्त है ;

(ii) किसी राज्य सरकार द्वारा, ऐसे मार्गदर्शक सिद्धांतों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विहित किए जाएं, मान्यताप्राप्त है ; या

(iii) कोई ऐसी प्रयोगशाला या संगठन है जो तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित किया गया है, जिसका केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा, किसी माल का यह अवधारण करने की दृष्टि से कि क्या उस माल में कोई त्रुटि है, विश्लेषण या परीक्षण करने के लिए अनुरक्षण, वित्तपोषण किया जाता है या सहायता की जाती है ;]

 [(कक) शाखा कार्यालय" से अभिप्रेत है-

(i) कोई ऐसा स्थापन जो विरोधी पक्षकार द्वारा शाखा के रूप में वर्णित किया गया है ; या

(ii) कोई ऐसा स्थापन जो वही क्रियाकलाप या सारतः वही क्रियाकलाप कर रहा है जो स्थापन के मुख्य कार्यालय द्वारा किया जाता है ;]

(ख) परिवादी" से परिवाद करने वाला-

(i) कोई उपभोक्ता ; या

(ii) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई स्वैच्छिक उपभोक्ता संगम ; या

(iii) केन्द्रीय सरकार या कोई राज्य सरकार ;

 [(iv) जहां एक ही हित रखने वाले अनेक उपभोक्ता हैं वहां एक या अधिक उपभोक्ता हैं ;]

 [(v) उपभोक्ता की मृत्यु की दशा में, उसका विधिक वारिस या प्रतिनिधि,]अभिप्रेत है ;

(ग) परिवाद" से किसी परिवादी द्वारा इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उपबंधित कोई अनुतोष अभिप्राप्त करने की दृष्टि से लिखित में किया गया ऐसा कोई अभिकथन अभिप्रेत है कि-

  [(i)  [किसी व्यापारी या सेवा प्रदाता] द्वारा कोई अनुचित व्यापारिक व्यवहार या कोई अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अपनाया गया है ;]

(ii) 3[उसके द्वारा क्रय किए गए या उसके द्वारा क्रय किए जाने के लिए करार किए गए माल] में एक या अधिक त्रुटियां हैं ;]

(iii) 3[उसके द्वारा भाड़े पर ली गई या उपभोग की गई अथवा भाड़े पर लिए जाने या उपभोग किए जाने के लिए करार की गई सेवाओं] में किसी भी प्रकार की कोई कमी है ;

 4[(iv) यथास्थिति, किसी व्यापारी या सेवा प्रदाता ने परिवाद में वर्णित माल या सेवाओं के लिए ऐसी कीमत से अधिक कीमत ली है जो,-

(क) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन नियत की गई है ;

(ख) ऐसे माल या ऐसे माल को अंतर्विष्ट करने वाले किसी पैकेज पर संप्रदर्शित की गई है ;

(ग) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन उसके द्वारा प्रदर्शित कीमत सूची पर संप्रदर्शित की गई है ;

(घ) पक्षकारों के बीच करार पाई गई है ;

(v) ऐसा माल, जो उपभोग किए जाने पर जीवन और सुरक्षा के लिए परिसंकटमय होगा-

(क) ऐसे माल की सुरक्षा से संबंधित किन्हीं मानकों के, जिनका तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन अनुपालन करने की अपेक्षा की गई है, उल्लंघन में ;

(ख) यदि व्यापारी सम्यक् तत्परता से यह जान सकता हो कि इस प्रकार प्रस्थापित माल जनता के लिए असुरक्षित है,

जनता को विक्रय के लिए प्रस्थापित किया जा रहा है ;

(vi) ऐसी सेवाएं जो उनके उपयोग किए जाने पर जनता के जीवन और सुरक्षा के लिए परिसंकटमय है या जिनका परिसंकटमय होना संभाव्य है, सेवा प्रदाता द्वारा प्रस्थापित की जा रही हैं जिन्हें उक्त व्यक्ति सम्यक् तत्परता से जान सकता हो कि वह जीवन और सुरक्षा के लिए हानिकर है ;]

(घ) उपभोक्ता" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो-

(i) किसी ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागतः संदाय किया गया है, और भागतः वचन दिया गया है, या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन किसी माल का क्रय करता है, और इसके अंतर्गत ऐसे किसी व्यक्ति से भिन्न, जो ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागतः संदाय किया गया है या भागतः वचन दिया गया है या आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन माल का क्रय करता है ऐसे माल का कोई प्रयोगकर्ता भी है, जब ऐसा प्रयोग ऐसे व्यक्ति के अनुमोदन से किया जाता है किन्तु इसके अन्तर्गत ऐसा कोई व्यक्ति नहीं है जो ऐसे माल को पुनः विक्रय या किसी वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए अभिप्राप्त करता है ; और

(ii) किसी ऐसे प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है या वचन दिया गया है या भागतः संदाय किया गया है और भागतः वचन दिया गया है, या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन सेवाओं को 3[भाड़े पर लेता है या उनका उपभोग करता है] और इसके अंतर्गत ऐसे किसी व्यक्ति से भिन्न जो ऐसे किसी प्रतिफल के लिए जिसका संदाय किया गया है और वचन दिया गया है और भागतः संदाय किया गया है और भागतः वचन दिया गया है या किसी आस्थगित संदाय की पद्धति के अधीन सेवाओं को 3[भाड़े पर लेता है या उनका उपभोग करता हैट ऐसी सेवाओं का कोई हिताधिकारी भी है जब ऐसी सेवाओं का उपयोग प्रथम वर्णित व्यक्ति के अनुमोदन से किया जाता है,  [किन्तु इसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति नहीं आता है जो किसी वाणिज्यिक प्रयोजन के लिए ऐसी सेवाएं प्राप्त करता है ।]

 [स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, वाणिज्यिक प्रयोजन" के अंतर्गत किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे माल या सेवाओं का उपयोग नहीं है जिन्हें वह स्वःनियोजन द्वारा अपनी जीविका उपार्जन के प्रयोजनों के लिए अनन्य रूप से लाया है और जिनका उसने उपयोग किया है और उसने जो सेवाएं प्राप्त की हैं ;]

(ङ) उपभोक्ता विवाद" से कोई ऐसा विवाद अभिप्रेत है जब वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया है, परिवाद में अंतर्विष्ट अभिकथनों से इंकार करता है या उनका प्रतिवाद करता है ;

(च) त्रुटि" से ऐसी क्वालिटी, मात्रा, शक्ति, शुद्धता या मानक में जिसे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन  [अथवा किसी अभिव्यक्त या विवक्षित संविदा के अधीन] बनाए रखना अपेक्षित है या जिसका ऐसे किसी माल के संबंध में किसी भी प्रकार की रीति में व्यापारी द्वारा दावा किया जाता है, कोई दोष, अपूर्णता या कमी अभिप्रेत है ;

(छ) कमी" से ऐसे कार्य की क्वालिटी, प्रकृति और रीति में जिसे तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या उसके अधीन बनाए रखना अपेक्षित है या जिसका किसी सेवा के संबंध में किसी संविदा के अनुसरण में या अन्यथा किसी व्यक्ति द्वारा पालन किए जाने का वचनबंध किया गया है, कोई दोष, अपूर्णता, कमी या अपर्याप्तता अभिप्रेत है ;

(ज) जिला पीठ" से धारा 9 के खंड (क) के अधीन स्थापित उपभोक्ता विवाद प्रतितोष पीठ अभिप्रेत है ;

(झ) माल" से माल विक्रय अधिनियम, 1930 (1930 का 3) में यथा परिभाषित माल अभिप्रेत है ;

2[(ञ) विनिर्माता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो,-

                (i) किसी माल या उसके भाग को बनाता है या उसका विनिर्माण करता है ; या

                (ii) किसी माल को बनाता नहीं है या उसका विनिर्माण नहीं करता है किंतु अन्य व्यक्तियों द्वारा बनाए गए या विनिर्मित उसके भागों को संयोजित करता है ; या

(ii) किसी अन्य विनिर्माता द्वारा बनाए गए या विनिर्मित किसी माल पर अपना स्वयं का चिह्न लगाता है या लगवाता है ;]

3[(ञञ) सदस्य" के अंतर्गत, यथास्थिति, राष्ट्रीय आयोग या किसी राज्य आयोग या जिला पीठ का अध्यक्ष और कोई सदस्य है ;]

(ट) राष्ट्रीय आयोग" से धारा 9 के खंड (ग) के अधीन स्थापित राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग अभिप्रेत है ;

(ठ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित कोई अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(ड) व्यक्ति" के अन्तर्गत है :-

                (i) कोई फर्म चाहे रजिस्ट्रीकृत हो या न हो ;

                (ii) हिन्दू अविभक्त कुटुम्ब ;

                (iii) सहकारी सोसाइटी ;

                (iv) व्यक्तियों का प्रत्येक अन्य संगम चाहे वह सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत हो या न हो ;

(ढ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन, यथास्थिति, राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

2[(ढढ) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन राष्ट्रीय आयोग द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ;

(ढढढ) अवरोधक व्यापारिक व्यवहार" से ऐसा व्यापारिक व्यवहार अभिप्रेत है जिसका आशय माल या सेवाओं से संबंधित बाजार में कीमत में या उनके परिदान की स्थितियों में ऐसी रीति से व्यवहार कौशल दिखाने या प्रदायों के प्रवाह को प्रभावित करने का है जिससे उपभोक्ता पर अनुचित कीमतें या निर्बंधन थोपे जा सकें और इसके अंतर्गत-

(क) किसी व्यापारी द्वारा ऐसे माल के प्रदाय में या सेवाएं प्रदान कराने में करार पाई गई अवधि के परे विलंब, जिससे कीमत में वृद्धि हुई है या वृद्धि होने की संभावना हो ;

(ख) ऐसा कोई व्यापारिक व्यवहार जो किसी उपभोक्ता से, यथास्थिति, किसी अन्य माल या सेवा का, क्रय करने, भाड़े पर लेने या उसका उपभोग करने की, किसी अन्य माल या सेवा का पुरोभाव्य शर्त के रूप में क्रय करने, भाड़े पर लेने या उसका उपभोग करने की अपेक्षा, करता है, भी आता है ;]

(ण) सेवा" से किसी भी प्रकार की कोई सेवा अभिप्रेत है जो उसके संभावित प्रयोगकर्ताओं को उपलब्ध कराई जाती है और इसके अन्तर्गत बैंककारी, वित्तपोषण, बीमा, परिवहन, प्रसंस्करण, विद्युत या अन्य ऊर्जा के प्रदाय, बोर्ड या निवास अथवा दोनों,  [गृह निर्माण,] मनोरंजन, आमोद-प्रमोद या समाचार या अन्य जानकारी पहुंचाने के संबंध में  [सुविधाओं का प्रबंध भी है लेकिन वह इन्हीं तक सीमित नहीं है,] किन्तु इसके अन्तर्गत निःशुल्क या व्यक्तिगत सेवा संविदा के अधीन सेवा का किया जाना नहीं है ;

 [(णण) नकली माल या सेवाएं" से ऐसे माल या सेवाएं अभिप्रेत हैं जिनके असली होने का दावा किया गया है किन्तु वे वास्तव में असली नहीं है ;]

(त) राज्य आयोग" से धारा 9 के खंड (ख) के अधीन किसी राज्य के लिए स्थापित कोई उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग अभिप्रेत है ;

(थ) किसी माल के संबंध में व्यापारी" से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो विक्रयार्थ किसी माल का विक्रय या वितरण करता है और इसके अंतर्गत उसका विनिर्माता भी है और जहां ऐसे माल का विक्रय या वितरण पैकेज के रूप में किया जाता है वहां इसके अंतर्गत इसका पैकर भी है ;

 [(द) अनुचित व्यापारिक व्यवहार" से ऐसा व्यापारिक व्यवहार अभिप्रेत है जिसमें किसी माल के विक्रय, उपयोग या प्रदाय के संप्रवर्तन के प्रयोजन के लिए अथवा कोई सेवा उपलब्ध कराए जाने के लिए, कोई अनुचित पद्धति अथवा अनुचित या प्रबंधक व्यवहार जिसके अंतर्गत निम्नलिखित कोई व्यवहार है, अपनाया जाता है, अर्थात् :-

(1) मौखिक रूप से या लिखित रूप में या दृश्यरूपेण द्वारा कोई ऐसा कथन करने का व्यवहार जिसमें,-

(i) यह मिथ्या व्यपदेशन किया जाता है कि माल किसी विशिष्ट स्तरमान, क्वालिटी, मात्रा, श्रेणी, संरचना, अधिमान या माडल का है ;

(ii) यह मिथ्या व्यपदेशन किया जाता है कि सेवाएं किसी विशिष्ट स्तरमान, क्वालिटी या श्रेणी की है ;

(iii) किसी पुनर्निर्मित, बरते हुए, नवीकृत, दुरस्त किए गए या पुराने माल के नया माल होने का मिथ्या व्यपदेशन किया जाता है ;

(iv) यह व्यपदेशन किया जाता है कि माल या सेवाओं को ऐसे प्रयोजन, अनुमोदन, कार्यकरण, लक्षण, उपसाधन, प्रयोग या फायदे प्राप्त हैं जो कि ऐसे माल या सेवाओं के नहीं हैं ;

(v) यह व्यपदेशन किया जाता है कि विक्रेता या प्रदायकर्ता को ऐसा, प्रयोजन या अनुमोदन या सहबद्धता प्राप्त है जो ऐसे विक्रेता या प्रदायकर्ता को प्राप्त नहीं है ;

(vi) किसी माल या सेवाओं की आवश्यकता या उपयोगिता से संबंधित कोई मिथ्या या भ्रामक व्यपदेशन किया जाता है ;

(vii) जनता को किसी उत्पाद के या किसी माल के निष्पादन, प्रभावकारिता या अस्तित्व की दीर्घता की, जो उसके पर्याप्त या समुचित परीक्षण पर आधारित नहीं है, कोई वारंटी या प्रत्याभूति दी जाती है :

परन्तु जहां इस आशय की प्रतिरक्षा की जाती है कि ऐसी वारंटी या प्रत्याभूति पर्याप्त या समुचित परीक्षण पर आधारित है वहां ऐसी प्रतिरक्षा के सबूत का भार उस व्यक्ति पर होगा जो ऐसी प्रतिरक्षा करता है ;

(viii) जनता को इस रूप में व्यपदेशन किया जाता है जो-

(i) किसी उत्पाद या किसी माल या सेवाओं की वारंटी या प्रत्याभूति, या

(ii) किसी वस्तु या उसके किसी भाग को बदलने, उसके अनुरक्षण या उसकी मरम्मत करने अथवा कोई सेवा, जब तक कि उससे कोई विनिर्दिष्ट परिणाम प्राप्त न हो जाए, पुनः करने या उसे जारी रखने का वचन,

देने के लिए तात्पर्यित है, यदि ऐसी तात्पर्यित वारंटी या प्रत्याभूति या वचन तात्त्विक रूप से भ्रामक है अथवा यदि इस बात की कोई युक्तियुक्त संभावना नहीं है कि ऐसी वारंटी, प्रत्याभूति या वचन का पालन किया जाएगा ;

(ix) उस कीमत के बारे में जनता को तात्त्विक रूप से भुलावा दिया जाता है जिस पर किसी उत्पाद या वैसे ही उत्पाद या माल या सेवा का मामूली तौर पर विक्रय किया जाता है अथवा वह उपलब्ध कराई जाती है, तथा इस प्रयोजन के लिए कीमत के बारे में किसी व्यपदेशन को उस कीमत के प्रति निर्देश करने वाला समझा जाएगा जिस पर सुसंगत बाजार में साधारणतया वह उत्पाद या माल विक्रेताओं द्वारा विक्रय किया गया है, या सेवाएं प्रदायकर्ताओं द्वारा उपलब्ध कराई गई है, जब तक कि यह स्पष्टतया विनिर्दिष्ट न किया गया हो कि यह वह कीमत है, जिस पर उस व्यक्ति द्वारा, वह उत्पाद विक्रय किया गया है, जिसके द्वारा या सेवाएं उपलब्ध कराई गई है जिसके निमित्त व्यपदेशन किया गया है ;

(x) ऐसे मिथ्या या भ्रामक तथ्य दिए जाते हैं जो किसी अन्य व्यक्ति के माल, सेवाओं या व्यापार का अपकथन करते हैं ।

स्पष्टीकरण-खंड (1) के प्रयोजनों के लिए, ऐसे कथन के बारे में जो-

(क) विक्रय के लिए प्रस्थापित या संप्रदर्शित किसी वस्तु पर या उसके रैपर या आधान पर अभिव्यक्त है ; या

(ख) विक्रय के लिए प्रस्थापित या संप्रदर्शित किसी वस्तु से संलग्न, उसमें रखी हुई या उसके साथ की किसी चीज पर या किसी ऐसी चीज पर, जिस पर वह वस्तु संप्रदर्शन या विक्रय के लिए मढ़ी हुई है, अभिव्यक्त है ; या

(ग) किसी ऐसी वस्तु में या उस पर अंतर्विष्ट है जो जनता को विक्रय की जाती है, भेजी जाती है, परिदान की जाती है, पारेषित की जाती है या किसी भी अन्य रीति से उपलब्ध कराई जाती है,

यह समझा जाएगा कि वह ऐसा कथन है जो जनता को उस व्यक्ति द्वारा और केवल उस व्यक्ति द्वारा किया गया है जिसने उस कथन को इस प्रकार अभिव्यक्त कराया गया था या अंतर्विष्ट कराया था ;

(2) ऐसे माल या सेवाओं के किसी रियायती कीमत पर विक्रय या प्रदाय के लिए, जो उस रियायती कीमत पर विक्रय या प्रदाय के लिए प्रस्थापित की जाने के लिए आशयित नहीं है या ऐसी अवधि के लिए जो उन, और ऐसी मात्रा में जो, उस बाजार के स्वरूप को, जिसमें कारबार किया जाता है, कारबार के स्वरूप और आकार को तथा विज्ञापन की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, युक्तियुक्त है, किसी समाचारपत्र में या अन्यथा किसी विज्ञापन के प्रकाशन की अनुज्ञा देता है ।

स्पष्टीकरण-खंड (2) के प्रयोजनों के लिए, रियायती कीमत" से-

(क) ऐसी कीमत अभिप्रेत है जो किसी विज्ञापन में, मामूली कीमत के प्रति निर्देश से या अन्यथा रियायती कीमत कथित की गई है ; या

(ख) ऐसी कीमत अभिप्रेत है जो ऐसा व्यक्ति, जो उस विज्ञापन को पढ़ता, सुनता या देखता है, उन कीमतों को ध्यान में रखते हुए जिन पर विज्ञापित उत्पाद या वैसे ही उत्पाद मामूली तौर पर विक्रय किए जाते हैं, युक्तियुक्त रूप से रियायती कीमत समझेगा ;

(3) (क) दान, इनामों या अन्य वस्तुओं को प्रस्थापित किए जाने की अनुज्ञा देता है किन्तु जिन्हें प्रस्थापित किए गए रूप में दिए जाने का कोई आशय नहीं होता है अथवा जिनसे यह धारणा उत्पन्न होती है कि कोई चीज मुफ्त दी जा रही है या प्रस्थापित की जा रही है, जबकि उसकी कीमत पूर्णतः या भागतः उस रकम में आ जाती है जो उस संपूर्ण संव्यवहार में प्रभारित की जाती है ;

(ख) किसी उत्पाद के विक्रय, उपयोग या प्रदाय का अथवा किसी कारबारी हित का, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः,

संप्रवर्तन करने के प्रयोजन के लिए, किसी प्रतियोगिता, लाटरी, संयोग-प्रधान या कौशल-प्रधान खेल के संचालन की अनुज्ञा देता है ;

 [(3क) दान, ईनाम या निःशुल्क अन्य वस्तुएं प्रस्थापित करने वाली किसी स्कीम के भागीदारों से, उसके बंद हो जाने पर स्कीम के अंतिम परिणामों के बारे में जानकारी को रोकने की अनुज्ञा देता है ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, स्कीम के भागीदारों को वहां स्कीम के अंतिम परिणामों की जानकारी दे दी गई समझी जाएगी जहां ऐसे परिणाम उचित समय के भीतर उसी समाचारपत्र में प्रमुख रूप से प्रकाशित कर दिए जाते हैं जिसमें स्कीम मूल रूप से विज्ञापित की गई थी ;]

(4) ऐसे माल के विक्रय या प्रदाय की, जो उपभोक्ताओं द्वारा उपयोग किए जाने के लिए आशयित है या इस किस्म का है जिसका उपभोक्ताओं द्वारा प्रयोग किया जाना संभाव्य है, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए अनुज्ञा देता है कि वह माल निष्पादन, संरचना, अंतर्वस्तु, डिजाइन, सन्निर्माण, परिरूप या पैक करने के संबंध में, जो माल का उपयोग करने वाले व्यक्ति को क्षति की जोखिम का, निवारण करने या उसे कम करने के लिए आवश्यक है, उन स्तरमानों के अनुरूप नहीं है जो सक्षम प्राधिकारी द्वारा विहित किए गए हैं ;

(5) माल की जमाखोरी या उसको नष्ट किए जाने की अनुज्ञा देता है या माल के विक्रय किए जाने अथवा विक्रय के लिए उसके उपलब्ध कराए जाने या कोई सेवा उपलब्ध कराए जाने से इंकार करता है, यदि ऐसी जमाखोरी या ऐसा नाश किए जाने या इंकार, उसका या अन्य समरूप माल या सेवाओं का दाम, बढ़ा देता है या बढ़ाने की प्रवृत्ति रखता है या वह बढ़ाने के लिए आशयित है ;]

1[(6) नकली माल के विनिर्मित या विक्रय के लिए ऐसे माल की प्रस्थापना करने या सेवाओं के उपबंध में प्रवंचक व्यवहार अपनाने की अनुज्ञा देता है ।]

(2) इस अधिनियम में ऐसे किसी अन्य अधिनियम या उसके उपबंध के प्रति किसी ऐसे निर्देश का जो किसी ऐसे क्षेत्र में जिसको यह अधिनियम लागू होता है, प्रवृत्त नहीं है, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त किसी तत्स्थानी अधिनियम या उसके उपबंध के प्रति निर्देश है ।

3. अधिनियम का किसी अन्य विधि के अल्पीकरण में होना-इस अधिनियम के उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अतिरिक्त होंगे, न कि उसके अल्पीकरण में ।

अध्याय 2

उपभोक्ता संरक्षण परिषद्

4. केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद्-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से जो वह ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे, केन्द्रीय उपभोक्ता संरक्षण परिषद् के रूप में ज्ञात एक परिषद् का (जिसे इसमें इसके पश्चात् केन्द्रीय परिषद् कहा गया है)  [गठन करेगी] ।

(2) केन्द्रीय परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-

(क) केन्द्रीय सरकार के  [उपभोक्ता कार्यकलापों] का भारसाधक मंत्री जो उसका अध्यक्ष होगा ;

(ख) ऐसे हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले अन्य सरकारी या गैर-सरकारी सदस्यों की उतनी संख्या जो विहित की जाए

5. केन्द्रीय परिषद् के अधिवेशनों की प्रक्रिया-(1) केन्द्रीय परिषद् के अधिवेशन आवश्यकतानुसार होंगे किन्तु प्रत्येक वर्ष में परिषद्  [का कम से कम एक अधिवेशन किया जाएगा ।]

(2) केन्द्रीय परिषद् का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा जो अध्यक्ष ठीक समझे और वह अपने कारबार के संव्यवहार की बाबत ऐसी प्रक्रिया का पालन करेगी जो विहित की जाए ।

6. केन्द्रीय परिषद् के उद्देश्य-केन्द्रीय परिषद् का उद्देश्य उपभोक्ताओं के अधिकारों का संवर्धन और संरक्षण करना होगा, जैसे-

(क) जीवन और संपत्ति के लिए परिसंकटमय माल  [और सेवाओं] के विपणन के विरुद्ध संरक्षण का अधिकार ;

(ख)  [यथास्थिति, माल या सेवाओंट की क्वालिटी, मात्रा, शक्ति, शुद्धता, मानक और मूल्य के बारे में, सूचित किए जाने का अधिकार जिससे कि अनुचित व्यापारिक व्यवहार से उपभोक्ता को संरक्षण दिया जा सके ;

(ग) जहां भी संभव हो वहां प्रतिस्पर्धा मूल्यों पर विभिन्न किस्मों का माल  [और सेवाओं को] सुलभ कराने का आश्वासन दिए जाने का अधिकार ;

(घ) सुने जाने का और यह आश्वासन किए जाने का अधिकार कि उपभोक्ताओं के हितों पर समुचित पीठों में सम्यक् रूप से विचार किया जाएगा ;

(ङ) अनुचित व्यापारिक व्यवहार 1[या अवरोधक व्यापारिक व्यवहार] या उपभोक्ताओं के अनैतिक शोषण के विरुद्ध प्रतितोष प्राप्त करने का अधिकार ; और

(च) उपभोक्ता शिक्षा का अधिकार ।

7. राज्य उपभोक्ता संरक्षण परिषद्-(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से जो वह ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे, .......... उपभोक्ता संरक्षण परिषद् के रूप में ज्ञात एक परिषद् का (जिसे इसमें इसके पश्चात् राज्य परिषद् कहा गया है)  [गठन करेगी] ।

2[(2) राज्य परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-

                (क) राज्य सरकार में उपभोक्ता कार्यकलापों का भारसाधक मंत्री, जो उसका अध्यक्ष होगा ;

                (ख) ऐसे हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले उतने अन्य सरकारी और गैर-सरकारी सदस्य, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ;

 [(ग) दस से अनधिक उतने अन्य सरकारी या गैर-सरकारी सदस्य जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएं ।]

(3) राज्य परिषद् के अधिवेशन आवश्यकतानुसार होंगे किन्तु प्रत्येक वर्ष कम से कम दो अधिवेशन किए जाएंगे ।

(4) राज्य परिषद् का अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होगा जो अध्यक्ष ठीक समझे और वह अपने कारबार के संव्यवहार के बारे में ऐसी प्रक्रिया का पालन करेगी जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।]

8. राज्य परिषद् के उद्देश्य-प्रत्येक राज्य परिषद् का उद्देश्य राज्य के भीतर, धारा 6 के खंड (क) से खंड (च) में अधिकथित उपभोक्ता अधिकारों का संवर्द्धन और संरक्षण करना होगा ।

 [8क. जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद्-(1) राज्य सरकार, प्रत्येक जिले के लिए, अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख से, जो वह ऐसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट करे, जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद् के रूप में ज्ञात एक परिषद् की स्थापना करेगी ।

(2) जिला उपभोक्ता संरक्षण परिषद् में (जिसे इसमें इसके पश्चात् जिला परिषद् कहा गया है) निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-

                (क) जिले का कलक्टर (चाहे उसका जो भी नाम हो), जो उसका अध्यक्ष होगा, और

                (ख) ऐसे हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले उतने अन्य सरकारी या गैर-सरकारी सदस्य, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(3) जिला परिषद् के अधिवेशन आवश्यकतानुसार होंगे किन्तु प्रत्येक वर्ष कम से कम दो अधिवेशन किए जाएंगे ।

(4) जिला परिषद् का अधिवेशन, जिले के भीतर, ऐसे समय और स्थान पर होगा जो अध्यक्ष ठीक समझे और वह अपने कारबार के संव्यवहार के बारे में ऐसी प्रक्रिया का पालन करेगी जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।

8ख. जिला परिषद् के उद्देश्य-प्रत्येक जिला परिषद् का उद्देश्य जिले के भीतर, धारा 6 के खंड (क) से खंड (च) में अधिकथित उपभोक्ताओं के अधिकारों का संवर्द्धन और संरक्षण करना होगा ।]

अध्याय 3

उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण

9. उपभोक्ता विवाद प्रतितोष अभिकरण की स्थापना-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए निम्नलिखित अभिकरणों की स्थापना की जाएगी, अर्थात् :-

                (क) राज्य सरकार जिला पीठ" के रूप में ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष पीठ की स्थापना  । । । अधिसूचना द्वारा, राज्य के प्रत्येक जिले में करेगी :

                 [परन्तु यदि राज्य सरकार ठीक समझती है, तो वह किसी जिले में एक से अधिक जिला पीठों की स्थापना कर  सकेगी;]

                (ख) राज्य सरकार राज्य आयोग" के रूप में ज्ञात एक उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग की स्थापना 1। । । अधिसूचना द्वारा, राज्य में करेगी ; और

(ग) केन्द्रीय सरकार एक राष्ट्रीय उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग की स्थापना, अधिसूचना द्वारा करेगी ।

10. जिला पीठ की संरचना- [(1) प्रत्येक जिला पीठ निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-

(क) ऐसा कोई व्यक्ति, जो जिला न्यायाधीश है, या रह चुका है या होने के लिए अर्हित है, उसका अध्यक्ष होगा ;

 [(ख) दो ऐसे अन्य सदस्य, जिनमें एक स्त्री होगी, जिनके पास निम्नलिखित अर्हताएं होंगी, अर्थात् :-

                (i) कम से कम पैंतीस वर्ष की आयु के होंगे,

                (ii) किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि रखते हों ;

(iii) योग्य, निष्ठा और प्रतिष्ठा वाले ऐसे व्यक्ति होंगे जिन्हें अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखा-कर्म, उद्योग, लोक कार्यकलाप या प्रशासन से संबंधित समस्याओं को हल करने का पर्याप्त ज्ञान हो और जिनके पास कम से कम दस वर्ष का अनुभव हो :

परन्तु कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए निरर्हित होगा यदि वह-

(क) ऐसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है जिसमें, सरकार की राय में, नैतिक अधमता अन्तर्वलित है ; या

(ख) अनुन्मोचित दिवालिया है ; या

(ग) विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय द्वारा उसे ऐसा घोषित कर दिया गया है ; या

(घ) सरकार या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगमित निकाय की सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया गया है ; या

(ङ) राज्य सरकार की राय में, ऐसा वित्तीय हित या अन्य हित रखता है जिसके कारण सदस्य के रूप में उसके द्वारा उसके कृत्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ; या

(च) ऐसी अन्य निरर्हताएं रखता है जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं ।]

 [(1क) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक नियुक्ति, राज्य सरकार द्वारा चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-

(i) राज्य आयोग का अध्यक्ष                                                                                                                          -अध्यक्ष

(ii) राज्य के विधि विभाग का सचिव                                                                                                            -सदस्य

(iii) राज्य में उपभोक्ता कार्यकलापों के बारे में कार्यवाही

करने वाले विभाग का भारसाधक सचिव                                                                                                        सदस्य] :

                 [परन्तु जहां राज्य आयोग का अध्यक्ष, अनुपस्थिति या अन्य कारण से, चयन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने में असमर्थ हो, वहां राज्य सरकार, अध्यक्ष के रूप में कार्य करने के लिए उस उच्च न्यायालय के पीठासीन न्यायाधीश को नामनिर्दिष्ट करने के लिए मामले को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति को निर्देशित कर सकेगी ।]

                 4[(2) जिला पीठ का प्रत्येक सदस्य पांच वर्ष की अवधि के लिए या पैंसठ वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो,      पद धारण करेगा :

                परंतु कोई सदस्य पांच वर्ष की एक और अवधि के लिए या पैंसठ वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पूर्वतर हो, पुनर्नियुक्ति के लिए इस शर्त के अधीन रहते हुए पात्र होगा, कि वह उपधारा (1) के खंड (ख) में वर्णित नियुक्ति के लिए अर्हताओं और अन्य शर्तों को पूरा करता है और ऐसी पुनर्नियुक्ति भी चयन समिति की सिफारिश के आधार पर की जानी है :

                परन्तु यह और कि सदस्य, राज्य सरकार को संबोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्यागपत्र स्वीकार कर लिए जाने पर, उसका पद रिक्त हो जाएगा और वह ऐसे किसी व्यक्ति की नियुक्ति द्वारा भरा जा सकेगा जिसके पास ऐसे किसी सदस्य के प्रवर्ग के संबंध में, उपधारा (1) में वर्णित अर्हताओं में से कोई अर्हता है जिसे ऐसे व्यक्ति के स्थान पर, जिसने त्यागपत्र दिया है, उपधारा (1क) के उपबंधों के अधीन नियुक्त किया जाना अपेक्षित है :

                परन्तु यह भी कि उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ से पहले अध्यक्ष के रूप में या सदस्य के रूप में नियुक्त कोई व्यक्ति, अपनी पदावधि पूरा होने तक, यथास्थिति, अध्यक्ष के रूप में या सदस्य के रूप में ऐसा पद धारण करता रहेगा ।]

                (3) जिला पीठ के सदस्यों को देय वेतन या मानदेय और अन्य भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ऐसी होंगी जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाएं :

                  [परंतु सदस्य की पूर्णकालिक आधार पर नियुक्ति, राज्य सरकार द्वारा राज्य आयोग के अध्यक्ष की सिफारिश पर ऐसे पहलुओं को ध्यान में रखते हुए, जो विहित किए जाएं, जिसमें जिला पीठ में कार्य की मात्रा भी है, की जाएगी ।]

11. जिला पीठ की अधिकारिता-(1) इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, जिला पीठ को ऐसे परिवादों को ग्रहण करने की अधिकारिता होगी जहां माल या सेवा का मूल्य और दावा प्रतिकर, यदि कोई है,  [बीस लाख रुपए से अधिक नहीं है] ।

(2) परिवाद ऐसे जिला पीठ में संस्थित किया जाएगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर-

                (क) विरोधी पक्षकार, या जहां एक से अधिक विरोधी पक्षकार हैं वहां विरोधी पक्षकारों में से हर एक परिवाद के संस्थित किए जाने के समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता है या  [कारबार करता है या उसका शाखा कार्यालय है या वह] अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है ; अथवा

                (ख) जहां एक से अधिक विरोधी पक्षकार है वहां विरोधी पक्षकारों में से कोई भी विरोधी पक्षकार परिवाद के संस्थित किए जाने के समय वास्तव में और स्वेच्छा से निवास करता है या 3[कारबार करता है या उसका शाखा कार्यालय है या वह] अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है, परन्तु यह तब जबकि ऐसी अवस्था में या तो जिला पीठ की इजाजत दे दी गई है या जो विरोधी पक्षकार पूर्वोक्त रूप में निवास नहीं करते या 3[कारबार नहीं करते या शाखा कार्यालय नहीं रखतेट या अभिलाभ के लिए स्वयं काम नहीं करते, वे ऐसे संस्थित किए जाने के लिए उपमत हो गए हैं ; अथवा

                (ग) वाद हेतुक पूर्णतः या भागतः पैदा होता है ।

 [12. वह रीति जिसमें परिवाद किया जाएगा-(1) विक्रीत या परिदत्त या विक्रय या परिदान किए जाने के लिए करार किए गए किसी माल अथवा उपलब्ध कराई गई या उपलब्ध कराई जाने के लिए करार की गई किसी सेवा के संबंध में कोई परिवाद निम्नलिखित द्वारा जिला पीठ को किया जा सकेगा, अर्थात् :-

                (क) वह उपभोक्ता जिसको ऐसा माल विक्रीत या परिदत्त किया जाता है या जिससे विक्रय या परिदान किए जाने के लिए करार किया जाता है अथवा जिसको ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं या जिससे ऐसी सेवाएं उपलब्ध करवाए जाने के लिए करार किया जाता है ;

                (ख) कोई मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगम, चाहे वह उपभोक्ता, जिसको उस माल का विक्रय या परिदान किया जाता है या जिससे विक्रय या परिदान किए जाने का करार किया जाता है अथवा जिसको ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराई जाती हैं, या जिससे ऐसी सेवाएं उपलब्ध कराए जाने के लिए करार किया जाता है, ऐसे संगम का सदस्य हो या नहीं ;

                (ग) जहां एक ही हित रखने वाले बहुत से उपभोक्ता हैं, वहां इस प्रकार हितबद्ध सभी उपभोक्ताओं की ओर से या उनके फायदे के लिए जिला पीठ की अनुज्ञा से एक या अधिक उपभोक्ता ;

                (घ) यथास्थिति, केन्द्रीय या राज्य सरकार, अपनी व्यष्टिक हैसियत में या साधारणतः उपभोक्ताओं के हितों के प्रतिनिधि के रूप में ।

(2) उपधारा (1) के अधीन फाइल किए गए प्रत्येक परिवाद के साथ फीस की ऐसी रकम होगी और ऐसी रीति में संदेय होगी, जो विहित की जाए ।

(3) जिला पीठ, उपधारा (1) के अधीन किए गए परिवाद की प्राप्ति पर, आदेश द्वारा, परिवाद पर कार्यवाही किए जाने के लिए अनुज्ञात कर सकेगा या उसे अस्वीकार कर सकेगा :

परंतु इस उपधारा के अधीन कोई परिवाद तब तक अस्वीकार नहीं किया जाएगा जब तक कि परिवादी को सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो :

परन्तु यह और कि परिवाद की ग्राह्यता साधारणतया परिवाद की प्राप्ति की तारीख से इक्कीस दिनों के भीतर विनिश्चित की जाएगी ।

(4) जहां परिवाद पर उपधारा (3) के अधीन कार्यवाही किए जाने के लिए अनुज्ञात किया जाता है, वहां जिला पीठ परिवाद पर इस अधिनियम के अधीन उपबंधित रीति में कार्यवाही कर सकेगा :

परन्तु जहां न्यायपीठ द्वारा कोई परिवाद ग्रहण कर लिया गया है वहां वह किसी अन्य न्यायालय या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि द्वारा या उसके अधीन स्थापित किसी अधिकरण या किसी प्राधिकारी को अंतरित नहीं किया जाएगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, मान्यताप्राप्त उपभोक्ता संगम" से कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1)   या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत स्वैच्छिक उपभोक्ता संगम अभिप्रेत है ।]

13. [परिवादों के ग्रहण होने पर प्रक्रिया]-(1) जिला पीठ, 1[किसी परिवाद के ग्रहण कर लिए जाने पर] यदि वह किसी माल के संबंध में है,-

                1[(क) ग्रहण किए गए परिवाद की एक प्रति उसके ग्रहण करने की तारीख से इक्कीस दिन के भीतर परिवाद में वर्णित विरोधी पक्षकार को यह निदेश देते हुए निर्देशित करेगा कि वह तीस दिन की अवधि या पन्द्रह से अनधिक ऐसी बढ़ाई गई अवधि के भीतर, जो जिला पीठ द्वारा मंजूर की जाए, मामले के बारे में अपना पक्ष कथन प्रस्तुत करे ;]

                (ख) जहां विरोधी पक्षकार खंड (क) के अधीन उसको निर्दिष्ट किसी परिवाद की प्राप्ति पर, परिवाद में अन्तर्विष्ट अभिकथनों से इंकार करता है या उनका प्रतिवाद करता है, या जिला पीठ द्वारा दिए गए समय के भीतर अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए कोई कार्रवाई करने का लोप करता है या करने में असफल रहता है वहां जिला पीठ उपभोक्ता विवाद को खंड (ग) से खंड (छ) में विनिर्दिष्ट रीति में निपटाने के लिए कार्यवाही करेगा ;

                (ग) जहां परिवादी ने माल में किसी ऐसी त्रुटि का अभिकथन किया है जिसका अवधारण माल के उचित विश्लेषण या परीक्षण के बिना नहीं किया जा सकता है वहां जिला पीठ परिवादी से माल का नमूना अभिप्राप्त करेगा, उसे सीलबंद करेगा और विहित रीति में अधिप्रमाणित करेगा और इस प्रकार सीलबंद नमूने को इस निदेश के साथ समुचित प्रयोगशाला को निर्देशित करेगा कि ऐसी प्रयोगशाला यह पता लगाने की दृष्टि से ऐसे विश्लेषण या परीक्षण जो भी आवश्यक हो, करे कि ऐसे माल में परिवाद में अभिकथित कोई त्रुटि है या नहीं अथवा माल में कोई अन्य त्रुटि है या नहीं और उस पर अपनी रिपोर्ट निर्देश की प्राप्ति के पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर या ऐसी अवधि के भीतर जो जिला पीठ द्वारा मंजूर की गई हो, जिला पीठ को भेजेगा ;

                (घ) माल का कोई नमूना खंड (ग) के अधीन किसी समुचित प्रयोगशाला में निर्दिष्ट किए जाने के पूर्व, जिला पीठ परिवादी से प्रश्नगत माल के संबंध में आवश्यक विश्लेषण या परीक्षण करने के लिए समुचित प्रयोगशाला को संदाय के लिए ऐसी फीस जो विहित की जाए पीठ के खाते में जमा कराने की अपेक्षा कर सकेगा ;

                (ङ) जिला पीठ खंड (घ) के अधीन उसके खाते में जमा की गई रकम को समुचित प्रयोगशाला को, प्रेषित करेगा जिससे कि वह खंड (ग) में वर्णित विश्लेषण या परीक्षण कर सके और समुचित प्रयोगशाला से रिपोर्ट प्राप्त करने पर जिला पीठ ऐसे टिप्पणों सहित जो जिला पीठ उचित समझे, रिपोर्ट की एक प्रति विरोधी पक्षकार को भेजेगा ;

                (च) यदि कोई पक्षकार समुचित प्रयोगशाला के किसी निष्कर्ष की सत्यता के बारे में विवाद करता है या समुचित प्रयोगशाला द्वारा अपनाई गई विश्लेषण या परीक्षण की पद्धति के सही होने के बारे में विवाद करता है तो जिला पीठ विरोधी पक्षकार या परिवादी से समुचित प्रयोगशाला द्वारा दी गई रिपोर्ट की बाबत उसके आक्षेपों को लिखित रूप में प्रस्तुत करने की अपेक्षा कर सकेगा ;

                (छ) जिला पीठ तत्पश्चात्, परिवादी तथा विरोधी पक्षकार को, समुचित प्रयोगशाला द्वारा की गई रिपोर्ट की सत्यता के बारे में या अन्यथा और खंड (च) के अधीन उसके संबंध में किए गए आक्षेपों के बारे में भी सुनवाई का एक युक्तियुक्त अवसर देगा और धारा 14 के अधीन एक समुचित आदेश जारी करेगा ।

(2) जिला पीठ, यदि धारा 12 के अधीन उसके द्वारा 1[ग्रहण किया गया परिवाद] ऐसे माल के संबंध में है जिसकी बाबत उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्रक्रिया का अनुसरण नहीं किया जा सकता है या यदि परिवाद किसी सेवा के संबंध में है, तो वह-

                (क) ऐसे परिवाद की एक प्रति विरोधी पक्षकार को उसे यह निदेश देते हुए निर्देशित करेगा कि वह तीस दिन की अवधि के भीतर या पन्द्रह दिन से अनधिक की ऐसी बढ़ाई गई अवधि के भीतर, जो जिला पीठ द्वारा मंजूर की जाए, अपना कथन प्रस्तुत करेगा ;

                (ख) जहां विरोधी पक्षकार, खंड (क) के अधीन उसको निर्दिष्ट, परिवाद की प्रति की प्राप्ति पर, परिवाद में अंतर्विष्ट अभिकथनों से इंकार करता है या उनका प्रतिवाद करता है या जिला पीठ द्वारा दिए गए समय के भीतर अपने मामले का अभ्यावेदन करने के लिए कोई कार्रवाई करने का लोप करता है या उसमें असफल रहता है तो जिला पीठ निम्नलिखित आधार पर उपभोक्ता विवाद का निपटारा करने के लिए अग्रसर होगा,-

(i) जहां विरोधी पक्षकार परिवाद में अंतर्विष्ट अभिकथन से इंकार करता है या उनका प्रतिवाद करता है वहां परिवादी और विरोधी पक्षकार द्वारा उसकी दृष्टि में लाए गए साक्ष्य के आधार पर, या

(ii) जहां विरोधी पक्षकार पीठ द्वारा दिए गए समय के भीतर अपने मामले का अभ्यावेदन करने के लिए कोई कार्रवाई करने का लोप करता है या उसमें असफल रहता है वहां परिवादी द्वारा उसकी दृष्टि में लाए गए  [साक्ष्य के आधार पर एकपक्षीय रूप से,] या

                 [(ग) जहां परिवादी जिला पीठ के समक्ष सुनवाई की तारीख को उपसंजात होने में असफल रहता है वहां जिला पीठ या तो व्यतिक्रम के कारण परिवाद को खारिज कर सकेगा या उसका विनिश्चय गुणागुण के आधार पर कर सकेगा ।]

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में अधिकथित प्रक्रिया के अनुपालन में किसी भी कार्यवाही को किसी न्यायालय में इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि नैसर्गिक न्याय के सिद्धांतों का अनुपालन नहीं किया गया है ।

2[(3क) प्रत्येक परिवाद की सुनवाई यथासंभव शीघ्रता के साथ की जाएगी और जहां परिवाद में वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की अपेक्षा नहीं है, वहां विरोधी पक्ष को सूचना की प्राप्ति की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर और यदि उसमें वस्तुओं के विश्लेषण या परीक्षण की अपेक्षा है तो पांच मास के भीतर परिवाद का विनिश्चय करने का प्रयास किया जाएगा :

परन्तु जिला पीठ द्वारा साधारणतया तब तक कोई स्थगन मंजूर नहीं किया जाएगा जब तक कि पर्याप्त कारण दर्शित नहीं किया गया हो और स्थगन मंजूर करने के कारणों को पीठ द्वारा लेखबद्ध नहीं किया गया हो :

परन्तु यह और कि जिला पीठ स्थगन के कारण खर्चे के लिए ऐसे आदेश करेगा जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों में उपबंधित किए जाएं :

परन्तु यह भी कि परिवाद का, इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के पश्चात्, निपटारा किए जाने की दशा में, जिला पीठ, उक्त परिवाद का निपटारा करते समय उसके कारणों को लेखबद्ध करेगा ।

(3ख) जहां जिला पीठ के समक्ष किसी कार्यवाही के लंबित रहने के दौरान, उसे यह आवश्यक प्रतीत होता है, वहां वह ऐसा अंतरिम आदेश पारित कर सकेगा जो मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में न्यायसंगत और उचित हो ।] 

(4) इस धारा के प्रयोजनार्थ जिला पीठ को, निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी, जो किसी सिविल न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय होती हैं, अर्थात् :-

                (i) किसी प्रतिवादी या साक्षी को समन करना तथा हाजिर कराना और शपथ पर साक्षी की परीक्षा करना ;

                (ii) साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य दस्तावेज या किसी अन्य तात्त्विक वस्तु का प्रकटीकरण और पेश किया जाना ;

                (iii) शपथ पत्रों पर साक्ष्य पेश करना ;

                (iv) समुचित प्रयोगशाला या किसी अन्य सुसंगत स्रोत से संबद्ध विश्लेषण या परीक्षण की रिपोर्ट की अध्यपेक्षा करना ;

                (v) किसी साक्षी की परीक्षा के लिए कोई कमीशन निकालना ;

                (vi) कोई अन्य विषय जो विहित किए जाएं ।

(5) जिला पीठ के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और जिला पीठ दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनार्थ सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

 [(6) जहां परिवादी धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) के उपखंड (iv) में निर्दिष्ट कोई उपभोक्ता है, वहां सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की पहली अनुसूची के आदेश 1 के नियम 8 के उपबंध इस उपांतरण के अधीन रहते हुए लागू होंगे कि उसमें वाद या डिक्री के प्रति प्रत्येक निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह किसी परिवाद या उस पर जिला पीठ के आदेश के प्रति निर्देश है ।]

 [(7) ऐसे परिवादी की मृत्यु की दशा में, जो एक उपभोक्ता है या ऐसा विरोधी पक्षकार है जिसके विरुद्ध परिवाद फाइल किया गया है, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की पहली अनुसूची के आदेश 22 के उपबंध इस उपांतरण के अधीन रहते हुए लागू होंगे कि उसमें वादी और प्रतिवादी के प्रत्येक निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, परिवादी या विरोधी पक्षकार के प्रति निर्देश है ।]

14. जिला पीठ के निष्कर्ष-(1) यदि, धारा 13 के अधीन की गई कार्यवाही के पश्चात्, जिला पीठ का यह समाधान हो जाता है कि उस माल में जिसके बारे में परिवाद किया गया है, परिवाद में विनिर्दिष्ट कोई त्रुटि है या सेवाओं के बारे में परिवाद में अंतर्विष्ट कोई अभिकथन साबित हो गया है तो वह विरोधी पक्षकार को निम्नलिखित में से कोई एक या अधिक बातें करने का निदेश देने वाला आदेश जारी करेगा, अर्थात् :-

                (क) प्रश्नगत माल में से समुचित प्रयोगशाला द्वारा प्रकट की गई त्रुटि को दूर करना ;

                (ख) माल को उसी वर्णन के नए और त्रुटिहीन माल से बदलना ;

                (ग) परिवादी द्वारा विरोधी पक्षकार को संदत्त, यथास्थिति, कीमत या प्रभारों को परिवादी को वापस लौटाना ;

                (घ) ऐसी रकम का संदाय करना जो विरोधी पक्षकार की उपेक्षा के कारण उपभोक्ता द्वारा सहन की गई किसी हानि या क्षति के लिए परिवादी को प्रतिकर के रूप में अधिनिर्णीत की गई है :

                 [परंतु जिला पीठ को, ऐसी परिस्थितियों में, जिन्हें वह उचित समझता है, दंडात्मक नुकसानी मंजूर करने की  शक्ति होगी ;]

                 [(ङ)  [प्रश्नगत माल की त्रुटियों या सेवाओं की कमियों को दूर करना ;]

                (च) अनुचित व्यापारिक व्यवहार या अवरोधक व्यापारिक व्यवहार को बन्द करना या उसे न दोहराना ;

                (छ) परिसंकटमय माल के विक्रय के लिए प्रस्थापना न करना ;

                (ज) परिसंकटमय माल को विक्रय के लिए प्रस्थापित किए जाने से प्रत्याहृत करना ;

3[(जक) परिसंकटमय माल के विनिर्माण को बंद करना और ऐसी सेवाओं की प्रस्थापना करने से प्रतिविरत रहना जो परिसंकटमय प्रकृति की हैं ;

                (जख) ऐसी रकम का संदाय करना जो उसके द्वारा अवधारित की जाए यदि उसकी यह राय है कि हानि या क्षति उपभोक्ताओं की ऐसी बड़ी संख्या द्वारा सहन की गई है जिनकी सुगमता से पहचान नहीं की जा सकती :

                परन्तु इस प्रकार संदेय राशि की न्यूनतम रकम ऐसे उपभोक्ताओं को, यथास्थिति, विक्रय किए गए त्रुटिपूर्ण माल या उपलब्ध कराई गई सेवा के मूल्य के पांच प्रतिशत से कम नहीं होगी :

                परन्तु यह और कि इस प्रकार अभिप्राप्त की गई रकम ऐसे व्यक्ति के हक में जमा की जाएगी और ऐसी रीति में उपयोजित की जाएगी, जो विहित की जाए ;

                (जग) विरोधी पक्षकार के खर्चे पर, जो ऐसा भ्रामक विज्ञापन जारी करने के लिए उत्तरदायी है, भ्रामक विज्ञापन के प्रभाव को निष्प्रभावी करने के लिए दोष निवारक विज्ञापन जारी करना ;]

                (झ) पक्षकारों के लिए पर्याप्त खर्चों की व्यवस्था करना ।]

 [(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक कार्यवाही का संचालन जिला पीठ के अध्यक्ष और उसके साथ बैठने वाले जिला पीठ के कम से कम एक सदस्य द्वारा किया जाएगा :

                5[परंतु जहां किसी कारण से वह सदस्य उस कार्यवाही का संचालन उसके पूर्ण होने तक करने में असमर्थ है, वहां अध्यक्ष और अन्य सदस्य कार्यवाही को उस प्रक्रम से आगे जारी रखेंगे जिस तक उसमें अंतिम सुनवाई पूर्व सदस्य द्वारा की गई थी ।]

(2क) जिला पीठ द्वारा उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश पर उसके अध्यक्ष और ऐसे सदस्य या सदस्यों द्वारा हस्ताक्षर किए जाएंगे जिसने या जिन्होंने कार्यवाही का संचालन किया है :

परंतु जहां कार्यवाही का संचालन अध्यक्ष और एक सदस्य द्वारा किया जाता है और उनका किसी प्रश्न या किन्हीं प्रश्नों पर मतभेद है तो वे उस प्रश्न को या उन प्रश्नों को, जिन पर उनका मतभेद है, कथित करेंगे और उसे ऐसे प्रश्न या प्रश्नों पर सुनवाई के लिए अन्य सदस्य को निर्दिष्ट करेंगे तथा बहुमत की राय जिला पीठ का आदेश होगा ।]

(3) पूर्वगामी उपबंधों के अधीन रहते हुए, जिला पीठ के सदस्यों के आचरण, उसके अधिवेशन और अन्य विषयों से संबंधित प्रक्रिया ऐसी होगी जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।

15. अपील-जिला पीठ द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से जो विहित की जाए, उस आदेश के विरुद्ध राज्य आयोग को अपील कर सकेगा :

परन्तु राज्य आयोग, तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न करने का पर्याप्त कारण था :

 [परंतु यह और कि किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जिससे जिला पीठ के किसी आदेश के निबंधनानुसार किसी रकम का संदाय करने की अपेक्षा की जाती है, की गई कोई अपील राज्य आयोग द्वारा तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक कि अपीलार्थी ने, विहित रीति में, उस रकम का पचास प्रतिशत या पच्चीस हजार रुपए, इनमें से जो भी कम हो, जमा नहीं कर दिए हों ।]

16. राज्य आयोग की संरचना-(1) प्रत्येक राज्य आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा :-

                (क) एक ऐसा व्यक्ति जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है, जिसे राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा और जो उसका अध्यक्ष होगा :

                 [परंतु इस खंड के अधीन कोई नियुक्ति, उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात् ही की जाएगी, अन्यथा नहीं ;]

                 [(ख) कम से कम दो और अधिक से अधिक उतनी संख्या में सदस्य जो विहित की जाए, और उनमें से एक स्त्री होगी, जिनके पास निम्नलिखित अर्हताएं होंगी-

                                (i) जिसकी आयु पैंतीस वर्ष से कम की नहीं होगी ;

                                (ii) जिसके पास किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि होगी ; और

                (iii) ऐसे व्यक्ति होंगे जो योग्य, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले हों और जिन्हें अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोककार्य या प्रशासन से संबंधित समस्याओं के संबंध में कार्यवाही करने का पर्याप्त ज्ञान और जिनके पास कम-से-कम दस वर्ष का अनुभव हो :

                                परन्तु सदस्यों में से पचास प्रतिशत से अनधिक सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति होंगे ।

                स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति" से ऐसे व्यक्ति अभिप्रेत हैं जो जिला स्तर के न्यायालय या समतुल्य स्तर के किसी अधिकरण में पीठासीन अधिकारी के रूप में कम-से-कम दस वर्षों की अवधि का ज्ञान और अनुभव रखते हैं :

                                परन्तु यह और कि कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए निरर्हित होगा यदि वह,-

(क) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है जिसमें, राज्य सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है ; या

                                (ख) अनुन्मोचित दिवालिया है ; या

                                (ग) विकृत चित्त का है और किसी सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित किया गया है ; या

                (घ) सरकार या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगमित निकाय की सेवा से हटाया गया है या पदच्युत किया गया है ; या

(ङ) राज्य सरकार की राय में, ऐसे वित्तीय या अन्य हित रखता है जिनसे उसके सदस्य के रूप में उसके द्वारा उसके कृत्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ; या

                                                (च) ऐसी अन्य निरर्हता रखता है जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए ।]

 [(1क) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक नियुक्ति राज्य सरकार द्वारा निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनने वाली चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी, अर्थात् :-

(i) राज्य आयोग का अध्यक्ष                                                                                                                           -अध्यक्ष ;

(ii) राज्य के विधि विभाग का सचिव                                                                                                              -सदस्य ;

(iii) राज्य में उपभोक्ता कार्यों से संबंधित विभाग का भारसाधक सचिव                                             -सदस्य :

                परंतु जहां राज्य आयोग का अध्यक्ष, अनुपस्थिति या किसी अन्य कारण से, चयन समिति के अध्यक्ष के रूप में कार्य करने में असमर्थ है, वहां राज्य सरकार मामले को उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति को, उस उच्च न्यायालय के किसी आसीन न्यायाधीश को अध्यक्ष के रूप में नामनिर्देशित करने के लिए, निर्देशित कर सकेगी ।

(1ख) (i) राज्य आयोग की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ;

(ii) अध्यक्ष द्वारा किसी न्यायपीठ का गठन, एक या अधिक सदस्यों से, जैसा अध्यक्ष ठीक समझे, किया जा सकेगा ;

(iii) यदि न्यायपीठ के सदस्यों में किसी मुद्दे पर मतभेद है तो, उन मुद्दों का विनिश्चय यदि बहुमत है, बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा, किंतु यदि सदस्य बराबर संख्या में बंटे हुए हैं तो उस मुद्दे या मुद्दों का कथन करेंगे जिन पर उनमें मतभेद है और उन्हें अध्यक्ष को निर्देशित करेंगे जो या तो स्वयं उस मुद्दे या मुद्दों पर सुनवाई करेगा या मामले को ऐसे मुद्दे या मुद्दों पर एक या अधिक या अन्य सदस्यों द्वारा सुनवाई के लिए निर्देशित करेगा और ऐसे मुद्दे या मुद्दों का विनिश्चय उन सदस्यों के बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा जिन्होंने मामले की सुनवाई की है और जिनमें वे सदस्य भी सम्मिलित हैं जिन्होंने उसकी प्रथम बार सुनवाई की थी ।]

(2) राज्य आयोग के सदस्यों को देय वेतन या मानदेय और अन्य भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निर्बंधन और शर्तें, । । । वे होंगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं :

1[परंतु पूर्णकालिक आधार पर किसी सदस्य की नियुक्ति, राज्य सरकार द्वारा, राज्य आयोग के अध्यक्ष की सिफारिश पर, ऐसी बातों को ध्यान में रखते हुए, जो विहित की जाएं जिसके अंतर्गत राज्य आयोग के काम का भार भी है, की जाएगी ।]

 [(3) राज्य आयोग का प्रत्येक सदस्य पांच वर्ष की अवधि तक या सड़सठ वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पहले हो, पद   धारण करेगा :

परन्तु सदस्य पांच वर्ष की एक और अवधि के लिए या सड़सठ वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पहले हो, इस शर्त के अधीन रहते हुए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा कि वह उपधारा (1) के खंड (ख) में उल्लिखित नियुक्ति के लिए अर्हताओं और अन्य शर्तों को पूरा करता है और ऐसी पुनर्नियुक्ति चयन समिति की सिफारिशों के आधार पर की गई है :

परन्तु यह और कि राज्य आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति, इस धारा की उपधारा (1) के खंड (क) में उपबंधित रीति से पुनर्नियुक्ति का भी पात्र होगा :

परन्तु यह भी कि सदस्य राज्य सरकार को संबोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्यागपत्र स्वीकार हो जाने पर उसका पद रिक्त हो जाएगा और वह पद ऐसे सदस्य के प्रवर्ग से संबंधित उपधारा (1) में वर्णित अर्हताओं में से कोई अर्हता रखने वाले व्यक्ति की नियुक्ति द्वारा भरा जा सकेगा, जिसे उस व्यक्ति के स्थान पर जिसने त्यागपत्र दिया है, उपधारा (1क) के उपबंधों के अधीन नियुक्त किया जाना अपेक्षित है ।

(4) उपधारा (3) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति जो उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ से पूर्व अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त हुआ है, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य के रूप में अपनी पदावधि पूरी होने तक पद धारण करता रहेगा ।]

17. राज्य आयोग की अधिकारिता- [(1)] इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, राज्य आयोग की निम्नलिखित अधिकारिता होगी, अर्थात् :-

(क) (i) ऐसे परिवादों को ग्रहण करना जहां माल या सेवाओं का मूल्य और दावा प्रतिकर यदि कोई है,  [बीस लाख रुपए से अधिक है किन्तु एक करोड़ रुपए से अधिक नहीं है] ; और

                (ii) उस राज्य के भीतर किसी जिला पीठ के उद्देश्यों के विरुद्ध अपील ग्रहण करना ; और

                (ख) जहां राज्य आयोग को यह प्रतीत हो कि किसी जिला पीठ ने ऐसी किसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा उसमें निहित नहीं है या जो इस प्रकार निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है या उसने अपनी अधिकारिता का प्रयोग अवैध रूप से या तात्त्विक अनियमितता से किया है वहां किसी ऐसे उपभोक्ता विवाद के जो राज्य के भीतर किसी जिला पीठ के समक्ष लंबित है या उसके द्वारा विनिश्चित किया गया है, अभिलेखों को मंगाना और समुचित आदेश पारित करना ।

 [(2) कोई परिवाद ऐसे राज्य आयोग में संस्थित किया जाएगा जिसकी अधिकारिता की सीमा के भीतर,-

                (क) विरोधी पक्षकार या जहां एक से अधिक विरोधी पक्षकार हों वहां प्रत्येक विरोधी पक्षकार, परिवाद के संस्थापन के समय, वास्तव में और स्वेच्छया निवास करता हो या कारबार करता हो या उसका शाखा कार्यालय हो या व्यक्तिगत रूप से अभिलाभ के लिए कार्य करता हो ; या

                (ख) जहां एक से अधिक विरोधी पक्षकार हों वहां प्रत्येक विरोधी पक्षकार, परिवाद के संस्थापन के समय, वास्तव में और स्वेच्छया निवास करता हो या कारबार करता हो या उसका शाखा कार्यालय हो या व्यक्तिगत रूप से अभिलाभ के लिए कार्य करता हो, परन्तु ऐसे मामले में, या तो राज्य आयोग द्वारा अनुज्ञा दी गई हो या ऐसे विरोधी पक्षकार जो, यथास्थिति, निवास न करते हों या कारबार न करते हों या उनका शाखा कार्यालय न हो या वे व्यक्तिगत रूप से अभिलाभ के लिए कार्य न करते हों, ऐसे संस्थापन के लिए उपमत हों ; या

                (ग) वाद हेतुक पूर्णतः या भागतः उद्भूत होता है ।]

 [17क. मामलों का अंतरण-राज्य आयोग, परिवादी के आवेदन पर या स्वःप्रेरणा से कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर, जिला पीठ के समक्ष लंबित किसी परिवाद को, राज्य के भीतर किसी अन्य जिला पीठ को अंतरित कर सकेगा यदि न्याय के हित में ऐसा अपेक्षित हो ।

17ख. सर्किट न्यायपीठें-राज्य आयोग साधारणतः राज्य की राजधानी में कार्य करेगा किन्तु वह ऐसे अन्य स्थानों पर भी अपने कृत्यों का निर्वहन कर सकेगा जिन्हें राज्य सरकार, राज्य सरकार आयोग के परामर्श से, समय-समय पर राजपत्र में अधिसूचित करे ।]

18. राज्य आयोग को लागू प्रक्रिया- [जिला पीठ द्वारा परिवादों के निपटारे के लिए धारा 12, धारा 13 और धारा 14 तथा उनके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध] जिला पीठ द्वारा परिवादों के निपटारे के लिए विनिर्दिष्ट प्रक्रिया, ऐसे उपांतरणों सहित जो आवश्यक हों, राज्य आयोग द्वारा विवादों के निपटारे को 5[लागू होंगी ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

19. अपील-धारा 17 के खंड (क) के उपखंड (i) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, राज्य आयोग द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से जो विहित की जाए, उस आदेश के विरुद्ध राष्ट्रीय आयोग को अपील कर सकेगा :

परन्तु राष्ट्रीय आयोग तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न करने का पर्याप्त कारण था :

 [परन्तु यह और कि ऐसे किसी व्यक्ति की कोई अपील, जिसके द्वारा राज्य आयोग के किसी आदेश के अनुसार किसी रकम का संदाय अपेक्षित हो, राष्ट्रीय आयोग द्वारा तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक कि अपीलार्थी ने विहित रीति से उस रकम का पचास प्रतिशत या पैंतीस हजार रुपए, इनमें से जो भी कम हो, जमा न कर दिए हों ।]

 [19क. अपील की सुनवाई-राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के समक्ष फाइल की गई प्रत्येक अपील की यथासंभव शीघ्रता से सुनवाई की जाएगी और यह प्रयास किया जाएगा कि अपील का अंतिम निपटारा उसके ग्रहण किए जाने की तारीख से नब्बे दिन की अवधि के भीतर किया जाए :

परन्तु, यथास्थिति, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा साधारणतः कोई स्थगन तब तक अनुदत्त नहीं किया जाएगा जब तक कि पर्याप्त हेतुक दर्शित न किया गया हो और स्थगन के अनुदान के लिए कारणों को ऐसे आयोग द्वारा लेखबद्ध नहीं किया गया हो :

परन्तु यह और कि, यथास्थिति, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग, स्थगन द्वारा कारित व्यय के संबंध में ऐसे आदेश करेगा जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों में उपबंधित किए जाएं :

परन्तु यह भी कि यदि किसी अपील का निपटारा इस प्रकार विनिर्दिष्ट अवधि के पश्चात् किया जाता है तो, यथास्थिति, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग, उक्त अपील का निपटारा करते समय, उसके कारणों को लेखबद्ध करेगा ।]

20. राष्ट्रीय आयोग का गठन-(1) राष्ट्रीय आयोग निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-

(क) एक ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रह चुका है, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा और जो उसका अध्यक्ष होगा :

 [परन्तु इस खंड के अधीन कोई नियुक्ति, भारत के मुख्य न्यायमूर्ति से परामर्श करने के पश्चात् ही की जाएगी,  अन्यथा नहीं ;]

 [(ख) कम से कम चार और उस संख्या से अनधिक ऐसे सदस्य जो विहित की जाए, और जिनमें एक स्त्री होगी, जो निम्नलिखित अर्हताएं रखते हों, अर्थात् :-

                                (i) पैंतीस वर्ष से अन्यून आयु के हों ;

                                (ii) किसी मान्यताप्राप्त विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि रखते हों ;

(iii) योग्य, सत्यनिष्ठा और प्रतिष्ठा वाले व्यक्ति हों और जिनको अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य, लेखाकर्म, उद्योग, लोक-कार्य या प्रशासन से संबंधित समस्याओं से निपटने का पर्याप्त ज्ञान और कम से कम दस वर्ष का अनुभव हो :

                                परन्तु पचास प्रतिशत से अनधिक सदस्य न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति होंगे ।

                स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए न्यायिक पृष्ठभूमि वाले व्यक्ति" से ऐसे व्यक्ति अभिप्रेत हैं जिन्हें जिला स्तर न्यायालय या किसी समतुल्य स्तर के अभिकरण में पीठासीन अधिकारी के रूप में कम से कम दस वर्ष का ज्ञान और अनुभव हो :

                                परन्तु यह और कि वह व्यक्ति नियुक्ति के लिए निरर्हित होगा यदि वह,-

(क) ऐसे किसी अपराध के लिए, जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अंतर्वलित है, सिद्धदोष ठहराया गया है और कारागार से दंडादिष्ट किया गया है ; या

                                                (ख) अनुन्मोचित दिवालिया है ; या

                                                (ग) विकृतचित्त का है और सक्षम न्यायालय द्वारा इस प्रकार घोषित किया गया है ; या

                (घ) सरकार या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगमित निकाय की सेवा से हटाया गया है या पदच्युत किया गया है ; या

(ङ) केन्द्रीय सरकार की राय में उसका ऐसा वित्तीय या अन्य हित है जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ; या

                                                (च) केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाने वाली कोई अन्य निरर्हताएं रखता है ;

परन्तु यह भी कि इस खंड के अधीन प्रत्येक नियुक्ति, केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसी चयन समिति की सिफारिश पर की जाएगी, जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात् :-

(क) एक ऐसा व्यक्ति जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है,                               -अध्यक्ष ;

जिसे भारत के मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा

(ख) भारत सरकार के विधि कार्य विभाग का सचिव                                                     -सदस्य ;

(ग) भारत सरकार में उपभोक्ता कार्यकलापों के बारे में                                                -सदस्य ;]

कार्यवाही करने वाले विभाग का सचिव

 [(1क) (i) राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता, शक्तियों और प्राधिकार का प्रयोग उसकी न्यायपीठों द्वारा किया जा सकेगा ;

(ii) अध्यक्ष द्वारा एक न्यायपीठ गठित की जा सकेगी जिसमें एक या अधिक उतने सदस्य होंगे जितने अध्यक्ष द्वारा ठीक   समझे जाएं ;

(iii) यदि न्यायपीठ के सदस्यों में किसी मुद्दे पर मतभेद है तो उन मुद्दों का विनिश्चय यदि बहुमत है, बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा, किंतु यदि सदस्य बराबर संख्या में बंटे हुए हैं तो वे उस मुद्दे या मुद्दों का कथन करेंगे जिन पर उनमें मतभेद है और उन्हें अध्यक्ष को निर्देशित करेंगे जो या तो स्वयं उस मुद्दे या मुद्दों पर सुनवाई करेगा या मामले को ऐसे मुद्दे या मुद्दों पर एक या अधिक सदस्यों द्वारा सुनवाई के लिए निर्देशित करेगा और ऐसे मुद्दे या मुद्दों का विनिश्चय उन सदस्यों के बहुमत की राय के अनुसार किया जाएगा जिन्होंने मामले की सुनवाई की है और जिनमें वे सदस्य भी सम्मिलित हैं जिन्होंने उसकी प्रथम बार सुनवाई की थी ।]

                (2) राष्ट्रीय आयोग के सदस्यों को देय वेतन या मानदेय और अन्य भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें  । । ।   वे होंगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।

                 [(3) राष्ट्रीय आयोग का प्रत्येक सदस्य पांच वर्ष की अवधि तक या सत्तर वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पहले हो, पद धारण करेगा :

                परन्तु कोई सदस्य पांच वर्ष की एक और अवधि के लिए या सत्तर वर्ष की आयु तक, इनमें से जो भी पहले हो, इस शर्त के अधीन रहते हुए पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा कि वह उपधारा (1) के खंड (ख) में उल्लिखित नियुक्ति के लिए अर्हताओं और अन्य शर्तों को पूरा करता है और ऐसी पुनर्नियुक्ति, चयन समिति की सिफारिश के आधार पर की जाती है :

                परन्तु यह और कि राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त व्यक्ति उपधारा (1) के खंड (क) में उपबंधित रीति में पुनर्नियुक्ति के लिए भी पात्र होगा :

                परन्तु यह भी कि कोई सदस्य, केन्द्रीय सरकार को संबोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा अपना पद त्याग सकेगा और ऐसा त्यागपत्र स्वीकार हो जाने पर उसका पद रिक्त हो जाएगा और वह पद ऐसे सदस्य के प्रवर्ग से संबंधित उपधारा (1) में वर्णित अर्हताओं में से कोई अर्हता रखने वाले व्यक्ति की नियुक्ति द्वारा भरा जाएगा जिसे उस व्यक्ति के स्थान पर, जिसने त्यागपत्र दिया है, उपधारा (1क) के उपबंधों के अधीन नियुक्त किया जाना अपेक्षित है ।

                (4) उपधारा (3) में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति जो उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ से पूर्व अध्यक्ष या किसी सदस्य के रूप में नियुक्त हुआ है, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य के रूप में ऐसा पद अपनी पदावधि के पूरा होने तक धारण करता रहेगा ।]

21. राष्ट्रीय आयोग की अधिकारिता-इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, राष्ट्रीय आयोग को निम्नलिखित अधिकारिता होगी, अर्थात् :-

(क) (i) ऐसे परिवादों को ग्रहण करना जहां माल या सेवाओं का मूल्य अथवा दावा प्रतिकर यदि कोई है [एक करोड़ रुपए] से अधिक है ; और

                (ii) किसी राज्य आयोग के आदेशों के विरुद्ध अपील ग्रहण करना ;

                (ख) जहां राष्ट्रीय आयोग को यह प्रतीत हो कि राज्य आयोग ने ऐसी किसी अधिकारिता का प्रयोग किया है जो विधि द्वारा उसमें निहित नहीं है या जो इस प्रकार निहित अधिकारिता का प्रयोग करने में असफल रहा है या उसने अपनी अधिकारिता का प्रयोग अवैध रूप से या तात्त्विक अनियमितता से किया है वहां किसी ऐसे उपभोक्ता विवाद के जो किसी राज्य आयोग के समक्ष लंबित है या उसके द्वारा विनिश्चित किया गया है, अभिलेखों को मंगाना और समुचित आदेश     पारित करना ।

 [22. राष्ट्रीय आयोग की शक्ति और उसे लागू प्रक्रिया-(1) जिला पीठ द्वारा परिवादों के निपटारे के लिए धारा 12, धारा 13 और धारा 14 तथा उनके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंध, ऐसे उपांतरणों सहित जिन्हें आयोग आवश्यक समझे, राष्ट्रीय आयोग द्वारा विवादों के निपटान को लागू होंगे ।

(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, राष्ट्रीय आयोग को, अपने द्वारा किए गए किसी आदेश का, जहां अभिलेख को देखने से ही प्रकट त्रुटि हो, पुनर्विलोकन करने की शक्ति होगी ।

22क. एकपक्षीय आदेशों को अपास्त करने की शक्ति-जहां राष्ट्रीय आयोग द्वारा, यथास्थिति, विरोधी पक्षकार या किसी परिवादी के विरुद्ध एकपक्षीय आदेश पारित किया जाता है वहां व्यथित पक्षकार आयोग को, न्याय के हित में उक्त आदेश को अपास्त करने के लिए आवेदन कर सकेगा ।

22ख. मामलों का अंतरण-राष्ट्रीय आयोग, परिवादी के आवेदन पर या स्व-प्रेरणा से, कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर, न्याय के हित में, एक राज्य के जिला पीठ के समक्ष लंबित किसी परिवाद को किसी अन्य राज्य के जिला पीठ को या एक राज्य आयोग से दूसरे राज्य आयोग को अंतरित कर सकेगा ।

22ग. सर्किट न्यायपीठें-राष्ट्रीय आयोग साधारणतः नई दिल्ली में कार्य करेगा और वह ऐसे अन्य स्थानों पर अपने कृत्यों का निर्वहन करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राष्ट्रीय आयोग के परामर्श से समय-समय पर राजपत्र में अधिसूचित किए जाएं ।

22घ. अध्यक्ष के पद में रिक्ति-जहां, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष का पद रिक्त हो या ऐसा पद धारण करने वाला व्यक्ति, अनुपस्थिति के कारण या अन्यथा, अपने पद के कर्तव्यों का निष्पादन करने में असमर्थ हो, वहां, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के ज्येष्ठतम सदस्य द्वारा उनका निर्वहन किया जाएगा :

परन्तु जहां उच्च न्यायालय का कोई सेवानिवृत्त न्यायाधीश राष्ट्रीय आयोग का सदस्य हो, वहां वह सदस्य या जहां ऐसे सदस्यों की संख्या एक से अधिक हो वहां ऐसे सदस्यों में से ज्येष्ठतम व्यक्ति, राष्ट्रीय आयोग के अध्यक्ष की अनुपस्थिति में आयोग की अध्यक्षता करेगा ।]

23. अपील-धारा 21 के खंड (क) के उपखंड (i) द्वारा प्रदत्त अधिकारिता का प्रयोग करते हुए, राष्ट्रीय आयोग द्वारा किए गए किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, उस आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय में अपील कर सकेगा :

परन्तु उच्चतम न्यायालय तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर अपील फाइल न करने का पर्याप्त कारण था :

 [परन्तु यह और कि ऐसे व्यक्ति की जिससे राष्ट्रीय आयोग के किसी आदेश के अनुसार किसी रकम का संदाय अपेक्षित हो, कोई अपील उच्चतम न्यायाल द्वारा तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक उस व्यक्ति ने विहित रीति से उस रकम का पचास प्रतिशत या पचास हजार रुपए, इनमें से जो भी कम हो, जमा न कर दिए हों ।]

24. आदेशों की अन्तिमता-जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग का प्रत्येक आदेश यदि इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन ऐसे आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं की गई है, अंतिम होगा ।

 [24क. परिसीमा अवधि-(1) जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग, कोई परिवाद तब तक ग्रहण नहीं करेगा जब तक कि वह उस तारीख से, जिसको वादहेतुक उद्भूत होता है, दो वर्ष के भीतर फाइल न किया गया हो ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई परिवाद उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के पश्चात् ग्रहण किया जा सकेगा यदि परिवादी, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग का यह समाधान कर देता है कि उसके पास ऐसी अवधि के भीतर परिवाद फाइल न करने का पर्याप्त कारण था :

परन्तु ऐसा कोई परिवाद तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि, यथास्थिति, राष्ट्रीय आयोग, राज्य आयोग या जिला पीठ ऐसे विलम्ब के लिए माफी देने के अपने कारणों को अभिलिखित नहीं कर देता है ।

24ख. प्रशासनिक नियंत्रण-(1) राष्ट्रीय आयोग का निम्नलिखित विषयों में सभी राज्य आयोगों पर प्रशासनिक नियंत्रण होगा, अर्थात् :-

                (i) मामलों के संस्थित किए जाने, निपटाए जाने, लंबित रहने के बारे में कालिक विवरणियां मंगाना ;

                (ii) मामलों की सुनवाई, एक पक्षकार द्वारा पेश किए गए दस्तावेजों को प्रतियों की विरोधी पक्षकारों पर पूर्व तामील किसी भाषा में लिखे गए निर्णयों के अंग्रेजी अनुवाद दिए जाने, दस्तावेजों की प्रतियों के शीघ्र दिए जाने के बारे में एक सी प्रक्रिया अंगीकृत किए जाने की बाबत अनुदेश जारी करना ;

(iii) राज्य आयोगों या जिला पीठों के कार्यकरण का साधारण निरीक्षण, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सके कि इस अधिनियम के उद्देश्यों और प्रयोजनों की, उनकी न्यायिककल्प स्वतंत्रता में किसी प्रकार का हस्तक्षेप किए बिना, सर्वोत्तम रूप से पूर्ति की जा रही है ।

(2) राज्य आयोग का उपधारा (1) में निर्दिष्ट सभी विषयों में अपनी अधिकारिता के भीतर सभी जिला पीठों पर प्रशासनिक नियंत्रण होगा ।]

 [25. जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के आदेशों का प्रवर्तन-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन किए गए अंतरिम आदेश का अनुपालन नहीं किया जाता है, वहां, यथास्थिति, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग ऐसे आदेश का अनुपालन न करने वाले व्यक्ति की संपत्ति कुर्क करने का आदेश कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन की गई कोई कुर्की तीन मास से अधिक के लिए प्रवृत्त नहीं रहेगी जिसकी समाप्ति पर, यदि अननुपालन जारी रहता है तो कुर्क की गई संपत्ति का विक्रय किया जा सकेगा और उसके आगम में से, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग ऐसी नुकसानी, जो वह ठीक समझे, परिवादी को प्रदान कर सकेगा और बाकी का, यदि कोई हो, उसके हकदार पक्षकार को संदाय करेगा ।

(3) जहां कोई रकम, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा किए गए किसी आदेश के अधीन किसी व्यक्ति से शोध्य है, वहां उस रकम का हकदार व्यक्ति, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग को आवेदन कर सकेगा और ऐसा जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग उस जिला के कलक्टर को (चाहे किसी भी नाम से पुकारा जाए) उक्त रकम के लिए एक प्रमाणपत्र जारी कर सकेगा और वह कलक्टर भू-राजस्व की बकाया के रूप में उसी रीति से उस रकम को वसूल करने के लिए कार्यवाही करेगा ।]

 [26. तंग या परेशान करने वाले परिवादों का खारिज किया जाना-जहां, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के समक्ष संस्थित किसी परिवाद के बारे में यह पाया जाता है कि वह तंग या परेशान करने वाला है वहां वह ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, परिवाद को खारिज करेगा और यह आदेश करेगा कि परिवादी विरोधी पक्षकार को दस हजार रुपए से अनधिक ऐसे खर्चे का संदाय करे जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए ।]

27. शास्तियां- [(1)] जहां कोई व्यापारी या ऐसा व्यक्ति, जिसके विरुद्ध परिवाद किया गया है  [या परिवादी], यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा किए गए किसी आदेश का अनुपालन करने में असफल रहेगा या उसका लोप करेगा तो वहां ऐसा व्यापारी या व्यक्ति 4[या परिवादी] ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि एक मास से कम नहीं होगी, किन्तु जो तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए से कम का नहीं होगा, किन्तु जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, अथवा दोनों से, दंडनीय होगा :

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

 [(2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग को, इस अधिनियम के अधीन अपराधों के विचारण के लिए प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट की शक्ति होगी और शक्तियों के इस प्रकार प्रदत्त किए जाने पर, यथास्थिति, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग, जिसको शक्तियां इस प्रकार प्रदत्त की जाती हैं, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 के प्रयोजन के लिए प्रथम वर्ग का न्यायिक मजिस्ट्रेट समझा जाएगा ।

(3) इस अधिनियम के अधीन सभी अपराधों का, यथास्थिति, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय द्वारा संक्षपेतः विचारण किया जा सकेगा ।]

 [27क. धारा 27 के अधीन पारित आदेश के विरुद्ध अपील-(1) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, धारा 27 के अधीन अपील, तथ्यों और विधि दोनों पर,-

                (क) जिला पीठ द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध राज्य आयोग को होगी ;

                (ख) राज्य आयोग द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध राष्ट्रीय आयोग को होगी ; और

                (ग) राष्ट्रीय आयोग द्वारा पारित आदेश के विरुद्ध उच्चतम न्यायालय को होगी ।

(2) पूर्वोक्त के सिवाय, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के किसी आदेश के विरुद्ध कोई अपील किसी न्यायालय को नहीं होगी ।

(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील, यथास्थिति, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के आदेश की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर की जाएगी :

परन्तु, यथास्थिति, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग या उच्चतम न्यायालय तीस दिन की उक्त अवधि के पश्चात् अपील ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी के पास तीस दिन की अवधि के भीतर अपील फाइल न करने के लिए पर्याप्त कारण था ।]

अध्याय 4

प्रकीर्ण

28. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अधीन या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अधीन जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा बनाए गए किसी आदेश के निष्पादन के लिए या सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग या राष्ट्रीय आयोग के किसी सदस्य या जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के अधीन कार्यरत किसी अधिकारी या व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी ।

 [28क. सूचना आदि की तामील-(1) तामील किए जाने के लिए इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित सभी सूचनाएं इसमें इसके पश्चात् उपधारा (2) में वर्णित रीति से तामील की जाएंगी ।

(2) सूचनाओं की तामील विरोधी पक्षकार जिसके विरुद्ध परिवाद किया जाता है या परिवादी का सम्यक् रूप से संबोधित अभिस्वीकृतिपत्र सहित रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा उनकी एक प्रति स्पीड पोस्ट या ऐसी कूरियर सेवा द्वारा जो, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा अनुमोदित हो, या दस्तावेजों के पारेषण के किसी अन्य साधन (जिसके अंतर्गत फैक्स संदेश भी है) द्वारा परिदान करके या भेजकर की जा सकेगी ।

(3) जब विरोधी पक्षकार या उसके अभिकर्ता द्वारा या परिवादी द्वारा हस्ताक्षरित होने के लिए तात्पर्यित कोई अभिस्वीकृति या कोई अन्य रसीद, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग को प्राप्त होती है या ऐसी डाक वस्तु जिसमें सूचना अन्तर्विष्ट हो, किसी डाक कर्मचारी द्वारा या कूरियर सेवा द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किए गए तात्पर्यित इस आशय के पृष्ठांकन के साथ कि विरोधी पक्षकार या उसके अभिकर्ता ने या परिवादी ने सूचना से युक्त डाक वस्तु को लेने से इंकार कर दिया है या    उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट किसी अन्य साधन द्वारा जब उसे सूचना दी गई या भेजी गई तो स्वीकार करने से इंकार कर दिया है, ऐसे जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग को वापस प्राप्त होती है तब, यथास्थिति, जिला पीठ या राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग यह घोषणा करेगा कि विरोधी पक्षकार या परिवादी पर सूचना की सम्यक् रूप से तामील हो गई है :

परन्तु जहां सूचना समुचित रूप से संबोधित पूर्व संदत्त और सम्यक् रूप से अभिस्वीकृतिपत्र के साथ रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा भेजी गई थी वहां इस उपधारा में निर्दिष्ट घोषणा इस तथ्य के होते हुए भी की जाएगी कि अभिस्वीकृति खो गई है या इधर-उधर हो गई है या किसी अन्य कारण से यथास्थिति जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग द्वारा सूचना के जारी करने की तारीख से तीस दिन के भीतर प्राप्त नहीं हुई है ।

(4) विरोधी पक्षकार या परिवादी पर तामील की जाने के लिए अपेक्षित सभी सूचनाएं पर्याप्त रूप से तामील की गई समझी जाएंगी यदि विरोधी पक्षकार की दशा में उस स्थान पर संबोधित की जाती हैं जहां वह कारबार या व्यवसाय करता है और परिवादी की दशा में, उस स्थान पर संबोधित की जाती हैं जहां ऐसा व्यक्ति वास्तविक रूप से तथा स्वेच्छया निवास कर रहा हो ।]

29. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में आदेश द्वारा ऐसे उपबंध जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों कर सकेगी जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :

परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

 [(3) यदि उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 को उपबंधों का प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए, आदेश द्वारा ऐसी कोई बात कर सकेगी जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो :

परन्तु ऐसा कोई आदेश उपभोक्ता संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(4) उपधारा (3) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।]

 [29क. रिक्तियों या नियुक्ति में त्रुटियों से आदेशों का अविधिमान्य होना-जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस कारण से अविधिमान्य नहीं होगी कि उसके सदस्य के पद में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।]

 [30. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (क), धारा 4 की उपधारा (2) के खंड (ख), धारा 5 की उपधारा (2), धारा 12 की उपधारा (2), धारा 13 की उपधारा (4) के खंड (vi), धारा 14 की उपधारा (1) के खंड (जख), धारा 19, धारा 20 की उपधारा (1) के खंड (ख) और उपधारा (2), धारा 22 और धारा 23 में अंतर्विष्ट उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) राज्य सरकार, इस अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (2) के खंड (ख) और उपधारा (4), धारा 8क की उपधारा (2) के खंड (ख) और उपधारा (4), धारा 10 की उपधारा (1) के खंड (ख) और उपधारा (3), धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (ग), धारा 14 की उपधारा (1) के खंड (जख) और उपधारा (3), धारा 15 और धारा 16 की उपधारा (1) के खंड (ख) तथा उपधारा (2), में अंतर्विष्ट उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।]

 [30क. विनियम बनाने की राष्ट्रीय आयोग की शक्ति-(1) राष्ट्रीय आयोग, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, अधिसूचना द्वारा ऐसे सभी विषयों के लिए, जिनके लिए इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए उपबंध करना आवश्यक या समीचीन है, उपबंध करने के लिए ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम से असंगत न हों ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम, यथास्थिति, जिला पीठ, राज्य आयोग या राष्ट्रीय आयोग के समक्ष किसी कार्यवाही के स्थगन के खर्चे के लिए उपबंध कर सकेंगे जिसे किसी पक्षकार को संदाय करने का आदेश दिया जाए ।]

 [31. नियमों और विनियमों का संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई उपान्तरण करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह, यथास्थिति, ऐसे उपान्तरित रूप में ही प्रभावी होगा या निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु इस प्रकार कि नियम या विनियम के ऐसे उपांतरित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

(2) राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।

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