विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम, 1967
(1967 का अधिनियम संख्यांक 37)
[30 दिसम्बर, 1967]
व्यष्टियों और संगमों के कतिपय विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप के अधिक
प्रभावी निवारण [और आतंकवादी क्रियाकलापों से निपटने के
लिए] और तत्संसक्त विषयों का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
[संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् ने, 28 दिसम्बर, 2001 को अपनी 4385वीं बैठक में, संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अध्याय 7 के अधीन संकल्प 1373 (2001) को अंगीकार किया जिसमें सभी राज्यों से अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए उपाय करने की अपेक्षा की गई है ;
और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् के संकल्प 1267 (1999), संकल्प 1333 (2000), संकल्प 1363 (2001), संकल्प 1390 (2002), संकल्प 1455 (2003), संकल्प 1526 (2004), संकल्प 1566 (2004), संकल्प 1617 (2005), संकल्प 1735 (2006), और संकल्प 1822 (2008) में राज्यों से कतिपय आतंकवादियों और आतंकवादियों संगठनों के विरुद्ध कार्रवाई करने, आस्तियों और अन्य आर्थिक संसाधनों पर रोक लगाने, अपने राज्यक्षेत्रों में प्रवेश करने या राज्यक्षेत्र में से अभिवहन करने को निवारित करने और अनुसूची में सूचीबद्ध व्यष्टियों या अस्तित्वों को आयुध और गोला बारूद के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष प्रदाय, विक्रय या अंतरण का निवारण करने की अपेक्षा की गई है ;
और केन्द्रीय सरकार ने, संयुक्त राष्ट्र (सुरक्षा परिषद्) अधिनियम, 1947 (1947 का 43) की धारा 2 द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, आतंकवाद का निवारण और दमन (सुरक्षा परिषद् के संकल्पों का कार्यान्वयन) आदेश, 2007 किया है ;
और उक्त संकल्पों और आदेश को प्रभावी करने और आतंकवादी क्रियाकलापों का निवारण करने और उनका मुकाबला करने तथा उससे संबद्ध या उसके आनुषंगिक विषयों के लिए विशेष उपबंध करना आवश्यक समझा गया है ।]
भारत गणराज्य के अठारहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
[1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिनियम, 1967 है।
(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) प्रत्येक व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन, उसके उपबंधों के प्रतिकूल प्रत्येक कार्य या लोप के लिए, जिसके लिए वह भारत में दोषी ठहराया जाता है, दंड का दायी होगा ।
(4) किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में, जो भारत से पर कोई ऐसा अपराध करता है, जो इस अधिनियम के अधीन दंडनीय है, इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार उसी रीति से कार्यवाही की जाएगी मानो ऐसा कार्य भारत में किया गया था ।
(5) इस अधिनियम के उपबंध निम्नलिखित को भी लागू होंगे,-
(क) भारत के बाहर भारत के नागरिक ;
(ख) सरकार की सेवा में व्यक्ति, चाहे वे कहीं भी हों ; और
(ग) भारत में रजिस्ट्रीकृत पोतों और वायुयानों पर के व्यक्ति, चाहे वे कहीं भी हों ।
2. परिभाषाएं-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) संगम" से व्यष्टियों का कोई समुच्चय या निकाय अभिप्रेत है ;
(ख) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग का अध्यर्पण" के अन्तर्गत ऐसे किसी भाग पर किसी विदेश के दावे का ग्रहण किया जाना है ;
(ग) संहिता" से दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) अभिप्रेत है ;
(घ) न्यायालय" से संहिता के अधीन इस अधिनियम के अंतर्गत आने वाले अपराधों का विचारण करने के लिए अधिकारिता रखने वाला कोई दंड न्यायालय अभिप्रेत है [और इसमें राष्ट्रीय अन्वेषण अभिकरण अधिनियम, 2008 की धारा 11 के अधीन या धारा 21 के अधीन गठित कोई विशेष न्यायालय सम्मिलित है ;]
(ङ) अभिहित प्राधिकारी" से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार का ऐसा अधिकारी, जो उस सरकार के संयुक्त सचिव की पंक्तिसे नीचे का न हो या राज्य सरकार का ऐसा अधिकारी जो उस सरकार के सचिव की पंक्ति से नीचे का न हो, जिसे केंन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा, राजपत्र में प्रकाशित किसी अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट किया जाए, अभिप्रेत है ;
[(ङक) आर्थिक सुरक्षा" के अंतर्गत वित्तीय, धनीय और राजकोषीय स्थायित्व, उत्पादन और वितरण के साधनों की सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जीविका सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, पारिस्थितिक और पर्यावरणीय सुरक्षा भी है ;]
[(ङख)] आदेश" से, समय-समय पर, यथा संशोधित आतंकवाद का निवारण और दमन (सुरक्षा परिषद् के संकल्पों का कार्यान्वयन) आदेश, 2007 अभिप्रेत है ;]
2[(ङग) व्यक्ति" के अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं,-
(i) कोई व्यष्टि,
(ii) कोई कंपनी,
(iii) कोई फर्म,
(iv) कोई संगठन या कोई व्यक्ति-संगम या व्यष्टि-निकाय चाहे वह निगमित हो या नहीं,
(v) ऐसा प्रत्येक कृत्रिम विधिक व्यक्ति, जो पूर्ववर्ती उपखंडों में से किसी के अंतर्गत नहीं आता है, और
(vi) पूर्ववर्ती उपखंडों में से किसी के अंतर्गत आने वाले किसी व्यक्ति के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन कोई अभिकरण, कार्यालय या शाखा ;]
(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
[(छ) आतंकवाद" के आगम से,-
(i) सभी प्रकार की ऐसी संपत्तियां अभिप्रेत हैं, जो किसी आतंकवादी कार्य के करने से व्युत्पन्न हुई हों या अभिप्राप्त की गई हों या किसी आतंकवादी कार्य से संबंधित निधियों के माध्यम से अर्जित की गई हों, उस व्यक्ति का विचार किए बिना, जिसके नाम में ऐसे आगम हैं या जिसके कब्जे में वे पाए जाते हैं ; या
(ii) कोई ऐसी संपत्ति अभिप्रेत है, जिसका किसी आतंकवादी कार्य के लिए या किसी व्यष्टि आतंकवादी या किसी आतंकवादी गैंग या किसी आतंकवादी संगठन के प्रयोजन के लिए उपयोग किया जा रहा है या उपयोग किया जा रहा है या उपयोग किया जाना आशयित है ।
स्पष्टीकरण-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए यह घोषित किया जाता है कि आतंकवाद के आगम" पद के अंतर्गत ऐसी कोई सम्पत्ति भी है, जिसका उपयोग आतंकवाद के लिए किया जाना आशयित है ।]
1[(ज) संपत्ति" से प्रत्येक वर्णन की संपत्ति और आस्तियां, चाहे वे मूर्त या अमूर्त, जंगम या स्थावर, भौतिक या अभौतिक हों और बैंक-प्रत्ययों, यात्री चेकों, बैंक चेकों, मनी आर्डरों, शेयरों, प्रतिभूतियों, बंधपत्रों, ड्राफ्टों, प्रत्यय पत्रों, नकदी और बैंक खाते, जिसमें किसी भी प्रकार से अर्जित निधि सम्मिलित है, के माध्यम से ऐसी संपत्ति या आस्तियों के हक या उनमें हित के साक्ष्यस्वरूप किसी भी रूप में, 4[जिसके अंतर्गत इलैक्ट्रानिक या अंकीय रूप भी है, किन्तु जो उस तक सीमित नहीं है] विधिक दस्तावेज, विलेख और लिखतें अभिप्रेत हैं ;]
(जक) अनुसूची" से इस अधिनियम की अनुसूची अभिप्रेत है ;]
(झ) भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग का संघ से विलग हो जाना" के अन्तर्गत यह अवधारित करने के लिए किसी दावे का प्राख्यान आता है कि क्या ऐसा भाग भारत के राज्यक्षेत्र का भाग रहेगा ;
(ञ) किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में राज्य सरकार" से उसका प्रशासक अभिप्रेत है ;
(ट) आतंकवादी कार्य" का वही अर्थ है, जो धारा 15 में उसका है और आतंकवाद" तथा आतंकवादी" पदों का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ;
(ठ) आतंकवादी गैंग" से आतंकवादी संगठन से भिन्न कोई संगम, चाहे व्यवस्थित हो या अन्यथा, जो आतंकवादी कार्य से संबंधित या उसमें अंतर्वलित है, अभिप्रेत है ;
(ड) आतंकवादी संगठन" से अनुसूची में सूचीबद्ध कोई संगठन या इस प्रकार सूचीबद्ध किसी संगठन के रूप में उसकी नाम से कार्य करने वाला कोई संगठन अभिप्रेत है ;
(ढ) अधिकरण" से धारा 5 के अधीन गठित अधिकरण अभिप्रेत है ;
(ण) विधिविरुद्ध क्रियाकलाप" से किसी व्यष्टि या संगम के संबंध में, ऐसे व्यष्टि या संगम द्वारा (चाहे कोई कार्य करके, या बोले गए अथवा लिखे गए शब्दों द्वारा, या संकेतों द्वारा, या दृश्यरूपण द्वारा या अन्यथा) की गई कोई ऐसी कार्रवाई अभिप्रेत है,-
(i) जो किसी भी आधार पर, चाहे वह कुछ भी हो, भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग का अध्यर्पण या भारत के राज्यक्षेत्र के किसी भाग का संघ से विलग हो जाना घटित करने के लिए आशयित है, या उसके लिए किसी दावे का समर्थन करती है, या जो ऐसा अध्यर्पण या विलग हो जाना घटित करने के लिए किसी व्यष्टि या व्यष्टियों के समूह को उद्दीप्त करती है ; या
(ii) जिससे भारत की प्रभुता और प्रादेशिक अखण्डता का अनु-अंगीकरण होता है या उन पर आक्षेप होता है या जो उन्हें विच्छिन्न करती है या विच्छिन्न करने के लिए आशयित है ; या
(iii) जो भारत के विरुद्ध द्रोह कारित करती है या द्रोह कारित करने के लिए आशयित है ;
(त) विधिविरुद्ध संगम" से कोई ऐसा संगम अभिप्रेत है-
(i) जिसका उद्देश्य कोई विधिविरुद्ध क्रिया है या जो कोई विधिविरुद्ध क्रिया करने के लिए व्यक्तियों को प्रोत्साहित करता है या उसकी सहायता करता है अथवा जिसके सदस्य ऐसी क्रिया करते हैं ; अथवा
(ii) जिसका उद्देश्य भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 153क या धारा 153ख के अधीन दण्डनीय कोई कार्य है या जो कोई ऐसा कार्य करने के लिए व्यक्तियों को प्रोत्साहित करता है या उनकी सहायता करता है अथवा जिसके सदस्य कोई ऐसा कार्य करते हैं :
परन्तु उपखण्ड (ii) की कोई बात जम्मू-कश्मीर राज्य को लागू नहीं होगी ।
(थ) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं किंतु परिभाषित नहीं है और संहिता में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो क्रमशः उनके संहिता में हैं ।
(2) इस अधिनियम में किसी अधिनियमिति या उसके किसी उपबंध के प्रति किसी निर्देश का, किसी ऐसे क्षेत्र के संबंध में, जिसमें ऐसी अधिनियमिति या ऐसा उपबंध प्रवृत्त नहीं है, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस क्षेत्र में प्रवृत्त तत्समान विधि या तत्समान विधि के सुसंगत उपबंध हैं, यदि कोई हो, के प्रति निर्देश है ।]
अध्याय 2
विधिविरुद्ध संगम
3. किसी संगम के विधिविरुद्ध होने की घोषणा-(1) यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि कोई संगम विधिविरुद्ध संगम है, या हो गया है तो, वह ऐसे संगम को शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विधिविरुद्ध घोषित कर सकेगी ।
(2) ऐसी हर अधिसूचना में वे आधार जिन पर वह निकाली गई है तथा ऐसी अन्य विशिष्टियां, जिन्हें केन्द्रीय सरकार आवश्यक समझे, विनिर्दिष्ट होंगी :
परन्तु इस उपधारा में की कोई बात केन्द्रीय सरकार से किसी ऐसे तथ्य को प्रकट करने की अपेक्षा नहीं करेगी जिसे प्रकट करना वह लोकहित के विरुद्ध समझती है ।
(3) ऐसी कोई अधिसूचना तब तक प्रभावी नहीं होगी जब तक कि उसमें की गई घोषणा की अधिकरण ने, धारा 4 के अधीन किए गए किसी आदेश द्वारा, पुष्टि न कर दी हो और वह आदेश शासकीय राजपत्र में प्रकाशित न कर दिया गया हो :
परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनमें उस सरकार के लिए किसी संगम को तात्कालिक प्रभाव से विधिविरुद्ध घोषित करना आवश्यक हो जाता है, तो वह ऐसे कारणों से, जिन्हें लिखित रूप में कथित किया जाएगा, निदेश दे सकेगी कि अधिसूचना, किसी ऐसे आदेश के अध्यधीन रहते हुए, जो धारा 4 के अधीन किया जाएगा, शासकीय राजपत्र में उसके प्रकाशन की तारीख से प्रभावी होगी ।
(4) ऐसी हर अधिसूचना शासकीय राजपत्र में प्रकाशित की जाने के अतिरिक्त कम से कम एक ऐसे दैनिक समाचारपत्र में प्रकाशित की जाएगी जिसका परिचालन उस राज्य में हो जिसमें प्रभावित संगम का प्रधान कार्यालय, यदि कोई हो स्थित हो, और ऐसे संगम पर उसकी तामील भी ऐसी रीति से की जाएगी जैसी, केन्द्रीय सरकार ठीक समझे तथा ऐसी तामील कराने में निम्नलिखित सभी या कोई ढंग अनुसरित किए जा सकेंगे, अर्थात् :-
(क) अधिसूचना की एक प्रति को संगम के कार्यालय के, यदि कोई हो, किसी सहजदृश्य भाग में लगाना ; अथवा
(ख) अधिसूचना की एक प्रति की जहां संभव हो, संगम के प्रधान पदाधिकारियों पर यदि कोई हों, तामील करना ; अथवा
(ग) अधिसूचना की अन्तर्वस्तुओं को उस क्षेत्र में जिसमें संगम के क्रियाकलाप मामूली तौर से किए जाते हैं डोंडी पिटवा कर या लाउडस्पीकरों द्वारा उद्घोषित करना ; अथवा
(घ) अन्य ऐसी रीति जो विहित की जाए ।
4. अधिकरण को निर्देश-(1) जहां कि धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन निकाली गई किसी अधिसूचना द्वारा कोई संगम विधिविरुद्ध घोषित किया गया है वहां केन्द्रीय सरकार, उक्त उपधारा के अधीन अधिसूचना के प्रकाशित किए जाने की तारीख से तीस दिन के भीतर, वह अधिसूचना, अधिकरण को यह न्यायनिर्णीत करने के प्रयोजनार्थ निर्देशित करेगी कि संगम को विधिविरुद्ध घोषित करने का पर्याप्त हेतुक है या नहीं ।
(2) उपधारा (1) के अधीन निर्देश प्राप्त होने पर, अधिकरण प्रभावित संगम से, लिखित सूचना द्वारा यह अपेक्षा करेगा कि वह, ऐसी सूचना की तामील की तारीख से तीस दिन के भीतर, हेतुक दर्शित करे कि संगम को विधिविरुद्ध क्यों न घोषित किया जाए ।
(3) अधिकरण, संगम या उसके पदाधिकारियों या सदस्यों द्वारा दर्शित हेतुक पर, यदि कोई हो, विचार करने के पश्चात्, धारा 9 में विनिर्दिष्ट रीति से जांच करेगा और केन्द्रीय सरकार से या संगम के किसी पदाधिकारी या सदस्य से ऐसी अतिरिक्त जानकारी मंगाने के पश्चात्, जैसी वह आवश्यक समझे, यह विनिश्चय करेगा कि संगम को विधिविरुद्ध घोषित करने के लिए पर्याप्त हेतुक है या नहीं, और अधिसूचना में की गई घोषणा की पुष्टि करने वाला या उसे रद्द करने वाला ऐसा आदेश, जैसा वह ठीक समझे, यथासम्भव शीघ्रता के साथ तथा किसी भी दशा में, धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना निकाले जाने की तारीख से छह मास की कालावधि के भीतर करेगा ।
(4) अधिकरण का उपधारा (3) के अधीन किया गया आदेश शासकीय राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।
5. अधिकरण-(1) केन्द्रीय सरकार, जब-जब आवश्यक हो, एक अधिकरण का गठन, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर सकेगी जो विधिविरुद्ध क्रिया-कलाप (निवारण) अधिकरण" के नाम से ज्ञात होगा और जिसमें एक व्यक्ति होगा, जिसकी नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा की जाएगी :
परन्तु किसी भी व्यक्ति को ऐसे नियुक्त न किया जाएगा जब तक कि वह किसी उच्च न्यायालय का न्यायधीश न हो ।
(2) यदि अधिकरण के पीठासीन आफिसर के पद में (अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न) कोई रिक्ति किसी भी कारणवश हो जाती है तो केन्द्रीय सरकार उस रिक्ति को भरने के लिए इस धारा के उपबन्धों के अनुसार किसी अन्य व्यक्ति को नियुक्त करेगी और कार्यवाहियों को अधिकरण के समक्ष उस प्रक्रम से चालू किया जा सकेगा जिस प्रक्रम पर वह रिक्ति भरी गई ।
(3) केन्द्रीय सरकार, अधिकरण को ऐसा कर्मचारिवृन्द उपलभ्य करेगी जो इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक हो ।
(4) अधिकरण के संबंध मे उपगत सभी व्यय भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे ।
(5) धारा 9 के उपबन्धों के अध्यधीन रहते हुए, अधिकरण को अपने कृत्यों के निर्वहन से उद्भूत होने वाले सभी मामलों में जिनके अन्तर्गत वह स्थान या वे स्थान आते हैं जहां वह अपनी बैठकें करेगा, अपनी प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।
(6) इस अधिनियम के अधीन कोई जांच करने के प्रयोजन के लिए अधिकरण की शक्तियां निम्नलिखित विषयों के संबंध में वही होंगी जो किसी वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना, तथा उसकी शपथ पर परीक्षा करना ;
(ख) साक्ष्य के रूप में पेश की जाने योग्य किसी दस्तावेज या अन्य भौतिक पदार्थ का प्रकटीकरण और उसका पेश किया जाना ;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य लेना ;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख को मंगाना ;
(ङ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कोई कमीशन निकालना ।
(7) अधिकरण के समक्ष की कोई कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और 228 के अर्थ के अन्दर न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और अधिकरण को [संहिता] की धारा 195 और [अध्याय 26] के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
6. अधिसूचना के प्रवृत्त रहने की कालावधि और उसक रद्द किया जाना-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अध्यधीन यह है कि धारा 3 के अधीन निकाली गई अधिसूचना उस तारीख से, जिस तारीख को वह प्रभावी होती है, [पांच वर्ष] की कालावधि के लिए उस दशा में प्रवृत्त रहेगी जिसमें कि अधिकरण, उसमें की गई घोषणा की पुष्टि, धारा 4 के अधीन किए गए आदेश द्वारा कर देता है ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, धारा 3 के अधीन निकाली गई अधिसूचना, या तो स्वप्रेरणा से या किसी व्यथित व्यक्ति के आवेदन पर, किसी भी समय पर रद्द कर सकेगी, चाहे उसमें की गई घोषणा अधिकरण द्वारा पुष्ट कर दी गई हो या नहीं ।
7. किसी विधिविरुद्ध संगम की निधियों के उपयोग का प्रतिषेध करने की शक्ति-(1) जहां कि धारा 3 के अधीन निकाली गई अधिसूचना द्वारा, जो उस धारा की उपधारा (3) के अधीन प्रभावी हो गई है, कोई संगम विधिविरुद्ध घोषित किया जा चुका है और केन्द्रीय सरकार का ऐसी जांच के पश्चात्, जैसी वह ठीक समझे, समाधान हो गया है कि किसी व्यक्ति की अभिरक्षा में कोई ऐसे धन, प्रतिभूतियां या पावने हैं जो उस विधिविरुद्ध संगम के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए जा रहे हैं या उपयोग में लाए जाने के लिए आशयित हैं वहां, केन्द्रीय सरकार, ऐसे व्यक्ति को, ऐसे धनों, प्रतिभूतियों या पावनों को, या किन्हीं अन्य ऐसे धनों, प्रतिभूतियों या पावनों को, जो उस आदेश के किए जाने के पश्चात् उसकी अभिरक्षा में आएं, केन्द्रीय सरकार के लिखित आदेशों के अनुसार के सिवाय, संदत्त, परिदत्त, या अन्तरित करने या उनसे किसी भी रीति से अन्यथा बरतने से, लिखित आदेश द्वारा, प्रतिषिद्ध कर सकेगी, और ऐसे आदेश की एक प्रति की तामील इस प्रकार प्रतिषिद्ध व्यक्ति पर उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट रीति से की जाएगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रतिषेधात्मक आदेश की एक प्रति अन्वेषणार्थ सरकार के किसी ऐसे राजपत्रित आफिसर को पृष्ठांकित कर सकेगी, जिसे वह चुने, और ऐसी प्रति ऐसा अधिपत्र होगी जिसके अधीन ऐसा आफिसर उस व्यक्ति के, जिसे वह आदेश निर्दिष्ट है, किसी परिसर में या उस पर प्रवेश कर सकेगा, ऐसे व्यक्ति की पुस्तकों की परीक्षा कर सकेगा, धनों, प्रतिभूतियों और पावनों के लिए तलाशी ले सकेगा, और किन्हीं ऐसे धनों, प्रतिभूतियों या पावनों में, जिनके बारे में, अन्वेषक आफिसर को संदेह हो कि वे विधिविरुद्ध संगम के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए जा रहे है या उपयोग में लाए जाने के लिए आशयित हैं, किए गए किन्हीं ब्यौहारों के उद्गम के सम्बन्ध में ऐसे व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति के किसी आफिसर, अभिकर्ता या सेवक से पूछताछ कर सकेगा ।
(3) इस धारा के अधीन किए गए किसी आदेश की प्रति की तामील, उस रीति से की जाएगी जो समन की तामील के लिए दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) में उपबन्धित है या जहां कि वह व्यक्ति जिस पर तामील की जानी है, कोई निगम, कम्पनी, बैंक या अन्य संगम है, उसकी तामील उसके प्रबन्ध से संपृक्त किसी सचिव, निदेशक या अन्य आफिसर या व्यक्ति पर की जाएगी या, उस प्रति को निगम, कम्पनी, बैंक या अन्य संगम के रजिस्ट्रीकृत कार्यालय में या जहां कि कोई रजिस्ट्रीकृत कार्यालय नहीं है वहां उस स्थान पर, जहां वह कारबार चलाता है, छोड़कर या उसके पते पर डाक द्वारा भेज कर की जाएगी ।
(4) उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रतिषेधात्मक आदेश से व्यथित व्यक्ति, ऐसे आदेश की तामील की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर, उस जिला न्यायाधीश के न्यायालय में, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर ऐसा व्यक्ति स्वेच्छया निवास करता है, या कारबार चलाता है, या अभिलाभ के लिए स्वयं कार्य करता है, यह सिद्ध करने के लिए आवेदन कर सकेगा कि जिन धनों, प्रतिभूतियों या पावनों के सम्बन्ध में वह प्रतिषेधात्मक आदेश किया गया है वे विधिविरुद्ध संगम के प्रयोजन के लिए उपयोग में नहीं लाए जा रहे हैं या उपयोग में लाए जाने के लिए आशयित नहीं हैं, और जिला न्यायाधीश का न्यायालय इस प्रश्न का विनिश्चय करेगा ।
(5) उपधारा (2) के अधीन किए गए किसी अन्वेषण के अनुक्रम में अभिप्राप्त कोई भी सूचना, वहां तक के सिवाय जहां तक कि वह इस धारा के अधीन की किन्हीं कार्यवाहियों के प्रयोजनों के लिए आवश्यक हो, सरकार के किसी राजपत्रित आफिसर द्वारा, केन्द्रीय सरकार की सम्मति के बिना, प्रकट नहीं की जाएगी ।
(6) इस धारा में, प्रतिभूति" के अन्तर्गत ऐसी दस्तावेज आती है जिसके द्वारा कोई व्यक्ति यह अभिस्वीकार करता है कि वह धन का संदाय करने के लिए किसी वैध दायित्व के अधीन है या जिसके अधीन किसी व्यक्ति को धन के संदाय के लिए कोई वैध अधिकार अभिप्राप्त होता है ।
8. विधिविरुद्ध संगम के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाए गए स्थानों को अधिसूचित करने की शक्ति-(1) जहां कि धारा 3 के अधीन निकाली गई किसी अधिसूचना द्वारा, जो उस धारा की उपधारा (3) के अधीन प्रभावी हो गई है, कोई संगम विधिविरुद्ध घोषित किया जा चुका है वहां, केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, किसी ऐसे स्थान को अधिसूचित कर सकेगी जो उसकी राय में ऐसे विधिविरुद्ध संगम के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाया जाता है ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, स्थान" के अन्तर्गत गृह या निर्माण, या उसका भाग, या तम्बू या जलयान आता है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना निकलने पर, वह जिला मजिस्ट्रेट, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर ऐसा अधिसूचित स्थान स्थित है, या उसके द्वारा लिखित रूप में इस निमित्त प्राधिकृत कोई आफिसर (पहिनने के वस्त्रों, रांघने के बर्तनों, चारपाइयों और बिछौना, शिल्पियों के औजारों, खेती के उपकरणों, ढोरों, अनाज और खाद्य पदार्थों तथा अन्य ऐसी वस्तुओं से, जिन्हें वह तुच्छ प्रकृति का समझे भिन्न) उन समस्त जंगम सम्पत्तियों की, जो उस अधिसूचित स्थान में पाई जाएं, एक सूची दो सम्मानित साक्षियों की उपस्थिति में तैयार करेगा ।
(3) यदि सूची में विनिर्दिष्ट कोई वस्तुएं, जिला मजिस्ट्रेट की राय में, उस विधिविरुद्ध संगम के प्रयोजन के लिए उपयोग में लाई जाती हैं, या लाई जा सकती हैं तो वह किसी भी व्यक्ति को उन वस्तुओं का उपयोग, जिला मजिस्ट्रेट के लिखित आदेशों के अनुसार करने के सिवाय, करने से प्रतिषिद्ध करने वाला आदेश कर सकेगा ।
(4) जिला मजिस्ट्रेट तदुपरि यह आदेश कर सकेगा कि कोई भी व्यक्ति जो अधिसूचना की तारीख को उस अधिसूचित स्थान में निवास नहीं करता था, जिला मजिस्ट्रेट की अनुज्ञा के बिना, अधिसूचित स्थान पर या उसमें न तो प्रवेश करेगा, न रहेगा:
परन्तु इस उपधारा में की कोई भी बात, किसी ऐसे व्यक्ति के किसी निकट सम्बन्धी को लागू नहीं होगी जो अधिसूचना की तारीख को, उस अधिसूचित स्थान में निवास करता था ।
(5) जहां कि उपधारा (4) के अनुसरण में किसी व्यक्ति को अधिसूचित स्थान पर या उसमें प्रवेश करने, या रहने की अनुज्ञा दी जाती है वहां वह व्यक्ति ऐसी अनुज्ञा के अधीन कार्य करते समय अपने आचरण के विनियमन के लिए ऐसे आदेशों का अनुपालन करेगा जो जिला मजिस्ट्रेट द्वारा दिए जाएं ।
(6) कोई भी पुलिस आफिसर जो उपनिरीक्षक की पंक्ति से नीचे की पंक्ति का न हो या, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अन्य व्यक्ति, अधिसूचित स्थान पर या उसमें प्रवेश करने वाले, या प्रवेश चाहने वाले, किसी व्यक्ति की या किसी ऐसे व्यक्ति की, जो उस पर या उसमें हैं, तलाशी ले सकेगा और ऐसे किसी व्यक्ति को उसकी तलाशी लेने के प्रयोजन के लिए निरुद्ध कर सकेगा:
परन्तु इस उपधारा के अनुसरण में किसी महिला की तलाशी, महिला द्वारा ली जाने के लिए सिवाय, नहीं ली जाएगी ।
(7) यदि उपधारा (4) के अधीन किए गए किसी आदेश के उल्लंघन में कोई व्यक्ति किसी अधिसूचित स्थान में है, तो ऐसी किन्हीं अन्य कार्यवाहियों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जो उसके विरुद्ध की जा सकेंगी, उसे किसी भी आफिसर द्वारा, अथवा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति द्वारा वहां से हटाया जा सकेगा ।
(8) उपधारा (1) के अधीन किसी स्थान के सम्बन्ध में निकाली गई अधिसूचना से अथवा उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन किए गए किसी आदेश से व्यथित व्यक्ति-
(क) यह घोषणा कराने के लिए कि वह स्थान विधिविरुद्ध संगम के प्रयोजनों के लिए उपयोग में नहीं लाया गया है ; अथवा
(ख) उपधारा (3) या उपधारा (4) के अधीन किए गए आदेश को अपास्त कराने के लिए,
आवेदन, यथास्थिति, अधिसूचना या आदेश की तारीख से तीस दिन के भीतर, उस जिला न्यायाधीश के न्यायालय में कर सकेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर ऐसा अधिसूचित स्थान स्थित है, और उस आवेदन के प्राप्त होने पर जिला न्यायाधीश का न्यायालय, पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात्, उस प्रश्न का विनिश्चय करेगा ।
9. इस अधिनियम के अधीन आवेदनों के निपटारे में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया-ऐसे नियमों के अध्यधीन रहते हुए जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं, वह प्रक्रिया जिसका अनुसरण धारा 4 की उपधारा (3) के अधीन कोई जांच करने में अधिकरण द्वारा, अथवा धारा 7 की उपधारा (4) या धारा 8 की उपधारा (8) के अधीन आवेदन को निपटाने में जिला न्यायाधीश के न्यायालय द्वारा किया जाता है, यावत्शक्य वही होगा जो दावों के अन्वेषण के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित है, और यथास्थिति, अधिकरण या जिला न्यायाधीश के न्यायालय का विनिश्चय अंतिम होगा ।
अध्याय 3
अपराध और शास्तियां
[10. किसी विधिविरुद्ध संगम, आदि का सदस्य हाने पर शास्ति-जहां किसी संगम के धारा 3 के अधीन जारी की गई किसी अधिसूचना द्वारा, जो उस धारा की उपधारा (3) के अधीन प्रभावी हो गई है, विधिविरुद्ध घोषित किया जाता है, वहां,-
(क) कोई व्यक्ति जो,-
(i) ऐसे संगम का सदस्य है और बना रहता है ; या
(ii) ऐसे संगम के अधिवेशनों में भाग लेता है ; या
(iii) ऐसे संगम के प्रयोजन के लिए अभिदाय करता है या उसके लिए कोई अभिदाय प्राप्त करता है या उसकी इच्छा करता है ; या
(iv) किसी प्रकार ऐसे संगम की संक्रियाओं में सहायता करता है,
कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा ; और
(ख) कोई व्यक्ति, जो ऐसे संगम का सदस्य है या बना रहता है या स्वेच्छया ऐसे संगम के उद्देश्यों में किसी रीति से सहायता करने के लिए या उनका संवर्धन करने के लिए कोई कार्य करता है और किसी भी दशा में कोई अननुज्ञप्त अग्न्यायुध, गोलाबारूद, विस्फोटक या अन्य उपस्कर अथवा पदार्थ, जो सामूहिक विनाश कारित करने में समर्थ हो, कब्जे में रखता है और कोई ऐसा कार्य करता है, जिसके परिणामस्वरूप मानव जीवन की हानि होती है या किसी व्यक्ति को गंभीर क्षति होती है या किसी संपत्ति को कोई महत्वपूर्ण नुकसान कारित करता है,-
(i) और यदि ऐसे कार्य के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हो जाती है, तो वह मृत्यु से या आजीवन कारावास से दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा;
(ii) किसी अन्य दशा में, ऐसी अवधि के कारावास से, जो पांच वर्ष से कम नहीं होगा, किंतु आजीवन कारावास हो सकेगा, दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा ।]
11. विधिविरुद्ध संगम की निधियों से बरतने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, जिस पर धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन किन्हीं धनों, प्रतिभूतियों, या पावनों के सम्बन्ध में किसी प्रतिषेधात्मक आदेश की तामील की जा चुकी है, उस प्रतिषेधात्मक आदेश के उल्लंघन में उन्हें संदत्त, परिदत्त, या अन्तरित करेगा या उनसे किसी भी रीति से अन्यथा बरतेगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा, और [संहिता] में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसे उल्लंघन का विचारण करने वाला न्यायालय, दोषसिद्ध व्यक्ति से उन धनों या पावनों की रकमें या उन प्रतिभूतियों का बाजार-मूल्य, जिनके सम्बन्ध में प्रतिषेधात्मक आदेश का उल्लंघन किया गया है, या उनका ऐसा भाग, ऐसा न्यायालय ठीक समझे, वसूल करने के लिए उस पर अतिरिक्त जुर्माना भी अधिरोपित कर सकेगा ।
12. अधिसूचित स्थान के सम्बन्ध में किए गए किसी आदेश के उल्लंघन के लिए शास्ति-(1) जो कोई किसी वस्तु का उपयोग, धारा 8 की उपधारा (3) के अधीन उसके सम्बन्ध में किए गए किसी प्रतिषेधात्मक आदेश के उल्लंघन में करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
(2) जो कोई धारा 8 की उपधारा (4) के अधीन किए गए किसी आदेश के उल्लंघन में जानते हुए और जानबूझकर किसी अधिसूचित स्थान में होगा, या उसमें प्रविष्ट होगा या प्रविष्ट होने का प्रयत्न करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, दण्डनीय होगा, और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
13. विधिविरुद्ध क्रियाकलाप के लिए दण्ड-(1) जो कोई-
(क) किसी विधिविरुद्ध क्रिया में भाग लेगा, या ऐसी क्रिया करेगा, अथवा
(ख) किसी विधिविरुद्ध क्रिया के किए जाने का पक्ष समर्थन करेगा, उसका दुष्प्रेरण करेगा, उसकी सलाह देगा या उसके किए जाने को उद्दीप्त करेगा,
वह कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा, और जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
(2) जो कोई धारा 3 के अधीन विधिविरुद्ध घोषित किए गए किसी संगम की किसी विधिविरुद्ध क्रिया में, उस धारा की उपधारा (3) के अधीन उस अधिसूचना के प्रभावी हो जाने के पश्चात् जिसके द्वारा वह इस प्रकार घोषित किया गया हो, किसी भी प्रकार सहायता करेगा, वह कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(3) इस धारा में की कोई बात भारत सरकार और किसी अन्य देश की सरकार के बीच हुई किसी संधि, करार या अभिसमय को, या भारत सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा उसके लिए की जाने वाली किसी बातचीत को लागू नहीं होगी ।
14. अपराधों का संज्ञेय होना- [संहिता] में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय कोई अपराध संज्ञेय होगा ।
[अध्याय 4
आतंकवादी क्रियाकलापों के लिए दंड
[15. आतंकवादी कार्य- [(1)] जो कोई, भारत की एकता, अखंडता, सुरक्षा, [आर्थिक सुरक्षा] या प्रभुता को संकट में डालने या संकट में डालने की संभावना के आशय से या भारत में या किसी विदेश में जनता अथवा जनता के किसी वर्ग में आतंक फैलाने या आतंक फैलाने की संभावना के आशय से-
(क) बमों, डाइनामाइट या अन्य विस्फोटक पदार्थों या ज्वलनशील पदार्थों या अग्न्यायुधों या अन्य प्राणहर आयुधों या विषों या अपायकर गैसों या अन्य रसायनों या परिसंकटमय प्रकृति के किन्हीं अन्य पदार्थों का (चाहे वे जैविक रेडियोधर्मी, न्यूक्लीयर हों या अन्यथा) या किसी भी प्रकृति के किन्हीं अन्य साधनों का उपयोग करके ऐसा कोई कार्य करता है जिससे, -
(i) किसी व्यक्ति या व्यक्तियों की मृत्यु होती है या उन्हें क्षति होती है या होने की संभावना है; या
(ii) संपत्ति की हानि या उसका नुकसान या विनाश होता है या होने की संभावना है;
(iii) भारत में या किसी विदेश में समुदाय के जीवन के लिए अनिवार्य किन्हीं प्रदायों या सेवाओं में विघ्न कारित होता है या होने की संभावना है; या
3[(त्त्त्क) उच्च क्वालिटी के कागज, सिक्के या किसी अन्य सामग्री की कूटकृत भारतीय करेंसी के निर्माण या उसकी तस्करी या परिचालन से भारत की आर्थिक स्थिरता को नुकसान कारित होता है या होने की संभावना है; या]
(iv) भारत की प्रतिरक्षा या भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या उनके किन्हीं अभिकरणों के किन्हीं अन्य प्रयोजनों के संबंध में उपयोग की जाने वाली या उपयोग किए जाने के लिए आशयित भारत में या किसी विदेश में किसी संपत्ति का नुकसान या विनाश होता है या होने की संभावना है; या
(ख) लोक कृत्यकारियों को आपराधिक बल के द्वारा या आपराधिक बल का प्रदर्शन करके आतंकित करता है या ऐसा करने का प्रयत्न करता है या किसी लोक कृत्यकारी की मृत्यु कारित करता है या किसी लोक कृत्यकारी की मृत्यु कारित करने का प्रयत्न करता है; या
(ग) किसी व्यक्ति को निरुद्ध करता है, उसका व्यपहरण या अपहरण करता है या ऐसे व्यक्ति को मारने या क्षति पहुंचाने की धमकी देता है या भारत सरकार, किसी राज्य सरकार या किसी विदेश की सरकार [किसी अंतरराष्ट्रीय या अंतर-सरकारी संगठन या किसी अन्य व्यक्ति को कोई कार्य करने या किसी कार्य को करने से प्रविरत रहने के लिए बाध्य करने के लिए कोई अन्य कार्य करता है,]
तो वह आतंकवादी कार्य करता है ।
6[स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजन के लिए, -
(क) लोक कृत्यकारी" से संवैधानिक प्राधिकारी या केंद्रीय सरकार द्वारा राजपत्र में लोक कृत्यकारी के रूप में अधिसूचित कोई अन्य कृत्यकारी अभिप्रेत है;
(ख) उच्च क्वालिटी की कूटकृत भारतीय करेंसी" से ऐसी कृटकृत करेंसी अभिप्रेत है, जो किसी प्राधिकृत या अधिसूचित न्याय संबंधी प्राधिकारी द्वारा यह परीक्षा करने के पश्चात् कि ऐसी करेंसी तीसरी अनुसूची में यथा विनिर्दिष्ट मुख्य सुरक्षा लक्षणों की अनुकृति है या उसके अनुरूप है, उस रूप में घोषित की जाए ।]
5[(2) आतंकवादी कार्य के अंतर्गत ऐसा कोई कार्य आता है, जिससे दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट संधियों में से किसी की परिधि के अंतर्गत अपराध गठित होता है और जो उसमें उस रूप में परिभाषित है ।]
16. आतंकवादी कार्य के लिए दंड-जो कोई आतंकवादी कार्य करेगा, वह, -
(क) यदि ऐसे कार्य के परिणामस्वरूप किसी व्यक्ति की मृत्यु हुई है तो, मृत्यु दंड या आजीवन कारावास से दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा;
(ख) किसी अन्य दशा में, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
। । । । । ।
[17. आतंकवादी कार्य के लिए निधियां जुटाने के लिए दंड-जो कोई भारत में या विदेश में, प्रत्यक्ष रूप से या अप्रत्यक्ष रूप से, किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों से, चाहे किसी विधिसम्मत या विधिविरुद्ध स्रोत से, निधियां जुटाता है या निधियां उपलब्ध कराता है या संगृहीत करता है या उपलब्ध कराने का प्रयास करता है अथवा यह जानते हुए कि ऐसी निधियों का ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा या किसी आतंकवादी संगठन द्वारा या किसी आतंकवादी गैंग द्वारा या किसी व्यष्टि आतंकवादी द्वारा कोई आतंकवादी कार्य करने के लिए, पूर्णतः या भागतः उपयोग किए जाने की संभावना है, किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों के लिए, इस बात को विचार में लिए बिना कि ऐसी निधियों का ऐसे कार्य को करने के लिए वस्तुतः प्रयोग किया गया था अथवा नहीं, निधियां जुटाता है या संगृहीत करता है, वह ऐसी अवधि के कारावास से, जो पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए, -
(क) इसमें वर्णित किसी भी कार्य में भाग लेने, संगठित होने या उसका संचालन करने से अपराध गठित होगा;
(ख) निधियां जुटाने के अंतर्गत उच्च क्वालिटी की कूटकृत भारतीय करेंसी के निर्माण या उसकी तस्करी या परिचालन के माध्यम से निधियां जुटाना या संगृहीत करना या उपलब्ध कराना भी है;
(ग) ऐसे प्रयोजन के लिए, जो विनिर्दिष्टतया धारा 15 के अधीन नहीं आता है, किसी व्यष्टि आतंकवादी, आतंकवादी गैंग या आतंकवादी संगठन के फायदे के लिए या किसी रीति में निधियां जुटाने या संगृहीत करने या उसको उपलब्ध कराने को भी अपराध समझा जाएगा ।]
18. षड्यंत्र आदि के लिए दंड-जो कोई, कोई आतंकवादी कार्य करने या आतंकवादी कार्य किए जाने की तैयारी का कार्य करने का षड्यंत्र करेगा या प्रयत्न करेगा या उसके किए जाने का पक्षपोषण करेगा, दुष्प्रेरण करेगा, सलाह देगा या [उद्दीपन करेगा, निदेश देगा या जानबूझकर उसका किया जाना सुकर बनाएगाट वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
[18क. आतंकवादी शिविर आयोजित करने के लिए दंड-जो कोई आतंकवाद में प्रशिक्षण देने के लिए किसी शिविर या शिविरों का आयोजन करेगा या कराएगा, तो वह ऐसी अवधि के कारावास से, जो पांच वर्ष से कम नहीं होगी किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
18ख. आतंकवादी कार्य के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को भर्ती करने के लिए दंड-जो कोई किसी आतंकवादी कार्य को करने के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों को भर्ती करेगा या कराएगा, तो वह ऐसी अवधि के कारावास से, जो पांच वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा, और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।]
19. संश्रय देने, आदि के लिए दंड-जो कोई, किसी व्यक्ति को यह जानते हुए कि वह व्यक्ति आतंकवादी है, स्वेच्छया संश्रय देगा या छिपाएगा या संश्रय देने या छिपाने का प्रयास करेगा वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा:
परन्तु यह धारा ऐसे मामले में लागू नहीं होगी, जिसमें संश्रय देने या छिपाने का कार्य अपराधी के पति या पत्नी द्वारा किया गया है ।
20. आतंकवादी गैंग या संगठन का सदस्य होने के लिए दंड-कोई व्यक्ति, जो ऐसे किसी आतंकवादी गैंग या किसी आतंकवादी संगठन का सदस्य है, जो आतंकवादी कार्य में संलिप्त है, वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
21. आतंकवाद के आगमों को धारित करने के लिए दंड-जो कोई जानबूझकर किसी आतंकवादी कार्य के किए जाने से व्युत्पन्न या अभिप्राप्त की गई या आतंकवादी निधि के माध्यम से अर्जित किसी संपत्ति को धारित करेगा, वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
22. साक्षी को धमकी देने के लिए दंड-जो कोई, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो कोई साक्षी है या किसी अन्य व्यक्ति को, जिसमें वह व्यक्ति हितबद्ध हो, हिंसा की धमकी देगा या साक्षी अथवा किसी अन्य व्यक्ति को, जिसमें साक्षी हितबद्ध हो, दोषपूर्वक अवरुद्ध करेगा या परिरुद्ध करेगा या उक्त कार्यों में से किसी कार्य को करने के आशय से कोई अन्य विधिविरुद्ध कार्य करेगा वह ऐसे कारावास से, जो तीन वर्ष तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
[22क. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति (जिसके अंतर्गत कंपनी के संप्रवर्तक भी हैं), जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को (जिसके अंतर्गत संप्रवर्तक भी हैं) इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए समुचित सावधानी बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी संप्रवर्तक, निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा संप्रवर्तक, निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है; और
(ख) किसी फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
22ख. सोसाइटियों या न्यासों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, किसी सोसाइटी या न्यास द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति (जिसके अंतर्गत सोसाइटी का संप्रवर्तक या न्यास का व्यवस्थापक भी है), जो उस अपराध के किए जाने के समय उस सोसाइटी या न्यास के कारबार के संचालन के लिए उस सोसाइटी या न्यास का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह सोसाइटी या न्यास भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे :
परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि वह अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए समुचित सावधानी बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी सोसाइटी या न्यास द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि अपराध सोसाइटी या न्यास के किसी संप्रवर्तक, निदेशक, प्रबंधक, सचिव, न्यासी या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा संप्रवर्तक, निदेशक, प्रबंधक, सचिव, न्यासी या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए, -
(क) सोसाइटी" से सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या सोसाइटियों के रजिस्ट्रीकरण को शासित करने वाले किसी अन्य राज्य अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है;
(ख) न्यास" से भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) या न्यासों के रजिस्ट्रीकरण को शासित करने वाले किसी अन्य राज्य अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई निकाय अभिप्रेत है;
(ग) किसी सोसाइटी या न्यास के संबंध में, निदेशक" से केंद्रीय या राज्य सरकार या समुचित कानूनी प्राधिकारी के हितों का प्रतिनिधित्व करने वाले किसी पदेन सदस्य से भिन्न उसके शासी बोर्ड का कोई सदस्य अभिप्रेत है ।
22ग. कंपनियों, सोसाइटियों या न्यासों द्वारा अपराधों के लिए दंड-जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध, यथास्थिति, किसी कंपनी या किसी सोसाइटी या किसी न्यास द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति (जिसके अंतर्गत कंपनी या न्यास का संप्रवर्तक या न्यास का व्यवस्थापक भी है), जो उस अपराध के समय कारबार के संचालन के लिए भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, ऐसी अवधि के कारावास के लिए, जो सात वर्ष से कम की नहीं होगी, किंतु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी, जो पांच करोड़ रुपए से कम का नहीं होगा और जो दस करोड़ रुपए तक का हो सकेगा, दायी होगा ।]
23. वर्धित शास्तियां- [यदि कोई व्यक्ति, किसी आतंकवादी या किसी आतंकवादी संगठन या किसी आतंकवादी गैंग की सहायता करने के आशय सेट विस्फोटक अधिनियम, 1884 (1884 का 4) या विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 (1908 का 6) या ज्वलनशील पदार्थ अधिनियम, 1952 (1952 का 20) या आयुध अधिनियम, 1959 (1959 का 54) के किसी उपबंध या उनके अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन करेगा या उसने किसी बम, डायनामाइट या परिसंकटमय विस्फोटक पदार्थ या अन्य प्राणहर आयुध या भारी विनाश करने योग्य पदार्थ या [युद्धकालीन जैव या रासायनिक पदार्थ या उच्च क्वालिटी की कूटकृत भारतीय करेंसी को] अनधिकृत रूप से अपने कब्जे में रखा हुआ है तो वह पूर्वोक्त अधिनियमों में से किसी अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि पांच वर्ष से कम नहीं होगी, किन्तु जो आजीवन कारावास तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने के लिए भी दायी होगा ।
(2) 1[किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में, जो किसी आतंकवादी या आतंकवादी संगठन या आतंकवादी गैंग की सहायता करने के आशय से] उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी विधि या नियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करने का प्रयास या दुष्प्रेरण करेगा या उसके उल्लंघन की तैयारी का कोई कार्य करेगा, यह समझा जाएगा कि उसने उपधारा (1) के अधीन उस उपबंध का उल्लंघन किया है और उस उपधारा के उपबंधों का उस व्यक्ति के संबंध में इस उपांतरण के अधीन रहते हुए प्रभावी होगा कि उसमें आजीवन कारावास" के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह दस वर्ष के कारावास" के प्रति निर्देश है ।
अध्याय 5
आतंकवाद के आगमों का [या ऐसी किसी संपत्ति का, जिसका उपयोग
आतंकवाद के लिए किया जाना आशयित है] समपहरण
[24. आतंकवाद के आगम के प्रति निर्देश के अंतर्गत ऐसी किसी संपत्ति के प्रति, जिसका उपयोग आतंकवाद के लिए किया जाना आशयित है, निर्देश भी होगा-इस अध्याय में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, आतंकवाद के आगम" के प्रति सभी निर्देशों के अंतर्गत ऐसी कोई संपत्ति, जिसका उपयोग आतंकवाद के लिए किया जाना आशयित है," के प्रति निर्देश भी है ।
24क. आतंकवाद के आगमों का समपहरण-(1) कोई भी व्यक्ति आतंकवाद के आगमों को धारण नहीं करेगा या कब्जे में नहीं रखेगा ।
(2) आतंकवाद के आगम, चाहे वे किसी आतंकवादी संगठन या आतंकवादी गैंग द्वारा या किसी अन्य व्यक्ति द्वारा रखे गए हों और चाहे ऐसे आतंकवादी संगठन या आतंकवादी गैंग या अन्य व्यक्ति को अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजित या सिद्धदोष ठहराया गया हो अथवा नहीं, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार को इस अध्याय के अधीन उपबंधित रीति में, समपहृत किए जाने के दायित्वाधीन होंगे ।
(3) जहां कार्यवाहियां इस धारा के अधीन प्रारंभ की गई हैं, वहां न्यायालय अपराध में, अंतर्वलित आतंकवाद के आगमों के मूल्य के समतुल्य संपत्ति की, यथास्थिति, कुर्की करने या उसका समपहरण करने का निदेश देने संबंधी आदेश पारित कर सकेगा ।]
25. अन्वेषण अधिकारी और अभिहित प्राधिकारी की शक्तियां और अभिहित प्राधिकारी के आदेश के विरुद्ध अपील-(1) यदि अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन किए गए किसी अपराध का अन्वेषण करने वाले किसी अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि कोई संपत्ति, जिसके संबंध में अन्वेषण किया जा रहा है, आतंकवाद के आगमों से है तो वह, उस राज्य के, जिसमें ऐसी संपत्ति स्थित है, पुलिस महानिदेशक के लिखित में पूर्व अनुमोदन से, ऐसी संपत्ति का अभिग्रहण करने का आदेश करेगा और जहां ऐसी संपत्ति को अभिग्रहण करना व्यवहार्य न हो, वहां यह निदेश देते हुए ऐसी संपत्ति की कुर्की का आदेश देगा कि उस संपत्ति को, ऐसा आदेश करने वाले अधिकारी या उस अभिहित प्राधिकारी की पूर्व अनुज्ञा के सिवाय अंतरित नहीं किया जाएगा या अन्यथा कार्यवाही नहीं की जाएगी, जिसके समक्ष अभिगृहीत या कुर्क की गई संपत्ति पेश की जाती है और उस आदेश की एक प्रति संबंधित व्यक्ति को भी भेजी जाएगी ।
(2) अन्वेषण अधिकारी, ऐसी संपत्ति के अभिग्रहण या उसकी कुर्की के अड़तालीस घंटों के भीतर अभिहित प्राधिकारी को उसकी सम्यक् सूचना देगा ।
(3) अभिहित प्राधिकारी, जिसके समक्ष अभिगृहीत या कुर्क की गई संपत्ति पेश की जाती है, ऐसे पेश किए जाने की तारीख से साठ दिन की अवधि के भीतर, इस प्रकार जारी किए गए अभिग्रहण या कुर्की के आदेश की या तो पुष्टि करेगा या उसे प्रतिसंहृत करेगा:
परंतु उस व्यक्ति को, जिसकी संपत्ति अभिगृहीत या कुर्क की जा रही है अभ्यावेदन देने का अवसर दिया जाएगा ।
(4) अन्वेषण अधिकारी द्वारा कुर्क की गई स्थावर संपत्ति की दशा में, उसे अभिहित प्राधिकारी के समक्ष तब पेश किया गया समझा जाएगा, जब अन्वेषण अधिकारी अपनी रिपोर्ट अधिसूचित करता है और उसे अभिहित प्राधिकारी के समक्ष कार्यवाही किए जाने के लिए रखता है ।
(5) अन्वेषण अधिकारी, ऐसी किसी नकदी को, जिसे यह अध्याय लागू होता है, अभिगृहीत कर सकेगा और उसे प्रतिधृत कर सकेगा, यदि उसके पास यह संदेह करने के लिए युक्तियुक्त आधार हैं कि-
(क) वह किसी आतंकवाद के प्रयोजनों के संबंध में उपयोग किए जाने के लिए आशयित है; या
(ख) वह किसी आतंकवादी संगठन का संपूर्ण संसाधन या उसका भाग बनती है:
परंतु अन्वेषण अधिकारी द्वारा इस उपधारा के अधीन अभिगृहीत की गई नकदी उस समय से, जब उसे अभिगृहीत किया गया था, प्रारंभ होने वाले अड़तालीस घंटों की अवधि के भीतर तब तक निर्मुक्त नहीं की जाएगी, जब तक वह नकदी अंतवर्लित करने वाला मामला अभिहित प्राधिकारी के समक्ष न हो और उस प्राधिकारी ने उसके अड़तालीस घंटों से अधिक की प्रतिधारण की अनुज्ञा देने वाला आदेश न पारित किया हो ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, नकदी" से निम्नलिखित अभिप्रेत हैं-
(क) किसी भी करेंसी में सिक्के या नोट;
(ख) पोस्टल आर्डर;
(ग) यात्री चैक;
[(गक) क्रेडिट या डेबिट कार्ड या ऐसे कार्ड जो उनका जैसा प्रयोजन सिद्ध करते है;]
(घ) बैंककार के ड्राफ्ट; और
(ङ) ऐसी अन्य धन संबंधी लिखतें, जिन्हें यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार लिखित में आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।
(6) अभिहित प्राधिकारी के द्वारा किए गए आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, आदेश की प्राप्ति की तारीख से तीस दिन की अवधि के भीतर, न्यायालय को अपील कर सकेगा और न्यायालय या तो इस प्रकार किए गए संपत्ति की कुर्की या अभिग्रहण के आदेश की पुष्टि कर सकेगा या ऐसे आदेश को प्रतिसंहृत कर सकेगा और संपत्ति को मुक्त कर सकेगा ।
26. न्यायालय द्वारा आतंकवाद के आगमों के समपहरण का आदेश दिया जाना-जहां कोई संपत्ति इस आधार पर अभिगृहीत या कुर्क की गई है कि वह आतंकवाद के आगमों का गठन करती है और न्यायालय धारा 25 की उपधारा के अधीन इस संबंध में आदेश की पुष्टि कर देता है, वहां, चाहे उस व्यक्ति को, जिसके कब्जे से इसे अभिगृहीत या कुर्क किया गया है, अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन किसी अपराध के लिए न्यायायल में अभियोजित किया गया हो या नहीं, वह ऐसी संपत्ति के समपहरण का आदेश दे सकेगा ।
27. आतंकवाद के आगमों के समपहरण से पूर्व हेतुक दर्शित करने की सूचना का जारी किया जाना-(1) धारा 26 के अधीन आतंकवाद के किन्हीं आगमों के समपहरण का कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा, जब तक उस व्यक्ति को, जो ऐसे आगमों को धारित करता है या अपने कब्जे में रखता है, उन आधारों की, जिन पर आतंकवाद के आगमों को समपहृत करने का प्रस्ताव किया गया है, उसको जानकारी देने वाली सूचना नहीं दे दी गई है और उस व्यक्ति को, ऐसे युक्तियुक्त समय के भीतर, जो सूचना में विनिर्दिष्ट हो, समपहरण के आधारों के विरुद्ध लिखित में पक्षकथन प्रस्तुत करने का अवसर न दिया गया हो और उसे उस मामले में सुनवाई का अवसर भी न दिया गया हो ।
(2) उपधारा (1) के अधीन समपहरण का कोई आदेश नहीं किया जाएगा, यदि ऐसा व्यक्ति यह सिद्ध कर देता है कि वह ऐसे आगमों का, इस जानकारी के बिना कि वे आतंकवाद के आगमों को दर्शित करते हैं, मूल्य के लिए सद्भावी अंतरिती हैं ।
(3) अभिगृहीत या कुर्क की गई संपत्ति के संबंध में न्यायालय के लिए, -
(क) उसका विक्रय किए जाने का निदेश देने वाला आदेश करना समुचित होगा, यदि वह विनश्वर संपत्ति है और संहिता की धारा 459 के उपबंध, जहां तक व्यवहार्य हो, ऐसे विक्रय के शुद्ध आगमों को लागू होंगे;
(ख) किसी अन्य संपत्ति की दशा में, ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो न्यायालय द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसी संपत्ति के प्रशासक के कृत्य का पालन करने के लिए केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी अधिकारी का नामनिर्देशन करने वाला आदेश करना समुचित होगा ।
28. अपील-(1) धारा 26 के अधीन समपहरण के किसी आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसे आदेश की प्राप्ति की तारीख से एक मास के भीतर, उस उच्च न्यायालय को अपील कर सकेगा, जिसकी अधिकारिता के भीतर वह न्यायालय स्थित है, जिसने ऐसा आदेश पारित किया था, जिसके विरुद्ध अपील की गई है ।
(2) जहां धारा 26 के अधीन किसी आदेश को उच्च न्यायालय द्वारा उपांतरित या बातिल किया जाता है या जहां अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन किसी अपराध के लिए संस्थित किए गए किसी अभियोजन में, उस व्यक्ति को, जिसके विरुद्ध धारा 26 के अधीन समपहरण का आदेश किया गया है, दोषमुक्त कर दिया जाता है, वहां ऐसी संपत्ति उसे वापस कर दी जाएगी और किसी भी दशा में, यदि किसी कारणवश समपहृत संपत्ति को वापस करना संभव नहीं है तो उस व्यक्ति को संपत्ति के समपहरण की तारीख से संगणित किए गए युक्तियुक्त ब्याज के साथ उसके लिए कीमत इस प्रकार संदत्त की जाएगी, मानो, संपत्ति का केन्द्रीय सरकार को विक्रय कर दिया गया हो और ऐसी कीमत का अवधारण विहित रीति में किया जाएगा ।
29. समपहरण के आदेश का अन्य दंडों में बाधा न डालना-न्यायालय द्वारा इस भाग के अधीन किया गया समपहरण का आदेश किसी अन्य दंड के, जिसके लिए उससे प्रभावित व्यक्ति अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन दायी है, अधिरोपण को निवारित नहीं करेगा ।
30. तीसरे पक्षकार द्वारा दावे-(1) जहां धारा 25 के अधीन किसी संपत्ति के समपहरण या उसकी कुर्की के संबंध में कोई दावा इस आधार पर किया जाता है कि ऐसी संपत्ति समहपरण या कुर्की के लिए दायी नहीं है वहां अभिहित प्राधिकारी, जिसके समक्ष ऐसी संपत्ति पेश की गई है, दावे या आक्षेप का अन्वेषण करने की कार्यवाही करेगा:
परंतु ऐसा कोई अन्वेषण वहां नहीं किया जाएगा, जहां अभिहित प्राधिकारी यह समझता है कि दावा या आक्षेप अनावश्यक विलंब कराने के लिए अभिकल्पित किया गया है ।
(2) जहां धारा 25 की उपधारा (6) के अधीन कोई अपील की गई है और दावाकर्ता या आक्षेपकर्ता यह साबित कर देता है कि धारा 27 के अधीन जारी की गई सूचना में विनिर्दिष्ट संपत्ति, इस अध्याय के अधीन समपहृत किए जाने के लिए दायी नहीं है तो उक्त सूचना को वापस ले लिया जाएगा या तद्नुसार उसे उपांतरित किया जाएगा ।
31. अभिहित प्राधिकारी की शक्तियां-इस अध्याय के उपबंधों के अधीन कार्य करने वाले अभिहित प्राधिकारी को उसके समक्ष मामले में पूर्व और उचित जांच करने के लिए अपेक्षित सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी ।
32. कतिपय अंतरणों का आकृत और शून्य होना-जहां, धारा 25 के अधीन किसी आदेश के जारी किए जाने या धारा 27 के अधीन किसी सूचना के जारी किए जाने के पश्चात् उक्त आदेश या सूचना में निर्दिष्ट कोई संपत्ति किसी भी प्रकार की रीति से अंतरित कर दी जाती है, वहां ऐसे अंतरण पर, इस अध्याय के अधीन कार्यवाहियों के प्रयोजन के लिए, ध्यान नहीं दिया जाएगा और यदि ऐसी संपत्ति तत्पश्चात् समपहृत कर ली जाती है तो ऐसी संपत्ति के ऐसे अंतरण को अकृत और शून्य समझा जाएगा ।
33. कतिपय व्यक्तियों की संपत्ति का समपहरण-(1) जहां कोई व्यक्ति, अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है, वहां न्यायालय ऐसा कोई आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र होगा कि उसकी जंगम या स्थावर या दोनों प्रकार की सभी या उनमें से कोई संपत्ति, यदि इस अध्याय के अधीन पहले ही कुर्क नहीं की गई है तो ऐसे विचारण के दौरान, कुर्क कर ली जाएं ।
(2) जहां किसी व्यक्ति को अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन दंडनीय किसी अपराध या सिद्धदोष ठहराया गया है, वहां न्यायालय, कोई दंड देने के अतिरिक्त, लिखित में आदेश द्वारा यह घोषित कर सकेगा कि अभियुक्त की, जंगम या स्थावर या दोनों प्रकार की कोई संपत्ति, जो आदेश में विनिर्दिष्ट हो, सभी विल्लंगमों से मुक्त रूप में, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को समपहृत हो जाएगी ।
[(3) जहां कोई व्यक्ति उच्च क्वालिटी की कूटकृत भारतीय करेंसी से संबंधित किसी अपराध का अभियुक्त है, वहां न्यायालय अपराध में अंतर्वलित ऐसी उच्च क्वालिटी की कूटकृत भारतीय करेंसी के मूल्य के, जिसके अंतर्गत ऐसी करेंसी का अंकित मूल्य भी है; जो उच्च क्वालिटी का होने के रूप में परिभाषित नहीं है, किंतु जो उच्च क्वालिटी की कूटकृत भारतीय करेंसी के साथ सामान्य अभिग्रहण के भागरूप है, समतुल्य संपत्ति की, यथास्थिति, कुर्की करने या उसका समपहरण करने का निदेश देने संबंधी आदेश पारित कर सकेगा ।
(4) जहां कोई व्यक्ति, अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का अभियुक्त है, वहां न्यायालय अपराध में अंतर्वलित आतंकवाद के आगमों के मूल्य के समतुल्य संपत्ति की, यथास्थिति, कुकी करने या उसका समपहरण करने का निदेश देने संबंधी आदेश पारित कर सकेगा ।
(5) जहां कोई व्यक्ति, अध्याय 4 या अध्याय 6 के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है, वहां न्यायालय इस आशय का आदेश पारित करने के लिए स्वतंत्र होगा कि उसकी जंगम या स्थावर या दोनों प्रकार की सभी संपत्ति का या उनमें से किसी का, जहां इस अधिनियम के अधीन विचारण अभियुक्त की मृत्यु के कारण या उसे उद्घोषित अपराधी घोषित कर दिए जाने के कारण या किसी अन्य कारणवश समाप्त नहीं हो सकता, न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत तात्त्विक साक्ष्य के आधार पर अधिहरण कर लिया जाए ।]
34. कंपनी द्वारा सरकार को शेयरों का अंतरण करना-जहां किसी कंपनी में कोई शेयर इस अध्याय के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को समपहृत हो गया है, वहां कंपनी, न्यायालय के आदेश की प्राप्ति पर, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में या कंपनी के संगम अनुच्छेदों में किसी बात के होते हुए भी, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को ऐसे शेयरों के अंतरिति के रूप में तुरंत रजिस्टर करेगी ।
अध्याय 6
आतंकवादी संगठन
35. अनुसूची, आदि का संशोधन-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में [अधिसूचना] द्वारा-
(क) 1[पहली अनुसूची] में किसी संगठन को जोड़ सकेगी; या
(ख) 1[पहली अनुसूची] में किसी ऐसे संगठन को भी जोड़ सकेगी, जिसके बारे में यह पता चलता है कि वह अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद का सामना करने के लिए, संयुक्त राष्ट्र के चार्टर के अध्याय 7 के अधीन सुरक्षा परिषद् द्वारा अंगीकृत संकल्प में आतंकवादी संगठन है; या
(ग) 1[पहली अनुसूची] से किसी संगठन को हटा सकेगी; या
(घ) 1[पहली अनुसूची] का किसी अन्य रूप में संशोधन कर सकेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार किसी संगठन के संबंध में उपधारा (1) के खंड (क) के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग तभी कर सकेगी, जब उसे यह विश्वास हो जाता है कि वह आतंकवाद में संलिप्त है ।
(3) उपधारा (2) के प्रयोजनों के लिए, किसी संगठन को आतंकवाद में संलिप्त समझा जाएगा, यदि वह-
(क) आतंकवादी कार्य करता है या उसमें भाग लेता है;
(ख) आतंकवाद के लिए तैयारी करता है;
(ग) आतंकवाद में अभिवृद्धि करता है या उसे बढ़ावा देता है; या
(घ) अन्यथा आतंकवाद में संलिप्त है ।
[(4) केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, दूसरी अनुसूची या तीसरी अनुसूची में जोड़ सकेगी या उससे हटा सकेगी या उसमें संशोधन कर सकेगी और इस प्रकार, यथास्थिति, दूसरी अनुसूची या तीसरी अनुसूची तद्नुसार संशोधित की गई समझी जाएगी ।
(5) उपधारा (1) या उपधारा (4) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना, उसके जारी किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के समक्ष रखी जाएगी ।]
36. किसी आतंकवादी संगठन को अधिसूचना से निकाला जाना-(1) किसी संगठन को अनूसूची से हटाने के लिए धारा 35 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन अपनी शक्ति का प्रयोग करने के लिए कोई आवेदन केन्द्रीय सरकार को किया जा सकेगा ।
(2) कोई आवेदन, -
(क) संगठन द्वारा; या
(ख) संगठन को किसी आतंकवादी संगठन के रूप में अनुसूची में सम्मिलित किए जाने से प्रभावित किसी व्यक्ति द्वारा,
किया जा सकेगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार, इस धारा के अधीन किए गए किसी आवेदन को ग्रहण करने या उसके निपटारे की प्रक्रिया विहित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(4) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन नामंजूर कर दिया गया है वहां आवेदक, धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा गठित पुनर्विलोकन समिति को, आवेदक द्वारा ऐसी नामंजूरी के आदेश की प्राप्ति की तारीख से एक मास के भीतर, पुनर्विलोकन के लिए, आवेदन कर सकेगा ।
(5) पुनर्विलोकन समिति, अनुसूची से किसी संगठन को हटाने से इंकार के विरुद्ध पुनर्विलोकन के लिए आवेदन को मंजूर कर सकेगी, यदि उसका यह विचार है कि नामंजूर करने का विनिश्चय, जब उस पर न्यायिक पुनर्विलोकन के किसी आवेदन के संबंध में लागू सिद्धान्तों को ध्यान में रखकर विचार किया गया था, दोषपूर्ण था ।
(6) जहां पुनर्विलोकन समिति, किसी संगठन द्वारा या उसके संबंध में उपधारा (5) के अधीन पुनर्विलोकन मंजूर करती है वहां आशय का कोई आदेश कर सकेगी ।
(7) जहां उपधारा (6) के अधीन कोई आदेश किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार, उसके द्वारा आदेश की प्रति प्राप्त करने पर, यथासंभवशीघ्र, संगठन को अनुसूची से हटाने का आदेश करेगी ।
37. पुनर्विलोकन समिति-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 36 के प्रयोजनों के लिए एक या अधिक पुनर्विलोकन समितियां गठित करेगी ।
(2) ऐसी प्रत्येक समिति में अध्यक्ष और तीन से अनधिक और ऐसी अर्हताएं रखने वाले उतने अन्य सदस्य होंगे, जितने विहित किए जाएं ।
(3) समिति का अध्यक्ष, ऐसा व्यक्ति होगा, जो किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीध है या रहा है, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा और किसी आसीन न्यायाधीश की नियुक्ति की दशा में, संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति की सहमति अभिप्राप्त की जाएगी ।
38. किसी आतंकवादी संगठन की सदस्यता से संबंधित अपराध-(1) कोई व्यक्ति, जो स्वयं को किसी आतंकवादी संगठन से सहबद्ध करता है या उसके क्रियाकलापों को अग्रसर करने के आशय से उसके साथ सहबद्ध होने की घोषणा करता है, किसी आतंकवादी संगठन की सदस्यता से संबंधित कोई अपराध कारित करता है:
परन्तु यह उपधारा वहां लागू नहीं होगी, जहां आरोपित व्यक्ति यह साबित करने में समर्थ है कि-
(क) संगठन को उस समय आतंकवादी संगठन के रूप में घोषित नहीं किया गया था, जब वह सदस्य बना था या उसने सदस्य बनने की घोषणा की थी; और
(ख) उसने, संगठन को आतंकवादी संगठन के रूप में अनुसूची में सम्मिलित किए जाने के दौरान किसी भी समय उसके क्रियाकलापों में भाग नहीं लिया है ।
(2) कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) के अधीन किसी आतंकवादी संगठन की सदस्यता से संबंधित अपराध कारित करता है, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से अधिक नहीं हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से दंडनीय होगा ।
39. किसी आतंकवादी संगठन को दिए गए समर्थन से संबंधित अपराध-(1) कोई व्यक्ति, किसी आतंकवादी संगठन को समर्थन दिए जाने से संबंधित अपराध करता है, -
(क) जो, आतंकवादी संगठन के क्रियाकलाप को अग्रसर करने के आशय से, -
(i) आतंकवादी संगठन के लिए समर्थन आमंत्रित करता है; और
(ii) ऐसा समर्थन, धारा 40 के अर्थान्तर्गत धन या अन्य संपत्ति की व्यवस्था करने के लिए नहीं है या उसी तक निर्बंधित नहीं है; या
(ख) जो, आतंकवादी संगठन के क्रियाकलाप को अग्रसर करने के आशय से, किसी ऐसी बैठक की व्यवस्था या प्रबंध करता है या बैठक की व्यवस्था या प्रबंध करने में सहायता करता है, जिसके बारे में वह यह जानता है कि वह, -
(i) आतंकवादी संगठन के समर्थन के लिए है; या
(ii) आतंकवादी संगठन के क्रियाकलाप को अग्रसर करने के लिए है; या
(iii) उसे ऐसे व्यक्ति द्वारा संबोधित किया जाना है, जो किसी आतंकवादी संगठन से सहबद्ध है या सहबद्ध होने की घोषणा करता है; या
(ग) जो, किसी आतंकवादी संगठन के क्रियाकलाप को अग्रसर करने के आशय से आतंकवादी संगठन के लिए समर्थन को प्रोत्साहित करने के प्रयोजन के लिए या उसके क्रियाकलाप को अग्रसर करने के लिए किसी बैठक को संबोधित करता है ।
(2) कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) के अधीन किसी आतंकवादी संगठन को दिए गए समर्थन से संबंधित अपराध करता है, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि दस वर्ष से अधिक नहीं होगी या जुर्माने से या दोनों से दंडनीय होगा ।
40. किसी आतंकवादी संगठन के लिए निधि जुटाने का अपराध-(1) कोई व्यक्ति किसी आतंकवादी संगठन के लिए निधि जुटाने का अपराध करता है, जो आतंकवादी संगठन के क्रियाकलाप को अग्रसर करने के आशय से, -
(क) अन्य व्यक्ति को, धन या अन्य संपत्ति उपलब्ध कराने का आमंत्रण देता है और यह आशय रखता है कि उसका उपयोग किया जाना चाहिए या यह संदेह करने का युक्तियुक्त कारण रखता है कि उसका उपयोग आतंकवाद के प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है; या
(ख) धन और अन्य संपत्ति प्राप्त करता है और यह आशय रखता है कि उसका उपयोग किया जाना चाहिए या यह संदेह करने का युक्तियुक्त कारण रखता है कि उसका उपयोग आतंकवाद के प्रयोजनों के लिए किया जा सकता है; या
(ग) धन या अन्य संपत्ति उपलब्ध कराता है और यह जानता है या यह संदेह करने का युक्तियुक्त कारण रखता है कि उसका उपयोग आतंकवाद के प्रयोजनों के लिए किया जाएगा या किया जा सकता है ।
[स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, धन या अन्य संपत्ति उपलब्ध कराने के प्रति निर्देश के अंतर्गत-
(क) उसका दिया जाना, उधार दिया जाना या उसे अन्यथा उपलब्ध कराना भी है, चाहे प्रतिफल के लिए हो या नहीं; या
(ख) उच्च क्वालिटी की कूटकृत भारतीय करेंसी के निर्माण या उसकी तस्करी या उसके परिचालन के माध्यम से निधियां जुटाना, संगृहीत करना या उपलब्ध कराना भी है ।]
(2) कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) के अधीन किसी आतंकवादी संगठन के लिए निधि जुटाने का अपराध करता है, ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि चौदह वर्ष से अधिक नहीं होगी, या जुर्माने से या दोनों से, दंडनीय होगा ।
अध्याय 7
प्रकीर्ण
41. संगम का बने रहना-किसी संगम के बारे में, केवल उसके विघटन या नाम परिवर्तन के किसी औपचारिक कार्य के कारण यह नहीं समझा जाएगा कि वह विद्यमान नहीं रहा है, किन्तु वह तब तक विद्यमान बना रहा समझा जाएगा जब तक उसके किन्हीं सदस्यों के बीच ऐसे संगम के प्रयोजनों के लिए वास्तविक मेल बना रहता है ।
42. प्रत्यायोजन की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी सभी या किसी शक्ति का, जो धारा 7 या धारा 8 या दोनों धाराओं के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जाती है, ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी दशाओं के अधीन, यदि कोई है, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, राज्य सरकार द्वारा भी प्रयोग किया जाएगा और राज्य सरकार, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, लिखित में आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी शक्ति का, जिसका उसके द्वारा प्रयोग किए जाने का निदेश दिया गया है, ऐसी परिस्थितियों में और ऐसी दशाओं के अधीन, यदि कोई है, जो निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, राज्य सरकार के अधीनस्थ किसी व्यक्ति द्वारा, जो उसमें विनिर्दिष्ट हो, प्रयोग किया जा सकेगा ।
43. अध्याय 4 और अध्याय 6 अधीन अपराधों का अन्वेषण करने के लिए सक्षम प्राधिकारी-संहिता में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसा कोई पुलिस अधिकारी, जो-
(क) दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन अधिनियम, 1946 (1946 का 25) की धारा 2 की उपधारा (1) के अधीन गठित दिल्ली विशेष पुलिस स्थापन की दशा में, पुलिस उपायुक्त की पंक्ति से नीचे का या समतुल्य पंक्ति का पुलिस अधिकारी है;
(ख) मुम्बई, कोलकाता, चैन्नई और अहमदाबाद के महानगर क्षेत्रों में और संहिता की धारा 8 की उपधारा (1) के अधीन उस रूप में अधिसूचित किसी अन्य महानगर क्षेत्र में, सहायक पुलिस आयुक्त की पंक्ति से नीचे का है;
(ग) किसी भी दशा में, जो खंड (क) या खंड (ख) से संबंधित नहीं है, पुलिस उप अधीक्षक से नीचे का या समतुल्य पंक्ति का पुलिस अधिकारी है,
अध्याय 4 और अध्याय 6 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का अन्वेषण नहीं करेगा ।
[43क. गिरफ्तार करने, तलाशी लेने, आदि की शक्ति-अभिहित प्राधिकरण का ऐसा कोई अधिकारी, जो, यथास्थिति, केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार के किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त सशक्त किया गया है, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध को कारित करने की योजना के संबंध में जानकारी रखता है या जिसके पास व्यक्तिगत जानकारी या किसी व्यक्ति द्वारा दी गई और लिखित में ली गई ऐसी सूचना पर यह विश्वास करने का कारण है कि किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम के अधीन कोई दंडनीय अपराध किया है या कोई दस्तावेज, वस्तु या ऐसी अन्य चीज जो ऐसे अपराध के किए जाने का साक्ष्य दे सकेगी, या कोई अवैध रूप से अर्जित संपत्ति या ऐसे दस्तावेज या अन्य वस्तु, जो किसी अवैध रूप से अर्जित संपत्ति के धारण का साक्ष्य दे सकेगी, जो इस अध्याय के अधीन अभिग्रहण किए जाने या रोक लगाए जाने या समपहरण किए जाने के लिए दायी है, किसी भवन, वाहन या स्थान में रखी गई है या छिपाई गई है, तो वह अपने अधीनस्थ किसी अधिकारी को ऐसे किसी व्यक्ति को, चाहे दिन में या रात में, गिरफ्तार करने या ऐसे किसी भवन, वाहन या स्थान की तलाशी लेने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा या स्वयं ऐसे व्यक्ति को गिरफ्तार कर सकेगा या ऐसे किसी भवन, वाहन या स्थान की तलाशी ले सकेगा ।
43ख. गिरफ्तारी, अभिग्रहण, आदि की प्रक्रिया-(1) धारा 43क के अधीन किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करने वाला कोई अधिकारी, यथासंभवशीघ्र उसे ऐसी गिरफ्तारी के आधारों की सूचना देगा ।
(2) धारा 43क के अधीन गिरफ्तार प्रत्येक व्यक्ति और अभिगृहीत वस्तु को बिना किसी अनावश्यक विलंब के निकटतम पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को अग्रेषित किया जाएगा ।
(3) ऐसा प्राधिकारी या अधिकारी, जिसे उपधारा (2) के अधीन कोई व्यक्ति या वस्तु अग्रेषित की गई है, सब सुविधापूर्ण शीघ्रता से ऐसे उपाय करेगा जो संहिता के उपबंधों के अनुसार आवश्यक हों ।
43ग. संहिता के उपबंधों का लागू होना-संहिता के उपबंध, जहां तक वे इस अधिनियम के उपबंधों के असंगत न हों, इस अधिनियम के अधीन की गई सभी गिरफ्तारियों, तलाशियों और अभिग्रहणों को लागू होंगे ।
43घ. संहिता के कतिपय उपबंधों का उपातंरित रूप में लागू होना-(1) संहिता या किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय प्रत्येक अपराध संहिता की धारा 2 के खंड (ग) के अर्थ के भीतर संज्ञेय अपराध समझा जाएगा और उस खंड में यथा परिभाषित संज्ञेय मामला" का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ।
(2) संहिता की धारा 167 ऐसे किसी मामले के संबंध में, जिसमें इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध अंतर्वलित है, इस उपांतरण के अधीन रहते हुए लागू होगी कि उपधारा (2) में-
(क) पन्द्रह दिन", नब्बे दिन" और साठ दिन" के प्रतिनिर्देशों का, जहां कहीं वे आते हैं, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे क्रमशः तीस दिन", नब्बे दिन" और नब्बे दिन" के प्रतिनिर्देश है; और
(ख) परंतुक के पश्चात् निम्नलिखित परंतुक अंतःस्थापित किए जाएंगे, अर्थात्: -
परंतु यह और कि यदि नब्बे दिन की उक्त अवधि के भीतर अन्वेषण पूरा करना संभव नहीं है तो न्यायालय, यदि वह लोक अभियोजक की अन्वेषण की प्रगति और नब्बे दिनों की उक्त अवधि से परे, अभियुक्त को निरुद्ध रखने के लिए विनिर्दिष्ट कारणों को उपदर्शित करने वाली रिपोर्ट से संतुष्ट है, उक्त अवधि को एक सौ अस्सी दिन तक विस्तारित कर सकेगा:
परन्तु यह भी कि यदि इस अधिनियम के अधीन अन्वेषण करने वाला पुलिस अधिकारी अन्वेषण के प्रयोजनों के लिए, न्यायिक अभिरक्षा में स्थित किसी व्यक्ति को न्यायिक अभिरक्षा से पुलिस अभिरक्षा में सौंपने का अनुरोध करता है तो वह ऐसा करने के कारणों का कथन करते हुए एक शपथपत्र फाइल करेगा और ऐसी पुलिस अभिरक्षा का अनुरोध करने के लिए किसी विलंब, यदि कोई हो, को भी स्पष्ट करेगा ।" ।
(3) संहिता की धारा 268 ऐसे किसी मामले के संबंध में जिसमें इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध अंतर्वलित है, इस उपांतरण के अधीन रहते हुए लागू होगी कि-
(क) उसकी उपधारा (1) में, -
(i) राज्य सरकार" के प्रतिनिर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार" के प्रतिनिर्देश है;
(ii) राज्य सरकार के आदेश" के प्रतिनिर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के आदेश" के प्रतिनिर्देश है; और
(ख) उसकी उपधारा (2) में राज्य सरकार" के प्रतिनिर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार" के प्रतिनिर्देश है ।
(4) संहिता की धारा 438 में की कोई बात, किसी ऐसे मामले के संबंध में लागू नहीं होगी जिसमें किसी ऐसे अभियुक्त व्यक्ति की गिरफ्तारी अंतर्वलित है, जिसने इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध किया है ।
(5) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अध्याय 4 और अध्याय 6 के अधीन दंडनीय किसी अपराध का अभियुक्त कोई व्यक्ति, यदि वह अभिरक्षा में है, जमानत पर या अपने ही बंधपत्र पर तब तक नहीं छोड़ा जाएगा जब तक लोक अभियोजक को ऐसे छोड़े जाने के लिए आवेदन पर सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो:
परंतु ऐसा अभियुक्त व्यक्ति जमानत पर या अपने ही बंधपत्र पर छोड़ा नहीं जाएगा यदि न्यायालय की केस डायरी या संहिता की धारा 173 के अधीन दी गई रिपोर्ट के परिशीलन पर यह राय है कि वह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार है कि उस व्यक्ति के विरुद्ध अभियोग प्रथमदृष्ट्या सही है ।
(6) उपधारा (5) में विनिर्दिष्ट जमानत मंजूर किए जाने पर निर्बंधन, संहिता या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन जमानत मंजूर करने संबंधी निर्बंधनों के अतिरिक्त हैं ।
(7) उपधारा (5) और उपधारा (6) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई जमानत इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के अभियुक्त व्यक्ति को अतिआपवादिक परिस्थितियों में के सिवाय और ऐसे कारणों से जो लेखबद्ध किए जाएं, मंजूर नहीं की जाएगी, यदि वह भारत का नागरिक नहीं है और उसने देश में अप्राधिकृत रूप से या अवैध-रूप से प्रवेश किया है ।
43ङ. धारा 15 के अधीन अपराधों के बारे में उपधारणा-धारा 15 के अधीन किसी अपराध के लिए अभियोजन में, यदि यह साबित हो जाता है कि-
(क) उक्त धारा में विनिर्दिष्ट आयुध या विस्फोटक या कोई अन्य पदार्थ अभियुक्त के कब्जे से बरामद किए गए थे और यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसे आयुध या उसी प्रकृति के विस्फोटक या अन्य पदार्थ ऐसे अपराध को कारित करने में प्रयोग किए गए थे; या
(ख) विशेषज्ञ के साक्ष्य द्वारा, अभियुक्त व्यक्ति की अंगुली छाप या ऐसा कोई अन्य निश्चित साक्ष्य जिससे अभियुक्त के अपराध में अंतर्वलित होने का संकेत मिलता है, अपराध स्थल पर या किसी अन्य वस्तु पर या जिसके अंतर्गत ऐसे अपराध के किए जाने के संबंध में उपयोग किए गए आयुध और यान भी हैं, पाया गया था,
तो न्यायालय, जब तक इसके प्रतिकूल दर्शित न किया गया हो, यह उपधारणा करेगा कि अभियुक्त ने ऐसा अपराध किया है ।
43च. सूचना देने की बाध्यता-(1) किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अन्वेषण करने वाला अधिकारी, पुलिस अधिक्षक से अनिम्न पंक्ति के किसी अधिकारी के लिखित पूर्व अनुमोदन से, केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी या किसी बैंक या किसी कंपनी या किसी फर्म या किसी अन्य संस्था, स्थापन, संगठन के किसी अधिकारी या प्राधिकारी या किसी व्यष्टि से मुद्दों या विषयों पर ऐसे अपराध के संबंध में उसके कब्जे में की ऐसी जानकारी देने की अपेक्षा कर सकेगा जहां अन्वेषण करने वाले अधिकारी के पास यह विश्वास करने का कारण है कि ऐसी सूचना इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोगी या उनसे सुसंगत होगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन मांगी गई जानकारी देने में असफल रहना या जानबूझकर मिथ्या जानकारी देना, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी या जुर्माने से या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(3) संहिता में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (2) के अधीन किसी अपराध का विचारण संक्षिप्त मामले के रूप में किया जाएगा और उक्त संहिता के अध्याय 21 में [धारा 262 की उपधारा (2) के सिवायट विहित प्रक्रिया उसको लागू होगी ।]
44. साक्षियों का संरक्षण-(1) इस संहिता में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों लिखित में अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से, यदि न्यायालय ऐसा चाहे तो, बंद कमरे में की जा सकेंगी ।
(2) यदि न्यायालय का, उसके समक्ष किसी कार्यवाही में किसी साक्षी द्वारा या ऐसे साक्षी के संबंध में लोक अभियोजक द्वारा किए गए आवेदन पर या स्वप्रेरणा से यह समाधान हो जाता है कि ऐसे साक्षी का जीवन खतरे में है तो वह, लिखित में, अभिलिखित किए जाने वाले कारणों से, ऐसे साक्षी की पहचान और पता गुप्त रखने वाला ऐसा उपाय कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
(3) विशिष्टतया और उपधारा (2) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना उन उपायों में, जिन्हें न्यायालय उस उपधारा के अधीन कर सकेगा, निम्नलिखित सम्मिलित हो सकेंगे-
(क) उस स्थान पर कार्यवाहियों का किया जाना, जिसका विनिश्चय न्यायालय द्वारा किया जाएगा;
(ख) अपने आदेशों या निर्णयों या मामले के किन्हीं अन्य अभिलेखों में, जो जनता तक पहुंच योग्य हैं, साक्षियों के नाम और पते के उल्लेख से बचना;
(ग) यह सुनिश्चित करने के लिए कोई निदेश जारी करना कि साक्षियों की पहचान और पता प्रकट नहीं किए जाते हैं;
(घ) यह विनिश्चय कि ऐसा आदेश करना लोक हित में है कि ऐसे न्यायालय के समक्ष लंबित सभी या कोई कार्यवाही किसी रीति में प्रकाशित नहीं की जाएगी ।
(4) कोई व्यक्ति जो उपधारा (3) के अधीन जारी किए गए किसी विनिश्चय या निदेश का उल्लंघन करेगा, कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा और जुर्माने का भी दायी होगा ।
45. अपराधों का संज्ञान- [(1)] कोई न्यायालय, -
(i) अध्याय 3 के अधीन, केन्द्रीय सरकार या इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी की पूर्व मंजूरी के बिना;
(ii) अध्याय 4 और अध्याय 6 के अधीन, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना और जहां ऐसा अपराध किसी विदेशी सरकार के विरुद्ध किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना,
किसी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा ।
[(2) उपधारा (1) के अधीन अभियोजन के लिए मंजूरी, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा नियुक्त ऐसे प्राधिकारी की रिपोर्ट पर विचार करने के पश्चात् ही ऐसे समय के भीतर दी जाएगी, जो विहित किया जाए जो अन्वेषण के अनुक्रम में एकत्रित साक्ष्य का स्वतंत्र रूप से पुनर्विलोकन करेगा और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को ऐसे समय के भीतर, जो विहित किया जाए, सिफारिश करेगा ।]
46. संसूचनाओं के अंतर्रोधन के माध्यम से संगृहीत साक्ष्य की ग्राह्यता-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, भारतीय तार अधिनियम, 1885 (1885 का 13) या सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 (2000 का 21) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अधीन तार, इलैक्ट्रोनिक या मौखिक संसूचना के अन्तर्रोधन के माध्यम से संगृहीत साक्ष्य, किसी मामले के विचारण के दौरान किसी न्यायालय में अभियुक्त के विरुद्ध साक्ष्य के रूप में ग्राह्य होगा :
परंतु अन्तर्रोधित किसी तार, इलैक्ट्रोनिक या मौखिक संसूचना की अंतर्वस्तु या उससे व्युत्पन्न साक्ष्य किसी न्यायालय में किसी विचारण, सुनवाई या अन्य कार्यवाही में तब तक साक्ष्य में ग्रहण नहीं किया जाएगा या अन्यथा प्रकट नहीं किया जाएगा जब तक कि प्रत्येक अभियुक्त को उस पूर्वोक्त विधि के अधीन, जिसके अधीन, अन्तर्रोधन का निदेश किया गया था, सक्षम प्राधिकारी के आदेश की प्रति, विचारण, सुनवाई या कार्यवाही के कम से कम दस दिन पूर्व न दे दी गई हो:
परंतु यह और कि मामले का विचारण कर रहे न्यायाधीश द्वारा दस दिन की अवधि का अधित्याग किया जा सकेगा, यदि वह इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि विचारण, सुनवाई या कार्यवाही के दस दिन पूर्व ऐसा आदेश अभियुक्त को दिया जाना संभव नहीं था और ऐसे आदेश के प्राप्त करने में विलंब से अभियुक्त पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
47. अधिकारिता का वर्जन-(1) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा अभिव्यक्त रूप से उपबंधित है उसके सिवाय इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार या जिला मजिस्ट्रेट या केन्द्रीय सरकार या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी द्वारा की गई कोई कार्यवाही किसी सिविल न्यायालय में किसी वाद या आवेदन या अपील अथवा पुनरीक्षण के रूप में प्रश्नगत नहीं की जाएगी और इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली किसी कार्यवाही के संबंध में किसी सिविल न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा कोई व्यादेश मंजूर नहीं किया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी कोई सिविल न्यायालय या अन्य प्राधिकारी, धारा 36 में निर्दिष्ट मामलों के संबंध में कोई अधिकारिता, शक्तियां या प्राधिकार नहीं रखेगा या उसका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा ।
48. अन्य अधिनियमितियों से असंगत अधिनियम और नियमों आदि का प्रभाव-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए किसी आदेश के उपबंध, इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति या इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के फलस्वरूप प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में अंतर्विष्ट उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
49. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, -
(क) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार अथवा राज्य सरकार के किसी अधिकारी या प्राधिकारी या जिला मजिस्ट्रेट अथवा सरकार या जिला मजिस्ट्रेट द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी या किसी अन्य ऐसे प्राधिकारी के, जिसको इस अधिनियम के अधीन शक्तियां प्रदान की गई हैं, विरुद्ध ऐसी बात के लिए जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए तात्पर्यित है; और
(ख) आतंकवाद का मुकाबला करने के लिए निदेशित किसी संक्रिया के दौरान, सशस्त्र बलों या अर्द्ध सैनिक बलों के किसी सेवारत या सेवानिवृत्त सदस्य के विरुद्ध, उसके द्वारा सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए तात्पर्यित किसी कार्रवाई के संबंध में,
नहीं होगी ।
50. व्यावृत्ति-इस अधिनियम की किसी बात का संघ की नौ सेना, सेना या वायु सेना या अन्य सशस्त्र बलों से संबंधित किसी विधि के अधीन किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी द्वारा प्रयोक्तव्य अधिकारिता या उसको लागू प्रक्रिया पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
51. अधिनियम के अधीन आरोपित व्यक्ति के पासपोर्ट और आयुध अनुज्ञप्ति का परिबद्ध किया जाना-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी किसी ऐसे व्यक्ति का पासपोर्ट और उसकी आयुध अनुज्ञप्ति, जिसे इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किए जाने के लिए आरोपित किया गया है, ऐसी अवधि के लिए जिसे न्यायालय ठीक समझे परिबद्ध किए गए समझे जाएंगे ।
[51क. केन्द्रीय सरकार की कतिपय शक्तियां-आतंकवादी क्रियाकलापों का निवारण करने और उनका मुकाबला करने के लिए केन्द्रीय सरकार को निम्नलिखित कार्य करने की शक्ति होगी, -
(क) आदेश की अनुसूची में सूचीबद्ध व्यष्टियों या अस्तित्वों या आतंकवाद में लगे या लगे होने के लिए संदिग्ध किसी अन्य व्यक्ति द्वारा या उनकी ओर से या उनके निदेश पर धारित निधियों और अन्य वित्तीय आस्तियों या आर्थिक संसाधनों पर रोक लगाना, उनका अभिग्रहण करना या उन्हें कुर्क करना;
(ख) आदेश की अनुसूची में सूचीबद्ध व्यष्टियों या अस्तित्वों या आतंकवाद में लगे या लगे होने के लिए संदिग्ध किसी अन्य व्यक्ति के फायदे के लिए निधियों, वित्तीय आस्तियों या आर्थिक संसाधनों या संबद्ध सेवाओं को उपलब्ध कराने से किसी व्यष्टि या अस्तित्व को प्रतिषिद्ध करना;
(ग) आदेश की अनुसूची में सूचीबद्ध व्यष्टियों या आतंकवाद में लगे या लगे होने के लिए संदिग्ध किसी अन्य व्यक्ति के भारत में प्रवेश करने या भारत से उसके अभिवहन को रोकना ।]
52. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के कार्यान्वयन के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -
(क) इस अधिनियम के अधीन जारी की गई सूचनाओं या किए गए आदेशों की तामील और वह रीति जिसमें ऐसी सूचनाओं या आदेशों की वहां तामील की जा सकेगी जहां वह व्यक्ति, जिस पर तामील की जानी है, निगम, कंपनी, बैंक या अन्य संगम हैं;
(ख) इस अधिनियम के अधीन कोई जांच करने या किसी आवेदन का निपटारा करने में अधिकरण या जिला न्यायाधीश द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;
(ग) धारा 28 की उपधारा (2) के अधीन समपहृत संपत्ति की कीमत का अवधारण;
(घ) धारा 36 की उपधारा (3) के अधीन किसी आवेदन को ग्रहण करने और उसे निपटाने के लिए प्रक्रिया;
(ङ) धारा 37 की उपधारा (2) के अधीन पुनर्विलोकन समिति के सदस्यों की अर्हताएं; और
[(ङङ) वह समय जिसके भीतर धारा 45 की उपधारा (2) के अधीन अभियोजन के लिए मंजूरी दी जाएगी और केन्द्रीय सरकार को सिफारिश की जाएगी; और]
(च) कोई अन्य विषय, जिसे विहित किया जाना है या जो विहित किया जाए ।
53. आदेशों और नियमों का संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखा जाना- [(1)] इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किया गया प्रत्येक आदेश और बनाया गया प्रत्येक नियम किए जाने या बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकती है, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस आदेश या नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह आदेश या नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा आदेश या नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् केवल ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा तथापि, उस आदेश या नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से पहले उसके अधीन की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
[(2) अनुसूची की प्रविष्टि 33 में निर्दिष्ट आदेश और उस आदेश में किया गया प्रत्येक संशोधन किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी ।]
[पहली अनुसूची]
धारा 2 (1) (ड) और धारा 35 देखिए
आतंकवादी संगठन
1. बबर खालसा इंटरनेशनल ।
2. खालिस्तान कमांडो फोर्स ।
3. खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स ।
4. इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन ।
5. लश्कर-ए-तैयबा/पासबान-ए-अहले हदीस ।
6. जैश-ए-मोहम्मद/तहरीक-ए-फुरकौन ।
7. हरकत-उल-मुजाहिदीन/हरकत-उल-अंसार/हरकत-उल-जैहाद-ए-इस्लामी ।
8. हिजबुल मुजाहिदीन/हिजबुल मुजाहिदीन पीर पंजाल रेजिमेंट ।
9. अल अमर मुजाहिदीन ।
10. जम्मू और कश्मीर इस्लामिक फ्रंट ।
11. यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट आफ असम (उल्फा) ।
12. नेशनल डेमोक्रेटक फ्रंट आफ बोडोलैंड (एनडीएफबी) ।
13. पीपल्स लिबरेशन आर्मी (पीएलए) ।
14. यूनाइटेड नेशनल लिबरेशन फ्रंट (यूएनएलएफ) ।
15. पीपल्स रेवोल्यूशनरी पार्टी आफ कांगलीपाक (पीआरईपीएके) ।
16. कांगलीपाक कम्युनिस्ट पार्टी (केसीपी) ।
17. कांग्लेई योल कान्बालुप (केवाई केएल) ।
18. मणिपुर पीपल्स लिबरेशन फ्रंट (एमपीएलएफ) ।
19. आल त्रिपुरा टाइगर फोर्स ।
20. नेशनल लिबरेशन फ्रंट आफ त्रिपुरा ।
21. लिबरेशन टाइगर्स आफ तमिल ईलम (एलटीटीई) ।
22. स्टुडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट आफ इंडिया ।
23. दीनदार अंजुमन ।
24. कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (मार्कसिस्ट-लेनिनिस्ट) पीपल्स वार, उसकी सभी विरचनाएं और फ्रंट संगठन।
25. माओइस्ट कम्युनिस्ट सेंटर (एमसीसी), उसकी सभी विरचनाएं और फ्रंट संगठन ।
26. अल बदर ।
27. जमायते-उल-मुजाहिद्दीन ।
28. अल-कायदा ।
29. दुखतरान-ए-मिल्लत (डीईएम) ।
30. तमिलनाडु लिबरेशन आर्मी (टीएनएलए) ।
31. तमिल नेशनल रिट्रीबल ट्रुप्स (टीएनआरटी) ।
32. अखिल भारत नेपाली एकता समाज (एबीएनईएस) ।]
[33. संयुक्त राष्ट्र (सुरक्षा परिषद्) अधिनियम, 1947 (1947 का 43) की धारा 2 के अधीन बनाए गए और समय-समय पर यथासंशोधित आतंकवाद का निवारण और दमन (सुरक्षा परिषद् के संकल्पों का कार्यान्वयन) आदेश, 2007 की अनुसूची में सूचीबद्ध संगठन ।]
[दूसरी अनुसूची
[धारा 15 (2) देखिए]
(i) वायुयान के विधिविरुद्ध अभिग्रहण का दमन करने संबंधी कन्वेंशन (1970);
(ii) सिविल विमानन की सुरक्षा के विरुद्ध विधिविरुद्ध कृत्यों का दमन करने संबंधी कन्वेंशन (1971);
(iii) अंतरराष्ट्रीय रूप से संरक्षित व्यक्तियों के, जिनके अंतर्गत राजनयिक अभिकर्ता भी हैं, विरुद्ध अपराधों के निवारण और दंड संबंधी कन्वेंशन (1973);
(iv) बंधकों को लेने के विरुद्ध अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन (1979);
(v) न्यूक्लीय पदार्थ की भौतिक संरक्षा संबंधी कन्वेंशन (1980);
(vi) सिविल विमानन की सुरक्षा के विरुद्ध विधिविरुद्ध कृत्यों का दमन करने संबंधी कन्वेंशन के अनुपूरक, अंतरराष्ट्रीय सिविल विमानन में लगे वायुपत्तनों पर हिंसा के विधिविरुद्ध कृत्यों का दमन करने संबंधी प्रोटोकोल (1988);
(vii) सामुद्रिक नौपरिवहन की सुरक्षा के विरुद्ध विधिविरुद्ध कृत्यों का दमन करने संबंधी कन्वेंशन (1988);
(viii) महाद्वीपीय मग्नतट भूमि पर अवस्थित स्थिर प्लेटफार्मों की सुरक्षा के विरुद्ध विधिविरुद्ध क्रियाकलापों का दमन करने संबंधी प्रोटोकोल (1988); और
(ix) आतंकवादी बमबारी का दमन करने संबंधी अंतरराष्ट्रीय कन्वेंशन (1977) ।
तीसरी अनुसूची
[धारा 15 (1) के स्पष्टीकरण का खंड (ख) देखिए]
उच्च क्वालिटी के कूटकृत भारतीय करेंसी नोटों को परिभाषित करने के सुरक्षा लक्षण-
(क) जलचिह्न;
(ख) अप्रकट प्रतिबिंब; और
(ग) करेंसी नोटों में आलेख्य के माध्यम से देखना ।]
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