लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950
(1950 का अधिनियम संख्यांक 43)
[12 मई, 1950]
लोक सभा और राज्यों के विधान-मण्डलों में स्थानों के आबंटन
और उनके लिए निर्वाचनों के प्रयोजनार्थ निर्वाचन-क्षेत्रों के
परिसीमन, ऐसे निर्वाचनों से मतदाताओं की अर्हताओं,
निर्वाचक नामावलियों की तैयारी, [राज्य सभा में
[संघ राज्यक्षेत्रोंट के प्रतिनिधियों द्वारा भरे
जाने वाले स्थानों को भरने की रीतिट
और तत्संसक्त विषयों के लिए
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
भाग 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम-यह अधिनियम लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 कहा जा सकेगा ।
2. परिभाषाएं-- *** इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है ;
(ख) “सभा निर्वाचन-क्षेत्र" से राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचनों के प्रयोजनार्थ [विधि द्वाराट उपबन्धित निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है ;
(ग) “परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र" से राज्य की विधान परिषद् के लिए निर्वाचनों के प्रयोजनार्थ [विधि द्वाराट उपबंधित निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है ;
। । । । । ।
(घ) “निर्वाचन-आयोग" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 324 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है ;
(ङ) “आदेश" से शासकीय राजपत्र में प्रकाशित आदेश अभिप्रेत है ;
(च) “संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र" से लोकसभा के लिए निर्वाचनों के प्रयोजनार्थ [विधि द्वाराट उपबन्धित निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है ;
। । । । । ।
(छ) “व्यक्ति" के अंतर्गत व्यक्तियों का निकाय नहीं आता है ;
(ज) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
[(झ) “राज्य" के अंतर्गत कोई भी संघ राज्यक्षेत्र आता है ;]
(ञ) “राज्य सरकार" से किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में उसका प्रशासक अभिप्रेत है ।
। । । । । ।
भाग 2
स्थानों का आबंटन और निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन
लोक सभा
[3. लोक सभा में स्थानों का आबंटन-लोक सभा में राज्यों को स्थानों का आबंटन और हर एक राज्य की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित किए जाने वाले स्थानों की, यदि कोई हों, संख्या वह होगी जो प्रथम अनुसूची में दर्शित है ।
4. लोक सभा में स्थानों का भरा जाना और संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र- । । । ।
[(2) राज्यों को धारा 3 के अधीन आबंटन में मिले लोक सभा में के सभी स्थान ऐसे स्थान होंगे जो राज्यों में के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाएंगे ।]
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट हर संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र एक सदस्य निर्वाचन-क्षेत्र होगा ।
(4) हर राज्य, जिसको धारा 3 के अधीन आबंटन में केवल एक स्थान मिला है, एक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र होगा ।
[(5) उपधारा (4) में यथा उपबंधित के सिवाय अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, मणिपुर और नागालैंड राज्यों के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों को छोड़कर समस्त संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों का विस्तार ऐसा होगा जैसा परिसीमन अधिनियम, 2002 (2002 का 33) के उपबंधों के अधीन परिसीमन आयोग द्वारा किए गए आदेशों द्वारा अवधारित किया गया हो और अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, मणिपुर और नागालैंड राज्यों के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र का विस्तार ऐसा होगा जैसा परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 10क और धारा 10ख के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 में उपबंधित किया गया हो ।]
5. [संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 2) की धारा 4 द्वारा निरसित ।
6. [संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन ।]-विधि अनुकूलन (सं० 2) आदेश, 1956 द्वारा निरसित ।
राज्य विधान सभाएं
[7. विधान सभाओं में स्थानों की कुल संख्या तथा सभा निर्वाचन-क्षेत्र- (1) द्वितीय अनुसूची में विनिर्दिष्ट हर एक राज्य की विधान सभा में [ [उपधारा (1क), उपधारा (1ख) और उपधारा (1ग)] के उपबंधों के अधीन उन स्थानों की कुल संख्या] जो सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाएंगे तथा उन स्थानों की, यदि कोई हों, जो राज्य की अनुसूचित जातियों के लिए और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित की जानी है, संख्या वह होगी जो उस अनुसूची में दर्शित है :
परन्तु अनुच्छेद 371क के खंड (2) में निर्दिष्ट कालावधि के लिए नागालैण्ड के राज्य की विधान सभा को आबंटित स्थानों की कुल संख्या [बावन] होगी, जिनमें से-
(क) [बारह स्थान] टयूनसांग जिले को आबंटित किए जाएंगे और ऐसे व्यक्तियों द्वारा भरे जाएंगे, जो उस अनुच्छेद में निर्दिष्ट प्रादेशिक परिषद् के सदस्यों द्वारा उन्हीं में से ऐसी रीति में, जैसी राज्यपाल उस परिषद् से परामर्श करने के पश्चात् शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे, चुने जाएं, तथा
(ख) शेष चालीस स्थान ऐसे व्यक्तियों द्वारा भरे जाएंगे जो शेष राज्य के सभा निर्वाचन-क्षेत्र में से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने जाएंगे ।
[(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, सिक्किम राज्य की विधान सभा में जो लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1980 (1980 का 8) के प्रारम्भ के पश्चात् किसी समय गठित की जानी है उन स्थानों की कुल संख्या जो सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाएंगे, बत्तीस होगी जिसमें से--
(क) बारह स्थान भूटिया-लेप्चा उद्भव के सिक्किमियों के लिए आरक्षित होंगे;
(ख) दो स्थान उस राज्य की अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित होंगे; और
(ग) एक स्थान धारा 25क में निर्दिष्ट संघा के लिए आरक्षित होगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में “भूटिया" के अंतर्गत चुम्बिपा, डोप्थापा, दुकपा, कगाते, शेरपा, तिब्बती, ट्रोमोपा और योल्मो भी हैं ।]
[(1ख) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अरुणाचल प्रदेश, मेघालय, मिजोरम और नागालैण्ड राज्यों की विधान सभाओं में, जो लोक प्रतिनिधित्व (तीसरा संशोधन) अधिनियम, 1987 (1987 का 40) के प्रारम्भ के पश्चात् किसी समय गठित की जानी है-
(क) अरुणाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए [उनसठ स्थान] आरक्षित होंगे ;
(ख) मेघालय राज्य की विधान सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए पचपन स्थान आरक्षित होंगे ;
(ग) मिजोरम राज्य की विधान सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए उनतालीस स्थान आरक्षित होंगे; और
(घ) नागालैण्ड राज्य की विधान सभा में अनुसूचित जनजातियों के लिए उनसठ स्थान आरक्षित होंगे ।]
[(1ग) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, त्रिपुरा राज्य की विधान सभा में, जो लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1992 (1992 का 38) के प्रारम्भ के पश्चात् किसी समय गठित की जानी है, अनुसूचित जनजातियों के लिए बीस स्थान आरक्षित होंगे ।]
(2) [ उपधारा (1) या उपधारा (1क) मेंट निर्दिष्ट हर सभा निर्वाचन-क्षेत्र एक-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्र होगा ।
[(3) अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, मणिपुर और नागालैंड राज्यों के सभा निर्वाचन-क्षेत्रों को छोड़कर समस्त राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के प्रत्येक सभा निर्वाचन-क्षेत्र का विस्तार ऐसा होगा जैसा परिसीमन अधिनियम, 2002 (2002 का 33) के उपबंधों के अधीन परिसीमन आयोग द्वारा किए गए आदेशों द्वारा अवधारित किया गया हो और अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, मणिपुर और नागालैंड राज्यों के प्रत्येक सभा निर्वाचन-क्षेत्र का विस्तार ऐसा होगा जैसा परिसीमन अधिनियम, 2002 की धारा 10क और धारा 10ख के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 में उपबंधित किया गया हो ।]
[7क. सिक्किम की विधान सभा में स्थानों की कुल संख्या और सभा निर्वाचन-क्षेत्र-(1) धारा 7 में किसी बात के होते हुए भी, सिक्किम राज्य की विधान सभा में जो [संविधान (छत्तीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 के अधीन उस राज्य की सम्यक् रूप से गठित विधान सभा समझी जाती है] सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से सीधे निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या 32 होगी ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक सभा निर्वाचन-क्षेत्र एक-सदस्य निर्वाचन-क्षेत्र होगा ।
(3) इस प्रकार सम्यक् रूप से गठित समझी गई विधान सभा में प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र का विस्तार और स्थानों का आरक्षण वैसा ही होगा जैसा कि संविधान (छत्तीसवां संशोधन) अधिनियम, 1975 के प्रारम्भ के ठीक पूर्व उपबंधित था ।]
संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश
8. परिसीमन आदेशों का समेकन- [(1) अरुणाचल प्रदेश, असम, झारखंड, मणिपुर और नागालैंड राज्यों को छोड़कर सभी राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों के संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित धारा 4 की उपधारा (5) और धारा 7 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट, परिसीमन आयोग द्वारा किए गए और राजपत्र में प्रकाशित समस्त आदेशों को ध्यान में रखते हुए निर्वाचन आयोग,-
(क) किसी ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र के विस्तार को परिवर्तित किए बिना, ऐसे संशोधन करने के पश्चात् जो ऐसे आदेशों में दिए गए संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के विस्तार के वर्णन को अद्यतन करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों ;
(ख) अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और नागालैंड राज्यों के संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित परिसीमन अधिनियम, 2002 (2002 का 33) की धारा 10क और झारखंड राज्य की संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित उक्त अधिनियम की धारा 10ख के उपबंधों के अधीन राष्ट्रपति द्वारा किए गए आदेशों के अनुसरण में लागू किए गए संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 1976 के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए,
ऐसे सभी आदेशों को एकल आदेश में समेकित करेगा, जो संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 के नाम से ज्ञात होगा और उस आदेश की अधिप्रमाणित प्रतियां, केंद्रीय सरकार को और ऐसे प्रत्येक राज्य की सरकार को, जिसमें विधान सभा हो, भेजेगा; और तदुपरि वह आदेश धारा 4 की उपधारा (5) और धारा 7 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट सभी आदेशों को अधिष्ठित करेगा और विधि का बल रखेगा तथा किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।]
(2) उक्त आदेश के केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा प्राप्त किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र वह सरकार उसको, यथास्थिति, लोक सभा के समक्ष या राज्य की विधान सभा के समक्ष रखवाएगी ।
[(3) धारा 4 की उपधारा (5) में, या यथास्थिति, धारा 7 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट आदेशों का उपधारा (1) के अधीन समेकन, [परिसीमन अधिनियम, 2002 (2002 का 33) की धारा 10 की उपधारा (5) में उपबंधित रूप में,] किसी ऐसे आदेश या किन्हीं ऐसे आदेशों के, जो सुसंगत हों, भारत के राजपत्र में प्रकाशन की तारीख को विद्यमान लोक सभा में या राज्य की विधान सभा में प्रतिनिधित्व को और प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों को प्रभावित नहीं करेगा ।]
[8क. अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर या नागालैंड राज्यों में संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन-(1) यदि राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर या नागालैंड राज्य में विद्यमान स्थिति और दशाएं परिसीमन की कार्यवाही करने के लिए अनुकूल हैं तो वह उस राज्य के संबंध में परिसीमन अधिनियम, 2002 (2002 का 33) की धारा 10क के उपबंधों के अधीन जारी आस्थगन आदेश को, आदेश द्वारा विखंडित कर सकेंगे और निर्वाचन आयोग द्वारा राज्य में परिसीमन की कार्यवाही किए जाने के लिए उपबंध कर सकेंगे ।
(2) किसी राज्य के संबंध में किसी आस्थगन आदेश के उपधारा (1) के अधीन विखंडित कर दिए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, निर्वाचन आयोग, आदेश द्वारा,-
(क) उन संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों का, जिनमें किसी ऐसे राज्य को, जिसे प्रथम अनुसूची में एक से अधिक स्थान आबंटित किए गए हैं, विभाजित किया जाएगा ;
(ख) प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र के विस्तार का; और
(ग) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या, यदि कोई है,
अवधारण कर सकेगा ।
(3) किसी राज्य के संबंध में किसी आस्थगन आदेश के उपधारा (1) के अधीन विखंडित कर दिए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, निर्वाचन आयोग, आदेश द्वारा,-
(क) ऐसे सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का, जिनमें ऐसे राज्य को, उस राज्य की विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए विभाजित किया जाएगा ;
(ख) प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र के विस्तार का ; और
(ग) अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या का, यदि कोई है,
अवधारण कर सकेगा ।
(4) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, निर्वाचन आयोग, संविधान के उपबंधों और परिसीमन अधिनियम, 2002 (2002 का 33) की धारा 9 की उपधारा (1) के खंड (ग) और खंड (घ) में विनिर्दिष्ट सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए, अरुणाचल प्रदेश, असम, मणिपुर और नागालैंड राज्यों के संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों, जिनमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान, यदि कोई हैं, आरक्षित होंगे, का अवधारण करेगा ।
(5) निर्वाचन आयोग,-
(क) किसी राज्य के संबंध में, उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4) के अधीन अपने प्रस्तावों का प्रकाशन राजपत्र में, और ऐसी अन्य रीति में भी जिसे वह ठीक समझे, करेगा ;
(ख) उस तारीख को विनिर्दिष्ट करेगा जिसको या जिसके पश्चात् प्रस्तावों पर उसके द्वारा आगे विचार किया जाएगा ;
(ग) सभी आक्षेपों और सुझावों पर, विचार करेगा जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख से पूर्व प्राप्त हुए हों ;
(घ) ऐसे विचार के प्रयोजन के लिए, यदि ऐसा करना ठीक समझे, एक या अधिक सार्वजनिक बैठकें ऐसे राज्य में ऐसे स्थान या स्थानों पर, जिन्हें वह ठीक समझे, करेगा ;
(ङ) ऐसे सभी आक्षेपों और सुझावों पर, जो इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख से पूर्व प्राप्त हों, विचार करने के पश्चात्, आदेश द्वारा राज्य में संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन का, और उस निर्वाचन-क्षेत्र या निर्वाचन-क्षेत्रों का अवधारण करेगा जिनमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान, यदि कोई हों, आरक्षित रहेंगे और ऐसे आदेश राजपत्र में प्रकाशित कराएगा तथा ऐसे प्रकाशन पर आदेश, विधि का बल रखेगा तथा किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा और संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 को तदनुसार संशोधित किया गया समझा जाएगा ।
(6) उपधारा (1) और उपधारा (2) तथा उपधारा (5) के खंड (ङ) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
(7) उपधारा (1) और उपधारा (3) तथा उपधारा (5) के खंड (ङ) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, उस उपधारा के अधीन प्रकाशित किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संबंधित राज्य की विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।]
9. निर्वाचन आयोग की परिसीमन आदेश को अद्यतन बनाए रखने की शक्ति-(1) निर्वाचन आयोग भारत के राजपत्र में और संपृक्त राज्य के शासकीय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा समय-समय पर-
[(क) संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 में किसी मुद्रण संबंधी भूल को या अनवधानता से हुई भूल या लोप से उसमें उद्भूत किसी गलती को शुद्ध कर सकेगा ;
(कक) संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 में ऐसे संशोधन कर सकेगा जैसे उसे इस अधिनियम की धारा 8क के या किसी अन्य केंद्रीय अधिनियम के अधीन संसदीय या सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के संबंध में, (जिसके अन्तर्गत ऐसे निर्वाचन-क्षेत्रों में अनुसूचित जातियों या अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थानों का आरक्षण भी है) जारी की गई किसी अधिसूचना या आदेश का उक्त आदेश के साथ समेकित करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ;]
(ख) वहां, जहां कि उस आदेश में वर्णित किसी जिले या किसी क्षेत्रीय खंड की सीमाएं या नाम परिवर्तित कर दी जाती हैं या कर दिया जाता है, ऐसे संशोधन कर सकेगा जो उस आदेश को अद्यतन बनाने के लिए उसको आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।
[(ग) संविधान (एक सौवां संशोधन) अधिनियम, 2015 के अनुसरण में, 31 जुलाई, 2015 से भारत की एक सौ ग्यारह बस्तियों और बंग्लादेश की इक्यावन बस्तियों के आदान-प्रदान के परिमाणस्वरूप, संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 में ऐसे संशोधन कर सकेगा, जो सुसंगत क्षेत्रों को उसमें सम्मिलित करके तथा उसमें से सुसंगत क्षेत्रों को अपवर्जित करके आदेश को अद्यतन बनाने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।]
(2) इस धारा के अधीन हर अधिसूचना अपने निकाले जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र लोक सभा के तथा संपृक्त राज्य की विधान सभा के समक्ष रखी जाएगी ।
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राज्य विधान परिषदें
10. विधान परिषदों में के स्थानों का आबंटन-(1) उन राज्यों में, जिनमें विधान परिषदें हैं, ऐसी परिषदों में के स्थानों का आबंटन ऐसा होगा जैसा तृतीय अनुसूची में दर्शित है ।
(2) तृतीय अनुसूची के प्रथम स्तंभ में विनिर्दिष्ट हर एक राज्य की विधान परिषद् में स्थानों की संख्या वह होगी जो उसके द्वितीय स्तम्भ में उस राज्य के सामने विनिर्दिष्ट है और उन स्थानों में से--
(क) तृतीय, चतुर्थ और पंचम स्तम्भों में विनिर्दिष्ट संख्याएं उन स्थानों की संख्याएं होंगी जो अनुच्छेद 171 के खंड (3) के उपखंड (क), (ख) और (ग) में विनिर्दिष्ट निर्वाचक मंडलों द्वारा क्रमशः निर्वाचित व्यक्तियों द्वारा भरे जाने हैं;
(ख) षष्ठ स्तम्भ में विनिर्दिष्ट संख्या उन स्थानों की संख्या होगी जो उस राज्य की विधान सभा के सदस्यों द्वारा उन व्यक्तियों में से निर्वाचित व्यक्तियों द्वारा भरे जाने हैं जो उस सभा के सदस्य नहीं हैं ; तथा
(ग) सप्तम स्तम्भ में विनिर्दिष्ट संख्या उन स्थानों की संख्या होगी जो राज्य के राज्यपाल *** द्वारा अनुच्छेद 171 के खण्ड (5) के उपबंधों के अनुसार नामनिर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा भरे जाने हैं ।
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11. परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन-इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र राष्ट्रपति-
(क) उन निर्वाचन-क्षेत्रों को जिनमें हर एक राज्य जिसमें विधान परिषद् है, उस परिषद् के लिए अनुच्छेद 171 के खंड (3) के उपखंड (क), (ख) और (ग) में से हर एक के अधीन निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए विभक्त किया जाएगा;
(ख) हर एक निर्वाचन-क्षेत्र के विस्तार को; तथा
(ग) हर एक निर्वाचन-क्षेत्र को आबंटन में मिले स्थानों की संख्या को,
आदेश द्वारा अवधारित करेगा ।
निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन करने वाले आदेशों के बारे में उपबंध
12. आदेशों को परिवर्तित या संशोधित करने की शक्ति-- [(1)] राष्ट्रपति *** धारा 11 के अधीन अपने द्वारा किए गए आदेश को निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् आदेश द्वारा समय-समय पर परिवर्तित या संशोधित कर सकेगा ।
[(2) उपधारा (1) के अधीन के आदेश के किए जाने से अव्यवहित पूर्व जो कोई सदस्य किसी परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र का प्रतिनिधित्व कर रहा है उस सदस्य का आबंटन उस आदेश द्वारा नए सिरे से परिसीमित या परिवर्तित किसी निर्वाचन-क्षेत्र को किए जाने के लिए और ऐसे अन्य आनुषंगिक और पारिणामिक विषयों के लिए, जैसे राष्ट्रपति आवश्यक समझे, उपबंध उस आदेश में अन्तर्विष्ट हो सकेंगे ।]
13. निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन करने वाले आदेशों के बारे में प्रक्रिया-- । । । । । ।
(3) *** धारा 11 या धारा 12 के अधीन किया गया हर आदेश अपने किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के समक्ष रखा जाएगा और ऐसे उपान्तरों के अध्यधीन रहेगा जैसे संसद् उस तारीख से, जिसको आदेश ऐसा रखा गया है, बीस दिन के भीतर किए गए प्रस्ताव पर करे ।
[भाग 2क
आफिसर
13क. मुख्य निर्वाचन आफिसर-(1) हर एक राज्य के लिए एक मुख्य निर्वाचन आफिसर होगा जो सरकार का ऐसा आफिसर होगा जैसा निर्वाचन आयोग उस सरकार के परामर्श से इस निमित्त पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट करे ।
(2) निर्वाचन आयोग के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अधीन रहते हुए मुख्य निर्वाचन आफिसर राज्य में इस अधिनियम के अधीन वाली सब निर्वाचक नामावलियों की तैयारी, पुनरीक्षण और शुद्धि का पर्यवेक्षण करेगा ।
[13कक. जिला निर्वाचन आफिसर-(1) *** किसी राज्य में हर एक जिले के लिए निर्वाचन आयोग, उस राज्य की सरकार के परामर्श से एक जिला निर्वाचन आफिसर को पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट करेगा, जो सरकारी आफिसर होगा :
परंतु निर्वाचन आयोग किसी जिले के लिए एक से अधिक ऐसे आफिसर पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट कर सकेगा । यदि निर्वाचन आयोग का यह समाधान हो जाता है कि पद के कृत्यों का एक आफिसर द्वारा समाधानप्रद रूप में पालन नहीं किया जा सकता ।
(2) जहां कि किसी जिले के लिए उपधारा (1) के परन्तुक के अधीन एक से अधिक जिला निर्वाचन आफिसर पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट किए जाते हैं, वहां निर्वाचन आयोग जिला निर्वाचन आफिसरों को पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट करने वाले आदेश में उस क्षेत्र को भी विनिर्दिष्ट करेगा जिसकी बाबत हर एक ऐसा आफिसर अधिकारिता का प्रयोग करेगा ।
(3) मुख्य निर्वाचन आफिसर के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए जिला निर्वाचन आफिसर उस जिले में या अपनी अधिकारिता के भीतर के क्षेत्र में उस जिले के भीतर के सब संसदीय, सभा और परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए निर्वाचन नामावलियों की तैयारी और पुनरीक्षण से संसक्त सब काम का समन्वय और पर्यवेक्षण करेगा ।
(4) जिला निर्वाचन आफिसर ऐसे अन्य कृत्यों का भी पालन करेगा, जैसे उसे निर्वाचन आयोग और मुख्य निर्वाचन आफिसर द्वारा न्यस्त किए जाएं ।
13ख. निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर-(1) [ [ जम्मू-कश्मीर राज्य में या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र में, जिसमें विधान सभा नहीं है,] हर एक संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र, हर एक सभा निर्वाचन-क्षेत्र] और हर एक परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर द्वारा तैयार और पुनरीक्षित की जाएगी जो सरकार का या किसी स्थानीय प्राधिकारी का वह आफिसर होगा जिसे निर्वाचन आयोग, उस राज्य की सरकार के, जिसके राज्य में वह निर्वाचन-क्षेत्र स्थित है, परामर्श से, इस निमित्त पदाभिहित या नामनिर्दिष्ट करे ।
(2) निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर किन्हीं विहित निर्बंधनों के अध्यधीन रहते हुए ऐसे व्यक्तियों को निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली तैयार और पुनरीक्षित करने के लिए नियोजित कर सकेगा जैसे वह ठीक समझे ।
13ग. सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर-(1) निर्वाचन आयोग निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर के अपने कृत्यों का पालन करने में उस आफिसर की सहायता करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।
(2) हर सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर के नियंत्रण के अध्यधीन रहते हुए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर के सब या किन्हीं कृत्यों का पालन करने के लिए सक्षम होगा ।]
[13गग. मुख्य निर्वाचन आफिसरों, जिला निर्वाचन आफिसरों, आदि का निर्वाचन आयोग में प्रतिनियुक्त समझा जाना-इस भाग में निर्दिष्ट और सभी निर्वाचनों के लिए निर्वाचक नामावलियों की तैयारी, पुनरीक्षण और शुद्धि करने, और ऐसे निर्वाचनों का संचालन करने के संबंध में नियोजित कोई अन्य आफिसर या कर्मचारिवृन्द, उस अवधि में जिसके दौरान उन्हें इस प्रकार नियोजित किया जाता है, निर्वाचन आयोग में प्रतिनियुक्त समझे जाएंगे और ऐसे आफिसर और कर्मचारिवृन्द, उस अवधि के दौरान, निर्वाचन आयोग के नियंत्रण, अधीक्षण और अनुशासन के अध्यधीन होंगे ।]
भाग 2ख
संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए निर्वाचक नामावलियां
[13घ. संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए निर्वाचक नामावलियां-(1) जम्मू-कश्मीर राज्य में के या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र में के, जिसमें विधान सभा नहीं है, संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र से भिन्न हर संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली उतने सभा निर्वाचन-क्षेत्रों की निर्वाचक नामावलियों से मिलकर गठित होगी जितने उस संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र में समाविष्ट हैं और ऐसे किसी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली पृथक्तः तैयार या पुनरीक्षित करना आवश्यक न होगा :
परन्तु अनुच्छेद 371क के खंड (2) में निर्दिष्ट कालावधि के लिए नागालैंड के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के उस भाग के लिए जो टयूनसांग जिले में समाविष्ट है, निर्वाचक नामावली पृथक्तः तैयार और पुनरीक्षित करना आवश्यक होगा तथा भाग 3 के उपबंध उक्त भाग की निर्वाचक नामावली की तैयारी और पुनरीक्षण के संबंध में ऐसे लागू होंगे जैसे वे सभा निर्वाचन-क्षेत्र के संबंध में लागू होते हैं ।
(2) भाग 3 के उपबंध जम्मू-कश्मीर राज्य में के या ऐसे संघ राज्यक्षेत्र में के, जिसमें विधान सभा नहीं है, हर संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के संबंध में ऐसे लागू होंगे जैसे वे सभा निर्वाचन-क्षेत्र के संबंध में लागू होते हैं ।]]
भाग 3
[ *** निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावलियां]
[14. परिभाषाएं- इस भाग में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “निर्वाचन-क्षेत्र" से सभा निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है; 6***
(ख) “अर्हता की तारीख" से इस भाग के अधीन हर निर्वाचक नामावली की तैयारी या पुनरीक्षण के संबंध में उस वर्ष की [जनवरी का पहला दिन] अभिप्रेत है जिस वर्ष में वह इस प्रकार तैयार या पुनरीक्षित की जाती है :]
[परन्तु वर्ष 1989 में इस भाग के अधीन हर निर्वाचक नामावली की तैयारी या पुनरीक्षण के संबंध में, “अर्हता की तारीख" 1989 की अप्रैल का पहला दिन होगी ।]]
15. हर निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली-हर निर्वाचन-क्षेत्र के लिए एक निर्वाचक नामावली होगी जो निर्वाचन आयोग के अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण के अधीन इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार तैयार की जाएगी ।
16. निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए निरर्हताएं-(1) यदि कोई व्यक्ति-
(क) भारत का नागरिक नहीं है ; अथवा
(ख) विकृतचित्त है और उसके ऐसा होने की सक्षम न्यायालय की घोषणा विद्यमान है; अथवा
(ग) निर्वाचनों के संबंध में भ्रष्ट *** आचरणों और अन्य अपराधों से संबंधित किसी विधि के उपबंधों के अधीन मतदान करने के लिए तत्समय निरर्हित हैं,
तो वह निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए निरर्हित होगा ।
(2) रजिस्ट्रीकरण के पश्चात् जो कोई व्यक्ति ऐसे निरर्हित हो जाता है, उसका नाम निर्वाचक नामावली में से तत्काल काट दिया जाएगा जिसमें वह दर्ज है :
[परन्तु किसी निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में से जिस व्यक्ति का नाम उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन निरर्हता के कारण काटा गया है यदि ऐसी निरर्हता उस कालावधि के दौरान, जिसमें ऐसी नामावली प्रवृत्त रहती है, किसी ऐसी विधि के अधीन हटा दी जाती है जो ऐसा हटाना प्राधिकृत करती है तो उस व्यक्ति का नाम तत्काल उसमें पुनःस्थापित कर दिया जाएगा ।]
17. एक से अधिक निर्वाचन-क्षेत्र में किसी व्यक्ति का नाम रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा-एक से अधिक निर्वाचन-क्षेत्र के लिए *** निर्वाचक नामावली में कोई व्यक्ति रजिस्ट्रीकृत किए जाने का हकदार न होगा ।
18. किसी निर्वाचन-क्षेत्र में कोई व्यक्ति एक से अधिक बार रजिस्ट्रीकृत नहीं किया जाएगा-किसी निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में कोई व्यक्ति एक से अधिक बार रजिस्ट्रीकृत किए जाने का हकदार न होगा ।
[19. रजिस्ट्रीकरण की शर्तें-इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों के अध्यधीन यह है कि हर व्यक्ति जो-
(क) अर्हता की तारीख को [अठारह वर्ष] से कम आयु का नहीं है; तथा
(ख) किसी निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी है,
उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए हकदार होगा ।]
20. “मामूली तौर से निवासी" का अर्थ-- [(1) किसी व्यक्ति की बाबत केवल इस कारण कि वह निर्वाचन-क्षेत्र में किसी निवास गृह पर स्वामित्व या कब्जा रखता है यह न समझा जाएगा कि वह उस निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी है ।
(1क) अपने मामूली निवास-स्थान में अपने आपको अस्थायी रूप से अनुपस्थित करने वाले व्यक्ति की बाबत केवल इसी कारण यह न समझा जाएगा, कि वह वहां का मामूली तौर से निवासी नहीं रह गया है ।
(1ख) संसद् का या किसी राज्य के विधान-मंडल का जो सदस्य ऐसे सदस्य के रूप में अपने निर्वाचन के समय जिस निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में निर्वाचक के रूप में रजिस्ट्रीकृत है उसकी बाबत इस कारण कि वह ऐसे सदस्य के रूप में अपने कर्तव्यों के संबंध में उस निर्वाचन-क्षेत्र से अनुपस्थित रहा है यह न समझा जाएगा कि वह अपनी पदावधि के दौरान उस निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी नहीं रह गया है ।]
(2) जो व्यक्ति मानसिक रोग या मनोवैकल्य से पीड़ित व्यक्तियों के रखने और चिकित्सा के लिए पूर्णतः या मुख्यतः पोषित किसी स्थापन में चिकित्साधीन है या जो किसी स्थान में, कारागार में या अन्य विधिक अभिरक्षा में निरुद्ध है, उसके बारे में केवल इसी कारण यह न समझा जाएगा कि वह वहां मामूली तौर से निवासी है ।
[(3) किसी ऐसे व्यक्ति के बारे में, जो सेवा अर्हता रखता है, यह समझा जाएगा कि वह किसी तारीख को उस निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी है, जिसमें, यदि उसकी ऐसी सेवा अर्हता न होती तो, वह उस तारीख को मामूली तौर से निवासी होता ।]
(4) जो कोई व्यक्ति भारत में ऐसा पद धारण किए हुए है जिसे राष्ट्रपति ने, निर्वाचन आयोग के परामर्श से ऐसा पद घोषित कर दिया है जिसे इस उपधारा के उपबन्ध लागू हैं *** उसके बारे में यह समझा जाएगा कि वह किसी तारीख को *** उस निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी है जिसमें, यदि वह कोई ऐसा पद धारण *** न किए होता तो वह, उस तारीख को *** मामूली तौर से निवासी होता ।
(5) ऐसे किसी व्यक्ति का, जिसके प्रति उपधारा (3) या उपधारा (4) में निर्देश किया गया है, विहित प्ररूप में किए गए और विहित रीति में सत्यापित, इस कथन की बाबत कि [यदि मेरी सेवा अर्हताट न होती या मैं किसी ऐसे पद को धारण *** न किए होता । जैसा उपधारा (4) में निर्दिष्ट है, तो मैं एक विनिर्दिष्ट स्थान में किसी तारीख को *** मामूली तौर से निवासी होता, तत्प्रतिकूल साक्ष्य के अभाव में यह 7[स्वीकार किया जाएगा कि वह शुद्ध है] ।
(6) यदि ऐसे किसी व्यक्ति *** की पत्नी, जैसे व्यक्ति के प्रति उपधारा (3) या उपधारा (4) में निर्देश किया गया है, उसके साथ मामूली तौर से *** निवास करती हो, तो ऐसी पत्नी के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसे व्यक्ति द्वारा उपधारा (5) के अधीन विनिर्दिष्ट किए गए निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी है ।
[(7) यदि किसी मामले में यह प्रश्न पैदा होता है कि कोई व्यक्ति किसी सुसंगत समय पर वहां का मामूली तौर से निवासी है तो वह प्रश्न मामले के सब तथ्यों के और ऐसे नियमों के, जैसे केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्वाचन आयोग के परामर्श से इस निमित्त बनाए जाएं, प्रति निर्देश से अवधारित किया जाएगा ।]
(8) उपधाराओं (3) और (5) में “सेवा अर्हता से"-
(क) संघ के सशस्त्र बलों का सदस्य होना, अथवा
(ख) ऐसे बल का सदस्य होना, जिसको सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46) के उपबंध उपान्तरों सहित या रहित लागू कर दिए गए हैं, अथवा
(ग) किसी राज्य के सशस्त्र पुलिस बल का ऐसा सदस्य होना जो उस राज्य के बाहर सेवा कर रहा है, अथवा
(घ) ऐसा व्यक्ति होना, जो भारत सरकार के अधीन भारत के बाहर किसी पद पर नियोजित है,
अभिप्रेत है ।
[20क. भारत से बाहर निवास कर रहे भारत के नागरिकों के लिए विशेष उपबंध-(1) इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, भारत का ऐसा प्रत्येक नागरिक,-
(क) जिसका नाम निर्वाचक नामावली में सम्मिलित नहीं है ;
(ख) जिसने किसी अन्य देश की नागरिकता अर्जित नहीं की है ; और
(ग) जो भारत में अपने मामूली निवास-स्थान से, अपने नियोजन, शिक्षा या अन्यथा भारत से बाहर रहने के कारण अनुपस्थित रहा है (चाहे अस्थायी रूप से है या नहीं),
ऐसे निर्वाचन-क्षेत्र की, जिसमें भारत में उसका ऐसा निवास-स्थान जो उसके पासपोर्ट में उल्लिखित है, अवस्थित है, निर्वाचक नामावली में अपना नाम रजिस्ट्रीकृत कराने का हकदार होगा ।
(2) वह समय, जिसके भीतर उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्तियों के नाम निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाएंगे और उपधारा (1) के अधीन निर्वाचक नामावली में किसी व्यक्ति को रजिस्ट्रीकृत करने की रीति और प्रक्रिया वह होगी, जो विहित की जाए ।
(3) इस धारा के अधीन रजिस्ट्रीकृत प्रत्येक व्यक्ति को, यदि वह अपने मताधिकार का प्रयोग करने के लिए अन्यथा पात्र है, उस निर्वाचन-क्षेत्र में होने वाले किसी निर्वाचन में मतदान करने की अनुज्ञा दी जाएगी ।]
[21. निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और पुनरीक्षण-(1) हर एक निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली अर्हता की तारीख के प्रति निर्देश से और विहित रीति में तैयार की जाएगी और इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार अपने अंतिम प्रकाशन पर तुरन्त प्रवृत्त हो जाएगी ।
[(2) उक्त निर्वाचक नामावली का-
(क) विहित रीति में पुनरीक्षण तब के सिवाय जब कि उन कारणों से, जो लेखन द्वारा अभिलिखित किए जाएंगे, निर्वाचन आयोग अन्यथा निदेश दे--
(i) लोक सभा या किसी राज्य की विधान सभा के हर एक साधारण निर्वाचन से पहले, तथा
(ii) निर्वाचन-क्षेत्र को आबंटित स्थान में आकस्मिक रिक्ति भरने के लिए हर एक उपनिर्वाचन से पहले,
अर्हता की तारीख के प्रति निर्देश से किया जाएगा; तथा
(ख) विहित रीति में किसी वर्ष में पुनरीक्षण अर्हता की तारीख के प्रति निर्देश से किया जाएगा यदि ऐसा पुनरीक्षण निर्वाचन आयोग द्वारा निर्दिष्ट किया गया है :
परन्तु यदि निर्वाचक नामावली का यथापूर्वोक्त पुनरीक्षण न किया गया हो तो उससे उक्त निर्वाचक नामावली की विधिमान्यता या निरन्तर प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
(3) उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी निर्वाचन आयोग किसी भी निर्वाचन-क्षेत्र या निर्वाचन-क्षेत्र के भाग के लिए निर्वाचक नामावली के ऐसी रीति में, जिसे वह ठीक समझे विशेष पुनरीक्षण के लिए निदेश, उन कारणों से जो अभिलिखित किए जाएंगे, किसी भी समय दे सकेगा :
परन्तु उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली अपने उस रूप में, जिसमें वह किसी ऐसे निदेश के निकाले जाने के समय प्रवृत्त है, इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए तब तक प्रवृत्त बनी रहेगी जब तक ऐसे निर्दिष्ट किया गया विशेष पुनरीक्षण समाप्त न हो जाए ।
[22. निर्वाचक नामावलियों में की प्रविष्टियों की शुद्धि--यदि किसी निर्वाचन-क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर का समाधान अपने से आवेदन किए जाने पर या स्वप्रेरणा पर, ऐसी जांच के पश्चात् जैसी वह ठीक समझता है, हो जाता है कि उस निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में कोई प्रविष्टि--
(क) किसी विशिष्टि में गलत है या त्रुटिपूर्ण है,
(ख) इस आधार पर कि सम्पृक्त व्यक्ति ने उस निर्वाचन-क्षेत्र के अन्दर अपना मामूली निवास-स्थान बदल दिया है नामावली में अन्यत्र रख दी जानी चाहिए, अथवा
(ग) इस आधार पर कि सम्पृक्त व्यक्ति मर गया है या उस निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी नहीं रह गया है या उस नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए अन्यथा हकदार नहीं है, निकाल दी जानी चाहिए,
तो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर, ऐसे किन्हीं साधारण या विशेष निदेशों के, यदि कोई हों, जैसे निर्वाचन आयोग द्वारा इस निमित्त दिए जाएं, अध्यधीन रहते हुए [तथ्यों का ऐसी रीति में जो विहित की जाए, समुचित सत्यापन करने के पश्चात्] उस प्रविष्टि को संशोधित कर सकेगा, अन्यत्र रख सकेगा या निकाल सकेगा :
परन्तु खंड (क) या खंड (ख) के अधीन किसी आधार पर कोई कार्यवाही या खंड (ग) के अधीन इस आधार पर कि सम्पृक्त व्यक्ति उस निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी नहीं रह गया है या वह उस निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए अन्यथा हकदार नहीं है कोई कार्यवाही करने से पूर्व निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर सम्पृक्त व्यक्ति को 1[तथ्यों का ऐसी रीति में जो विहित की जाए, समुचित सत्यापन करने के पश्चात्] उस व्यक्ति के संबंध में की जाने के लिए प्रस्थापित कार्यवाही के बारे में सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देगा ।]
[23. निर्वाचक नामावलियों में नामों का सम्मिलित किया जाना-(1) कोई भी व्यक्ति, जिसका नाम किसी निर्वाचन-क्षेत्र नामावली में सम्मिलित नहीं है, उस नामावली में अपना नाम सम्मिलित कराने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को आवेदन कर सकेगा ।
(2) निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर का यदि यह समाधान हो जाता है कि आवेदक उस निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए हकदार है तो [तथ्यों का ऐसी रीति में जो विहित की जाए, समुचित सत्यापन करने के पश्चात्] वह यह निदेश देगा कि उसका नाम उसमें सम्मिलित किया जाए :
परन्तु यदि आवेदक किसी अन्य निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत है तो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर उस अन्य निर्वाचन-क्षेत्र के निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को इत्तिला देगा और वह आफिसर ऐसी इत्तिला प्राप्त होने पर 3[तथ्यों का ऐसी रीति में जो विहित की जाए, समुचित सत्यापन करने के पश्चात्] उस नामावली में से आवेदक के नाम को काट देगा ।
(3) किसी निर्वाचन-क्षेत्र में या उस संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र में, जिसमें वह निर्वाचन-क्षेत्र समाविष्ट है, निर्वाचन के लिए नामनिर्देशन करने की अन्तिम तारीख के पश्चात् और उस निर्वाचन की समाप्ति से पूर्व धारा 22 के अधीन कोई भी प्रविष्टि न तो संशोधित की जाएगी, न अन्यत्र रखी जाएगी और न निकाली जाएगी और न इस धारा के अधीन किसी निर्वाचन-क्षेत्र की निर्वाचक नामावली में किसी नाम को सम्मिलित करने के लिए कोई निर्देश ही दिया जाएगा ।]
[24. अपीलें--यथाविहित समय के अन्दर और रीति में, अपील-
(क) किसी ऐसे आदेश के खिलाफ जो निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर ने धारा 22 या धारा 23 के अधीन किया है, [जिला मजिस्ट्रेट या अपर जिला मजिस्ट्रेट या कार्यपालक मजिस्ट्रेट या जिला कलक्टर या समतुल्य पंक्ति का कोई अधिकारी] को होगी ; ***
[(ख) खंड (क) के अधीन जिला मजिस्ट्रेट या अपर जिला मजिस्ट्रेट के किसी आदेश के खिलाफ मुख्य निर्वाचन आफिसर को होगी ।]
25. आवेदनों और अपीलों के लिए फीस-धारा 22 या धारा 23 के अधीन हर आवेदन और धारा 24 के अधीन हर अपील के साथ विहित फीस होगी जो किसी भी दशा में वापस नहीं की जाएगी ।]]
[25क. सिक्किम के संघ निर्वाचन-क्षेत्र में निर्वाचक के रूप में रजिस्ट्रीकरण की शर्तें--धारा 15 और 19 में किसी बात के होते हुए भी, सिक्किम राज्य में संघ निर्वाचन-क्षेत्र के लिए, मठों के केवल वे संघ, निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत होने के हकदार होंगे, जिन्हें सिक्किम की सभा बनाने के लिए अप्रैल, 1974 में सिक्किम में किए गए निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए मान्यता दी गई थी और उक्त निर्वाचक नामावली को, धारा 21 से 25 तक की धाराओं के उपबंधों के अधीन रहते हुए, ऐसी रीति से तैयार किया जाएगा या पुनरीक्षित किया जाएगा, जो सिक्किम सरकार के परामर्श से निर्वाचन आयोग द्वारा, निर्दिष्ट की जाए ।]
भाग 4
[परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावलियां]
26. [सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए निर्वाचक नामावलियों की तैयारी ।]--(1) लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 2) की धारा 17 द्वारा निरसित ।
27. परिषद् निर्वाचन-क्षेत्रों के लिए निर्वाचक नामावलियों की तैयारी--(1) धारा में स्त्र्स्थानीय प्राधिकारी", “निर्वाचन-क्षेत्र", स्नातक निर्वाचन-क्षेत्र" और शिक्षक निर्वाचन-क्षेत्र" से विधान परिषद् के लिए अनुच्छेद 171 के खंड 3 के क्रमशः उपखंड (क), उपखंड (ख) और उपखंड (ग) के अधीन निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए निर्वाचन-क्षेत्र अभिप्रेत है ।
[(2) किसी स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन-क्षेत्र में राज्य की विधान परिषद् के लिए निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए-
(क) निर्वाचक मंडल उस क्षेत्र की सीमाओं के भीतर के किसी स्थान या क्षेत्र में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले ऐसे स्थानीय प्राधिकारियों के सदस्यों से मिलकर बनेगा जैसे उस राज्य के संबंध में चतुर्थ अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं,
(ख) स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन-क्षेत्र के भीतर के हर एक ऐसे स्थानीय प्राधिकारी का हर सदस्य उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए हकदार होगा,
(ग) हर स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली अद्यतन शोधित करके विहित रीति और प्ररूप में अपने कार्यालय में बनाए रखेगा,
(घ) निर्वाचक नामावली को अद्यतन शोधित करके बनाए रखने के लिए निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को समर्थ बनाने के लिए हर स्थानीय प्राधिकारी का मुख्य कार्यपालक आफिसर (चाहे ऐसा आफिसर किसी भी पदाभिधान से ज्ञात क्यों न हो) निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को उस स्थानीय प्राधिकारी की सदस्यता में के हर परिवर्तन की बाबत तुरन्त इत्तिला देगा, और निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर उस इत्तिला के प्राप्त होने पर, निर्वाचक नामावली से उन व्यक्तियों के नाम काट देगा जो उस स्थानीय प्राधिकारी के सदस्य नहीं रहे और उन व्यक्तियों के नाम उसमें सम्मिलित कर लेगा जो उस स्थानीय प्राधिकारी के सदस्य हो गए हैं, तथा
(ङ) धारा 15, 16, 18, 22 और 23 के उपबंध स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन-क्षेत्रों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के संबंध में लागू होते हैं ।]
(3) स्नातक निर्वाचन-क्षेत्रों और शिक्षक निर्वाचन-क्षेत्रों में किसी राज्य की विधान परिषद् के लिए निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए सम्पृक्त राज्य सरकार, निर्वाचन आयोग की सहमति से, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा-
(क) वे अर्हताएं, जो भारत के राज्यक्षेत्र में के विश्वविद्यालय के स्नातक के समतुल्य समझी जाएंगी, तथा
(ख) राज्य के भीतर की वे शैक्षणिक संस्थाएं, जो माध्यमिक विद्यालय के स्तर से नीचे की नहीं हैं, विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
[(4) धारा 15, 16, 18, 21, 22 और 23 के उपबंध स्नातक निर्वाचन-क्षेत्रों और शिक्षक निर्वाचन-क्षेत्रों के संबंध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के संबंध में लागू होते हैं ।]
(5) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों के अध्यधीन रहते हुए यह है कि--
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[(क)] हर व्यक्ति, जो किसी स्नातक निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी [हैट और [अर्हता की तारीख से पहले] कम से कम तीन वर्ष तक या तो भारत के राज्यक्षेत्र में के किसी विश्वविद्यालय का स्नातक था या सम्पृक्त राज्य सरकार द्वारा उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन विनिर्दिष्ट अर्हताओं में से कोई अर्हता रखता था, उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए हकदार होगा, तथा
[(ख)] हर व्यक्ति, जो किसी शिक्षक निर्वाचन-क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी 6[हैट और 7[अर्हता की तारीख से अव्यवहित पूर्व] छह वर्ष के भीतर कम से कम तीन वर्ष की कुल कालावधि के लिए सम्पृक्त राज्य सरकार द्वारा उपधारा (3) के खंड (ख) के अधीन विनिर्दिष्ट शैक्षणिक संस्थाओं में से किसी में शिक्षा देने में लगा रहा हो, उस निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए हकदार होगा ।
[(6) उपधारा (4) और उपधारा (5) के प्रयोजनों के लिए अर्हता की तारीख उस वर्ष के नवम्बर के पहले दिन की तारीख होगी जिसमें निर्वाचक नामावली की तैयारी या पुनरीक्षण प्रारम्भ किए जाएं ।]
[भाग 4क
[संघ राज्यक्षेत्रोंट के प्रतिनिधियों द्वारा भरे जाने वाले राज्य सभा में के स्थानों को भरने की रीति
27क. संघ राज्यक्षेत्रों को आबंटन में मिले राज्य सभा में के स्थानों को भरने के लिए निर्वाचकगणों का गठन-- (1) किसी 3[संघ राज्यक्षेत्र] *** को संविधान की चतुर्थ अनुसूची में आबंटन में मिले राज्य सभा के [किसी स्थान या किन्हीं स्थानों को भरने के प्रयोजन के] लिए [हर एक ऐसे राज्यक्षेत्र] *** के लिए एक निर्वाचकगण होगा ।
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[(3) दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र के लिए निर्वाचकगण उस राज्यक्षेत्र के लिए दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1991 (1992 का 1) के अधीन गठित विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनेगा ।]
[(4) [ *** पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के लिए निर्वाचकगणट उस विधान सभा के निर्वाचित सदस्यों से मिलकर बनेगा जो संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) के अधीन उस राज्यक्षेत्र के लिए गठित की गई हो ।]
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27ख. [निर्वाचकगण निर्वाचन-क्षेत्र ।]--क्षेत्रीय परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103) द्वारा निरसित ।
27ग. [निर्वाचकगण निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन ।]-क्षेत्रीय परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103) की धारा 65 द्वारा निरसित ।
27घ. [आदेश का परिवर्तन और संशोधन करने की शक्ति ।]-क्षेत्रीय परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 103) की धारा 65 द्वारा निरसित ।
27ङ. [निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमित आदेशों की प्रक्रिया ।]-लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 2) की धारा 21 द्वारा निरसित ।
27च. [राज्य सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली ।]--लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 2) की धारा 22 द्वारा निरसित ।
27छ. कतिपय निरर्हताओं के लिए निर्वाचकगण की सदस्यता का पर्यवसान-यदि वह व्यक्ति, जो किसी निर्वाचकगण का सदस्य है, संसद् की सदस्यता के लिए किसी निरर्हता के अध्यधीन ऐसी किसी विधि के उपबंधों के अधीन हो जाए जो संसद् के निर्वाचनों में सम्बद्ध भ्रष्ट और अवैध आचरणों और अन्य धाराओं के संबंध में है तो वह ऐसा होने पर उस राज्य निर्वाचकगण का सदस्य नहीं रह जाएगा ।
27ज. संघ राज्यक्षेत्रों को आबंटन में मिले राज्य सभा में के स्थानों को भरने की रीति--किसी [संघ राज्यक्षेत्र] *** को संविधान की *** चतुर्थ अनुसूची में आबंटन में मिले राज्य सभा में के स्थान या स्थानों को [उस राज्यक्षेत्र] *** के लिए निर्वाचकगण के सदस्यों द्वारा आनुपातिक प्रतिनिधित्व पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा निर्वाचित व्यक्ति या व्यक्तियों से भरा जाएगा :
[परन्तु जो व्यक्ति संविधान (सातवां संशोधन) अधिनियम, 1953 के प्रारम्भ के अव्यवहितपूर्व मणिपुर और त्रिपुरा के भाग ग राज्यों को आबंटन में मिले स्थान को धारण किए हुए है उस व्यक्ति की बाबत यह समझा जाएगा कि वह त्रिपुरा के संघ राज्यक्षेत्रों के आबंटन में मिले स्थान को ऐसे प्रारम्भ से ही भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित हुआ है ।]
27झ. [राज्य सभा के लिए अजमेर और कुर्ग राज्यों और मणिपुर और त्रिपुरा राज्यों के स्थान भरने के लिए विशेष उपबंध ।]-विधि अनुकूलन (सं० 2) आदेश, 1956 द्वारा निरसित ।
27ञ. निर्वाचकगणों में रिक्तियां होते हुए भी उनका निर्वाचन करने की शक्ति--किसी निर्वाचकगण *** के सदस्यों द्वारा इस अधिनियम के अधीन किया गया कोई भी निर्वाचन ऐसे गण की सदस्यता में किसी रिक्ति के विद्यमान होने के आधार पर ही प्रश्नगत न किया जाएगा ।
27ट. [कुछ राज्यों के लिए जिनके लिए विधान सभाएं बनाई गई हैं, निर्वाचकगण ।]--विधि अनुकूलन (सं० 2) आदेश, 1956 द्वारा निरसित ।
भाग 5
साधारण
28. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतः और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सब विषयों के लिए या उनमें से किन्हीं के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-
[(क) मामूली तौर से निवास की धारा 20 की उपधारा (7) के अधीन अवधारण ;
(कक) निर्वाचक नामावलियों में प्रविष्ट की जाने वाली विशिष्टियां ;]
(ख) निर्वाचक नामावलियों *** का प्रारंभिक प्रकाशन ;
(ग) वह रीति जिसमें और वह समय जिसके भीतर निर्वाचक नामावलियों में की प्रविष्टियों की बाबत दावे और आक्षेप किए जा सकेंगे ;
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(ङ) वह रीति जिसमें दावों या आक्षेपों की सूचनाएं प्रकाशित की जाएंगी ;
(च) वह स्थान, तारीख और समय, जिसमें या जिस पर दावे या आक्षेप सुने जांएगे और वह रीति जिसमें दावे या आक्षेप सुने और निपटाए जाएंगे ;
(छ) निर्वाचक नामावलियों का अंतिम प्रकाशन ;
[(ज) निर्वाचक नामावलियों का पुनरीक्षण और शुद्धि तथा उनके अंदर नामों को सम्मिलित करना ;]
[(जज) धारा 22 के अधीन निर्वाचक नामावलियों में किसी प्रविष्टि का संशोधन करने, उसे अन्यत्र रखने या लोप करने के लिए तथ्यों के समुचित सत्यापन की प्रक्रिया ;
(जजज) धारा 23 की उपधारा (2) के अधीन निर्वाचक नामावलियों में नामों को सम्मिलित करने या काटने के लिए तथ्यों के समुचित सत्यापन की प्रक्रिया ;]
(झ) कोई भी ऐसी अन्य बात जो इस अधिनियम द्वारा विहित किए जाने के लिए अपेक्षित है ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
[29. स्थानीय प्राधिकारियों के कर्मचारिवृंद का उपलब्ध किया जाना-राज्य में का हर स्थानीय प्राधिकारी राज्य के मुख्य निर्वाचक आफिसर द्वारा ऐसे अपेक्षित किए जाने पर किसी भी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर को ऐसा कर्मचारिवृंद उपलब्ध करेगा जैसा निर्वाचक नामावलियों की तैयारी और पुनरीक्षण से संसक्त किन्हीं कर्तव्यों के पालन के लिए आवश्यक हो ।]
30. सिविल न्यायालयों की अधिकारिता वर्जित-किसी भी सिविल न्यायालय को-
(क) कोई ऐसा प्रश्न कि कोई व्यक्ति किसी निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक नामावली में रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए हकदार है या नहीं ग्रहण करने या न्यायनिर्णीत करने की, अथवा
(ख) किसी निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर के प्राधिकार के द्वारा या अधीन की गई किसी कार्यवाही की या ऐसी किसी नामावली के पुनरीक्षण के लिए इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किसी प्राधिकारी द्वारा दिए गए किसी विनिश्चय की वैधता को प्रश्नगत करने की,
अधिकारिता न होगी ।
[ [31. मिथ्या घोषणाएं करना-यदि कोई व्यक्ति-
(क) किसी निर्वाचक नामावली की तैयारी, पुनरीक्षण या शुद्धि के, अथवा
(ख) किसी प्रविष्टि के किसी निर्वाचक नामावली में सम्मिलित या उसमें अपवर्जित किए जाने के संबंध में, ऐसा कथन या ऐसी घोषणा लिखित रूप में करेगा जो मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का या तो उसे ज्ञान है या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, तो वह ऐसे कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।]
32. निर्वाचक नामावलियों की तैयारी आदि से संसक्त पदीय कर्तव्यों का भंग-(1) यदि कोई निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर, सहायक निर्वाचक रजिस्ट्रीकरण आफिसर या अन्य व्यक्ति जो किसी निर्वाचक नामावली की तैयारी, पुनरीक्षण या शुद्धि से संसक्त या किसी प्रविष्टि को उस निर्वाचक नामावली में सम्मिलित करने या उससे अपवर्जित करने से संसक्त किसी पदीय कर्तव्य के पालन के लिए इस अधिनियम के द्वारा या अधीन अपेक्षित है, ऐसे पदीय कर्तव्य के भंग में किसी कार्य या कार्यलोप का दोषी युक्तियुक्त हेतुक के बिना होगा, तो वह [कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से कम की नहीं होगी, किंतु दो वर्ष तक की हो सकेगी, और जुर्माने सेट दंडनीय होगा ।
(2) पूर्वोक्त जैसे किसी कार्य या कार्यलोप की बाबत नुकसानी के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही ऐसे किसी आफिसर या अन्य व्यक्ति के खिलाफ न होगी ।
(3) जब तक कि निर्वाचन आयोग या सम्पृक्त राज्य के मुख्य निर्वाचन आफिसर के आदेश द्वारा या प्राधिकार के अधीन परिवाद न किया गया हो, कोई भी न्यायालय उपधारा (1) के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान न करेगा ।]
[प्रथम अनुसूची
(धारा 3 देखिए)
लोक सभा में स्थानों का आबंटन
|
राज्य/संघ राज्यक्षेत्र का नाम |
समय-समय पर यथा संशोधित संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्र का परिसीमन आदेश, 1976 के आधार पर 2004 में यथा गठित सदन में स्थानों की संख्या |
संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 के अनुसार तत्पश्चात् यथा गठित सदन में स्थानों की संख्या |
||||
|
कुल |
अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित |
अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित |
कुल |
अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित |
अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित |
|
|
1 |
2 |
3 |
4 |
5 |
6 |
7 |
- राज्य
|
1. आन्ध्र प्रदेश |
42 |
6 |
2 |
42 |
7 |
3 |
|
2. अरुणाचल प्रदेश |
2 |
- |
- |
2 |
- |
- |
|
3.असम |
14 |
1 |
2 |
14 |
1 |
2 |
|
4.बिहार |
40 |
7 |
- |
40 |
6 |
- |
|
5.छत्तीसगढ़ |
11 |
2 |
4 |
11 |
1 |
4 |
|
6.गोवा |
2 |
- |
- |
2 |
- |
- |
|
7.गुजरात |
26 |
2 |
4 |
26 |
2 |
4 |
|
8.हरियाणा |
10 |
2 |
- |
10 |
2 |
- |
|
9.हिमाचल प्रदेश |
4 |
1 |
- |
4 |
1 |
- |
|
10.जम्मू-कश्मीर |
6 |
- |
- |
6 |
- |
- |
|
11.झारखंड |
14 |
1 |
5 |
14 |
1 |
5 |
|
12.कर्नाटक |
28 |
4 |
- |
28 |
5 |
2 |
|
13.केरल |
20 |
2 |
- |
20 |
2 |
- |
|
14.मध्य प्रदेश |
29 |
4 |
5 |
29 |
4 |
6 |
|
15.महाराष्ट्र |
48 |
3 |
4 |
48 |
5 |
4 |
|
16.मणिपुर |
2 |
- |
1 |
2 |
- |
1 |
|
17.मेघालय |
2 |
- |
- |
2 |
- |
2 |
|
18.मिजोरम |
1 |
- |
1 |
1 |
- |
1 |
|
19.नागालैंड |
1 |
- |
- |
1 |
- |
- |
|
20. [ओडिशा] |
21 |
3 |
5 |
21 |
3 |
5 |
|
21.पंजाब |
13 |
3 |
- |
13 |
4 |
- |
|
22.राजस्थान |
25 |
4 |
3 |
25 |
4 |
3 |
|
23.सिक्किम |
1 |
- |
- |
1 |
- |
- |
|
24.तमिलनाडु |
39 |
7 |
- |
39 |
7 |
- |
|
1 |
2 |
3 |
4 |
5 |
6 |
7 |
|
25.त्रिपुरा |
2 |
- |
1 |
2 |
-- |
1 |
|
26.उत्तराखंड |
5 |
- |
- |
5 |
1 |
- |
|
27.उत्तर प्रदेश |
80 |
18 |
- |
80 |
17 |
- |
|
28.पश्चिमी बंगाल |
42 |
8 |
2 |
42 |
10 |
2 |
|
II. संघ राज्यक्षेत्र |
||||||
|
1. अडंमान और निकोबार द्वीप |
1 |
- |
- |
1 |
- |
- |
|
2. चंडीगढ़ |
1 |
- |
- |
1 |
- |
- |
|
3.दादरा और नागर हवेली |
1 |
- |
1 |
1 |
- |
1 |
|
4.दिल्ली |
7 |
1 |
- |
7 |
1 |
- |
|
5.दमन और दीव |
1 |
- |
- |
1 |
- |
- |
|
6.लक्षद्वीप |
1 |
- |
1 |
1 |
- |
1 |
|
7.पुडुचेरी |
1 |
- |
- |
1 |
- |
- |
|
कुल |
543 |
79 |
41 |
543 |
84 |
47 |
__________________________
द्वितीय अनुसूची
(धारा 7 और धारा 7क देखिए)
विधान सभाओं में स्थानों की कुल संख्या
|
राज्य/संघ राज्यक्षेत्र का नाम |
समय-समय पर यथा संशोधित संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 1976 के आधार पर 2004 में यथा गठित सदन में स्थानों की संख्या |
संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन आदेश, 2008 के अनुसार तत्पश्चात् यथा गठित सदन में स्थानों की संख्या |
||||
|
कुल |
अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित |
अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित |
कुल |
अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित |
अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित |
|
|
1 |
2 |
3 |
4 |
5 |
6 |
7 |
I. राज्य
|
1. आन्ध्र प्रदेश |
294 |
39 |
15 |
294 |
48 |
19 |
|
2. अरुणाचल प्रदेश |
60 |
- |
59 |
60 |
- |
59 |
|
3.असम |
126 |
8 |
16 |
126 |
8 |
16 |
|
4.बिहार |
243 |
39 |
- |
243 |
38 |
2 |
|
5.छत्तीसगढ़ |
90 |
10 |
34 |
90 |
10 |
29 |
|
6.गोवा |
40 |
1 |
- |
40 |
1 |
- |
|
7.गुजरात |
182 |
13 |
26 |
182 |
13 |
27 |
|
8.हरियाणा |
90 |
17 |
- |
90 |
17 |
- |
|
9.हिमाचल प्रदेश |
68 |
16 |
3 |
68 |
17 |
3 |
|
10.जम्मू-कश्मीर* |
76 |
6 |
- |
|
|
|
__________________________________________________________________________________
|
1 |
2 |
3 |
4 |
5 |
6 |
7 |
|
11.झारखंड |
81 |
9 |
28 |
81 |
9 |
28 |
|
12.कर्नाटक |
224 |
33 |
2 |
224 |
36 |
15 |
|
13.केरल |
140 |
13 |
1 |
140 |
14 |
2 |
|
14.मध्य प्रदेश |
230 |
34 |
41 |
230 |
35 |
47 |
|
15.महाराष्ट्र |
288 |
18 |
22 |
288 |
29 |
25 |
|
16.मणिपुर |
60 |
1 |
19 |
60 |
1 |
19 |
|
17.मेघालय |
60 |
- |
55 |
60 |
- |
55 |
|
18.मिजोरम |
40 |
- |
39 |
40 |
- |
[39] |
|
19.नागालैंड |
60 |
- |
59 |
60 |
- |
59 |
|
20. ओडिशा$ |
147 |
22 |
34 |
147 |
24 |
33 |
|
21.पंजाब |
117 |
29 |
- |
117 |
34 |
- |
|
22.राजस्थान |
200 |
33 |
24 |
200 |
34 |
25 |
|
23.सिक्किम |
32 |
2 |
12** |
32 |
2 |
12** |
|
24.तमिलनाडु |
234 |
42 |
3 |
234 |
44 |
2 |
|
25.त्रिपुरा |
60 |
7 |
20 |
60 |
10 |
20 |
|
26.उत्तराखंड |
70 |
12 |
3 |
70 |
13 |
2 |
|
27. उत्तर प्रदेश |
403 |
89 |
- |
403 |
85 |
- |
|
28.पश्चिमी बंगाल |
294 |
59 |
17 |
294 |
68 |
16 |
|
II.संघ राज्यक्षेत्र |
||||||
|
1.दिल्ली |
70 |
13 |
- |
70 |
12 |
- |
|
2.पुडुचेरी |
30 |
5 |
- |
30 |
5 |
-] |
* जम्मू-कश्मीर के संविधान के अधीन उस राज्य की विधान सभा में स्थानों की संख्या, पाकिस्तान के कब्जाधीन क्षेत्र के लिए नियत 24 स्थानों का अपजर्वन करके 87 है जिनमें से 7 स्थान-जम्मू-कश्मीर लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1957 के अनुसरण में अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित हैं ।
**संघा के लिए एक स्थान और भूटिया लेप्चा-मूल के सिक्किमियों के लिए 12 स्थान आरक्षित ।
[तृतीय अनुसूची
(धारा 10 देखिए)
विधान परिषदों में स्थानों का आबंटन
|
राज्य का नाम |
स्थानों की कुल संख्या |
अनुच्छेद 171 (3) के अधीन निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किए जाने वालों की संख्या |
||||
|
|
उपखंड (क) |
उपखंड (ख) |
उपखंड (ग) |
उपखंड (घ) |
उपखंड (ङ) |
|
|
1 |
2 |
3 |
4 |
5 |
6 |
7 |
|
[ [1.आन्ध्र प्रदेश |
90 |
31 |
8 |
8 |
31 |
12] |
|
[2. बिहार |
75 |
24 |
6 |
6 |
27 |
12] |
|
5* |
* |
* |
* |
* |
* |
* |
|
[3]. मध्य प्रदेश |
90 |
31 |
8 |
8 |
31 |
12] |
|
7* |
* |
* |
* |
* |
* |
* |
|
[5. महाराष्ट्र |
78 |
22 |
7 |
7 |
30 |
12] |
|
[6. [कर्नाटकट |
75 |
25 |
7 |
7 |
25 |
11] |
|
11* |
* |
* |
* |
* |
* |
* |
|
[7. तमिलनाडु |
78 |
26 |
7 |
7 |
26 |
12] |
|
[8. उत्तर प्रदेश |
[100] |
36 |
8 |
8 |
[38] |
10] |
|
15* |
* |
* |
* |
* |
* |
* |
चतुर्थ अनुसूची
(धारा 27(2) देखिए)
विधान परिषदों के लिए निर्वाचनों के प्रयोजनों के लिए स्थानीय प्राधिकारी
। । । । । । ।
[आन्ध्र प्रदेश
1. नगर निगम ।
2. नगरपालिकाएं ।
3. नगर पंचायतें ।
4. छावनी बोर्ड ।
5. जिला प्रजा परिषदें ।
6. मंडल प्रजा परिषदें ।]
[बिहार
1. नगर परिषदें ।
2. छावनी बोर्ड ।
3. नगर पंचायतें ।
4. जिला परिषदें ।
5. पंचायत समितियां ।
6. नगर निगम (कारपोरेशन)
7. ग्राम पंचायतें ।]
। । । । । । ।
[मध्य प्रदेश
[1. नगरपालिकाएं ।
2. जनपद संभाएं ।
3. मंडल पंचायतें ।
4. छावनी बोर्ड ।
5. अधिसूचित क्षेत्र समितियां ।
6. नगर क्षेत्र समितियां ।]]
। । । । । । ।
[महाराष्ट्र
[1. नगरपालिकाएं ।
2. छावनी बोर्ड ।
। । ।
4. जिला परिषद् ।]]
[कर्नाटक]
[1. शहरी नगर निगम ।
2. शहरी नगरपालिका परिषदें ।
3. नगरी नगरपालिका परिषदें ।
4. नगर पंचायतें ।
5. जिला पंचायतें ।
6. तालुक पंचायतें ।
7. ग्राम पंचायतें ।
8. छावनी बोर्ड ।]
। । । । । । ।
[तमिलनाडु
1. संविधान के अनुच्छेद 243थ में यथानिर्दिष्ट नगरपालिकाएं ।
2. पंचायत संघ परिषदें ।
3. छावनी बोर्ड ।
4. तमिलनाडु पंचायत अधिनियम, 1994 (1994 का तमिलनाडु अधिनियम 21) में निर्दिष्ट जिला पंचायतें ।]
उत्तर प्रदेश
[1. नगर निगम ।
2. नगरपालिका परिषदें ।
3. जिला पंचायतें ।
4. नगर पंचायतें ।
5. क्षेत्र पंचायतें ।
6. छावनी बोर्ड ।]
। । । । । । ।
। । । । । । ।
[पंचम् अनुसूची ।]--संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 57 और द्वितीय अनुसूची द्वारा निरसित ।
[षष्ठम् अनुसूची ।]--लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 2) की धारा 27 द्वारा निरसित ।
[सप्तम् अनुसूची ।]--लोक प्रतिनिधित्व (संशोधन) अधिनियम, 1956 (1956 का 2) की धारा 27 द्वारा निरसित ।
_______

