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पेटेंन्ट अधिनियम, 1970 ( Patents Act, 1970 )


 

पेटेंन्ट अधिनियम, 1970

(1970 का अधिनियम संख्यांक 39)

[19 सितम्बर, 1970]

पेटेंटों से सम्बन्धित विधि का

संशोधन और समेकन

करने के लिए

अधिनियम

                 भारत गणराज्य के इक्कीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखिख रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम पेटेंट अधिनियम, 1970 है ।

(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।

(3) यह उस तारीख  को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे :

परन्तु इस अधिनियम के विभिन्न उपबंधों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी और ऐसे किसी उपबंध में इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस उपबंध के प्रवृत्त होने के प्रति निर्देश है ।

2. परिभाषाएं और निर्वचन-(1) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

 [(क) “अपील बोर्ड" से धारा 116 में निर्दिष्ट अपील बोर्ड अभिप्रेत है; 

 [(कख) “समनुदेशिती" के अन्तर्गत समनुदेशिती का समनुदेशिती और मृत समनुदेशिती का विधिक प्रतिनिधि भी है और किसी व्यक्ति के समनुदेशिती के प्रति निर्देशों के अंतर्गत विधिक प्रतिनिधि के समनुदेशिती या उस व्यक्ति के समनुदेशिती के प्रति निर्देश भी हैं; 

 [(कखक) “बुडापेस्ट संधि" से 28 अप्रैल, 1977 को बुडापेस्ट में की गई पेटेन्ट प्रक्रिया के प्रयोजनों के लिए सूक्ष्म जीवाणुओं के निक्षेप की अन्तर्राष्ट्रीय मान्यता संबंधी बुडापेस्ट संधि, समय-समय पर यथासंशोधित और उपान्तरित              अभिप्रेत है];

(कग) किसी अविष्कार के संबंध में औद्योगिक उपयोजन के लिए समर्थ" से यह अभिप्रेत है कि उक्त आविष्कार किसी उद्योग में किए जाने या उपयोग किए जाने के लिए समर्थ है;]

(ख) “नियंत्रक" से पेटेंट, डिजाइन और व्यापार चिह्न महानियंत्रक अभिप्रेत है जो धारा 73 में निर्दिष्ट है; 

(ग) “कन्वेंशन देश" से पेटेंट के लिए धारा 135 के आधार पर किया गया आवेदन अभिप्रेत है; 

 [(घ) “कन्वेंशन देश" से  [धारा 133 में कन्वेंशन देश के रूप में निर्दिष्टट कोई देश या ऐसा कोई देश जो देशों के किसी समूह या देशों के किसी संघ का सदस्य है अथवा अंतर-शासनात्मक संगठन अभिप्रेत है;]

(ङ) “जिला न्यायालय" का वही अर्थ है जो उसका सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में है; 

(च) “अनन्य अनुज्ञप्ति" से पेटेंटधारी से प्राप्त ऐसी अनुज्ञप्ति अभिप्रेत है जो अन्य सभी व्यक्तियों को (जिनके अन्तर्गत पेटेंटधारी भी है) अपवर्जित करते हुए, अनुज्ञप्तिधारी को या अनुज्ञप्तिधारी और उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्तियों को, पेटेंटकृत आविष्कार के बारे में कोई अधिकार प्रदत्त करती है तथा अनन्य अनुज्ञप्तिधारी" का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा; 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।             

(ज) “सरकारी उपक्रम" से-

(i) सरकार  के किसी विभाग द्वारा, अथवा

(ii) किसी केन्द्रीय, प्रान्तीय अथवा राज्य अधिनियम द्वारा स्थापित किसी ऐसे निगम द्वारा जो सरकार के स्वामित्व या नियंत्रण में है, अथवा 

(iii) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 में यथापरिभाषित सरकारी कंपनी द्वारा,  [याट [(iv) सरकार द्वारा पूर्णतया या सारवान रूप से वित्तपोषित किसी संस्था द्वारा],

चलाया जाने वाला कोई औद्योगिक उपक्रम अभिप्रेत है  । । ।

 [(झ) किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, “उच्च न्यायालय" से, यथास्थिति, उस राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता रखने वाला उच्च न्यायालय अभिप्रेत है;]

 [(झक) “अंतरराष्ट्रीय आवेदन" से पेटेंट सहयोग संधि के अनुसार पेटेंट के लिए किया गया आवेदन अभिप्रेत है;]

 [(ञ) “आविष्कार" से ऐसा नया उत्पाद या प्रक्रिया अभिप्रेत है जिसमें आविष्कार संबंधी कोई कार्रवाई अंतर्वलित है और जो औद्योगिक उपयोजन के लिए समर्थ है;]

 [(ञक) “आविष्कार संबंधी कार्रवाई" से किसी आविष्कार का ऐसा अभिलक्षण अभिप्रेत है, जिसमें विद्यमान ज्ञान की तुलना में तकनीकी प्रोन्नति अंतर्वलित है या जिसका आर्थिक महत्व है या दोनों हैं और जो आविष्कार को कला में कुशल व्यक्ति के लिए स्पष्ट नहीं बनाता है;]

(ट) विधिक प्रतिनिधि" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो मृत व्यक्ति की संपदा का विधि की दृष्टि में प्रतिनिधित्व करता है;

 [(ठ) “नए आविष्कार" से कोई ऐसा आविष्कार या प्रौद्योगिकी अभिप्रेत है जिसका, पूर्ण विनिर्देश के साथ पेटेन्ट के लिए आवेदन फाइल करने की तारीख के पूर्व किसी दस्तावेज में प्रकाशन द्वारा पूर्वानुमान नहीं लगाया गया है या देश में अथवा विश्व में अन्यत्र उपयोग नहीं किया गया है, अर्थात् जिसकी विषय-वस्तु किसी लोक अधिकार क्षेत्र में नहीं आती है या वह कला की स्थिति का भाग नहीं है; 

(ठक) “विरोधी बोर्ड" से धारा 25 की उपधारा (3) के अधीन गठित कोई विरोधी बोर्ड अभिप्रेत है;]

(ड) “पेटेन्ट" से इस अधिनियम के अधीन मंजूर किए गए किसी आविष्कार के लिए कोई पेटेन्ट अभिप्रेत है;

(ढ) “पेटेंट अभिकर्ता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो इस अधिनियम के अधीन पेटेंट अभिकर्ता के रूप में तत्समय रजिस्ट्रीकृत है; 

(ण) “पेटेंटकृत वस्तु" और पेटेंटकृत प्रक्रिया" से क्रमशः ऐसी वस्तु या प्रक्रिया अभिप्रेत है जिसकी बाबत कोई पेटेंट प्रवृत्त है; 

[(णक) पेटेंट सहयोग संधि" से 19 जून, 1970 को वाशिंगटन में की गई और समय-समय पर यथासंशोधित और उपांतरित पेटेंट सहयोग संधि अभिप्रेत है;]

(त) पेटेंटधारी" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो पेटेंट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्टर में तत्समय                दर्ज है; 

(थ) “परिवर्धन-पेटेंट" से धारा 54 के अनुसार अनुदत्त पेटेंट अभिप्रेत है; 

(द) “पेटेंट कार्यालय" से धारा 74 में निर्दिष्ट पेटेंट कार्यालय अभिप्रेत है; 

(ध) “व्यक्ति" के अंतर्गत सरकार भी है; 

(न) “हितबद्ध व्यक्ति" के अंतर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो उसी क्षेत्र में अनुसंधान करने में या उसके संप्रवर्तन में लगा हुआ है जिससे आविष्कार संबद्ध है;

 [(नक) “भेषजीय पदार्थ" से एक या अधिक आविष्कार संबंधी कार्रवाइयों को अंतर्वलित करने वाला कोई नया अस्तित्व अभिप्रेत है;]

 [(प) “विहित" से अभिप्रेत है,-

(अ) उच्च न्यायालय के समक्ष की कार्यवाहियों के संबंध में, उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों द्वारा विहित; 

 [(आ) अपील बोर्ड के समक्ष की कार्यवाहियों के संबंध में, अपील बोर्ड द्वारा बनाए गए, नियमों द्वारा विहित; और]

(इ) अन्य मामलों में, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित;] 

(फ) “विहित रीति" के अंतर्गत विहित फीस का संदाय भी है; 

(ब) “पूर्विकता तारीख" का वही अर्थ है जो उसका धारा 11 में है; 

(भ) “रजिस्टर" से पेटेंटों का वह रजिस्टर अभिप्रेत है जो धारा 67 में निर्दिष्ट है; 

(म) “वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता" के अंतर्गत, न तो आविष्कार का भारत में प्रथम आयातकर्ता है और न ऐसा व्यक्ति है जिसे कोई आविष्कार भारत के बाहर से प्रथम बार संसूचित किया गया है ।

(2) इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) नियंत्रक के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत ऐसे अधिकारी के प्रति निर्देश भी है जो धारा 73 के अनुसरण में नियंत्रक के कृत्यों का निर्वहन कर रहा है; 

(ख) पेटेंट कार्यालय के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अंतर्गत पेटेंट कार्यालय के किसी शाखा कार्यालय के प्रति निर्देश भी है । 

अध्याय 2

आविष्कार जो पेटेंट योग्य नहीं हैं

3. क्या-क्या आविष्कार नहीं हैं-इस अधिनियम के अर्थ में निम्नलिखित आविष्कार नहीं है, अर्थात् :-

(क) आविष्कार जो तुच्छ है या ऐसी किसी बात का दावा करता है जो सुस्थापित प्राकृतिक नियमों के प्रत्यक्षतः प्रतिकूल है; 

 [(ख) आविष्कार जिसका प्राथमिक या आशयित उपयोग अथवा वाणिज्यिक समुपयोजन लोक व्यवस्था या नैतिकता के प्रतिकूल होगा या जो मानव, पशु अथवा पौधों के जीवन या स्वास्थ्य या पर्यावरण पर गंभीर रूप से प्रतिकूल प्रभाव डालता है;

(ग) वैज्ञानिक सिद्धांत की खोज मात्र या अमूर्त सिद्धांत को सूत्रित करना;  [अथवा प्रकृति में विद्यमान किसी मूर्त चीज या अमूर्त पदार्थ की खोज करना] ; 

 [(घ) किसी ज्ञात पदार्थ के किसी नए रूप की खोज मात्र, जिसका परिणाम उस पदार्थ की ज्ञात दक्षता की वृद्धि में नहीं होता है या किसी ज्ञात पदार्थ के किसी नए गुण या नए उपयोग की खोज मात्र या किसी ज्ञात प्रक्रिया, मशीन या साधित्र के मात्र उपयोग की खोज, जब तक कि ऐसी ज्ञात प्रक्रिया के परिणामस्वरूप कोई नया उत्पादन निकल आए या उसमें कम-से-कम एक नया अभिकारक न लग जाए । 

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए लवणों, ईस्टरों, ईथरों, पौलीमार्फों, मेटाबोलाइटों, शुद्ध रूप में, कण आकार, बहुलकों, बहुलकों के मिश्रणों और ज्ञात पदार्थ के अन्य व्युत्पनों को समान पदार्थ समझा जाएगा जब तक कि वे दक्षता के संबंध में गुणों में महत्वपूर्ण रूप से भिन्न न हों;]

(ङ) सम्मिश्रण मात्र से अभिप्राप्त पदार्थ, जिसके परिणामस्वरूप उसके घटकों के गुणों का केवल समुच्चयन हो जाता हो या ऐसे पदार्थ के उत्पादन की प्रक्रिया; 

(च) ऐसी ज्ञात युक्तियों का जिनमें से हर एक किसी ज्ञात ढंग से एक दूसरे से स्वतंत्र कार्य कार्य करती है, विन्यास का पुनर्विन्यास या द्विरावृत्ति मात्र; 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।             

(ज) कृषि या उद्यान-कृषि का ढंग; 

(झ) मनुष्यों के औषधीय, शल्यचिकित्सीय, रोगहर, रोगनिरोधी  [नैदानिक रोगोपचारीट या अन्य उपचार के लिए कोई प्रक्रिया अथवा पशुओं  । । । को रोगमुक्त करने के लिए या उनके या उनके उत्पादों के आर्थिक मूल्य को बढ़ाने के लिए पशुओं या पौधों के वैसे ही उपचार के लिए कोई प्रक्रिया; 

 [(ञ) सूक्ष्म जीवों से भिन्न संपूर्ण पौधे और पशु या उनके कोई भाग, किन्तु उनके अंतर्गत बीज, किस्म और और जाति तथा पौधों और पशुओं के उत्पादन या प्रवर्धन के लिए अनिवार्य रूप से जैव प्रक्रिया भी है; 

(ट) गणितीय या कारबार पद्धति अथवा स्वतः कम्प्यूटर प्रोग्राम या कलन विधि; 

(ठ) साहित्यिक, नाटकीय, संगीतात्मक अथवा कलात्मक कृति या किसी प्रकार का कोई अन्य सौन्दर्य विषयक सृजन, जिसके अन्तर्गत चलचित्र संबंधी कृतियां और टेलीविजन प्रस्तुति भी हैं; 

(ड) मानसिक प्रदर्शन करने की मात्र स्कीम या नियम या ढंग अथवा खेल खेलने का ढंग; 

(ढ) सूचना का प्रस्तुतीकरण;

(ण) एकीकृत सर्किट का स्थान वर्णन ;

(त) कोई आविष्कार जो वस्तुतः पारंपरिक ज्ञान है या जो पारंपरिक रूप से ज्ञात संघटक या संघटकों के ज्ञात गुण का संकलन या पुनरावृत्ति है ।]

4. परमाणु ऊर्जा से सम्बन्धित आविष्कार का पेटेंट योग्य होना-परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 (1962 का 33) की धारा 20 की उपधारा (1) के अंतर्गत आने वाले परमाणु ऊर्जा से संबंधित आविष्कारों की बाबत कोई पेटेंट अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

अध्याय 3

पेटेंटों के लिए आवेदन

6. पेटेंटों के लिए आवेदन करने के हकदार व्यक्ति-(1) धारा 134 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी आविष्कार के पेटेंट के लिए आवेदन निम्नलिखित व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति कर सकेगा, अर्थात् :-

(क) आविष्कार का वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता होने का दावा करने वाला कोई व्यक्ति; 

(ख) ऐसा कोई व्यक्ति जो ऐसा आवेदन करने के अधिकार की बाबत वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता होने का दावा करने वाले व्यक्ति का समनुदेशिती है; 

(ग) किसी ऐसे मृत व्यक्ति का विधिक प्रतिनिधि जो अपनी मृत्यु से ठीक पहले ऐसा आवेदन करने का हकदार था । 

(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन उस उपधारा में निर्दिष्ट व्यक्तियों में से किसी भी व्यक्ति द्वारा या तो अकेले या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से, किया जा सकेगा । 

7. आवेदन का प्रारूप-(1) पेटेंट के लिए हर आवेदन केवल एक आविष्कार के लिए होगा और वह विहित रूप में किया जाएगा तथा पेटेंट कार्यालय में फाइल किया जाएगा ।

 [(1क) यदि कोई तत्समान आवेदन भारत में नियंत्रक के समक्ष भी फाइल किया गया है तो पेटेंट के लिए पेटेंट सहयोग संधि के अधीन प्रत्येक अन्तरराष्ट्रीय आवेदन, जो भारत को अभिहित करते हुए फाइल किया जाए, इस अधिनियम के अधीन आवेदन समझा जाएगा ।] 

 [(1ख) उपधारा (1क) में निर्दिष्ट किसी आवेदन को फाइल करने की तारीख और पदाभिहित कार्यालय या निर्वाचित कार्यालय के रूप में पेटेंट कार्यालय द्वारा प्रसंस्कृत किया जाने वाला इसका पूर्ण विनिर्देश, पेटेंट सहयोग संधि के अधीन दी गई अंतरराष्ट्रीय फाइल करने की तारीख होगी ।]

(2) जहां कोई आवेदन, आविष्कार के पेटेंट के लिए आवेदन करने के अधिकार के समनुदेशन के आधार पर किया जाता है वहां आवेदन के साथ या आवेदन फाइल करने के पश्चात् ऐसी अवधि के भीतर, जो विहित की जाए, आवेदन करने के अधिकार का सबूत दिया जाएगा ।

(3) इस धारा के अधीन किए गए हर आवेदन में यह कथित होगा कि आवेदक का आविष्कार पर कब्जा है और उसमें वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता होने का दावा करने वाले  [व्यक्तिट का नाम रहेगा और जहां ऐसा दावा करने वाला व्यक्ति आवेदक न हो या आवेदकों में से कोई भी आवेदक न हो वहां आवेदन में यह घोषणा की जाएगी कि आवेदक को यह विश्वास है कि इस प्रकार नामित व्यक्ति वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता है । 

 [(4) प्रत्येक ऐसा आवेदन (जो कन्वेंशन आवेदन या भारत को पदाभिहित किए जाने के लिए पेंटेंट सहयोग संधि के अधीन फाइल किया गया कोई आवेदन नहीं है) के साथ एक अनंतिम या संपूर्ण विनिर्देश लगा होगा ।]

8. विदेशी आवेदनों के बारे में जानकारी और वचनबंद्ध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन पेटेंट का कोई आवेदक भारत के बाहर किसी देश में, उसी या सारतः उसी आविष्कार की बाबत पेटेंट के लिए आवेदन की पैरवी या तो अकेले या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से कर रहा है अथवा जहां उसकी जानकारी में ऐसे आवेदन की पैरवी, किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसके माध्यम से वह दावा करता है या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा की जा रही है जिसे उससे हक व्युत्पन्न होता है वहां वह अपने आवेदन की साथ निम्नलिखित फाइल करेगा,  [ [या विहित अवधि के भीतर जो नियंत्रक अनुज्ञात करें] अर्थात् :-

 [(क) ऐसा विवरण जिसमें ऐसे आवेदन की विस्तृत विशिष्टियां उपवर्णित हों, और]

(ख) यह वचनबन्ध कि वह नियंत्रक को,  [भारत में पेटेंट अनुदत्त करने की तारीख तकट उसी या सारतः उसी आविष्कार से संबंधित हर ऐसे अन्य आवेदन के बारे में, यदि कोई हो, जो खण्ड (क) में निर्दिष्ट विवरण के फाइल किए जाने के पश्चात् विहित समय के भीतर भारत के बाहर किसी देश में फाइल किया गया है,  [पूर्वोक्त खण्ड के अधीन यथा अपेक्षित विस्तृत विशिष्टियों कीट लिखित रूप में सूचना, समय-समय पर, देता रहेगा । 

 [(2) भारत में पेटेंट के लिए किसी आवेदत को फाइल करने के पश्चात् किसी समय और उस पर पेटेंट अनुदत्त करने अथवा पेटेंट अनुदत्त करने से इंकार किए जाने तक, नियंत्रक आवेदक से यह अपेक्षा भी कर सकेगा कि वह भारत से बाहर किसी देश में आवेदन की प्रक्रिया के संबंध में ऐसे ब्यौरे दे, जो विहित किए जाएं और उस दशा में आवेदक नियंत्रक को उसके पास उपलब्ध जानकारी ऐसी अवधि के भीतर देगा, जो विहित की जाए ।]

9. अनंतिम और पूर्ण विनिर्देश- [(1) जहां किसी पेटेंट के लिए किसी आवेदन (जो कोई कन्वेन्शन आवेदन या भारत को अभिहित किए जाने के लिए पेटेंट सहयोग संधि के अधीन फाइल किया गया कोई आवेदन नहीं है) के साथ एक अनंतिम विनिर्देश लगा हो, वहां एक पूर्ण विनिर्देश आवेदन फाइल करने की तारीख से बारह मास के भीतर फाइल किया जाएगा और यदि पूर्ण विनिर्देश इस प्रकार फाइल नहीं किया जाता है तो आवेदन उस बारे में यह समझा जाएगा कि उसका परित्याग कर दिया गया है :]

परन्तु पूर्ण विनिर्देश पूर्वोक्त तारीख से बारह मास के पश्चात् किन्तु उस तारीख से पन्द्रह मास के भीतर किसी भी समय फाइल किया जा सकेगा यदि नियंत्रक से उस आशय की प्रार्थना की गई है और विहित फीस पूर्ण विनिर्देश फाइल किए जाने की तारीख को या उसके पूर्व संदत्त कर दी गई है । 

(2) जहां उसी आवेदक के नाम से दो या अधिक आवेदनों के साथ ऐसे आविष्कारों की बाबत, जो सजातीय है या जिनमें से एक अन्य आविष्कार का उपान्तर है, अनन्तिम विनिर्देश है और नियंत्रक की यह राय है किए ऐसे समस्त आविष्कार ऐसे हैं कि उनसे एकल आविष्कार बनता है और जो उचित रूप से एक ही पेटेन्ट के अन्तर्गत आ सकते हैं वहां वह ऐसे सब अनन्तिम विनिर्देशों की बाबत एक ही पूर्ण विनिर्देश फाइल किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा :

 [परंतु यह कि उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट कालावधि को सबसे पहले अनंतिम विनिर्देश के फाइल करने की तारीख से गणना में लिया जाएगा ।]

 [(3) जहां पेटेंट के लिए ऐसे आवेदन के साथ (जो कोई कन्वेन्शन आवेदन या भारत को अभिहित किए जाने के लिए पेटेंट सहयोग संधि के अधीन फाइल किया गया कोई आवेदन नहीं है) ऐसा विनिर्देश हो जिसका पूर्ण विनिर्देश होना तात्पर्यित है, वहां नियंत्रक यदि आवेदक ऐसे आवेदन को फाइल करने की तारीख से बाहर मास के भीतर किसी समय ऐसा अनुरोध करता है तो यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा विनिर्देश इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अनंतिम विनिर्देश समझा जाएगा और आवेदन पर तदनुसार आगे कार्यवाही कर सकेगा ।]

(4) जहां पेटेंट के लिए ऐसे आवेदन के अनुसरण में, जिसके साथ अनन्तिम विनिर्देश है या ऐसा विनिर्देश है जो उपधारा (3) के अधीन दिए गए निदेश के आधार पर अनन्तिम विनिर्देश माना गया है, पूर्ण विनिर्देश फाइल कर दिया गया है वहां नियंत्रक यदि आवेदक के  [पेटेंट अनुदत्त करनेट से पहले किसी भी समय ऐसी प्रार्थना करता है, तो, अनन्तिम विनिर्देश को रद्द कर सकेगा और आवेदन के पूर्ण विनिर्देश फाइल किए जाने की तारीख से उत्तर-दिनांकित कर सकेगा ।

10. विनिर्देशों की अन्तर्वस्तुएं-(1) हर विनिर्देश में, चाहे वह अनन्तिम हो या पूर्ण, आविष्कार का वर्णन होगा और वह आविष्कार से सम्बद्ध विषयवस्तुएं को पर्याप्त रूप से करने वाले शीर्षक से आरम्भ होगा ।

(2) ऐसे किन्हीं नियमों के, जो इस निमित्त इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं, अधीन रहते हुए, किसी विनिर्देश के प्रयोजनों के लिए, चाहे वह पूर्ण हो या अनन्तिम, रेखांकन दिए जा सकेंगे और यदि नियंत्रक ऐसी अपेक्षा करे तो वे दिए, जाएंगे और जब तक नियंत्रक अन्यथा निदेश न दे इस प्रकार दिए गए रेखांकन, विनिर्देश के भाग समझे जाएंगे और इस अधिनियम में विनिर्देश के प्रति निर्देशों का अर्थ तद्नुसार लगाया जाएगा ।

(3) यदि किसी विशिष्ट मामले में नियंत्रक यह समझता है कि आवेदन के साथ किसी ऐसी वस्तु का प्रतिमान या नमूना भी होना चाहिए जो आविष्कार को चित्रांकित करती है या जिससे आविष्कार का बनना अभिकथित है तो ऐसा प्रतिमान या नमूना जिसकी वह अपेक्षा करे,  [किसी आवेदन के किसी पेटेंट को अनुदत्त करने के लिए नियमित पाए जाने से पहलेट दिया जाएगा किन्तु ऐसा प्रतिमान या नमूना विनिर्देश का भाग नहीं समझा जाएगा । 

(4) हर पूर्ण विनिर्देश में-

(क) आविष्कार और उसके प्रचलन या उपयोग का और उस ढंग का जिससे उसे क्रियान्वित किया जाना है, पूर्णतः और विशिष्टतः वर्णन होगा; 

(ख) आविष्कार को क्रियान्वित करने का सर्वोत्तम ढंग जो आवेदक को ज्ञात है और जिसके लिए वह संरक्षण का दावा करने का हकदार है, प्रकट किया जाएगा; तथा 

(ग) अन्त में ऐसा दावा या ऐसे दावे होंगे जिसमें या जिनमें उस आविष्कार का क्षेत्र परिभाषित है, जिसके लिए संरक्षण का दावा किया गया है ।    

 [(घ) उसके साथ आविष्कार के बारे में तकनीकी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए संक्षिप्त सार होगाट :

परन्तु-

(i) नियंत्रक तीसरे पक्षकार को और अच्छी जानकारी देने के लिए संक्षिप्त सार का संशोधन कर सकेगा ; और 

(ii) यदि आवेदक विनिर्देश में किसी जैव पदार्थ का वर्णन करता है जिसे खंड (क) और खंड (ख) का समाधान करने के लिए इस रूप में वर्णित नहीं किया जा सकता है और यदि ऐसा पदार्थ जनता के लिए उपलब्ध नहीं है तो आवेदन को,     4[ऐसा पदार्थ बुडापेस्ट संधि के अधीन किसी अंतरराष्ट्रीय निक्षेपागार प्राधिकरण के पासट निक्षेपित करके तथा निम्नलिखित शर्तों को पूरा करने के पश्चात् पूरा किया जाएगा, अर्थात् :-

 [(अ) पदार्थ का निक्षेप भारत में पेटेंट के आवेदन के फाइल करने की तारीख के पश्चात् नहीं किया जाएगा और उसका निर्देश विहित अवधि के भीतर विनिर्देश में किया जाएगाट ; 

(आ) उसके लिए अपेक्षित उस पदार्थ के उपलब्ध सभी लक्षणों की जिनकी सही रूप से पहचान की जानी है या उन्हें उपदर्शित किया जाना है, उपलब्ध सभी विशिष्टियां विनिर्देश में सम्मिलित हैं जिनके अंतर्गत निक्षेपागार संस्था का नाम और पता तथा उस संस्था के पास पदार्थ के निक्षेप की तारीख तथा उनकी संख्या भी है; 

(इ) निक्षेपागार संस्था में उक्त पदार्थ तक पहुंच भारत में पेटेंट के लिए आवेदन की तारीख के पश्चात् या यदि पूर्विकता का दावा किया जाता है तो पूर्विकता की तारीख के पश्चात् ही उपलब्ध है; 

(ई) विनिर्देश में जैव पदार्थ के जब उसका किसी आविष्कार में उपयोग किया गया है, स्रोत और भौगोलिक मूल का प्रकटन ।]

 [(4क) भारत को अभिहित करने वाले किसी अंतरराष्ट्रीय आवेदन की दशा में आवेदन के साथ फाइल किए गए हक, वर्णन, रेखांकन संक्षिप्त सार और दावे इस अधिनियम के प्रयोजन के लिए पूर्ण विनिर्देश समझे जाएंगे ।]

 [(5) पूर्ण विनिर्देश का दावा या दावे एकल आविष्कार या उससे जुड़े हुए आविष्कारों के समूह से संबद्ध होंगे जिससे कल आविष्कारिक संकल्पना की रचना हो सके, स्पष्ट और संक्षिप्त होंगे तथा विनिर्देश में प्रकट किए गए विषय पर निप्पक्ष रूप से आधारित होंगे ।] 

(6) आविष्कार के आविष्कर्ता होने के बारे में घोषणा ऐसी दशाओं में जो विहित की जाएं, पूर्ण विनिर्देश के साथ या उस विनिर्देश के फाइल किए जाने के पश्चात् उस अवधि के भीतर जो विहित की जाए, विहित प्ररूप में दी जाएगी । 

(7) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन रहते हुए, अनन्तिम विनिर्देश के पश्चात् फाइल किए गए पूर्ण विनिर्देश में, अनन्तिम विनिर्देश में वर्णित आविष्कार के ऐसे विकास या परिवर्धनों की बाबत दावे सम्मिलित किए जा सकेंगे जो ऐसे विकास या परिवर्धन हों, जिनकी बाबत आवेदक पेटेंट के लिए धारा 6 के उपबन्धों के अधीन अलग से आवेदन करने का हकदार होगा ।

11. पूर्ण विनिर्देश के दावों की पूर्विक्ता तारीख-(1) पूर्ण विनिर्देश के हर एक दावे की एक पूर्विकता तारीख होगी । 

(2) जहां पूर्ण विनिर्देश, ऐसे एकल आवेदन के अनुसरण में, जिसके साथ-

(क) अनन्तिम विनिर्देश है; अथवा 

(ख) ऐसा विनिर्देश है जिसे धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन दिए गए निदेश के आधार पर अनन्तिम विनिर्देश माना जाता है,

फाइल किया जाता है और दावा, खण्ड (क) या खण्ड (ख) में निर्दिष्ट विनिर्देश में प्रकट किए गए विषय पर पूर्ण रूप से आधारित है वहां उस दावे की पूर्विकता तारीख सुसंगत विनिर्देश के फाइल किए जाने की तारीख होगी । 

(3) जहां ऐसे दो या अधिक आवेदनों के अनुसरण में पूर्ण विनिर्देश फाइल किया जाता है या उस पर कार्यवाही की जाती है, जिनके साथ ऐसे विनिर्देश हैं जो उपधारा (2) में वर्णित है और दावा- 

(क) उन विनिर्देशों में से किसी एक में प्रकट किए गए विषय पर पूर्ण रूप से आधारित है वहां उस दावे की पूर्विकता तारीख, उस आवेदन के फाइल किए जाने की तारीख होगी जिसके साथ वह विनिर्देश है ;

(ख) भागतः किसी एक में और भागतः किसी दूसरे में प्रकट किए गए विषय पर पूर्ण रूप से आधारित है वहां उस दावे की पूर्विकता तारीख उस आवेदन के फाइल किए जाने की तारीख होगी जिसके साथ पश्चात्वर्ती तारीख का                  विनिर्देश है । 

 [(3क) जहां भारत में पहले फाइल किए गए आवेदन पर आधारित पूर्ण विनिर्देश उस आवेदन की तारीख से बारह मास के भीतर फाइल किया गया है और दावा पहले किए गए आवेदन में प्रकट किए गए विषय पर उचित रूप में आधारित है वहां उस दावे की पूर्विकता की तारीख, पहले किए गए आवेदन की वह तारीख होगी जिसमें विषय पहले प्रकट किया गया था ।]

(4) जहां धारा 16 की उपधारा (1) के आधार पर किए गए अतिरिक्त आवेदन के अनुसरण में पूर्ण विनिर्देश फाइल कर दिया गया है और दावा, यथास्थिति, पूर्ववर्ती अनन्तिम या पूर्ण विनिर्देशों में से किसी में प्रकट किए गए विषय पर पूर्ण रूप से आधारित है वहां उस दावे की पूर्विकता तारीख उस विनिर्देश के फाइल किए जाने की तारीख होगी जिसमें वह विषय प्रथम बार                        प्रकट किया गया है । 

(5) जहां पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे की, यदि इस उपधारा के उपबन्ध न होते तो, इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन दो या अधिक पूर्विकता तारीखें होती वहां उस दावे की पूर्विकता तारीख वह होगी जो उन तारीखों में से पूर्वतर या पूर्वतम हो ।

(6) ऐसे किसी मामले में जिसे उपधारा (2), (3) 3[(3क)ट, (4) और (5) लागू नहीं होती, दावे की पूर्विकता तारीख, धारा 137 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, पूर्ण विनिर्देश के फाइल किए जाने की तारीख होगी ।

(7) इस धारा में, आवेदन या पूर्ण विनिर्देश के फाइल करने को तारीख के प्रति निर्देश, उन दशाओं में जिनमें उसको यथास्थिति, धारा 9 या धारा 17 के अधीन उत्तर-दिनांकित किया गया है या धारा 16 के अधीन पूर्व-दिनांकित किया गया है उस तारीख के प्रति निर्देश होगा जिस तारीख से उसको इस प्रकार उत्तर-दिनांकित या पूर्व-दिनांकित किया गया है ।

(8) पेटेन्ट के पूर्व विनिर्देश में का कोई दावा-

(क) किसी आविष्कार का प्रकाशन या उपयोग ऐसे दावे की पूर्विकता तारीख को या उसके पश्चात् करने के कारण  ही वहां तक जहां तक कि वह उस दावे में दावाकृत है; अथवा 

(ख) उसी या किसी पश्चात्वर्ती पूर्विकता तारीख के दावे में किसी ऐसे अन्य पेटेंट के जो आविष्कार का दावा करता है, अनुदत्त किए जाने के कारण ही, वहां तक जहां तक कि वह प्रथम वर्णित दावे में दावाकृत है,

अविधिमान्य नहीं होगा । 

अध्याय 4

[आवेदनों का प्रकाशन और उनकी परीक्षा]

11क. आवेदनों का प्रकाशन- [(1) इसमें अन्यथा उपबंधित के सिवाय पेटेंट के लिए कोई आवेदन साधारणतया ऐसी अवधि के लिए जनता के लिए खुला रहेगा, जो विहित की जाए ।]

(2) आवेदक, विहित रीति में नियंत्रक से अपने आवेदन के प्रकाशन की उपधारा (1) के अधीन विहित अवधि के अवसान से पूर्व प्रकाशित करने की प्रार्थना कर सकेगा और उपधारा (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, नियंत्रक ऐसे आवेदन को यथासंभव शीघ्र प्रकाशित करेगा । 

(3) किसी पेटेंट के लिए प्रत्येक आवेदन, उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के अवसान पर, उन मामलों के सिवाय प्रकाशित किया जाएगा जहां- 

(क) आवेदन में धारा 35 के अधीन गोपनीयता निदेश अधिरोपित किया गया है; 

(ख) आवेदन का धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन परित्याग कर दिया गया है; या 

(ग) जहां आवेदन उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि से तीन मास पूर्व वापस ले लिया गया है;] 

(4) उस दशा में, जिसमें धारा 35 के अधीन किसी आवेदन की बाबत गोपनीयता का कोई निदेश दिया गया है, वह                [उपधारा (1) में विहितट अवधि की समाप्ति के पश्चात् अथवा जब गोपनीयता के निदेश का प्रवृत्त होना समाप्त हो गया है, जो भी पूर्ववर्ती हो, प्रकाशित किया जाएगा । 

(5) इस धारा के अधीन प्रत्येक आवेदक के प्रकाशन के अन्तर्गत, आवेदन की तारीख, आवेदन संख्या, आवेदक के नाम और पते की विशिष्टियां सम्मिलित होंगी जिनसे आवेदन और संक्षिप्त सार की पहचान हो । 

(6) इस धारा के अधीन पेटेंट के लिए आवेदन के प्रकाशन पर-

(क) निक्षेपागार संस्था विनिर्देश में वर्णित जैव पदार्थ जनता के लिए उपलब्ध कराएगी; 

(ख) पेटेंट कार्यालय, ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, ऐसे आवेदन के विनिर्देश और रेखांकनों को, यदि कोई हों, जनता को उपलब्ध करा सकेगा ।

 [(7) पेटेंट के लिए आवेदन के प्रकाशन की तारीख से ही और ऐसे आवेदन के संबंध में किसी पेटेंट को अनुदत्त करने की तारीख तक आवेदक को वैसे ही विशेषाधिकार और अधिकार होंगे मानो आविष्कार के लिए कोई पेटेंट आवेदन के प्रकाशन की तारीख को अनुदत्त कर दिया गया था : 

परन्तु यह कि आवेदक, पेटेंट के अनुदत्त किए जाने तक किसी व्यतिक्रम के लिए कोई कार्यवाही संस्थित करने का हकदार नहीं होगा :

परन्तु यह और कि धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन 1 जनवरी, 2005 के पूर्व किए गए आवेदन के संबंध में किसी पेटेंटधारी के अधिकार पेटेंट अनुदत्त किए जाने की तारीख से प्रोद्भूत होंगे : 

परन्तु यह भी कि धारा 5  की उपधारा (2) के अधीन किए गए आवेदनों के संबंध में पेटेंट को अनुदत्त किए जाने के पश्चात् पेटेंट धारक ऐसे उद्यमों से युक्तियुक्त स्वामिस्व प्राप्त करने का ही हकदार होगा, जिन्होंने पर्याप्त विनिधान किया है और  जो             1 जनवरी, 2005 से पूर्व संबंधित उत्पाद का उत्पादन और विपणन कर रहे थे और जो पेटेंट के अनुदत्त किए जाने की तारीख को पेटेंट के अन्तर्गत आने वाले उत्पाद का विनिर्माण करना जारी रखते हैं और कोई अतिलंघन कार्यवाहियां ऐसे उद्यमों के विरुद्ध संस्थित नहीं की जाएंगी । 

11ख. परीक्षा के लिए अनुरोध- [(1) पेटेंट के लिए किसी आवेदन की तब तक परीक्षा नहीं की जाएगी जब तक आवेदक या कोई अन्य हितबद्ध व्यक्ति विहित अवधि के भीतर ऐसी परीक्षा के लिए विहित रीति में अनुरोध नहीं करता है ।] 

 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

 [(3) धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन किसी पेटेंट के लिए 1 जनवरी, 2005 के पूर्व, फाइल किए गए किसी दावे के संबंध में किसी आवेदन की दशा में इसकी परीक्षा के लिए विहित अवधि के भीतर और विहित रीति में आवेदक द्वारा या किसी अन्य हितबद्ध व्यक्ति द्वारा किया जाएगा ।]

(4) उस दशा में, जिसमें आवेदक या कोई अन्य हितबद्ध व्यक्ति पेटेंट के लिए आवेदन की परीक्षा के लिए उपधारा (1)  । । । या उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अनुरोध नहीं करता है तो आवेदन आवेदक द्वारा वापस लिया गया समझा जाएगा :

 [परन्तु यह कि- 

(i) आवेदक, आवेदन फाइल करने के पश्चात् किसी समय किन्तु कोई पेटेंट अनुदत्त करने से पूर्व विहित रीति में अनुरोध करके आवेदन वापस ले सकेगा; और 

(ii) उस मामले में, जहां धारा 35 के अधीन गोपनीय निदेश जारी किया जा चुका है वहां, परीक्षा का अनुरोध गोपनीय निदेश के प्रतिसंहरण की तारीख से विहित अवधि के भीतर किया जा सकेगा ।]

12. आवेदनों की परीक्षा-(1)  [जब किसी पेटेंट के लिए किसी आवेदन के संबंध में परीक्षा के लिए कोई अनुरोध धारा 11ख की उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन विहित रीति में किया गया है तब नियंत्रक उससे संबंधित आवेदन और विनिर्देश तथा अन्य दस्तावेजों को शीघ्रतमट किसी परीक्षक को निम्नलिखित विषयों की बाबत उसको रिपोर्ट देने के लिए निर्देशित करेगा, अर्थात् :-

(क) क्या आवेदन और  [उससे सम्बन्धित विनिर्देश और अन्य दस्तावेजट इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों की अपेक्षाओं के अनुसार हैं; 

(ख) क्या आवेदन के अनुसरण में इस अधिनियम के अधीन पेटेंट के अनुदत्त किए जाने के बारे में आक्षेप का कोई विधिपूर्ण आधार है; 

(ग) धारा 13 के अधीन किए गए अन्वेषणों का परिणाम, तथा 

(घ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए । 

(2) जिस परीक्षक को ओवदन और 7[उससे संबंधित विनिर्देश और अन्य दस्तावेजट उपधारा (1) के अधीन निर्देशित किए गए हैं वह नियंत्रक को 7[ऐसी अवधि के भीतर जो विहित की जाएट सामान्यतः रिपोर्ट देगा ।   

13. पूर्व प्रकाशन द्वारा और पूर्विक्त दावे द्वारा किए गए पूर्वानुमान की तलाश-(1) जिस परीक्षक को पेटेंट के लिए आवेदन धारा 12 के अधीन निर्देशित किया गया है वह इस बात को अभिनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ अन्वेषण करेगा कि क्या उस आविष्कार का, जहां तक कि उसका दावा किसी पूर्ण विनिर्देश के दावे में किया गया है,-

(क) किसी ऐसे विनिर्देश में जो पेटेंट के लिए भारत में किए गए आवेदन के अनुसरण में फाइल किया गया है और जिस पर 1 जनवरी, 1912 या उसके पश्चात् की तारीख पड़ी है, आवेदक के पूर्ण विनिर्देश के फाइल किए जाने की तारीख के पूर्व ही प्रकाशन द्वारा पूर्वानुमान किया गया है; 

(ख) दावा किसी अन्य ऐसे पूर्ण विनिर्देश के दावे में किया गया है जो आवेदक के पूर्ण विनिर्देश के फाइल किए जाने की तारीख को या उसके पश्चात् प्रकाशित किया गया है और वह ऐसा विनिर्देश है जो पेटेंट के लिए भारत में किए गए आवेदन के अनुसरण में फाइल किया गया है और जिस पर उस तारीख से पूर्व की तारीख पड़ी है या जिसमें उस तारीख से पूर्व की पूर्विकता तारीख दावा किया गया है । 

(2) परीक्षक, इसके अतिरिक्त  [इस बात को अभिनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ अन्वेषण करेगाट कि क्या उस आविष्कार का, जहां तक कि उसका दावा पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में किया गया है, उपधारा (1) में वर्णित दस्तावेज से भिन्न किसी दस्तावेज में आवेदक के पूर्ण विनिर्देश फाइल करने की तारीख के पूर्व भारत में या अन्यत्र प्रकाशन द्वारा पूर्वानुमान किया गया है । 

(3) जहां पूर्ण विनिर्देश का, इसके पूर्व कि  [ऐसी अवधी के भीतर जो विहित की जाएट इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन संशोधन किया जाता है वहां संशोधित विनिर्देश की परीक्षा और अन्वेषण मूल विनिर्देश की तरह ही किया जाएगा । 

(4) धारा 12 और इस धारा के अधीन अपेक्षित परीक्षा और अन्वेषण किसी पेटेंट की विधिमान्यता के लिए किसी भी प्रकार समुचित आधार नहीं समझे जाएंगे तथा किसी परीक्षा या अन्वेषण अथवा उसके परिणामस्वरूप दी जाने वाली किसी                                 रिपोर्ट के या की जाने वाली अन्य कार्यवाहियों के कारण या उनके संबंध में, केंद्रीय सरकार या उसके किसी अधिकारी का कोई दायित्व उपगत नहीं होगा ।

 [14. नियंत्रक द्वारा परीक्षक की रिपोर्ट पर विचार-जहां पेटेंट के लिए किसी आवेदन के संबंध में नियंत्रक को प्राप्त परीक्षक की रिपोर्ट आवेदक के विरुद्ध है अथवा आवेदन, विनिर्देश या अन्य दस्तावेज में किसी संशोधन की अपेक्षा, यह सुनिश्चित करने के लिए की गई है कि इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों का अनुपालन किया गया है वहां नियंत्रक, इसमें इसके पश्चात् आने वाले उपबंधों के अनुसार आवेदन को निपटाने की कार्यवाही करने से पूर्व आक्षेपों का सार आवेदक को शीघ्रता से संसूचित  करेगा और यदि आवेदक विहित समय के भीतर ऐसी अपेक्षा करता है तो वह उसे सुनवाई का अवसर देगा ।

15. नियंत्रक की कतिपय मामलों में इंकार करने या आवेदनों आदि के संशोधन की अपेक्षा करने की शक्ति-जहां नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि उसके अनुसरण में फाइल किया गया आवेदन या कोई विनिर्देश या कोई अन्य दस्तावेज इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों की अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं करता है, वहां, नियंत्रक आवेदन पर कार्यवाही करने से इंकार कर सकेगा या, यथास्थिति, आवेदन, विनिर्देश या आगे दस्तावेजों में, आवेदन पर आगे कार्यवाही करने से पूर्व, उसके समाधानप्रद रूप में संशोधन करने की अपेक्षा कर सकेगा और ऐसा करने में असफल होने पर आवेदन पर कार्यवाही करने से इंकार कर सकेगा ।]

16. आवेदन के विभाजन की बाबत आदेश करने की नियंत्रक की शक्ति-(1) कोई व्यक्ति, जिसने इस अधिनियम के अधीन पेटेन्ट के लिए आवेदन किया है, यदि वह ऐसा चाहे तो  [पेटेंट अनुदत्त करने से पहलेट किसी भी समय या नियंत्रक द्वारा इस आधार पर कि पूर्ण विनिर्देश के दावे एक से अधिक आविष्कार से संबंध रखते हैं, किए गए आक्षेप को दूर करने की दृष्टि से, ऐसे आविष्कार की बाबत जो प्रथम वर्णित आवेदन की बाबत पहले ही फाइल किए गए अनन्तिम या पूर्ण विनिर्देश में प्रकट किया गया है, कोई अतिरिक्त आवेदन फाइल कर सकेगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए अतिरिक्त आवेदन के साथ एक पूर्ण विनिर्देश होगा किन्तु ऐसे पूर्ण विनिर्देश में ऐसी कोई बात नहीं होगी जो प्रथम वर्णित आवेदन के अनुसरण में फाइल किए गए पूर्ण विनिर्देश में सारतः प्रकट न की गई हो ।

(3) नियंत्रक, या तो मूल या अतिरिक्त आवेदन के अनुसरण में फाइल किए गए पूर्ण विनिर्देश के ऐसे संशोधन की अपेक्षा कर सकेगा जो इस बात को सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो कि उक्त पूर्ण विनिर्देशों में से किसी में ऐसी किसी बात का दावा सम्मिलित नहीं है जिसका कि दूसरे में दावा किया गया है ।

 [स्पष्टीकरण-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आगे आवेदन और उसके साथ लगे पूर्ण विनिर्देश को उस तारीख को फाइल किया गया समझा जाएगा जिसको पहले उल्लिखित आवेदन फाइल किया गया था और आगे आवेदन पर सारवान् आवेदन के रूप में कार्यवाही की जाएगी तथा उसकी परीक्षा तब की जाएगी जब परीक्षा का अनुरोध विहित अवधि के भीतर फाइल किया जाता है ।]

17. आवेदन पर तारीख डालने की बाबत आदेश करने की नियंत्रक की शक्ति-(1) धारा 9 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन आवेदन फाइल किए जाने के पश्चात् और  [पेटेंट अनुदत्त करने से पहलेट किसी भी समय नियंत्रक, विहित रीति से किए गए आवेदक के निवेदन पर, यह निदेश दे सकेगा कि आवेदन को ऐसी तारीख से उत्तर-दिनांकित किया जाए जो निवेदन में विनिर्दिष्ट कि जाए और वह आवेदन पर तद्नुसार आगे कार्यवाही कर सकेगा :

परन्तु इस उपधारा के अधीन किसी भी आवेदन को उस तारीख से छह मास के पश्चात् की किसी तारीख से उत्तर-दिनांकित नहीं किया जाएगा जिस तारीख को वह वास्तव में किया गया था या वह उस उपधारा के उपबन्धों के अभाव में किया गया                   समझा जाता । 

 [(2) जहां किसी आवेदन या विनिर्देश (जिसके अंतर्गत आरेखन भी है) या किसी अन्य दस्तावेज का धारा 15 के अधीन संशोधन किए जाने की अपेक्षा की जाती है वहां यदि नियंत्रक ऐसा निदेश दे तो उक्त आवेदन या विनिर्देश या अन्य दस्तावेज, उस तारीख को जिसको अपेक्षा का अनुपालन किया जाता है या जहां ऐसा आवेदन या विनिर्देश या अन्य दस्तावेज आवेदक को वापस कर दिया जाता है वहां उस तारीख को किया गया समझा जाएगा जिसको वह अपेक्षा का अनुपालन करने के पश्चात् पुनःफाइल                    किया जाता है ।]

18. पूर्वानुमान के मामलों में नियंत्रक की शक्तियां-(1) जहां नियंत्रक को यह प्रतीत होता है कि उस आविष्कार का, जहां तक कि पूर्ण विनिर्देश के दावे में उसका दावा किया गया है, धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड (क) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट रीति से पूर्वानुमान किया गया है वहां वह  [आवेदन पर कार्यवाही करने सेट इन्कार कर सकेगा जब तक कि आवेदक-

(क) नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में यह दर्शित नहीं कर देता कि उसके पूर्ण विनिर्देश के दावे की पूर्विकता तारीख उस तारीख के पश्चात् की नहीं है जिस तारीख को सुसंगत दस्तावेज प्रकाशित किया गया था; अथवा  

(ख) अपने पूर्ण विनिर्देश का संशोधन नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में नहीं कर देता । 

(2) यदि नियंत्रक को यह प्रतीत होता है कि उस आविष्कार का दावा धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट किसी अन्य पूर्ण विनिर्देश के दावे में किया गया है तो वह इसमें इसके पश्चात् अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन रहते हुए, यह निदेश दे सकेगा कि आवेदक के पूर्ण विनिर्देश में उस अन्य विनिर्देश को निर्देश लोक सूचना के रूप में अन्तःस्थापित किया जाए, जब तक कि आवेदक, उतने समय के भीतर जो विहित किया जाए,-  

(क) नियंत्रक को समाधानप्रद रूप में यह दर्शित नहीं कर देता कि उसके दावे की पूर्विकता तारीख उक्त अन्य विनिर्देश के दावे की पूर्विकता तारीख के पश्चात् की नहीं है; अथवा 

(ख) पूर्ण विनिर्देश का संशोधन नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में नहीं कर दिया जाता ।

(3) यदि, धारा 13 के अधीन किए गए अन्वेषण के परिणामस्वरूप या अन्यथा, नियंत्रक को यह प्रतीत होता है कि-

(क) उस आविष्कार का, जहां तक कि आवेदक के पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में उसका दावा किया गया है, धारा 13 की उपधारा (1) के खण्ड (क)  में निर्दिष्ट किसी अन्य पूर्ण विनिर्देश में दावा किया गया है; तथा

(ख) ऐसा अन्य पूर्ण विनिर्देश आवेदक के दावे की पूर्विकता तारीख को या उसके पश्चात् प्रकाशित किया गया था, 

तो जब तक कि नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में यह दर्शित नहीं कर दिया जाता कि आवेदक के दावे की पूर्विकता तारीख उस विनिर्देश के दावे की पूर्विकता तारीख के पश्चात् की नहीं है, उपधारा (2) के उपबन्ध उसे उसी प्रकार लागू होंगे जिस प्रकार वे आवेदक के पूर्ण विनिर्देश फाइल किए जाने की तारीख को या उसके पश्चात् प्रकाशित किसी विनिर्देश को लागू होते हैं  ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

19. सम्भाव्य अतिलंघन की दशा में नियंत्रक की शक्तियां-(1) यदि,  [इस अधिनियम के अधीन अपेक्षित अन्वेषणों के फलस्वरूपट नियंत्रक को यह प्रतीत होता है कि कोई आविष्कार, जिसकी बाबत पेटेंट के लिए आवेदन किया गया है, किसी अन्य पेटेंट के दावे के अतिलंघन का पर्याप्त जोखिम उठाए बिना, क्रियान्वित नहीं किया जा सकता तो वह यह निदेश दे सकेगा कि आवेदक के पूर्ण विनिर्देश में उस अन्य पेटेंट का निर्देश, लोक सूचना के रूप में, अन्तःस्थापित किया जाए जब तक कि आवेदक, उतने समय के भीतर जो विहित किया जाए,- 

(क) नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में यह दर्शित नहीं कर देता कि अन्य पेटेंट के उक्त दावे की विधिमान्यता का प्रतिवाद करने के लिए युक्तियुक्त आधार है; अथवा 

(ख) पूर्ण विनिर्देश का संशोधन नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में नहीं कर दिया जाता । 

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी निदेश के अनुसरण में, पूर्ण विनिर्देश में अन्य पेटेंट का निर्देश अन्तःस्थापित किए जाने के पश्चात्- 

(क) वह अन्य पेटेंट प्रतिसंहृत कर दिया जाता है या अन्यथा प्रवृत्त नहीं रह जाता है ;  

(ख)  सुसंगत दावे का लोप करके उस अन्य पेटेंट के विनिर्देश को संशोधित कर दिया जाता है; अथवा

(ग) न्यायालय या नियंत्रक के समक्ष की कार्यवाहियों में यह पाया जाता है कि उस अन्य पेटेंट का सुसंगत दावा अविधिमान्य है या आवेदक के आविष्कार के किसी क्रियान्वयन से उसका अतिलंघन नहीं होता,

वहां नियंत्रक, आवेदक के आवेदन पर, उस पर अन्य पेटेंट के प्रति निर्देश का लोप कर सकेगा । 

20. आवेदकों, आदि के प्रतिस्थापन के संबंध में आदेश करने की नियंत्रक की शक्तियां-(1) यदि पेटेंट अनुदत्त किए जाने के पूर्व किसी भी समय ऐसी रीति से जो विहित की जाए, दावा किए जाने पर, नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि पेटेंट के लिए आवेदक या आवेदकों में से किसी एक आवेदक द्वारा किए गए किसी लिखित समनुदेशन या करार के आधार पर अथवा विधि की क्रिया द्वारा दावेदार, उस दशा में जब पेटेन्ट उस समय अनुदत्त किया गया होता, उसका या उमसें आवेदक के हित का अथवा पेटेंट या उस हित के अविभाजित अंश का हकदार होता तो नियंत्रक इस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए निदेश दे सकेगा कि आवेदन पर तदनुसार आगे कार्यवाही, दावेदार के नाम से या दावेदारों और आवेदक  या अन्य संयुक्त आवेदक या आवेदकों के नामों से, जैसा कि मामले में अपेक्षित हो, की जाएगी । 

(2) किसी पेटेंट के लिए दो या अधिक संयुक्त आवेदकों में से किसी एक आवेदक द्वारा किए गए किसी समनुदेशन या करार के आधार पर यथापूर्वोक्त कोई निदेश अन्य संयुक्त आवेदक या आवेदकों की सहमति के बिना नहीं दिया जाएगा । 

(3) किसी आविष्कार के फायदे के किसी समनुदेशन के या समनुदेशानार्थ किसी करार के आधार पर यथापूर्वोक्त कोई निदेश तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक कि- 

(क) पेटेंट के लिए आवेदन के संख्यांक के प्रति निर्देश से उसमें आविष्कार की पहचान नहीं हो जाती ; अथवा   

(ख) समनुदेशन या करार करने वाले व्यक्ति द्वारा इस बात की अभिस्वीकृति नियंत्रक के समक्ष प्रस्तुत नहीं कर दी जाती कि वह समनुदेशन या करार उस आविष्कार से सम्बद्ध है जिसकी बाबत वह आवेदन किया गया है; अथवा

(ग) आविष्कार की बाबत दावेदार के अधिकार न्यायालय के विनिश्चय द्वारा अन्तिम रूप से स्थापित नहीं हो जाते; अथवा 

(घ) नियंत्रक, उपधारा (5) के अधीन आवेदन पर कार्यवाही किए जाने के लिए या ऐसी रीति का विनियमन करने के लिए, निदेश नहीं देता जिस रीति से उस पर कार्यवाही की जानी चाहिए ।

(4) जहां पेटेन्ट के लिए दो या दो से अधिक संयुक्त आवेदकों में से किसी एक आवेदक की मृत्यु पेटेन्ट अनुदत्त किए जाने से पूर्व किसी भी समय हो जाती है वहां नियंत्रक, उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों द्वारा इस निमित्त निवेदन किए जाने पर और मृतक के विधिक प्रतिनिधियों की सहमति से, यह निदेश दे सकेगा कि आवेदन पर आगे कार्यवाही केवल उत्तरजीवी या उत्तरजीवियों के नाम से की जाएगी । 

(5) यदि पेटेन्ट के संयुक्त आवेदकों के बीच कोई विवाद उत्पन्न होता है कि क्या या किसी रीति से आवेदन पर आगे कार्यवाही की जाए तो नियंत्रक, पक्षकरों में से किसी पक्षकार द्वारा विहित रीति से अपने को किए गए आवेदन पर और सभी सम्पृक्त पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह, आवेदन पर पक्षकारों में से केवल एक या एक से अधिक पक्षकारों के नाम से कार्यवाही किए जाने के लिए या उस रीति का विनियमन करने के लिए जिस रीति से उस पर आगे कार्यवाही की जानी चाहिए, या उन दोनों प्रयोजनों के लिए, जैसा कि मामले में अपेक्षित हो, ठीक समझे । 

 [21. अनुदत्त करने के लिए आवेदन को नियमित करने के लिए समय-(1) किसी पेटेंट के लिए किसी आवेदन का, तब तक परित्याग किया गया समझा जाएगा जब तक ऐसी अवधि के भीतर, जो विहित की जाए, आवेदक इस अधिनियम के द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित सभी अपेक्षाओं का अनुपालन नहीं कर लेता है, चाहे वह पूर्ण विनिर्देश के संबंध में हो या अन्यथा इस आवेदन के संबंध में उस तारीख से, जिसको आवेदन या पूर्ण विनिर्देश या उससे संबंधित अन्य दस्तावेजों के आक्षेपों का प्रथम कथन नियंत्रक द्वारा आवेदक को अग्रेषित किया जाता है, हो ।

स्पष्टीकरण-जहां किसी पेटेंट के लिए आवेदन या कोई विनिर्देश या किसी कन्वेन्शन आवेदन अथवा भारत को अभिहित करने वाली पेटेंट  सहयोग संधि के अधीन फाइल किए गए किसी आवेदन में आवेदन के भागरूप फाइल किया गया कोई दस्तावेज नियंत्रक द्वारा कार्यवाहियों के अनुक्रम में आवेदक को लौटा दिया जाता है वहां आवेदक के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि उसने ऐसी अपेक्षाओं का अनुपालन कर लिया है जब तक कि वह उसे पुनः फाइल नहीं कर देता है या आवेदक नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में यह साबित नहीं कर देता है कि ऐसा दस्तावेज उसके नियंत्रण के परे कारणों से फाइल नहीं किया जा सका था । 

(2) यदि उपधारा (1) के अधीन यथाविहित के अवसान पर,-

(क) कोई अपील मुख्य आविष्कार के पेटेंट के लिए आवेदन के संबंध में उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित है; या 

(ख) परिवर्धन के पेटेंट के लिए किसी आवेदन की दशा में कोई अपील, उच्च न्यायालय के समक्ष या तो उस आवेदन के संबंध में या मुख्य आविष्कार के आवेदन के संबंध में लंबित है तो वह समय, जिसके भीतर नियंत्रक की अपेक्षाओं का अनुपालन किया जाएगा, उपधारा (1) के अधीन यथाविहित अवधि के अवसान से पूर्व आवेदक द्वारा किए गए किसी आवेदन पर ऐसी तारीख तक के लिए बढ़ा दिया जाएगा जो उच्च न्यायालय अवधारित करे ।

(3) यदि वह समय जिसके भीतर उपधारा (2) में उल्लिखित अपील संस्थित की जा सकेगी, पर्यवसित नहीं हुआ है तो नियंत्रक उपधारा (1) के अधीन यथाविहित अवधि को ऐसी अवधि तक के लिए जो अवधारित की जाए, बढा़ सकेगा :

 परन्तु यह कि यदि उक्त और अवधि के दौरान कोई अपील फाइल कर दी गई है और उच्च न्यायालय ने नियंत्रक की अपेक्षाओं को अनुपालन करने के लिए समय में कोई विस्तार मंजूर कर दिया है तब अपेक्षाओं का न्यायालय द्वारा मंजूर किए गए समय के भीतर अनुपालन किया जा सकेगा ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

अध्याय 5

[पेटेंट अनुदत्त करने के लिए विरोधी कार्यवाहियां]

 [25. पेटेंट का विरोध-(1) जहां, पेटेंट के लिए कोई आवेदन प्रकाशित कर दिया गया है किन्तु पेटेंट अनुदत्त नहीं किया जाता है, वहां कोई व्यक्ति लिखित में नियंत्रक को निम्नलिखित आधारों में से किसी आधार पर, न कि किसी अन्य आधार पर, पेटेंट अनुदत्त करने के विरुद्ध विरोध के रूप में अभ्यावेदन दे सकेगा, अर्थात् यह कि-

(क) पेटेंट के आवेदक ने या उस व्यक्ति ने जिसके अधीन या मार्फत वह दावा करता है, आविष्कार को या उसके किसी भाग को उससे या ऐसे व्यक्ति से जिसके अधीन या जिसकी मार्फत वह दावा करता है, गलत ढंग से अभिप्राप्त किया है; 

(ख)  पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावाकृत आविष्कार को दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व-

(i) किसी पेटेंट के लिए किसी आवेदन के अनुसरण में भारत में 1 जनवरी, 1912 को या उसके पश्चात् फाइल किए गए किसी विनिर्देश में; या 

(ii) भारत में यह कहीं और किसी अन्य दस्तावेज में,

                प्रकाशित कर दिया गया है : 

परंतु यह कि उपखंड (ii) में निर्दिष्ट आधार वहां उपलब्ध नहीं होगा जहां ऐसे प्रकाशन से धारा 29 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के आधार पर आविष्कार का पूर्वानुमान नहीं होता है; 

(ग) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में दावाकृत आविष्कार का किसी पूर्ण विनिर्देश के किसी ऐसे दावे में दावा किया गया है जो आवेदक के दावे की पूर्विकता तारीख को या उसके पश्चात् प्रकाशित किया गया है और भारत में किसी पेटेंट के लिए किसी आवेदन के अनुसरण में फाइल किया गया है, जो ऐसा दावा है जिसकी पूर्विकता तारीख आवेदक के दावे की पूर्विकता तारीख से पूर्वतर है; 

(घ) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावाकृत आविष्कार, भारत में उस दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व सार्वजनिक रूप से ज्ञात या सार्वजनिक रूप से प्रयोग में था ।

                स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, किसी ऐसी प्रक्रिया से संबंधित किसी आविष्कार के बारे में, जिसके लिए किसी पेटेंट का दावा किया गया है, यह समझा जाएगा कि वह दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व भारत में सार्वजनिक रूप से ज्ञात हो चुका है या उसका सार्वजनिक रूप से प्रयोग हो चुका है यदि उस प्रक्रिया द्वारा निर्मित कोई उत्पाद उस तारीख से पूर्व भारत में पहले ही आयातित हो चुका है उसके सिवाय जहां ऐसा आयात युक्तियुक्त विचारण या केवल प्रयोग  के प्रयोजनों के लिए हुआ है;  

(ङ) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावाकृत आविष्कार स्पष्ट है और खंड (ख) में यथा उल्लिखित प्रकाशित विषय को ध्यान में रखते हुए या उस विषय को ध्यान में रखते हुए जो दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व भारत में प्रयोग में था, उसमें स्पष्ट रूप से कोई आविष्कार संबंधी कार्रवाई अंतर्वलित नहीं है; 

(च) पूर्ण विनिर्देश का कोई दावा, इस अधिनियम के अर्थान्तर्गत कोई आविष्कार नहीं है या उस अधिनियम के अधीन पेटेंट योग्य नहीं है; 

(छ) पूर्ण विनिर्देश, पर्याप्त रूप से और स्पष्ट रूप से आविष्कार का या उस पद्धति का, जिसके द्वारा इसका पालन किया जाना है, वर्णन नहीं करता है; 

(ज) आवेदक धारा 8 द्वारा अपेक्षित सूचना नियंत्रक को प्रकट करने में असफल रहा है या उसने ऐसी जानकारी प्रस्तुत की है जो किसी सारवान् विशिष्टि में उसकी जानकारी में गलत थी;

(झ)  कन्वेन्शन आवेदन की दशा में, यह आवेदन, आवेदक द्वारा या किसी व्यक्ति द्वारा, जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है कन्वेन्शन देश में किए गए आविष्कार के संरक्षण के लिए किए गए प्रथम आवेदन की तारीख से बारह मास के भीतर नहीं किया गया था;

(ञ) पूर्ण विनिर्देश, आविष्कार के लिए उपयोग किए गए जैव पदार्थ के स्रोत या भौगोलिक उद्गम को प्रकट नहीं करता है या गलत रूप में उल्लिखित करता है; 

(ट) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में जहां तक दावा किया गया है, आविष्कार भारत में या किसी स्थानीय या स्वदेशी समुदाय के भीतर या अन्यथा उपलब्ध मौखिक या अन्य जानकारी को ध्यान में रखते हुए प्रत्याशित है,

और नियंत्रक यदि, ऐसे व्यक्ति द्वारा सुनवाई के लिए अनुरोध किया जाए तो उसे सुनेगा और ऐसे अभ्यावेदन पर ऐसी रीति से और ऐसी अवधि के भीतर जो विहित की जाए उसका निपटान करेगा ।  

(2) पेटेंट अनुदत्त करने के पश्चात् किसी समय कितु किसी पेंटेट को अनुदत्त करने की तारीख के प्रकाशन से एक वर्ष की अवधि के अवसान से पूर्व, कोई हितबद्ध व्यक्ति नियंत्रक को, विहित रीति में निम्नलिखित आधारों में से किसी पर विरोध की सूचना दे सकेगा, अर्थात् यह कि :-

(क)  पेटेंटधारी या उस व्यक्ति ने, जिसके अधीन या मार्फत वह दावा करता है, आविष्कार को या उसके किसी भाग को उससे या ऐसे व्यक्ति से जिसके अधीन या जिसकी मार्फत वह दावा करता है, गलत ढंग से अभिप्राप्त किया है;

(ख) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावाकृत आविष्कार को दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व- 

(i) किसी पेटेंट के लिए किसी आवेदन के अनुसरण में भारत में 1 जनवरी, 1912 को या उसके पश्चात् फाइल किए गए किसी विनिर्देश में; या  

(ii) भारत में या कहीं और किसी अन्य दस्तावेज में,

                प्रकाशित कर दिया गया है : 

परंतु यह कि उपखंड (ii) में निर्दिष्ट आधार वहां उपलब्ध नहीं होगा जहां ऐसे प्रकाशन से धारा 29 की उपधारा (2) या उपधारा (3) के आधार पर आविष्कार का पूर्वानुमान नहीं होता है; 

(ग) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में दावाकृत आविष्कार का किसी पूर्ण विनिर्देश के किसी ऐसे दावा में दावा किया गया है जो पेटेंटधारी के दावे की पूर्विकता तारीख को या उसके पश्चात् प्रकाशित किया गया था और भारत में किसी पेटेंट के लिए आवेदन के अनुसरण में फाइल किया गया था, जो ऐसा दावा जिसकी पूर्विकता तारीख पेटेंटधारी के दावे की पूर्विकता तारीख से पूर्वतर है;

(घ) पूर्व विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावाकृत आविष्कार भारत में उस दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व सार्वजनिक रूप से ज्ञात या सार्वजनिक रूप से प्रयोग में था ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनों के लिए, किसी ऐसी प्रक्रिया से संबंधित किसी आविष्कार के बारे में, जिसके लिए कोई पेटेंट अनुदत्त किया जाता है, यह समझा जाएगा  कि वह दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व भारत में सार्वजनिक रूप से ज्ञात हो चुका है या सार्वजनिक रूप से प्रयोग हो चुका है यदि उस प्रक्रिया द्वारा निर्मित कोई उत्पाद उस तारीख से पूर्व भारत में पहले ही आयातित हो चुका है उसके सिवाय जहां ऐसा आयात युक्तियुक्त विचारण या केवल प्रयोग के प्रयोजनों के लिए हुआ है;

(ङ) पूर्व विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावाकृत आविष्कार स्पष्ट है और खंड (ख) में यथा उल्लिखित प्रकाशित विषय को ध्यान में रखते हुए या उस विषय को ध्यान में रखते हुए जो दावे की पूर्विकता की तारीख से पूर्व भारत में प्रयोग में था, स्पष्ट रूप से कोई नवीकरण चरण अंतर्वलित नहीं है;

 (च) पूर्ण विनिर्देश का कोई दावा इस अधिनियम के अर्थान्तर्गत कोई आविष्कार नहीं है, या इस अधिनियम के अधीन पेटेंट योग्य नहीं है;  

(छ) पूर्ण विनिर्देश पर्याप्त रूप से और स्पष्ट रूप से आविष्कार का या उस पद्धति का जिसके द्वारा इसका पालन किया जाना है, वर्णन नहीं करता है;  

(ज) पेटेंटधारी धारा 8 द्वारा अपेक्षित सूचना नियंत्रक को प्रकट करने में असफल रहा है या उसने ऐसी जानकारी प्रस्तुत की है जो किसी सारवान् विशिष्टि में उसकी जानकारी में गलत थी ;

(झ) कन्वेन्शन आवेदन पर अनुदत्त किसी पेटेंट की दशा में, पेटेंट के लिए आवेदन किसी कन्वेन्शन देश या भारत में पेटेंट द्वारा या ऐसे व्यक्ति द्वारा जिससे वह हक प्राप्त करता है, किए गए आविष्कार की सुरक्षा के लिए पहले आवेदन की तारीख से बारह मास के भीतर नहीं किया गया था ; 

(ञ) पूर्ण विनिर्देश, आविष्कार में प्रयोग की गई जैव विज्ञान सामग्री के संसाधन और भौगोलिक उद्गम को प्रकट नहीं करता है या गलत रूप में उल्लिखित करता है;

(ट) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावेकृत आविष्कार भारत में या नहीं और किसी स्थानीय या स्वदेशी समाज के भीतर उपलब्ध ज्ञान या अन्यथा को ध्यान में रखते हुए पूर्वानुमानित था,

किंतु न कि किसी अन्य आधार पर ।

(3) (क) जहां विरोध की कोई ऐसी सूचना उपधारा (3) के अधीन सम्यक् रूप से दी जाती है वहां नियंत्रक, पेटेंटधारी को अधिसूचित करेगा । 

(ख) विरोध की सूचना की प्राप्ति पर नियंत्रक, लिखित में आदेश द्वारा, विरोध बोर्ड रूप में ज्ञात एक बोर्ड का गठन करेगा जिसमें ऐसे अधिकारी होंगे जो अवधारित किए जाएं और विरोध की ऐसी सूचना को दस्तावेजों सहित उस बोर्ड को परीक्षा के लिए निर्देशित करेगा और उसकी सिफारिशों को नियंत्रक को प्रस्तुत करेगा । 

(ग) खंड (ख) के अधीन गठित प्रत्येक विरोध बोर्ड ऐसी प्रक्रिया के अनुसरण में, जो विहित की जाए, परीक्षा करेगा । 

(4) विरोध बोर्ड की सिफारिश प्राप्त करने पर और पेटेंटधारी और विरोधी को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् नियंत्रक पेटेंट को बनाए रखने या उसमें संशोधन करने या उसे प्रतिसंहृत करने का आदेश देगा । 

(5) उपधारा (2) के खंड (घ) या खंड (ङ) में उल्लिखित आधार की बाबत उपधारा (4) के अधीन आदेश पारित करने समय, नियंत्रक किसी व्यक्तिगत दस्तावेज या गुप्त विचारण या गुप्त प्रयोग को ध्यान में नहीं रखेगा । 

(6) यदि नियंत्रक उपधारा (5) के अधीन ऐसा आदेश पारित करता है कि पेटेंट विनिर्देश या किसी अन्य दस्तावेज के संशोधन के अधीन रखा जाएगा तो पेटेंट तदनुसार संशोधित होगा । 

26. “अभिप्राप्त करने" के मामेल में नियंत्रक पेटेंट को विरोधी के पेटेंट के रूप में समझ सकेगा-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी विरोधी कार्यवाही में नियंत्रक यह पाता है कि-

(क)  पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में अभी तक दावाकृत आविष्कार को धारा 25 की उपधारा (2) के खंड (क) में उपवर्णित रीति में विरोधी से अभिप्राप्त किया गया था और पेटेंट उस आधार पर चलन में है तो वह ऐसे विरोधी द्वारा विनिर्दिष्ट रीति में अनुरोध पर यह निदेश दे सकेगा कि पेटेंट विरोधी के नाम में संशोधित होगा; 

(ख) पूर्ण विनिर्देश में वर्णित किसी आविष्कार का कोई भाग विरोधी से अभिप्राप्त किया गया था तो वह यह अपेक्षा करते हुए कोई आदेश पारित कर सकेगा कि विनिर्देश में आविष्कार के उस भाग को अपवर्जित करते हुए संशोधन किया जा सकेगा । 

(2) जहां किसी विरोधी ने, उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट किसी पूर्ण विनिर्देश के संशोधन की अपेक्षा करने वाले नियंत्रक के आदेश की तारीख से पूर्व किसी आविष्कार के पेटेंट के लिए कोई आवेदन फाइल किया है जिसमें संपूर्ण आविष्कार या उसका कोई भाग उससे अभिप्राप्त किया गया धारित है और ऐसा आवेदन लंबित है वहां नियंत्रक ऐसे आवेदन और विनिर्देश को जहां तक उनका संबंध उससे अभिप्राप्त किए गए धारित आविष्कार से है, जो पूर्ण विनिर्देश के दावों का पूर्विकता तारीखों से संबंधित इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उस तारीख को फाइल किया गया मान सकेगा, जिसको तत्समान दस्तावेज, पूर्वतर आवेदन में पेटेंटधारी द्वारा फाइल किया गया था या फाइल किया गया समझा गया था किन्तु सभी अन्य प्रयोजनों के लिए विरोधी के आवेदन पर इस अधिनियम के अधीन पेटेंट के लिए किसी आवेदन के रूप में कार्यवाही की जाएगी ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

28. पेटेन्ट में आविष्कर्ता का उस हैसियत में उल्लेख किया जाना-(1) यदि इस धारा के उपबन्धों के अनुसार किए गए निवेदन पर या किए गए दावे पर नियन्त्रक का यह समाधान हो जाता है कि- 

(क) वह व्यक्ति जिसकी बाबत या जिसके द्वारा निवेदन या दावा किया गया है, उस आविष्कार का या उस आविष्कार के पर्याप्त भाग का, आविष्कर्ता है जिसकी बाबत पेटेन्ट के लिए आवेदन किया गया है; तथा 

(ख) पेटेन्ट के लिए आवेदन उनके आविष्कर्ता होने का प्रत्यक्ष परिणाम है,

तो नियन्त्रक, इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, आवेदन के अनुसरण से अनुदत्त किसी पेटेन्ट में, पूर्ण विनिर्देश में और पेटेन्ट के रजिस्टर में उसका आविष्कर्ता की हैसियत में उल्लेख कराएगा :

                परन्तु इस धारा के अधीन किसी व्यक्ति का आविष्कर्ता की हैसियत में उल्लेख होने से पेटेन्ट के अधीन उसे न तो कोई अधिकार प्रदत्त होंगे और न उसका अल्पीकरण होगा । 

(2) यह निवेदन कि किसी व्यक्ति का यथापूर्वोक्त हैसियत में उल्लेख किया जाए, पेटेन्ट के आवेदक द्वारा या (जहां वह व्यक्ति जिसकी बाबत यह अभिकथित है कि वह आविष्कर्ता है, आवेदक या आवेदकों में से कोई आवेदक नहीं है, वहां) आवेदक और उस व्यक्ति द्वारा विहित रीति से किया जा सकेगा ।

(3) यदि (उस व्यक्ति से भिन्न जिसकी बाबत प्रश्नगत आवेदन से सम्बन्धित निवेदन उपधारा (2) के अधीन किया जा चुका है) कोई व्यक्ति यह चाहता है कि उसका यथापूर्वोक्त हैसियत में उल्लेख किया जाए तो वह विहित रीति से उस निमित्त दावा कर सकेगा । 

 [(4) इस धारा के पूर्वगामी उपबंधों के अधीन कोई अनुरोध या दावा पेटेंट अनुदत्त किए जाने से पूर्व किया जाएगा ।]

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

 

(6)  [जहां] उपधारा (3) के अधीन दावा किया जाता है, वहां नियंत्रक उस दावे की सूचना पेटेन्ट के हर आवेदक को             (जो दावेदार न हो) और ऐसे किसी अन्य व्यक्ति को जिसे नियन्त्रक हितबद्ध समझे, देगा और उपधारा (2) या उपधारा (3) के अधीन किए गए किसी निवेदन या किए गए किसी दावे का विनिश्चय करने से पूर्व नियन्त्रक, यदि अपेक्षा की जाए तो, उस व्यक्ति को जिसकी बाबत या जिसके द्वारा निवेदन या दावा किया गया है और उपधारा (3) के अधीन किसी दावे की दशा में किसी ऐसे व्यक्ति का जिसे दावे की सूचना पूर्वोक्त रीति से दी गई है, सुनेगा । 

(7) जहां किसी व्यक्ति का इस धारा के अनुसरण में आविष्कर्ता की हैसियत में उल्लेख किया गया है वहां ऐसा कोई अन्य व्यक्ति जो यह अभिकथित करता है कि उसका इस प्रकार उल्लेख नहीं किया जाना चाहिए था, किसी भी समय उस आशय के प्रमाणपत्र के लिए नियन्त्रक को आवेदन कर सकेगा और नियंत्रक, यदि अपेक्षा की जाए, तो ऐसे किसी व्यक्ति को सुनने के पश्चात् जिसे वह हितबद्ध समझे, ऐसा प्रमाणपत्र दे सकेगा और यदि वह ऐसा करता है तो वह विनिर्देश और रजिस्टर को तदनुसार परिशुद्ध करेगा ।

अध्याय 6

पूर्वानुमान

29. पूर्व प्रकाशन द्वारा पूर्वानुमान-(1) ऐसा आविष्कार, जिसका दावा पूर्ण विनिर्देश में किया गया है केवल इस कारण कि वह आविष्कार पेटेन्ट के लिए भारत में किए गए और 1 जनवरी, 1912 के पूर्व की तारीख के किसी आवेदन के अनुसरण में फाइल किए गए विनिर्देश में प्रकाशित किया गया था, पूर्वानुमानित नहीं समझा जाएगा ।

(2) इसमें इसके पश्चात् जैसा उपबन्धित है उसके अधीन रहते हुए, ऐसा आविष्कार जिसका दावा पूर्ण विनिर्देश में किया गया है केवल इस कारण कि वह आविष्कार विनिर्देश के सुसंगत दावे की पूर्विकता तारीख से पहले प्रकाशित किया गया था, उस दशा से पूर्वानुमानित नहीं समझा जाएगा जिसमें पेटेन्टधारी या पेटेन्ट का आवेदन यह साबित कर देता है कि- 

(क) प्रकाशित बात उससे या (जहां वह स्वयं वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता नहीं है वहां) किसी ऐसे व्यक्ति से, जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है, अभिप्राप्त की गई थी और वह उसकी सहमति के या ऐसे किसी व्यक्ति की सहमति के बिना प्रकाशित की गई थी; तथा 

(ख) जहां पेटेन्टधारी ने या पेटेन्ट के आवेदक ने या किसी ऐसे व्यक्ति ने, जिससे उसका हक व्युत्पतन्न होता है उस प्रकाशन की जानकारी पेटेन्ट के लिए आवेदन की तारीख से पूर्व अथवा कन्वेंशन आवेदन की दशा में, कन्वेंशन देश में संरक्षण के लिए आवेदन की तारीख से पूर्व प्राप्त की थी वहां, यथास्थिति, आवेदन अथवा कन्वेंशन देश में आवेदन, तत्पश्चात् युक्तियुक्त रूप से यथासाध्य शीघ्र किया गया था :

                परन्तु यह उपधारा उस दशा में लागू नहीं होगी जिसमें वह आविष्कार, दावे की पूर्विकता तारीख से पूर्व या तो पेटेन्टधारी द्वारा या पेटेन्ट के आवेदक द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है  अथवा पेटेन्टधारी की या पेटेन्ट के आवेदक की या किसी ऐसे व्यक्ति की जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है, सहमति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, युक्तियुक्त परीक्षण के प्रयोजन से भिन्न प्रयोजन के लिए, भारत में वाणिज्यिक रूप से क्रियान्वित किया गया है । 

(3) जहां पूर्ण विनिर्देश, ऐसे व्यक्ति द्वारा जो वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता है या जिसका हक उससे व्युत्पन्न होता है किए गए पेटेन्ट के लिए आवेदन के अनुसरण में फाइल किया जाता है वहां वह आविष्कार जिसका दावा उस विनिर्देश में किया गया है, केवल इस कारण कि उसी आविष्कार की बाबत पेटेन्ट  के लिए कोई अन्य आवेदन उस व्यक्ति के अधिकारों का उल्लंघन करके किया गया था या केवल इस कारण कि उस अन्य आवेदन से सम्बद्ध आवेदक द्वारा या उस आवेदक द्वारा किसी आविष्कार के किसी प्रकटन के परिणामस्वरूप किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, आविष्कार का उपयोग या प्रकाशन, उस अन्य आवेदन के फाइल करने की तारीख के पश्चात्, उस व्यक्ति की सहमति के बिना किया गया था, पूर्वानुमानित नहीं समझा जाएगा ।  

30. सरकार को पूर्व संसूचना द्वारा पूर्वानुमान-कोई आविष्कार, जिसका दावा पूर्ण विनिर्देश में किया गया है, सरकार की अथवा आविष्कार या उसके गुणागुण का अन्वेषण करने के लिए सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को आविष्कार की संसूचना के कारण ही या अन्वेषण के प्रयोजन के लिए, ऐसी संसूचना के परिणामस्वरूप की गई किसी बात के कारण ही पूर्वानुमानित नहीं समझा जाएगा । 

31. सार्वजनिक प्रदर्शन, आदि द्वारा पूर्वानुमान-कोई आविष्कार जिसका दावा पूर्ण विनिर्देश में किया गया है- 

(क) किसी औद्योगिक या अन्य प्रदर्शनी में, जिस पर इस धारा के उपबन्धों का विस्तार केन्द्रीय सरकार ने राजपत्र में अधिसूचना द्वारा कर दिया है, वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता की या ऐसे व्यक्ति की, जिसका हक उससे व्युत्पन्न होता है, सहमति से आविष्कार के प्रदर्शन के, या ऐसी प्रदर्शनी के प्रयोजन के लिए उसे उस स्थान पर जहां वह प्रदर्शनी हो रही है, उसकी सहमति से उसके उपयोग के; अथवा 

(ख) यथापूर्वोक्त किसी प्रदर्शनी में आविष्कार के प्रदर्शन या उपयोग के परिणामस्वरूप आविष्कार के किसी वर्णन के प्रकाशन के; अथवा 

(ग) यथापूर्वोक्त किसी प्रदर्शनी में आविष्कार का प्रदर्शन या उपयोग किए जाने के पश्चात् और प्रदर्शनी की अवधि के दौरान किसी व्यक्ति द्वारा वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता की या ऐसे व्यक्ति की जिसका हक उससे व्युत्पतन्न होता है सहमति के बिना उसका उपयोग किए जाने के; अथवा 

(घ) किसी विद्वत समाज के समक्ष वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता द्वारा पढ़े गए अथवा उसकी सहमति से ऐसे समाज की रिपोर्टों में प्रकाशित किसी निबन्ध में आविष्कार के वर्णन के, 

कारण ही उस दशा में पूर्वानुमानित नहीं समझा जाएगा जिसमें पेटेंट के लिए आवेदन, वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता द्वारा या उस व्यक्ति द्वारा, जिसका हक उससे व्युत्पन्न होता है, यथास्थिति, प्रदर्शनी के खुलने या निबन्ध के पढ़े जाने या प्रकाशन से  [बारह मास तक, न कि उसके पश्चात्ट कर दिया जाए ।

32. सार्वजनिक क्रियान्वयन द्वारा पूर्वानुमान-कोई आविष्कार, जिसका दावा पूर्ण विनिर्देश में किया गया है, केवल इस कारण पूर्वानुमानित नहीं समझा जाएगा कि विनिर्देश के सुसंगत दावे की पूर्विकता तारीख से पूर्व एक वर्ष के भीतर किसी भी समय आविष्कार का भारत में सार्वजनिक क्रियान्वयन,-

(क)  पेटेन्टधारी द्वारा या पेटेन्ट के आवेदक द्वारा या ऐसे व्यक्ति द्वारा जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है, किया गया था; अथवा

(ख) पेटेन्टधारी की या पेटेन्ट के आवेदक की या किसी ऐसे व्यक्ति की जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है, सहमति से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा, किया गया था,

यदि क्रियान्वयन केवल युक्तियुक्त परीक्षण के प्रयोजन के लिए किया गया था और आविष्कार की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए, उस प्रयोजन के लिए क्रियान्वयन का सार्वजनिक रूप से किया जाना युक्तियुक्त रूप से आवश्यक था ।  

33. अनन्तिम विनिर्देश के पश्चात् उपयोग और प्रकाशन द्वारा पूर्वानुमान-(1) जहां पूर्ण विनिर्देश ऐसे आवेदन के अनुसरण में जिसके साथ अनन्तिम विनिर्देश था, फाइल किया जाता है, या उस पर आगे कार्यवाही की जाती है अथवा जहां आवेदन के साथ फाइल किया गया पूर्ण विनिर्देश धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन दिए गए निदेश के आधार पर अनन्तिम विनिर्देश माना जाता है वहां इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, नियंत्रक केवल इस कारण पेटेन्ट अनुदत्त करने से इंकार नहीं करेगा और पेटेन्ट प्रतिसंहृत या अविधिमान्य नहीं किया जाएगा कि अनन्तिम विनिर्देश में या यथापूर्वोक्त ऐसे विनिर्देश में जो अनन्तिम विनिर्देश माना गया है, वर्णित कोई बात उस विनिर्देश के फाइल किए जाने की तारीख के पश्चात् किसी भी समय भारत में उपयोग में लाई गई थी अथवा भारत में या अन्यत्र प्रकाशित की गई थी । 

(2) जहां कन्वेशन आवेदन के अनुसरण में पूर्ण विनिर्देश फाइल किया जाता है वहां इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, नियंत्रक केवल इस कारण पेटेन्ट अनुदत्त करने से इन्कार नहीं करेगा और पेटेन्ट प्रतिसंहृत या अविधिमान्य नहीं किया जाएगा कि कन्वेशन देश में संरक्षण के लिए किसी आवेदन में प्रकट की गई कोई बात जिस पर कन्वेशन आधारित है, उस संरक्षण के लिए आवेदन की तारीख के पश्चात् किसी भी समय भारत में उपयोग में लाई गई थी अथवा भारत में या अन्यत्र प्रकाशित की गई थी । 

34. यदि परिस्थितियां वही हैं जो धारा 29, 30, 31 और 32 में वर्णित हैं तो पूर्वानुमान का किया जाना-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, केवल किन्हीं ऐसी परिस्थितियों के कारण, जिनसे धारा 29 या धारा 30 या धारा 31 या धारा 32 के आधार पर किसी ऐसे आविष्कार का, जिसका दावा विनिर्देश में किया गया है, पूर्वानुमान नहीं होता, नियन्त्रक  । । । पेटेन्ट अनुदत्त करने से इन्कार नहीं करेगा और कोई पेटेन्ट प्रतिसंहृत या अविधिमान्य नहीं किया जाएगा । 

अध्याय 7

कतिपय आविष्कारों की गोपनीयता के लिए उपबंध

35. रक्षा के प्रयोजनों के लिए सुसंगत आविष्कारों के सम्बन्ध में गोपनीयता के निदेश-(1) जहां इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या उसके पश्चात् पेटेन्ट के लिए किए गए आवेदन की बाबत नियंत्रक को यह प्रतीत होता है कि आविष्कार उस वर्ग का है जिसका रक्षा के प्रयोजनों के लिए सुसंगत होना केन्द्रीय सरकार द्वारा उसको अधिसूचित किया गया है, या जहां आविष्कार उसको अन्यथा इस प्रकार सुसंगत प्रतीत होता है वहां वह उस आविष्कार की बाबत जानकारी के प्रकाशन का, या  । । । ऐसी जानकारी संसूचित किए जाने का प्रतिषेध या निर्बन्धन करने के लिए निदेश दे सकेगा । 

(2) जहां नियंत्रक ऐसे कोई निदेश देता है जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट किए गए हैं वहां वह उस आवेदन और उन निदेशों की सूचना केन्द्रीय सरकार को देगा और केन्द्रीय सरकार, ऐसी सूचना के प्राप्त होने पर, यह विचार करेगी कि क्या आविष्कार का प्रकाशन भारत की रक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा और यदि ऐसा विचार करने पर उसे यह प्रतीत होता है कि आविष्कार का प्रकाशन इस प्रकार प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा तो वह नियंत्रक को उस आशय की सूचना देगी जो तब उन निदेशों को प्रतिसंहृत करेगा और आवेदक को तदनुसार अधिसूचित करेगा ।

(3) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि वह आविष्कार, जिसके बारे में नियंत्रक ने उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश नहीं दिए हैं, रक्षा के प्रयोजनों के लिए सुसंगत हैं वहां वह नियंत्रक को,  [पेटेंट के अनुदान से पूर्वट किसी भी समय उस आशय की बाबत अधिसूचित कर सकेगी और तब उस उपधारा के उपबन्ध इस प्रकार लागू होंगे मानो वह आविष्कार उस वर्ग का हो जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया गया हो और तदनुसार नियंत्रक अपने द्वारा जारी किए गए निदेशों की सूचना केन्द्रीय सरकार को देगा । 

36. गोपनीयता के निदेशों का कालिकतः पुनर्विलोकन किया जाना- [(1) इस प्रश्न पर कि क्या कोई आविष्कार, जिसके बाबत धारा 35 के अधीन निदेश दिए गए हैं, रक्षा के प्रयोजनों के लिए सुसंगत बना हुआ है,  [छह मासट के अंतरालों पर या आवेदक द्वारा किए गए ऐसे अनुरोध पर जो नियंत्रक द्वारा युक्तियुक्त पाया जाए, केन्द्रीय सरकार द्वारा पुनर्विचार किया जाएगा और यदि ऐसे पुनर्विचार पर केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि आविष्कार का प्रकाशन अब भारत की रक्षा पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा या किसी विेदेशी आवेदक द्वारा फाइल किए गए आवेदन की दशा में यह पाया जाता है कि आविष्कार भारत से बाहर प्रकाशित किया जाता है तो वह तुरंत नियंत्रक को उक्त निदेश का प्रतिसंहरण करने की सूचना देगा और नियंत्रक अपने द्वारा पहले दिए गए निदेशों को प्रतिसंहृत करेगा ।] 

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए हर पुनर्विचार का परिणाम, उतने समय के भीतर और ऐसी रीति से जो विहित की जाए, आवेदक को संसूचित किया जाएगा । 

37. गोपनीयता के निदेशों के परिणाम-(1) जब तक कि धारा 35 के अधीन दिए गए कोई निदेश किसी आवेदन की बाबत प्रवृत्त रहते हैं तब तक-

(क)  नियंत्रक  [उसे अनुदत्त करने] से इन्कार करने वाला आादेश नहीं करेगा; तथा 

(ख) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, उसकी बाबत नियंत्रक द्वारा किए गए किसी आदेश से कोई अपील नहीं की जा सकती : 

 [परंतु उन निदेशों के अधीन रहते हुए उस आवेदन पर कार्यवाही, पेटेंट अनुदत्त किए जाने के प्रथम तक हो सकेगी, किन्तु पेटेंट अनुदत्त किए जाने के लिए सही पाए गए आवेदन और विनिर्देशन प्रकाशित नहीं किए जाएंगे और उस आवेदन के अनुसरण में कोई भी पेटेंट अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।]

(2) जहां ऐसे आविष्कार के जिसकी बाबत धारा 35 के अधीन निदेश दिए गए हैं, पेटेन्ट के लिए आवेदन के अनुसरण में फाइल किया गया पूर्व विनिर्देश उन निदेशों के प्रवृत्त बने रहने के दौरान 5[पेटेंट अनुदत्त किए जाने के लिए सही पाया जाता हैट वहां- 

(क) यदि उन निदेशों के प्रवृत्त बने रहने के दौरान उस आविष्कार का कोई उपयोग सरकार द्वारा या उसकी ओर से या उसके आदेश से किया जाता है तो धारा 100, धारा 101 और धारा 103 के उपबन्ध उस उपयोग के सम्बन्ध में इस प्रकार लागू होंगे मानो पेटेन्ट उस आविष्कार के लिए अनुदत्त किया गया हो; तथा 

(ख) यदि केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि उन निदेशों के प्रवृत्त बने रहने के कारण पेटेन्ट के आवेदक को कोई कठिनाई सहन करनी पड़ी है तो केन्द्रीय सरकार उसे तोषण के रूप में ऐसा संदाय (यदि कोई हो) कर सकेगी जो केन्द्रीय सरकार को, आविष्कार की नवीनता और उपयोगिता और उस प्रयोजन को जिसके लिए वह परिकल्पित है और किन्हीं अन्य सुसंगत परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, युक्तियुक्त प्रतीत होता है ।   

(3) जहां ऐसे आवेदन के अनुसरण में जिसकी बाबत धारा 35 के अधीन निदेश दिए गए हैं, पेटेन्ट अनुदत्त किया जाता है वहां उस अवधि की बाबत जिसके दौरान वे निदेश प्रवृत्त थे, कोई नवीकरण फीस संदेय नहीं होगी ।

38. गोपनीयता के निदेशों का प्रतिसंहरण और समय का बढ़ाया जाना-जब धारा 35 के अधीन दिया गया कोई निदेश नियंत्रक द्वारा प्रतिसंहृत किया जाता है तब इस अधिनियम के ऐसे किसी उपबन्ध के होते हुए भी, जिसमें वह समय विनिर्दिष्ट हो, जिसके भीतर पेटेन्ट के लिए आवेदन के सम्बन्ध में कोई कार्रवाई की जानी चाहिए या कोई कार्य किया जाना चाहिए, नियंत्रक आवेदन के सम्बन्ध में इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन किए जाने के लिए अपेक्षित या प्राधिकृत किसी बात को करने के लिए ऐसी शर्तों (यदि कोई हों) के अधीन जिन्हें अधिरोपित करना वह ठीक समझे, समय बढ़ा सकेगा चाहे उस समय का अवसान पहले हो                    गया है या नहीं । 

 [39. निवासियों द्वारा भारत से बाहर पेटेंट के लिए कोई आवेदन पूर्व अनुज्ञा के बिना नहीं किया जाना-(1) भारत में निवासी कोई व्यक्ति, विहित रीति में मांगी गई और नियंत्रक द्वारा या उसकी ओर से अनुदत्त किसी लिखित अनुज्ञा के प्राधिकार के अधीन के सिवाय किसी आविष्कार के पेटेंट के अनुदत्त किए जाने के लिए भारत के बाहर तब तक कोई आवेदन नहीं करेगा और न कराएगा जब तक कि- 

(क) उसी आविष्कार के पेटेंट के लिए भारत में आवेदन, भारत के बाहर किए गए आवेदन के कम से कम छह सप्ताह पूर्व न कर दिया गया हो; और 

(ख) भारत में उस आवेदन के संबंध में और धारा 35 की उपधारा (1) के अधीन या तो कोई निदेश नहीं दिया गया है या ऐसी सभी निदेश प्रतिसंहृत कर लिए गए हैं । 

(2) नियंत्रक ऐसे प्रत्येक आवेदन का निपटारा ऐसी अवधि के भीतर करेगा, जो विहित की जाए :

परन्तु यदि आविष्कार प्रतिरक्षा प्रयोजन या परमाणु ऊर्जा के लिए सुसंगत है तो नियंत्रक केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति के बिना अनुज्ञा प्रदान नहीं करेगा ।  

(3) यह धारा ऐसे आविष्कार के संबंध में लागू नहीं होगी जिसके लिए संरक्षण हेतु आवेदन पहले भारत के बाहर के निवासी किसी व्यक्ति द्वारा भारत के बाहर किसी देश में फाइल कर दिया गया है ।]

40. धारा 35 या धारा 39 के उल्लंघन के लिए दायित्व-अध्याय 20 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, यदि पेटेन्ट के किसी आवेदन की बाबत कोई व्यक्ति नियंत्रक द्वारा धारा 35 के अधीन दिए गए गोपनीयता के बारे में किसी निदेश का उल्लंघन करता है  [या धारा 39 का उल्लंघन करके पेटेंट के अनुदत्त किए जाने के लिए भारत के बारह आवेदन करता है या कराता हैट तो इस अधिनियम के पेटेन्ट के लिए आवेदन के बारे में यह समझा जाएगा कि उसका परित्याग कर दिया गया है और अनुदत्त पेटेंट, यदि कोई हो, धारा 64 के अधीन प्रतिसंहरणीय होगा । 

41. नियंत्रक और केन्द्रीय सरकार के आदेशों का अन्तिम होना-गोपनीयता के बारे में निदेश देने वाले नियंत्रक के सभी आदेश और साथ ही केन्द्रीय सरकार के इस अध्याय के अधीन सभी आदेश अन्तिम होंगे और वे किसी भी न्यायालय में किसी भी आधार पर प्रश्नगत नहीं किए जाएंगे । 

42. सरकार को प्रकटन के बारे में व्यावृत्तियां-इस अधिनियम की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह, यह विचार करने के लिए कि इस अध्याय के अधीन कोई आदेश किया जाना चाहिए या नहीं अथवा इस प्रकार किया गया कोई आदेश प्रतिसंहृत किया जाना चाहिए या नहीं, आवेदन या विनिर्देश की परीक्षा करने के प्रयोजन के लिए, नियंत्रक द्वारा केन्द्रीय सरकार को किसी ऐसी जानकारी के प्रकटन को रोकती है जो किसी पेटेन्ट के लिए आवेदन या उसके अनुसरण में फाइल किए गए किसी विनिर्देश के सम्बन्ध में है ।

अध्याय 8

[पेटेन्टों का अनुदान और उसके द्वारा प्रदत्त अधिकार]

 [43. पेटेंटों का अनुदान-(1) जहां पेटेंट के लिए कोई आवेदन पेटेंट के अनुदान के लिए नहीं पाया गया है और या तो- 

(क) नियंत्रक द्वारा, इस अधिनियम द्वारा उसमें निहित किसी शक्ति के आधार पर आवेदन को अस्वीकार नहीं किया गया है; या

(ख) आवेदन इस अधिनियम के किसी उपबंध के उल्लंघन में नहीं पाया जाता है,

तो वहां पेटेंट आवेदक को अथवा संयुक्त आवेदन की दशा में, आवेदकों को संयुक्त रूप से पेटेंट कार्यालय की मुद्रा के साथ यथा संभवशीघ्र अनुदत्त किए जाएगा और वह तारीख जिसको पेटेंट अनुदत्त किया जाता है, रजिस्टर में प्रविष्ट की जाएगी । 

(2) नियंत्रक, पेटेंट अनुदत्त किए जाने पर, इस तथ्य को प्रकाशित करेगा कि पेटेंट अनुदत्त कर दिया गया है और तत्पश्चात् आवेदन, विनिर्देश और उनसे संबंधित अन्य दस्तावेज लोक निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे ।]

44. मूल आवेदक को अनुदत्त पेटेन्ट का संशोधन-जहां इस अधिनियम के अधीन किए गए आवेदन के अनुसरण में किसी पेटेंट के  [अनुदत्त]  किए जाने के पश्चात् किसी भी समय नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि पेटेन्ट के [अनुदत] किए जाने के पूर्व उस व्यक्ति की जिसको पेटेन्ट अनुदत्त किया गया है, मृत्यु हो गई थी या निगमित निकाय की दशा में उसका अस्तित्व नहीं रह गया था वहां नियंत्रक उस व्यक्ति के नाम के स्थान पर ऐसे व्यक्ति का नाम प्रतिस्थापित करके जिसको पेटेन्ट अनुदत्त किए जाना चाहिए था, पेटेन्ट का संशोधन कर सकेगा और पेटेन्ट तदनुसार प्रभावी होगा और सदैव से प्रभावी रहा हुआ समझा जाएगा ।

45. पेटेन्ट की तारीख- [(1) इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक पेटेन्ट पर वह तारीख डाली जाएगी जिसको पेटेंट के लिए आवेदन फाइल किया गया था ।]

(2) हर पेटेन्ट की तारीख रजिस्टर में दर्ज की जाएगी । 

(3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी,  [आवेदन को प्रकाशन की तारीखट के पूर्व किए गए किसी अतिलंघन के बारे में कोई भी वाद या अन्य कार्यवाही न तो प्रारम्भ की जाएगी और न चलाई जाएगी । 

46. पेटेन्ट का प्ररूप, विस्तार और प्रभाव-(1) हर पेटेन्ट विहित प्ररूप में होगा और भारत में सर्वत्र प्रभावी होगा ।

(2) एक पेटेन्ट केवल एक आविष्कार के लिए अनुदत्त किया जाएगा :

परन्तु कोई व्यक्ति इस बात के लिए सक्षम नहीं होगा कि वह किसी वाद या अन्य कार्यवाही में पेटेन्ट पर इस आधार पर कोई आक्षेप करे कि वह एक से अधिक आविष्कारों के लिए अनुदत्त किया गया है । 

47. पेटेन्टों के अनुदान का कतिपय शर्तों के अधीन होना-इस अधिनियम के अधीन किसी पेटेन्ट का अनुदान इस शर्त के अधीन होगा कि- 

(1) किसी मशीन, साधित्र या अन्य वस्तु का जिसकी बाबत पेटेन्ट अनुदत्त किया गया है, या किसी वस्तु का जिसका निर्माण ऐसी प्रक्रिया का उपयोग करके किया गया है जिसकी बाबत पेटेन्ट अनुदत्त किया गया है, आयात या निर्माण, सरकार द्वारा या उसकी ओर से केवल उसके अपने उपयोग के प्रयोजन के लिए किया जा सकेगा; 

(2) किसी प्रक्रिया का जिसकी बाबत पेटेन्ट अनुदत्त किया गया है उपयोग सरकार द्वारा या उसकी ओर से केवल उसके अपने उपयोग के प्रयोजन के लिए, किया जा सकेगा;

(3) किसी मशीन, साधित्र या अन्य वस्तु का जिसकी बाबत पेटेन्ट अनुदत्त किया गया है या किसी वस्तु का जिसका निर्माण ऐसी प्रक्रिया का उपयोग करके किया गया है जिसकी बाबत पेटेन्ट अनुदत्त किया गया है, निर्माण या उपयोग, और ऐसी प्रक्रिया का जिसकी बाबत पेटेन्ट अनुदत्त किया गया है, उपयोग, किसी व्यक्ति द्वारा केवल प्रयोग या अनुसंधान के प्रयोजन के लिए जिसके अन्तर्गत शिष्यों को शिक्षण देना भी है, किया जा सकेगा; और

(4)  किसी औषध या ओषधि की बाबत किसी पेटेन्ट की दशा में उस औषध या ओषधि का आयात सरकार द्वारा केवल अपने उपयोग के प्रयोजन के लिए या सरकार द्वारा या उसकी ओर से चलाए जाने वाले किसी औषधालय, अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था में या किसी ऐसे अन्य औषधालय, अस्पताल या अन्य चिकित्सा संस्था में जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उस लोक सेवा का ध्यान रखते हुए जिसे ऐसा औषधालय, अस्पताल या चिकित्सा संस्था करती है इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट की जाए, वितरण के लिए किया जा सकेगा ।

 [48. पेटेंटधारियों के अधिकार-(1) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट अन्य उपबंधों और धारा 47 में विनिर्दिष्ट शर्तों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन अनुदत्त किया गया पेटेंट, पेटेंटधारियों को-

(क) जहां पेटेन्ट की विषय-वस्तु उत्पाद है तो ऐसे तीसरे पक्षकार को जिसने उसकी सहमति नहीं ली है, भारत में उन प्रयोजनों के लिए उस उत्पाद को बनाने, उसका उपयोग करने, विक्रय के लिए प्रस्थापित करने, विक्रय करने या उन प्रयोजनों के लिए आयातित करने के कार्य को निवारित करने का अनन्य अधिकार प्रदत्त करेगा ; 

(ख) जहां पेटेंट की विषय-वस्तु प्रक्रिया है तो ऐसे अन्य किसी पक्षकार को जिसने उसकी सहमति नहीं ली है भारत में उस प्रक्रिया का उपयोग करने का कार्य करने से और उस प्रक्रिया द्वारा प्रत्यक्षतः अभिप्राप्त किए गए उत्पाद के, उन प्रयोजनों के लिए उसका उपयोग करने, विक्रय के लिए प्रस्थापित करने, विक्रय करने या आयात करने का कार्य करने से निवारित करने का अनन्य अधिकार प्रदत्त करेगा :

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

49. अस्थायी या आकस्मिक रूप से भारत में आए विदेशी जलयानों, आदि पर उपयोग में लाए जाने से ही पेटेन्ट अधिकारों का अतिलंघन होना-(1) जहां विदेश में रजिस्ट्रीकृत कोई जलयान या वायुयान अथवा किसी ऐसे देश में मामूली तौर से निवास करने वाले किसी व्यक्ति के स्वामित्व में का कोई स्थलयान भारत में (जिसके अन्तर्गत उसका राज्यक्षेत्रीय सागर-खण्ड भी है) केवल अस्थायी या आकस्मिक रूप से आ जाए वहां, यथास्थिति,-

(क) जलयान के ढांचे में या उसकी मशीनरी, लफ्ती, साधित्र या अन्य उपसाधनों में वहां तक जहां तक कि आविष्कार का उपयोग जलयान पर और केवल उसकी आवश्यकताओं के लिए किया गया है; अथवा 

(ख) वायुयान या स्थलयान या उसके उपसाधनों के निर्माण या क्रियान्वयन में,

आविष्कार के उपयोग से यह नहीं समझा जाएगा कि आविष्कार के पेटेन्ट द्वारा प्रदत्त अधिकारों का अतिलंघन हुआ है । 

(2) इस धारा का विस्तार उन जलयानों, वायुयानों या स्थलयानों पर न होगा, जो ऐसे विदेश में मामूली तौर से निवास करने वाले व्यक्तियों के स्वामित्व में हों, जिसकी विधियां भारत में मामूली तौर से निवास करने वाले व्यक्तियों के स्वामित्व में के जलयानों, वायुयानों या स्थलयानों में आविष्कारों के उस समय उपयोग की बाबत समरूपी अधिकार प्रदत्त नहीं करती है, जब वे उस विदेश के पत्तनों में या उसके राज्यक्षेत्रीय सागर-खण्ड में या अन्यथा उसके न्यायालयों की अधिकारिता में हैं ।

50. पेटेन्टों के सहस्वामियों के अधिकार-(1) जहां पेटेन्ट दो या दो से अधिक व्यक्तियों को अनुदत्त किया जाता है वहां उन व्यक्तियों में से हर एक व्यक्ति, जब तक कि तत्प्रतिकूल करार प्रवृत्त न हो, पेटेन्ट में समान अविभक्त-अंश का हकदार होगा । 

(2) इस धारा और धारा 51 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, जहां दो या दो से अधिक व्यक्ति पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत हैं वहां, जब तक कि तत्प्रतिकूल करार प्रवृत्त न हो, उन व्यक्तियों में से हर एक व्यक्ति, अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को लेखा-जोखा दिए बिना, अपने फायदे के लिए, अपने द्वारा या अपने अभिकर्ताओं द्वारा  [धारा 48 के अधीन प्रदत्त अधिकारों का हकदार होगा ।]

(3) इस धारा और धारा 51 के उपबन्धों और तत्समय प्रवृत्त किसी करार के अधीन रहते हुए, जहां दो या दो से अधिक व्यक्ति पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत हों वहां ऐसे व्यक्तियों में से कोई व्यक्ति, अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों की सहमति के बिना, पेटेन्ट के अधीन अनुज्ञप्ति अनुदत्त नहीं करेगा और पेटेन्ट में का कोई अंश समनुदेशित नहीं करेगा ।

(4) जहां किसी पेटेन्टकृत वस्तु का पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत दो या दो से अधिक व्यक्तियों में से किसी एक व्यक्ति द्वारा विक्रय किया जाता है वहां क्रेता और उससे व्युत्पन्न अधिकार के माध्यम से दावा करने वाला कोई व्यक्ति उस वस्तु के विषय में उसी रीति से संव्यवहार करने का हकदार होगा मानो उस वस्तु का एकमात्र पेटेन्टधारी द्वारा विक्रय किया           गया हो ।

(5) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, जंगम सम्पत्ति के स्वामित्व और न्यागमन को साधारणतया लागू विधि के नियम पेटेन्टों के सम्बन्ध में लागू होंगे और उपधारा (1) या उपधारा (2) की कोई बात न्यासियों के या मृत व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधियों के पारस्परिक अधिकारों या बाध्यताओं पर या उनके इस रूप में के अधिकारों या बाध्यताओं पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

(6) इस धारा की कोई भी बात इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व सृष्ट पेटेन्ट में के आंशिक हित के समनुदेशितियों के अधिकारों पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

51. सहस्वामियों को निदेश देने की नियंत्रक की शक्ति-(1) जहां दो या दो से अधिक व्यक्ति पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत हैं वहां नियंत्रक, विहित रीति से, उन व्यक्तियों में से किसी व्यक्ति द्वारा उसको किए गए आवेदन पर, पेटेन्ट या उसमें के किसी हित का विक्रय करने या उसे पट्टे पर देने, पेटेन्ट के अधीन अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करने या उसके सम्बन्ध में धारा 50 के अधीन किसी अधिकार का प्रयोग करने के बारे में, आवेदन के अनुसार ऐसे निदेश दे सकेगा जो वह ठीक समझे । 

(2) यदि पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत कोई व्यक्ति इस धारा के अधीन दिए गए किसी निदेश के अनुपालन के लिए अपेक्षित किसी लिखत का निष्पादन या कोई अन्य बात, इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत अन्य व्यक्तियों में से किसी व्यक्ति द्वारा ऐसा करने के लिए लिखित निवेदन किए जाने के पश्चात् चौदह दिन के भीतर नहीं करता है तो नियंत्रक, विहित रीति से, किसी ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा उसको किए गए आवेदन पर, व्यतिक्रम करने वाले व्यक्ति के नाम में और उसकी ओर से उस लिखत का निष्पादन करने या वह कार्य करने के लिए किसी व्यक्ति को सशक्त करने वाले निदेश दे सकेगा । 

(3) इस धारा के अधीन किए गए आवेदन के अनुसरण में कोई निदेश देने के पूर्व नियंत्रक-

(क) उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन की दशा में, पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों को;  

(ख) उपधारा (2) के अधीन किए गए आवेदन की दशा में, व्यतिक्रम करने वाले व्यक्ति को,

सुनवाई का अवसर देगा ।  

(4) इस धारा के अधीन ऐसा कोई निदेश नहीं किया जाएगा जिससे न्यासियों के या मृत व्यक्ति के विधिक प्रतिनिधियों के पारस्परिक अधिकारों या बाध्यताओं पर या उनके इस रूप में के अधिकारों या बाध्यताओं पर प्रभाव पड़े या जो पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत व्यक्तियों के बीच हुए किसी करार के निबन्धनों से असंगत है । 

52. जहां पेटेन्ट वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता के प्रति कपट करके किसी अन्य व्यक्ति द्वारा अभिप्राप्त कर लिया गया है वहां वास्तविक और प्रथम आविष्कर्ता को पेटेन्ट का अनुदान-(1)  [जहां पेटेन्ट इस आधार पर धारा 64 के अधीन प्रतिसंहृत किया          गया हैट  कि पेटेन्ट सदोष और अर्जीदार के या किसी ऐसे व्यक्ति के, जिससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन या जिसके माध्यम से वह दावा करता है, अधिकारों का उल्लंघन करके अभिप्राप्त किया गया था अथवा जहां प्रतिसंहरण की अर्जी में  [अपील बोर्ड या न्यायालयट पेटेन्ट को प्रतिसंहृत करने के बजाय, इस निष्कर्ष के फलस्वरूप कि ऐसे दावे या दावों के अन्तर्गत आने वाला अविष्कार अर्जीदार से अभिप्राप्त किया गया था, यह निदेश देता है कि पूर्ण विनिर्देश ऐसे दावे या दावों का अपवर्जन करके संशोधित किया जाए वहां 2[अपील बोर्ड या न्यायालयट अर्जीदार को सम्पूर्ण आविष्कार के या उसके ऐसे भाग के, जिसके बारे में न्यायालय का यह निष्कर्ष हो कि वह इस प्रकार प्रतिसंहृत पेटेन्ट के बदले में पेटेन्टधारी द्वारा सदोष अभिप्राप्त किया गया है या वह संशोधन द्वारा अपवर्जित किया गया है अनुदत्त किए जाने की अनुज्ञा, उसी कार्यवाही में पारित आदेश द्वारा, दे सकेगा । 

(2) जहां कोई ऐसा आदेश पारित किया जाता है वहां नियंत्रक, विहित रीति से अर्जीदार द्वारा निवेदन किए जाने पर, उसे-

(i) उन दशाओं में जिनमें 2[अपील बोर्ड या न्यायालयट सम्पूर्ण पेटेन्ट अनुदत्त किए जाने की अनुज्ञा देता है, उसी तारीख और संख्या वाला जो प्रतिसंहृत पेटेन्ट की है, नया पेटेन्ट अनुदत्त करेगा; 

(ii) उन दशाओं में जिनमें 2[अपील बोर्ड या न्यायालयट पेटेन्ट के केवल किसी भाग के अनुदत्त किए जाने की अनुज्ञा देता है, ऐसे भाग के लिए उसी तारीख वाला जो प्रतिसंहृत पेटेन्ट की है और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, डाली गई संख्या वाला नया पेटेन्ट अनुदत्त करेगा :

                परन्तु नियंत्रक, ऐसे अनुदान की शर्त के रूप में, अर्जीदार से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में ऐसा नया और पूर्ण विनिर्देश फाइल करे जिसमें आविष्कार के उस भाग का वर्णन और दावा किया गया हो जिसके लिए पेटेन्ट अनुदत्त किया जाना है  ।

(3) इस धारा के अधीन अनुदत्त पेटेन्ट के किसी ऐसे अतिलंघन के संबंध में कोई वाद नहीं लाया जाएगा जो उस वास्तविक तारीख के पहले किया गया हो जिस तारीख को वह पेटेन्ट अनुदत्त किया गया था । 

53. पेटेन्ट की अवधि- [(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 2002 के प्रारंभ के पश्चात् अनुदत्त प्रत्येक पेटेंट की अवधि, और ऐसे प्रत्येक पेटेंट की अवधि, जो इस अधिनियम के अधीन ऐसे प्रारंभ की तारीख को समाप्त नहीं हुई है और जिसका प्रभाव समाप्त नहीं हुआ है, पेटेंट के लिए आवेदन के फाइल किए जाने की तारीख से बीस वर्ष होगी ।] 

 [स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, भारत को अभिहित करने वाली पेटेंट सहयोग संधि के अधीन फाइल किए गए अंतरराष्ट्रीय आवेदनों की दशा में, पेटेंट की अवधि पेटेंट सहयोग संधि के अधीन की गई अंतरराष्ट्रीय आवेदन फाइल करने की तारीख से बीस वर्ष होगी ।]

(2) कोई पेटेन्ट, उसमें या इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, किसी नवीकरण फीस के संदाय के लिए विहित अवधि के अवसान पर उस दशा में प्रभावहीन हो जाएगा, जब वह फीस विहित अवधि के भीतर  [या ऐसी विस्तारित अवधि के भीतर जो विहित की जाएट संदत्त नहीं कर दी जाती । 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

 [(4) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, नवीकरण के लिए फीस का संदाय न किए जाने के कारण पेटेन्ट अधिकार के समाप्त हो जाने पर या पेटेंट की अवधि के पर्यवसान पर उक्त पेटेंट के अंतर्गत आने वाली विषय-वस्तु किसी भी संरक्षण के लिए हकदार नहीं होगी ।]

अध्याय 9

परिवर्धन पेटेन्ट

54. परिवर्धन पेटेन्ट-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, जहां किसी ऐसे आविष्कार में (जिसे इस अधिनियम में मुख्य आविष्कार" कहा गया है) जो उसके लिए फाइल किए गए पूर्ण विनिर्देश में वर्णित या प्रकट किया गया है, किसी सुधार या उसके उपांतर की बाबत पेटेन्ट के लिए आवेदन किया जाए और आवेदक भी उस आविष्कार के पेटेन्ट के लिए आवेदन करे या कर चुका है अथवा वह उसकी बाबत पेटेन्टधारी है वहां, यदि आवेदक ऐसा निवेदन करता है, तो, नियंत्रक उसे परिवर्धन पेटेन्ट के रूप में सुधार या उपान्तर के लिए पेटेन्ट अनुदत्त कर सकेगा । 

(2) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, जहां कोई आविष्कार, जो किसी अन्य आविष्कार में सुधार या उसका उपान्तर है, स्वतंत्र पेटेन्ट का विषय है और उस पेटेन्ट की बाबत पेटेन्टधारी मुख्य आविष्कार के पेटेन्ट की बाबत भी पेटेन्टधारी है, वहां, यदि पेटेन्टधारी ऐसा निवेदन करता है तो, नियंत्रक, आदेश द्वारा, सुधार या उपान्तर के पेटेन्ट को प्रतिसंहृत कर सकेगा और उसकी बाबत परिवर्धन-पेटेन्ट, जिस पर वही तारीख होगी, जो इस प्रकार प्रतिसंहृत पेटेन्ट की तारीख हो, पेटेन्टधारी को अनुदत्त कर सकेगा । 

(3) परिवर्धन-पेटेन्ट के रूप में कोई पेटेन्ट तब तक अनुदत्त नहीं किया जाएगा जब तक कि  [आवेदनट फाइल किए जाने की तारीख या तो वही हो जो मुख्य आविष्कार की बाबत 1[आवेदनट फाइल किए जाने की तारीख थी या उसके पश्चात् की हो । 

 [(4) मुख्य आविष्कार के लिए पेटेंट अनुदत्त किए जाने से पूर्व कोई परिवर्धन-पेटेंट अनुदत्त नहीं किया जाएगा ।]

55. परिवर्धन पेटेन्ट की अवधि-(1) परिवर्धन-पेटेन्ट ऐसी अवधि के लिए अनुदत्त किया जाएगा जो मुख्य आविष्कार के पेटेन्ट की अवधि के या उसके अनवसित भाग के बराबर है और वह उस अवधि के दौरान या मुख्य आविष्कार के पेटेन्ट की पूर्वतन समाप्ति तक न कि उसके आगे, प्रवृत्त रहेगा : 

परन्तु यदि मुख्य आविष्कार के पेटेन्ट का प्रतिसंहण इस अधिनियम के अधीन किया जाता है तो, यथास्थिति, न्यायालय या नियंत्रक, पेटेन्टधारी द्वारा विहित रीति से अपने को निवेदन किए जाने पर, यह आदेश दे सकेगा कि परिवर्धन-पेटेन्ट मुख्य आविष्कार के पेटेन्ट की अवधि के शेष भाग के लिए स्वतन्त्र पेटेन्ट हो जाएगा और तब वह पेटेन्ट तदनुसार स्वतन्त्र पेटेन्ट के रूप में प्रवृत्त रहेगा । 

(2) परिवर्धन-पेटेन्ट की बाबत कोई नवीकरण फीस देय नहीं होगी किन्तु यदि कोई ऐसा पेटेन्ट उपधारा (1) के अधीन स्वतन्त्र पेटेन्ट हो जाता है तो तत्पश्चात् वही फीस उन्हीं तारीखों पर देय होगी मानो पेटेन्ट स्वतन्त्र पेटेन्ट के रूप से मूलतः अनुदत्त किया गया हो । 

56. परिवर्धन-पेटेन्टों की विधिमान्यता-(1) केवल इस आधार पर परिवर्धन-पेटेन्ट को अनुदत्त करने से इन्कार नहीं किया जाएगा और न परिवर्धन-पेटेन्ट के रूप में अनुदत्त-पेटेन्ट प्रतिसंहृत या अविधिमान्य किया जाएगा कि ऐसे आविष्कार में जिसका दावा पूर्ण विनिर्देश में किया गया है, कोई आविष्कारित क्रिया,-

(क) तत्सम्बद्ध पूर्ण विनिर्देश में वर्णित मुख्य आविष्कार; अथवा

(ख) मुख्य आविष्कार के पेटेन्ट के परिवर्धन-पेटेन्ट के पूर्ण विनिर्देश में वर्णित मुख्य आविष्कार में या ऐसे परिवर्धन के लिए आवेदन में किसी सुधार या उसके उपान्तर,

के किसी प्रकाशन या उपयोग को ध्यान में रखते हुए, अन्तर्ग्रस्त नहीं है और परिवर्धन-पेटेन्ट की विधिमान्यता के बारे में इस आधार पर आक्षेप नहीं किया जाएगा कि वह आविष्कार स्वतंत्र पेटेन्ट का विषय होना चाहिए था ।  

(2) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि ऐसे आविष्कार की, जिसका दावा परिवर्धन-पेटेन्ट के लिए आवेदन के अनुसरण में फाइल किए गए पूर्ण विनिर्देश में किया गया है, नवीनता अवधारित करने में उस पूर्ण विनिर्देश का भी ध्यान रखा जाएगा जिसमें मुख्य आविष्कार वर्णित है ।  

 

अध्याय 10

आवेदनों और विनिर्देशों का संशोधन

57. नियंत्रक के समक्ष के आवेदन और विनिर्देश का संशोधन-(1) धारा 59 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, नियंत्रक, पेटेन्ट के आवेदक द्वारा या पेटेन्ट द्वारा ऐसी रीति से जो विहित की जाए, इस धारा के अधीन किए गए आवेदन पर, पेटेन्ट के लिए आवेदन को या पूर्ण विनिर्देश को  [या उससे संबंधित किसी दस्तावेज कोट ऐसी शर्तों के, यदि कोई हों अधीन रहते हुए जैसी नियंत्रक ठीक समझे, संशोधित किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा :

परन्तु जब पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए कोई वाद किसी न्यायालय के समक्ष अथवा पेटेन्ट के प्रतिसंहरण के लिए कोई कार्यवाही उच्च न्यायालय के समक्ष लम्बित है, चाहे वह वाद या कार्यवाही संशोधन के लिए आवेदन के फाइल किए जाने के पूर्व या उसके पश्चात् प्रारंभ हुई हो तब नियंत्रक, पेटेन्ट के लिए आवेदन को या विनिर्देश को इस धारा के अधीन संशोधित करने से संबंधित किसी आवेदन के बारे में न तो अनुज्ञा देने वाला और न इंकार करने वाला आदेश पारित करेगा ।  

(2) पेटेन्ट के लिए आवेदन को  [या पूर्ण विनिर्देश को या उससे संबंधित किसी दस्तावेज कोट इस धारा के अधीन संशोधित करने की इजाजत के लिए हर आवेदन में प्रस्थापित संशोधन की प्रकृति कथित होगी और उसमें उन कारणों की सभी विशिष्टियां दी जाएंगी जिनके आधार पर आवेदन किया जाता है ।

 [(3) इस धारा के अधीन किसी पेटेंट या पूर्ण विनिर्देश या उससे संबंधित दस्तावेज का संशोधन करने की इजाजत के लिए ऐसे प्रत्येक आवेदन का जो पेटेंट अनुदत्त किए जाने के पश्चात् किया गया है और प्रस्थापित संशोधन की प्रकृति का, प्रकाशन किया                     जा सकेगा ।]

(4) जहां कोई आवेदन उपधारा (3) के अधीन  [प्रकाशितट किया जाता है वहां कोई हितबद्ध व्यक्ति उसके विरोध की सूचना उसके  [प्रकाशनट के पश्चात् नियंत्रक को विहित अवधि के भीतर दे सकेगा और जहां ऐसी सूचना पूर्वोक्त अवधि के भीतर दी जाती है वहां नियंत्रक उस व्यक्ति को अधिसूचित करेगा जिसके द्वारा इस धारा के अधीन आवेदन किया गया है और इसके पूर्व कि वह मामले का विनिश्चय करे उस व्यक्ति को और विरोधकर्ता को सुनवाई का अवसर देगा । 

(5) इस धारा के अधीन किया गया पूर्ण विनिर्देश का संशोधन दावे की पूर्विकता तारीख का संशोधन हो सकेगा या उसके अन्तर्गत ऐसा संशोधन भी आ सकेगा ।

 [(6) इस धारा के उपबंध, नियंत्रक के ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए, जो पेटेंट अनुदत्त किए जाने से पूर्व जारी किए गए हों, अपने विनिर्देश या उससे संबंधित किसी दस्तावेज का संशोधन करने के लिए पेटेंट के आवेदक के अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होंगे ।]

 [58. अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय के समक्ष विनिर्देश का संशोधन-(1) पेटेंट के प्रतिसंहरण के लिए अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय के समक्ष की गई किसी कार्यवाही में, यथास्थिति, अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय, धारा 59 में अंतर्विष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, पेटेंटधारी के अपने पूर्ण विनिर्देश को ऐसी रीति से और खर्च, विज्ञापन या अन्य बातों के संबंध में ऐसे निबंधनों के अधीन रहते हुए जो अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय ठीक समझे, संशोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा और यदि प्रतिसंहरण के लिए की गई किसी कार्यवाही में अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय यह विनिश्चय करता है कि पेटेंट अविधिमान्य है तो वह पेटेंट का प्रतिसंहरण करने के बजाय विनिर्देश को इस धारा के अधीन संशोधित करने की अनुज्ञा दे सकेगा । 

(2) जहां इस धारा के अधीन किसी आदेश के लिए कोई आवेदन अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय को किया जाता है वहां आवेदक उस आवेदन की सूचना नियंत्रक को देगा और नियंत्रक हाजिर होने का और सुने जाने का हकदार होगा तथा यदि अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकार निर्देश दिया जाए तो वह हाजिर होगा ।

(3) अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय के ऐसे सभी आदेशों की प्रतिलिपियां, जिनके द्वारा विनिर्देश को संशोधन करने की पेटेंटधारी को अनुज्ञा दी गई है, अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय द्वारा नियंत्रक को पारेषित की जाएगी, जो उनकी प्राप्ति पर रजिस्टर में उनकी प्रविष्टि कराएगा और उनका निर्देश अंकित कराएगा ।]

59. विनिर्देश या आवेदन के संशोधन के बारे में अनुपूरक उपबन्ध- [(1) पेटेन्ट के लिए आवेदन या पूर्ण विनिर्देश अथवा उससे संबंधित किसी दस्तावेज का कोई भी संशोधन, दावा, त्याग, शुद्धि या स्पष्टीकरण के तौर पर किए जाने के सिवाय, नहीं किया जाएगा, और उसका कोई भी संशोधन, वास्तविक तथ्य को सम्मिलित किए जाने के प्रयोजन के लिए किए जाने के सिवाय, अनुज्ञात नहीं किया जाएगा और पूर्ण विनिर्देश का कोई भी ऐसा संशोधन अनुज्ञात नहीं किया जाएगा जिसका यह प्रभाव होता है कि यथा संशोधित विनिर्देश में ऐसी बात का दावा या वर्णन किया जाए जो संशोधन से विनिर्देश में सारतः प्रकट या दर्शित नहीं की गई है या यथा संशोधन विनिर्देश का कोई दावा संशोधन से पहले विनिर्देश के दावे के भीतर पूर्णतः नहीं आता है ।] 

 [(2) जहां पेटेंट के अनुदान की तारीख के पश्चात् विनिर्देश या उससे संबंधित किन्हीं अन्य दस्तावेजों का कोई संशोधन, यथास्थिति, नियंत्रक द्वारा या अपील बोर्ड अथवा उच्च न्यायालय द्वारा अनुज्ञात किया जाता है, वहां-

(क) वह संशोधन सभी प्रयोजनों के लिए विनिर्देश तथा उससे संबंधित अन्य दस्तावेजों का भाग समझा जाएगा ;

(ख) यह तथ्य कि विनिर्देश या उससे संबंधित किन्हीं अन्य दस्तावेजों का संशोधन कर दिया गया है, यथासंभवशीघ्रता से प्रकाशित किया जाएगा; और 

(ग) आवेदक या पेटेंटधारी के संशोधन करने के अधिकार पर आक्षेप, कपट के आधार पर किए जाने के सिवाय, नहीं किया जाएगा ।]

(3) यथासंशोधित विनिर्देश का अर्थ लगाने में मूल रूप से यथा प्रतिगृहीत विनिर्देश का निर्देश किया जा सकेगा । 

अध्याय 11

व्यपगत पेटेन्टों का प्रत्यावर्तन

60. व्यपगत पेटेन्टों के प्रत्यावर्तन के लिए आवेदन-(1) जहां कोई पेटेन्ट,  [धारा 53 के अधीन विहित अवधि के भीतर या ऐसी अवधि के भीतर जो धारा 142 की उपधारा (4) के अधीन अनुज्ञात की जाए] किसी नवीकरण फीस का संदाय करने में असफल रहने के कारण प्रभावहीन हो गया है वहां पेटेन्टधारी या उसका विधिक प्रतिनिधि और जहां पेटेन्ट दो या दो से अधिक व्यक्तियों द्वारा संयुक्त रूप से धारित था वहां, नियंत्रक की इजाजत से, उनमें से एक या एक से अधिक व्यक्ति, अन्य व्यक्तियों को सम्मिलित किए बिना, उस तारीख से  [अठारह मास]  के भीतर जिस तारीख को पेटेन्ट प्रभावहीन हो गया था, पेटेन्ट का प्रत्यावर्तन करने के लिए, आवेदन कर सकेंगे ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(3) इस धारा के अधीन किए गए आवेदन में एक ऐसा कथन भी होगा जो विहित रीति से सत्यापित किया गया हो और जिसमें वे परिस्थितियां पूर्ण रूप से उपवर्णित की गई हों जिनके फलस्वरूप विहित फीस का संदाय करने में असफलता हुई थी, और नियंत्रक आवेदक से ऐसे अतिरिक्त साक्ष्य की अपेक्षा कर सकेगा जो वह आवश्यक समझे । 

61. व्यपगत पेटेन्टों के प्रत्यावर्तन के लिए आवेदनों के निपटाए जाने की प्रक्रिया-(1) यदि, उन दशाओं में जहां आवेदक ऐसा चाहता है या नियंत्रक ऐसा ठीक समझता है वहां, आवेदक को सुने जाने के पश्चात् नियंत्रक का प्रथमदृष्ट्या यह समाधान हो जाता है कि नवीकरण फीस का संदाय करने में असफलता अनाशयित थी और आवेदन करने में असम्यक् विलम्ब नहीं हुआ है तो वह  [आवेदन को विहित रीति से प्रकाशित करेगा] और कोई भी हितबद्ध व्यक्ति उसके विरोध की नियंत्रक को सूचना विहित अवधि के भीतर निम्नलिखित आधारों में से किसी भी आधार पर या दोनों ही आधारों पर दे सकेगा, अर्थात् :-

(क) नवीकरण फीस का संदाय करने में असफलता अनाशयित नहीं थी; अथवा 

(ख) आवेदन करने में असम्यक् विलम्ब हुआ है । 

(2) यदि विरोध की सूचना पूर्वोक्त अवधि के भीतर दे दी जाती है तो नियंत्रक आवेदक को अधिसूचित करेगा और इसके पूर्व कि वह मामले का विनिश्चय करे उस व्यक्ति को और विरोधकर्ता को सुनवाई का अवसर देगा । 

(3) यदि विरोध की कोई भी सूचना पूर्वोक्त अवधि के भीतर नहीं दी जाती है अथवा यदि विरोध किए जाने की दशा में नियंत्रक का विनिश्चय आवेदक के पक्ष में है, तो नियंत्रक किसी असंदत्त नवीकरण फीस का और ऐसी अतिरिक्त फीस का जो विहित की जाए, संदाय कर देने पर उस पेटेन्ट को और ऐसे परिवर्धन-पेटेन्ट को जो आवेदन में विनिर्दिष्ट है और जो उस पेटेन्ट की समाप्ति पर प्रभावहीन हो गया है, प्रत्यावर्तित करेगा । 

(4) यदि नियंत्रक ठीक समझे तो वह पेटेन्ट के प्रत्यावर्तन की शर्त के रूप में यह अपेक्षा कर सकेगा कि ऐसी किसी दस्तावेज या बात की प्रविष्टि, जिसे इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रजिस्टर में दर्ज किया जाना है, किन्तु जो इस प्रकार दर्ज नहीं की गई है, रजिस्टर में की जाए ।   

62. उन व्यपगत पेटेन्टों के जो प्रत्यावर्तित किए गए हैं, पेटेन्टधारियों के अधिकार-(1) जहां पेटेन्ट प्रत्यावर्तित किया जाता है वहां पेटेन्टधारी के अधिकार ऐसे उपबन्धों के जो विहित किए जाएं तथा ऐसे अन्य उपबन्धों के अधीन होंगे, जिन्हें नियंत्रक उन व्यक्तियों के संरक्षण या प्रतिकर के लिए अधिरोपित करना ठीक समझे जिन व्यक्तियों ने पेटेन्टकृत आविष्कार का उस तारीख के जब पेटेन्ट प्रभावहीन हो गया था और इस अध्याय के अधीन पेटेन्ट के प्रत्यावर्तन के लिए आवेदन के  [प्रकाशनट की तारीख के बीच स्वयं लाभ उठाना प्रारंभ कर दिया हो या स्वयं लाभ उठाने के लिए संविदा द्वारा या अन्यथा निश्चित कदम उठाए हों । 

(2) कोई भी बात या अन्य कार्यवाही, पेटेन्ट के ऐसे अतिलंघन के बारे में जो उस तारीख के जिस तारीख को पेटेन्ट प्रभावहीन हो गया था और पेटेन्ट के प्रत्यावर्तन के लिए आवेदन के  [प्रकाशन की तारीखट के बीच किया गया था, प्रारंभ या अभियोजित नहीं की जाएगी ।

अध्याय 12

पेटेन्टों का अभ्यर्पण और प्रतिसंहरण

63. पेटेन्टों का अभ्यर्पण-(1) पेटेन्टधारी, नियंत्रक को विहित रीति से सूचना देकर किसी भी समय अपने पेटेन्ट के अभ्यर्पण की प्रस्थापना कर सकेगा । 

(2) जहां ऐसी कोई प्रस्थापना की जाती है वहां नियंत्रक उस प्रस्थापना को विहित रीति से  [प्रकाशित करेगाट और पेटेन्टधारी से भिन्न ऐसे हर व्यक्ति को भी अधिसूचित करेगा जिसका नाम रजिस्टर में पेटेन्ट में हितबद्ध व्यक्ति के रूप में अंकित है ।  

(3) कोई भी हितबद्ध व्यक्ति  [ऐसे प्रकाशनट के पश्चात् विहित अवधि के भीतर नियंत्रक को उस अभ्यर्पण के विरोध की सूचना दे सकेगा और जहां कोई ऐसी सूचना दी जाती है वहां नियंत्रक पेटेन्टधारी को अधिसूचित करेगा । 

(4) यदि पेटेन्टधारी को और ऐसे किसी विरोधकर्ता को, यदि वह चाहता है कि उसे सुना जाए तो, सुने जाने के पश्चात् नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि पेटेन्ट उचित रूप से अभ्यर्पित किया जा सकेगा तो वह प्रस्थापना को प्रतिगृहीत कर सकेगा और पेटेन्ट को, आदेश द्वारा, प्रतिसंहृत कर सकेगा । 

64. पेटेन्टों का प्रतिसंहरण-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए पेटेन्ट, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व या उसके पश्चात् अनुदत्त किया गया हो,  [किसी हितबद्ध व्यक्ति की या केन्द्रीय सरकार की अर्जी पर अपील बोर्ड द्वारा या पेटेंट के अतिलंघन के किसी वाद में के किसी प्रतिदावे पर उच्च न्यायालय द्वारा निम्नलिखित आधारों में से किसी आधार पर प्रतिसंहृत किया जा सकेगा], अर्थात् :-

(क) उस आविष्कार का, जहां तक कि उसका दावा पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में किया गया है, दावा भारत में अनुदत्त किसी अन्य पेटेन्ट के पूर्ण विनिर्देश में अन्तर्विष्ट पूर्वतर पूर्विकता तारीख के विधिमान्य दावे में किया गया था; 

(ख) वह पेटेन्ट ऐसे व्यक्ति के आवेदन पर अनुदत्त किया गया था, जो उसके लिए आवेदन करने के लिए इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन हकदार नहीं था : 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              । 

(ग) वह पेटेन्ट अर्जीदार के या उस व्यक्ति के, जिससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन या जिसके माध्यम से वह दावा करता है, अधिकारों का अतिलंघन करके सदोष अभिप्रापत किया गया था ; 

(घ) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे का विषय इस अधिनियम के अर्थ में आविष्कार नहीं है; 

(ङ) दावे की पूर्विकता तारीख से पूर्व भारत में जो कुछ सार्वजनिक रूप से ज्ञात था या सार्वजनिक रूप से उपयोग किया गया था या जो कुछ धारा 13 में निर्दिष्ट दस्तावेजों में से किसी में भारत में या अन्यत्र प्रकाशित किया गया था उसको ध्यान में रखते हुए, वह आविष्कार, जहां तक कि उसका दावा पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में किया गया है, नया नहीं है : 

।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(च) दावे की पूर्विकता तारीख के पूर्व भारत में जो कुछ सार्वजनिक रूप से ज्ञात था या सार्वजनिक रूप से उपयोग किया गया था या जो कुछ भारत में या अन्यत्र प्रकाशित किया गया था उसको ध्यान में रखते हुए, वह आविष्कार, जहां तक कि उसका दावा पूर्ण विनिर्देश के दावे में किया गया है, स्पष्ट है और उसमें कोई आविष्कारिक क्रिया अन्तर्गस्त नहीं है :

।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(छ) वह आविष्कार, जहां तक कि उसका दावा पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में किया गया है, उपयोगी नहीं है; 

(ज) पूर्ण विनिर्देश में आविष्कार का तथा उसके क्रियान्वयन के ढंग का पर्याप्त और ठीक वर्णन नहीं किया गया है, अर्थात्, पूर्ण विनिर्देश में यथा अन्तर्विष्ट आविष्कार के क्रियान्वयन के ढंग का वर्णन या अनुदेश स्वतः इस बात के लिए पर्याप्त नहीं है कि भारत में कोई व्यक्ति, जो उस कला में जिससे वह आविष्कार संबद्ध है, औसत कुशलता या उसका औसत ज्ञान रखता है, उस आविष्कार का क्रियान्वयन कर सके या उसमें उसके क्रियान्वयन का उत्तम ढंग नहीं दिया गया है जो पेटेन्ट के आवेदक को ज्ञात था और जिसके लिए वह संरक्षण का दावा करने का हकदार था; 

(झ) पूर्ण विनिर्देश के दावे का क्षेत्र पर्याप्त और स्पष्ट रूप से परिनिश्चित नहीं किया गया है या पूर्ण विनिर्देश का कोई दावा विनिर्देश में प्रकट की गई बात पर पर्याप्त रूप से आधारित नहीं है; 

(ञ) वह पेटेन्ट मिथ्या सुझाव या व्यपदेशन के आधार पर अभिप्राप्त किया गया था;

(ट) पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे का विषय इस अधिनियम के अधीन पेटेन्ट होने योग्य नहीं है; 

(ठ) वह आविष्कार, जहां तक कि उसका दावा पूर्ण विनिर्देश के किसी दावे में किया गया है, उस दावे की पूर्विकता तारीख से पूर्व उपधारा (3) में यथावर्णित रीति से भिन्न रीति से भारत में गुप्त रूप से उपयोग में लाया जाता था; 

(ड) पेटेन्ट के आवेदक से नियन्त्रक को धारा 8 द्वारा अपेक्षित जानकारी नहीं दी है या उसने ऐसी जानकारी दी है जो उसके ज्ञान में किसी तात्त्विक विशिष्टि में मिथ्या थी ; 

(ढ) आवेदक ने धारा 35 के अधीन दिए गए गोपनीयता के निदेश का उल्लंघन किया है  [अथवा धारा 39 का उल्लंघन करके, भारत के बाहर पेटेंट अनुदत्त किए जाने के लिए आवेदन किया है या करवाया है;]

(ण)  धारा 57 या धारा 58 के अधीन पूर्ण विनिर्देश को संशोधित करने की इजाजत कपट द्वारा अभिप्राप्त की             गई थी;

 [(त) पूर्ण विनिर्देश में आविष्कार के लिए उपयोग में लाए गए जैव पदार्थ के स्रोत या भौगोलिक मूल का प्रकटन नहीं किया गया है या उसका गलत वर्णन किया गया है;

(थ) जहां तक पूर्ण विनिर्देश के किस दावे में दावा किया गया है, आविष्कार की, भारत में या अन्यत्र किसी स्थानीय या देशी समुदाय के भीतर उपलब्ध मौखिक या अन्यथा जानकारी को ध्यान में रखते हुए, प्रत्याशा थी ।]

(2) उपधारा (1) के खंड (ङ) और (च) के प्रयोजनों के लिए,-

(क)  [निजी दस्तावेज या गुप्त परीक्षण या गुप्त उपयोग कोट विचार में नहीं लिया जाएगा; तथा

(ख) जहां पेटेन्ट किसी प्रक्रिया के लिए या किसी ऐसे उत्पाद के लिए है जिसका निमार्ण वर्णित या दावाकृत प्रक्रिया द्वारा किया गया है वहां उस उत्पाद का, जिसका विदेश में उस प्रक्रिया द्वारा निर्माण किया गया है भारत में किया गया आयात, ऐसा आयात करने की तारीख को, उस दशा के सिवाय जब ऐसा आयात केवल युक्तियुक्त परीक्षण या प्रयोग के लिए किया गया था, उस आविष्कार का भारत में ज्ञात या उपयोग माना जाएगा । 

(3) आविष्कार के किसी ऐसे उपयोग को उपधारा (1) के खंड (ठ) के प्रयोजनों के लिए विचार में नहीं लिया जाएगा जो- 

(क) केवल युक्तियुक्त परीक्षण या प्रयोग के लिए किया गया है; अथवा 

(ख) पेटेन्ट के आवेदक या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है, सरकार को या सरकार द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति को या किसी सरकारी उपक्रम को उस आविष्कार के प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः संसूचित या प्रकट कर देने के परिणामस्वरूप सरकार द्वारा या यथापूर्वोक्त प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा या किसी सरकारी उपक्रम द्वारा किया गया है; अथवा 

(ग) पेटेन्ट के आवेदक द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है, उस आविष्कार के संसूचित या प्रकट कर देने के परिणामस्वरूप और आवेदक की या किसी ऐसे व्यक्ति की, जिससे उसका हक व्युत्पतन्न होता है, सहमति या उपमति के बिना किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किया गया है । 

(4) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कोई पेटेन्ट केन्द्रीय सरकार की अर्जी पर उच्च न्यायालय द्वारा प्रतिसंहृत किया जा सकेगा, यदि उच्च न्यायालय का यह समाधान हो जाता है  कि पेटेन्टधारी केन्द्रीय सरकार के प्रयोजनों के लिए धारा  99 के अर्थ में पेटेन्टकृत आविष्कार का युक्तियुक्त निबन्धनों पर निर्माण, उपयोग या प्रयोग करने के केन्द्रीय सरकार के निवेदन का अनुपालन करने में युक्तियुक्त हेतुक के बिना असफल रहा है ।  

(5) किसी पेटेन्ट के इस धारा के अधीन प्रतिसंहरण के लिए किसी अर्जी की सूचना की तामील ऐसे सभी व्यक्तियों पर की जाएगी, जिनके बारे में रजिस्टर से यह प्रतीत होता है  कि वे पेटेन्ट के स्वत्वधारी हैं या उसमें अंश या हित रखते हैं और सूचना की तामील किसी अन्य व्यक्ति पर करना आवकश्यक नहीं होगा ।

 [65. परमाणु ऊर्जा से संबंधित मामलों में सरकार के निदेशों पर पेटेंट का प्रतिसंहरण या पूर्ण विनिर्देश का संशोधन-(1) जहां पेटेंट के अनुदान के पश्चात् किसी समय केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है पेटेन्ट परमाणु ऊर्जा से संबंधित ऐसे आविष्कार के लिए है जिसके लिए परमाणु ऊर्जा अधिनियम, 1962 (1962 का 33) की धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन कोई पेटेंट अनुदत्त नहीं किया जा सकता है, वहां वह नियंत्रक को पेटेंट को प्रतिसंहृत करने को निदेश दे सकेगी और तदुपरि नियंत्रक, पेटेंटधारी को और  ऐसे प्रत्येक अन्य व्यक्ति को, जिसका नाम पेटेंट में हित रखने वाले व्यक्ति के रूप में रजिस्टर में दर्ज किया गया है, सूचना देने के पश्चात् और उन्हें सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् पेटेंट प्रतिसंहृत कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी कार्रवाई में नियंत्रक, पेटेंट को प्रतिसंहृत करने के बजाय पेटेंटधारी को पूर्ण विनिर्देश का ऐसी रीति में संशोधन करने के लिए अनुज्ञा दे सकेगा, जिसे वह आवश्यक समझे ।]

66. लोकहित में पेटेन्ट का प्रतिसंहरण-जहां केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि पेटेन्ट या वह ढंग जिसमें उसका प्रयोग किया जाता है, राज्य के लिए रिष्टकारी या सर्वसाधारण पर साधारणतः प्रतिकूल प्रभाव डालने वाला है वहां वह पेटेन्टधारी की सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उस प्रभाव की घोषणा राजपत्र में कर सकेगी और तब पेटेन्ट प्रतिसंहृत किया गया समझा जाएगा । 

                67. पेटेन्टों का रजिस्टर और उसमें दर्ज की जाने वाली विशिष्टियां-(1) पेटेन्ट कार्यालय में पेटेन्टों का रजिस्टर रखा जाएगा जिसमें- 

(क) पेटेन्टों के प्राप्तिकर्ताओं के नाम और पते; 

(ख) पेटेन्टों के समनुदेशनों और अन्तरणों की, पेटेन्टों के अधीन अनुज्ञप्तियों की तथा पेटेन्टों के संशोधनों, विस्तारणों और प्रतिसंहरणों की अधिसूचनाएं; तथा  

(ग) पेटेन्टों की विधिमान्यता या स्वत्वधारिता पर प्रभाव डालने वाली ऐसी अन्य बातों की विशिष्टियां जो विहित की जाएं,

दर्ज की जाएंगी ।  

(2) किसी न्यास की, चाहे वह अभिव्यक्त, विवक्षित या आन्वयिक हो, कोई भी सूचना रजिस्टर में दर्ज नहीं की जाएगी और किसी ऐसी सूचना का नियंत्रक पर प्रभाव नहीं पड़ेगा । 

(3) केन्द्रीय सरकार के अधीक्षण और निदेशन के अधीन रहते हुए, रजिस्टर को नियंत्रक के नियंत्रण और प्रबंध के                 अधीन रखा जाएगा ।

 [(4) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, नियंत्रक के लिए यह विधिसम्मत होगा कि वह पेटेंट के लिए रजिस्टर या उसके किसी भाग को ऐसे रक्षोपायों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, कम्प्यूटर फ्लापियों, डिस्कैटों या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रख सके ।

(5) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में किसी बात के होते हुए भी, पेटेंटों के रजिस्टर की ऐसी प्रति या उससे उद्धरण जिसका नियंत्रक या नियंत्रक द्वारा इस निमित्त सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा उसका सत्य प्रति होना सत्यापित किया गया है, सभी विधिक कार्यवाहियों में साक्ष्य में ग्राह्य होगा । 

(6) उस दशा में, जिसमें रजिस्टर पूर्णतः या भागतः कप्यूटर फ्लापियों, डिस्कैटों या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखा जाता है,-

(क) इस अधिनियम में रजिस्टर में किसी प्रविष्टि के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा  कि उसके अंतर्गत कम्प्यूटर फ्लापियों, डिस्कैटों या अन्य किसी इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखी गई प्रविष्टियों के अभिलेख के प्रति निर्देश भी हैं और जिसमें रजिस्टर या उसका कोई भाग भी सम्मिलित है; 

(ख) इस अधिनियम में किन्हीं विशिष्टियों के, जिनको रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत किया गया है या जिनकी प्रविष्टि की गई है, प्रति निर्देशों के बारे में यह समझा जाएगा कि उनके अंतर्गत कम्प्यूटर फ्लापियों, डिस्कैटों या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रजिस्टर या उसके भाग सहित प्रविष्टियों के अभिलेख रखे जाने के प्रति निर्देश भी हैं; और 

(ग) रजिस्टर के परिशोधन के प्रति इस अधिनियम में निर्देशों को इस प्रकार पढ़ा जाएगा जैसे कि उनके अंतर्गत कम्प्यूटर फ्लापियों, डिस्कैटों या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखे गए विशिष्टियों के अभिलेख और रजिस्टर या रजिस्टर के किसी भाग के परिशोधन के प्रति निर्देश है ।] 

 [68. समनुदेशनों, आदि का जब तक कि वे लिखित और सम्यक् रूप से निष्पादित हों, विधिमान्य होना-किसी पेटेंट का या पेटेंट के किसी अंश का समनुदेशन, पेटेंट का बंधक, उसकी अनुज्ञप्ति या उसमें किसी अन्य हित का सृजन तब तक विधिमान्य नहीं होगा जब तक कि वह लिखित में न हो और सम्बद्ध पक्षकारों के बीच करार को एक ऐसे दस्तावेज का रूप न दे दिया गया हो जिसमें उनके अधिकारों और बाध्यताओं को शासित करने वाले सभी निबंधन और शर्तें समाविष्ट हों और वह सम्यक् रूप से निष्पादित किया गया हो ।]

69. समनुदेशनों, अन्तरणों, आदि का रजिस्ट्रीकरण-(1) जहां कोई व्यक्ति, समनुदेशन, अन्तरण या विधि की क्रिया द्वारा पेटेन्ट का या पेटेन्ट में अंश का हकदार हो जाता है, या पेटेन्ट में किसी अन्य हित का, बन्धकदार या अनुज्ञप्तिधारी के रूप में या अन्यथा, हकदार हो जाता है वहां वह रजिस्टर में, यथास्थिति, अपने हक के अथवा अपने हित की सूचना के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन नियंत्रक को विहित रीति से और लिखित रूप में करेगा ।

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी ऐसे व्यक्ति के हक के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन, जो समनुदेशन द्वारा, पेटेन्ट का या पेटेन्ट में अंश का हकदार हो जाता है या पेटेन्ट में किसी अन्य हित का बन्धक, अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत के आधार पर हकदार हो जाता है, यथास्थिति, समनुदेशक, बन्धककर्ता, अनुज्ञापक द्वारा या उस लिखत के अन्य पक्षकर द्वारा विहित रीति से किया जा सकेगा । 

(3) जहां कोई आवेदन किसी व्यक्ति के हक के रजिस्ट्रीकरण के लिए इस धारा के अधीन किया जाता है वहां नियंत्रक, अपने समाधानप्रद रूप में हक के साबित हो जाने पर-

(क) उस दशा में जिसमें कि वह व्यक्ति पेटेन्ट का या पेटेन्ट में अंश का हकदार है, रजिस्टर में उसको पेटेन्ट के स्वत्वधारी या सह-स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रकृत करेगा और लिखत की या उस घटना की जिससे उसका हक व्युत्पन्न होता है, विशिष्टियां रजिस्टर में दर्ज करेगा; अथवा 

(ख) उस दशा में, जिसमें कि वह व्यक्ति पेटेन्ट में किसी अन्य हित का हकदार है, उसके हित की सूचना और उसका सृजन करने वाली लिखत की, यदि कोई हो, विशिष्टियां रजिस्टर में दर्ज करेगा :

                परन्तु यदि पक्षकारों के बीच कोई ऐसा विवाद है कि क्या समनुदेशन, बन्धक, अनुज्ञप्ति, अन्तरण, विधि की क्रिया या किसी अन्य संव्यवहार ने पेटेन्ट का या उसमें किसी अंश या हित का हक ऐसे व्यक्ति में विधिमान्यतः निहित किया है तो नियन्त्रक, यथास्थिति, खंड (क) या खंड (ख) के अधीन कोई कार्रवाई करने से तब तक इंकार कर सकेगा जब तक कि पक्षकरों के अधिकरों का अवधारण सक्षम न्यायालय द्वारा न कर दिया जाए ।  

(4) सभी करारों, अनुज्ञप्तियों और किसी पेटेन्ट के या तदधीन किसी अनुज्ञप्ति के हक पर प्रभाव डालने वाली अन्य दस्तावेजों की विहित रीति से अधिप्रमाणिकृत प्रतियां और विषय-वस्तु से सुसंगत ऐसी अन्य दस्तावेजें भी जो विहित की जाएं, नियंत्रक को पेटेन्ट कार्यालय में फाइल किए जाने के लिए विहित रीति से दी जाएंगी :

परन्तु पेटेन्ट के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्ति की दशा में नियंत्रक, यदि पेटेन्टधारी द्वारा अथवा अनुज्ञप्तिधारी द्वारा ऐसा निवेदन किया जाता है तो, यह सुनिश्चित करने के लिए कार्रवाई करेगा कि अनुज्ञप्ति के निबंधन किसी व्यक्ति को, न्यायालय के आदेश के बिना, प्रकट न किए जाएं ।

(5) उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन के या रजिस्टर में परिशुद्धि के लिए किए गए आवेदन के प्रयोजनों के सिवाय, ऐसी दस्तावेज जिसके बारे में उपधारा (3) के अधीन रजिस्टर में कोई प्रविष्टि नहीं की गई है, नियंत्रक द्वारा या किसी न्यायालय द्वारा किसी व्यक्ति के पेटेन्ट के या उसमें अंश या हित के हक के साक्ष्य के रूप में तब तक ग्रहण नहीं की जाएगी जब तक कि नियंत्रक या न्यायालय, उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, अन्यथा निदेश न दे । 

70. रजिस्ट्रीकृत प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी की पेटेन्ट के विषय में संव्यवहार करने की शक्ति-इस अधिनियम के ऐसे उपबन्धों के अधीन रहते हुए जो पेटेन्टों के सहस्वामित्व से संबंधित हैं और किसी अन्य व्यक्ति में निहित ऐसे अधिकारों के अधीन रहते हुए जिनकी सूचना रजिस्टर में दर्ज है, उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों को जो पेटेन्ट के प्राप्तिकर्ता या स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत हैं, पेटेन्ट  का समनुदेशन करने, उसके अधीन अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करने या उसके विषय में अन्यथा संव्यवहार करने की तथा ऐसे किसी समनुदेशन, अनुज्ञप्ति या संव्यवहार के प्रतिफल के लिए प्रभावी रसीद देने की शक्ति प्राप्त होगी :

परन्तु पेटेन्ट की बाबत कोई साम्याएं उसी रीति से प्रवर्तित की जा सकेंगी जिस रीति से वे किसी अन्य जंगम सम्पत्ति की बाबत प्रवर्तित की जाती हैं ।  

                71.  [अपील बोर्डट द्वारा रजिस्टर की परिशुद्धि-(1) 1[अपील बोर्डट किसी ऐसे व्यक्ति के आवेदन पर जो- 

(क) रजिस्टर में किसी प्रविष्टि की अविद्यमानता या लोप से; अथवा 

(ख) रजिस्टर में पर्याप्त हेतुक के बिना की गई किसी प्रविष्टि से; अथवा 

(ग)  रजिस्टर में किसी प्रविष्टि के गलती से रह जाने से; अथवा

(घ) रजिस्टर की किसी प्रविष्टि में किसी गलती या त्रुटि से,

व्यथित है, रजिस्टर में कोई प्रविष्टि करने, उसमें कोई फेरफार करने या उसे हटा देने के लिए ऐसा आदेश दे सकेगा जो वह ठीक समझे ।  

(2) इस धारा के अधीन किसी कार्यवाही में 1[अपील बोर्डट ऐसे किसी प्रश्न का विनिश्चय कर सकेगा जो रजिस्टर की परिशुद्धि के संबंध में विनिश्चित करना आवश्यक या समीचीन है । 

(3)  [अपील बोर्ड] को इस धारा के अधीन किए गए आवेदन की सूचना नियंत्रक को विहित रीति से दी जाएगी जो हाजिर होने का और आवेदन के संबंध में सुने जाने का हकदार होगा और यदि बोर्ड द्वारा इस प्रकार निदेश दिया जाए तो वह हाजिर होगा । 

(4) इस धारा के अधीन रजिस्टर में परिशुद्धि करने के लिए 1[अपील बोर्डट द्वारा किए गए किसी आदेश में यह निदेश दिया जाएगा कि परिशुद्धि की सूचना की तामील नियंत्रक पर विहित रीति से की जाए जो ऐसी सूचना की प्राप्ति पर रजिस्टर में तदनुसार परिशुद्धि करेगा । 

72. रजिस्टर का निरीक्षण के लिए खुला रहना-(1) इस अधिनियम के और इसके अधीन बनाए गए किन्हीं भी नियमों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, रजिस्टर सभी उपयुक्त समयों पर लोक-निरीक्षण के लिए खुला रहेगा और रजिस्टर की किसी प्रविष्टि की प्रमाणित प्रतियां जो पेटेन्ट कार्यालय की मुद्रा से मुद्रांकित हो, विहित फीस का संदाय किए जाने पर उनकी अपेक्षा करने वाले किसी भी व्यक्ति को दी जाएंगी । 

(2) रजिस्टर उन सभी बातों का प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होगा जिनका उसमें दर्ज किया जाना इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अपेक्षित या प्राधिकृत है । 

 [(3) यदि विशिष्टियों का अभिलेख कम्प्यूटर फ्लापियों, डिस्कैटों या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखा जाता है तो उस दशा में उपधारा (1) और उपधारा (2) का अनुपालन किया गया समझा जाएगा जब विशिष्टियों के ऐसे अभिलेख की ऐसी कम्प्यूटर फ्लापियां, डिस्कैटों या कोई अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप या प्रिन्ट आउट निरीक्षण के लिए जनता की पहुंच में हों ।]

अध्याय 14

पेटेन्ट कार्यालय और उसका स्थापन

73. नियंत्रक और अन्य अधिकारी-(1)  [व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (1999 का 47) की धारा 3] की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किया गया पेटेन्ट, डिजाइन और व्यापार चिह्न महानियंत्रक इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए पेटेन्ट नियंत्रक होगा । 

(2) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, केन्द्रीय सरकार, उतने परीक्षक और अन्य अधिकारी, ऐसे पदाभिधानों सहित, जो वह ठीक समझे, नियुक्त कर सकेगी । 

(3) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किए गए अधिकारी नियंत्रक के अधीक्षण और निदेशन के अधीन इस अधिनियम के अधीन नियंत्रक के ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेंगे जो नियंत्रक समय-समय पर, लिखित, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, निर्वहन करने के लिए उन्हें प्राधिकृत करे ।

(4) उपधारा (3) के उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, नियंत्रक लिखित आदेश द्वारा और उसके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किए गए किसी अधिकारी के समक्ष लम्बित किसी मामले को प्रत्याहृत कर सकेगा और ऐसे मामले के विषय में या तो नए सिरे से या उस प्रक्रम से जहां से वह ऐसे प्रत्याहृत किया गया था, स्वयं कार्यवाही कर सकेगा या उस मामले को उपधारा (2) के अधीन नियुक्त किए गए ऐसे किसी अन्य अधिकारी को अन्तरित कर सकेगा जो अन्तरण के आदेश के विशेष निदेशों के अधीन रहते हुए, मामले में या तो नए सिरे से या उस प्रक्रम से जहां से वह ऐसे अन्तरित किया गया था, कार्यवाही कर सकेगा । 

74. पेटेन्ट कार्यालय और उसकी शाखाएं-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए एक कार्यालय होगा जो पेटेन्ट कार्यालय के नाम से ज्ञात होगा । 

 [(2) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, पेटेन्ट कार्यालय का नाम विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।] 

(3) पेटेन्ट कार्यालय का मुख्य कार्यालय ऐसे स्थान पर होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट करे और पेटेन्टों के रजिस्ट्रीकरण को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए पेटेन्ट कार्यालय के शाखा कार्यालय ऐसे अन्य स्थानों पर स्थापित किए जा सकेंगे जिन्हें केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।

(4) पेटेन्ट कार्यालय की एक मुद्रा होगी ।

75. पेटेन्ट कार्यालय के कर्मचारियों पर पेटेन्ट में अधिकार या हित के विषय में निर्बन्धन-पेटेन्ट कार्यालय के सभी अधिकारी और कर्मचारी उस अवधि में जब कि वे अपने पद धारण करते हैं इस बात के लिए अयोग्य होंगे कि वे, विरासत या वसीयत के सिवाय, ऐसे किसी पेटेन्ट में अधिकार या हित, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः अर्जित करें या प्राप्त करें जो उस कार्यालय द्वारा जारी किया गया है ।

76. अधिकारियों और कर्मचारियों द्वारा जानकारी, आदि का दिया जाना-पेटेन्ट कार्यालय का कोई अधिकारी या कर्मचारी, उस दशा के सिवाय जब कि इस अधिनियम द्वारा या  [केन्द्रीय सरकार, अपील बोर्डट या नियंत्रक के लिखित निदेश के अधीन या न्यायालय के आदेश द्वारा उससे ऐसी अपेक्षा की जाए या उसे प्राधिकृत किया जाए- 

(क) ऐसे किसी विषय में जिसमें इस अधिनियम के अधीन  । । । के अधीन कोई कार्यवाही की जा रही है या की जा चुकी है, जानकारी नहीं देगा, अथवा 

(ख) इस अधिनियम के अधीन या 2। । । के अधीन पेटेन्ट कार्यालय में दाखिल की जाने के लिए अपेक्षित या अनुज्ञात कोई दस्तावेज न तो तैयार करेगा और न उसके तैयार किए जाने में सहायता करेगा; अथवा 

(ग) पेटेन्ट कार्यालय के अभिलेखों की तलाशी नहीं लेगा । 

अध्याय 15

नियंत्रक की साधारणतः शक्तियां

77. नियंत्रक को सिविल न्यायालय की कतिपय शक्तियां होना-(1) इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, नियंत्रक को इस अधिनियम के अधीन अपने समक्ष की कार्यवाहियों में वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को होती हैं, अर्थात् :-

(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना; 

(ख) किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना; 

(ग) शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना; 

(घ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;  

(ङ) खर्चा दिलवाना;

(च) विहित समय के भीतर और विहित रीति से किए गए आवेदन पर स्वयं अपने विनिश्चय का पुनर्विलोकन करना;

(छ) एकपक्षीय रूप से पारित किए गए आदेश को, विहित समय के भीतर और विहित रीति से किए गए आवेदन पर, अपास्त करना;

(ज)  कोई अन्य विषय जो विहित किया जा सकता है ।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियंत्रक को प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करते हुए, उसके द्वारा खर्चा दिलवाने से सम्बन्धित किसी आदेश का निष्पादन सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में किया जा सकेगा । 

78. लेखन संबंधी गलतियों, आदि को शुद्ध करने की नियंत्रक की शक्ति-(1) पेटेन्टों के लिए आवेदनों या पूर्ण विनिर्देशों            [या उससे संबंधित अन्य दस्तावेजोंट के संशोधन की बाबत धारा 57 और धारा 59 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना तथा धारा 44 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, नियंत्रक, किसी पेटेन्ट में या किसी विनिर्देश में या ऐसी दस्तावेज में जो ऐसे आवेदन के अनुसरण में फाइल की गई है या पेटेन्ट के लिए किसी आवेदन में किसी लेखन संबंधी गलती को या रजिस्टर में दर्ज किसी विषय में किसी लेखन संबंधी गलती को, इस धारा के उपबन्धों के अनुसार शुद्ध कर सकेगा । 

(2)  इस धारा के अनुसरण में कोई शुद्धि या तो किसी हितबद्ध व्यक्ति द्वारा किए गए ऐसे लिखित निवेदन पर, जिसके साथ विहित फीस दी गई हो, अथवा ऐसे निवेदन के बिना, की जा सकेगी ।

(3) जहां नियंत्रक इस धारा के अधीन किए गए निवेदन के अनुसरण से भिन्न रूप में, यथापूर्वोक्त कोई ऐसी शुद्धि करने की प्रस्थापना करता है वहां वह, यथास्थिति, पेटेन्टधारी या पेटेन्ट के आवेदक को तथा ऐसे अन्य व्यक्ति को, जो उसे सम्बद्ध प्रतीत होता है, उस प्रस्तावना की सूचना देगा और शुद्धि करने से पूर्व उन्हें सुनवाई का अवसर देगा । 

(4) जहां कोई निवेदन पेटेन्ट में या पेटेन्ट के लिए आवेदन में या ऐसे आवेदन के अनुसरण में फाइल की गई किसी दस्तावेज में किसी गलती की शुद्धि के लिए इस धारा के अधीन किया जाता है और नियंत्रक को यह प्रतीत होता है कि शुद्धि उस दस्तावेज के, जिससे निवेदन सम्बद्ध है, अर्थ या क्षेत्र का तात्त्विक रूप में परिवर्तन करेगी और ऐसी शुद्धि उससे प्रभावित होने वाले व्यक्तियों को सूचना दिए बिना नहीं की जानी चाहिए वहां वह प्रस्थापित शुद्धि की प्रकृति की सूचना के बारे में यह अपेक्षा करेगा कि वह विहित रीति से  [प्रकाशितट की जाए ।

(5) कोई हितबद्ध व्यक्ति यथापूर्वोक्त  [ऐसे प्रकाशनट के पश्चात् विहित समय के भीतर उस निवेदन का विरोध करने की सूचना नियंत्रक को दे सकेगा और जहां विरोध की ऐसी सूचना दी जाती है वहां नियंत्रक उसकी सूचना उस व्यक्ति को देगा जिसके द्वारा वह निवेदन किया गया था और उसके पूर्व कि वह मामले का विनिश्चय करे उस व्यक्ति को और विरोधकर्ता को सुनवाई का                   अवसर देगा । 

79. साक्ष्य किस प्रकार दिया जाए और उसकी बाबत नियंत्रक की शक्तियां-इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन नियंत्रक के समक्ष की किसी कार्यवाही में नियंत्रक के तत्प्रतिकूल निदेशों के अभाव में,              शपथ-पत्र द्वारा साक्ष्य दिया जाएगा, किंतु किसी ऐसे मामले में, जिसमें नियंत्रक ऐसा करना ठीक समझता है, वह शपथ-पत्र द्वारा साक्ष्य के बदले में या उसके अतिरिक्त, मौखिक साक्ष्य ले सकेगा या किसी पक्षकार की उसके शपथ-पत्र की अन्तर्वस्तु पर प्रतिपरीक्षा किए जाने की अनुज्ञा दे सकेगा । 

80. वैवेकिक शक्तियों का नियंत्रक द्वारा प्रयोग-इस अधिनियम के किसी ऐसे उपबन्ध पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना जिससे नियंत्रक से यह अपेक्षा की गई है कि वह इस अधिनियम के अधीन की कार्यवाहियों के किसी पक्षकार को सुने या किसी ऐसे पक्षकार को सुनवाई का अवसर दे, नियंत्रक पेटेन्ट के या विनिर्देश के संशोधन के आवेदक को इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन नियंत्रक में विहित किसी विवेकाधिकार का उस आवेदक के प्रतिकूल प्रयोग करने से पूर्व (यदि आवेदक विहित समय के भीतर ऐसी अपेक्षा करे) सुनवाई का अवसर देगा : 

 [परन्तु सुनवाई की वांछा करने वाला पक्षकार, नियंत्रक को ऐसी सुनवाई के लिए कार्यवाही के संबंध  में विनिर्दिष्ट समय-सीमा की समाप्ति से कम से कम दस दिन पूर्व निवेदन करे ।]

81. समय बढ़ाने के लिए किए गए आवेदनों का नियंत्रक द्वारा निपटाया जाना-जहां नियंत्रक कोई कार्य करने के लिए इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों के अधीन समय बढ़ा सकता है वहां इस अधिनियम की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह नियंत्रक से यह अपेक्षा करती है कि वह समय बढ़ाने का विरोध करने में हितबद्ध पक्षकार को सूचना दे या उसको सुने, और न नियंत्रक के किसी ऐसे आदेश की अपील हो सकेगी जिसमें इस प्रकार समय बढ़ाने की मंजूरी दी गई है ।  

[अध्याय 16

पेटेंटों का क्रियान्वयन, अनिवार्य अनुज्ञप्तियां और प्रतिसंहरण

82. “पेटेंटकृत वस्तु" और पेटेंटधारी" की परिभाषाएं-इस अध्याय में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) “पेटेंटकृत वस्तु" के अंतर्गत ऐसी वस्तु भी है, जिसका निर्माण पेटेंटकृत प्रक्रिया द्वारा किया जाता है; और 

(ख) “पेटेंटधारी" के अंतर्गत अनन्य अनुज्ञप्तिधारी भी हैं । 

83. पेटेंटकृत आविष्कारों के क्रियान्वयन को लागू साधारण सिद्धांत-इस अधिनियम के अन्य उपबंधों पर, प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस अध्याय द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने में, निम्नलिखित सामान्य बातों का ध्यान रखा जाएगा, अर्थात् :-

(क) पेटेंट, आविष्कारों को प्रोत्साहित करने के लिए और यह सुनिश्चित करने के लिए अनुदत्त किए जाते हैं कि आविष्कार, वाणिज्यिक पैमाने पर और पूर्णतम मात्रा में भारत में क्रियान्वित किए जाएं जो असम्यक् विलंब के बिना युक्तियुक्त तौर पर साध्य हैं; 

(ख) वे केवल इसलिए अनुदत्त नहीं किए जाते हैं कि वे पेटेंटधारियों को पेटेंटकृत वस्तु के आयात के लिए एकाधिकार का उपयोग करने में समर्थ बनाए; 

(ग) पेटेंट अधिकारों का संरक्षण और प्रवर्तन, प्रौद्योगिक नवप्रवर्तन के संवर्धन और प्रौद्योगिकी के अंतरण और प्रसार, प्रौद्योगिक ज्ञान के प्रस्तुतकर्ताओं और उपयोगकर्ताओं के पारस्परिक फायदों के लिए ऐसी रीति में जो सामाजिक और आर्थिक कल्याण के लिए सहायक हो और अधिकारों और बाध्यताओं के संतुलन में योगदान देता है; 

(घ) अनुदत्त पेटेंट जनस्वास्थ्य और पोषण के संरक्षण में बाधा नहीं डाले और विशेष रूप से भारत के सामाजिक, आर्थिक और प्रौद्योगिक विकास के लिए अधिक महत्व वाले सेक्टरों में जनता के हित को बढ़ाने के लिए साधन के रूप में           कार्य करें; 

(ङ) अनुदत्त पेटेंट किसी रूप में केन्द्रीय सरकार को जनस्वास्थ्य की संरक्षा के लिए उपाय करने से प्रतिषिद्ध नहीं करते हैं; 

(च) पेटेंट अधिकार का पेटेंटधारी से पेटेंट का हक या हित प्राप्त करने वाले व्यक्ति द्वारा दुरुपयोग नहीं किया जाता है और पेटेंटधारी या पेटेंटधारी में पेटेंट का हक या हित प्राप्त करने वाला व्यक्ति ऐसी पद्धतियों का आश्रय नहीं लेता है जो अयुक्तियुक्त रूप से व्यापार को अवरुद्ध करती हैं या प्रौद्योगिकी के अंतरराष्ट्रीय अंतरण पर प्रतिकूल प्रभाव डालती है; 

(छ) पेटेंट जनता को युक्तियुक्त रूप से वहनीय कीमतों पर पेटेंटकृत आविष्कार उपलब्ध कराने के लिए                दिए जाते है ।

84. अनिवार्य अनुज्ञप्तियां-(1) कोई भी हितबद्ध व्यक्ति, पेटेंट के  [अनुदानट की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् किसी भी समय नियंत्रक को पेटेंट के संबंध में अनिवार्य अनुज्ञप्ति दिए जाने के लिए आवेदन निम्नलिखित में से किन्हीं आधारों पर कर सकेगा, अर्थात् :-

(क) पेटेंटकृत आविष्कार की बाबत जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाओं को पूरा नहीं किया गया है, या 

(ख) पेटेंटकृत आविष्कार युक्तियुक्त रूप से वहनीय कीमत पर जनता को उपलब्ध नहीं है, या 

(ग) पेटेंटकृत आविष्कार भारत के राज्यक्षेत्र में क्रियान्वित नहीं किया जाता है ।  

(2) इस धारा के अधीन कोई आवेदन किसी व्यक्ति द्वारा इस बात के होते हुए भी किया जा सकेगा कि वह पहले से ही पेटेंट के अधीन अनुज्ञप्ति का धारक है और किसी भी व्यक्ति को, उसके द्वारा चाहे ऐसी अनुज्ञप्ति में या अन्यथा की गई किसी स्वीकृति के कारण अथवा उसके द्वारा ऐसी अनुज्ञप्ति प्रतिगृहीत कर लेने के कारण यह अभिकथन करने से विबंधित नहीं किया जाएगा कि पेटेंटकृत आविष्कार की बाबत जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाएं पूरी नहीं की गई हैं या पेटेंटकृत आविष्कार भारत के राज्यक्षेत्र में क्रियान्वित नहीं किया गया है या पेटेंटकृत आविष्कार जनता को युक्तियुक्त रूप से वहनीय कीमत पर उपलब्ध नहीं है ।

(3) उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्येक आवेदन में, आवेदक के हित की प्रकृति को, ऐसी विशिष्टियों के साथ जो विहित की जाएं और उन तथ्यों को जिन पर आवेदन आधारित है, उपवर्णित करने वाला कथन अंतर्विष्ट होगा । 

(4) यदि नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि पेटेंटकृत आविष्कार की बाबत जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाएं पूरी नहीं की गई हैं या पेटेंटकृत आविष्कार भारत के राज्यक्षेत्र में क्रियान्वित नहीं किया गया है या पेटेंटकृत आविष्कार जनता को युक्तियुक्त रूप से वहनीय कीमत पर उपलब्ध नहीं है तो वह ऐसे निबंधनों पर, जिन्हें वह ठीक समझे, अनुज्ञप्ति अनुदत्त कर सकेगा । 

(5) जहां नियंत्रक पेटेंटधारी को अनुज्ञप्ति अनुदत्त करने के लिए निदेश देता है वहां वह उसके आनुषंगिक रूप में धारा 88 में उपवर्णित शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा । 

(6) इस धारा के अधीन फाइल किए गए आवेदन पर विचार करने में नियंत्रक निम्नलिखित बातों को ध्यान में रखेगा,-

(i)  आविष्कार की प्रकृति, वह समय जो पेटेंट के मुद्रांकन के  बाद बीत गया हो और आविष्कार का पूर्ण उपयोग करने के लिए पेटेंटधारी या किसी अनुज्ञप्तिधारी द्वारा पहले से ही किए गए उपाय;

(ii) आविष्कार को जनता की भलाई के लिए क्रियान्वित करने के लिए आवेदक की योग्यता;

(iii) यदि आवेदन मंजूर किया गया होता तो पूंजी की व्यवस्था करने और आविष्कार को क्रियान्वित करने में जोखिम उठाने के लिए आवेदक की सामर्थ्य; 

(iv) क्या आवेदक ने पेटेंटधारी से युक्तियुक्त निबंधनों और शर्तों पर अनुज्ञप्ति अभिप्राप्त करने के प्रयास किए हैं और ऐसे प्रयास उस युक्तियुक्त अवधि के भीतर, जिसे नियंत्रक ठीक समझे, सफल नहीं हुए हैं :

                परन्तु यह खंड, राष्ट्रीय आपात स्थिति की दशा में या चरम अत्यावश्यकता की अन्य परिस्थितियों में या सार्वजनिक वाणिज्यिकेतर उपयोग की दशा में; या पेटेंटधारी द्वारा अपनाई गई प्रतियोगितारोधी प्रथाओं के आधार के सिद्ध होने पर लागू नहीं होगा, किंतु आवेदन किए जाने के बाद की बातों को ध्यान में रखना अपेक्षित नहीं होगा । 

 [स्पष्टीकरण-खंड (iv) के प्रयोजनों के लिए युक्तियुक्त अवधि" का ऐसी अवधि के रूप में अर्थ लगाया जाएगा जो सामान्यतः छह मास की अवधि से अधिक नहीं है ।]

(7) इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए, जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाओं को तब पूरा नहीं किया गया समझा जाएगा,-

(क) यदि पेटेंटधारी के युक्तियुक्त निबंधनों पर अनुज्ञप्ति या अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करने से इंकार किए                   जाने के कारण,-

(i) विद्यमान व्यापार या उद्योग या उसके विकास पर या किसी नए व्यापार या उद्योग की भारत में स्थापना पर या भारत में व्यापार अथवा विनिर्माण करने वाले किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के वर्ग के व्यापार या उद्योग पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है; या 

(ii) पेटेंटकृत वस्तु की मांग पर्याप्त मात्रा में या युक्तियुक्त निबंधनों पर पूरी नहीं की जा रही है; या 

(iii) भारत में विनिर्मित पेटेंटकृत वस्तु के निर्यात के लिए बाजार को उस वस्तु का प्रदाय नहीं किया जा रहा है या उसे विकसित नहीं किया जा रहा है; या 

(iv) भारत में वाणिज्यिक क्रियाकलापों की स्थापना या विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है; या

(ख) यदि पेटेंटधारी द्वारा पेटेंट के अधीन अनुज्ञप्तियों के अनुदत्त किए जाने पर या पेटेंटकृत वस्तु या प्रक्रिया के क्रय, भाड़े पर लेने या उपयोग पर अधिरोपित शर्तों के कारण, उन पदार्थों के जो पेटेंट द्वारा संरक्षित नहीं हैं, विनिर्माण, उपयोग या विक्रय पर भारत में किसी व्यापार या उद्योग की स्थापना या विकास पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, या

(ग) यदि पेटेंटधारी अनन्य अनुदान वापसी, पेटेंट की विधिमान्यता को चुनौतियां दिए जाने को रोकने या बलपूर्वक पैकेज अनुज्ञप्ति देने का उपबंध करने के लिए पेटेंट के अधीन अनुज्ञप्तियों के अनुदत्त किए जाने पर शर्त अधिरोपित                   करता है; या 

(घ) यदि पेटेंटकृत आविष्कार भारत के राज्यक्षेत्र में वाणिज्यिक पैमाने पर पर्याप्त मात्रा में क्रियान्वित नहीं किया जा रहा है या पूर्णतम मात्रा में ऐसे क्रियान्वित नहीं किया जा रहा है जो युक्तियुक्त रूप से साध्य है, या 

(ङ) यदि निम्नलिखित व्यक्तियों द्वारा विदेश से पेटेंटकृत वस्तु के आयात से पेटेंटकृत आविष्कार के भारत के राज्यक्षेत्र में वाणिज्यिक पैमाने पर क्रियान्वयन में रुकावट आ रही है या वह अवरोधित हो रहा है,-

(i) पेटेंटधारी या उसके अधीन होने का दावा करने वाले व्यक्तियों द्वारा; या 

(ii) उससे प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से क्रय करने वाले व्यक्तियों द्वारा; या 

(iii) ऐसे अन्य व्यक्तियों द्वारा जिनके विरुद्ध पेटेंटधारी अतिलंघन के लिए कार्यवाहियां नहीं कर रहा है या उसने नहीं की हैं । 

85. क्रियान्वित किए जाने के कारण नियंत्रक द्वारा पेटेंटों का प्रतिसंहरण-(1) जहां किसी पेटेंन्ट के बारे में अनिवार्य अनुज्ञप्ति अनुदत्त की गई है वहां केन्द्रीय सरकार या कोई भी हितबद्ध व्यक्ति, नियंत्रक को, प्रथम अनिवार्य अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने के आदेश की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात्, पेटेंट का इस आधार पर प्रतिसंहरण करने के आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा  कि पेटेंटकृत आविष्कार को भारत के राज्यक्षेत्र में क्रियान्वित नहीं किया गया है या पेटेंटकृत आविष्कार की बाबत जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाएं पूरी नहीं की गई हैं या पेटेंटकृत आविष्कार जनता को युक्तियुक्त वहनीय कीमत पर उपलब्ध नहीं है ।  

(2) उपधारा (1) के अधीन किए गए प्रत्येक आवेदन में ऐसी विशिष्टियां, जो विहित की जाएं, वे तथ्य जिन पर आवेदन आधारित है, अंतर्विष्ट होंगी और केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए आवेदन से भिन्न आवेदन की दशा में, उसमें आवेदक के हित की प्रकृति भी उपवर्णित होगी । 

(3) यदि नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि पेटेंटकृत आविष्कार की बाबत जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाएं पूरी नहीं की गई हैं या पेटेंटकृत आविष्कार भारत के राज्यक्षेत्र में क्रियान्वित नहीं किया गया है या पेटेंटकृत आविष्कार जनता को युक्तियुक्त रूप से वहनीय कीमत पर उपलब्ध नहीं है तो वह पेटेंन्ट के प्रतिसंहरण का आदेश कर सकेगा । 

(4) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक आवेदन का विनिश्चय सामान्यतया नियंत्रक को उसके प्रस्तुत किए जाने के एक वर्ष के भीतर किया जाएगा । 

86. कुछ दशाओं में अनिवार्य अनुज्ञप्तियों आदि के लिए आवेदनों को स्थगित करने की नियंत्रक की शक्ति-(1) जहां, यथास्थिति, धारा 84 या धारा 85 के अधीन आवेदन इस आधार पर कि पेटेंटकृत आविष्कार को भारत राज्यक्षेत्र में क्रियान्वित नहीं किया गया है या धारा 84 की उपधारा (7) के खंड (घ) में वर्णित आधार पर किया जाता है और नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि जब पेटेंट का मुद्रांकन किया गया था तब से जो समय बीत गया है, वह आविष्कार को वाणिज्यिक पैमाने पर पर्याप्त मात्रा में क्रियान्वित किए जाने के लिए या आविष्कार को पूर्णतम मात्रा में ऐसे क्रियान्वित किए जाने के लिए, जो युक्तियुक्त रूप से साध्य हो, किसी कारण अपर्याप्त रहा है तो वह आदेश द्वारा, आवेदन की आगे सुनवाई कुल मिला कर बारह मास से अनधिक ऐसी अवधि के लिए स्थगित कर सकेगा जो उसे उस आविष्कार के क्रियान्वित किए जाने के लिए पर्याप्त प्रतीत हो :

 परंतु किसी ऐसी दशा में जिसमें पेटेंटधारी यह साबित कर देता है कि पेटेंटधारी आविष्कार का यथापूर्वोक्त क्रियान्वयन आवेदन की तारीख से पूर्व न किए जा सकने का कारण कोई राज्य या केन्द्रीय अधिनियम  या उसके अधीन बनाया गया कोई नियम या विनियम था या सरकार का कोई ऐसा आदेश था जो भारत के राज्यक्षेत्र में आविष्कार के क्रियान्वयन के लिए या पेटेंटकृत वस्तुओं के, अथवा ऐसी वस्तुओं के जो उस प्रक्रिया द्वारा या पेटेंटकृत संयंत्र, मशीनरी या साधित्र के उपयोग से बनाई गई है, व्ययन के लिए, शर्त के तौर पर अधिरोपित किए जाने से अन्यथा अधिरोपित किया गया था, वहां उस स्थगन की, जिसका आदेश इस उपधारा के अधीन किया गया था, अवधि की गणना उस तारीख से की जाएगी जिसको आवेदन की तारीख से यथासंगणित उस अवधि की समाप्ति होती है, जिसके दौरान उस आविष्कार का क्रियान्वयन ऐसे अधिनियम, नियम या विनियम या सरकार के आदेश द्वारा रुक गया था ।

(2) उपधारा (1) के अधीन कोई भी स्थगन आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि नियंत्रक का यह समाधान नहीं हो जाता है कि पेटेंटधारी ने आविष्कार का भारत के राज्यक्षेत्र में वाणिज्यिक पैमाने पर और पर्याप्त मात्रा में क्रियान्वयन प्रारंभ करने के लिए पर्याप्त या युक्तियुक्त कार्रवाई तत्परता के साथ की है । 

87. धारा 84 और धारा 85 के अधीन किए गए आवेदनों पर कार्यवाही करने के लिए प्रक्रिया-(1) जहां नियंत्रक का, धारा 84 या धारा 85 के अधीन किए गए आवेदन पर विचार करने के पश्चात् यह समाधान हो जाता है कि आदेश करने के लिए प्रथमदृष्ट्या मामला बन गया है वहां वह आवेदक को यह निदेश देगा कि वह आवेदन की प्रतियों की पेटेंटधारी पर और ऐसे किसी अन्य व्यक्ति पर, जो रजिस्टर से उस पेटेंट के बारे में हितबद्ध प्रतीत होता है, जिसकी  बाबत आवेदन किया गया है, तामील करे और वह  [आवेदन को शासकीय जर्नल में प्रकाशित करेगा] ।

(2) पेटेंटधारी या ऐसा कोई अन्य व्यक्ति, जो आवेदन का विरोध करना चाहता है, ऐसे समय के भीतर जो विहित किया जाए या ऐसे अतिरिक्त समय के भीतर, जो नियंत्रक (विहित समय की समाप्ति के या तो पूर्व या पश्चात् किए गए) आवेदन पर अनुज्ञात करे, विरोध की सूचना नियंत्रक को देगा ।  

(3) विरोध की किसी ऐसी सूचना में कथन अंतर्विष्ट होगा जिसमें वे आधार उपवर्णित होंगे जिन पर आवेदन का विरोध किया गया है ।

(4) जहां विरोध की कोई ऐसी सूचना सम्यक् रूप से दी गई है वहां नियंत्रक आवेदक को अधिसूचित करेगा तथा आवेदक और विरोधकर्ता को मामले का विनिश्चय करने के पूर्व सुनवाई का अवसर देगा ।

88. अनिवार्य अनुज्ञप्तियां अनुदत्त करने की नियंत्रक की शक्तियां-(1) जहां नियंत्रक का धारा 84 के अधीन किए गए आवेदन पर यह समाधान हो जाता है कि पेटेंट द्वारा संरक्षित न किए गए पदार्थों के विनिर्माण, उपयोग या विक्रय पर, उन शर्तों के कारण, जो पेटेंटधारी द्वारा पेटेंट के अधीन अनुज्ञप्तियों के अनुदत्त किए जाने पर या पेटेंटकृत वस्तु के क्रय, भाड़े पर लेने या उपयोग पर या प्रक्रिया पर अधिरोपित की गई है, प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है वहां वह, उस धारा के उपबंधों के अधीन रहते हुए, आवेदक के उन ग्राहकों को, जिन्हें वह ठीक समझे और आवेदक को, पेटेंट के अधीन अनुज्ञप्तियों के अनुदत्त किए जाने का आदेश कर सकेगा । 

(2) जहां धारा 84 के अधीन आवेदन उस व्यक्ति द्वारा किया जाता है जो पेटेंट के अधीन अनुज्ञप्ति का धारक है वहां नियंत्रक, यदि वह आवेदक को अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने के लिए आदेश करता है तो, विद्यमान अनुज्ञप्ति के रद्द किए जाने का आदेश कर सकेगा अथवा यदि वह ठीक समझे तो आवेदक को अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने के लिए आदेश करने के बजाय, विद्यमान अनुज्ञप्ति को संशोधित किए जाने का आदेश कर सकेगा ।

(3) जहां दो या दो से अधिक पेटेंट एक ही पेटेंटधारी द्वारा धारित हैं और अनिवार्य अनुज्ञप्ति का आवेदक यह साबित कर देता है कि जनता की युक्तियुक्त अपेक्षाएं उक्त पेटेंटों में से कुछ ही पेटेंटों की बाबत पूरी नहीं की गई हैं वहां, यदि नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक उन पेटेंटों के अधीन उसे अनुदत्त अनुज्ञप्ति को, पेटेंटधारी द्वारा धारित अन्य पेटेंटों का अतिलंघन किए बिना, दक्षता से या समाधानप्रद रूप में क्रियान्वित नहीं कर सकता और यदि उन पेटेंटों में अन्य पेटेंटों के संबंध में विशेष आर्थिक सार्थकता की महत्वपूर्ण तकनीकी प्रगति अंतर्वलित है तो, वह आदेश द्वारा, अनुज्ञप्तिधारी को उस पेटेंट या उन पेटेंटों को क्रियान्वित करने के लिए समर्थ बनाने हेतु, जिनकी बाबत धारा 84 के अधीन अनुज्ञप्ति अनुदत्त की गई है, अन्य पेटेंटों की बाबत भी अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने का निदेश दे सकेगा ।

(4) जहां अनुज्ञप्ति के निबंधन और शर्तें नियंत्रक द्वारा तय की गई हैं वहां अनुज्ञप्तिधारी, आविष्कार को वाणिज्यिक पैमाने पर कम से कम बारह मास की अवधि के लिए क्रियान्वित करने के पश्चात् किसी भी समय, नियंत्रक को उन निबंधनों और शर्तों के पुनरीक्षण के लिए आवेदन इस आधार पर कर सकेगा कि तय किए गए निबंधन और शर्तें उनसे अधिक दुर्भर साबित हुई हैं जो मूलतः प्रत्याशित थी और उनके परिणामस्वरूप अनुज्ञप्तिधारी हानि उठाए बिना आविष्कार को क्रियान्वित करने में असमर्थ है :

परन्तु ऐसा कोई आवेदन दूसरी बार ग्रहण नहीं किया जाएगा ।

89. अनिवार्य अनुज्ञप्तियों के अनुदत्त करने के लिए साधारण प्रयोजन-धारा 84 के अधीन किए गए आवेदन के संबंध में नियंत्रक की शक्तियां निम्नलिखित साधारण प्रयोजनों को सुनिश्चित करने की दृष्टि से प्रयोग की जाएंगी, अर्थात्- 

(क) पेटेन्टकृत आविष्कार भारत के राज्यक्षेत्र में असम्यक् विलंब के बिना और पूर्णतम मात्रा में वाणिज्यिक पैमाने पर ऐसे क्रियान्वित किए जाएं जो युक्तियुक्त रूप से साध्य हों; 

(ख) भारत के राज्यक्षेत्र में पेटेन्ट के संरक्षण के अधीन आविष्कार को तत्समय क्रियान्वित या विकसित करने वाले किसी व्यक्ति के हितों पर अनुचित रूप से प्रतिकूल प्रभाव न पड़े । 

90. अनिवार्य अनुज्ञप्तियों के निबंधन और शर्तें-(1) धारा 84 के अधीन अनुज्ञप्ति के निबंधन और शर्तें तय करने में नियंत्रक यह सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा कि-

(i) पेटेन्टधारी या पेटेन्ट में फायदा पाने के हकदार अन्य व्यक्ति को आरक्षित स्वामिस्व और अन्य पारिश्रमिक; यदि कोई हो, आविष्कार की प्रकृति को, आविष्कार करने में या उसे विकसित करने में और पेटेन्ट अभिप्राप्त करने में, और उसे प्रवर्तन में रखने में उपगत व्यय को तथा अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए, युक्तियुक्त है; 

(ii) पेटेन्टकृत आविष्कार उस व्यक्ति द्वारा, जिसको अनुज्ञप्ति अनुदत्त की गई है, पूर्णतम मात्रा में और उसके युक्तियुक्त लाभ के साथ क्रियान्वित किया जाता है; 

(iii) पेटेन्टकृत वस्तुएं जनता को युक्तियुक्त रूप से वहनीय कीमतों पर उपलब्ध की जाती हैं; 

(iv) अनुदत्त अनुज्ञप्ति अनन्येतर अनुज्ञप्ति है; 

(v) अनुज्ञप्तिधारी का अधिकार समनुदेशनेतर है; 

(vi) अनुज्ञप्ति तभी तक पेटेन्ट की शेष अवधि के लिए है, जब तक कि अत्पतर अवधि लोकहित के संगत है ;

 [(vii) अनुज्ञप्ति भारतीय बाजार में प्रदाय के प्रधान प्रयोजन से अनुदत्त की गई है और यह कि अनुज्ञप्तिधारी, यदि धारा 84 की उपधारा (7) के खंड (क) के उपखंड (iii) के उपबंधों के अनुसार आवश्यक हो तो पेटेन्टीकृत उत्पादक निर्यात भी कर सकेगा; 

(viii) अर्द्धचालक प्रौद्योगिकी की दशा में, अनुदत्त की गई अनुज्ञप्ति लोक वाणिज्येतर उपयोग के लिए आविष्कार के क्रियान्वयन के लिए है; 

(ix) यदि अनुज्ञप्ति न्यायिक या प्रौद्योगिकी प्रक्रिया के पश्चात् प्रतियोगी विरोधी अवधारित की गई पद्धति का उपचार करने के लिए अनुदत्त को गई है तो अनुज्ञप्तिधारी को, यदि आवश्यकता हो तो पेटेन्टीकृत उत्पाद का निर्यात करने की अनुज्ञा दी जाएगी ।]

(2) नियंत्रक द्वारा, अनुदत्त कोई भी अनुज्ञप्ति किसी अनुज्ञप्तिधारी को पेटेन्टकृत वस्तु या पेटेन्टकृत प्रक्रिया से बनाई गई किसी वस्तु या पदार्थ को विदेश से आयात करने के लिए उस दशा में, प्राधिकृत नहीं करेगी जिसमें कि ऐसा आयात, यदि ऐसे प्राधिकृत न किया गया होता तो, पेटेन्टधारी के अधिकारों का अतिलंघन होता । 

(3) यदि केन्द्रीय सरकार की राय में ऐसा करना लोकहित में आवश्यक हो तो, उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी वह नियंत्रक को किसी भी समय निदेश दे सकेगी कि वह किसी पेटेन्ट के बारे में अनुज्ञप्तिधारी को पेटेन्टकृत वस्तु या पेटेन्टकृत प्रक्रिया से बनाई गई किसी वस्तु  या पदार्थ को विदेश से आयात करने के लिए (ऐसी शर्तों के अधीन जो वह, अन्य बातों के साथ पेटेन्टधारी को देय स्वामिस्व और अन्य पारिश्रमिक, यदि कोई हो, आयात की मात्रा, आयात की गई वस्तु की विक्रय कीमत और आयात-अवधि के संबंध में अधिरोपित करना आवश्यक समझे) प्राधिकृत करे और तब नियंत्रक उन निदेशों को कार्यान्वित करेगा ।

91. संबंधित पेटेंटों का अनुज्ञापन-(1) इस अध्याय के अन्य उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, पेटेन्ट के मुद्राकंन के पश्चात् किसी भी समय, कोई ऐसा व्यक्ति, जो किसी अन्य पेटेन्टकृत आविष्कार को या तो उसके पेटेन्टधारी के नाते या उसके, अनन्य या अन्यथा, अनुज्ञप्तिधारी के नाते क्रियान्वित करने का अधिकार रखता है, नियंत्रक को प्रथम उल्लिखित पेटेंन्ट की अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने के लिए आवेदन इस आधार पर कर सकेगा कि उसको ऐसी अनुज्ञप्ति के बिना अन्य आविष्कार को दक्षतापूर्वक या सर्वोत्तम संभव लाभ के साथ क्रियान्वित करने में रुकावट होती है या अवरोध होता है । 

(2) उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि नियंत्रक का यह समाधान नहीं हो                     जाता कि-

(i) आवेदक, पेटेन्टधारी को और उसके अनुज्ञप्तिधारी को, यदि वे ऐसा चाहते हैं, तो, अन्य आविष्कार की बाबत युक्तियुक्त निबंधनों पर अनुज्ञप्ति अनुदत्त करने के लिए या अनुज्ञप्ति अनुदत्त कराने के लिए समर्थ और इच्छुक है; तथा 

(ii) अन्य आविष्कार ने भारत के राज्यक्षेत्र में वाणिज्यिक और औद्योगिक क्रियाकलापों के स्थापन या विकास में पर्याप्त योगदान दिया है । 

(3) यदि नियंत्रक का यह समाधान हो जाता है कि उपधारा (1) में वर्णित शर्तें आवेदक द्वारा पूरी कर दी गई हैं तो वह प्रथमवर्णित पेटेन्ट के अधीन अनुज्ञप्ति अनुदत्त करते हुए आदेश, ऐसे निबंधनों पर जो वह ठीक समझे, कर सकेगा तथा अन्य पेटेन्ट के अधीन वैसा ही आदेश, यदि प्रथमवर्णित पेटेन्ट के स्वत्वधारी या उसके अनुज्ञप्तिधारी द्वारा ऐसा निवेदन किया गया हो तो,                      कर सकेगा :

परन्तु यह कि नियंत्रक द्वारा अनुदत्त अनुज्ञप्ति, सिवाय संबंधित पेटेन्टों के समनुदेशन के, समनुदेशनेतर होगी । 

(4) धारा 87, धारा 88, धारा 89 और धारा 90 के उपबंध इस धारा के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्तियों को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 84 के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्तियों को लागू होते हैं । 

92. केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचनाओं पर अनिवार्य अनुज्ञप्तियों के लिए विशेष उपबंध-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का राष्ट्रीय आपात परिस्थितियों या नितांत अत्यावश्यकता की परिस्थितियों या सार्वजनिक वाणिज्यिकेतर उपयोग की दशा में प्रवृत्त किसी पेटेन्ट के बारे में यह समाधान हो जाता है कि यह आवश्यक है कि अनिवार्य अनुज्ञप्तियां उनके मुद्रांकन के पश्चात् किसी भी समय आविष्कार या आविष्कारों के क्रियान्वयन के लिए अनुदत्त की जानी चाहिएं तो वह राजपत्र में उस प्रभाव की घोषणा कर सकेगी और तब निम्नलिखित उपबंध प्रभावी होंगे, अर्थात् :-

(i) नियंत्रक, अधिसूचना के पश्चात् किसी भी समय किसी हितबद्ध व्यक्ति द्वारा किए आवेदन पर आवेदक को पेटेन्ट के अधीन अनुज्ञप्ति ऐसे निबंधनों पर, जो वह ठीक समझे, अनुदत्त करेगा; 

(ii) इस धारा के अधीन अनुदत्त अनुज्ञप्ति के निबंधनों और शर्तों को तय करने में नियंत्रक इस बात को सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा कि पेटेन्ट के अधीन विनिर्मित वस्तुएं जनता को ऐसी निम्नतम कीमतों पर उपलब्ध होंगी जो पेटेन्टधारियों को उनके पेटेन्ट अधिकारों से उचित फायदा मिलने से संगत हों । 

(2) धारा 83, धारा 87, धारा 88, धारा 89 और धारा 90 के उपबंध इस धारा के अधीन अनुज्ञप्तियों के अनुदत्त किए जाने के बारे में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे धारा 84 के अधीन अनुज्ञप्तियों के अनुदत्त किए जाने के बारे में लागू होते हैं । 

(3) उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, जहां नियंत्रक का उपधारा (1) के खंड (i) में निर्दिष्ट किसी आवेदन पर विचार करने के पश्चात् यह समाधान हो जाता है कि,-

(i) राष्ट्रीय आपात की परिस्थिति में; या 

(ii) नितांत अत्यावश्यकता की परिस्थिति में; या 

(iii) सार्वजनिक वाणिज्यिकेतर उपयोग की दशा में, 

यह आवश्यक है जिसमें अर्जित प्रतिरक्षा कमी के संलक्षण, मानव प्रतिरक्षा कमी के वाइरस, क्षय रोग, मलेरिया या अन्य महामारी से संबंधित लोक स्वास्थ्य संकटावस्थाएं भी हैं, जो, यथास्थिति, उत्पन्न हों या अपेक्षित हों, वहां वह इस धारा के अधीन अनुज्ञप्ति अनुदत्त करने के लिए आवेदन के संबंध में धारा 87 में विनिर्दिष्ट किसी प्रक्रिया को लागू नहीं करेगा :

परंतु नियंत्रक, यथासाध्य शीघ्रता से आवेदन से संबंधित पेटेंट के पेटेंटधारी को धारा 87 के इस प्रकार लागू न होने के बारे में सूचना देगा ।

 [92क. कतिपय असाधारण परिस्थितियों में पेटेंटकृत भेषजीय उत्पादों के निर्यात के लिए अनिवार्य अनुज्ञप्ति-(1) ऐसे किसी देश को, जिसके पास लोक स्वास्थ्य की समस्याओं को हल करने के लिए संबद्ध उत्पाद के लिए भेषजीय सेक्टर में अपर्याप्त विनिर्माण क्षमता है या कोई विनिर्माण क्षमता नहीं है, पेटेंटकृत भेषजीय उत्पादों के विनिर्माण और निर्यात के लिए अनिवार्य अनुज्ञप्ति उपलब्ध होगी, परंतु यह तब जब कि ऐसे देश द्वारा अनिवार्य अनुज्ञप्ति अनुदत्त कर दी गई हो या ऐसे देश ने अधिसूचना द्वारा या अन्यथा भारत से पेटेंटीकृत भेषजीय उत्पादों का आयात अनुज्ञात किया हो ।

(2) नियंत्रक, विहित रीति में, किसी आवेदन की प्राप्ति पर, ऐसे देश को ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट और प्रकाशित की जाएं, संबद्ध भेषजीय उत्पाद के केवल विनिर्माण और निर्यात के लिए अनिवार्य अनुज्ञप्ति अनुदत्त करेगा । 

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंध उस सीमा तक प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले नहीं होंगे जिस तक अनिवार्य अनुज्ञप्ति के अधीन उत्पादित भेषजीय उत्पाद इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध के अधीन निर्यात नहीं किए जा सकते । 

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, भेषजीय उत्पाद" से लोक स्वास्थ्य समस्याओं को दूर करने के लिए आवश्यक भेषजीय सेक्टर का कोई पेटेंटकृत उत्पाद या पेटेंटकृत प्रक्रिया के माध्यम से विनिर्मित उत्पाद अभिप्रेत है और उसके अंतर्गत उनके विनिर्माण के लिए आवश्यक संघटक और उनके उपयोग के लिए अपेक्षित निदान विद्या किट सम्मिलित होगी ।]

93. अनुज्ञप्ति के लिए आदेश का सम्पृक्त पक्षकारों के बीच विलेख के रूप में प्रवर्तित होना-इस अध्याय के अधीन अनुज्ञप्ति के अनुदत्त किए जाने के लिए कोई आदेश ऐसे प्रवर्तित होगा मानो वह पेटेन्टधारी और अन्य सब आवश्यक पक्षकारों द्वारा निष्पादित ऐसा विलेख हो जिसमें नियंत्रक द्वारा तय किए गए निबंधनों और शर्तों को, यदि कोई हों, सन्निविष्ट करने वाली अनुज्ञप्ति अनुदत्त                    की गई हो । 

94. अनिवार्य अनुज्ञप्ति की समाप्ति-(1) पेटेन्टधारी या पेटेन्ट में हक या हित प्राप्त करने वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा किए गए आवेदन पर, धारा 84 के अधीन अनुदत्त अनिवार्य अनुज्ञप्ति नियंत्रक द्वारा समाप्त की जा सकेगी, यदि वे परिस्थितियां जिनमें अनुज्ञप्ति प्रदान की गई थी अब विद्यमान नहीं है और ऐसी परिस्थितियों की पुनरावृत्ति की संभावना भी नहीं है : 

परन्तु अनिवार्य अनुज्ञप्तिधारक को ऐसी समाप्ति के प्रति आपत्ति करने का अधिकार होगा । 

(2) उपधारा (1) के अधीन आवेदन पर विचार करते समय, नियंत्रक इस बात को ध्यान में रखेगा कि उस व्यक्ति के हित पर, जिसे पूर्व में अनुज्ञप्ति अनुदत्त की गई थी, असम्यक् रूप से प्रतिकूल प्रभाव न पड़े ।]

अध्याय 17

सरकार के प्रयोजनों के लिए आविष्कारों का उपयोग और केन्द्रीय सरकार द्वारा आविष्कारों का अर्जन

99. सरकार के प्रयोजनों के लिए आविष्कारों के उपयोग का अर्थ-(1) इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए आविष्कार के बारे में यह बात कि वह सरकार के प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाया जाता है उस दशा में कही जाती है, जिसमें उसका केन्द्रीय सरकार, किसी राज्य सरकार या सरकारी उपक्रम के प्रयोजनों के लिए निर्माण, उपयोग, प्रयोग या विक्रय किया जाता है । 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(3) इस अध्याय की कोई बात किसी मशीन, साधित्र या अन्य वस्तु के किसी ऐसे आयात, निर्माण या उपयोग की या किसी प्रक्रिया के ऐसे उपयोग की या किसी औषध या ओषधि के ऐसे आयात, उपयोग या वितरण की बाबत जो धारा 47= में विनिर्दिष्ट किसी एक या एक से अधिक शर्तों के आधार पर किया जाए, लागू नहीं होगी ।  

100. आविष्कारों का सरकार के प्रयोजनों के लिए उपयोग करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, पेटेन्ट कार्यालय में पेटेन्ट के लिए आवेदन फाइल किए जाने के या पेटेन्ट अनुदत्त किए जाने के पश्चात् किसी भी समय, केन्द्रीय सरकार या उसके द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत कोई भी व्यक्ति आविष्कार का उपयोग, इस अध्याय के उपबन्धों के अनुसार सरकार के प्रयोजनों के लिए कर सकेगा । 

(2) जहां कोई आविष्कार पेटेन्टधारी द्वारा या ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसके अधिकार से उसका हक व्युत्पन्न होता है, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः आविष्कार की संसूचना के परिणाम से भिन्न किसी प्रकार से, सरकार या सरकारी उपक्रम द्वारा या उसकी ओर से पूर्व विनिर्देश में सुसंगत दावे की पूर्विकता तारीख के पूर्व, सम्यक्तः दस्तावेज में अभिलिखित कर लिया गया है या परख लिया गया है या परीक्षित कर लिया गया है वहां केन्द्रीय सरकार या उसके द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा उस आविष्कार का कोई उपयोग, पेटेन्टधारी को कोई स्वामिस्व या अन्य पारिश्रमिक दिए बिना सरकार के प्रयोजनों के लिए किया जा सकेगा ।

(3) यदि और जहां तक आविष्कार यथापूर्वोक्त रूप से न तो अभिलिखित किया गया है, न परखा गया है और न परीक्षित किया गया है, तो और वहां तक आविष्कार का ऐसा कोई उपयोग, जो  [पेटेन्ट के अनुदानट के पश्चात् किसी भी समय या यथापूर्वोक्त किसी ऐसी संसूचना के परिमाणमस्वरूप केन्द्रीय सरकार या उपधारा (1) के अधीन उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा किया जाए, ऐसे निबन्धनों पर किया जाएगा, जिन पर उपयोग के पूर्व या पश्चात् केन्द्रीय सरकार या उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत किसी व्यक्ति के और पेटेन्टधारी के बीच सहमति हो जाए अथवा जो ऐसी सहमति न होने की दशा में धारा 103 के अधीन निर्देश के आधार पर उच्च न्यायालय द्वारा अवधारित किया जाए : 

 [परन्तु किसी पेटेन्ट के ऐसे किसी उपयोग की दशा में, पेटेन्टधारी को, प्रत्येक मामले की परिस्थितियों में, उक्त पेटेन्ट के उपयोग के आर्थिक मूल्य को ध्यान में रखते हुए, पर्याप्त पारिश्रमिक से अधिक संदत्त नहीं किया जाएगा ।]

(4) आविष्कार की बाबत केन्द्रीय सरकार द्वारा इस धारा के अधीन प्राधिकार, पेटेन्ट के अनुदत्त किए जाने के या पूर्व या पश्चात् और अन्य कार्यों के, जिनकी बाबत ऐसा प्राधिकार दिया गया है, किए जाने के या तो पूर्व या पश्चात्, दिया जा सकेगा, तथा किसी व्यक्ति को, चाहे वह आवेदक या पेटेन्धारी द्वारा आविष्कार के निर्माण, उपयोग, प्रयोग या विक्रय के लिए या ऐसे पेटेन्ट के अन्तर्गत आने वाली किसी मशीन, साधित्र या अन्य वस्तु अथवा औषध या औषधि के आयात के लिए प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः प्राधिकृत हो या नहीं, किया जा सकेगा । 

(5) जहां कोई आविष्कार इस धारा के अधीन सरकार के प्रयोजनों के लिए केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके प्राधिकार से उपयोग में लाया गया है वहां,  [राष्ट्रीय आपात या नितांत अत्यावश्यकता की अन्य परिस्थितियों या वाणिज्यिकेतर उपयोग की दशा के सिवायट सरकार यथासाध्यशीघ्र पेटेन्टधारी को तथ्य अधिसूचित करेगी और उसको आविष्कार के उपयोग के विस्तार के बारे में ऐसी जानकारी देगी जिसकी वह, समय-समय पर, युक्तियुक्त रूप से अपेक्षा करे और जहां आविष्कार सरकारी उपक्रम के प्रयोजनों के लिए उपयोग में लाया गया है वहां केन्द्रीय सरकार ऐसे उपक्रम में ऐसी सूचना मांग सकेगी जो इस प्रयोजन के लिए आवश्यक हो । 

(6) उपधारा (1) के अधीन सरकार के प्रयोजनों के लिए आविष्कार के निर्माण, उपयोग, प्रयोग या विक्रय के अधिकार के अन्तर्गत 4[उस माल के, वाणिज्यिकेतर आधार पर, विक्रय का अधिकार भी होगा] जिसका उस अधिकार का प्रयोग करते हुए निर्माण किया गया है, और ऐसे विक्रय किए गए माल के क्रेता को और उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले व्यक्ति को माल के विषय में इस प्रकार संव्यवहार करने की शक्ति होगी मानो केन्द्रीय सरकार या उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत व्यक्ति आविष्कार के पेटेन्टधारी थे । 

(7) जहां पेटेन्ट की बाबत, जो इस धारा के अधीन प्राधिकार का विषय रहा है, कोई ऐसा अनन्य अनुज्ञप्तिधारी है, जो             धारा 101 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट है, या जहां ऐसे पेटेन्ट का, आविष्कार के उपयोग के प्रति निर्देश द्वारा अवधारित स्वामिस्वों और अन्य फायदों के (जिनके अन्तर्गत न्यूनतम स्वामिस्व के रूप में संदाय भी हैं)  प्रतिफलस्वरूप पेटेन्टधारी को समनुदेशन किया गया है वहां उपधारा (5) के अधीन दिए जाने के लिए निर्दिष्ट सूचना, यथास्थिति, ऐसे अनन्य अनुज्ञप्तिधारी या समनुदेशक को भी दी जाएगी और उपधारा (3) में पेटेन्टधारी के प्रति निर्देश के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत ऐसे समनुदेशक या अनन्य अनुज्ञप्तिधारी के प्रति निर्देश भी है । 

101. सरकार के प्रयोजनों के लिए आविष्कार के उपयोग की बाबत पर-व्यक्तियों के अधिकार-(1) पेटेन्टकृत आविष्कार के, या ऐसे आविष्कार के जिसकी बाबत पेटेन्ट के लिए आवेदन लम्बित है, किसी ऐसे उपयोग के सम्बन्ध में, जो- 

(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा या धारा 100 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा; अथवा

(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए आदेश के अनुसार पेटेन्टधारी या पेटेन्ट के आवेदक द्वारा, सरकार के प्रयोजनों के लिए किया गया है,  । । । अनुदत्त की गई किसी अनुज्ञप्ति, किए गए समनुदेशन अथवा पेटेन्टधारी या पेटेन्ट के आवेदक के (या किसी ऐसे व्यक्ति के जिसका उसके अधिष्कार से हक व्युत्पन्न होता है या जिनके अधिकार से उसका हक व्युत्पन्न होता है) और केन्द्रीय सरकार से भिन्न किसी व्यक्ति के बीच किए गए करार के उपबन्ध वहां तक प्रभावी नहीं होंगे जहां तक कि वे उपबन्ध- 

(i) आविष्कार के या उससे सम्बन्धित किसी प्रतिमान, दस्तावेज या जानकारी के उपयोग को, सरकार के प्रयोजनों के लिए निर्बन्धित या विनियमित करते हैं; अथवा 

(ii) आविष्कार के या उससे सम्बन्धित प्रतिमान, दस्तावेज या जानकारी के ऐसे उपयोग की बाबत सरकार के प्रयोजनों के लिए, ऐसे संदाय । । । करने के लिए उपबन्ध करते हैं,

तथा सरकार के प्रयोजनों के लिए उक्त उपयोग से संसक्त किसी प्रतिमान या दस्तावेज के पुनरुत्पादन या प्रकाशन के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह प्रतिमान या दस्तावेज में अस्तित्वयुक्त, किसी प्रतिलिप्यधिकार का अतिलंघन करता है । 

(2) जहां पेटेन्ट का या पेटेन्ट के लिए आवेदन करने या उसको अभिप्राप्त करने के अधिकार का समनुदेशन, आविष्कार के उपयोग के प्रति निर्देश से अवधारित पेटेन्टधारी को स्वामिस्वों या अन्य फायदों के 1। । । प्रतिफलस्वरूप पेटेन्टधारी को किया गया है वहां आविष्कार के किसी ऐसे उपयोग के संबंध में, जो केन्द्रीय के आदेश के अनुसार पेटेन्टधारी द्वारा सरकार के प्रयोजनों के लिए किया गया है, धारा 100 की उपधारा (3) ऐसे प्रभावी होगी मानो वह उपयोग उस धारा के अधीन दिए गए प्राधिकार के आधार पर किया गया था और उस धारा की उपधारा (3) के आधार पर सरकार के प्रयोजनों के लिए आविष्कार का कोई उपयोग ऐसे प्रभावी होगा मानो पेटेन्टधारी के प्रति निर्देश के अन्तर्गत पेटेन्ट के समनुदेशक के प्रति निर्देश भी है तथा उस उपधारा के आधार पर देय कोई राशि पेटेन्टधारी और समनुदेशन के बीच ऐसे अनुपात में विभाजित की जाएगी जिस पर उनके बीच सहमति हो जाए या जो ऐसी सहमति न होने की दशा में धारा 103 के अधीन निर्देश के आधार पर उच्च न्यायालय द्वारा अवधारित किया जाए । 

(3) जहां धारा 100 की उपधारा (3) के आधार पर, सरकार के प्रयोजनों के लिए आविष्कार के उपयोग की बाबत केन्द्रीय सरकार द्वारा या उस धारा की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकृत व्यक्तियों द्वारा संदाय किए जाने अपेक्षित हैं और जहां ऐसे पेटेन्ट की बाबत कोई ऐसा अनन्य अनुज्ञप्तिधारी है, जो आविष्कार का उपयोग सरकार के प्रयोजनों के लिए अपनी अनुज्ञप्ति के अधीन करने के लिए प्राधिकृत है वहां ऐसी राशि पेटेन्टधारी और ऐसे अनुज्ञप्तिधारी द्वारा ऐसे अनुपातों में, यदि कोई हों, बांट ली जाएगी जिन पर उनके बीच सहमति हो जाए या जो ऐसी सहमति न होने की दशा  में अनुज्ञप्तिधारी द्वारा- 

(क)  उक्त आविष्कार का विकास करने में; अथवा

(ख) आविष्कार के उपयोग के प्रति निर्देश से अवधारित स्वामिस्वों या अन्य फायदों से भिन्न संदाय, अनुज्ञप्ति के प्रतिफलस्वरूप । । । पेटेन्टधारियों को करने में,

उपगत किसी व्यय को ध्यान में रखते हुए, धारा 103 के अधीन निर्देश के आधार पर उच्च न्यायालय द्वारा न्यायसंगत अवधारित               किए जाएं । 

102. आविष्कारों और पेटेन्टों का केन्द्रीय सरकार द्वारा अर्जन-(1) यदि केन्द्रीय सरकार का यह समाधान हो जाता है कि यह आवश्यक है कि ऐसे आविष्कार का जो पेटेन्ट के लिए आवेदन का विषय है या पेटेन्ट का अर्जन आवेदक से या पेटेन्टधारी से लोक प्रयोजन के लिए किया जाना चाहिए तो वह उस प्रभाव की अधिसूचना राजपत्र में प्रकाशित कर सकेगी और तब वह आविष्कार या पेटेन्ट और उस आविष्कार या पेटेन्ट की बाबत सभी अधिकार इस धारा के बल द्वारा केन्द्रीय सरकार को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगे । 

(2) ऐसे अर्जन की सूचना आवेदक को, और जहां पेटेन्ट अनुदत्त कर दिया गया है वहां पेटेन्टधारी को और अन्य ऐसे व्यक्तियों को, यदि कोई हों, जो पेटेन्ट में हित रखने वालों के रूप में रजिस्टर में अंकित हैं, दी जाएगी ।

(3)  केन्द्रीय सरकार, यथास्थिति, आवेदक को या पेटेन्टधारी और अन्य व्यक्तियों को जो पेटेन्ट में हित रखने वालों के रूप में रजिस्टर में अंकित है, ऐसा प्रतिकर, जिस पर केन्द्रीय सरकार और आवेदक या पेटेन्टधारी और अन्य व्यक्तियों के बीच सहमति हो जाए या जो ऐसी सहमति न होने की दशा में आविष्कार के संबंध में उपगत व्यय को और पेटेन्ट की दशा में उसकी अवधि को, उस अवधि को जिसके दौरान और उस रीति को जिससे वह पहले ही कार्यान्वित किया जा चुका है (जिसके अन्तर्गत ऐसी अवधि के दौरान पेटेन्टधारी द्वारा या उसके अनुज्ञप्तिधारी द्वारा, चाहे अनन्यतः या अन्यथा उठाए गए लाभ भी हैं) और अन्य सुसंगत बातों को ध्यान में रखते हुए धारा 103 के अधीन निर्देश के आधार पर उच्च न्यायालय द्वारा न्यायासंगत अवधारित किया जाए, देगी । 

103. सरकार के प्रयोजनों के लिए उपयोग के बारे में विवादों का उच्च न्यायालय को निर्देश-(1) धारा 100 द्वारा प्रदत्त शक्तियों के केन्द्रीय सरकार द्वारा या उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा प्रयोग के बारे में या उसके अधीन आविष्कार का सरकार के प्रयोजनों के लिए उपयोग करने विषयक निबन्धनों के बारे में या उस धारा की उपधारा (3) के अनुसरण में किए गए संदाय के किसी भाग को प्राप्त करने के किसी व्यक्ति के अधिकार के बारे में या धारा 102 के अधीन किसी आविष्कार या पेटेन्ट के अर्जन के लिए देय प्रतिकर की रकम के बारे में कोई विवाद, उस विवाद के पक्षकारों में से किसी के द्वारा उच्च न्यायालय को ऐसी रीति से जो उच्च न्यायालय के नियमों द्वारा विहित की जाए, निर्देशित किया जा सकेगा । 

(2) इस धारा के अधीन की ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में, जिनमें केन्द्रीय सरकार पक्षकार है, केन्द्रीय सरकार-

(क) यदि पेटेन्टधारी कार्यवाहियों में पक्षकार है तो, किसी ऐसे आधार पर, जिस पर धारा 64 के अधीन पेटेन्ट प्रतिसंहृत किया जा सकता हो, पेटेन्ट के प्रतिसंहरण के लिए अर्जी प्रतिदावे के तौर पर दे सकेगी; तथा  

(ख) चाहे पेटेन्धारी कार्यवाहियों में पक्षकार हो या न हो, पेटेन्ट की विधिमान्यता को, उस पेटेन्ट के प्रतिसंहरण के लिए अर्जी दिए बिना, विवाद्य कर सकेगी । 

(3) यदि यथापूर्वोक्त कार्यवाहियों में ऐसा कोई प्रश्न उठता है कि क्या किसी आविष्कार को धारा 100 में यथावर्णित रूप में अभिलिखित, परखा या परीक्षित किया जा चुका है या नहीं और किसी आविष्कार विषयक किसी दस्तावेज के या उसकी परख या उसके परीक्षण के किसी साक्ष्य के प्रकटन का, केन्द्रीय सरकार की राय में, लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा तो ऐसा प्रकटन अन्य पक्षकार के अधिवक्ता को या किसी ऐसे स्वतन्त्र विशेषज्ञ को जिसके बारे में परस्पर सहमति हो जाए, गोपनीय ढंग से किया जा सकेगा । 

(4) आविष्कार का उपयोग सरकार के प्रयोजनों के लिए करने से सम्बद्ध निबन्धनों के बारे में केन्द्रीय सरकार और किसी व्यक्ति के बीच के किसी विवाद का अवधारण इस धारा के अधीन करने में, उच्च न्यायालय ऐसे किसी फायदे या प्रतिकर को ध्यान में रखेगा, जिससे वह व्यक्ति या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसके अधिकार से उसका हक व्युत्पन्न होता है, प्रशनगत आविष्कार का सरकार के प्रयोजनों के लिए उपयोग करने की बाबत प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः प्राप्त कर सकता है या प्राप्त करने का हकदार हो सकता है । 

(5) इस धारा के अधीन की गई किसी कार्यवाही में, उच्च न्यायालय सम्पूर्ण कार्यवाही जो उसमें उठे तथ्य के किसी प्रश्न या विवाद्यक को शासकीय निर्देशी, आयुक्त या मध्यस्थ को निर्दिष्ट किए जाने के लिए किसी समय ऐसे निबन्धनों पर जो उच्च न्यायालय निर्दिष्ट करे, आदेश दे सकेगा और इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में उच्च न्यायालय के प्रति निर्देश का अर्थ तदनुसार लगाया जाएगा । 

(6)  जहां पेटेन्ट  में दावाकृत आविष्कार ऐसे व्यक्ति द्वारा किया गया था जो उस समय, जब वह किया गया था, केन्द्रीय सरकार की या राज्य सरकार की सेवा में था या सरकारी उपक्रम का कर्मचारी था और आविष्कार की विषय-वस्तु के बारे में सुसंगत सरकार द्वारा या सरकारी उपक्रम के प्रधान अधिकारी द्वारा यह प्रमाणित किया गया है कि वह उस कार्य से संसक्त है, जो सरकारी सेवक या सरकारी उपक्रम के कर्मचारी के प्रसामान्य कर्तव्यों के अनुक्रम में किया जाता है वहां, इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, आविष्कार से सम्बन्धित उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रकृति के किसी विवाद का निपटारा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस धारा के उपबन्धों के अनुरूप, जहां तक वे लागू किए जा सकें, किया जाएगा किन्तु ऐसा करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार पेटेन्टधारी और ऐसे अन्य पक्षकारों को, जिन्हें वह उस विषय में हित रखने वाले समझती है, सुनवाई का अवसर देगी ।

अध्याय 18

पेटेन्टों के अतिलंघन से संपृक्त वाद

104. अधिकारिता-धारा 105 के अधीन कोई घोषणा करने के लिए या धारा 106 के अधीन किसी अनुतोष के लिए या पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए कोई भी वाद या उस वाद का विचारण करने की अधिकारिता रखने वाले किसी जिला न्यायालय से अवर किसी न्यायालय में संस्थित नहीं किया जाएगा :

परन्तु जहां पेटेन्ट के प्रतिसंहरण का कोई प्रतिदावा प्रतिवादी द्वारा किया जाता है वहां उस वाद और साथ ही प्रतिदावे का अन्तरण उच्च न्यायालय को विनिश्चय के लिए किया जाएगा ।  

 [104क. अतिलंघन से संबंधित वादों की दशा में सबूत का भार-(1) किसी पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए किसी वाद में, जहां पेटेन्ट की विषय-वस्तु काई उत्पाद अभिप्राप्त करने के लिए एक प्रक्रिया है वहां न्यायालय प्रतिवादी को यह साबित करने का निदेश दे सकेगा कि पेटेंट की गई प्रक्रिया के उत्पाद के समरूप उक्त उत्पाद अभिप्राप्त करने के लिए उसके द्वारा प्रयुक्त प्रक्रिया पेटेंट की गई प्रक्रिया से भिन्न है यदि,-

(क) पेटेंट की विषय-वस्तु एक नया उत्पाद अभिप्राप्त करने के लिए एक प्रक्रिया है; या 

(ख) इस बात की अत्यधिक संभावना है कि उक्त प्रक्रिया द्वारा समरूप उत्पाद बनाया जाता है और पेटेंटधारी या उससे उक्त पेटेंटधारी में हक या हित प्राप्त करने वाला  व्यक्ति वास्तविक रूप से प्रयुक्त प्रक्रिया का अवधारण करने में युक्तियुक्त प्रयासों के बावजूद असफल रहा है :

परन्तु पेटेंटधारी या उससे पेटेंट में हक या हित प्राप्त करने वाला व्यक्ति यह पहले साबित कर देता है कि उक्त उत्पाद पेटेंट की गई प्रक्रिया द्वारा प्रत्यक्षतः अभिप्राप्त उत्पाद के समरूप है । 

(2) इस बारे में विचार करते समय कि किसी पक्षकार ने उपधारा (1) के अधीन उस पर अधिरोपित भार का निर्वहन किया है अथवा नहीं, न्यायालय उससे कोई विनिर्माण या वाणिज्यिक गुप्त बातों को प्रकट करने की अपेक्षा नहीं करेगा यदि न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि ऐसा करना अनुचित होगा ।]

105. अतिलंघन होने के बारे में घोषणा करने की न्यायालय की शक्ति-(1) विनिर्दिष्ट अनुतोष अधिनियम, 1963             (1963 का 47) की धारा 34 में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति इस बात की घोषणा के लिए कि उसके द्वारा किसी प्रक्रिया के उपयोग से, या किसी वस्तु के निर्माण, उपयोग या विक्रय से पेटेन्ट के दावे का अतिलंघन नहीं होता है या नहीं होगा, पेटेन्टधारी या पेटेन्ट के अधीन अनन्य अनुज्ञप्ति के धारक के विरुद्ध वाद, इस बात के होते हुए भी कि पेटेन्टधारी या अनुज्ञप्तिधारी द्वारा तत्प्रतिकूल कोई भी प्राख्यान नहीं किया गया है, संस्थित कर सकेगा, यदि यह दर्शित कर दिया जाए कि- 

(क) वादी न पेटेन्टधारी या अनन्य अनुज्ञप्तिधारी से दावाकृत घोषणा के प्रभाव की लिखित अभिस्वीकृत के लिए लिखित रूप में आवेदन किया है और उसने उसको प्रश्नगत प्रक्रिया या वस्तु की पूरी विशिष्टियां लिखित रूप में दे दी हैं; तथा 

(ख) अनुज्ञप्तिधारी या पेटेन्धारी ने ऐसी अभिस्वीकृत देने से इन्कार कर दिया है या देने में उपेक्षा की है । 

(2) किसी घोषणा के लिए वाद में जो इस धारा के आधार पर लाया गया है सभी पक्षकारों के खर्चे, जब तक कि न्यायालय विशेष कारणों से अन्यथा आदेश देना ठीक न समझे, वादी द्वारा दिए जाएंगे । 

(3) किसी पेटेन्ट के विनिर्देश के दावे की विधिमान्यता पर, किसी घोषणा के लिए वाद में जो इस धारा के आधार पर लाया गया है, आक्षेप नहीं किया जाएगा और तद्नुसार किसी पेटेन्ट की दशा में कोई घोषणा करने या उसके करने से इन्कार करने के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि उसमें यह अन्तर्हित है कि पेटेन्ट विधिमान्य या अविधिमान्य है । 

(4) किसी घोषणा के लिए कोई वाद,  [किसी पेटेन्ट के अनुदान के प्रकाशन के पश्चात्ट इस धारा के आधार पर किसी भी समय लाया जा सकेगा और इस धारा में पेटेन्टधारी के प्रति निर्देशों का अर्थ तद्नुसार लगाया जाएगा । 

106. अतिलंघन कार्यवाहियों की निराधार धमकियों की दशा में अनुतोष देने की न्यायालय की शक्ति-(1) जहां कोई व्यक्ति (चाहे वह पेटेन्ट में या पेटेन्ट के लिए आवेदन में हकदार या हितबद्ध हो या नहीं) किसी अन्य व्यक्ति को, परिपत्रों या विज्ञापनों द्वारा या उसे या किसी अन्य व्यक्ति को सम्बोधित मौखिक या लिखित संसूचनाओं द्वारा, किसी पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए कार्यवाहियों की धमकी देता है वहां तद्धारा व्यथित कोई व्यक्ति निम्नलिखित अनुतोषों के लिए निवेदन करते हुए उसके विरुद्ध वाद ला                      सकेगा, अर्थात् :-

(क) इस प्रभाव की घोषणा की धमकियां न्यायसंगत नहीं हैं; 

(ख) धमकियों के बने रहने के विरुद्ध व्यादेश; तथा 

(ग) ऐसी नुकसानी, यदि कोई हो, जो तद्द्वारा उसने उठाई है । 

(2) जब तक कि ऐसे वाद में प्रतिवादी यह साबित नहीं कर देता है कि उन कार्यों से, जिनकी बाबत कार्यवाहियों की धमकी दी गई थी, पेटेन्ट का या ऐसे अधिकारों का, जो विनिर्देश के ऐसे दावे की बाबत, जिसे वादी ने अविधिमान्य नहीं दिखाया है, पूर्ण विनिर्देश के प्रकाशन से उद्भूत हों, अतिलंघन होता है, या यदि किए गए तो अतिलंघन होगा, न्यायालय वादी की वे सभी अनुतोष या उनमें से कोई अनुतोष दे सकेगा, जिनके लिए निवेदन किया गया है । 

स्पष्टीकरण- [पेटेन्ट के अस्तित्वट की अधिसूचना मात्र इस धारा के अर्थ में कार्यवाही की धमकी नहीं होती । 

107. अतिलंघन के लिए वादों में प्रतिरक्षाएं, आदि-(1) पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए किसी वाद में हर ऐसा आधार, जिस पर, वह धारा 64 के अधीन प्रतिसंहृत किया जा सकेगा, प्रतिरक्षा के आधार के तौर पर उपलभ्य होगा । 

(2) किसी मशीन, साधित्र या अन्य वस्तु के निर्माण, उपयोग या आयात द्वारा या किसी प्रक्रिया के उपयोग द्वारा या किसी ओषध या ओषधि के आयात, उपयोग या वितरण द्वारा किए गए किसी पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए किसी वाद में यह प्रतिरक्षा का आधार होगा कि ऐसा निर्माण, उपयोग, आयात या वितरण धारा 47 में विनिर्दिष्ट शर्तों में से किसी एक या अधिक के अनुसार है । 

 [107. कतिपय कार्यों को अतिलंघन मानना-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए-

(क) भारत में या भारत से भिन्न किसी अन्य देश में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन अपेक्षित विकास और सूचना के प्रस्तुत किए जाने के संबंध में युक्तियुक्त रूप से उपयोगों के लिए एक मात्र पेटेन्ट किए गए आविष्कार के करने, उसकी संरचना करने,  [उपयोग करने, विक्रय करने या आयात करने] का कोई कार्य जो किसी उत्पाद के विनिर्माण, संरचना,  [उपयोग, विक्रय या आयात] को विनियमित करता है; 

(ख) किसी व्यक्ति द्वारा ऐसे किसी व्यक्ति से,  [जो उत्पाद का उत्पादन और विक्रय या वितरण करने के लिए विधि के अधीन सम्यक्तः प्राधिकृत है,ट पेटेन्ट किए गए उत्पादों का आयात,

पेटेंट अधिकारों का अतिलंघन नहीं माना जाएगा ।]

108. अतिलंघन के लिए वादों में अनुतोष- [(1)] अतिलंघन के लिए किसी वाद में जो अनुतोष न्यायालय द्वारा दिए जा सकेंगे, उनके अन्तर्गत (ऐसे निबन्धनों के अधीन, यदि कोई हों, जिन्हें न्यायालय ठीक समझे) व्यादेश और वादी के विकल्प पर या तो नुकसानी या लाभ-लेखा हो सकेगा ।

 [(2) न्यायालय यह भी आदेश कर सकेगा कि ऐसा माल जो अतिलंघनकारी पाया जाता है और ऐसी सामग्री और उपकरण जिनके प्रधान उपयोग अतिलंघनकारी माल के सृजन में होता है, बिना किसी प्रतिकर के संदाय के अभिगृहीत, समपहृत कर लिए या नष्ट कर दिए जाएंगे, जैसा न्यायालय मामले की परिस्थितियों में उचित समझे ।]

109. अतिलंघन के विरुद्ध कार्यवाही करने का अनन्य अनुज्ञप्तिधारी का अधिकार-(1) अनन्य अनुज्ञप्ति के धारक को, पेटेन्ट के ऐसे किसी अतिलंघन के बारे में, जो अनुज्ञप्ति की तारीख के पश्चात् किया गया है, वाद संस्थित करने का वही अधिकार होगा, जो पेटेन्ट को होगा तथा किसी ऐसे वाद में नुकसानी या लाभ-लेखा अधिनिर्णीत करते समय या कोई अन्य अनुतोष देते समय, न्यायालय, यथास्थिति, किसी ऐसी हानि को जो अनन्य अनुज्ञप्तिधारी द्वारा उस हैसियत में सहन की गई है या सहन करनी संभाव्य है, अथवा उन लाभों को जो अतिलंघन के द्वारा उपार्जित किए गए हैं, वहां तक वहां तक कि वह अनन्य अनुज्ञप्तिधारी की उस हैसियत में के अधिकारों का अतिलंघन करता है, विचार में लेगा ।          

(2)  उपधारा (1) के अधीन किसी अनन्य अनुज्ञपति के धारक द्वारा पेटेंट के अतिलंघन के लिए किसी वाद में, पेटेन्ट धारी, जब तक कि वह वाद में वादी के रूप में सम्मिलित न हुआ हो, प्रतिवादी के रूप में शामिल किया जाएगा, किन्तु प्रतिवादी के रूप में इस प्रकार शामिल किया गया पेटेन्टधारी, जब तक कि वह कार्यवाहियों में हाजिर नहीं होता और उमसें भाग नहीं लेता, किसी खर्चे के लिए दायी नहीं होगा । 

110. अतिलंघन के विरुद्ध कार्यवाहियां करने अनुज्ञप्तिधारी का धारा 84 के अधीन अधिकार-कोई ऐसा व्यक्ति जिसको धारा 84 के अधीन अनुज्ञप्ति प्रदान की गई है, पेटेन्टधारी से यह मांग करने का हकदार होगा कि वह पेटेन्ट के किसी अतिलंघन के निवारण के लिए कार्यवाहियां करे और यदि पेटेन्टधारी ऐसे मांगे किए जाने के पश्चात् दो मास के भीतर ऐसा करने से इंकार करेगा या ऐसा करने में उपेक्षा करेगा तो अनुज्ञप्तिधारी अतिलंघन के लिए कार्यवाहियां, पेटेन्टधारी को प्रतिवादी बना कर, अपने नाम में ऐसे संस्थित कर सकेगा मानो वह पेटेन्टधारी हो, किन्तु प्रतिवादी के रूप में इस प्रकार शामिल किया गया पेटेन्टधारी जब तक कि वह कार्यवाहियों में हाजिर नहीं होता और उनमें भाग नहीं लेता, किसी खर्चे के लिए दायी नहीं होगा । 

111. अतिलंघन के लिए नुकसानी या लाभ-लेखा मंजूर करने की न्यायालय की शक्ति पर निर्बन्धन-(1) पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए वाद में, नुकसानी या लाभ-लेखा ऐसे प्रतिवादी के विरुद्ध मंजूर नहीं किया जाएगा जो यह साबित कर देता है कि अतिलंघन की तारीख को उसे इस बात की न तो जानकारी थी और न उसके पास यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार थे कि पेटेन्ट अस्तित्व में है । 

स्पष्टीकरण-“केबल पेटेन्ट", “पेटेन्टकृत" शब्द या ऐसे कोई शब्द जिनसे यह अभिव्यक्त या संकेत विवक्षित होता है कि उस वस्तु के लिए पेटेन्ट अभिप्राप्त कर लिया गया है, किसी वस्तु पर प्रयोग किए जाने के कारण हो, किसी व्यक्ति के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि उसे इस बात की जानकारी थी या उसके पास यह विश्वास करने के लिए युक्तियुक्त आधार थे कि वह पेटेन्ट अस्तित्व में है जब तक कि पेटेन्ट की संख्या के साथ प्रश्नगत शब्द न हों ।

(2) पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए किसी वाद में न्यायालय, यदि वह ठीक समझे, विहित अवधि के भीतर किसी नवीकरण फीस के देने में हुई किसी असफलता के पश्चात् और उस अवधि के किसी विस्तारण के पूर्व किए गए किसी अतिलंघन की बाबत कोई नुकसानी या लाभ-लेखा मंजूर करने से इंकार कर सकेगा । 

(3) जहां किसी विनिर्देश का संसोधन इस अधिनियम के अधीन दावा-त्याग, शुद्धि या स्पष्टीकरण के रूप में, विनिर्देश के प्रकाशन के पश्चात्, अनुज्ञात किया गया है वहां संशोधन को अनुज्ञात करने वाले विनिश्चय की तारीख से पूर्व आविष्कार के उपयोग की बाबत कोई भी नुकसानी या लाभ-लेखा किसी कार्यवाही में मंजूर नहीं किया जाएगा जब तक कि न्यायालय का यह समाधान नहीं हो जाता है कि मूल रूप से यथा प्रकाशित विनिर्देश की विरचना सद्भावपूर्वक तथा युक्तियुक्त कौशल और ज्ञान के साथ की गई थी । 

(4) इस धारा के कोई भी बात पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए किसी वाद में व्यादेश अनुदत्त करने की न्यायालय की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।              ।

113. विनिर्देश की विधिमान्यता का प्रमाणपत्र और उसके अतिलंघन के लिए पश्चात्वर्ती वादों के खर्चें- [(1) यदि, धारा 64  और धारा 104 के अधीन पेटेंट के प्रतिसंहरण के लिए, यथास्थिति, अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय के समक्ष की किसी कार्यवाही में विनिर्देश के किसी दावे की विधिमान्यता का प्रतिवाद किया जाता है और वह दावा अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय द्वारा विधिमान्य पाया जाता है तो अपील बोर्ड या उच्च न्यायालय यह प्रमाणित कर सकेगा कि उस दावे की विधिमान्यता का उन कार्यवाहियों में प्रतिवाद किया गया था और उसको मान लिया गया था ।] 

(2) जहां कोई ऐसा प्रमाणपत्र प्रदान किया गया है वहां, यदि पेटेन्ट के उस दावे के अतिलंघन के लिए न्यायालय के समक्ष के किसी पश्चातवर्ती वाद में या पेटेन्ट के प्रतिसंहरण के लिए किसी पश्चात्वर्ती कार्यवाही में, जहां तक वह उस दावे से संबंधित है, पेटेन्टधारी या दावे की विधिमान्यता पर निर्भर करने वाला अन्य व्यक्ति अपने पक्ष में अन्तिम या निर्णय अभिप्राप्त कर लेता है, तो वह किसी ऐसे वाद या कार्यवाही के या उसके आनुषंगिक अपने उन सब खर्चों, प्रभारों और व्यायों के जो उचित रूप से उपगत किए गए हों, संदाय के लिए आदेश का वहां तक हकदार होगा, जहां तक वे उस दावे से संसक्त हैं जिसके बारे में प्रमाणपत्र प्रदान किया गया था, जब तक कि वाद या कार्यवाही का विचारण करने वाला न्यायालय अन्यथा निदेश न दे :

परन्तु इस उपधारा में यथा विनिर्दिष्ट खर्चों का आदेश तब नहीं दिया जाएगा, जब दावे की विधिमान्यता के बारे में विवाद करने वाला पक्षकार न्यायालय का यह समाधान कर देता है कि उसको उस समय, जब उसने वह विवाद किया था, प्रमाणपत्र के प्रदान किए जाने की जानकारी नहीं थी तथा जैसे ही उसे ऐसे प्रमाणपत्र की जानकारी हुई उसने ऐसी प्रतिरक्षा का तुरन्त प्रत्याहरण                   कर लिया था ।

 [(3) इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह, यथास्थिति, अतिलंघन के वादों में की डिक्रियों या आदेशों से अपील की या प्रतिसंहरण की अर्जियों की सुनवाई करने वाले न्यायालयों या अपील बोर्ड को उसमें विनिर्दिष्ट मापमान पर खर्चों के लिए आदेश पारित करने के लिए प्राधिकृत करती है ।]

114. भागतः विधिमान्य विनिर्देश के अतिलंघन के लिए अनुतोष-(1) यदि किसी पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए कार्यवाहियों में यह पाया जाता है कि विनिर्देश का कोई ऐसा दावा विधिमान्य है, जो ऐसा दावा है जिसके बारे में अतिलंघन अभिकथित किया गया है, किन्तु कोई अन्य दावा अविधिमान्य है तो न्यायालय ऐसे किसी विधिमान्य दावे की बाबत, जिसका अतिलंघन किया गया है,               अनुतोष दे सकेगा : 

परन्तु न्यायालय सिवाय उपधारा (2) में वर्णित परिस्थितियों में ही व्यादेश के रूप में कोई अनुतोष देगा, अन्यथा नहीं ।  

(2) जहां वादी यह साबित कर देता है कि अविधिमान्य दावे की विरचना सद्भावपूर्वक तथा युक्तियुक्त कौशल और ज्ञान के साथ की गई थी वहां न्यायालय ऐसे किसी विधिमान्य दावे की बाबत जिसका अतिलंघन किया गया है, ऐसा अनुतोष देगा जो खर्चों के बारे में और उस तारीख के बारे में जिससे नुकसानी या लाभों के लेखे की गणना की जानी चाहिए न्यायालय के विवेक के अधीन होगा तथा ऐसे विवेक का प्रयोग करते समय, न्यायालय पक्षकारों का वह आचरण ध्यान में रखेगा जो विनिर्देश में ऐसे अविधिमान्य दावों को अन्तःस्थापित करने या उनको वहां बने रहने देने के विषय में उनका रहा है ।

115. वैज्ञानिक सलाहकार-(1) अतिलंघन के किसी ऐसे वाद में या किसी ऐसी कार्यवाही में जो इस अधिनियम के अधीन न्यायालय के समक्ष हैं, न्यायालय किसी भी समय, और चाहे उस प्रयोजन के लिए किसी पक्षकार ने आवेदन किया हो या नहीं, एक स्वतन्त्र वैज्ञानिक सलाहकार इस बात के लिए नियुक्त कर सकेगा कि वह न्यायालय की सहायता करे अथवा किसी ऐसे तथ्य या राय विषयक प्रश्न के संबंध में (जिसमें विधि के निर्वचन का प्रश्न अन्तर्वलित नहीं है) जो वह इस प्रयोजन के लिए बनाए, जांच करे और अपनी रिपोर्ट दे ।

(2) वैज्ञानिक सलाहकार का परिश्रमिक न्यायालय द्वारा नियत किया जाएगा और उसमें रिपोर्ट देने के खर्चे और ऐसे किसी दिन के लिए, जिसका वैज्ञानिक सलाहकार न्यायालय के समक्ष हाजिर होने के लिए अपेक्षित किया जाए, उचित दैनिक फीस सम्मिलित होगी, और ऐसा पारिश्रमिक उस धन में से चुकाया जाएगा जिसका संसद् द्वारा इस प्रयोजन के लिए विधि द्वारा उपबन्ध किया जाए ।

[अध्याय 19

अपील बोर्ड को अपीलें

116. अपील बोर्ड-(1) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (1999 का 47) की धारा 83 के अधीन स्थापित अपील बोर्ड इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अपील बोर्ड होगा और उक्त अपील बोर्ड इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसे प्रदत्त अधिकारिता, शक्ति और प्राधिकार का प्रयोग करेगा : 

परन्तु इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अपील बोर्ड के तकनीकी सदस्य के पास उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट अर्हताएं होंगी ।

(2) कोई व्यक्ति इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए तकनीकी सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए तभी अर्हित होगा जब उसने-

(क) इस अधिनियम के अधीन नियंत्रक का पद कम से कम पांच वर्ष तक धारण किया हो या इस अधिनियम के अधीन कम से कम पांच वर्ष तक नियंत्रक के कृत्यों का प्रयोग किया हो; या 

(ख) कम से कम दस वर्ष तक रजिस्ट्रीकृत पेटेंट अभिकर्ता के रूप में कृत्य किया हो और तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित किसी विश्वविद्यालय से इंजीनियरी या प्रौद्योगिकी में डिग्री या विज्ञान में मास्टर डिग्री या इसके समतुल्य डिग्री रखता हो, या 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।             

117. अपील बोर्ड के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार अपील बोर्ड को इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए अपेक्षति अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की प्रकृति और प्रवर्गों का अवधारण करेगी और अपील बोर्ड को उतने अधिकारी और अन्य कर्मचारी उपलब्ध कराएगी जितने वह उचित समझे । 

(2) अपील बोर्ड के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।

(3) अपील बोर्ड के अधिकारी और अन्य कर्मचारी अपने कृत्यों का निर्वहन अपील बोर्ड के अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन उस रीति से करेंगे जो विहित की जाए । 

117क. अपील बोर्ड को अपीलें-(1) उपधारा (2) में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन किए गए किसी विनिश्चय, आदेश या जारी निदेश से अथवा ऐसे विनिश्चय, आदेश या निदेश को प्रभावी करने के प्रयोजनार्थ नियंत्रक के किसी कार्य या आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी । 

(2) धारा 15, धारा 16, धारा 17, धारा 18, धारा 19,  [धारा 20, धारा 25 की उपधारा (4), धारा 28,ट धारा 51, धारा 54, धारा 57, धारा 60, धारा 61, धारा 63, धारा 66, धारा 69 की उपधारा (3), धारा 78, धारा 84 की उपधारा (1) से उपधारा (5), धारा 85, धारा 88, धारा 91, धारा 92 और धारा 94 के अधीन नियंत्रक या केन्द्रीय सरकार के किसी विनिश्चय, आदेश या निदेश से कोई अपील, अपील बोर्ड को होगी । 

(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील विहित प्ररूप में होगी और ऐसी रीति में सत्यापित की जाएगी, जो विहित की जाए, तथा उसके साथ उस विनिश्चय, आदेश या निदेश की एक प्रति होगी जिसके विरुद्ध अपील की गई है और उतनी फीस होगी जो विहित की जाए ।

(4) प्रत्येक अपील नियंत्रक या केन्द्रीय सरकार के, यथास्थिति, विनिश्चय, आदेश या निदेश की तारीख से तीन मास के भीतर या उतने और समय के भीतर की जाएगी जो अपील बोर्ड, उसके द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार, अनुज्ञात करे । 

117ख. अपील बोर्ड की प्रक्रिया और शक्तियां-व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 (1999 का 47) की धारा 84 की उपधारा (2) से उपधारा (6), धारा 87, धारा 92, धारा 95, और धारा 96 के उपबंध अपील बोर्ड को इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन में उसी प्रकार लागू होंगे जैसे कि वे व्यापार चिह्न अधिनियम, 1999 के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन को लागू होते हैं ।

117ग. न्यायालय आदि की अधिकारिता का वर्णन-धारा 117क की उपधारा (2) या धारा 117घ में विनिर्दिष्ट विषयों के संबंध में, किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकारी को कोई अधिकारिता, शक्तियां या प्राधिकार नहीं होगा या वह उनका प्रयोग करने का हकदार नहीं होगा । 

117घ. अपील बोर्ड के समक्ष परिशोधन आदि के लिए आवेदन के लिए प्रक्रिया-(1) धारा 71 के अधीन अपील बोर्ड को          [धारा 64के अधीन अपील बोर्ड के समक्ष पेटेंट के प्रतिसंहरण के लिए और रजिस्टर के परिशोधन के परिशोधन के लिए आवेदन] किया गया आवेदन उस प्ररूप में होगा जो विहित किया जाए ।

(2) इस अधिनियम के अधीन पेटेंट से संबंधित अपील बोर्ड के प्रत्येक आदेश या निर्णय की एक प्रमाणित प्रति बोर्ड द्वारा नियंत्रक को सूचित की जाएगी और नियंत्रक बोर्ड के आदेश को प्रभावी करेगा और निदेश दिए जाने पर, उक्त आदेश के अनुसार रजिस्टर की प्रविष्टियों में संशोधन करेगा या रजिस्टर का परिशोधन करेगा । 

117ङ. विधिक कार्यवाहियों में नियंत्रक की हाजिरी-(1) नियंत्रक को निम्नलिखित में हाजिर होने और सुने जाने का अधिकार होगा :-

(क) अपील बोर्ड के समक्ष किसी ऐसी विधिक कार्यवाही में, जिसमें ईप्सित अनुतोष में रजिस्टर का परिवर्तन या परिशोधन सम्मिलित है अथवा जिसमें पेटेंट कार्यालय के व्यवहार से संबंधित कोई प्रश्न उठाया गया हो; 

(ख) पेटेंट के अनुदान के लिए किसी आवेदन पर नियंत्रक के किसी आदेश से अपील बोर्ड को किसी अपील में- 

(i) जिसका विरोध नहीं किया गया हो तथा नियंत्रक द्वारा उक्त आवेदन नामंजूर किया गया हो, या किन्हीं संशोधनों, उपांतरणों, शर्तों या परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, स्वीकार किया गया हो, या 

(ii) जिसका विरोध किया गया हो और नियंत्रक यह समझता है कि उसकी हाजिरी लोकहित में         आवश्यक है,

और नियंत्रक किसी मामले में, यदि अपील बोर्ड द्वारा वैसा निदेश दिया जाए, हाजिर होगा । 

(2) जब तक कि अपील बोर्ड अन्यथा निदेश न दे, नियंत्रक हाजिर होने की बजाय उसके द्वारा हस्ताक्षरित एक लिखित कथन प्रस्तुत कर सकेगा जिसमें विवाद्यकाधीन विषय से संबंधित उसके समक्ष कार्यवाहियों की या उसके द्वारा दिए गए किसी विनिश्चय के आधारों की, या ऐसे ही मामलों में पेटेंट कार्यालय की पद्धति की या विवाद्यकों से सुसंगत और उसकी जानकारी में के अन्य विषयों की जिन्हें नियंत्रक आवश्यक समझे, ऐसी विशिष्टियां होंगी जिन्हें वह उचित समझे, और ऐसा कथन कार्यवाही में साक्ष्य होगा । 

117च. अपील बोर्ड के समक्ष कार्यवाहियों में नियंत्रक के खर्चें-अपील बोर्ड के समक्ष इस अधिनियम के अधीन सभी कार्यवाहियों में नियंत्रक के खर्चे बोर्ड के विवेकानुसार होंगे किन्तु नियंत्रक को किसी पक्षकार को खर्चों का संदाय करने के लिए आदेश नहीं दिया जाएगा । 

 [117छ. लंबित कार्यवाहियों का अपील बोर्ड को अंतरण-उच्च न्यायालय के समक्ष लंबित नियंत्रक के किसी आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध अपीलों के सभी मामले और अतिलंघन के लिए वादों में प्रतिदावे पर से भिन्न पेटेंट के प्रतिसंहरण और रजिस्टर के परिशोधन से संबंधित सभी मामले उस तारीख से अपील बोर्ड को अंतरित हो जाएंगे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अधिसूचित की जाए और अपील बोर्ड ऐसे मामले में या तो नए सिरे या उस प्रक्रम से जिससे वह अंतरित किया गया है, कार्रवाई करेगा ।]

 [117ज. अपील बोर्ड की नियम बनाने की शक्ति-अपील बोर्ड, इस अधिनियम के अधीन उसके समक्ष की सभी कार्यवाहियों के संबंध में उनकी प्रक्रिया संचालन के बारे में, इस अधिनियम से सुसंगत नियम बना सकेगा ।]

अध्याय 20

शास्तियां

118. कतिपय आविष्कारों से सम्बन्धित गोपनीयता के उपबन्धों का उल्लंघन-यदि कोई व्यक्ति धारा 35 के अधीन दिए गए किसी निदेश का अनुपालन नहीं करेगा,  । । । तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

119. रजिस्टर, आदि में प्रविष्टियों का मिथ्याकरण-यदि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन रखे गए किसी रजिस्टर में कोई मिथ्या प्रविष्टि या ऐसा कोई लेखे जिसका मिथ्या रूप से ऐसे रजिस्टर की किसी प्रविष्टि की प्रतिलिपि होना तात्पर्यित है, करेगा या करवाएगा अथवा किसी ऐसे लेखे को, यह जानते हुए कि वह प्रविष्टि या लेख मिथ्या है, साक्ष्य में पेश करेगा, या निविदत्त करेगा, या पेश या निविदत्त करवाएगा तो वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।

120. पेटेन्ट अधिकारों का अप्राधिकृत दावा-यदि कोई व्यक्ति मिथ्या रूप से यह व्यपदेशन करेगा कि उसके द्वारा विक्रय की गई कोई वस्तु भारत में पेटेन्टकृत है, या भारत में पेटेन्ट के लिए आवेदन का विषय है तो वह जुर्माने से, जो  [एक लाख रुपए] तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।  

स्पष्टीकरण 1-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने यह व्यपदेशन                  किया है कि- 

(क) कोई वस्तु भारत में पेटेन्टकृत है यदि उस वस्तु पर “पेटेन्ट" या “पेटेन्टकृत" शब्द, या कोई अन्य शब्द जिससे यह अभिव्यक्त या संकेत होता है कि उस वस्तु के लिए पेटेन्ट भारत में अभिप्राप्त कर किया गया है, स्टाम्पित, उत्कीर्ण या मुद्रित है, या उस पर अन्यथा प्रयोग किए गए हैं । 

(ख) कोई वस्तु भारत में पेटेन्ट के लिए आवेदन का विषय है, यदि उस वस्तु पर पेंटेन्ट आवेदित", “पेटेन्ट लम्बित" या कुछ अन्य शब्द, जिनसे यह संकेत होता है कि उस वस्तु के पेटेन्ट के लिए आवेदन भारत में किया गया है, स्टाम्पित, उत्कीर्ण या मुद्रित हैं, या उस पर अन्यथा प्रयोग किया गया हैं ; 

स्पष्टीकरण 2-“पेटेन्ट", “पेटेन्टकृत", “पेटेन्ट आवेदित", “पेटेन्ट लम्बित" शब्दों के या ऐसे अन्य शब्दों के प्रयोग से, जिनसे यह अभिव्यक्त या संकेत होता है कि वस्तु पेटेन्टकृत है या पेटेन्ट के लिए आवेदन कर दिया गया है, यथास्थिति, भारत में प्रवर्तित पेटेन्ट या भारत में पेटेन्ट के लिए लम्बित आवेदन के प्रति निर्देश समझा जाएगा जब तक कि उसमें यह उपदर्शित नहीं कर दिया जाता है कि भारत से बाहर के किसी देश में पेटेन्ट अभिप्राप्त कर लिया गया है या उसके लिए आवेदन कर दिया गया है । 

121. “पेटेन्ट कार्यालय" शब्दों का सदोष प्रयोग-यदि कोई व्यक्ति अपने कारबार के स्थान पर या अपने द्वारा जारी किए गए किसी दस्तावेज पर या अन्यथा, “पेटेन्ट कार्यालय" शब्दों या किन्हीं ऐसे अन्य शब्दों का प्रयोग करेगा जिनसे युक्तियुक्त रूप से यह विश्वास हो सकता है कि उसके कारबार का स्थान पेटेन्ट कार्यालय है या उससे शासकीय रूप से सम्बद्ध है वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डनीय होगा । 

122. जानकारी देने से इंकार करना या जानकारी देने में असफल रहना-(1) यदि कोई व्यक्ति,-

(क) केन्द्रीय सरकार को कोई ऐसी जानकारी जिसे वह धारा 100 की उपधारा (5) के अधीन देने के लिए               अपेक्षित है; 

(ख) नियन्त्रक को कोई ऐसी जानकारी या विवरण जिसे वह धारा 146 द्वारा या उसके अधीन देने के लिए               अपेक्षित है,

देने से इंकार करेगा या देने में असफल रहेगा, वह जुर्माने से, जो  [दस लाख रुपएट  तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।

(2) यदि कोई व्यक्ति, जिससे ऐसी कोई जानकारी देने की अपेक्षा की गई है जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है, ऐसी जानकारी या विवरण देगा जो मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का या तो उसे ज्ञान है या वह विश्वास करने का कारण रखता है अथवा जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है, तो वह कारवास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी या जुर्माने से, या दोनों से,                  दण्डनीय होगा । 

123. अरजिस्ट्रीकृत पेटेन्ट अभिकर्ताओं द्वारा वृत्ति-यदि कोई व्यक्ति धारा 129 के उपबन्धों का उल्लंघन करेगा तो वह जुर्माने से,  [जो प्रथम अपराध की दशा में एक लाख रुपए तक का और द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराधों की दशा में पांच लाख रुपए तक हो सकेगाट दण्डनीय होगा ।

124. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) यदि इस अधिनियम के अधीन अपराध करने वाला व्यक्ति कम्पनी है तो वह कम्पनी और साथ ही ऐसा प्रत्येक व्यक्ति भी जो ऐसे अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :

परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है तथा यह साबित होता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी अपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए- 

(क) “कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम                  भी है; तथा 

(ख) किसी फर्म के सम्बन्ध में “निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है । 

अध्याय 21

पेटेंट अभिकर्ता

 [125. पेटेंट अभिकर्ताओं का रजिस्टर-(1) नियंत्रक, एक रजिस्टर रखेगा जो पेटेंट अभिकर्ताओं का रजिस्टर कहलाएगा, जिसमें उन सभी व्यक्तियों के नाम, पते और अन्य सुसंगत विशिष्टियां, जो विहित की जाएं, दर्ज की जाएंगी जो धारा 126 के अधीन अपने नामों को इस प्रकार दर्ज कराने के लिए अर्हित हैं ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, नियंत्रक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह पेटेन्ट अभिकर्ताओं के रजिस्टर ऐसे रक्षोपायों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, कम्प्यूटर फ्लापियों, डिस्कैटों या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखें ।]

126. पेटेन्ट अभिकर्ताओं के रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हताएं-(1) यदि कोई व्यक्ति निम्नलिखित शर्तों को पूरा करता है तो वह पेटेन्ट अभिकर्ताओं के रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने के लिए अर्हित होगा, अर्थात् :-

(क) वह भारत का नागरिक हो; 

(ख) उसने इक्कीस वर्ष की आयु पूरी कर ली हो;

(ग)  उसने भारत के राज्यक्षेत्र में के  [तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित किसी विश्वविद्यालय से विज्ञान, इंजीनियरी या प्रौद्योगिकी में उपाधिट प्राप्त कर ली हो, या उसके पास ऐसी अन्य समतुल्य अर्हताएं हों जिन्हें केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे और, इसके अतिरिक्त,-

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(ii) उसने इस प्रयोजन के लिए विहित अर्हक परीक्षा उत्तीर्ण कर ली हो;  [याट

 [(iii) उसने, दस वर्ष से अन्यून की कुल अवधि तक धारा 73 के अधीन परीक्षक के रूप में कार्य किया हो या उसने नियंत्रक के कृत्यों का निर्वहन किया हो अथवा दोनों कार्य किए हों किन्तु रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करते समय ऐसी किसी हैसियत में न रहा हो,]

                                (घ) उसने ऐसी फीस दे दी हो जो विहित की जाए । 

 [(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा व्यक्ति जो  [पेटेंट (संशोधन) अधिनियम, 2005ट के प्रारम्भ से पूर्व पेटेंट अभिकर्ता के रूप में रजिस्ट्रीकृत रहा है, पेटेंट अभिकर्ता के रूप में रजिस्ट्रीकृत बने रहने या जब पुनः रजिस्टर कराना अपेक्षित हो तो ऐसी फीस के संदाय पर जो विहित की जाए, रजिस्ट्रीकृत किए जाने का हकदार होगा ।]  

127. पेटेन्ट अभिकर्ताओं के अधिकार-इस अधिनियम के और इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक पेटेन्ट अभिकर्ता, जिसका नाम रजिस्टर में दर्ज किया गया है, निम्नलिखित का हकदार होगा, अर्थात् :-

(क) नियंत्रक के समक्ष वृत्ति करना; और

(ख) इस अधिनियम के अधीन नियंत्रक के समक्ष की किसी कार्यवाही के सम्बन्ध में सभी दस्तावेजें तैयार करना, सभी कारबार का संव्यवहार करना और ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करना जो विहित किए जाएं । 

 

 

 

128. पेटेन्ट अभिकर्ताओं द्वारा कतिपय दस्तावेजों का हस्ताक्षरित और सत्यापित किया जाना-(1)  । । । इस अधिनियम के अधीन नियंत्रक को दिए गए सभी आवेदन और संसूचनाएं ऐसे पेटेन्ट अभिकर्ता द्वारा हस्ताक्षरित किए जा सकेंगे जो सम्पृक्त व्यक्ति द्वारा इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत है । 

।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

129. पेटेन्ट अभिकर्ताओं के रूप में वृत्ति करने पर निर्बंधन-(1) कोई भी व्यक्ति, या तो अकेले या किसी अन्य व्यक्ति के साथ भागीदारी में पेटेन्ट अभिकर्ता के रूप में वृत्ति नहीं करेगा, अपने आपको वर्णित या प्रकट नहीं करेगा, इस प्रकार वर्णित या प्रकट किया जाना अनुज्ञात नहीं करेगा, जब तक कि, यथास्थिति, वह पेटेन्ट, अभिकर्ता के रूप में रजिस्ट्रीकृत न हो या जब तक कि वह और उसके सभी भागीदार इस प्रकार रजिस्ट्रीकृत न हों । 

(2) कोई भी कम्पनी या अन्य निगमित निकाय पेटेन्ट अभिकर्ता के रूप में वृत्ति नहीं करेगा, अपने आपको वर्णित या प्रकट नहीं करेगा, या अपना इस प्रकार वर्णित या प्रकट किया जाना अनुज्ञात नहीं करेगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, पेटेन्ट अभिकर्ता के रूप में वृत्ति के अन्तर्गत निम्नलिखित कार्यों में से कोई कार्य आता है, अर्थात् :-

(क) भारत में या अन्यत्र पेटेन्टों के लिए आवेदन करना या उन्हें अभिप्राप्त करना; 

(ख) इस अधिनियम के या किसी अन्य देश की पेटेन्ट विधि के प्रयोजनों के लिए विनिर्देश या अन्य दस्तावेजें तैयार करना; 

(ग)  पेटेन्टों की विधिमान्यता या उनके अतिलंघन के बारे में वैज्ञानिक या तकनीकी प्रकृति की सलाह से भिन्न सलाह देना ।

130. पेटेन्ट अभिकर्ताओं के रजिस्टर से हटाया जाना और प्रत्यावर्तन-(1)  [नियंत्रकट किसी व्यक्ति का नाम रजिस्टर से तब  [हटा सकेगाट जब उसका, उस व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात् और ऐसी अतिरिक्त जांच करने के पश्चात्, यदि कोई हो, जिसे वह करना उचित समझे, यह समाधान हो जाता है कि- 

(i) उसका नाम रजिस्टर में गलती से या दुर्व्यपदेशन या तात्विक तथ्यों के छिपाने के कारण दर्ज कर लिया गया है;

(ii) वह किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास की किसी अवधि से दण्डादिष्ट किया गया है और अपनी वृत्तिक हैसियत में ऐसे अवचार का दोषी रहा है, जो 2[नियंत्रकट की राय में उसे रजिस्टर में रखे जाने के लिए अयोग्य बनाता है ।

(2) 2[नियंत्रकट रजिस्टर से हटाए गए किसी व्यक्ति के नाम का प्रत्यावर्तन, आवेदन किए जाने के पर और पर्याप्त कारण दर्शित किए जाने पर उसमें कर सकेगा । 

131. कतिपय अभिकर्ताओं से व्यवहार करने से इंकार करने की नियंत्रक की शक्ति-(1) इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, नियंत्रक- 

(क) किसी व्यक्ति को जिसका नाम रजिस्टर से हटा दिया गया है और उसमें प्रत्यावर्तित नहीं किया गया है;

(ख) किसी व्यक्ति को जो धारा 123 के अधीन किसी अपराध का सिद्धदोष ठहराया गया है; 

(ग) किसी व्यक्ति को, जो पेटेन्ट अभिकर्ता के रूप में रजिस्ट्रीकृत नहीं है, जिसके बारे में नियन्त्रक की यह राय है कि वह भारत में या अन्यत्र पेटेन्टों के लिए आवेदन करने में उस व्यक्ति के नाम में या उसके फायदे के लिए, जिसके द्वारा वह नियोजित है, अभिकर्ता के रूप में कार्य करने में पूर्णतः या मुख्यतः लगा हुआ है ; 

(घ) किसी कम्पनी या फर्म को, यदि कोई व्यक्ति, जिसे नियन्त्रक किसी कारबार की बाबत अभिकर्ता के रूप में इस अधिनियम के अधीन मान्यता देने से इंकार कर सकता था, उस कम्पनी के निदेशक या प्रबन्धक की हैसियत में कार्य कर रहा है या फर्म में भागीदार है,

किसी कारबार की बाबत अभिकर्ता के रूप में इस अधिनियम के अधीन मान्यता देने से इंकार कर सकेगा ।

(2) नियन्त्रक किसी व्यक्ति को किसी कारबार की बाबत अभिकर्ता के रूप में इस अधिनियम के अधीन मान्यता देने से इंकार कर सकेगा जो न तो भारत में रहता है और न उसका वहां कारबार का स्थान है । 

 

132. अभिकर्ताओं के रूप में कार्य करने के लिए प्राधिकृत अन्य व्यक्तियों की बाबत व्यावृत्तियां-इस अध्याय की कोई भी बात- 

(क) पेटेन्ट के आवेदक को  । । । किसी विनिर्देश का प्रारूप बनाने से अथवा नियन्त्रक के समक्ष हाजिर होने या कार्य करने से; या 

(ख) किसी अधिवक्ता को जो पेटेन्ट अभिकर्ता नहीं है,  [नियंत्रक के समक्ष ऐसे पक्षकार की ओर से जो इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में भाग ले रहा है, किसी सुनवाई में भाग लेने सेट, प्रतिषिद्ध करने वाली नहीं समझी जाएगी । 

अध्याय 22

अन्तरराष्ट्रीय व्यवस्थाएं

 [133. अभिसमय देश-ऐसा कोई देश, जो हस्ताक्षरकर्ता या पक्षकार है अथवा पक्षकार या देशों का समूह, देशों का संघ या अंतरशासन संगठन, जो हस्ताक्षरकर्ता या पक्षकार है ऐसी किसी अंतरराष्ट्रीय, प्रादेशित या द्विपक्षीय संधि, अभिसमय या व्यवस्था के, जिसका भारत भी एक हस्ताक्षरकर्ता या पक्षकार है, और जो भारत में, पेटेंट के लिए आवेदकों या भारत के नागरिकों को वैसा ही विशेषाधिकार प्रदान करता है, जो पेटेंटों का अनुदान और पेटेंट अधिकारों के संरक्षण के संबंध में उनके अपने नागरिकों या उनके सदस्य देशों के नागरिकों को अनुदत्त है, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अभिसमय देश होगा या होंगे ।]     

134. व्यतिकर के लिए उपबन्ध करने वाले देशों के बारे में अधिसूचना-जहां केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट कोई देश पेटेन्टों के दान और पेटेन्ट अधिकारों के संरक्षण की बाबत भारत के नागरिकों को वे ही अधिकार नहीं देता है, जो वह अपने राष्ट्रिकों को देता है वहां ऐसे देश का कोई भी राष्ट्रिक, अकेले ही या संयुक्ततः किसी अन्य व्यक्ति के साथ- 

(क) पेटेन्ट के अनुदान के लिए आवेदन करने का या पेटेन्ट के स्वत्वधारी के रूप में रजिस्ट्रीकृत किए जाने का; 

(ख) पेटेन्ट के स्वत्वधारी के समनुदेशिती के रूप में रजिस्ट्रीकृत किए जाने का; या 

(ग) इस अधिनियम के अधीन अनुदत्त पेटेन्ट के अधीन किसी अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन करने का या उसे धारण करने का,

हकदार नहीं होगा । 

135. कन्वेंशन आवेदन-(1) धारा 6 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जहां किसी व्यक्ति ने कन्वेंशन देश में अविष्कार की बाबत पेटेन्ट के लिए आवेदन (जिसे इसमें इसके पश्चात् मूल आवेदन" कहा गया है) किया है और वह व्यक्ति या उस व्यक्ति का विधिक प्रतिनिधि या समनुदेशिती उस तारीख से बारह मास के भीतर, जिसको मूल आवेदन किया गया था, पेटेन्ट के लिए इस अधिनियम के अधीन आवेदन करता है वहां पूर्ण विनिर्देश के दावे की, जो मूल आवेदन में प्रकट किए गए विषय पर आधारित दावा है, पूर्विकता तारीख मूल आवेदन के करने की तारीख है ।

स्पष्टीकरण-जहां किसी आविष्कार की बाबत वैसे ही संरक्षण के लिए दो या अधिक कन्वेंशन देशों में आवेदन किए गए हों वहां इस उपधारा में निर्दिष्ट बारह मास की अवधि की गणना उस तारीख से की जाएगी, जिस तारीख को उक्त आवेदनों में से पूर्वतर या पूर्वतम आवेदन किया गया था । 

(2) जहां दो या अधिक ऐसे आविष्कारों की बाबत जो सजातीय हैं या उनमें से एक, दूसरे का उपान्तर है, संरक्षण के लिए आवेदन एक या अधिक कन्वेंशन देशों में किए गए हों वहां धारा 10 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उन आविष्कारों की बाबत संरक्षण के लिए एकल कन्वेंशन आवेदन, उक्त आवेदनों में से पूर्वतम आवेदन की तारीख से बारह मास के भीतर किसी भी समय किया जा सकेगा :

परन्तु ऐसा आवेदन करने पर देय फीस वहीं होगी मानो उक्त आविष्कारों में से हर एक की बाबत पृथक्-पृथक् आवेदन किए गए हों और धारा 136 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) की अपेक्षाएं, किसी ऐसे आवेदन की दशा में, उक्त आविष्कारों में से हर एक की बाबत संरक्षण के लिए आवेदनों को पृथक्-पृथक् लागू होंगी । 

 [(3) भारत को अभिहित करने वाली पेटेंट सहयोग संधि के अधीन फाइल किए गए आवेदन और भारत में पहले फाइल किए गए आवेदन से पूर्विकता का दावा करने की दशा में उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंध ऐसे लागू होंगे मानो पहले फाइल किया गया आवेदन मूल आवेदन था : 

परंतु धारा 11ख के अधीन जांच के लिए अनुरोध भारत में फाइल किए गए आवेदनों में से किसी एक के लिए ही                     किया जाएगा ।]

136. कन्वेंशन आवेदनों के संबंध में विशेष उपबन्ध-(1) हर कन्वेंशन आवेदन- 

(क) के साथ पूर्ण विनिर्देश होगा; और 

(ख) वह तारीख जिसको और वह कन्वेंशन देश, जिसमें, यथास्थिति, संरक्षण के लिए आवेदन या ऐसे आवेदनों में से प्रथम आवेदन किया गया था, विनिर्दिष्ट करेगा; और 

(ग) यह कथित करेगा कि आविष्कार की बाबत संरक्षण के लिए कोई आवेदन, आवेदक द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जिसके अधिकार से उसका हक व्युत्पन्न होता है, कन्वेंशन देश में उस तारीख से पूर्व नहीं किया गया है ।

(2) धारा 10 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कन्वेंशन आवेदन के साथ फाइल किए गए पूर्ण विनिर्देश के अन्तर्गत ऐसे आविष्कार के विकास या परिवर्धनों की बाबत दावे, जिसकी बाबत संरक्षण के लिए आवेदन कन्वेंशन देश में किया गया था, आ सकेंगे जो ऐसे विकास या परिवर्धन हैं जिनकी बाबत आवेदक धारा 6 के उपबन्धों के अधीन पेटेन्ट के लिए पृथक्-पृथक् आवेदन करने के लिए हकदार होता ।

(3) कन्वेंशन आवेदन धारा 17 की उपधारा (1) के अधीन ऐसी तारीख से उत्तर दिनांकित नहीं किया जाएगा जो उस तारीख के पश्चात् की हो, जिस तारीख को इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन आवेदन किया जा सकता था । 

137. बहुल पूर्विकताएं-(1) जहां आविष्कारों की बाबत पेटेन्टों के लिए दो या अधिक आवेदन एक या अधिक कन्वेंशन देशों में किए गए हों और वे आविष्कार इस प्रकार सम्बद्ध हों जिनसे एक ही आविष्कार गठित होता हो वहां धारा 135 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट व्यक्तियों में से किसी या सभी के द्वारा एक आवेदन उस तारीख से बारह मास के भीतर किया जा सकेगा, जिस तारीख को उन विनिर्देशों में जिनके साथ मूल आवेदन थे प्रकट किए गए आविष्कारों की बाबत उन आवेदनों में से पूर्वतर या पूर्वतम आवेदन किया गया था । 

(2) पूर्व विनिर्देश के दावे की जो मूल आवेदनों में से एक या अधिक में प्रकट किए गए विषयों पर आधारित दावा हो, पूर्विकता तारीख वह तारीख है जिसको वह विषय सब से पहले ऐसे प्रकट किया गया था । 

(3) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, कोई विषय कन्वेंशन देश में संरक्षण के लिए मूल आवेदन में प्रकट कर दिया गया समझा जाएगा, यदि उसका दावा या प्रकटन उस आवेदन में या आवेदक द्वारा उस आवेदन के समर्थन में संरक्षण के लिए प्रस्तुत किए गए किन्हीं दस्तावेजों में और उसी समय पर जो इस आवेदन का है (मुख्य कला के दावा त्याग या अभिस्वीकृति से भिन्न रूप में) किया गया था, किन्तु किसी ऐसी दस्तावेज में किए गए किसी प्रकटन को विचार में नहीं लिया जाएगा, जब तक कि दस्तावेज की प्रति पेटेन्ट कार्यालय में कन्वेंशन आवेदन के साथ या उस आवेदन के फाइल किए जाने के पश्चात् ऐसी अवधि के भीतर जो विहित की जाए फाइल न कर दी गई हो ।

138. कन्वेंशन आवेदनों के बारे में अनुपूरक उपबंध- [(1) जहां अभिसमय आवेदन इस अध्याय के उपबंधों के अनुसार किया गया है वहां आवेदक, जब भी नियंत्रक द्वारा अपेक्षा की जाए, पूर्ण विनिर्देश के अतिरिक्त, धारा 133 में यथानिर्दिष्ट अभिसमय देश के पेटेंट कार्यालय में आवेदक द्वारा फाइल किए गए विनिर्देश या जमा किए गए तत्संबंधी दस्तावेजों की प्रतियां या नियंत्रक के समाधान के लिए सत्यापित की गई प्रतियां नियंत्रक द्वारा संसूचना की तारीख से विहित अवधि के भीतर देगा ।]

(2) यदि कोई ऐसा विनिर्देश या अन्य दस्तावेज विदेशी भाषा में है तो  [नियंत्रक द्वारा अपेक्षा किए जाने पर दिया जाएगाट जो शपथपत्र द्वारा या नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में अन्यथा सत्यापित हो उसे विनिर्देश या दस्तावेज के साथ उपाबद्ध किया जाएगा ।

(3) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, वह तारीख जिसको कन्वेंशन देश में आवेदन किया गया था, ऐसी तारीख है जिसके बारे में कन्वेंशन देश के पेटेंट कार्यालय के शासकीय अध्यक्ष या प्रधान के प्रमाणपत्र द्वारा या अन्यथा नियन्त्रक का यह समाधान हो जाता है कि वह वही तारीख है जिस तारीख को उस कन्वेंशन देश में वह आवेदन किया गया था ।

 [(4) भारत को अभिहित करने वाली पेटेंट सहयोग संधि के अधीन फाइल किए गए किसी अंतरराष्ट्रीय आवेदन का यथास्थिति, धारा 7, धारा 54 और धारा 135 के अधीन पेटेंट के लिए आवेदन फाइल किए जाने का प्रभाव होगा और अंतरराष्ट्रीय आवेदन में फाइल किए गए, यदि कोई हों, हक, विवरण, दावा तथा उद्धरण और आरेखणों को इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए पूर्ण विनिर्देश समझा जाएगा ।

(5)  पेटेंट के लिए आवेदन और ऐसा पूर्ण विनिर्देश जिस पर अभिहित कार्यालय के रूप में पेटेंट कार्यालय द्वारा कार्यवाही की गई है, फाइल किए जाने की तारीख को पेटेंट सहयोग संधि के अधीन दी गई अंतरराष्ट्रीय आवेदन फाइल करने की तारीख समझा जाएगा ।

(6) भारत को अभिहित करने वाले या अंतरराष्ट्रीय तलाश प्राधिकारी या प्रारंभिक जांच प्राधिकारी के समक्ष भारत को अभिहित और चयनित करने वाले किसी अंतरराष्ट्रीय आवेदन के लिए आवेदक द्वारा प्रस्तावित संशोधन, यदि कोई हो, यदि आवेदक द्वारा ऐसी वांछा की जाए तो पेटेंट कार्यालय के समक्ष किया गया संशोधन समझा जाएगा ।]

139. अधिनियम के अन्य उपबन्धों का कन्वेंशन आवेदनों को लागू होना-उसके सिवाय जैसा इस अध्याय में अन्यथा उपबंधित है, इस अधिनियम के सभी उपबन्ध कन्वेंशन आवेदन के सम्बन्ध में और उसके अनुसरण में अनुदत्त पेटेंट के सम्बन्ध में वैसे ही लागू होंगे जैसे वे मामूली आवेदन और उसके अनुसरण में अनुदत्त पेटेन्ट को लागू होते हैं ।

अध्याय 23

प्रकीर्ण

140. कतिपय निर्बन्धनात्मक शर्तों का परिवर्जन-(1) (i) पेटेन्कृत वस्तु या पेटेन्टकृत प्रक्रिया द्वारा निर्मित किसी वस्तु के विक्रय या पट्टे के लिए या उससे सम्बन्धित किसी संविदा में; या 

(ii) पेटेन्टकृत वस्तु के विनिर्माण या उपयोग के लिए अनुज्ञप्ति में; या 

(iii) पेटेन्ट द्वारा संरक्षित किसी प्रक्रिया को क्रियान्वित करने के लिए अनुज्ञप्ति में, कोई ऐसी शर्त सम्मिलित करना विधिपूर्ण नहीं होगा, जिसका प्रभाव- 

(क) पेटेन्टकृत वस्तु से भिन्न कोई वस्तु या पेटेन्टकृत प्रक्रिया से निर्मित वस्तु से भिन्न कोई वस्तु विक्रेता, पट्टाकर्ता या अनुज्ञापक, या उसके नामनिर्देशितियों से अर्जित करने की क्रेता, पेट्टेदार या अनुज्ञप्तिधारी से अपेक्षा करने का या अर्जित करने से उसे प्रतिषिद्ध करने का या किसी व्यक्ति से अर्जित करने के उसके अधिकार को किसी रीति से या किसी विस्तार तक निर्बन्धित करने अथवा विक्रेता, पट्टाकर्ता या अनुज्ञापक, या उसके नामनिर्देशितियों से अर्जित करने के सिवाय किसी अन्य व्यक्ति से अर्जित करने से उसे प्रतिषिद्ध करने का हो; अथवा 

(ख) पेटेन्टकृत वस्तु से भिन्न किसी वस्तु का या पेटेन्टकृत प्रक्रिया द्वारा निर्मित वस्तु से भिन्न किसी वस्तु का, जिसका प्रदाय विक्रेता, पट्टाकर्ता या अनुज्ञापक, या उसके नामनिर्देशिती द्वारा नहीं किया गया है, उपयोग करने से क्रेता, पट्टेदार या अनुज्ञप्तिधारी को प्रतिषिद्ध करने का या क्रेता, पट्टेदार या अनुज्ञप्तिधारी के उसका उपयोग करने के अधिकार को रीति से या किसी विस्तार तक निर्बन्धित करने का हो; अथवा 

(ग)  पेटेन्टकृत प्रक्रिया से भिन्न किसी प्रक्रिया का उपयोग करने से क्रेता, पट्टेदार या अनुज्ञप्तिधारी को प्रतिषिद्ध करने का या क्रेता, पट्टेदार या अनुज्ञप्तिधारी के उसका उपयोग करने के अधिकार को किसी रीति से या किसी विस्तार तक निर्बन्धित करने का ह;

 [(घ) अनन्य अनुदान वापसी, पेटेन्ट की विधिमान्यता और प्रपीड़क पैकेज अनुज्ञापन के प्रति चुनौतियों के निवारण का उपबंध करने का हो,]

तथा कोई भी ऐसी शर्त शून्य होगी । 

(2) उपधारा (1) के खण्ड (क) या खण्ड (ख) या खण्ड (ग) में निर्दिष्ट प्रकृति की शर्त उस उपधारा के अन्तर्गत आने वाली शर्त के रूप में केवल इस तथ्य के कारण समाप्त नहीं हो जाएगी कि उसको अन्तर्विष्ट करने वाला करार अलग से किया गया है भले ही वह पेटेन्टकृत वस्तु या प्रक्रिया के विक्रय, पट्टे या अनुज्ञप्ति से सम्बन्धित संविदा के पूर्व या पश्चात् किया गया हो । 

(3) पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए किसी व्यक्ति के विरुद्ध की गई कार्यवाहियों में, यह साबित करना प्रतिरक्षा होगी कि ऐसे अतिलंघन के समय पेटेन्ट से सम्बन्धित और इस धारा द्वारा विधिविरुद्ध घोषित शर्त को अन्तर्विष्ट करने वाली संविदा प्रवृत्त थी :

परन्तु यदि वादी संविदा का पक्षकार नहीं है और वह न्यायालय के समाधानप्रद रूप में यह साबित कर देता है कि निर्बन्धनात्मक शर्त संविदा में उसके अभिव्यक्त या विवक्षित ज्ञान और सहमति के बिना सम्मिलित की गई थी तो यह उपधारा लागू नहीं होगी ।  

(4) इस धारा की कोई भी बात- 

(क) संविदा की ऐसी शर्त पर प्रभाव नहीं डालेगी, जिसके द्वारा कोई व्यक्ति किसी विशिष्टि व्यक्ति के माल से भिन्न माल का विक्रय, करने से प्रतिषिद्ध किया जाता है; 

(ख) ऐसी संविदा को विधिमान्य नहीं बनाएगी जो, यदि यह धारा न होती तो, अविधिमान्य होती; 

(ग) पेटेन्टकृत वस्तु के पट्टे की संविदा में या उसका उपयोग करने के लिए अनुज्ञप्ति में की ऐसी शर्त पर प्रभाव नहीं डालेगी, जिसके द्वारा पट्टाकर्ता या अनुज्ञापक अपने लिए या अपने नामनिर्देशिती के लिए पेटेन्टकृत वस्तु के ऐसे नए भागों के जिनकी अपेक्षा की जाए, प्रदाय करने के या उसकी मरम्मत करने या बनाए रखने के, अधिकार को आरक्षित रखता है ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।    

                141. कतिपय संविदाओं का पर्यवसान-(1) पेटेन्टकृत वस्तु के विक्रय या पट्टे के लिए या पेटेन्टकृत वस्तु या प्रक्रिया के विनिर्माण, उपयोग या क्रियान्वयन के लिए अनुज्ञप्ति के लिए या ऐसे किसी विक्रय, पट्टे या अनुज्ञप्ति से सम्बद्ध कोई संविदा,  । । । उस समय के पश्चात् जब ऐसा पेटेन्ट या ऐसे सब पेटेन्ट जिसके या जिनके द्वारा वस्तु या प्रक्रिया, संविदा करने के समय संरक्षित थी, प्रवृत्त नहीं रह गया है या नहीं रह गए हैं किसी भी समय और उस संविदा या किसी अन्य संविदा में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, यथास्थिति, पेटेन्ट के क्रेता, पट्टेदार या अनुज्ञप्तिधारी द्वारा दूसरे पक्षकार को लिखित रूप में तीन मास की सूचना देकर पर्यवसित की जा सकेगी । 

(2) इस धारा के उपबन्ध, संविदा का पर्यवसान करने के किसी ऐसे अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेंगे जो इस धारा के अलावा प्रयोक्तव्य हैं । 

142. फीस-(1) पेटेन्ट अनुदत्त किए जाने के और उनके लिए आवेदनों की बाबत और इस अधिनियम के अधीन पेटेन्ट अनुदत्त किए जाने से सम्बद्ध अन्य विषयों के लिए ऐसी फीस दी जाएगी, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाए ।

(2) जहां नियंत्रक द्वारा किसी कार्य के लिए जाने की बाबत कोई फीस देय है वहां नियन्त्रक उस कार्य को तब तक नहीं करेगा जब तक कि फीस न दे दी जाए ।  

 [(3) जहां पेटेंट कार्यालय में दस्तावेज फाइल करने के संबंध में कोई फीस देय है, वहां फीस दस्तावेज के साथ या विहित समय के भीतर संदत्त की जाएगी और यदि फीस का संदाय ऐसे समय के भीतर नहीं किया गया है तो यह समझा जाएगा कि दस्तावेज कार्यालय में फाइल नहीं किया गया है;] 

(4) जहां मूल पेटेन्ट,  [आवेदनट फाइल किए जाने की तारीख से दो वर्ष के पश्चात् अनुदत्त किया जाता है वहां फीस जो अभ्यन्तर काल में शोध्य हो जाए, रजिस्टर में पेटेन्ट के अभिलिखित किए जाने की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर  [या उतनी बढ़ाई गई अवधि के भीतर जो अभिलेखन की तारीख से नौ माह के पश्चात् की न होट दी जा सकेगी । 

 [143. विनिर्देश के प्रकाशन पर निर्बंधन-अध्याय 7 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, पेटेंट के लिए आवेदन और उसके अनुसरण में फाइल किया गया कोई विनिर्देश, आवेदक की सहमति के बिना, नियंत्रक द्वारा धारा 11क की उपधारा (1) में विहित अवधि की समाप्ति से पूर्व या धारा 11 की उपधारा (3) या धारा 43 के अनुसरण में लोक निरीक्षण के लिए खोले जाने से पूर्व प्रकाशित नहीं किया जाएगा ।] 

144. परीक्षकों की रिपोर्टों का गोपनीय होना-इस अधिनियम के अधीन नियंत्रक को परीक्षकों द्वारा दी गई रिपोर्टें लोक निरीक्षण के लिए उपबन्ध नहीं रहेंगी और न नियंत्रक द्वारा प्रकाशित की जाएंगी और ऐसी रिपोर्टें किसी विधिक कार्यवाही में पेश या निरीक्षण किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होंगी जब तक कि न्यायालय यह प्रमाणित नहीं कर देता है कि उनका पेश या निरीक्षण किया जाना न्याय के हित में वांछनीय है और अनुज्ञात किया जाना चाहिए । 

 [145. शासकीय जर्नल का प्रकाशन-नियंत्रक कालिक रूप से एक शासकीय जर्नल प्रकाशित करेगा जिसमें ऐसी जानकारी अंतर्विष्ट होगी जो इस अधिनियम के उपबंधों या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम द्वारा या उसके अधीन प्रकाशित किए जाने के लिए अपेक्षित हो ।]

146. पेटेन्टधारियों से जानकारी मांगने की नियंत्रक की शक्ति-(1) नियंत्रक, पेटेन्ट के बने रहने के दौरान किसी भी समय, लिखित सूचना द्वारा पेटेन्टधारी या अनुज्ञप्तिधारी से, चाहे अनन्यतः या अन्यथा, यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह ऐसी सूचना की तारीख से दो मास के भीतर या ऐसे अतिरिक्त समय के भीतर, जो नियन्त्रक अनुज्ञात करे, उसको ऐसी जानकारी या ऐसे नियतकालिक विवरण जो उस सूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, उस विस्तार तक दे जिस तक पेटेन्टकृत आविष्कार वाणिज्यिक रूप से भारत में क्रियान्वित किया गया है ।

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रत्येक पेटेन्टधारी और प्रत्येक अनुज्ञप्तिधारी (चाहे अनन्यतः या अन्यथा) ऐसी रीति से और ऐसे प्ररूप में और (छह मास से अन्यून के) ऐसे अन्तरालों पर जो विहित किए जाएं, उस विस्तार तक विवरण देगा जिस तक पेटेन्टकृत आविष्कार वाणिज्यिक पैमाने पर भारत में क्रियान्वित किया गया है । 

(3) नियन्त्रक, उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन उसके द्वारा प्राप्त की गई सूचना ऐसी रीति से प्रकाशित कर सकेगा जो विहित की जाए । 

147. प्रविष्टियों, दस्तावेजों, आदि का साक्ष्य-(1) कोई प्रमाणपत्र, जिसका नियन्त्रक द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जो किसी ऐसी प्रविष्टि, विषय या बात के बारे में है जिसे बनाने या करने के लिए वह इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों द्वारा प्राधिकृत है, उस प्रविष्टि के किए जाने और उसकी अन्वर्तस्तुओं के और उस विषय या बात के लिए किए जाने या न किए जाने के प्रथमदृष्ट्या साक्ष्य होगा । 

(2) किसी रजिस्टर में किसी प्रविष्टि की या पेटेन्ट कार्यालय में रखी गई किसी दस्तावेज की या किसी पेटेन्ट की प्रति, या किसी ऐसे रजिस्टर या दस्तावेज से कोई उद्धरण जिसका नियंत्रक द्वारा प्रमाणित और पेटेन्ट कार्यालय की मुद्रा से मुद्रांकित होना तात्पर्यित है सभी न्यायालयों में और सभी कार्यवाहियों में अतिरिक्त सबूत या मूल पेश किए बिना साक्ष्य में ग्रहण किया जाएगा ।

(3) नियन्त्रक या पेटेन्ट कार्यालय का कोई अन्य अधिकारी किन्हीं ऐसी विधिक कार्यवाहियों में, जिनका वह पक्षकार नहीं है, रजिस्टर या अपनी अभिरक्षा में किसी अन्य दस्तावेज को, जिसकी अन्तर्वस्तु इस अधिनियम के अधीन दी गई प्रमाणित प्रति पेश करके साबित की जा सकती है, पेश करने या उसमें अभिलिखित विषय को साबित करने के लिए साक्षी के रूप में हाजिर होने के लिए विवश नहीं किया जाएगा जब तक कि न्यायालय विशेष कारणों से आदेश न दे ।

148. शिशु, पागल, आदि द्वारा घोषणा-(1) यदि कोई व्यक्ति अवयस्कता, पागलपन या अन्य निःशक्कता के कारण, इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन अपेक्षित या अनुज्ञात कोई विवरण देने या किसी बात के करने में असमर्थ है तो ऐसे निःशक्त व्यक्ति का विधिपूर्ण संरक्षक, सुपुर्ददार या प्रबन्धक (यदि कोई हो) या यदि ऐसा कोई व्यक्ति न हो तो उसकी सम्पत्ति की बाबत अधिकारिता रखने वाले किसी न्यायालय द्वारा नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति वह विवरण या ऐसा विवरण जो उसके इतना समरूप हो जितना परिस्थितियां अनुज्ञात करें, दे सकेगा और निःशक्त व्यक्ति के नाम में और उसकी ओर से वह बात कर सकेगा । 

(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए न्यायालय द्वारा कोई नियुक्ति, निःशक्त व्यक्ति की ओर से कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की अथवा ऐसा विवरण देने या ऐसी बात करने से हितबद्ध किसी अन्य व्यक्ति की अर्जी पर, की जा सकेगी ।

149. सूचनाओं, आदि की डाक द्वारा तामील-इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन किए जाने के लिए अपेक्षित या प्राधिकृत कोई सूचना और दिए जाने या फाइल किए जाने के लिए ऐसे प्राधिकृत या अपेक्षित कोई आवेदन या अन्य दस्तावेज, डाक द्वारा दी जा सकेगी अथवा किया जा सकेगा या फाइल की जा सकेगी । 

150. खर्चों के लिए प्रतिपूर्ति-यदि कोई पक्षकार जिसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन विरोध की सूचना दी गई है या जिसके द्वारा किसी पेटेन्ट के अधीन अनुज्ञप्ति प्रदान किए जाने के लिए नियंत्रक से आवेदन किया गया है, भारत में न तो रहता है और न कारबार करता है तो नियंत्रक उससे कार्यवाहियों के खर्चों के लिए प्रतिपूर्ति देने की अपेक्षा कर सकेगा और ऐसी प्रतिपूर्ति देने में व्यतिक्रम करने पर विरोध या आवेदन के बारे में यह मान सकेगा कि उसका परित्याग कर दिया गया है ।

151. न्यायालयों के आदेशों का नियंत्रक को पारेषण-(1) प्रतिसंहरण के लिए अर्जी पर दिया गया  [उच्च न्यायालय या अपील बोर्डट का हर आदेश, जिसके अन्तर्गत किसी दावे की विधिमान्यता के प्रमाणपत्र प्रदान करने वाले आदेश है, [उच्च न्यायालय या अपील बोर्ड] द्वारा नियन्त्रक को पारेषित किए जाएंगे जो रजिस्टर में उसकी प्रविष्टि या उसके बारे में निर्देश करवाएगा ।

(2) जहां पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए किसी वाद में या धारा 106 के अधीन के किसी वाद में, किसी दावे या विनिर्देश का विधिमान्यता का प्रतिवाद किया जाता है और उस दावे की बाबत न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि वह, यथास्थिति, विधिमान्य है या विधिमान्य नहीं है वहां न्यायालय अपने निर्णय और डिक्री की प्रति नियन्त्रक को पारेषित करेगा जो उसकी प्राप्ति पर ऐसी कार्यवाही के सम्बन्ध में प्रविष्टि अनुपूरक अभिलेख में विहित रीति से करवाएगा । 

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबन्ध उस न्यायालय को भी लागू होंगे जिसको उन उपधाराओं में निर्दिष्ट  [यथास्थिति, अपील बोर्ड या न्यायालयोंट के विनिश्चयों के विरुद्ध अपीलें की जाती हैं ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

153. पेटेन्टों से सम्बन्धित जानकारी-कोई व्यक्ति जो नियंत्रक से निवेदन, उस निवेदन में विनिर्दिष्ट किसी पेटेन्ट की बाबत या इस प्रकार विनिर्दिष्ट किसी पेटेन्ट के लिए किसी आवेदन की बाबत किन्हीं ऐसे विषयों से सम्बन्धित जो विहित किए जाएं, जानकारी के लिए विहित रीति से करता है, विहित फीस का संदाय कर देने पर इस बात का हकदार होगा कि उसे तद्नुसार जानकारी दी जाए ।

154. पेटेन्टों का खो जाना या नष्ट हो जाना-यदि पेटेन्ट खो जाता है या नष्ट हो जाता है या उसके पेश किए जाने का लेखा-जोखा नियंत्रक के समाधानप्रद रूप में दे दिया जाता है तो नियंत्रक किसी भी समय विहित रीति से आवेदन किए जाने पर और विहित फीस का संदाय कर देने पर उसकी दूसरी प्रति मुद्रांकित करवाएगा और आवेदक को परिदत्त करवाएगा । 

155. नियंत्रक की रिपोर्ट का संसद् के समक्ष रखा जाना-केन्द्रीय सरकार वह रिपोर्ट जो नियंत्रक द्वारा या उसके अधीन इस अधिनियम का निष्पादन किए जाने की बाबत हो, संसद् के दोनों सदनों के समक्ष वर्ष में एक बार रखवाएगी । 

156. पेटेन्ट का सरकार को आबद्ध करना-इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई पेटेन्ट समस्त आशयों के लिए सरकार के विरुद्ध वैसे प्रभावी होगा जैसे वह किसी व्यक्ति के विरुद्ध प्रभावी होता है ।

 157. समपहृत वस्तुओं का विक्रय या उपयोग करने का सरकार का अधिकार-इस अधिनियम की कोई बात सरकार की या किसी ऐसे व्यक्ति की जिसका सरकार से प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः हक व्युत्पन्न होता है तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन समपहृत किन्हीं वस्तुओं का विक्रय या उपयोग करने की शक्ति पर प्रभाव नहीं डालेगी । 

 [157क. भारत की सुरक्षा का संरक्षण-इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार,-  

(क) इस अधिनयिम के अधीन किसी पेटेंट या योग्य आविष्कार या पेटेंट अनुदान करने से संबंधित किसी आवेदन की बाबत कोई ऐसी जानकारी प्रकट नहीं करेगी जिसे वह भारत की सुरक्षा के हित पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली समझती है; 

(ख) राजपत्र में इस आशय की अधिसूचना जारी करके कोई ऐसी जानकारी, जिसके अंतर्गत किसी पेटेंट का प्रतिसंहरण भी है, करेगी, जो वह भारत की सुरक्षा के हित में आवश्यक समझे ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, भारत की सुरक्षा" पद के अंतर्गत भारत की सुरक्षा के लिए आवश्यक कोई ऐसी कार्यवाही है- 

(i) जो विखंडनीय सामग्री से संबंधित है जिससे वह व्युत्पन्न होती है; या 

(ii) जो आयुध, गोला-बारूद और युद्ध के उपकरणों में दुर्व्यापार से और ऐसे अन्य माल तथा सामग्री के ऐसे दुर्व्यापार से संबंधित है, जो किसी सैनिक स्थापन को प्रदाय करने के प्रयोजन के लिए प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः किया             गया है; या 

(iii) जो अंतरराष्ट्रीय संबंधों के विषयों में युद्ध के समय या अन्य आपातकाल में की जाती है ।]

158. नियम बनाने की उच्च न्यायालयों की शक्ति-उच्च न्यायालय इस अधिनियम के अधीन अपने समक्ष की सभी कार्यवाहियों के बारे में संचालन और प्रक्रिया विषयक ऐसे नियम, जो इस अधिनियम से संगत हों, बना सकेगा ।

159. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी । 

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध करने के लिए नियम बना सकेगी, अर्थात् :-

(i) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे पेटेन्ट के लिए कोई आवेदन, विनिर्मित या रेखांकन और कोई अन्य आवेदन या दस्तावेज, पेटेन्ट कार्यालय में फाइल किया जा सकेगा; 

 [(iक) वह अवधि, जिसे नियंत्रक उपधारा (1) के अधीन आवेदनों के संबंध में कथन या वचनबंध फाइल करने के लिए अनुज्ञात करे, वह अवधि जिसके भीतर आवेदन की आदेशिका से संबंधित ब्यौरे नियंत्रक के समक्ष फाइल किए जा सकेंगे और धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन नियंत्रक को आवेदक द्वारा दिए जाने वाले ब्यौरे; 

(iख) वह अवधि जिसके भीतर धारा 10 की उपधारा (4) के परंतुक के खंड (ii) के उपखंड (अ) के अधीन विनिर्देश में सामग्री के जमा किए जाने के प्रतिनिर्देश किया जाएगा; 

(iग) वह अवधि जिसके लिए पेटेंट के लिए आवेदन उपधारा (1) के अधीन जनता के लिए खुला नहीं होगा और वह रीति जिसमें धारा 11क की उपधारा (2) के अधीन नियंत्रक से आवेदक अपने आवेदन को प्रकाशित करने के लिए अनुरोध कर सकेगा; 

(iघ)  पेटेंट के लिए आवेदन की जांच के लिए अनुरोध करने की रीति और वह अवधि जिसके भीतर धारा 11ख की उपधारा (1) और उपधारा (3) के अधीन ऐसी जांच की जाएगी; 

(iड) वह रीति जिसमें पेटेंट के अनुदान के लिए आवेदन वापस लेने के लिए आवेदन किया जाएगा और वह अवधि जिसके भीतर धारा 11ख की उपधारा (4) के परंतुक के अधीन गोपनीयता से संबंधित निदेशों के प्रतिसंहरण की तारीख से जांच के लिए अनुरोध किया जाएगा ;]

 

(ii) वह समय जिसके भीतर इस अधिनियम के अधीन कोई कार्य या बात की जा सकेगी, जिसके अन्तर्गत, वह रीति जिससे और वह समय जिसके भीतर कोई विषय इस अधिनियम के अधीन  [प्रकाशितट किया जा सकेगा, आते हैं;

(iii) वे फीसें जो इस अधिनियम के अधीन संदेय हों और उन फीसों के संदाय की रीति  [और समयट;  

(iv) वे विषय जिनकी बाबत परीक्षक नियंत्रक को कोई रिपोर्ट दे सकेगा;  

 [(v) वह रीति, जिसमें और वह अवधि, जिसके भीतर नियंत्रक धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन किसी अभ्यावेदन पर विचार करेगा और उसका निपटारा करेगा; 

(vक) वह अवधि, जिसके भीतर नियंत्रक धारा 39 के अधीन किसी आवेदन का निपटारा करने के लिए अपेक्षित है;]

(vi) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे और वह समय जिसके भीतर कोई सूचना इस अधिनियम के अधीन दी जा सकेगी; 

(vii) वे उपबंध जो ऐसे व्यक्तियों के संरक्षण के लिए पेटेन्ट के प्रत्यावर्तन के आदेश में सम्मिलित किए जा सकेंगे जिन्होंने पेटेन्ट के समाप्त हो जाने के पश्चात् पेटेन्ट की विषय-वस्तु का लाभ उठाया हो; 

(viii) पेटेन्ट कार्यालय के शाखा कार्यालय की स्थापना और पेटेन्ट कार्यालय, जिसके अन्तर्गत उसके शाखा कार्यालय आते हैं, के कारबार का साधारणतः विनियमन;

(ix) पेटेंटों के रजिस्टर का रखा जाता  [और ऐसे रजिस्टर को कम्प्यूटर फलापियों, डिस्कैटों या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखे जाने में पालन किए जाने वाले रक्षोपायट और उसमें दर्ज किया जाने वाला विषय; 

(x) वे विषय जिनके बारे में नियंत्रक को सिविल न्यायालय की शक्तियां होंगी; 

(xi) वह समय जब और वह रीति जिससे रजिस्टर या कोई अन्य दस्तावेज, जो निरीक्षण के लिए उपलब्ध हो, इस अधिनियम के अधीन निरीक्षित किया जा सकेगा; 

(xii) धारा 115 के प्रयोजन के लिए वैज्ञानिक सलाहकारों की अर्हताएं और उनकी सूची की तैयारी; 

4[(xiiक) धारा 117 की उपधारा (2) के अधीन अपील बोर्ड के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें और वह रीति जिसमें उक्त धारा की उपधारा (3) के अधीन अपील बोर्ड के अधिकारी और कर्मचारी अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे; 

(xiiख) धारा 117क की उपधारा (3) के अधीन अपील करने के लिए प्ररूप उसके सत्यापन की रीति और उसके साथ संदेय फीस; 

(xiiग) धारा 117घ की उपधारा (1) के अधीन अपील बोर्ड को किए जाने वाले आवेदन का प्ररूप और उसमें सम्मिलित की जाने वाली विशिष्टियां;]

(xiii) वह रीति जिससे सरकार द्वारा आविष्कार के अर्जन के लिए प्रतिकर दिया जा सकेगा; 

(xiv) 4[वह रीति जिसमें धारा 125 की उपधारा (1) के अधीन पेटेंट अभिकर्ताओं का रजिस्टर रखा जा सकेगा और ऐसे पेटेंट अभिकर्ताओं के रजिस्टर को उक्त धारा की उपधारा (2) के अधीन कम्प्यूटर फ्लापियों, डिस्कैट या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक प्ररूप में रखे जाने में पालन किए जाने वाले रक्षोपायट पेटेन्ट अभिकर्ताओं के लिए अर्हक परीक्षाओं का संचालन तथा उसकी वृत्ति और आचरण से संबंधित विषय जिनके अन्तर्गत पेटेन्ट अभिकर्ताओं के विरुद्ध अवचार के लिए अनुशासनिक कार्यवाहियां करना आता है;  

(xv) विनिर्देशों की अनुक्रमणिकाओं और संक्षेपणों के और पेटेन्ट कार्यालयों में की अन्य दस्तावेजों के निर्माण, मुद्रण, प्रकाशन और विक्रय का विनियमन तथा अनुक्रमणिकाओं और संक्षेपणों और अन्य दस्तावेजो का निरीक्षण; 

(xvi) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या किया जा सकता है । 

(3) इस धारा के अधीन नियम बनाने की शक्ति पूर्व प्रकाशन के पश्चात् नियम बनाए जाने की शर्त के अधीन होगी :

 [परंतु केन्द्रीय सरकार, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि विद्यमान परिस्थितियों में पूर्व प्रकाशन की शर्त का अनुपालन व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है तो ऐसे अनुपालन से अभिमुक्ति प्रदान कर सकेगी ।]

160. नियमों का संसद के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में  [अथवा दो आनुक्रमिक सत्रों मेंट  पूरी हो सकेगी । 1[यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान से पूर्वट दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

162. 1911 के अधिनियम सं० 2 का वहां तक निरसन जहां तक वह पेटेन्टों से सम्बद्ध है और व्यावृतियां-(1) भारतीय पेटेन्ट और डिजाइन अधिनियम, 1911 वहां तक जहां तक वह पेटेन्टों से सम्बद्ध है, इसके द्वारा निरसित किया जाता है, अर्थात् उक्त अधिनियम अनुसूची में विनिर्दिष्ट रीति से संशोधित किया जाएगा ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

(4) इस धारा में विशिष्ट विषयों का वर्णन निरसनों की बाबत साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) के साधारणतया लागू होने पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा । 

(5) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के प्रारम्भ होने के समय किसी न्यायालय में लम्बित पेटेन्ट के अतिलंघन के लिए कोई वाद या पेटेन्ट के प्रतिसंहरण के लिए कोई कार्यवाही उसी प्रकार चालू रखी जा सकेगी और निपटाई जा सकेगी, मानो यह अधिनियम पारित नहीं किया गया था । 

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।      

अनुसूची

(धारा 162 देखिए)

भारतीय पेटेन्ट और डिजाइन अधिनियम, 1911 का संशोधन

1. दीर्घ नाम-आविष्कारों और" का लोप कर दें । 

2. उद्देशिका-आविष्कारों और" का लोप कर दें । 

3. धारा 1-उपधारा (1) “में भारतीय पेटेन्ट और" का लोप कर दें ।

4. धारा 2-   

(क) खण्ड (1) का लोप कर दें; 

(ख) खण्ड (2) में (डिजाइनों की बाबत)" का लोप कर दें;

(ग) खण्ड (3) के स्थान पर निम्नलिखित रख दें- 

(3) “नियन्त्रक" से व्यापार और पण्य-वस्तु चिह्न अधिनियम, 1958 (1958 का 43) की धारा 4 की उपधारा (1) के अधीन नियुक्त किया गया पेटेन्ट, डिजाइन और व्यापार चिह्न महानियंत्रक अभिप्रेत है;ऱ् ; 

(घ) खण्ड (5) में, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 478 में यथापरिभाषित व्यापार चिह्न या" के स्थान पर व्यापार और पण्य-वस्तु चिह्न अधिनियम, 1958 (1958 का 43) की धारा 2 की उपधारा (1) के खण्ड (फ) में यथापरिभाषित व्यापार चिह्न या भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की " प्रतिस्थापित कर दें; 

(ङ) खण्ड (6) का लोप कर दें; 

(च) खण्ड (7) में उपखण्ड (ङङ) के पश्चात् निम्नलिखित अन्तःस्थापित कर दें- 

(च) दादरा और नागर हवेली तथा गोवा, दमन और दीव संघ राज्यक्षेत्रों के संबंध में मुम्बई उच्च न्यायालय; 

(छ) पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में मद्रास उच्च न्यायालय ;

(छ) खण्ड (8), (10) और (11) का लोप कर दें; 

(ज) खण्ड (12) के स्थान पर निम्नलिखित रख दें :-

 (12) “पेटेन्ट कार्यालय" से पेटेन्ट अधिनियम, 1970 की धारा 74 में निर्दिष्ट पेटेन्ट कार्यालय                अभिप्रेत हैं ।

5. भाग 1 का लोप कर दें ।

6. धारा 51ख के स्थान पर निम्नलिखित रख दें- 

51ख. डिजाइनों का सरकार को आबद्ध करना-रजिस्ट्रीकृत डिजाइन सभी आशयों के लिए सरकार के विरुद्ध वैसा ही प्रभाव रखेगी जैसा वह किसी व्यक्ति के विरुद्ध रखती है और पेटेन्ट अधिनियम, 1970 के अध्याय 17 के उपबन्ध रजिस्ट्रीकृत डिजाइनों को वैसे ही लागू होंगे जैसे वे पेटेन्टों को लागू होते हैं ।

7. धारा 54 में, “इस अधिनियम के उपबन्ध" के स्थान पर, पेटेन्ट अधिनियम, 1970 के उपबन्ध" रख दें । 

8. धारा 55 और 56 का लोप कर दें । 

9. धारा 57-उपधारा (1) के स्थान पर निम्नलिखित रख दें-

“(1) इस अधिनियम के अधीन डिजाइनों के रजिस्ट्रीकरण और उसके लिए आवेदनों की बाबत और डिजाइनों से सम्बद्ध अन्य विषयों की बाबत ऐसी फीसें दी जाएंगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं ।" ।

10. धारा 59क का लोप कर दें । 

11. धारा 61-उपधारा (1) का लोप कर दें । 

12. धारा 62 के स्थान पर निम्नलिखित रख दें- 

“62. लेखन सम्बन्धी गलतियों को शुद्ध करने की नियंत्रक की शक्ति-नियंत्रक ऐसे लिखित निवेदन के किए जाने पर जिसके साथ विहित फीस हो किसी डिजाइन के रूप में या किसी डिजाइन के स्वत्वधारी के नाम या पते में या ऐसे किसी अन्य विषय में जो डिजाइनों के रजिस्टर में दर्ज किया गया है, किसी लेखन संबंधी गलती को शुद्ध कर सकेगा ।" ।

13. धारा 63- 

(क) उपधारा (1) में, पेटेन्ट का या" और पेटेन्ट या" का लोप कर दें; 

(ख) उपधारा (2) में, पेटेन्ट या" का लोप कर दें और यथास्थिति, पेटेन्टों या “डिजाइनों" के स्थान पर डिजाइनों" रख दें; 

(ग) उपधारा (3) में, जहां कहीं पेटेन्ट या" पद आया है, उसका लोप कर दें; 

(घ) उपधारा (4) में, पेटेन्ट की बाबत या" का लोप कर दें ।

14. धारा 64- 

(क) उपधारा (1) में, “पेटेंटों या" का लोप कर दें और जहां कहीं दोनों रजिस्टरों में से किसी" शब्द आए हैं, उनके स्थान पर “रजिस्टर"  शब्द रख दें;

(ख) उपधारा (5) में, खण्ड (क) का लोप कर दें । 

15. धारा 66 का लोप कर दें । 

16. धारा 67- पेटेन्ट के लिए या किसी आवेदन या विनिर्देश के संशोधन के लिए अथवा,"  का लोप कर दें ।

17. धारा 69-उपधारा (1) में, ऐसे आविष्कार के लिए पेटेन्ट अनुदत्त करने या" का लोप कर दें । 

18. धारा 71क-पेटेन्ट, विनिर्देशों और अन्य दस्तावेजों की, या में से," के स्थान पर, दस्तावेजों की," रख दें । 

19. धारा 72 का लोप कर दें । 

20. धारा 74क और 75 का लोप कर दें ।

21. धारा 76- 

(क)  उपधारा (1) में, अन्य" का लोप कर दें;

(ख) उपधारा (2) में, खण्ड (ग) में, विरोधकर्ता" का लोप कर दें ।

22. धारा 77-

(क) उपधारा (1) में, - 

(i) खण्ड (ग) और खण्ड (घ) में, विनिर्देशों" का लोप कर दें;

(ii) खण्ड (ङ) के स्थान पर निम्नलिखित रख दें :-

“(ङ) पेटेन्ट कार्यालय में दस्तावेजों के निरीक्षण के लिए और उस रीति का जिससे वे प्रकाशित किए जा सकेंगे, उपबन्ध करना;" ; 

(iii) खण्ड (ङङङ) का लोप कर दें;

(ख) उपधारा (2क) का लोप कर दें । 

23. धारा 78 का लोप कर दें । 

24. धारा 78क के स्थान पर निम्नलिखित रख दें :-

78क. यूनाइटेड किंगडम और अन्य कामनवैल्थ देशों के साथ व्यतिकारी व्यवस्था-(1) कोई व्यक्ति, जिसने यूनाइटेड किंगडम में किसी डिजाइन के संरक्षण के लिए आवेदन किया है या उसका विधिक प्रतिनिधि या समनुदेशिती, या तो अकेले या किसी अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्ततः, यह दावा करने का हकदार होगा कि इस अधिनियम के अधीन उक्त डिजाइन का रजिस्ट्रीकरण अन्य आवेदकों के मुकाबले में पूर्विकता से होगा और उसकी वही तारीख होगी जो तारीख यूनाइटेड किंगडम में किए गए आवेदन की थी :

परन्तु-

(क)  यह तब जक कि आवेदन युनाइटेड किंगडम में संरक्षण के आवेदन के छह मास के भीतर कर दिया जाए; और

(ख) इस धारा की कोई बात डिजाइन के स्वात्वधारी को उस वास्तविक तारीख से, जिसको डिजाइन भारत में रजिस्ट्रीकृत किया गया है, पूर्व होने वाले अतिलंघनों के लिए नुकसानी वसूल करने का हकदार नहीं बनाएगी ।

(2) किसी डिजाइन का रजिस्ट्रीकरण केवल इसलिए अविधिमान्य नहीं कर दिया जाएगा कि भारत में उस डिजाइन का, इस धारा में विनिर्दिष्ट उस अवधि के दौरान जिसके भीतर आवेदन किया जा सकेगा, प्रदर्शन या उपयोग अथवा उसके वर्णन या रूपण का प्रकाशन किया गया है । 

(3) इस धारा के अधीन डिजाइन के रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन उसी रीति से किया जाना चाहिए जैसे कि इस धारा के अधीन मामूली आवेदन किया जाता है । 

(4) जहां केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत करा दिया जाता है कि किसी ऐसे कामनवैल्थ देश के, जो इस निमित्त केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित किया जाए, विधान-मण्डल ने भारत में रजिस्ट्रीकृत डिजाइनों के संरक्षण के लिए समाधानप्रद उपबन्ध कर दिया गया है वहां केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस धारा के उपबन्ध ऐसे फेरफार या परिवर्धनों के साथ, यदि कोई हों, जो ऐसी अधिसूचना में उपवर्णित किए जाएं, उस कामनवैल्थ देश में रजिस्ट्रीकृत डिजाइनों के संरक्षण को लागू होंगे ।

25. धारा 78ख, धारा 78ग, धारा 78घ और 78ङ का लोप कर दें । 

26. अनुसूची का लोप कर दें ।

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