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स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अधिनियम, 1988 ( Prevention of Illicit Traffic in Narcotic Drugs and Psychotropic Substances Act, 1988 )


 

स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अधिनियम, 1988

(1988 का अधिनियम संख्यांक 46)

[6 सितंबर, 1988]

स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार

के निवारण के प्रयोजन के लिए, कुछ मामलों में निरोध

का और उससे संबंधित विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार से जनता के स्वास्थ्य और कल्याण के लिए एक गंभीर आशंका उत्पन्न हो गई है, और ऐसे अवैध व्यापार में लगे हुए व्यक्तियों के क्रियाकलापों से राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था पर हानिकर प्रभाव पड़ा है ;

                और ऐसे व्यक्तियों को जिनके द्वारा और उस रीति को, जिससे ऐसे क्रियाकलाप संगठित किए और चलाए जाते हैं, ध्यान में रखते हुए तथा इस बात को ध्यान में रखते हुए कि कुछ ऐसे क्षेत्रों में, जो स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार के लिए सहजभेद्य हैं, काफी बड़े पैमाने पर ऐसे क्रियाकलाप छुपे तौर पर संगठित किए और चलाए जाते हैं, अतः ऐसे क्रियाकलापों के प्रभावी निवारण के लिए किसी भी रीति से उनसे संबंधित व्यक्तियों के निरोध के लिए उपबंध करना आवश्यक है ।

                भारत गणराज्य के उनतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अधिनियम, 1988 है ।

                (2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।

                (3) यह 4 जुलाई, 1988 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) समुचित सरकार" से केंद्रीय सरकार या केंद्रीय सराकर के किसी अधिकारी द्वारा किए गए निरोध आदेश अथवा ऐसे आदेश के अधीन निरुद्ध किसी व्यक्ति की बाबत, केंद्रीय सरकार और किसी राज्य सरकार या किसी राज्य के किसी अधिकारी द्वारा किए गए निरोध आदेश अथवा ऐसे आदेश के अधीन निरुद्ध किसी व्यक्ति की बाबत, राज्य सरकार अभिप्रेत है ;

(ख) सीमाशुल्क विमानपत्तन" से सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 7 के खंड (क) के अधीन सीमाशुल्क विमानपत्तन के रूप में नियत किया गया कोई विमानपत्तन अभिप्रेत है ;

(ग) निरोध आदेश" से धारा 3 के अधीन किया गया आदेश अभिप्रेत है ;

(घ) विदेशी" का वही अर्थ है, जो विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) में है ;

(ङ) स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों के संबंध में, अवैध व्यापार" से निम्नलिखित अभिप्रेत है :-

                (i) किसी कोका के पौधे की खेती करना या कोका के पौधे के किसी भाग का संग्रह करना ;

                (ii) अफीम, पोस्त या किसी कैनेबिस के पौधे की खेती करना ;

                (iii) स्वापक ओषधियों या मनःप्रभावी पदार्थों के उत्पादन, विनिर्माण, कब्जे, विक्रय, क्रय, परिवहन, भांडागारण, छिपाने, उपयोग या उपभोग, अंतरराज्यिक आयात, अंतरराज्यिक निर्यात, भारत में आयात, भारत से निर्यात या यानांतरण में लगना ;

                (iv) स्वापक ओषधियों या मनःप्रभावी पदार्थों के, उपखंड (i) से उपखंड (iii) तक में उपबंधित से भिन्न, किन्हीं क्रियाकलापों में संव्यवहार करना ; या

                (v) उपखंड (i) से उपखंड (iv) तक में निर्दिष्ट क्रियाकलापों में से किसी को चलाने के लिए किसी परिसर का प्रबंध करना या उसे किराए पर देना,

सिवाय उनके जिन्हें स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (1985 का 61) या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम या किए गए आदेश, या जारी की गई किसी अनुज्ञप्ति, निबंधन या प्राधिकारी की किसी शर्त के अधीन अनुज्ञात किया गया है, और इसके अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं-

                                (1) पूर्ववर्णित क्रियाकलापों में से किसी का प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः वित्तपोषण करना ;

                (2) पूर्ववर्णित क्रियाकलापों में से किसी के करने को अग्रसर करने में या समर्थन में दुष्प्रेरण या षड़्यंत्र करना ; और

                (3) पूर्ववर्णित क्रियाकलापों में से किसी में लगे व्यक्तियों को संश्रय देना ;

(च) भारतीय सीमाशुल्क सागरखंड" का वही अर्थ है जो सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 2 के खंड (28) में है ;

(छ) राज्य सरकार" से किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में उसका प्रशासक अभिप्रेत है ;

(ज) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं किंतु परिभाषित नहीं हैं और स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 (1985 का 61) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो, क्रमशः उनके उस अधिनियम में हैं ।

3. कुछ व्यक्तियों को निरुद्ध करने के लिए आदेश करने की शक्ति-(1) यदि केंद्रीय सरकार का या राज्य सरकार का, या केंद्रीय सरकार के किसी अधिकारी का, जो उस सरकार के संयुक्त सचिव से निम्न पंक्ति का नहीं है और जो उस सरकार द्वारा इस धारा के प्रयोजनों के लिए विशेष रूप से सशक्त किया गया है, या राज्य सरकार के किसी अधिकारी का, जो उस सरकार के सचिव से निम्न पंक्ति का नहीं है और जो उस सरकार द्वारा इस धारा के प्रयोजनों के लिए विशेष रूप से सशक्त किया गया है, किसी व्यक्ति (जिसके अंतर्गत विदेशी भी है) की बाबत यह समाधान हो जाता है कि स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार में लगने से उसे निवारित करने की दृष्टि से ऐसा करना आवश्यक है, तो वह यह निदेश देते हुए आदेश कर सकेगा कि ऐसे व्यक्ति को निरुद्ध किया जाए ।

                (2) जब निरोध का कोई आदेश किसी राज्य सरकार द्वारा या किसी राज्य सरकार द्वारा सशक्त किए गए किसी अधिकारी द्वारा किया जाता है, तब राज्य सरकार, आदेश की बाबत एक रिपोर्ट केंद्रीय सरकार को दस दिन के भीतर भेजेगी ।

                (3) संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड (5) के प्रयोजनों के लिए, निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध किए गए किसी व्यक्ति को, उन आधारों की, जिन पर आदेश किया गया है, संसूचना निरोध के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, किंतु साधारणतः निरोध की तारीख से पांच दिन के अपश्चात् और आपवादिक परिस्थितियों में और उनके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, पंद्रह दिन के अपश्चात् दी जाएगी ।

4. निरोध आदेशों का निष्पादन-कोई निरोध आदेश, दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन गिरफ्तारी के वारंट के निष्पादन के लिए उपबंधित रीति से भारत में किसी भी स्थान पर निष्पादित किया जा सकेगा ।

5. निरोध के स्थान और शर्तों को विनियमित करने की शक्ति-प्रत्येक व्यक्ति जिसकी बाबत निरोध आदेश किया गया है,-

(क) ऐसे स्थान में और ऐसी शर्तों के अधीन, जिसके अंतर्गत भरण-पोषण, अन्य के साथ साक्षात्कार या संपर्क, अनुशासन और अनुशासनभंग के लिए दंड संबंधी शर्तें भी हैं, जो समुचित सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा   विनिर्दिष्ट करे, निरुद्ध किए जाने का दायी होगा ; और

(ख) निरोध के एक स्थान से निरोध के दूसरे स्थान पर, चाहे वह उसी राज्य में हो या किसी अन्य राज्य में,  समुचित सरकार के आदेश द्वारा हटाए जाने का दायी होगा :

                परंतु किसी राज्य सरकार द्वारा खंड (ख) के अधीन किसी व्यक्ति को एक राज्य से दूसरे राज्य को हटाए जाने का आदेश, उस अन्य राज्य की सरकार की सम्मति के बिना, नहीं किया जाएगा ।

6. निरोध के आधार, पृथक्करणीय-जहां किसी व्यक्ति को धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन निरोध के किसी आदेश के, जो दो या अधिक आधारों पर किया गया है, अनुसरण में निरुद्ध किया गया है, वहां निरोध के ऐसे आदेश के बारे में यह समझा जाएगा कि वह ऐसे प्रत्येक आधार पर पृथक्तः किया गया है और तद्नुसार,-

                (क) ऐसा आदेश केवल इसलिए अविधिमान्य या अप्रवर्तनीय नहीं समझा जाएगा कि एक या कुछ आधार-

                                                (i) अस्पष्ट,

                                                (ii) अविद्यमान,

                                                (iii) असंगत,

                                                (iv) ऐसे व्यक्ति से असंसक्त या निकटतः असंसक्त, या

                                                (v) किसी अन्य कारण से, चाहे जो भी हो, अविधिमान्य,

है या हैं और इसलिए यह अभिधारण करना संभव नहीं है कि ऐसा आदेश करने वाली सरकार या अधिकारी का शेष आधार या आधारों के संदर्भ से धारा 3 की उपधारा (1) में यथा उपबंधित समाधान हो गया होता और उसने निरोध का आदेश   किया होता ;

                (ख) निरोध का आदेश करने वाली सरकार या अधिकारी के बारे में यह समझा जाएगा कि उसने उक्त उपधारा (1) के अधीन निरोध का आदेश उस उपधारा में यथाउपबंधित शेष आधार या आधारों के संदर्भ में समाधान हो जाने के पश्चात् किया है ।

7. कुछ आधारों पर निरोध आदेशों का अविधिमान्य या अप्रवर्तनीय होना-कोई भी निरोध आदेश केवल इस कारण अविधिमान्य या अप्रवर्तनीय नहीं होगा कि,-

(क) उसके अधीन निरुद्ध किया जाने वाला व्यक्ति, निरोध का आदेश करने वाली सरकार या अधिकारी की राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता की सीमाओं के बाहर है ; या

(ख) ऐसे व्यक्ति के निरोध का स्थान, उक्त सीमाओं के बाहर है ।

8. फरार व्यक्तियों के संबंध में शक्तियां-(1) यदि समुचित सरकार के पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह व्यक्ति, जिसकी बाबत निरोध आदेश किया गया है, फरार हो गया है या स्वयं को छिपा रहा है जिससे कि वह आदेश निष्पादित नहीं किया जा सकता, तो वह सरकार,-

(क) उस स्थान पर, जहां उक्त व्यक्ति साधारणतया निवास करता है, अधिकारिता रखने वाले किसी महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के मजिस्ट्रेट को उस तथ्य की लिखित रूप में रिपोर्ट कर सकेगी और तदुपरि दंड प्रक्रिया संहिता,   1973 (1974 का 2) की धारा 82, धारा 83, धारा 84 और धारा 85 के उपबंध उक्त व्यक्ति और उसकी संपत्ति की बाबत उसी प्रकार लागू होंगे मानो यह निदेश देने वाला आदेश कि उसे निरुद्ध किया जाए, मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया  वारंट हो ;

(ख) राजपत्र में अधिसूचित आदेश द्वारा उक्त व्यक्ति को ऐसे अधिकारों के समक्ष, ऐसे स्थान पर और ऐसी अवधि के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, हाजिर होने के लिए निदेश दे सकेगी, और यदि उक्त व्यक्ति, ऐसे निदेश के अनुपालन में असफल रहता है तो वह, जब तक कि वह यह साबित नहीं कर देता कि उसके लिए उसका अनुपालन करना संभव नहीं था और उसने उस आदेश में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर उस आदेश में उल्लिखित अधिकारी की उस कारण के   बारे में, जिसके कारण उसका अनुपालन करना असंभव हो गया था और अपने ठिकाने के बारे में सूचित कर दिया था,      ऐसी अवधि के कारावास से, जो एक वर्ष तक का हो सकेगा या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

                (2) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन प्रत्येक अपराध संज्ञेय होगा ।

9. सलाहकार बोर्ड-संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड (4) के उपखंड (क) और खंड (7) के उपखंड (ग) के प्रयोजनों के लिए,-

(क) केंद्रीय सरकार और प्रत्येक राज्य सरकार, जब कभी आवश्यक हो, एक या अधिक सलाहकार बोर्ड गठित करेगी जिनमें से प्रत्येक में एक अध्यक्ष और दो अन्य व्यक्ति होंगे जिनके पास संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड (4) के उपखंड (क) में विनिर्दिष्ट अर्हताएं होंगी ;

(ख) धारा 10 में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय, समुचित सरकार निरोध आदेश के अधीन किसी व्यक्ति के निरोध की तारीख से पांच सप्ताह के भीतर उसकी बाबत एक निर्देश, खंड (क) के अधीन गठित सलाहकार बोर्ड को, संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड (4) के उपखंड (क) के अधीन रिपोर्ट देने में सलाहकार बोर्ड को समर्थ बनाने के लिए, करेगी ;

(ग) वह सलाहकार बोर्ड, जिसे खंड (ख) के अधीन निर्देश किया गया है, निर्देश पर और उसके समक्ष रखी गई सामग्री पर विचार करने के पश्चात् और समुचित सरकार से या समुचित के माध्यम से इस प्रयोजन के लिए बुलाए गए किसी व्यक्ति से या संबंधित व्यक्ति से ऐसी और जानकारी, जैसी वह आवश्यक समझे, मंगवाने के पश्चात्, और यदि किसी विशिष्ट मामले में वह सुनवाई करना आवश्यक समझता है या यदि संबंधित व्यक्ति व्यक्तिगत सुनवाई की वांछा करता है तो उसकी व्यक्तिगत सुनवाई के पश्चात्, अपनी रिपोर्ट तैयार करेगा जिसके पृथक् पैरा में अपनी यह राय विनिर्दिष्ट करेगा कि क्या संबंधित व्यक्ति के निरोध के लिए पर्याप्त कारण है अथवा नहीं और उसे संबंधित व्यक्ति के निरोध की तारीख से ग्यारह सप्ताह के भीतर प्रस्तुत करेगा ;

(घ) जहां सलाहकार बोर्ड के सदस्यों के बीच मतभेद है वहां ऐसे सदस्यों के बहुमत की राय बोर्ड की राय  समझी जाएगी ;

(ङ) वह व्यक्ति जिसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन निरोध का आदेश किया गया है, सलाहकार बोर्ड को किए गए निर्देश से संबंधित किसी मामले में किसी विधि व्यवसायी के माध्यम से हाजिर होने का हकदार नहीं होगा और सलाहकार बोर्ड की कार्यवाहियां और उसकी रिपोर्ट, रिपोर्ट के उस भाग को छोड़कर जिसमें सलाहकार बोर्ड की राय विनिर्दिष्ट की गई है, गोपनीय होगी ;

(च) ऐसे प्रत्येक मामले में जहां सलाहकार बोर्ड ने यह रिपोर्ट दी है कि उसकी राय में उस व्यक्ति के निरोध के लिए पर्याप्त कारण है, वहां समुचित सरकार निरोध आदेश की पुष्टि कर सकेगी और संबंधित व्यक्ति के निरोध को ऐसी अवधि तक के लिए बनाए रख सकेगी जैसी वह ठीक समझे और ऐसे प्रत्येक मामले में जहां सलाहकार बोर्ड ने यह रिपोर्ट दी है कि उसकी राय में संबंधित व्यक्ति के निरोध के लिए पर्याप्त कारण नहीं है वहां समुचित सरकार निरोध आदेश को प्रतिसंहृत करेगी और उस व्यक्ति को तत्काल निर्मुक्त कर देगी ।

10. वे मामले जिनमें और वे परिस्थितियां जिनके अधीन व्यक्तियों को सलाहकार बोर्ड की राय अभिप्राप्त किए बिना तीन मास से अधिक अवधि के लिए निरुद्ध किया जा सकेगा-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति (जिसके अंतर्गत विदेशी भी हैं) जिसके संबंध में इस अधिनियम के अधीन  [31 जुलाई, 1999ट से पूर्व किसी भी समय निरोध का आदेश किया जाता है, संविधान के अनुच्छेद 22 के खंड (4) के उपखंड (क) के उपबंधों के अनुसार सलाहकार बोर्ड की राय अभिप्राप्त किए बिना उसके निरोध की तारीख से तीन मास से अधिक किंतु छह मास से अनधिक की अवधि के लिए तब निरुद्ध किया जा सकेगा  जब निरोध का आदेश ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ के अवैध व्यापार में लगने से उसे निवारित करने की दृष्टि से किया गया है, और केंद्रीय सरकार या केंद्रीय सरकार के किसी अधिकारी का, जो उस सरकार के अपर सचिव की पंक्ति से कम का नहीं है और जिसे उस सरकार द्वारा इस धारा के प्रयोजनों के लिए विशेष रूप से सशक्त किया गया है, यह समाधान हो जाता है कि ऐसा व्यक्ति अवैध व्यापार के लिए सहजभेद्य किसी क्षेत्र में, उस क्षेत्र से बाहर, उस क्षेत्र में से या उसके भीतर स्वापक ओषधियों और मनःप्रभावी पदार्थों के अवैध व्यापार में लगा हुआ है या उसका लगना संभाव्य है और ऐसे व्यक्ति के निरोध के पांच सप्ताह के भीतर उस आशय की घोषणा करता है ।

स्पष्टीकरण 1-इस उपधारा में ऐसे अवैध व्यापार के लिए सहजभेद्य क्षेत्र" से निम्नलिखित क्षेत्र अभिप्रेत है,-

                                (i) भारतीय सीमाशुल्क सागर खंड,

                                (ii) सीमाशुल्क विमानपत्तन,

                                (iii) मुम्बई, कलकत्ता, दिल्ली, मद्रास के महानगर और वाराणसी नगर,

                (iv) भारत के तट से चौड़ाई में एक सौ किलोमीटर वह अंतरदेशीय क्षेत्र जो आंध्र प्रदेश, गोवा, गुजरात, कर्नाटक, केरल, महाराष्ट्र, उड़ीसा, तमिलनाडु और पश्चिमी बंगाल राज्यों के राज्यक्षेत्रों और दमन तथा दीव और पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्रों के अंतर्गत आता है,

                (v) निम्नलिखित सीमाओं से चौड़ाई में एक सौ किलोमीटर अंतरदेशीय क्षेत्र-

                                (क) गुजरात, पंजाब और राजस्थान राज्यों में भारत-पाकिस्तान सीमा ;

                                (ख) बिहार, सिक्किम, उत्तर प्रदेश और पश्चिमी बंगाल राज्यों में भारत-नेपाल सीमा ;

                                (ग) अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मिजोरम और नागालैंड राज्यों में भारत-बर्मा सीमा ;

                                (घ) असम, मेघालय, त्रिपुरा और पश्चिमी बंगाल राज्यों में भारत-बांग्लादेश सीमा ;

                                (ङ) अरुणाचल प्रदेश, असम, सिक्किम और पश्चिमी बंगाल राज्यों में भारत-भूटान सीमा ;

                (vi) ऐसा अन्य क्षेत्र या सीमाशुल्क स्टेशन, जिसे केंद्रीय सरकार ऐसे क्षेत्र या सीमाशुल्क स्टेशन के अवैध व्यापार के लिए सहजभेद्य होने को ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।

स्पष्टीकरण 2-स्पष्टीकरण 1 के प्रयोजनों के लिए सीमाशुल्क स्टेशन" का वही अर्थ है जो सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52) की धारा 2 के खंड (13) में है ।

                (2) ऐसे निरोध आदेश के अधीन निरुद्ध किए गए किसी ऐसे व्यक्ति की दशा में, जिसे उपधारा (1) के उपबंध लागू होते हैं, धारा 9 निम्नलिखित उपांतरणों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी, अर्थात् :-

(i) खंड (ख) में पांच सप्ताह के भीतर" शब्दों के स्थान पर चार मास और दो सप्ताह के भतीर" शब्द  रखे जाएंगे ;

(ii) खंड (ग) में,-

(क) संबंधित व्यक्ति के निरोध" शब्दों के स्थान पर संबंधित व्यक्ति के निरंतर निरोध" शब्द  रखे जाएंगे ;

(ख) ग्यारह सप्ताह" शब्दों के स्थान पर पांच मास और तीन सप्ताह" शब्द रखे जाएंगे ;

(iii) खंड (च) में निरोध" शब्द के स्थान पर, उन दोनों स्थानों पर जहां वे आता है, निरंतर निरोध" शब्दरखे जाएंगे ।

11. निरोध की अधिकतम अवधि-वह अधिकतम अवधि, जिसके लिए कोई व्यक्ति किसी ऐसे निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध किया जा सकेगा, जिसे धारा 10 के उपबंध लागू नहीं होते हैं और जिसकी धारा 9 के खंड (च) के अधीन पुष्टि कर दी गई है, निरोध की तारीख से एक वर्ष होगी, और वह अधिकतम अवधि जिसके लिए किसी व्यक्ति को किसी ऐसे निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध किया जा सकेगा जिसे धारा 10 के उपबंध लागू होते हैं और जिसकी धारा 10 की उपधारा (2) के साथ पठित धारा 9 के खंड (च) के अधीन पुष्टि कर दी गई है, निरोध की तारीख से दो वर्ष होगी :

                परंतु इस धारा में अंतर्विष्ट कोई बात दोनों में से किसी मामले में किसी पूर्वतर समय पर निरोध आदेश को प्रतिसंहृत करने या उपांतरित करने की समुचित सरकार की शक्तियों को प्रभावित नहीं करेगी ।

12. निरोध आदेशों का प्रतिसंहरण-(1) साधारण खंड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 21 के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, कोई निरोध आदेश किसी भी समय निम्नलिखित के होते हुए भी, प्रतिसंहृत या उपांतरित किया जा सकेगा-

(क) कि आदेश राज्य सरकार के किसी अधिकारी द्वारा, उस राज्य सरकार या केंद्रीय सरकार द्वारा किया गया है ;

(ख) कि आदेश केंद्रीय सरकार के किसी अधिकारी द्वारा, किसी राज्य सरकार द्वारा, केंद्रीय सरकार द्वारा किया  गया है ।

(2) निरोध आदेश का प्रतिसंहरण उसी व्यक्ति के विरुद्ध धारा 3 के अधीन एक अन्य निरोध आदेश करने का वर्जन नहीं करेगा ।

13. निरुद्ध व्यक्तियों की अस्थायी निर्मुक्ति-(1) केंद्रीय सरकार किसी भी समय यह निदेश दे सकेगी कि उस सरकार द्वारा या उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा या राज्य सरकार द्वारा या राज्य सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा किए गए निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध कोई व्यक्ति किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए या तो बिना शर्तों के या उस निदेश में विनिर्दिष्ट ऐसी शर्तों पर, जिन्हें वह व्यक्ति स्वीकार करे, निर्मुक्त कर दिया जाए और किसी भी समय उसकी निर्मुक्ति को रद्द कर सकेगी ।

                (2) राज्य सरकार किसी भी समय यह निदेश दे सकेगी कि उस सरकार द्वारा या उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी द्वारा जारी किए गए निरोध आदेश के अनुसरण में निरुद्ध कोई व्यक्ति किसी विनिर्दिष्ट अवधि के लिए या तो बिना शर्तों के या उस निदेश में विनिर्दिष्ट ऐसी शर्तों पर, जिन्हें वह व्यक्ति स्वीकार करे, निर्मुक्त कर दिया जाए और किसी भी समय उसकी निर्मुक्ति को रद्द कर सकेगी ।

                (3) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन किसी व्यक्ति की निर्मुक्ति का निदेश देते समय, निर्मुक्ति का निदेश देने वाली सरकार निदेश में विनिर्दिष्ट शर्तों के सम्यक् अनुपालन के लिए उससे प्रतिभुओं सहित एक बंधपत्र निष्पादित करने की अपेक्षा कर सकेगी ।

                (4) उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निर्मुक्त कोई व्यक्ति, यथास्थिति, उसकी निर्मुक्ति का निदेश देने वाले या उसकी निर्मुक्ति रद्द करने वाले आदेश में विनिर्दिष्ट समय और स्थान पर और प्राधिकारी के समक्ष अपने आप को अभ्यर्पित करेगा ।

                (5) यदि कोई व्यक्ति बिना किसी पर्याप्त कारण के अपने आप को उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट रीति से अभ्यर्पित करने में असफल रहता है तो वह ऐसी अवधि के कारावास से जो दो वर्ष की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।

                (6) यदि कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निर्मुक्त किया गया है, उक्त उपधारा के अधीन उस पर अधिरोपित या उसके द्वारा निष्पादित बंधपत्र की शर्तों में से किसी को पूरा करने में असफल रहता है तो वह बंधपत्र समपहृत घोषित किया जाएगा और उसके द्वारा आबद्ध कोई व्यक्ति उससे संबंधित शास्ति का संदाय करने के लिए दायी होगा ।

                (7) किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी और इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, कोई व्यक्ति, जिसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन किया गया निरोध आदेश प्रवृत्त है, जमानत पर या जमानत-पत्र पर या अन्यथा निर्मुक्त नहीं किया जाएगा ।

14. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही और किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही नहीं होगी ।

 15. 1974 के अधिनियम सं० 52 का संशोधन-विदेशी मुद्रा संरक्षण और तस्करी निवारण अधिनियम, 1974 की धारा 3 की उपधारा (1) में निम्नलिखित परंतुक जोड़ा जाएगा, अर्थात् :-

परंतु इस उपधारा में विनिर्दिष्ट किसी भी ऐसे आधार पर निरोध का कोई आदेश नहीं किया जाएगा जिस पर स्वापक ओषधी और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अधिनियम, 1988 की धारा 3 के अधीन या जम्मू-कश्मीर स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अध्यादेश, 1988 (1988 का जम्मू-कश्मीर अध्यादेश 1) की धारा 3 के अधीन निरोध का आदेश किया जा सकता है ।" ।

16. निरसन और व्यावृत्ति-(1) स्वापक ओषधि और मनःप्रभावी पदार्थ अवैध व्यापार निवारण अध्यादेश, 1988 (1988 का अध्यादेश सं० 7) निरसित किया जाता है ।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।

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