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चाय कंपनी (रुग्ण चाय यूनिटों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1985 ( Tea Companies (Acquisition and Transfer of Sick Tea Units) Act, 1985 )


 

चाय कंपनी (रुग्ण चाय यूनिटों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1985

(1985 का अधिनियम संख्यांक 37)

[28 मई, 1985]

रुग्ण चाय यूनिटों का उचित पुनर्गठन और प्रबंध सुनिश्चित करने की दृष्टि से, जिससे

कि विभिन्न प्रकार की चाय के, जो देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के

लिए महत्वपूर्ण है, उत्पादन और विनिर्माण में वृद्धि करके जनसाधारण

का हित साधन हो सके, पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट ऐसी चाय

यूनिटों के और उक्त चाय यूनिटों की बाबत चाय कंपनियों

के अधिकार, हक और हित के अर्जन और अंतरण का

तथा उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक

विषयों का उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

पहली अनुसूची में विनिर्दिष्ट रुग्ण चाय यूनिटें विभिन्न प्रकार की चाय के उत्पादन और विनिर्माण में लगी हुई थीं ;

और उक्त चाय यूनिटों का प्रबंध चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण कर लिया गया था ;

और केन्द्रीय सरकार ने उक्त चाय यूनिटों को सक्षम बनाने की दृष्टि से बड़ी मात्रा में धनराशियों का विनिधान किया था ;

और उक्त चाय यूनिटों का पुनर्गठन और पुनरुद्धार करने के लिए बड़ी मात्रा में धनराशियों के और विनिधान की आवश्यकता है ;

और उक्त चाय यूनिटों का केन्द्रीय सरकार द्वारा अर्जन इसलिए आवश्यक है कि ऐसी बड़ी मात्रा में धनराशियों का विनिधान करने के लिए और पहले किए गए बड़ी मात्रा में विनिधान का और उनमें नियोजित कर्मकारों के हितों का भी, उक्त चाय यूनिटों के उचित पुनर्गठन और प्रबंध द्वारा संरक्षण करने के लिए और उसके द्वारा विभिन्न प्रकार की चाय के, जो देश की अर्थव्यवस्था की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण है, उत्पादन और विनिर्माण में वृद्धि करने के लिए उसे समर्थ बनाया जा सके ;

भारत गणराज्य के छत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम चाय कंपनी (रुग्ण चाय यूनिटों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1985 है

(2) यह 8 अप्रैल, 1985 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो,-

() नियत दिन" से इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख अभिप्रेत है ;

() आयुक्त" से धारा 13 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है ;

() अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

() विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

() रुग्ण चाय यूनिट" से पहली अनुसूची के स्तंभ (2) में विनिर्दिष्ट कोई ऐसी चाय यूनिट अभिप्रेत है जिसका प्रबन्ध नियत दिन के पूर्व चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण किया गया था ;

() इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के संबंध में, विनिर्दिष्ट तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, उस उपबंध के प्रयोजनों के लिए अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबन्धों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी ;

() चाय कंपनी" से पहली अनुसूची के स्तंभ (3) में विनिर्दिष्ट कंपनी [जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित कंपनी है] अभिप्रेत है ;

() चाय व्यापार निगम" से भारतीय चाय व्यापार निगम लिमिटेड, जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन निगमित और रजिस्ट्रीकृत कंपनी है अभिप्रेत है ;

() उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं ;

() उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और इस अधिनियम में या चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) में परिभाषित नहीं हैं किन्तु कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो कंपनी अधिनियम, 1956 में हैं

अध्याय 2

चाय कंपनियों की रुग्ण चाय यूनिटों का अर्जन और अंतरण

3. रुग्ण चाय यूनिटों के संबंध में चाय कंपनियों के अधिकारों का अर्जन-(1) नियत दिन को, प्रत्येक चाय कंपनी की प्रत्येक रुग्ण चाय यूनिट और, यथास्थिति, उस चाय कंपनी की रुग्ण चाय यूनिटों या रुग्ण यूनिट के संबंध में उसके अधिकार, हक और हित इस अधिनियम के आधार पर केन्द्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगे

                (2) ऐसी प्रत्येक रुग्ण चाय यूनिट, जो उपधारा (1) के आधार पर केन्द्रीय सरकार में निहित हो जाती है, उसके इस प्रकार निहित हो जाने के ठीक पश्चात्, चाय व्यापार निगम को अंतरित और उसमें निहित हो जाएगी

4. निहित होने का साधारण प्रभाव-(1) प्रत्येक रुग्ण चाय यूनिट के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अंतर्गत सभी आस्तियां, अधिकार, पट्टाधृतियां, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा सभी स्थावर और जंगम सम्पत्ति, जिसके अन्तर्गत भूमि, भवन, कर्मशालाएं, स्टोर, उपकरण, मशीनरी और उपस्कर, रोकड़ बाकी, हाथ की नकदी, आरक्षित निधि, विनिधान, बही-ऋण और ऐसी सम्पत्ति में या उससे उद्भूत होने वाले सभी अन्य अधिकार और हित हैं, जो नियत दिन के ठीक पूर्व संबंधित चाय कंपनी के स्वामित्व, कब्जे, शक्ति या नियंत्रण में, चाहे भारत में या भारत के बाहर थे और तत्संबंधी सभी लेखा-बहियां, रजिस्टर और सभी अन्य दस्तावेजें हैं, चाहे वे किसी भी प्रकार की हों और उसके बारे में यह भी समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत धारा 24 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट दायित्व हैं

                (2) पूर्वोक्त सभी संपत्तियां, जो धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गई हैं, ऐसे निहित होने के आधार पर न्यास, बाध्यता, बन्धक, भार, धारणाधिकार और उनको प्रभावित करने वाले अन्य सभी विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएंगी और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारण की कुर्की, व्यादेश, डिक्री या आदेश के बारे में ऐसी सम्पत्ति के उपयोग को किसी भी रीति से निर्बन्धित करता है या ऐसी सम्पूर्ण संपत्ति या उसके किसी भाग के संबंध में कोई रिसीवर नियुक्त करता है यह समझा जाएगा कि वह वापस ले लिया गया है

                (3) किसी ऐसी सम्पत्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गई है, प्रत्येक बन्धकदार और किसी ऐसी सम्पत्ति में या उसके संबंध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति, ऐसे समय के भीतर और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, ऐसे बन्धक, भार, धारणाधिकार और अन्य हित की सूचना आयुक्त को देगा

                (4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी सम्पत्ति का बन्धकदार या ऐसी किसी संपत्ति में या उसके सम्बन्ध में कोई भार, धारणाधिकार या अन्य हित धारण करने वाला कोई अन्य व्यक्ति धारा 6 और धारा 7 के अधीन संबंधित चाय कंपनी को दिए जाने के लिए निर्दिष्ट रकमों में से बन्धक धन या अन्य शोध्य धन के, पूर्णत. या भागतः, संदाय के लिए अपने अधिकारों और हितों के अनुसार दावा करने का हकदार होगा ; किन्तु ऐसा कोई बन्धक, भार, धारणाधिकार या अन्य हित किसी ऐसी संपत्ति के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा जो चाय व्यापार निगम में निहित हो गई है

                (5) ऐसी किसी चाय कंपनी की रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में, जो नियत दिन के पूर्व किसी भी समय धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गई है, चाय कंपनी को प्रदत्त और नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त कोई अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत ऐसी रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में और उसके प्रयोजनों के लिए ऐसे दिन को और उसके पश्चात् अपने प्रकट शब्दानुसार प्रवृत्त बनी रहेगी और वह निगम, ऐसी अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत में इस प्रकार प्रतिस्थापित हो गया समझा जाएगा मानो ऐसी अनुज्ञप्ति या अन्य लिखत ऐसे निगम को प्रदत्त की गई हो और ऐसा निगम उसे उस शेष अवधि के लिए धारण करेगा जिसके लिए चाय कंपनी उसके निबन्धनों के अनुसार उसे धारण करती

                (6) यदि, नियत दिन को, किसी चाय कंपनी की ऐसी रुग्ण यूनिट के संबंध में, जो धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गई है, धारा 24 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट किसी विषय के संबंध में उस कंपनी द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित कोई वाद या की गई कोई अपील या अन्य कार्यवाही, चाहे वह किसी भी प्रकार की हो, लम्बित है तो ऐसी चाय कंपनी की रुग्ण चाय यूनिट के अन्तरण या इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के कारण उसका उपशमन नहीं होगा, तब बन्द नहीं होगी या उस पर किसी भी रूप में प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ; किन्तु उस वाद, अपील या अन्य कार्यवाही को चाय व्यापार निगम द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखा जा सकेगा, चलाया जा सकेगा और प्रवर्तित किया जा सकेगा

5. कुछ पूर्व दायित्वों के लिए चाय कंपनियों का दायी होना-इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, नियत दिन के पूर्व किसी अवधि के संबंध में धारा 24 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट दायित्व से भिन्न चाय कंपनी का प्रत्येक दायित्व उस कंपनी का दायित्व होगा और उसके विरुद्ध, प्रवर्तनीय होगा और चाय व्यापार निगम के विरुद्ध प्रवर्तनीय नहीं होगा

अध्याय 3

रकमों का संदाय

6. रकम का संदाय-केन्द्रीय सरकार प्रत्येक चाय कंपनी को उस कंपनी की, यथास्थिति, रुग्ण चाय यूनिट या प्रत्येक रुग्ण चाय यूनिट और ऐसी रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में उस कंपनी के अधिकार, हक और हित, धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन उस सरकार को अन्तरित और उसमें निहित होने के लिए, नकद और अध्याय 6 में विनिर्दिष्ट रीति से उतनी रकम देगी जो पहली अनुसूची के स्तंभ (4) में उस रुग्ण चाय यूनिट के नाम के सामने विनिर्दिष्ट है

7. अतिरिक्त रकम का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, प्रत्येक चाय कम्पनी को उसकी रुग्ण चाय यूनिट के प्रबन्ध से उसको वंचित किए जाने के लिए उस तारीख को, जिसको ऐसी रुग्ण चाय यूनिट का प्रबन्ध चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) के उपबन्धों के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा किए गए आदेश के अनुसरण में, ग्रहण किया गया था, प्रारम्भ होने वाली और नियत दिन को समाप्त होने वाली अवधि के लिए, प्रतिवर्ष ऐसी रकम देगी जो पहली अनुसूची के स्तम्भ (5) में उस रुग्ण चाय यूनिट के नाम के सामने विनिर्दिष्ट है

                (2) पहली अनुसूची के स्तम्भ (4) और स्तम्भ (5) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक रकम पर चार प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से साधारण ब्याज, नियत दिन से प्रारम्भ होने वाली और उस तारीख को जिसको ऐसी रकम का संदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि के लिए दिया जाएगा

                (3) केन्द्रीय सरकार किसी चाय कम्पनी के संबंध में, उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार अवधारित रकम चाय कम्पनी को उस रकम के अतिरिक्त देगी, जो पहली अनुसूची के स्तम्भ (4) और स्तम्भ (5) में उस कम्पनी के सामने विनिर्दिष्ट है

अध्याय 4

चाय कंपनियों की रुग्ण चाय यूनिटों का प्रबन्ध, आदि

8. चाय कंपनियों की रुग्ण चाय यूनिटों का प्रबंध, आदि-चाय व्यापार निगम या कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे वह निगम, लिखित आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, उस रुग्ण चाय यूनिट के, जिसके सम्बन्ध में चाय कम्पनी के अधिकार, हक और हित धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन उस निगम में निहित हो गए हैं, कार्यकलापों और कारबार के साधारण अधीक्षण, निदेशन, नियन्त्रण और प्रबंध की शक्तियों का प्रयोग करने का और ऐसे सभी कार्य करने का हकदार होगा जिन शक्तियों का प्रयोग और जिन कार्यों को करने के लिए रुग्ण चाय यूनिट की चाय कम्पनी प्राधिकृत है

9. रुग्ण चाय यूनिटों के प्रबंध के भारसाधक व्यक्तियों का सभी आस्तियों, आदि को परिदत्त करने का कर्तव्य-(1) चाय कंपनियों की रुग्ण चाय यूनिटों का प्रबंध, चाय व्यापार निगम में निहित हो जाने पर, ऐसे निहित होने के ठीक पूर्व ऐसी रुग्ण चाय यूनिटों के प्रबंध के भारसाधक व्यक्ति, चाय व्यापार निगम को ऐसी रुग्ण चाय यूनिटों से सम्बन्धित ऐसी सभी आस्तियां, लेखा-बहियां, रजिस्टर और सभी अन्य दस्तावेजें, जो उनकी अभिरक्षा में हों, परिदत्त करने के लिए आबद्ध होंगे

                (2) केन्द्रीय सरकार चाय व्यापार निगम को ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह मामले की परिस्थितियों में वांछनीय समझे और उक्त निगम भी, यदि ऐसा करना आवश्यक समझा जाए तो, केन्द्रीय सरकार को किसी भी समय उस रीति के बारे में, जिससे चाय कम्पनियों की रुग्ण चाय यूनिटों के प्रबन्ध का संचालन किया जाएगा या किसी अन्य विषय के बारे में जो ऐसे प्रबंध के दौरान उत्पन्न हो अनुदेश देने के लिए आवेदन कर सकेगा

10. व्यक्तियों का उन आस्तियों आदि का लेखा-जोखा देने का कर्तव्य जो उनके कब्जे में हैं-(1) ऐसा कोई व्यक्ति जिसके कब्जे या नियन्त्रण में, नियत दिन को, किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी ऐसी रुग्ण चाय यूनिट से संबंधित जो इस अधिनियम के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गई है, कोई आस्तियां, बहियां, दस्तावेजें या अन्य कागज-पत्र हैं, उक्त आस्तियों, बहियों, दस्तावेजों और कागज-पत्रों का लेखा-जोखा चाय व्यापार निगम को देने के लिए दायी होगा और वह उनका परिदान उस निगम को या ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को करेगा जिन्हें वह निगम इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे

                (2) चाय व्यापार निगम चाय कंपनियों की उन रुग्ण चाय यूनिटों का, जो इस अधिनियम के अधीन उस निगम में निहित हो गई है, कब्जा लेने के लिए सभी आवश्यक कदम उठा सकेगा या उठवा सकेगा

                (3) प्रत्येक चाय कंपनी, चाय व्यापार निगम को ऐसी सभी सम्पत्ति और आस्तियों की, जो नियत दिन को उसकी ऐसी रुग्ण चाय यूनिट की है जो धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन उस निगम में निहित हो गई है, पूर्ण सूची ऐसी अवधि के भीतर देगी जो वह निगम इस निमित्त अनुज्ञात करे और इस प्रयोजन के लिए वह निगम ऐसी कम्पनी को सभी युक्तियुक्त सुविधाएं देगा

अध्याय 5

चाय कंपनियों के कर्मचारियों के बारे में उपबंध

11. कर्मचारियों का बने रहना-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व चाय कंपनियों की किसी रुग्ण चाय यूनिट में नियोजित रहा है, नियत दिन से ही चाय व्यापार निगम का कर्मचारी हो जाएगा और उस निगम के अधीन पेंशन, उपदान और अन्य बातों के बारे में वैसे ही अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ पद या सेवा धारण करेगा, जो उसे उस दशा में अनुज्ञेय होते जब ऐसा निधान हुआ होता और तब तक ऐसा करता रहेगा जब तक उस निगम के अधीन उसका नियोजन सम्यक् रूप से समाप्त नहीं कर दिया जाता है या जब तक उसके पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तों में उस निगम द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तन नहीं कर दिया     जाता है

                (2) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी चाय कंपनी की किसी रुग्ण चाय यूनिट में नियोजित किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति की सेवाओं का चाय व्यापार निगम को अन्तरण, ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा और ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा

12. भविष्य निधि और अन्य निधियां-(1) जहां किसी चाय कम्पनी ने अपने स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट में नियोजित व्यक्तियों के फायदे के लिए कोई भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि या अन्य निधि स्थापित की है वहां ऐसे कर्मचारियों से, जिनकी सेवाएं इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन चाय व्यापार निगम को, अन्तरित हो गई हैं, सम्बन्धित धनराशियां, ऐसी भविष्य निधि, अधिवार्षिकी निधि, कल्याण निधि या अन्य निधि में नियत दिन को जमा धनराशियों में से, चाय व्यापार निगम को अन्तरित और उसमें निहित हो जाएंगी

                (2) ऐसी धनराशियों के सम्बन्ध में, जो उपधारा (1) के अधीन चाय व्यापार निगम को अन्तरित हो जाती हैं, उस निगम द्वारा ऐसी रीति से कार्रवाई की जाएगी, जो विहित की जाए

अध्याय 6

संदाय आयुक्त

13. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 6 और धारा 7 के अधीन चाय कंपनियों को संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए अधिसूचना द्वारा, संदाय आयुक्त की नियुक्ति करेगी

                (2) केन्द्रीय सरकार, आयुक्त की सहायता के लिए ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी, जिन्हें वह ठीक समझे और तब आयुक्त ऐसे व्यक्तियों में से एक या अधिक को इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए भी प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जा सकेगा

                (3) ऐसा कोई व्यक्ति, जिसे आयुक्त ने अपने द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया है, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उसका वही प्रभाव होगा मानो वे उस व्यक्ति को इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदान की गई हैं और प्राधिकार के रूप में प्रदान नहीं की गई हैं

                (4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे

14. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर, प्रत्येक चाय कंपनी को संदाय करने के लिए आयुक्त को नकद-

() उतनी रकम देगी, जो पहली अनुसूची के स्तम्भ (4) में उस कंपनी के नाम के सामने विनिर्दिष्ट रकमों या रकम के बराबर हैं; और

() उतनी अतिरिक्त रकम देगी, जो पहली अनुसूची के स्तम्भ (5) में उस कम्पनी के नाम के सामने विनिर्दिष्ट रकमों या रकम के बराबर है

                (2) केन्द्रीय सरकार, भारत के लोक लेखा में आयुक्त के नाम से एक निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे दी गई प्रत्येक रकम उक्त निक्षेप खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा

                (3) आयुक्त ऐसी प्रत्येक चाय कंपनी की बाबत, जिसके संबंध में इस अधिनियम के अधीन उसे कोई संदाय किया गया है, पृथक् अभिलेख रखेगा

                (4) प्रत्येक चाय कंपनी के संबंध में उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकम पर प्रोद्भूत ब्याज ऐसी चाय कम्पनी के फायदे के लिए काम आएगा

15. चाय व्यापार निगम की कुछ शक्तियां-(1) चाय व्यापार निगम ऐसा कोई धन जो किसी चाय कंपनी को उसकी उस रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में, जो धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन निगम में निहित हो गई है, शोध्य है और जो नियत दिन के पश्चात् वसूल किया गया है, अन्य सभी व्यक्तियों को अपवर्जन करके विनिर्दिष्ट तारीख तक प्राप्त करने का हकदार इस बात के होते हुए भी होगा कि ऐसी वसूली नियत दिन के पूर्व किसी अवधि से संबंध रखती है

                (2) चाय व्यापार निगम, आयुक्त के समक्ष ऐसे प्रत्येक संदाय के संबंध में दावा कर सकेगा जो किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत निगम के किसी दायित्व का, जो धारा 24 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट दायित्व नहीं है, उन्मोचन करने के लिए उस निगम द्वारा नियत दिन के पश्चात् किया गया है और ऐसे प्रत्येक दावे को उन पूर्विकताओं के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी जो उस विषय को इस अधिनियम के अधीन प्राप्त है, जिसके संबंध में ऐसे दायित्व का उन्मोचन चाय व्यापार निगम द्वारा किया गया है

                (3) इस अधिनियम में जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, नियत दिन के पूर्व के किसी संव्यवहार की बाबत किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में उसके ऐसे दायित्व, जिनका विनिर्दिष्ट तारीख को या उसके पूर्व उन्मोचन नहीं किया गया है, उस कम्पनी के दायित्व होंगे

16. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना- [(1)] प्रत्येक व्यक्ति, जिसका किसी चाय कम्पनी के विरुद्ध उस कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में, दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट विषयों में से किसी विषय की बाबत कोई दावा है, ऐसा दावा विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के भीतर आयुक्त के समक्ष करेगा :

                परन्तु यदि आयुक्त का यह समाधान हो जाता है कि दावेदार पर्याप्त कारण से तीस दिन की उक्त अवधि के भीतर दावा करने से निवारित रहा था, तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के भीतर दावा ग्रहण कर सकेगा, किन्तु उसके पश्चात् नहीं

                 [(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, उस उपधारा में विनिर्दिष्ट अवधि या अतिरिक्त अवधि के पश्चात् किंतु 27 जुलाई, 1989 को या उसके पूर्व आयुक्त के समक्ष किए गए सभी दावों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे विधिमान्यतः किए गए हैं ]

17. दावों की पूर्विकता-धारा 16 के अधीन किए गए दावों को निम्नलिखित सिद्धांतों के अनुसार पूर्विकता प्राप्त होगी, अर्थात्: -

() प्रवर्ग 1 को अन्य सभी प्रवर्गों पर, अग्रता दी जाएगी और प्रवर्ग 2 को प्रवर्ग 3 पर अग्रता दी जाएगी और इसी प्रकार आगे भी;

() प्रत्येक प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दावे एक समान होंगे और उनका पूर्णतः संदाय किया जाएगा; किन्तु यदि इस अधिनियम के अधीन आयुक्त को संदत्त रकम ऐसे दावों को पूर्णतः चुकाने के लिए अपर्याप्त है तो वे समान अनुपात में कम कर दिए जाएंगे और तदनुसार उनका संदाय किया जाएगा; और

() किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट विषय की बाबत किसी दायित्व के उन्मोचन का प्रशन केवल तभी उठेगा जब उसके ठीक उच्चतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट सभी दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अधिशेष रह जाए

18. दावों की परीक्षा-(1) धारा 16 के अधीन दावे प्राप्त होने पर, आयुक्त दावों की दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट पूर्विकता के अनुसार क्रमबद्ध करेगा और उस क्रम के अनुसार उनकी परीक्षा करेगा

                (2) यदि किसी चाय कंपनी के दावों की परीक्षा करने पर आयुक्त की यह राय है कि ऐसी कंपनी को संदाय करने के लिए इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त रकम किसी निम्नतर प्रवर्ग में विनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के लिए पर्याप्त नहीं है तो उससे यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह ऐसे निम्नतर प्रवर्ग की बाबत किसी दावे की परीक्षा करे

19. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) दूसरी अनुसूची में उपवर्णित पूर्विकताओं के प्रति निर्देश से किसी चाय कम्पनी के विरुद्ध दावों की परीक्षा करने के पश्चात्, आयुक्त ऐसी कोई तारीख नियत करेगा जिसको या जिससे पूर्व प्रत्येक दावेदार चाय कम्पनी के विरुद्ध अपने दावे का सबूत फाइल करेगा

                (2) इस प्रकार नियत तारीख के बारे में कम से कम चौदह दिन की सूचना, देश के अधिकांश भाग में परिचालित अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचार-पत्र के एक अंक में और ऐसी प्रादेशिक भाषा के जो आयुक्त उपयुक्त समझे, दैनिक समाचार-पत्र के एक अंक में, विज्ञापन द्वारा दी जाएगी और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने दावे का सबूत आयुक्त के समक्ष ऐसे विज्ञापन में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर फाइल करे

                (3) ऐसे प्रत्येक दावेदार को, जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहेगा, आयुक्त द्वारा किए गए संवितरणों से अपवर्जित कर दिया जाएगा

                (4) आयुक्त, ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात्, जो उसकी राय में आवश्यक है और संबंधित चाय कम्पनी को दावे का खंडन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदार को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, लिखित आदेश द्वारा, दावे को पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार करेगा

                (5) आयुक्त को अपने कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में, जिनके अन्तर्गत वह या वे स्थान हैं जहां वह अपनी बैठकें कर सकेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए उसे निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -

                                () किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

() किसी दस्तावेज का या साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य अन्य तात्त्विक सामग्री का प्रकटीकरण और पेश किया जाना;

                                () शपथ-पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

                                () साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना

                (6) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और आयुक्त को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा

                (7) कोई ऐसा दावेदार, जो आयुक्त के विनिश्चय से असन्तुष्ट है, ऐसे विनिश्चय के विरुद्ध अपील उस उच्च न्यायालय को कर सकेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर संबंधित चाय कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है और प्रत्येक ऐसी अपील उस उच्च न्यायालय के कम से कम दो न्यायाधीशों द्वारा सुनी और निपटाई जाएगी

20. आयुक्त द्वारा धन का संवितरण-इस अधिनियम के अधीन किसी चाय कंपनी के विरुद्ध दावा स्वीकार करने के पश्चात् ऐसे दावे की बाबत शोध्य रकम आयुक्त ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को संदत्त करेगा जिसको या जिनको ऐसी रकम शोध्य है और ऐसा संदाय कर दिए जाने पर ऐसे दावे की बाबत चाय कंपनी के दायित्व का उन्मोचन हो जाएगा

21. चाय कंपनियों को रकमों का संवितरण-(1) यदि किसी चाय कंपनी के संबंध में आयुक्त को संदत्त धनराशि में से दूसरी अनुसूची में विनिर्दिष्ट दायित्वों को चुकाने के पश्चात् कोई अतिशेष रह जाता है तो आयुक्त उस अतिशेष का संवितरण ऐसी चाय कंपनी को करेगा

                (2) जहां किसी चाय कंपनी के कब्जे में की किसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति का कब्जा इस अधिनियम के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गया है, किन्तु ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति ऐसी चाय कंपनी की नहीं है, वहां उस निगम के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसी मशीनरी, उपस्कर या अन्य सम्पत्ति को ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर कब्जे में रखे रहे जिनके अधीन वे नियत दिन के पूर्व ऐसी चाय कंपनी के कब्जे में थी

22. असंवितरित या अदावाकृत रकमों का साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना-यदि आयुक्त को संदत्त कोई धन, उस तारीख से, जिसको आयुक्त के पद का अन्तिम रूप से परिसमापन किया जाता है, ठीक पूर्ववर्ती तारीख को असंवितरित या अदावाकृत रह जाता है तो आयुक्त उसे अपने पद के अन्तिम रूप से परिसमापन के पूर्व, केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अन्तरित करेगा, किन्तु इस प्रकार अन्तरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकेगा और इस संबंध में कार्रवाई इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अन्तरण नहीं किया गया हो और दावे के संदाय के लिए आदेश, यदि कोई हो, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश माना जाएगा

अध्याय 7

प्रकीर्ण

23. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में या किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण की किसी डिक्री या आदेश में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे

24. दायित्व का ग्रहण किया जाना-(1) जहां दूसरी अनुसूची के प्रवर्ग 1 में विनिर्दिष्ट किसी मद से उत्पन्न किसी चाय कंपनी के किसी दायित्व का आयुक्त द्वारा पूर्ण रूप से उन्मोचन इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त रकम में से नहीं किया गया है वहां आयुक्त, दायित्व की उस मात्रा के बारे में जो अनुन्मोचित रह गई है केन्द्रीय सरकार को लिखित रूप में सूचित करेगा और उस दायित्व को केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण किया जाएगा

                (2) केन्द्रीय सरकार, चाय व्यापार निगम को, आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि वह उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा ग्रहण किए गए दायित्व को ग्रहण करे और ऐसे निदेश की प्राप्ति पर चाय व्यापार निगम का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे दायित्व का उन्मोचन करे

25. प्रबन्ध का कुछ व्यक्तियों में तब तक निहित बने रहना जब तक आनुकल्पिक इंतजाम नहीं कर दिया जाता है-इस अधिनियम के अधीन किसी चाय कंपनी की रुग्ण चाय यूनिट के चाय व्यापार निगम में निहित होते हुए भी, -

() कोई व्यक्ति जो ऐसी किसी रुग्ण चाय यूनिट के कार्यकलाप का प्रबन्ध, उस तारीख से पूर्व जिसको रुग्ण चाय यूनिट इस प्रकार निहित हुई थी, कर रहा था जब तक चाय व्यापार निगम द्वारा ऐसी यूनिट के प्रबन्ध के लिए आनुकल्पिक इंतजाम नहीं कर दिया जाता है तब तक उस यूनिट के कार्यकलाप का प्रबन्ध इस प्रकार करता रहेगा मानो ऐसा व्यक्ति, चाय व्यापार निगम द्वारा ऐसी यूनिट के प्रबन्ध के लिए प्राधिकृत किया गया हो;

() ऐसा व्यक्ति, जब तक चाय व्यापार निगम द्वारा कोई आनुकल्पिक व्यवस्था नहीं कर दी जाती तब तक वह ऐसी चाय कंपनी की रुग्ण चाय यूनिट के सम्बन्ध में ऐसी यूनिट के किसी बैंक के खाते को चलाने के लिए इस प्रकार प्राधिकृत बना रहेगा मानो वह, चाय व्यापार निगम द्वारा ऐसे खाते को चलाने के लिए प्राधिकृत हो

26. संविदाओं का तब तक प्रभावी रहना जब तक उनका चाय व्यापार निगम द्वारा अनुसमर्थन नहीं कर दिया जाता है-किसी सेवा, विक्रय या प्रदाय के लिए किसी चाय कम्पनी द्वारा अपने स्वामित्व में की किसी ऐसी रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में, जो धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गई है, की गई प्रत्येक ऐसी संविदा, जो नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त है, नियत दिन से एक सौ अस्सी दिन की अवधि की समाप्ति से ही प्रभावी नहीं रहेगी जब तक ऐसी संविदा का उस अवधि की समाप्ति के पूर्व, चाय व्यापार निगम द्वारा लिखित रूप में अनुसमर्थन नहीं कर दिया जाता है और चाय व्यापार निगम ऐसी संविदा का अनुसमर्थन करने के लिए उसमें ऐसे परिवर्तन या उपांतरण कर सकेगा जो वह ठीक समझे :

                परन्तु चाय व्यापार निगम, संविदा का अनुसमर्थन करने में लोप और संविदा में कोई परिवर्तन या उपांतरण तभी करेगा जब-

() उसका यह समाधान हो जाता है कि ऐसी संविदा असम्यक् रूप से दुर्भर है या असद्भावपूर्वक की गई है अथवा चाय व्यापार निगम के लिए अहितकर है; और

() उसने संविदा के पक्षकारों को सुनवाई का उचित अवसर दे दिया है और संविदा का अनुसमर्थन करने से इन्कार करने या उसमें कोई परिवर्तन या उपांतरण करने के अपने कारणों को लेखबद्ध कर दिया है

27. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति, -

() किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट की भागरूप किसी संपत्ति को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, चाय व्यापार निगम से सदोष विधारित करेगा; या

() किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट की भागरूप संपत्ति का कब्जा सदोष अभिप्राप्त करेगा या उसे सदोष प्रतिधारित करेगा; या

() किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट से संबंधित किसी दस्वावेज या तालिका को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में है, चाय व्यापार निगम या उस निगम द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्तियों के निकाय को देने से जानबूझकर विधारित करेगा या उसे देने में असफल रहेगा; या

() किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट से संबंधित किन्हीं आस्तियों, लेखा-बहियों, रजिस्टरों या अन्य दस्तावेजों को, जो उसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में हैं, चाय व्यापार निगम या उस निगम द्वारा विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति या व्यक्ितयों के निकाय को देने में असफल रहेगा; या

() किसी चाय कंपनी के स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट की भागरूप किसी संपत्ति को सदोष हटाएगा या नष्ट करेगा अथवा इस अधिनियम के अधीन कोई ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या या बिल्कुल गलत है,

वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा

28. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:

                परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था अथवा उसने ऐसे अपराध के निवारण के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी, उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

                                () कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम है; और

                                () फर्म के संबंध में, निदेशक" से उस फर्म का कोई भागीदार अभिप्रेत है

29. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार के या उस सरकार के किसी अधिकारी के या चाय व्यापार निगम के अथवा उस सरकार या निगम द्वारा प्राधिकृत किसी अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी

                (2) इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या हो सकने वाले किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, केन्द्रीय सरकार के या उस सरकार के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी के अथवा चाय निगम के या उस निगम द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी या अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी

30. चाय कम्पनियों का न्यायालय द्वारा परिसमापन किया जाना- ऐसी किसी चाय कम्पनी के, जिसके स्वामित्व में की किसी रुग्ण चाय यूनिट के संबंध में अधिकार, हक और हित इस अधिनियम के अधीन चाय व्यापार निगम में निहित हो गए हैं, परिसमापन के लिए या रुग्ण चाय यूनिट के कारबार की बाबत रिसीवर की नियुक्ति के लिए कोई कार्यवाही, किसी न्यायालय में केन्द्रीय सरकार की सहमति से ही होगी या की जाएगी, अन्यथा नहीं

31. शक्तियों का प्रत्यायोजन-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि इस धारा और धारा 32 तथा धारा 33 द्वारा प्रदत्त शक्तियों से भिन्न, इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा भी किया जा सकेगा जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं

                (2) जब कभी उपधारा (1) के अधीन शक्ति का कोई प्रत्यायोजन किया जाता है तब वह व्यक्ति, जिसको ऐसी शक्ति का प्रत्यायोजन किया गया है, केन्द्रीय सरकार के निदेशन, नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन कार्य करेगा

32. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी

                (2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात्: -

                                () वह समय जिसके भीतर और वह रीति जिससे धारा 4 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट कोई सूचना दी जाएगी;

() वह रीति जिससे धारा 12 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी भविष्य निधि या अन्य निधि में की धनराशियों का उपयोग किया जाएगा;

() कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए

                (3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

33. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, जो इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत हो, उस कठिनाई को दूर कर सकेगी:

                परन्तु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा

34. निरसन और व्यावृत्ति-(1) चाय कंपनी (रुग्ण चाय यूनिटों का अर्जन और अंतरण) अध्यादेश, 1985 (1985 का 3) इसके द्वारा निरसित किया जाता है

                (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी यह है कि उक्त अध्यादेश की अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी

 

 

पहली अनुसूची

[धारा 2 () और (), धारा 6, धारा 7 और धारा 14(1) देखिए]

क्रम सं०

रुग्ण चाय यूनिट का नाम

चाय कंपनी का नाम

रकम (लाख रुपयों में)

अतिरिक्त रकम (रुपए)

(1)

(2)

(3)

(4)

(5)

1.

पाशोक टी एस्टेट

मैसर्स पाशोक टी कम्पनी लिमिटेड, 10, पोलक स्ट्रीट, कलकत्ता

26.03

7,640

2.

लुकसान टी एस्टेट

मैसर्स पाशोक टी कंपनी लिमिटेड, 10, पोलक स्ट्रीट, कलकत्ता

100.15

9,340

3.

वाह-तुकवेर टी एस्टेट

मैसर्स शशि तारा टी कंपनी प्राइवेट लिमिटेड, दार्जिलिंग

25.82

4,940

4.

पोटोंग टी एस्टेट

मैसर्स मून मून टी कंपनी (प्राइवेट) लिमिटेड, 5, क्लाइव रो, कलकत्ता

16.35

3,460

दूसरी अनुसूची

[धारा 16, धारा 18(1), धारा 19(1), धारा 21(1) और धारा 24 (1) देखिए]

पूर्विकताओं का क्रम

प्रवर्ग 1

                केन्द्रीय सरकार द्वारा रुग्ण चाय यूनिटों के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व या उसके पश्चात् की किसी अवधि के लिए, असंदत्त वेतन, मजदूरी, भविष्य निधि, कर्मचारी राज्य बीमा संबंधी अभिदाय या भारतीय जीवन बीमा निगम से संबंधित प्रीमियम मद्धे कर्मचारियों को शोध्य धन और कर्मचारियों को शोध्य कोई अन्य रकमें

प्रवर्ग 2

                केन्द्रीय सरकार द्वारा रुग्ण चाय यूनिटों के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व या उसके पश्चात् की किसी अवधि के लिए राज्य सरकार और स्थानीय प्राधिकारियों को भू-राजस्व, कर, उपकर, ग्रामीण नियोजन उपकर, विद्युत शुल्क या अन्य शोध्य धन

प्रवर्ग 3

                केन्द्रीय सरकार द्वारा रुग्ण चाय यूनिटों के प्रबंध-ग्रहण के पश्चात् की किसी अवधि के दौरान केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए उधार और ब्याज सहित अन्य वित्तीय सौकर्य और साथ ही वाणिज्यिक बैंकों और लोक वित्तीय संस्थाओं द्वारा दिया गया समरूप सौकर्य

प्रवर्ग 4

                केन्द्रीय सरकार द्वारा रुग्ण चाय यूनिटों के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व या उसके पश्चात् की किसी अवधि के लिए केन्द्रीय सरकार को राजस्व, कर, उपकर, रेट या अन्य शोध्य धन

प्रवर्ग 5

                केन्द्रीय सरकार द्वारा उस रुग्ण चाय यूनिट के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व की किसी अवधि के दौरान किसी चाय कंपनी द्वारा अपनी रुग्ण चाय यूनिट के प्रयोजनों के लिए राष्ट्रीयकृत बैंकों, चाय अधिनियम, 1953 (1953 का 29) के अधीन गठित चाय बोर्ड और लोक वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त प्रतिभूत उधार

प्रवर्ग 6

                केन्द्रीय सरकार द्वारा उस रुग्ण चाय यूनिट के प्रबंध-ग्रहण के पूर्व की किसी अवधि के दौरान किसी चाय कंपनी द्वारा अपनी रुग्ण चाय यूनिट की बाबत व्यापार या विनिर्माण के प्रयोजनों के लिए लिया गया कोई अन्य ऋण

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