राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993
(1993 का अधिनियम संख्यांक 27)
[2 अप्रैल, 1993]
अनुसूचिति जातियों और अनुसूचित जनजातियों से भिन्न पिछड़े वर्गों
के लिए राष्ट्रीय आयोग का गठन करने और उससे संबंधित या
उसके आनुषंगिक विषयों का उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के चवालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 1993 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह 1 फरवरी, 1993 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) पिछड़े वर्ग" से अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों से भिन्न, ऐसे पिछड़े हुए नागरिकों के वर्ग अभिप्रेत हैं जो केन्द्रीय सरकार द्वारा सूचियों में विनिर्दिष्ट किए जाएं;
(ख) आयोग" से धारा 3 के अधीन गठित राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अभिप्रेत है ;
(ग) सूची" से ऐसी सूचियां अभिप्रेत हैं जो ऐसे पिछड़े हुए नागरिकों के वर्ग के पक्ष में, जिनका प्रतिनिधित्व उस सरकार की राय में, भारत सरकार के और भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर या भारत सरकार के नियंत्रण के अधीन किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन सेवाओं में पर्याप्त नहीं हैं, नियुक्तियों या पदों के आरक्षण के लिए उपबंध करने के प्रयोजनों के लिए समय-समय पर भारत सरकार द्वारा तैयार की जाएं;
(घ) सदस्य" से आयोग का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष है ;
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।
अध्याय 2
राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग
3. राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, एक निकाय का, जो राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग के नाम से ज्ञात होगा, इस अधिनियम के अधीन उसे प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने और उसे समनुदिष्ट कृत्यों का पालन करने के लिए गठन करेगी ।
(2) आयोग निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे, अर्थात्-
(क) एक अध्यक्ष, जो उच्चतम न्यायालय या किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है ;
(ख) एक समाज विज्ञानी ;
(ग) दो ऐसे व्यक्ति, जिन्हें पिछड़े वर्गों से संबंधित मामलों का विशेष ज्ञान है ; और
(घ) एक सदस्य-सचिव जो भारत सरकार के सचिव की पंक्ति का केन्द्रीय सरकार का कोई अधिकारी है या रहा है ।
4. अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें-(1) प्रत्येक सदस्य, अपने पद ग्रहण की तारीख से, तीन वर्ष की अवधि तक अपना पद धारण करेगा ।
(2) सदस्य, किसी भी समय केन्द्रीय सरकार को सम्बोधित अपने हस्ताक्षर सहित लेख द्वारा, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य का पद त्याग सकेगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार किसी व्यक्ति को सदस्य के पद से हटा देगी यदि वह व्यक्ति-
(क) अनुन्मोचित दिवालिया हो जाता है ;
(ख) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया जाता है और कारावास से दण्डादिष्ट किया जाता है जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में नैतिक अधमता अन्तर्वलित है ;
(ग) विकृतचित्त का हो जाता है और किसी सक्षम न्यायालय की ऐसा घोषणा विद्यमान है ;
(घ) कार्य करने से इंकार करता है या कार्य करने के लिए असमर्थ हो जाता है ;
(ङ) आयोग से अनुपस्थिति की इजाजत लिए बिना आयोग के लगातार तीन अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है ; या
(च) केंद्रीय सरकार की राय में अध्यक्ष या सदस्य के पद का ऐसा दुरुपयोग करता है जिसके कारण उस व्यक्ति का पद पर बने रहना पिछड़े वर्ग के हितों या लोकहित के लिए हानिकर हो गया है :
परंतु इस खंड के अधीन कोई व्यक्ति तब तक नहीं हटाया जाएगा जब तक उसे उस मामले में सुनवाई का अवसर न दे दिया गया हो ।
(4) उपधारा (2) के अधीन या अन्यथा होने वाली कोई रिक्ति नए नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी ।
(5) अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।
5. आयोग के अधिकारी और अन्य कर्मचारी-(1) केंद्रीय सरकार आयोग के लिए एक सचिव तथा ऐसे अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों की व्यवस्था करेगी जो आयोग के कृत्यों का दक्षतापूर्ण पालन करने के लिए आवश्यक हों ।
(2) आयोग के प्रयोजन के लिए नियुक्त अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्तें तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।
6. वेतन और भत्तों का अनुदानों में से संदाय-अध्यक्ष और सदस्यों को संदेय वेतन और भत्तों का तथा प्रशासनिक व्ययों का, जिनके अंतर्गत धारा 5 में निर्दिष्ट अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन, भत्ते और पेंशन हैं, धारा 12 की उपधारा (1) में निर्दिष्ट अनुदानों में से संदाय किए जाएगा ।
7. रिक्तियों आदि से आयोग की कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-आयोग का कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगी कि आयोग में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ।
8. प्रक्रिया का आयोग द्वारा विनियमित किया जाना-(1) आयोग का अधिवेशन, जब भी आवश्यकता हो, ऐसे समय और स्थान पर होगा जो अध्यक्ष ठीक समझे ।
(2) आयोग अपनी प्रक्रिया स्वयं विनियमित करेगा ।
(3) आयोग के सभी आदेश और विनिश्चय सदस्य-सचिव द्वारा या इस निमित्त सदस्य-सचिव द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत आयोग के किसी अन्य अधिकारी द्वारा अधिप्रमाणित किए जाएंगे ।
अध्याय 3
आयोग के कृत्य और शक्तियां
9. आयोग के कृत्य-(1) आयोग, नागरिकों के किसी वर्ग के सूची में पिछड़े वर्ग के रूप में सम्मिलित किए जाने के अनुरोधों की जांच करेगा और ऐसी सूची में किसी पिछड़े वर्ग के अधिक सम्मिलित किए जाने या कम सम्मिलित किए जाने की शिकायतों की सुनवाई करेगा और केंद्रीय सरकार को ऐसी राय देगा जो वह उचित समझे ।
(2) आयोग की सलाह सामान्यता केंद्रीय सरकार पर आबद्धकर होगी ।
10. आयोग की शक्तियां-आयोग को धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन अपने कृत्यों का पालन करते समय, और विशिष्टतया निम्नलिखित विषयों के संबंध में वे सभी शक्तियां होंगी, जो वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय को हैं, अर्थात् :-
(क) भारत के किसी भी भाग से किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करना ;
(ख) किसी दस्तावेज को प्रकट और पेश करने की अपेक्षा करना ;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना ;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रति की अपेक्षा करना ;
(ङ) साक्षियों और दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना, और
(च) कोई अन्य विषय, जो विहित किया जाए ।
11. सूचियों का केंद्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर पुनरीक्षण-(1) केंद्रीय सरकार, ऐसी सूचियों का उन सूचियों से ऐसे वर्गों का अपवर्जन करने की दृष्टि से जो पिछड़े वर्ग के नहीं रह गए हैं या ऐसी सूचियों में नए पिछड़े वर्गों के सम्मिलित किए जाने के लिए, किसी भी समय पुनरीक्षण कर सकेगी तथा इस अधिनियम के प्रवृत्त होने से दस वर्ष की समाप्ति पर और तत्पश्चात् दस वर्ष की प्रत्येक उत्तरवर्ती अवधि की समाप्ति पर पुनरीक्षण करेगी ।
(2) केंद्रीय सरकार उपधारा (1) में निर्दिष्ट कोई पुनरीक्षण करते समय, आयोग से परामर्श करेगी ।
अध्याय 4
वित्त, लेखे और संपरीक्षा
12. केंद्रीय सरकार द्वारा अनुदान-(1) केंद्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, आयोग के अनुदानों के रूप में ऐसी धनराशियों का संदाय करेगी जो केंद्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए उपयोग किए जाने के लिए ठीक समझे ।
(2) आयोग इस अधिनियम के अधीन कृत्यों का पालन करने के लिए ऐसी धनराशि खर्च कर सकेगा जो वह ठीक समझे और वह धनराशि उपधारा (1) में निर्दिष्ट अनुदानों में से संदेय व्यय मानी जाएगी ।
13. लेखा और संपरीक्षा-(1) आयोग, उचित लेखा और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा, जो केन्द्रीय सरकार, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक से परामर्श करके विहित करे ।
(2) आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा, नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अन्तरालों पर जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, की जाएगी और ऐसी संपरीक्षा के संबंध में उपगत कोई व्यय आयोग द्वारा नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के, और उसके द्वारा इस अधिनियम के अधीन आयोग के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में नियुक्त किसी व्यक्ति के, ऐसी संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के साधारणतया सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में हैं और उसे विशिष्टतया बहियों, लेखाओं, संबंधित वाउचरों तथा अन्य दस्तावेजों और कागज-पत्रों के पेश किए जाने की मांग करने और आयोग के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।
14. वार्षिक रिपोर्ट-आयोग, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर जो विहित किया जाए अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों का पूरा विवरण होगा और उसकी एक प्रति केन्द्रीय सरकार को भेजेगा ।
15. वार्षिक रिपोर्ट और संपरीक्षा रिपोर्ट का संसद् के समक्ष रखा जाना-केन्द्रीय सरकार वार्षिक रिपोर्ट और साथ ही धारा 9 के अधीन आयोग द्वारा दी गई सलाह पर की गई कार्रवाई का और यदि ऐसी सलाह अस्वीकृत की गई है तो अस्वीकृति के कारणों का ज्ञापन तथा संपरीक्षा रिपोर्ट उनके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।
अध्याय 5
प्रकीर्ण
16. आयोग के अध्यक्ष, सदस्यों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-आयोग का अध्यक्ष, सदस्य और कर्मचारी भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
17. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) धारा 4 की उपधारा (5) के अधीन अध्यक्ष और सदस्यों को और धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें ;
(ख) वह प्ररूप जिसमें लेखाओं का वार्षिक विवरण धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन तैयार किया जाएगा ;
(ग) वह प्ररूप, जिसमें और वह समय, जब धारा 14 के अधीन वार्षिक रिपोर्ट तैयार की जाएगी ;
(घ) कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।
(3) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे प्रवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
18. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :
परंतु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
19. निरसन और व्यावृत्ति-(1) राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अध्यादेश, 1993 (1993 का अध्यादेश संख्यांक 23) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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