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हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 ( State of Himachal Pradesh Act, 1970( himachal pradesh state act) )


 

हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970

(1970 का अधिनियम संख्यांक 53)

[25 दिसम्बर, 1970]

हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना और तत्संबद्ध

विषयों का उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के इक्कीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

भाग 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम-यह अधिनियम हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 कहा जा सकेगा ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) “प्रशासक" से राष्ट्रपति द्वारा संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त प्रशासक अभिप्रेत है ;

(ख) “नियत दिन" से वह दिन  अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ;

(ग) “अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है ;

(घ) “निर्वाचन आयोग" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 324 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है ;

(ङ) “विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र" से नियत दिन के ठीक पहले विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ;

(च) “विधि" के अन्तर्गत संपूर्ण विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में या उसके किसी भाग में नियत दिन के ठीक पहले विधि का बल रखने वाली कोई अधिनियमिति, अध्यादेश, विनियम, आदेश, उपविधि, नियम, स्कीम, अधिसूचना, या अन्य लिखत भी है ;

(छ) संसद् के दोनों सदनों में से किसी के या विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के सम्बन्ध में आसीन सदस्य" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो नियत दिन के ठीक पहले उस सदन या उस सभा का सदस्य है ;

(ज) “खजाने" के अन्तर्गत उपखजाना भी है ।

भाग 2

हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना

3. हिमाचल प्रदेश राज्य की स्थापना-नियत दिन से, एक नया राज्य स्थापित किया जाएगा जो हिमाचल प्रदेश राज्य कहलाएगा और जिसमें वे राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे जो उस दिन के ठीक पहले हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में समाविष्ट थे ।

4. संविधान की प्रथम अनुसूची का संशोधन-नियत दिन से संविधान की प्रथम अनुसूची में,-

(क) “1. राज्य" शीर्षक के अन्तर्गत प्रविष्टि 17 के पश्चात्, निम्नलिखित प्रविष्टि अन्तःस्थापित की जाएगी,      अर्थात् :-

“18. हिमाचल प्रदेश-वे राज्यक्षेत्र जो इस अधिनियम के प्रारम्भ के ठीक पहले इस प्रकार प्रशासित थे मानो कि वे हिमाचल प्रदेश और बिलासपुर के नाम से मुख्य आयुक्त के प्रान्त रहे हों और वे राज्यक्षेत्र जो पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 की धारा 5 की उपधारा (1) में उल्लिखित हैं ।" ;

(ख) “2. संघ राज्यक्षेत्र" शीर्षक के अन्तर्गत हिमाचल प्रदेश से संबंधित प्रविष्टि 2 का लोप कर दिया जाएगा और 3 से 10 तक की प्रविष्टियां क्रमशः 2 से 9 तक की प्रविष्टियों के रूप में पुनःसंख्यांकित की जाएंगी ।

 

 

 

भाग 3

विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व

राज्य सभा

5. संविधान की चतुर्थ अनुसूची का संशोधन-नियत दिन से, संविधान की चतुर्थ अनुसूची की सारणी में,-

(क) प्रविष्टि 18, प्रविष्टि 19 के रूप में पुनःसंख्यांकित की जाएगी और इस प्रकार पुनःसंख्यांकित प्रविष्टि के पहले निम्नलिखित प्रविष्टि अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

                “18. हिमाचल प्रदेश . . . . . . . . . . . . . . . .  3 ;"

(ख) प्रविष्टि 19 का लोप कर दिया जाएगा ।

                6. आसीन सदस्यों का आबंटन-(1) नियत दिन से, विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले राज्य सभा के तीन आसीन सदस्य राज्य सभा में हिमाचल प्रदेश राज्य को आबंटित तीन स्थानों को भरने के लिए अनुच्छेद 80 के खण्ड (4) के अधीन सम्यक् रूप से निर्वाचित समझे जाएंगे ।

                (2) ऐसे आसीन सदस्यों की पदावधि अपरिवर्तित रहेगी ।

                7. 1950 के अधिनियम 43 की धारा 27का संशोधन-नियत दिन से, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 27क की उपधारा (4) में, हिमाचल प्रदेश" शब्दों का लोप कर दिया जाएगा ।

                 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

विधान सभा

                10. नियत दिन यथागठित विधान सभा के बारे में उपबन्ध-(1) नियत दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा में विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाने के लिए स्थानों की कुल संख्या साठ होगी और उस राज्य की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित स्थानों की संख्या क्रमशः चौदह और तीन होगी ; और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की द्वितीय अनुसूची तद्नुसार संशोधित समझी जाएगी ।

                (2) नियत दिन से, विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के साठ प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा के निर्वाचन-क्षेत्र समझे जाएंगे तथा संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन आदेश, 1966 का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ।

                (3) विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा का प्रत्येक आसीन सदस्य, जो ऐसे प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है जो नियत दिन से उपधारा (2) के उपबन्धों के आधार पर हिमाचल प्रदेश राज्य का निर्वाचन-क्षेत्र हो जाए, अनुच्छेद 170 के अधीन उस निर्वाचन-क्षेत्र से हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचित समझा जाएगा ।

                (4) किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में किसी बात के होते हुए भी हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा नियत दिन सम्यक् रूप से गठित समझी जाएगी ।

                11. विधान सभा की अवधि-अनुच्छेद 172 के खण्ड (1) में निर्दिष्ट पांच वर्ष की कालावधि, हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा की दशा में, उस दिन से प्रारम्भ समझी जाएगी जिस दिन संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 5 के अधीन हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विद्यमान विधान सभा की अवधि प्रारम्भ हुई ।

                12. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-वे व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पहले हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हों उस दिन से हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा के क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होंगे ।

                13. प्रक्रिया के नियम-नियत दिन के ठीक पहले यथाप्रवृत्त विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा की प्रक्रिया और कार्य-संचालन के नियम, जब तक अनुच्छेद 208 के खण्ड (1) के अधीन नियम नहीं बनते, उसके अध्यक्ष द्वारा उनमें किए गए उपान्तरों और अनुकूलनों के साथ, हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा की प्रक्रिया और कार्य-संचालन के नियम होंगे ।

निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन

                14. लोक सभा में के स्थानों का आबंटन-नियत दिन के पश्चात् गठित होने वाली लोक सभा में, हिमाचल प्रदेश राज्य को चार स्थान आबंटित होंगे जिनमें से एक स्थान अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित होगा ।

                15. विधान सभा में के स्थानों का आबंटन-नियत दिन के पश्चात् किसी समय गठित होने वाली हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा में प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या अड़सठ होगी, जिनमें से सोलह स्थान अनुसूचित जातियों के लिए आरक्षित होंगे और तीन स्थान अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित होंगे ।

                16. 1950 के अधिनियम 43 की प्रथम और द्वितीय अनुसूचियों का संशोधन-(1) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 में,-

(क) प्रथम अनुसूची में,-

(i) “1-राज्य" शीर्षक के अन्तर्गत, प्रविष्टि 17 के पश्चात्, निम्नलिखित प्रविष्टि अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

                “18. हिमाचल प्रदेश . . . . . . . . . . . . . 4             1 . . . . ." ;

(ii) 2-संघ राज्यक्षेत्र शीर्षक के अन्तर्गत हिमाचल प्रदेश से संबंधित प्रविष्टि 6 का लोप कर दिया जाएगा ;

                                (ख) द्वितीय अनुसूची में,-

(i) “1-राज्य" शीर्षक के अन्तर्गत प्रविष्टि 16 के पश्चात्, निम्नलिखित प्रविष्टि अन्तःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-

                “17. हिमाचल प्रदेश . . . . . . . . . . . . . 68    16    3 " ;

(ii) 2-संघ राज्यक्षेत्र शीर्षक के अन्तर्गत हिमाचल प्रदेश से संबंधित प्रविष्टि 2 का लोप कर दिया जाएगा ।

                (2) उपधारा (1) के खण्ड (क) और (ख) द्वारा किए गए संशोधन नियत दिन के पश्चात् किसी समय गठित होने वाली लोक सभा और हिमाचल प्रदेश की विधान सभा के संबंध में प्रभावी होंगे ।

                17. निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन-(1) निर्वाचन आयोग, धारा 14 के अधीन हिमाचल प्रदेश राज्य को आबंटित लोक सभा में के स्थानों को और धारा 15 के अधीन हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा को समनुदेशित स्थानों को, चाहे नियत दिन के पूर्व या पश्चात्, एक-सदस्य प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में इसमें उपबन्धित रीति से वितरित करेगा और उनका परिसीमन संविधान के उपबन्धों और निम्नलिखित उपबन्धों का ध्यान रखते हुए अन्तिम जनगणना के आंकड़ों के आधार पर करेगा, अर्थात् :-

(क) सब निर्वाचन-क्षेत्र, यथासाध्य, भौगोलिक रूप से संहृत क्षेत्र होंगे और उनका परिसीमन भौतिक लक्षणों, प्रशासनिक इकाइयों की विद्यमान सीमाओं, संचार की सुविधाओं और लोक सुविधाओं को ध्यान में रखते हुए किया जाएगा ;

(ख) प्रत्येक सभा निर्वाचन-क्षेत्र का इस प्रकार परिसीमन किया जाएगा कि वह पूर्णतया एक ही संसदीय    निर्वाचन-क्षेत्र में पड़े ;

(ग) वे निर्वाचन-क्षेत्र जिनमें अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित हैं राज्य के भिन्न-भिन्न भागों में वितरित होंगे ओर यथासाध्य उन क्षेत्रों में स्थित होंगे जहां कुल जनसंख्या से उनकी जनसंख्या का अनुपात तुलनात्मक रूप से अधिक   हो ; तथा

(घ) वे निर्वाचन-क्षेत्र जिनमें अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित हों, यथासाध्य, उन खेतों में स्थित होंगे जहां कुल जनसंख्या से उनकी जनसंख्या का अनुपात अधिकतम हो ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा में “अन्तिम जनगणना के आंकड़ों" से, यथास्थिति, विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र या हिमाचल प्रदेश राज्य की जनगणना के वे आंकड़े अभिप्रेत हैं जो उस अन्तिम जनगणना से विनिश्चेय हैं जिसके अन्तिम रूप से प्रकाशित आंकड़े उपलभ्य हैं ।

                (2) निर्वाचन आयोग उपधारा (1) के अधीन कृत्यों के अनुपालन में अपनी सहायता के प्रयोजनार्थ, अपने साथ निम्नलिखित को सहयुक्त सदस्यों के रूप में सहयुक्त करेगा,-

 [(क) वे सब व्यक्ति (या जितने उनमें से उपलभ्य हों) जो हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से निर्वाचित हो कर, लोक सभा के सदस्य उस समय के ठीक पहले थे जब वह 27 दिसम्बर, 1970 के भारत के राजपत्र में प्रकाशित लोक सभा सचिवालय की तारीख 27 दिसम्बर, 1970 की अधिसूचना सं० 37/2/70/टी के साथ प्रकाशित राष्ट्रपति के आदेश द्वारा विघटित हो गई, अथवा यदि किन्हीं निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन उस विघटन के बाद लोक सभा के प्रथम गठन के पश्चात् किया जाए तो उस सदन के लिए हिमाचल प्रदेश राज्य के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से निर्वाचित सब सदस्य (या जितने उनमें से उपलभ्य हों) ; तथा]

(ख) यथास्थिति, विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र या धारा 10 में निर्दिष्ट हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा के सदस्यों में से ऐसे छह सदस्य जिन्हें उसका अध्यक्ष नामनिर्दिष्ट करे :

                परन्तु किसी सहयुक्त सदस्य को मतदान का या निर्वाचन आयोग के किसी विनिश्चय पर हस्ताक्षर करने का अधिकार         नहीं होगा ।

                (3) किसी सहयुक्त सदस्य का पद मृत्यु या पदत्याग के कारण रिक्त हो जाने पर, यदि साध्य हो तो, वह उपधारा (2) के उपबन्धों के अनुसार भरा जाएगा ।

                (4) निर्वाचन आयोग-

(क) निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए अपनी प्रस्थापनाएं, किसी ऐसे सहयुक्त सदस्य की विसम्मत प्रस्थापनाओं सहित (यदि कोई हों) जो उनका प्रकाशन चाहे, शासकीय राजपत्र में और अन्य ऐसी रीति से, जिसे आयोग ठीक समझे, प्रकाशित करेगा, और उनके साथ-साथ एक सूचना भी प्रकाशित करेगा जिसमें प्रस्थापनाओं के सम्बन्ध में आपत्तियां और सुझाव आमंत्रित किए गए हों और वह तारीख विनिर्दिष्ट हो जिसको या जिसके पश्चात् प्रस्थापनाओं पर उसके द्वारा आगे विचार किया जाएगा ;

(ख) उन सब आपत्तियों और सुझावों पर, जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पहले प्राप्त हुए हों,           विचार करेगा ;

(ग) इस प्रकार विनिर्दिष्ट  तारीख के पहले उससे प्राप्त हुई सब आपत्तियों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात्, एक या अधिक आदेशों द्वारा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन अवधारित करेगा और ऐसे आदेश या आदेशों को शासकीय राजपत्र में प्रकाशित कराएगा ; और ऐसे प्रकाशन पर, वह आदेश या वे आदेश विधि का पूर्ण बल रखेंगे और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किए जाएंगे ।

                (5) ऐसे प्रकाशन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों से सम्बन्धित ऐसा प्रत्येक आदेश लोक सभा के समक्ष रखा जाएगा और विधान सभा के निर्वाचन-क्षेत्रों से सम्बन्धित ऐसा प्रत्येक आदेश विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।

                18. परिसीमन आदेशों को अद्यतन रखने की निर्वाचन आयोग की शक्ति-(1) निर्वाचन आयोग, समय-समय पर शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,-

(क) धारा  17 के अधीन दिए गए किसी आदेश में किसी मुद्रण सम्बन्धी भूल को या उसमें अनवधानता से हुई भूल या लोप के कारण हुई किसी गलती को ठीक कर सकेगा ;

(ख) जहां ऐसे किसी आदेश में वर्णित किसी प्रादेशिक खण्ड की सीमाओं या नाम में परिवर्तन हो जाए वहां ऐसे संशोधन जो ऐसे आदेश को अद्यतन करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों, कर सकेगा ।

                (2) इस धारा के अधीन की संसदीय या सभा निर्वाचन-क्षेत्र से सम्बन्धित प्रत्येक अधिसूचना, जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, यथास्थिति, लोक सभा या विधान सभा के समक्ष रखी जाएगी ।

                19. अनुसूचित जाति आदेश का संशोधन-(1) नियत दिन से, संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950, प्रथम अनुसूची में निदिष्ट रूप से संशोधित हो जाएगा ।

                (2) नियत दिन से, संविधान (अनुसूचित जातियां) (संघ राज्यक्षेत्र) आदेश 1951, द्वितीय अनुसूची में निदिष्ट रूप से संशोधित हो जाएगा ।

                20. अनुसूचित जनजाति आदेश का संशोधन-(1) नियत दिन से, संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश, 1950, तृतीय अनुसूची में निदिष्ट रूप से संशोधित हो जाएगा ।

(2) नियत दिन से, संविधान (अनुसूचित जनजातियां) (संघ राज्यक्षेत्र) आदेश 1951, चतुर्थ अनुसूची में निदिष्ट रूप से संशोधित हो जाएगा ।

भाग 4

उच्च न्यायालय

                21. हिमाचल प्रदेश के लिए उच्च न्यायालय-(1) नियत दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य के लिए एक पृथक् उच्च न्यायालय (जिसे इसमें इसके पश्चात् हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय कहा गया है) होगा ।

                (2) हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय का प्रधान स्थान शिमला में होगा ।

                22.  उच्च न्यायालय के न्यायाधीश-(1) राष्ट्रपति, यदि वह ठीक समझे तो, निदेश दे सकेगा कि नियत दिन के ठीक पहले पद धारण करने वाले दिल्ली उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीश, जो उसके द्वारा अवधारित किए जाएं, उस दिन से दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नहीं रहेंगे और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हो जाएंगे ।

                (2) उन व्यक्तियों की, जो उपधारा (1) के आधार पर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हो जाएं, उस न्यायालय में पंक्ति, उस दशा के सिवाय जब ऐसा कोई व्यक्ति उस उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति नियुक्त किया जाए उनकी दिल्ली उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्ति की पूर्विकता के अनुसार होगी ।

                23. उच्च न्यायालय की अधिकारिता-हिमाचल प्रदेश राज्य में समाविष्ट राज्यक्षेत्रों के किसी भाग के सम्बन्ध में, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को ऐसी सब अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार होंगे जो नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि के अधीन, उक्त राज्यक्षेत्रों के उस भाग के सम्बन्ध में दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य हों ।

                24. अधिवक्ताओं और विधिज्ञ परिषद् के सम्बन्ध में विशेष उपबन्ध-(1) हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा इस निमित्त बनाए गए किसी नियम या दिए गए किसी निदेश के अधीन रहते हुए, जो व्यक्ति नियत दिन के ठीक पहले दिल्ली उच्च न्यायालय में विधिव्यवसाय करने का हकदार अधिवक्ता हो, वह हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय करने का   हकदार होगा ।

                (2) हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में सुने जाने का अधिकार उन्हीं सिद्धांतों के अनुसार विनियमित किया जाएगा जो दिल्ली उच्च न्यायालय में सुने जाने के अधिकार की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त हों ।

                (3) नियत दिन से, अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की (जिसे इसके पश्चात् इस धारा में अधिवक्ता अधिनियम कहा गया है) धारा 3 में,-

(क) उपधारा (1) में, खण्ड (घ) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किए जाएंगे, अर्थात् :-

(घ) पंजाब और हरियाणा राज्यों और चंडीगढ़ संघ राज्यक्षेत्र के लिए होगी, जो पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात होगी ;

(घघ) हिमाचल प्रदेश राज्य के लिए होगी, जो हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात होगी ;" ;

(ख) उपधारा (2) के खंड (ख) में, उड़ीसा विधिज्ञ परिषद्" शब्दों के पश्चात् हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद्" शब्द अन्तःस्थापित किए जाएंगे ।

                (4) अधिवक्ता अधिनियम की धारा 17 के उपबन्ध हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् की नामावली के संबंध में निम्नलिखित उपान्तरों के साथ प्रभावी होंगे,-

(क) उक्त धारा 17 की उपधारा (1) के खंड (क) के स्थान पर निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किया जाएगा,            अर्थात् :-

(क) वे सब व्यक्ति जो हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 की धारा 2 के खंड (ख) के अधीन नियत किए गए दिन के ठीक पहले पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् की नामावली में अधिवक्ता के रूप में दर्ज थे, और जो उस दिन से तीस मास के अंदर ऐसी रीति से जो भारतीय विधिज्ञ परिषद् नियमों द्वारा विहित करे, हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् की अधिकारिता के अंदर विधि-व्यवसाय करने के आशय को लिखित रूप में अभिव्यक्त करें ;" ;

(ख) उक्त धारा 17 की उपधारा (3) के खंड (क) में भारतीय विधिज्ञ परिषद् अधिनियम, 1926 के अधीन उसके नामावलीगत किए जाने की तारीख से" शब्दों और अंकों के स्थान पर, पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् की नामावली में उसकी ज्येष्ठता से" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।

                (5) उपधारा (3) और (4) द्वारा यथासंशोधित या उपान्तरित अधिवक्ता अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी,-

“(क) उस अधिनियम के अधीन हिमाचल प्रदेश की प्रथम विधिज्ञ परिषद् की दशा में, उपधारा (3) द्वारा यथासंशोधित उस अधिनियम की धारा 3 की उपधारा (2) के खंड (ख) के अधीन चुने जाने के लिए अपेक्षित पन्द्रह सदस्य, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश द्वारा, उन अधिवक्ताओं में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे जो हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय साधिकार करने के हकदार हों और जो हिमाचल प्रदेश राज्य में समाविष्ट राज्यक्षेत्रों के अन्दर मामूली तौर पर विधि-व्यवसाय कर रहे हों और इस प्रकार नामनिर्दिष्ट सदस्यों की पदावधि परिषद् के प्रथम अधिवेशन की तारीख से एक वर्ष की, या जब तक उनके उत्तरवर्ती उक्त अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार सम्यक् रूप से निर्वाचित नहीं होते, इनमें से जो भी पहले हो, होगी ;

(ख) जब तक खंड (क) के अधीन नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले हिमाचल प्रदेश की प्रथम विधिज्ञ परिषद् के सदस्य, उस खंड के उपबन्धों के अनुसार सम्यक् रूप से नामनिर्दिष्ट न किए जाएं, तब तक पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद्, हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् के रूप के कार्य करेगी और अधिवक्ता अधिनियम के उपबंध, यावत्शक्य, तद्नुसार लागू होंगे ;

(ग) उपधारा (4) द्वारा यथा उपान्तरित अधिवक्ता अधिनियम की धारा 17 की उपधारा (1) के खण्ड (क) के उपबन्धों के अनुसार हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् की नामावली में दर्ज व्यक्तियों के नाम, उस तारीख या उन तारीखों से जब उनके नाम इस प्रकार दर्ज किए जाएं, पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् की नामावली में से हट जाएंगे ;

(घ) पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् की नामावली में से खंड (ग) के अधीन किसी व्यक्ति का नाम हटने के ठीक पहले किसी व्यक्ति के विरुद्ध उस विधिज्ञ परिषद् के समक्ष लंबित या उसके द्वारा संस्थित की जा सकने वाली कोई कार्यवाही ऐसे नाम हटने के पश्चात् हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् के समक्ष या उसके द्वारा जारी रखी जा सकेगी या संस्थित की जा सकेगी ;

(ङ) प्रत्येक व्यक्ति जो खंड (ग) के उपबन्धों के अनुसार पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् की नामावली में से उसका नाम हटने के ठीक पहले पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् का सदस्य हो उस तारीख से, जिसको उसका नाम उस विधिज्ञ परिषद् की नामावली में से इस प्रकार हटे, उस परिषद् का सदस्य नहीं रहेगा ;

(च) पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् द्वारा बनाए गए या बनाए समझे गए नियम, जो उस तारीख के ठीक पहले प्रवृत्त हों जब खंड (क) के उपबन्धों के अनुसार हिमाचल प्रदेश की प्रथम विधिज्ञ परिषद् सम्यक् रूप से गठित हो जाए, ऐसे उपान्तरों और अनुकूलनों के साथ जो हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् के अध्यक्ष द्वारा उनमें किए जाएं, हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् द्वारा बनाए गए नियम समझे जाएंगे और तद्नुसार प्रभावी होंगे ।

                (6) उपधारा (5) के खण्ड (क) के उपबन्धों के अनुसार हिमाचल प्रदेश की प्रथम विधिज्ञ परिषद् के सम्यक् रूप से गठित होने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, पंजाब और हरियाणा विधिज्ञ परिषद् की आस्तियां और दायित्व उस विधिज्ञ परिषद् और हिमाचल प्रदेश विधिज्ञ परिषद् के बीच, ऐसी रीति से और ऐसे अनुपात में विभाजित किए जाएंगे जिसका उन दोनों विधिज्ञ परिषदों में करार हो जाए और किसी विषय में करार के अभाव में, वह विषय भारतीय विधिज्ञ परिषद् के अध्यक्ष को निर्देशित किया जाएगा और उस पर उसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा में प्रयुक्त किन्तु इस अधिनियम में अपरिभाषित पदों के वही अर्थ होंगे जो क्रमशः उन्हें अधिवक्ता अधिनियम में दिए गए हैं ।

                25. उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया-इस भाग के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, दिल्ली उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपान्तरों सहित, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के संबंध में       लागू होगी ।

                26. उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा-दिल्ली उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा के संबंध में नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपान्तरों सहित, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा की बाबत लागू होगी ।

                27. रिटों और अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप-दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों और अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप की बाबत नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपान्तरों सहित, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों और अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप की बाबत लागू होगी ।

                28. न्यायाधीशों की शक्तियां-दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति, एकल न्यायाधीशों और खण्ड न्यायालयों की शक्तियों के संबंध में और उन शक्तियों के प्रयोग के आनुषंगिक सभी विषयों के संबंध में, नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपान्तरों सहित, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।

                29. उच्चतम न्यायालय को अपीलों के विषय में प्रक्रिया-दिल्ली उच्च न्यायालय और उसके न्यायाधीशों और खण्ड न्यायालयों से उच्चतम न्यायालय को अपीलों से संबंधित जो विधि नियत दिन के ठीक पहले प्रवृत्त हो, वह आवश्यक उपान्तरों सहित, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।

                30. दिल्ली उच्च न्यायालय से हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को कार्यवाहियों का अन्तरण-(1) इसमें इसके पश्चात् यथा उपबंधित के सिवाय, नियत दिन से, दिल्ली उच्च न्यायालय को हिमाचल प्रदेश राज्य में समाविष्ट राज्यक्षेत्र की बाबत कोई अधिकारिता नहीं होगी ।

                (2) दिल्ली उच्च न्यायालय में नियत दिन के ठीक पहले लंबित ऐसी कार्यवाहियां जिनके बारे में उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति ने, चाहे उस दिन के पूर्व या पश्चात्, वाद-हेतुक के पैदा होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह प्रमाणित किया हो कि वे ऐसी कार्यवाहियां हैं जो हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिएं, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी जाएंगी ।

                (3) इस धारा की उपधारा (1) और (2) या धारा 23 में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् यथा उपबंधित के सिवाय, अपीलों, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदनों, पुनर्विलोकन के लिए आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों को, जहां ऐसी किसी कार्यवाही में नियत दिन के पहले दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश की बाबत कोई अनुतोष चाहा गया हो, ग्रहण करने, सुनने और निपटाने की अधिकारिता दिल्ली उच्च न्यायालय को होगी और हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को न होगी :

                परन्तु यदि ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण किए जाने के पश्चात्, उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत हो कि वे हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को अंतरित की जानी चाहिए तो, वह आदेश देगा कि वे इस प्रकार अन्तरित की जाएं और तब ऐसी कार्यवाहियां तद्नुसार अन्तरित कर दी जाएंगी ।

                (4) दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा-

(क) उपधारा (2) के आधार पर हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को अन्तरित किन्हीं कार्यवाहियों में, नियत दिन के पहले, या

(ख) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में जिनकी बाबत, दिल्ली उच्च न्यायालय की अधिकारिता उपधारा (3) के आधार पर बनी रहती है,

दिया गया कोई आदेश, सब प्रयोजनों के लिए, केवल दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-

(क) कार्यवाहियां न्यायालय में तब तक लम्बित समझी जाएंगी जब तक उस न्यायालय ने पक्षकारों के बीच के सभी विवाद्यकों को, जिनके अन्तर्गत कार्यवाहियों के खर्चों के विनिर्धारण की बाबत विवाद्यक भी है, निपटा न दिया हो और इसके अन्तर्गत अपीलें, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के लिए आवेदन, पुनरीक्षण के लिए अर्जियां और रिट के लिए अर्जियां भी होंगी ;

(ख) उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उसके न्यायाधीश या खंड न्यायालय के प्रति निर्देश भी हैं तथा न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा दिए गए आदेश के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उस न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा पारित दण्डादेश, निर्णय या डिक्री के प्रति निर्देश भी हैं ।

                31. हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को अंतरित कार्यवाहियों में हाजिर होने या कार्य करने का अधिकार-किसी व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पहले, दिल्ली उच्च न्यायालय में विधि-व्यवसाय करने का हकदार अधिवक्ता हो और उस उच्च न्यायालय से धारा 30 के अधीन हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में हाजिर होने या कार्य करने के लिए प्राधिकृत किया गया हो, उन कार्यवाहियों के सम्बन्ध में हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय में, यथास्थिति, हाजिर होने या कार्य करने का     अधिकार होगा ।

                32. व्यावृत्तियां-इस भाग की किसी बात का प्रभाव संविधान के किन्हीं उपबन्धों के हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय को लागू होने पर नहीं पड़ेगा तथा यह भाग किसी ऐसे उपबन्ध के अधीन रहते हुए प्रभावी होगा जिसे ऐसा उपबन्ध करने की शक्ति रखने वाला कोई विधान-मंडल या अन्य प्राधिकारी नियत दिन या उसके पश्चात् उच्च न्यायालय की बाबत बनाए ।

भाग 5

व्यय का प्राधिकरण और राजस्व का वितरण

                33. विधान-मंडल की मंजूरी मिलने तक के लिए व्यय का प्राधिकरण-(1) राष्ट्रपति नियत दिन से प्रारम्भ होने वाली छह मास से अनधिक की कालावधि के लिए हिमाचल प्रदेश राज्य की संचित निधि में से ऐसा व्यय, जो वह आवश्यक समझे, आदेश द्वारा, तब तक के लिए प्राधिकृत कर सकेगा जब तक कि ऐसा व्यय हिमाचल प्रदेश राज्य की विधान सभा द्वारा मंजूर न कर दिया जाए :

                परन्तु नियत दिन के पश्चात्, हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल, उक्त छह मास की कालावधि के भीतर किसी कालावधि के लिए हिमाचल प्रदेश राज्य की संचित निधि में से ऐसा और व्यय जो वह आवश्यक समझे, आदेश द्वारा प्राधिकृत कर सकेगा ।

                (2) यथास्थिति, राष्ट्रपति या हिमाचल प्रदेश का राज्यपाल भिन्न वित्तीय वर्षों में पड़ने वाली कालावधियों की बाबत उपधारा (1) के अधीन पृथक् आदेश करेगा ।

                34. विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं के संबंध में रिपोर्टें-(1) संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 49 में निर्दिष्ट नियंत्रक और महालेखापरीक्षक की, नियत दिन के पहले की किसी कालावधि की बाबत विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं की बाबत रिपोर्टें, हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल को प्रस्तुत की जाएंगी, जो उन्हें राज्य की विधान सभा के समक्ष रखवाएगा ।

                (2) राज्यपाल, आदेश द्वारा,-

(क) वित्तीय वर्ष 1970-71 के दौरान नियत दिन के पहले की किसी कालावधि की बाबत या किसी पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष की बाबत किसी सेवा पर विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से उपगत किसी व्यय को, जो उस सेवा के लिए और उस वर्ष के लिए अनुदत्त रकम से आधिक्य में हो और जैसा वह उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट रिपोर्ट में प्रकटित हो, सम्यक् रूप से प्राधिकृत घोषित कर सकेगा ; तथा

(ख) उक्त रिपोर्टों से उठने वाले किसी विषय पर कोई कार्रवाई की जाने के लिए उपबन्ध कर सकेगा ।

                35. हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल के भत्ते और विशेषाधिकार-जब तक अनुच्छेद 158 के खंड (3) के अधीन संसद् विधि द्वारा इस निमित्त उपबन्ध न करे, हिमाचल प्रदेश के राज्यपाल के भत्ते और विशेषाधिकार वहीं होंगे जो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा,         अवधारित करे ।

                36. राजस्व का वितरण-राष्ट्रपति, हिमाचल प्रदेश राज्य के राजस्व को सहायता-अनुदान और संघ के उत्पाद-शुल्क, संपदा शुल्क और आय पर कर में राज्य का अंश, आदेश द्वारा, अवधारित करेगा और उस प्रयोजन के लिए तद्द्वारा संघ उत्पाद-शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1962 (1962 का 3), अतिरिक्त उत्पाद-शुल्क (विशेष महत्व का माल) अधिनियम, 1957 (1957 का 58), संपदा शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1962 (1962 का 9) और संविधान (राजस्व वितरण) आदेश, 1969 (संविधान आदेश 87) के सुसंगत उपबन्धों में ऐसी रीति से संशोधन करेगा जो वह ठीक समझे ।

भाग 6

आस्तियां और दायित्व

                37. सम्पत्ति, आस्तियां, अधिकार, दायित्व, बाध्यताएं आदि-(1) विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के अंदर की ऐसी सब सम्पत्ति और आस्तियां, जो नियत दिन के ठीक पहले उस संघ राज्यक्षेत्र के शासन के प्रयोजनों के लिए संघ द्वारा धारित हों, उस दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य को तब के सिवाय संक्रांत हो जाएंगी जब वे प्रयोजन जिनके लिए ऐसी सम्पत्ति और आस्तियां धारित हों संघ के प्रयोजन हों :

                परन्तु हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के खजानों में नियत दिन के पहले के नकद अतिशेष, उस दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य में निहित होंगे ।

                (2) संविदा से उद्भूत होने वाले या अन्य सब अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं (जो संघ के प्रयोजन से संबंधनीय या संबद्ध न हों), जो नियत दिन के ठीक पहले,-

(क) हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के शासन से उद्भूत या संबद्ध केन्द्रीय सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं हों ; अथवा

(ख) विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के, उसकी उस हैसियत से, या उस संघ राज्यक्षेत्र को सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं हों,

नियत दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य की सरकार के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं होंगी ।

                (3) (क) किसी ऐसे कर या शुल्क की, जो संविधान की सप्तम अनुसूची की राज्य सूची में प्रगणित कर या शुल्क है, अथवा

                (ख) अनुच्छेद 268 में निर्दिष्ट किसी शुल्क की, अथवा

                (ग) केन्द्रीय विक्रय-कर अधिनियम, 1956 (1956 का 74) के अधीन किसी कर की,

बकाया को, जो विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में शोध्य हुई है, वसूल करने का अधिकार हिमाचल प्रदेश राज्य को संक्रांत       हो जाएगा ।

                (4) इस धारा के उपबन्ध निम्नलिखित को या उनके संबंध में लागू नहीं होंगे,-

(क) पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) के अधीन किन्हीं आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों या बाध्यताओं का फायदा या भार, जो उक्त अधिनियम में यथापरिभाषित अंतरित राज्यक्षेत्रों के कारण माना जाए ;

(ख) कोई संस्था, उपक्रम या परियोजना, जिसके सम्बन्ध में व्यय नियत दिन के पहले भारत की संचित निधि से किया जाता हो ;

(ग) कोई सम्पत्ति, जो संघ द्वारा विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के व्ययनाधीन इस शर्त पर रखी गई हो कि उसका स्वामित्व संघ में निहित रहेगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए,-

(क) “दायित्व" के अन्तर्गत किसी सिविल निक्षेप, स्थानीय निधि निक्षेप, पूर्त या अन्य विन्यास, भविष्य-निधि लेखा, पेंशन या अनुयोज्य दोष से सम्बन्धित दायित्व है ;

(ख) “संघ के प्रयोजन" से संघ सूची में उल्लिखित किसी मामले से संबंधनीय सरकारी प्रयोजन अभिप्रेत हैं ।

                38. 1966 के अधिनियम 31 के अधीन अन्तरित राज्यक्षेत्रों के बारे में संघ की आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों आदि के अन्तरण के लिए विशेष उपबन्ध-(1) इस धारा में, उत्तरवर्ती राज्य" और अंतरित राज्य" पदों के वही अर्थ हैं जो क्रमशः उन्हें पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 में दिए गए हैं ।

                (2) केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा हिमाचल प्रदेश राज्य को पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) के अधीन संघ की किन्हीं आस्तियों, अधिकारों, दायित्वों या बाध्यताओं का फायदा या भार जहां तक ऐसा फायदा या भार, केन्द्रीय सरकार की राय में, अन्तरित राज्यक्षेत्रों के कारण माना जाए, अन्तरित कर सकेगी ।

                (3) उपधारा (2) के अधीन किया गया आदेश यह उपबन्ध कर सकेगा कि हिमाचल प्रदेश राज्य, पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) के सब या किन्हीं प्रयोजनों के लिए अंतरित राज्यक्षेत्रों के सम्बन्ध में, उत्तरवर्ती राज्य होगा या वह हिमाचल प्रदेश राज्य को वे अधिकार प्रदान कर सकेगा या उस पर वे बाध्यताएं अधिरोपित कर सकेगा जो उत्तरवर्ती राज्यों पर उस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त या अधिरोपित अधिकार या बाध्यताओं के यावत्शक्य तत्सम हों ।

                (4) धारा 49 के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केन्द्रीय सरकार, इस धारा के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) के भाग 6, भाग 7, भाग 8 और भाग 9 के उपबन्ध और सम्बन्धित उपबन्ध ऐसे अपवादों और उपान्तरों के साथ प्रभावी होंगे जो आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

भाग 7

सेवाओं के बारे में उपबन्ध

                39. अखिल भारतीय सेवाओं से सम्बन्धित उपबन्ध-(1) इस धारा में, राज्य काडर" पद का,-

(क) भारतीय प्रशासनिक सेवा के सम्बन्ध में वही अर्थ है जो उसे भारतीय प्रशासनिक सेवा (काडर) नियम, 1954 में दिया गया है ;

(ख) भारतीय पुलिस सेवा के सम्बन्ध में वही अर्थ है जो उसे भारतीय पुलिस सेवा (काडर) नियम, 1954 में दिया गया है ;

(ग) भारतीय वन सेवा के सम्बन्ध में वही अर्थ है जो उसे भारतीय वन सेवा (काडर) नियम, 1966 में दिया गया है ।

                (2) नियत दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य के लिए भारतीय प्रशासनिक सेवा का एक राज्य काडर, भारतीय पुलिस सेवा का एक राज्य काडर और भारतीय वन सेवा का एक राज्य काडर गठित किया जाएगा ।

                (3) उक्त राज्य काडरों में से प्रत्येक की प्रारम्भिक सदस्य-संख्या और संरचना ऐसी होगी जो राज्य सरकार, नियत दिन के पहले आदेश द्वारा अवधारित करे ।

                (4) उक्त सेवाओं में से प्रत्येक के ऐसे सदस्य, जो उनके संघ राज्यक्षेत्र काडर में नियत दिन के ठीक पहले थे और जिन्हें केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, उसी सेवा के हिमाचल प्रदेश राज्य काडर को ऐसी तारीख या तारीखों से, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, आबंटित किए जाएंगे ।

                (5) इस धारा की कोई बात नियत दिन के पश्चात् अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 (1951 का 61) या तद्धीन बनाए गए नियमों या विनियमों के उपधारा (2) या उपधारा (4) में निर्दिष्ट उक्त सेवाओं के राज्य काडर के संबंध में और राज्य काडरों में उन सेवाओं के सदस्यों के सम्बन्ध में प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।

                40. कुछ सेवाओं से सम्बन्धित उपबन्ध-(1) नियत दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य के लिए निम्नलिखित सेवाएं गठित की जाएंगी, अर्थात् :-

                                (क) हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा ; तथा

                                (ख) हिमाचल प्रदेश पुलिस सेवा ।

                (2) उक्त सेवाओं की प्रारम्भिक सदस्य-संख्या और काडर की संरचना ऐसी होगी जो विद्यमान हिमाचल प्रदेश राज्य का प्रशासक, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, नियत दिन के पहले, आदेश द्वारा, अवधारित करे ।

                (3) नियत दिन से, विद्यमान दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप सिविल सेवा (जिसे इसमें इसके पश्चात् विद्यमान सिविल सेवा कहा गया है) दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप सिविल सेवा के नाम से ज्ञात होगी और दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, अंडमान और निकोबार द्वीप पुलिस सेवा (जिसे इसमें इसके पश्चात् विद्यमान सिविल सेवा कहा गया है) दिल्ली, अंडमान और निकोबार द्वीप पुलिस सेवा के नाम से ज्ञात होगी ।

                (4) विद्यमान सिविल सेवा के ऐसे सदस्य जिन्हें केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा काडर को आबंटित किए जाएंगे और विद्यमान पुलिस सेवा के ऐसे सदस्य जिन्हें केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, हिमाचल प्रदेश पुलिस सेवा काडर को आबंटित किए जाएंगे और ऐसा कोई आदेश, वह तारीख या वे तारीखें विनिर्दिष्ट कर सकेगा जब से तद्धीन किया गया आबंटन प्रभावी होगा ।

                (5) वे सब व्यक्ति, जो उपधारा (4) के अधीन आबंटित किए जाएं और आबंटित किए जाने की तारीख के ठीक पहले किसी अखिल भारतीय सेवा के राज्य काडर में प्रोन्नति के लिए किसी प्रवर सूची में हों, धारा 39 की उपधारा (2) के अधीन गठित उसी सेवा के राज्य काडर में प्रोन्नति के लिए प्रवर सूची में प्रथमोक्त सूची वाले क्रम में सम्मिलित किए गए समझे जाएंगे ।

                (6) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों के अधीन रहते हुए, विद्यमान सिविल सेवा और विद्यमान पुलिस सेवा के सदस्यों को या उनके सम्बन्ध में लागू होने वाले और नियत दिन के ठीक पहले यथाप्रवृत्त नियम और विनियम, क्रमशः हिमाचल प्रदेश प्रशासनिक सेवा और हिमाचल प्रदेश पुलिस सेवा के सदस्यों को और उनके संबंध में यावत्शक्य लागू होंगे जब तक वे सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित न कर दिए जाएं ।

                (7) केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा का प्रत्येक सदस्य, जो नियत दिन के ठीक पहले विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में कोई ऐसा पद धारण किए हो, जो उस सेवा की प्राधिकृत सदस्य-संख्या में सम्मिलित हो, जब तक केन्द्रीय सरकार अन्यथा निदेश न दे, नियत दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य की सरकार में, सेवा के उन्हीं निबन्धनों और शर्तों पर, जो उसे केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा नियम, 1963 के अधीन लागू होती हों, प्रतिनियुक्ति पर, किन्तु बिना प्रतिनियुक्ति भत्ते के, समझा जाएगा :

                परन्तु ऐसी प्रतिनियुक्ति की कालावधि किसी दशा में, नियत दिन से तीन वर्ष की कालावधि से अधिक नहीं होगी ।

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा में, केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा" से केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा नियम, 1963 के अधीन गठित केन्द्रीय स्वास्थ्य सेवा अभिप्रेत है ।

                41. अन्य सेवाओं से सम्बन्धित उपबन्ध-(1) प्रत्येक व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पहले हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के प्रशासकीय नियंत्रण के अधीन संघ के कार्यकलाप के संबंध में सेवा कर रहा हो, जब तक केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा अन्यथा निदेश न दे, उस दिन से हिमाचल प्रदेश राज्य के कार्यकलाप से सम्बन्धित सेवा के लिए आबंटित समझा जाएगा :

                परन्तु इस धारा के अधीन कोई निदेश नियत दिन से एक वर्ष की कालावधि के अवसान के पश्चात् जारी नहीं किए जाएंगे :

                परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) की धारा 82 के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी ।

                (2) इस धारा के उपबन्ध उन व्यक्तियों के सम्बन्ध में लागू नहीं होंगे जिनको धारा 39 और धारा 40 के उपबन्ध लागू होते हैं ।

                42. सेवाओं के बारे में अन्य उपबन्ध-(1) इस धारा या धारा 40 और 41 में कोई बात संविधान के भाग 14 के अध्याय 1 के उपबन्धों के प्रवर्तन को हिमाचल प्रदेश राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में सेवा करने वाले व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के अवधारण के सम्बन्ध में नियत दिन को और तत्पश्चात् प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली न समझी जाएगी :

                परन्तु धारा 40 और धारा 41 में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति को नियत दिन के ठीक पहले लागू होने वाली सेवा की शर्तों में उसके लिए अहितकर रूप में परिवर्तन केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना नहीं किया जाएगा ।

                (2) धारा 40 के अधीन आबंटित या धारा 41 के अधीन आबंटित समझे गए किसी व्यक्ति द्वारा नियत दिन के पहले हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के सम्बन्ध में की गई सब सेवाएं, उसकी सेवा की शर्तों को विनियमित करने वाले नियमों के प्रयोजनार्थ हिमाचल प्रदेश राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में की गई समझी जाएंगी ।

                43. अधिकारियों को उन्हीं पदों पर बनाए रखने के बारे में उपबन्ध-प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पहले हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के सम्बन्ध में किसी पद या स्थान को धारण करता हो या उसके कर्तव्यों का निर्वहन करता हो, हिमाचल प्रदेश राज्य में उसी पद या स्थान को धारण करता रहेगा और उस दिन से, हिमाचल प्रदेश राज्य की सरकार या उसमें अन्य समुचित प्राधिकारी द्वारा उस पद या स्थान पर सम्यक् रूप से नियुक्त समझा जाएगा :

                परन्तु इस धारा की कोई बात किसी सक्षम प्राधिकारी को नियत तारीख से ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में उसके ऐसे पद या स्थान पर बने रहने पर प्रभाव डालने वाला आदेश पारित करने से निवारित करने वाली नहीं समझी जाएगी ।

                44. सलाहकार समितियां-केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित में अपनी सहायता के प्रयोजनार्थ एक या अधिक सलाहकार समितियां, आदेश द्वारा, स्थापित कर सकेगी :-

(क) इस भाग के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन ; तथा

(ख) इस भाग के उपबन्धों द्वारा प्रभावित सब व्यक्तियों के साथ ऋजु और साम्य पूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना और ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए किसी अभ्यावेदन पर उचित विचार करना ।

                45. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार हिमाचल प्रदेश राज्य सरकार को ऐसे निदेश दे सकेगी जो उसे इस भाग के पूर्वगामी उपबन्धों को और पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) के भाग 9 के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों और राज्य सरकार ऐसे निदेशों का अनुपालन करेगी ।

भाग 8

विधिक और प्रकीर्ण उपबन्ध

                46. अनुच्छेद 210 और अनुच्छेद 239का संशोधन-नियत दिन से-

                                (क) अनुच्छेद 210 के खंड (2) के अन्त में निम्नलिखित उपबन्ध अन्तःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

स्त्र्परन्तु हिमाचल प्रदेश राज्य के विधान-मंडल के सम्बन्ध में इस खंड का ऐसे प्रभाव होगा मानो उसमें आने वाले पन्द्रह वर्ष" शब्दों के स्थान पर पच्चीस वर्ष" शब्द प्रतिस्थापित किए गए हों ।ऱ् ;

                                (ख) अनुच्छेद 239क के खंड (1), में हिमाचल प्रदेश" शब्दों का लोप कर दिया जाएगा ।

                47. 1956 के अधिनियम 37 का संशोधन-नियत दिन से राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) की धारा 15 के खंड (क) में,-

(i) “पंजाब" शब्द के स्थान पर पंजाब, हिमाचल प्रदेश" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ;

(ii) “हिमाचल प्रदेश और चंडीगढ़" शब्दों के स्थान पर और चंडीगढ़" शब्द प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।

                48. 1963 के अधिनियम 20 का संशोधन-नियत दिन से संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ज) में और धारा 44 की उपधारा (2) में हिमाचल प्रदेश" शब्दों का लोप कर दिया जाएगा ।

                49. विद्यमान विधियों का जारी रहना और उनका अनुकूलन-(1) नियत दिन के ठीक पहले, विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में प्रवृत्त सब विधियां जब तक वे सक्षम विधान-मण्डल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित न कर दी जाएं, हिमाचल प्रदेश राज्य में प्रवृत्त बनी रहेंगी ।

                (2) नियत दिन के पहले बनाई गई किसी विधि के हिमाचल प्रदेश राज्य के सम्बन्ध में लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजनार्थ, समुचित सरकार, उस दिन से दो वर्ष के अन्दर, आदेश द्वारा, विधि के ऐसे अनुकूलन और उपान्तर, चाहे वे निरसन के रूप में हों या संशोधन के रूप में, जैसे आवश्यक या समीचीन हों, कर सकेगी, और तब प्रत्येक ऐसी विधि, जब तक वह सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित न कर दी जाए, इस प्रकार किए गए अनुकूलनों और उपान्तरों के साथ प्रभावी होगी ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा, समुचित सरकार" पद से, संविधान की सप्तम अनुसूची की संघ सूची में प्रगणित किसी विषय से सम्बन्धित विधि के बारे में केन्द्रीय सरकार अभिप्रेत है ; और किसी अन्य विधि के बारे में हिमाचल प्रदेश राज्य की सरकार अभिप्रेत है ।

                50. विधियों के अर्थान्वयन की शक्ति-इस बात के होते हुए भी कि नियत दिन के पहले बनाई गई किसी विधि के अनुकूलन के लिए धारा 49 के अधीन कोई उपबन्ध नहीं किया गया है या अपर्याप्त उपबन्ध किया गया है, कोई न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी, जो ऐसी विधि को प्रवृत्त कराने के लिए अपेक्षित या सशक्त हो, हिमाचल प्रदेश के सम्बन्ध में उसके लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजनार्थ, उस विधि का अर्थ उसके सार पर प्रभाव डाले बिना, यथास्थिति, उस न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष के विषय के बारे में ऐसी रीति से जो आवश्यक या उचित हो लगा सकेगा ।

                51. न्यायालयों आदि के बने रहने के बारे में उपबन्ध-नियत दिन के ठीक पहले संपूर्ण विद्यमान हिमाचल प्रदेश संघ राज्यक्षेत्र में या उसके किसी भाग में विधिपूर्ण कृत्यों का निर्वहन करने वाले सब न्यायालय और अधिकरण और सब प्राधिकारी, जब तक कि उनका बना रहना इस अधिनियम के उपबन्धों से असंगत न हो या सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्य उपबन्ध न किया जाए, अपने-अपने कृत्य करते रहेंगे ।

                52. अधिनियम के उन उपबन्धों का प्रभाव जो अन्य विधियों से असंगत हैं-इस अधिनियम के उपबन्ध किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।

                53. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न हो तो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, कोई भी बात कर सकेगा जो ऐसे उपबन्धों से असंगत न हो तथा जो उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।

                (2) इस धारा के अधीन दिया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

                54. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए नियम, शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

                 [(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

 

प्रथम अनुसूची

[धारा 19 (1) देखिए]

संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950 का संशोधन

                (1) पैरा 2 में अंक “13" के स्थान पर अंक “14" प्रतिस्थापित किया जाएगा, “और पैरा 4 में, और अनुसूची के भाग 4क और 10 में" से प्रारम्भ होने वाले और प्रति निर्देश है" शब्दों से समाप्त होने वाले शब्दों, अंकों और अक्षरों के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

“और अनुसूची के भाग 4क और 10 में किसी राज्य या उसके जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह नवम्बर, 1966 के प्रथम दिन से गठित राज्य, जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश है ; और भाग 14 में किसी राज्य या उसके जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 की धारा 2 के खंड (ख) के अधीन नियत किए गए दिन से गठित राज्य, जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश है ।" ।

                (2) अनुसूची में, भाग 13 के पश्चात् निम्नलिखित भाग अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

“भाग 14-हिमाचल प्रदेश

                1. पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) की धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्रों के सिवाय समस्त राज्य में-

                1. आदधर्मी

2. बाढ़ी, नगालू

3. बन्धेला

4. बाल्मीकी, चूड़ा या भंगी

5. बंगाली

6. बंजारा

7. बांसी

8. बरड़

9. बरार

10. बटवाल

11. बावरिया

12. बाजीगर

13. भंजड़ा

14. चमार, मोची, रामदासी, रविदासी या रामदासिया

15. चनाल

16. छिम्बे (धोबी)

17. चूहड़े

18. डागी

19. दाओले

20. दरेई या दरयाई

21. दाउले

22. ढाकी या तूरी

23. धौगरी या धुआई

24. डूम या डूमना

25. डूमने (भंजड़े)

26. हाली

27. हेसी

28. जोगी

29. जुलाहे

30. कबीरपंथी, जुलाहा या कीर

31. कमोह या डगोली

32. करोक

33. खटीक

34. कोली

35. लोहार

36. मजहबी

37. मेघ

38. नट

39. ओड

40. पासी

41. फरेड़ा

42. रेहाड़

43. रेहाड़ा

44. सांसी

45. सपेला

46. सरड़े, सराड़े या सिरयाड़े

47. सरेहड़े

48. सिकलीगर

49. सिप्पी

50. सिरकीबंद

51. तेली

52. ठठियार या ठठेरा ।

 

                2. पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) की धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्रों में-

                1. आदमर्धी

2. बंगाली

3. बरड़, बुरड़ या बरेड़

4. बटवाल

5. बौरिया या बावरिया

6. बाजीगर

7. बाल्मीकी, चूहड़ा या भंगी

8. भंजड़े

9. चमार, जटिया चमार, रेहगड़, रायगढ़, रामदासी या रविदासी

10. चनाल

11. डागी

12. दड़े

13. धानक

14. ढोगरी, ढांगरी या सिग्गी

15. डूमना, महाशय या डूम

16. गगड़ा

17. गंढीला या गन्ढील गोन्ढोला

18. कबीरपंथी या जुलाहा

19. खटीक

20. कोरी या कोली

21. मरीजा या मरेचा

22. मजहबी

23. मेघ

24. नट

25. ओड

26. पासी

27. पेरना

28. फरेरा

29. सनहाई

30. सनहाल

31. संसोई

32. सांसी, भेड़कूट या मनेश

33. सपेला

34. सरैड़ा

35. सिकलीगर

36. सिरकीबंद ।"

द्वितीय अनुसूची

[धारा 19 (2) देखिए]

संविधान (अनुसूचित जातियां) (संघ राज्यक्षेत्र) आदेश, 1951 का संशोधन

                (1) पैरा 4 में जिन दो स्थानों पर “भाग 2 और 5" शब्द और अंक आए हैं उनके स्थान पर भाग 5" शब्द और अंक प्रतिस्थापित किए जाएंगे ।

                (2) अनुसूची में, भाग 2 का लोप कर दिया जाएगा ।

 

 

तृतीय अनुसूची

[धारा 20 (1) देखिए]

संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश, 1950 का संशोधन

                (1) पैरा 2 में अंक “12" के स्थान पर अंक “13" प्रतिस्थापित किया जाएगा, और पैरा 3 में “और अनुसूची के भाग 4 और 7क" शब्दों, अंकों और अक्षर से प्रारम्भ होने वाले और प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश है" शब्दों से समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर निम्नलिखित प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

“और अनुसूची के भाग 4 और 7क में किसी राज्य या उसके जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह मई, 1960 के प्रथम दिन से गठित उस राज्य, जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश है ; और भाग 13 में राज्य या उसके जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह हिमाचल प्रदेश राज्य अधिनियम, 1970 की धारा 2 के खंड (ख) के अधीन नियत किए गए दिन से गठित राज्य, जिले या अन्य प्रादेशिक खंड के प्रति निर्देश है ।" ।

(2) अनुसूची में भाग 12 के पश्चात् निम्नलिखित भाग अंतःस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

“भाग 13-हिमाचल प्रदेश

                1. पंजाब पुनर्गठन अधिनियम, 1966 (1966 का 31) की धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्रों के सिवाय समस्त राज्य में-

                1. गद्दी

                2. गुज्जर या गूजर

                3. जाड़, लाम्बा, खाम्पा और भोट या बोध

                4. कन्नोरा या किन्नर

                5. लाहौला

                6. पंगवाला ।

                2. लाहौल और स्पीति जिले में-

                1. गद्दी

                2. स्वांगला

                3. भोट या बोध ।" ।

चतुर्थ अनूसूची

[धारा 20 (2) देखिए]

संविधान (अनुसचित जनजातियां) (संघ राज्यक्षेत्र) आदेश, 1951 का संशोधन

                (1) पैरा 3 के स्थान पर निम्नलिखित पैरा प्रतिस्थापित किया जाएगा, अर्थात् :-

3. इस आदेश में संघ राज्यक्षेत्र के प्रति निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि वह नवंबर, 1956 के प्रथम दिन से संघ राज्यक्षेत्र के रूप में गठित राज्यक्षेत्र के प्रति निर्देश है ।" ।

                (2) अनुसूची में, भाग 1 का लोप कर दिया जाएगा ।

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