राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956
(1956 का अधिनियम संख्यांक 37)
[31 अगस्त, 1956]
भारत के राज्यों के पुनर्गठन का तथा
उससे संबंधित विषयों का
उपबंध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सातवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
भाग 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) “नियत दिन" से 1956 के नवम्बर का प्रथम दिन अभिप्रेत है;
(ख) “अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है;
(ग) “सभा निर्वाचन-क्षेत्र", “परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र" और “संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र" के वही अर्थ हैं जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) में हैं;
(घ) विद्यमान मुम्बई, मध्य प्रदेश, मैसूर, पंजाब या राजस्थान राज्य के संबंध में, “तत्स्थानी नया राज्य" से उसी नाम वाला नया राज्य अभिप्रेत है, और तिरुवांकुर कोचीन के विधमान राज्य के संबंधमें नया केरल राज्य अभिप्रेत है;
(ङ) नए मुम्बई, मध्य प्रदेश, मैसूर, पंजाब या राजस्थान राज्य के संबंध में, “तत्स्थानी राज्य" से उसी नाम का विद्यमान राज्य अभिप्रेत है, और नए केरल राज्य के संबंध में, विद्यमान तिरुवांकुर-कोचीन राज्य अभिप्रेत है;
(च) “निर्वाचन आयोग" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 324 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है;
(छ) “विद्यमान राज्य" से इस अधिनियम के प्रारम्भ पर संविधान की प्रथम अनुसूची में विनिर्दिष्ट कोई राज्य अभिप्रेत है;
(ज) “विधि" के अन्तर्गत भारत के संपूर्ण राज्यक्षेत्र में या उसके किसी भाग में विधि का बल रखने वाली कोई अधिनियमिति, अध्यादेश, विनियम, आदेश, उपविधि, नियम, स्कीम, अधिसूचना या अन्य लिखत भी हैं;
(झ) “नया राज्य" से भाग 2 के उपबंधों द्वारा बनाया गया *** राज्य अभिप्रेत है;
(ञ) “अधिसूचित आदेश" से राजपत्र में प्रकाशित आदेश अभिप्रेत है;
(ट) किसी विद्यमान राज्य के उत्तरवर्ती राज्यों के संबंध में, “जनसंख्या अनुपात" से ऐसा अनुपात अभिप्रेत है जिसे केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, उस अनुपात के रूप में विनिर्दिष्ट करे जिस अनुपात में उस विद्यमान राज्य की पूर्वगत जनगणना में अभिनिश्चित जनसंख्या को भाग 2 के उपबंधों के आधार पर विभिन्न उत्तरवर्ती राज्यों के बीच राज्यक्षेत्रीय रूप से वितरित किया जाता है;
(ठ) “विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(ड) “प्रधान उत्तरवर्ती राज्य" से अभिप्रेत है,-
(i) विद्यमान मुम्बई, मध्य प्रदेश, मद्रास या राजस्थान राज्य के संबंध में, उसी नाम का राज्य; और
(ii) विद्यमान हैदराबाद, मध्य भारत और तिरुवांकुर-कोचीन राज्यों के संबंध में, क्रमशः आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, और केरल राज्य;
(ढ) संसद् के या किसी राज्य के विधान-मंडल के दोनों सदनों में से किसी के संबंध में, आसीन सदस्य" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है, जो नियत दिन के ठीक पूर्व, उस सदन का सदस्य है;
(ण) किसी विद्यमान राज्य के संबंध में, उत्तरवर्ती राज्य" से ऐसा कोई राज्य अभिप्रेत है जिसे भाग 2 के उपबंधों द्वारा उस विद्यमान राज्य का संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसका कोई भाग अंतरित कर दिया गया है, और इसके अंतर्गत विद्यमान मद्रास राज्य के संबंध में, उक्त उपबंधों द्वारा राज्यक्षेत्रीय रूप से यथा परिवर्तित वह राज्य, तथा संघ भी हैं;
(त) “अंतरित राज्यक्षेत्र" से वे राज्यक्षेत्र अभिप्रेत हैं जो भाग 2 के उपबंधों द्वारा एक विद्यमान राज्य से अन्य विद्यमान राज्य को या नए राज्य को अंतरित कर दिए गए हैं;
(थ) “खजाना" के अंतर्गत उप-खजाना भी है; और
(द) किसी राज्य के किसी जिला, तालुक, तहसील या अन्य प्रादेशिक खण्ड के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह 1956 की जुलाई के प्रथम दिन को उस प्रादेशिक खण्ड में समाविष्ट क्षेत्र के प्रति निर्देश है ।
भाग 2
राज्यक्षेत्रीय परिवर्तन और नए राज्यों का बनाया जाना
3. हैदराबाद से आन्ध्र को राज्यक्षेत्र का अंतरण और नाम में परिवर्तन-(1) नियत दिन से आन्ध्र राज्य में-
(क) हैदराबाद, मैदक, निजामाबाद, करीमनगर, वरंगल, खम्मम, नलगोंडा और महबूबनगर के जिलों में;
(ख) रायचूर जिले के अलमपुर और गदवाल तालुकों तथा गुलबर्गा जिले के कोड़ंगल तालुक;
(ग) गुलबर्गा जिले के तांडूर तालुक;
(घ) बीदर जिले के जाहिराबाद तालुक (निरना अंचल को छोड़कर), बीदर तालुक के न्यालकल अंचल और नरायन खेड़ तालुक;
(ङ) नांदेड जिले के डेगलूर तालुक के बिचकोंडा और जुक्कल अंचलों;
(च) नांदेड जिले के मघोल तालुक के मघोल, भैंसा और कुबेर अंचलों; और
(छ) बोथ तालुक के इसलापुर अंचल, किंवात तालुक और रजुरा तालुक को छोड़कर, अदिलाबाद जिले,
में समाविष्ट राज्यक्षेत्र जोड़ दिया जाएगा और तब उक्त राज्यक्षेत्र विद्यमान हैदराबाद राज्य के भाग नहीं रहेंगे तथा आन्ध्र राज्य आन्ध्र प्रदेश राज्य कहलाएगा ।
(2) उपधारा (1) के खण्ड (ख), (ग), (घ), (ङ) और (च) में निर्दिष्ट राज्यक्षेत्र आन्ध्र प्रदेश राज्य में क्रमशः महबूबनगर, हैदराबाद, मैदक, निजामाबाद और अदिलाबाद जिलों में सम्मिलित होंगे और उनके भाग होंगे ।
4. तिरुवांकुर-कोचीन से मद्रास को राज्यक्षेत्र का अन्तरण-नियत दिन से, मद्रास राज्य में त्रिवेन्द्रम जिले के अंगस्त्यीश्वरम, तोवला, कलकुलम और विलवनकोड तालुकों और क्विलोन जिले के शेनकोट्टा तालुक में समाविष्ट राज्यक्षेत्र जोड़ दिया जाएगा, और तब-
(क) उक्त राज्यक्षेत्र विद्यमान तिरुवांकुर-कोचीन राज्य के भाग नहीं रहेंगे;
(ख) अंगस्त्यीश्वरम, तोवला, कलकुलम और विलवनकोड तालुकों में समाविष्ट राज्यक्षेत्रों से एक पृथक् जिला बनेगा जो मद्रास राज्य का कन्याकुमारी जिला कहलाएगा; और
(ग) शेनकोट्टा तालुक में समाविष्ट राज्यक्षेत्र मद्रास राज्य में तिरुनेलवेली जिले में सम्मिलित होंगे और उसका भाग होंगे ।
5. केरल राज्य का बनाया जाना-(1) नियत दिन से, एक नया *** राज्य बनाया जाएगा जो केरल राज्य कहलाएगा जिसमें निम्नलिखित राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, अर्थात् :-
(क) धारा 4 द्वारा मद्रास राज्य को अंतरित राज्यक्षेत्रों को छोड़कर तिरुवांकुर-कोचीन के विद्यमान राज्य के राज्यक्षेत्र;
(ख) निम्नलिखित में समाविष्ट राज्यक्षेत्र, अर्थात् :-
(i) लक्कादीव और मिनिकोय द्वीपों को छोड़कर मलाबार जिला; और
(ii) दक्षिण कन्नड़ जिले का कसरगोड तालुक,
और तब उक्त राज्यक्षेत्र क्रमशः तिरुवांकुर-कोचीन और मद्रास राज्य के भाग नहीं रहेंगे ।
(2) उपधारा (1) के खण्ड (ख) में विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्रों से एक पृथक् जिला बनेगा जो केरल राज्य का मलाबार जिला कहलाएगा ।
6. लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप-नियत दिन से एक [संघ राज्यक्षेत्र] बनाया जाएगा जो लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप कहलाएगा जिसमें मलाबार जिले के लक्कादीव और मिनिकोय द्वीप तथा दक्षिण कन्नड़ जिले के अमीनदीवी द्वीप समाविष्ट होंगे; और तब उक्त द्वीप विद्यमान मद्रास राज्य के भाग नहीं रहेंगे ।
7. नए मैसूर राज्य का बनाया जाना-(1) नियत दिन से, एक नया *** राज्य बनाया जाएगा जो मैसूर राज्य कहलाएगा जिसमें निम्नलिखित राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, अर्थात् :-
(क) विद्यमान मैसूर राज्य के राज्यक्षेत्र;
(ख) विद्यमान मुम्बई राज्य का बेलगांव जिला, चांदगढ़ तालुक को छोड़कर, और बीजापुर, धारवाड़ और कन्नड़ जिले;
(ग) विद्यमान हैदराबाद राज्य का गुलबर्गा जिला, कोंड़गल और तांदूर तालुकों को छोड़कर, रायचूर जिला, अलमपुर और गदवाल तालुकों को छोड़कर, और बीदर जिला, अहमदपुर, निलंगा और उदगीर तालुकों को छोड़कर, तथा धारा 3 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) में निर्दिष्ट भाग;
(घ) मद्रास राज्य का दक्षिण कन्नड़ जिला, कसरगोड़ तालुक और अमीनदीवी द्वीप को छोड़कर, तथा कोयम्बटूर जिले का कोलेगल तालुक; और
(ङ) विद्यमान कुर्ग राज्य के राज्यक्षेत्र,
और तब उक्त राज्यक्षेत्र क्रमशः विद्यमान मैसूर, मुम्बई, हैदराबाद, मद्रास और कुर्ग राज्यों के भाग नहीं रहेंगे ।
(2) विद्यमान कुर्ग राज्य में समाविष्ट राज्यक्षेत्र से एक पृथक् जिला बनेगा जो कुर्ग जिला कहलाएगा, और उक्त कोलेगल तालुक नए मैसूर राज्य के मैसूर जिले में सम्मिलित होगा और उसका भाग होगा ।
8. नए मुम्बई राज्य का बनाया जाना-(1) नियत दिन से, एक नया 2*** राज्य बनाया जाएगा जो मुम्बई राज्य कहलाएगा जिसमें निम्नलिखित राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, अर्थात् :-
(क) निम्नलिखित को छोड़कर विद्यमान मुम्बई राज्य के राज्यक्षेत्र, अर्थात् :-
(i) बीजापुर, धारवाड़ और कन्नड़ जिले तथा चांदगढ़ तालुक को छोड़कर बेलगांव जिला,
(ii) बनासकंठा जिले का आबू रोड़ तालुक;
(ख) विद्यमान हैदराबाद राज्य में के औरंगाबाद, परभनी, भीर और उस्मानाबाद जिले, बीदर जिले के अहमदपुर, निलंगा और उदगीर तालुक, नांदेड़ जिला (डेगलूर तालुक के बिचकोंडा और जुक्कल अंचलों तथा मचोल तालुक के मघोल, भैंसा और कुबेर अंचलों को छोड़कर) और अदिलाबाद जिले के बोथ तालुक का इस्लापुर अंचल, किंवात तालुक और रजुरा तालुक;
(ग) विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य के बुलढ़ाना, आकोला, अमरावती, यवतमाल, वर्धा, नागपुर, भंडारा और चांदा जिले,
(घ) विद्यमान सौराष्ट्र राज्य के राज्यक्षेत्र; और
(ङ) विद्यमान कच्छ राज्य के राज्यक्षेत्र,
और तब उक्त राज्यक्षेत्र क्रमशः विद्यमान मुम्बई, हैदराबाद, मध्य प्रदेश, सौराष्ट्र और कच्छ राज्य के भाग नहीं रहेंगे ।
(2) उक्त चान्दगढ़ तालुक कोहलापुर जिले में सम्मिलित हो जाएगा और उसका भाग बन जाएगा; उक्त अहमदपुर, निलंगा और उदगीर तालुक उस्मानाबाद जिले में सम्मिलित हो जाएंगे; और उनका भाग बन जाएंगे; उक्त बोथ तालुक का इस्लापुर अंचल, किंवत तालुक और रजुरा तालुक नांदेड़ जिले में सम्मिलित हो जाएंगे और उसका भाग बन जाएंगे तथा विद्यमान कच्छ राज्य में समाविष्ट राज्यक्षेत्र से एक अलग जिला बन जाएगा जो मुम्बई राज्य का कच्छ जिला कहलाएगा ।
9. नए मध्य प्रदेश राज्य का बनाया जाना-(1) नियत दिन से एक नया 2*** राज्य बनेगा जो मध्य प्रदेश राज्य कहलाएगा जिसमें निम्नलिखित राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, अर्थात् :-
(क) धारा 8 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) में उल्लिखित जिलों को छोड़कर, विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य के राज्यक्षेत्र;
(ख) मंदसौर जिले के भानपुरा तहसील के सुनेलटप्पा को छोड़कर विद्यमान मध्य भारत राज्य के राज्यक्षेत्र;
(ग) विद्यमान राजस्थान राज्य के कोटा जिले का सिरोंज उपखण्ड;
(घ) विद्यमान भोपाल राज्य के राज्यक्षेत्र; और
(ङ) विद्यमान विंध्य प्रदेश राज्य के राज्यक्षेत्र,
और तब उक्त राज्यक्षेत्र क्रमशः विद्यमान मध्य प्रदेश, मध्य भारत, राजस्थान, भोपाल और विंध्य प्रदेश राज्य के भाग नहीं रहेंगे ।
(2) उक्त सिरोंज उपखण्ड नए मध्य प्रदेश राज्य के भिलसा जिले में सम्मिलित होगा और उसका भाग होगा ।
10. नए राजस्थान राज्य का बनाया जाना-(1) नियत दिन से एक नया *** राज्य बनेगा जो राजस्थान राज्य कहलाएगा जिसमें निम्नलिखित राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, अर्थात् :-
(क) कोटा जिले के सिरोंज उपखण्ड को छोड़कर, विद्यमान राजस्थान राज्य के राज्यक्षेत्र;
(ख) विद्यमान अजमेर राज्य के राज्यक्षेत्र;
(ग) विद्यमान मुम्बई राज्य के बनासकंठा जिले का आबू रोड़ तालुक; और
(घ) विद्यमान मध्य भारत राज्य के मंदसौर जिले के भानपुरा तहसील का सुनेलटप्पा,
और तब उक्त राज्यक्षेत्र क्रमशः विद्यमान राजस्थान, अजमेर, मुम्बई और मध्य भारत राज्यों के भाग नहीं रहेंगे ।
(2) विद्यमान अजमेर राज्य में समाविष्ट राज्यक्षेत्र से एक पृथक् जिला बनेगा जो नए राजस्थान राज्य का अजमेर जिला कहलाएगा और उपधारा (1) के खण्ड (ग) और (घ) में निर्दिष्ट राज्यक्षेत्र नए राजस्थान राज्य के क्रमशः सिरोही और झालावाड़ जिलों में सम्मिलित होंगे और उसका भाग होंगे ।
11. नए पंजाब राज्य का बनाया जाना-नियत दिन से एक नया 1*** राज्य बनेगा जो पंजाब राज्य कहलाएगा जिसमें निम्नलिखित राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, अर्थात् :-
(क) विद्यमान पंजाब राज्य के राज्यक्षेत्र; और
(ख) विद्यमान पटियाला और ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन राज्य के राज्यक्षेत्र,
और तब उक्त राज्यक्षेत्र क्रमशः विद्यमान पंजाब और पटियाला और ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन के भाग नहीं रहेंगे ।
12. संविधान की प्रथम अनुसूची का संशोधन-नियत दिन से, संविधान की प्रथम अनुसूची में भाग क, भाग ख और भाग ग के स्थान पर निम्नलिखित भाग रखे जाएंगे, अर्थात् :-
भाग क
|
नाम |
राज्यक्षेत्र |
|
1.आन्ध्र प्रदेश |
वे राज्यक्षेत्र जो आन्ध्र राज्य अधिनियम, 1953 की धारा 3 की उपधारा (1) में तथा राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 3 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
2.असम |
वे राज्य जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले असम प्रांत, खासी राज्यों और असम जनजाति क्षेत्रों में समाविष्ट थे किन्तु वे राज्यक्षेत्र इसके अन्तर्गत नहीं हैं जो असम (सीमा परिवर्तन) अधिनियम, 1951 की अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
3.बिहार |
वे राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ के ठीक पहले या तो बिहार प्रांत में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित थे मानो वे उस प्रांत के भाग रहे हों । |
|
4.मुम्बई |
वे राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 8 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
5.केरल |
वे राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
नाम |
राज्यक्षेत्र |
|
6.मध्य प्रदेश |
वे राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 9 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
7.मद्रास |
वे राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले या तो मद्रास प्रांत में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित थे मानो कि वे इस प्रांत के भाग रहे हों और वे राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 4 में विनिर्दिष्ट हैं किन्तु वे राज्यक्षेत्र इसके अन्तर्गत नहीं हैं जो आन्ध्र राज्य अधिनियम, 1953 की धारा 3 की उपधारा (1) और धारा 4 की उपधारा (1) में और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 5 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) और धारा 6 और धारा 7 की उपधारा (1) के खण्ड (घ) में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
8.मैसूर |
वे राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 7 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
9.उड़ीसा |
वे राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले या तो उड़ीसा प्रांत में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित थे मानो कि वे उस प्रांत के भाग रहे हों । |
|
10.पंजाब |
वे राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 11 में विनिर्दिष्ट हैं । |
|
11.राजस्थान
|
वे राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 10 में उल्लिखित हैं । |
|
12.उत्तर प्रदेश |
वे राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले या तो संयुक्त प्रांत नाम से ज्ञात प्रांत में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित थे मानो वे उस प्रांत के भाग रहे हों । |
|
13.पश्चिमी बंगाल |
वे राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले या तो पश्चिमी बंगाल प्रांत में समाविष्ट थे या इस प्रकार प्रशासित थे मानो वे उस प्रांत के भाग रहे हों तथा वह चन्द्रनगर (विलयन) अधिनियम, 1954 की धारा 2 के खण्ड (ग) में यथा परिभाषित चन्द्रनगर का राज्यक्षेत्र । |
भाग ख
|
नाम |
राज्यक्षेत्र |
|
1.जम्मू-कश्मीर |
वह राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले जम्मू-कश्मीर के देशी राज्य में समाविष्ट था । |
भाग ग
|
नाम |
राज्यक्षेत्र |
|
1.दिल्ली |
वह राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले दिल्ली के मुख्यायुक्त प्रान्त में समाविष्ट था । |
|
2.हिमाचल प्रदेश |
वे राज्यक्षेत्र जो हिमाचल प्रदेश और विलासपुर (नया राज्य) अधिनियम, 1954 के प्रारम्भ से ठीक पहले हिमाचल प्रदेश और विलासपुर राज्यों में समाविष्ट थे । |
|
3.मणिपुर |
वह राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले इस प्रकार प्रशासित था मानो वह मणिपुर के नाम से ज्ञात मुख्यायुक्त प्रांत रहा हो । |
|
4.त्रिपुरा |
वह राज्यक्षेत्र जो इस संविधान के प्रारम्भ से ठीक पहले इस प्रकार प्रशासित था मानो वह त्रिपुरा के नाम से ज्ञात मुख्यायुक्त का प्रांत रहा हो । |
|
5.लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप |
वह राज्यक्षेत्र जो राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 की धारा 6 में विनिर्दिष्ट हैं ।" । |
13. राज्य सरकारों की व्यावृत्ति संबंधी शक्तियां-इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह नियत दिन के पश्चात् राज्य के किसी जिले या खण्ड के नाम, विस्तार और सीमाओं में परिवर्तन करने की राज्य सरकार की शक्ति पर प्रभाव डालती है ।
भाग 3
क्षेत्र और क्षेत्रीय परिषद्
14. [परिभाषाएं]-विधि अनुकूलन (सं० 1) आदेश, 1956 द्वारा निरसित ।
15. क्षेत्रीय परिषदों की स्थापना-नियत दिन से, निम्नलिखित पांच क्षेत्रों में से प्रत्येक क्षेत्र के लिए एक क्षेत्रीय परिषद् होगी, अर्थात् :-
(क) उत्तरी क्षेत्र जिसमें [हरियाणा, [पंजाब,] हिमाचल प्रदेश,] राजस्थान और जम्मू-कश्मीर राज्य तथा दिल्ली [और चण्डीगढ़] [संघ राज्यक्षेत्र] समाविष्ट होंगे;
(ख) केन्द्रीय क्षेत्र, जिसमें उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश राज्य समाविष्ट होंगे;
[(ग) पूर्वी क्षेत्र, जिसमें बिहार, पश्चिमी बंगाल [उड़ीसा, और सिक्किम] राज्य, समाविष्ट होंगे];
[(घ) पश्चिमी क्षेत्र, जिसमें गोवा, गुजरात और महाराष्ट्र राज्य तथा दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र समाविष्ट हैं; और]
(ङ) दक्षिणी क्षेत्र, जिसमें [आन्ध्र प्रदेश और तेलंगाना] [ [तमिलनाडु], [कनार्टक] और केरल] राज्य [तथा पांडिचेरी संघ राज्यक्षेत्र] समाविष्ट होंगे ।
16. परिषदों का गठन-(1) प्रत्येक क्षेत्र की क्षेत्रीय परिषद् में निम्नलिखित सदस्य होंगे, अर्थात् :-
(क) एक संघ मंत्री जो राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा;
(ख) क्षेत्र में सम्मिलित राज्यों में से प्रत्येक राज्य का मुख्यमंत्री और ऐसे प्रत्येक राज्य के दो अन्य मंत्री जो जम्मू-कश्मीर की दशा में सदरे रियासत द्वारा और किसी अन्य राज्य की दशा में राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे, और यदि किसी ऐसे राज्य में कोई मंत्रि-परिषद् नहीं है तो उस राज्य से तीन सदस्य, जो राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे;
(ग) जहां क्षेत्र में कोई 4[संघ राज्यक्षेत्र] सम्मिलित हैं वहां 7[ऐसे प्रत्येक राज्यक्षेत्र] में से अधिक से अधिक दो सदस्य जो राष्ट्रपति द्वारा नामनिर्देशित किए जाएंगे;
। । । । । । । । । । । ।
(2) क्षेत्रीय परिषद् के लिए उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन नामनिर्देशित संघ मंत्री उक्त परिषद् का अध्यक्ष होगा ।
(3) प्रत्येक क्षेत्र में सम्मिलित राज्यों के मुख्यमंत्री उस क्षेत्र की क्षेत्रीय परिषद् के उपाध्यक्ष के रूप में चक्रानुक्रम से कार्य करेंगे और उनमें से प्रत्येक एक बार में एक वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा :
परन्तु यदि उस अवधि के दौरान संबंधित राज्य में कोई मंत्रि-परिषद् नहीं है तो उस राज्य से ऐसा सदस्य, जो राष्ट्रपति द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित किया जाए, क्षेत्रीय परिषद् के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करेगा ।
(4) प्रत्येक क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय परिषद् में, उसे उसके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता देने के लिए निम्नलिखित व्यक्ति परामर्शदाता के रूप में रहेंगे, अर्थात् :-
(क) योजना आयोग द्वारा नामनिर्देशित एक व्यक्ति;
(ख) क्षेत्र में सम्मिलित राज्यों में से प्रत्येक राज्य की सरकार का मुख्य सचिव; और
(ग) क्षेत्र में सम्मिलित राज्यों में से प्रत्येक राज्य का विकास आयुक्त या उस राज्य की सरकार द्वारा नामनिर्देशित कोई अन्य अधिकारी ।
(5) क्षेत्रीय परिषद् के प्रत्येक परामर्शदाता को परिषद् के, या उसकी किसी ऐसी समिति के जिसमें उसे राज्य सदस्य नामित किया जाए, विचार-विमर्शों में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे परिषद् के या किसी ऐसी समिति के अधिवेशन में मत देने का अधिकार नहीं होगा ।
17. परिषद् के अधिवेशन-(1) प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद् का अधिवेशन ऐसे समय पर होगा जो परिषद् के अध्यक्ष द्वारा इस निमित्त नियत किया जाए, और इस धारा के अन्य उपबन्धों के अधीन रहते हुए, परिषद् अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार की बाबत प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगी जो वह, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, समय-समय पर अधिकथित करे ।
(2) प्रत्येक क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय परिषद् का अधिवेशन, सिवाय तब के जब उसके द्वारा अन्यथा अवधारित किया जाए, उस क्षेत्र में सम्मिलित राज्यों में चक्रानुक्रम से किया जाएगा ।
(3) परिषद् के अधिवेशन का सभापतित्व अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में उपाध्यक्ष, या अध्यक्ष या उपाध्यक्ष दोनों की अनुपस्थिति में, उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने बीच में से चुने गए किसी अन्य सदस्य द्वारा किया जाएगा ।
(4) क्षेत्रीय परिषद् के अधिवेशन में सभी प्रश्न उपस्थित सदस्यों के बहुमत द्वारा विनिश्चित किए जाएंगे और मत बराबर रहने की दशा में अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में सभापतित्व करने वाले किसी अन्य व्यक्ति का एक दूसरा या निर्णायक मत होगा ।
(5) क्षेत्रीय परिषद् के प्रत्येक अधिवेशन की कार्यवाहियां केन्द्रीय सरकार को और संबंधित प्रत्येक राज्य सरकार को भी भेजी जाएंगी ।
18. समितियां नियुक्त करने की शक्ति-(1) क्षेत्रीय परिषद्, अधिवेशन में पारित किए गए संकल्पों द्वारा, समय-समय पर अपने सदस्यों और परामर्शदाताओं की समितियां ऐसे कृत्यों के निर्वहन के लिए नियुक्त कर सकती है जो संकल्प में विनिर्दिष्ट किए जाएं और ऐसी किसी समिति के साथ या तो संघ के या राज्य के ऐसे मंत्रियों को और संघ के या राज्यों के कार्यकलाप के संबंध में सेवा कर रहे ऐसे अधिकारियों को सहयोजित कर सकती है जो परिषद् द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित किए जाएं ।
(2) उपधारा (1) के अधीन क्षेत्रीय परिषद् की किसी समिति के साथ सहयोजित व्यक्ति को समिति के विचार-विमर्श में भाग लेने का अधिकार होगा किनतु उसके अधिवेशनों में मत देने का अधिकार नहीं होगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त समिति अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार की बाबत प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगी जो क्षेत्रीय परिषद्, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, समय-समय पर अधिकथित करें ।
19. परिषद् के कर्मचारिवृन्द-(1) प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद् के अनुसचिवीय कर्मचारिवृन्द होंगे जिनमें एक सचिव, एक संयुक्त सचिव और ऐसे अन्य अधिकारी होंगे जिन्हें नियुक्त करना अध्यक्ष आवश्यक समझे ।
(2) ऐसी परिषद् में प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यों के मुख्य सचिवों में से प्रत्येक चक्रानुक्रम से परिषद् का सचिव होगा और एक बार में एक वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा ।
(3) परिषद् का संयुक्त सचिव उन अधिकारियों में से चुना जाएगा जो परिषद् में प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यों में से किसी राज्य की सेवा में नहीं हो और उसकी नियुक्ति अध्यक्ष द्वारा की जाएगी ।
20. परिषद् का कार्यालय-(1) प्रत्येक क्षेत्र के लिए क्षेत्रीय परिषद् का कार्यालय क्षेत्र के भीतर ऐसे स्थान पर स्थित होगा जो परिषद् द्वारा अवधारित किया जाए ।
(2) उक्त कार्यालय के प्रशासनिक व्यय, जिसमें परिषद् के सचिव से भिन्न अन्य अनुसचिवीय कर्मचारिवृन्द के सदस्यों को और उनके संबंध में देय वेतन और भत्ते आते हैं, केन्द्रीय सरकार द्वारा उस प्रयोजन के लिए संसद् द्वारा उपबंधित धनराशि में से वहन किए जाएंगे ।
21. परिषद् के कर्तव्य-(1) प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद् एक परामर्शदाता निकाय होगी और वह किसी ऐसे विषय पर विचार-विमर्श कर सकती है जिसमें उस परिषद् में प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यों में से कुछ का या सभी राज्यों का, अथवा संघ का तथा उस परिषद् में प्रतिनिधित्व करने वाले राज्यों में से एक या अधिक राज्यों का, सामान्य हित है और वह केन्द्रीय सरकार को और संबंधित प्रत्येक राज्य की सरकार को उस कार्रवाई की बाबत परामर्श देगी जो किसी ऐसे विषय में की जानी चाहिए ।
(2) विशिष्टतः और उपधारा (1) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, क्षेत्रीय परिषद् निम्नलिखित विषयों पर विचार-विमर्श कर सकती है और उनकी बाबत सिफारिश कर सकती है, अर्थात्-
(क) आर्थिक और सामाजिक आयोजन के क्षेत्र में कोई सामान्य हित का विषय;
(ख) सीमा विवादों, भाषायी अल्पसंख्यकों या अन्तरराज्यीय परिवहन से संबंधित कोई विषय; और
(ग) इस अधिनियम के अधीन राज्यों के पुनर्गठन से संबंधित,या उनसे कोई विषय; उद्भूत,
22. क्षेत्रीय परिषदों के संयुक्त अधिवेशन-(1) जहां किसी क्षेत्र की क्षेत्रीय परिषद् के समक्ष यह व्यपदेशन किया जाता है कि ऐसे किसी विषय पर, जिसमें उस क्षेत्र में सम्मिलित किसी राज्य का और किसी अन्य क्षेत्र या क्षेत्रों में सम्मिलित राज्यों में से एक या अधिक राज्यों का सामान्य हित है, संयुक्त अधिवेशन में विचार-विमर्श किया जाना चाहिए तो संबंधित क्षेत्रीय परिषदों के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वे :-
(क) ऐसे स्थान और समय पर अधिवेशन करें जो उसका अध्यक्ष, एक दूसरे से परामर्श करके, इस निमित्त नियत करे; और
(ख) उक्त विषय पर ऐसे संयुक्त अधिवेशन में विचार-विमर्श करें और संबंधित राज्य सरकारों को उस कार्रवाई की बाबत सिफारिश करें जो उस विषय में की जानी चाहिएं ।
(2) केन्द्रीय सरकार, क्षेत्रीय परिषदों के संयुक्त अधिवेशनों की प्रक्रिया को विनियमित करने के लिए नियम बना सकती है ।
भाग 4
विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व
राज्य सभा
23. संविधान की चतुर्थ अनुसूची का संशोधन-नियत दिन से, संविधान की चतुर्थ अनुसूची में, स्थान-सारणी के स्थान पर, निम्नलिखित सारणी रखी जाएगी, अर्थात् :-
स्थान-सारणी
1.आन्ध्र प्रदेश. . . . . . . 18
2.असम. . . . . . . 6
3.बिहार. . . . . . . 21
4.मुम्बई. . . . . . . 27
5.केरल. . . . . . . 9
6.मध्य प्रदेश. . . . . . . 16
7.मद्रास. . . . . . . 17
8.मैसूर. . . . . . . 12
9.उड़ीसा. . . . . . . 9
10.पंजाब. . . . . . . 11
11.राजस्थान. . . . . . . 10
12.उत्तर प्रदेश. . . . . . . 31
13.पश्चिम बंगाल. . . . . . . 14
14.जम्मू-कश्मीर. . . . . . . 4
15.दिल्ली. . . . . . . 1
16.हिमाचल प्रदेश. . . . . . . 1
[17.मणिपुर. . . . . . . 1
[18.त्रिपुरा. . . . . . __________
208"
__________
24. राज्य सभा में आसीन सदस्यों का आबंटन-(1) आन्ध्र राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले बारह आसीन सदस्यों के बारे में और हैदराबाद राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले ग्यारह आसीन सदस्यों में से ऐसे सदस्यों के बारे में जिन्हें सभापति, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वे आन्ध्र प्रदेश राज्य को आबंटित अठारह स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किए गए हैं ।
(2) तिरुवांकुर-कोचीन राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले छह आसीन सदस्यों में से ऐसे पांच सदस्यों के बारे में और मद्रास राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले अठारह आसीन सदस्यों में से ऐसे तीन सदस्यों के बारे में जिन्हें सभापति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वे केरल राज्य को आबंटित नौ स्थानों में से आठ स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किए गए हैं ।
(3) भोपाल, मध्य भारत और विन्ध्य प्रदेश राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले ग्यारह आसीन सदस्यों के बारे में और मध्य प्रदेश राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले बारह आसीन सदस्यों में से ऐसे पांच सदस्यों के बारे में, जिन्हें सभापति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वे नऐ मध्य प्रदेश राज्य को आबंटित सोलह स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किए गए हैं ।
(4) तिरुवांकुर-कोचीन राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले छह सदस्यों में से एक सदस्य के बारे में, जिसे सभापति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वह मद्रास राज्य को आबंटित एक स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किया गया है ।
(5) मैसूर राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले छह आसीन सदस्यों के बारे में और मुम्बई राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले सत्रह आसीन सदस्यों में से ऐसे चार सदस्यों के बारे में, और हैदराबाद राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले ग्यारह आसीन सदस्यों में से ऐसे दो सदस्यों के बारे में, जिन्हें सभापति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वे नए मैसूर राज्य को आबंटित बारह स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किए गए हैं ।
(6) विद्यमान पंजाब राज्य और पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन का प्रतिनिधित्व करने वाले ग्यारह आसीन सदस्यों के बारे में, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वे नए पंजाब राज्य को आबंटित ग्यारह स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किए गए हैं ।
(7) राजस्थान राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले नौ आसीन सदस्यों के बारे में और अजमेर तथा कुर्ग राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले आसीन सदस्यों के बारे में, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वे नऐ राजस्थान राज्य को आबंटित दस स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किए गए हैं :
परन्तु यदि राजस्थान राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले आसीन सदस्यों की संख्या नौ से कम है तो विद्यमान मुम्बई राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले आसीन सदस्यों में से ऐसे एक सदस्य के बारे में जिसे सभापति, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वह नए राजस्थान राज्य को आबंटित एक स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किया गया है ।
(8) सौराष्ट्र और कच्छ राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले पांच आसीन सदस्यों के बारे में और विद्यमान मुम्बई, हैदराबाद और मध्य प्रदेश राज्यों का प्रतिनिधित्व करने वाले ऐसे आसीन सदस्यों के बारे में जो उपधारा (1), (3), (5) और (7) के अधीन आन्ध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, मैसूर या राजस्थान राज्य को आबंटित नहीं किए गए हैं, नियत दिन से, यह समझा जाएगा कि वे नए मुम्बई राज्य को आबंटित सत्ताईस स्थान भरने के लिए सम्यक् रूप से निर्वाचित किए गए हैं ।
(9) इस धारा में सभापति" से राज्य सभा का सभापति अभिप्रेत है ।
25. रिक्तियों को भरने के लिए उप-निर्वाचन-नियत दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, केरल और मद्रास राज्यों को आबंटित स्थानों से नियत दिन को विद्यमान आकस्मिक रिक्तियों को भरने के लिए उप-निर्वाचन किए जाएंगे ।
26. सदस्यों की पदावधि-इस आशय से कि सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम एक तिहाई, 1958 के अप्रैल के दूसरे दिन निवृत्त हो जाएं, और तत्पश्चात् प्रत्येक द्वितीय वर्ष की समाप्ति पर निवृत्त होते जाएं, राष्ट्रपति आदेश द्वारा, धारा 25 के अधीन निर्वाचित सदस्यों की पदावधि की बाबत ऐसे उपबंध कर सकता है जैसे वह ठीक समझे तथा असीन सदस्यों में से किसी की पदावधि में ऐसे उपांतरण कर सकता है जैसे वह ठीक समझे ।
लोक सभा
27. विद्यमान सदन के बारे में उपबंध-भाग 2 में की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह विद्यमान लोक सभा के गठन या उसकी अवधि पर या उस सदन के किसी आसीन सदस्य के निर्वाचन-क्षेत्र के विस्तार पर प्रभाव डालती है ।
विधान सभा
28. गठन में परिवर्तन और आसीन सदस्यों का आबंटन-(1) जहां भाग 2 के उपबंधों के आधार पर किसी विद्यमान राज्य के किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र का संपूर्ण क्षेत्र किसी अन्य विद्यमान राज्य को अंतरित कर दिया जाता है या केरल राज्य से भिन्न किसी नए राज्य का भाग हो जाता है, तो-
(क) नियत दिन से, उस क्षेत्र के बारे में यह समझा जाएगा कि वह, यथास्थिति, ऐसे अन्य विद्यमान राज्य या ऐसे नए राज्य की विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजनों के लिए विधि द्वारा उपबंधित निर्वाचन-क्षेत्र बन गया है; और
(ख) उस निर्वाचन-क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले आसीन सदस्य के बारे में, नियत दिन, से यह समझा जाएगा कि वह उक्त विधान सभा के लिए उस निर्वाचन-क्षेत्र से निर्वाचित किया गया है और वह उस विधान सभा का, जिसका कि वह उस दिन से ठीक पूर्व सदस्य था, सदस्य नहीं रहेगा ।
(2) मद्रास राज्य में, उसके राज्यक्षेत्र के भीतर पूर्णतः या भागतः सम्मिलित ऐसे सभी निर्वाचन-क्षेत्रों का, जो नियत दिन को नए केरल राज्य का भाग हो गए हैं, प्रतिनिधित्व करने वाले आसीन सदस्य, उस दिन से, मद्रास की विधान सभा के सदस्य नहीं रहेंगे ।
(3) प्रथम अनुसूची के उपबन्ध उन सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का, जो उक्त अनुसूची में विनिर्दिष्ट हैं और जिनके भाग, भाग 2 के उपबंधों के आधार पर, किसी एक विद्यमान राज्य से दूसरे विद्यमान राज्य को या नए राज्य को अंतरित कर दिए जाते हैं, प्रतिनिधित्व करने वाले आसीन सदस्यों की बाबत लागू होंगे ।
(4) लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की धारा 27क के अधीन गठित कच्छ के लिए निर्वाचकगण के सदस्य, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र स्वयं में से आठ व्यक्तियों को अनुपाती प्रतिनिधित्व-पद्धति के अनुसार एकल संक्रमणीय मत द्वारा और ऐसी रीति में जो विहित की जाए, निर्वाचित किया जाएगा; और इस प्रकार निर्वाचित व्यक्तियों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे, नियत दिन से, मुम्बई की विधान सभा के लिए सम्पूर्ण कच्छ जिले को समाविष्ट करने वाले निर्वाचन-क्षेत्र से निर्वाचित किए गए हैं ।
(5) गवर्नमेंट आफ पार्ट सी स्टेट्स ऐक्ट, 1951 (1951 का 49) की धारा 42 के अधीन कच्छ राज्य के लिए गठित सलाहकार परिषद् के सदस्य का पद भारत सरकार के अधीन लाभ का पद घोषित किया जाता है जिसके कारण उसका धारक उपधारा (4) के अधीन निर्वाचित किए जाने के लिए या उस उपधारा में उपबंधित के अनुसार मुम्बई विधान सभा का सदस्य होने के लिए निरर्हित नहीं होगा ।
(6) अनुच्छेद 333 के अधीन आंग्ल भारतीय समुदाय का मध्य प्रदेश और मैसूर की विधान सभाओं में प्रतिनिधित्व करने के लिए नामनिर्देशित आसीन सदस्य, नियत दिन से, उन विधान सभाओं के सदस्य नहीं रहेंगे और उनके बारे में यह समझा जाएगा कि वे संबंधित राज्यपालों द्वारा तत्स्थानी नए राज्यों की विधान सभाओं के लिए उक्त अनुच्छेद के अधीन नामनिर्देशित किए गए हैं ।
29. आन्ध्र प्रदेश विधान सभा के निर्वाचनों के लिए विशेष उपबंध-जब आन्ध्र प्रदेश राज्य में लोक सभा के लिए सदस्य निर्वाचित करने के लिए अगला साधरण निर्वाचन किया जाए तब उन सभा निर्वाचन-क्षेत्रों को आबंटित स्थानों को भरने के लिए, जिन निर्वाचन-क्षेत्रों में उस राज्य को अंतरित राज्यक्षेत्र धारा 47 की उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट क्रम के अनुसार विभाजित किया गया है, निर्वाचन भी किए जाएंगे मानो वे स्थान रिक्त हो गए हों; और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) के अधीन नियत तारीख से जो कि वह तारीख होगी जिसके पूर्व उक्त निर्वाचन पूरे किए जाएंगे, सभी व्यक्ति, जो हैदराबाद की विधान सभा के आसीन सदस्य होने के कारण नियत दिन को इस अधिनियम की धारा 28 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन आन्ध्र प्रदेश की विधान सभा के सदस्य हो जाएं, ऐसे सदस्य नहीं रहेंगे ।
30. विधान सभाओं की अवधि-अनुच्छेद 172 के खण्ड (1) में निर्दिष्ट पांच वर्ष की अवधि, केरल के सिवाय ऐसे प्रत्येक नए राज्य की विधान सभा की दशा में जो धारा 28 के उपबंधों द्वारा गठित हुई है, उस तारीख को प्रारम्भ हुई समझी जाएगी जिस तारीख को वह तत्स्थानी राज्य की विधान सभा की दशा में वास्तविक रूप से प्रारम्भ हुई थी ।
31. अध्यक्ष और उपाध्यक्ष-(1) नियत दिन से और, केरल से भिन्न, किसी भी नए राज्य की विधान सभा के प्रथम अधिवेशन पर्यन्त, वे व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व तत्स्थानी राज्य की विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हैं, यदि वे नए राज्य की विधान सभा के सदस्य हैं तो, उस विधान सभा के क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होंगे ।
(2) नियत दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, आन्ध्र प्रदेश राज्य की विधान सभा उस सभा के दो सदस्यों को क्रमशः उसके अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के रूप में चुनेगी और जब तक वे इस प्रकार नहीं चुने जाते, वे व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान आन्ध्र राज्य की विधान सभा के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष हों, आंध्र प्रदेश राज्य की विधान सभा के क्रमशः अध्यक्ष और उपाध्यक्ष होंगे ।
32. प्रक्रिया के नियम-जब तक नए राज्य की विधान सभा द्वारा अनुच्छेद 208 के खण्ड (1) के अधीन नियम नहीं बनाए जाते, तब तक नियत दिन के ठीक पूर्व तत्स्थानी राज्य की विधान सभा की बाबत प्रवृत्त प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियम नए राज्य की विधान सभा के संबंध में ऐसे उपान्तरों और अनुकूलनों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे जैसे अध्यक्ष द्वारा उनमें किए जाएं ।
विधान परिषद्
33. मध्य प्रदेश विधान परिषद्-(1) ऐसी तारीख से, जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा नियत करे, नए मध्य प्रदेश राज्य के लिए एक विधान परिषद् होगी ।
(2) उक्त परिषद् में [नब्बे] स्थान होंगे जिनमें से,-
(क) अनुच्छेद 171 के खण्ड (3) के उपखण्ड (क), (ख) और (ग) में निर्दिष्ट निर्वाचन-मंडलों द्वारा निर्वाचित व्यक्तियों से भरे जाने वाले स्थानों की संख्याएं क्रमशः [31, 8 और 8] होंगी;
(ख) उक्त खण्ड के उपखण्ड (घ) के उपबंधों के अनुसार, विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित व्यक्तियों से भरे जाने वाले स्थानों की संख्या [31] होगी; और
(ग) उस खण्ड के उपखण्ड (ङ) के उपबंधों के अनुसार राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित व्यक्तियों से भरे जाने वाले स्थानों की संख्या 12 होगी ।
(3) राष्ट्रपति, [विधान परिषद् अधिनियम, 1957 (1957 का 37)] के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात् आदेश द्वारा-
(क) वे निर्वाचन-क्षेत्र अवधारित करेगा जिनमें उक्त नया राज्य अनुच्छेद 171 के खण्ड (3) के उपखण्ड (क), (ख) और (ग) में से प्रत्येक के अधीन, परिषद् के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए विभाजित किया जाएगा;
(ख) प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र का विस्तार अवधारित करेगा; और
(ग) प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र को आबंटित स्थानों की संख्या अवधारित करेगा ।
(4) [ऐसे प्रारम्भ] के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र इस धारा के उपबंधों और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) तथा लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) के उपबंधों के अनुसार, उक्त परिषद् का गठन करने के लिए कदम उठाए जाएंगे ।
। । । । ।
34. मुम्बई विधान परिषद्-(1) ऐसी तारीख से जो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा नियत करे, नए मुम्बई राज्य के लिए एक विधान परिषद् होगी ।
(2) [जब तक विधि द्वारा अन्यथा उपबन्धित नहीं किया जाताट तब तक उक्त परिषद्-
(क) विद्यमान मुम्बई राज्य की विधान परिषद् के बेलगांव (स्थानीय प्राधिकारी), बीजापुर (स्थानीय प्राधिकारी) और धारवाड़ (स्थानीय प्राधिकारी) निर्वाचन-क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले आसीन सदस्यों के सिवाय अन्य सभी आसीन सदस्यों से; और
(ख) धारा 8 की उपधारा (1) के खण्ड (ख), (ग), (घ), (ङ) में निर्दिष्ट राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले पच्चीस सदस्यों से, जो ऐसी रीति में चुने जाएंगे जो विहित की जाए,
मिलकर बनेगी ।
। । । । ।
35. मद्रास विधान परिषद्-(1) नियत दिन से, मद्रास विधान परिषद् में [50] स्थान होंगे जिनमें से :-
(क) अनुच्छेद 171 के खण्ड (3) के उपखण्ड (क), (ख) और (ग) में निर्दिष्ट निर्वाचन-मंडलों द्वारा निर्वाचित व्यक्तियों से भरे जाने वाले स्थानों की संख्याएं क्रमशः [ 16, 6 और 4] होगी;
(ख) उक्त खण्ड के उपखण्ड (घ) के उपबन्धों के अनुसार विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित व्यक्तियों से भरे जाने वाले स्थानों की संख्या 16 होगी; और
(ग) उस खण्ड के उपखण्ड (ङ) के उपबन्धों के अनुसार राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित व्यक्तियों से भरे जाने वाले स्थानों की संख्या 8 होगी ।
(2) नियत दिन से, परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन (मद्रास) आदेश, 1951, द्वितीय अनुसूची में निर्दिष्ट उपान्तरणों के अधीन रहते हुए, प्रभावी होगा, और उक्त आदेश में :-
(क) मद्रास राज्य के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ होगा कि धारा 4 द्वारा उस राज्य में जोडे़ गए क्षेत्र उसमें सम्मिलित हैं और धारा 5, धारा 6 या धारा 7 के आधार पर जो राज्यक्षेत्र उस राज्य का भाग नहीं रहेंगे वे उसमें से अपवर्जित हैं;
(ख) तिरुनेलवेली जिला के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ होगा कि धारा 4 द्वारा उस जिले में जोड़ा गया राज्यक्षेत्र उसमें सम्मिलित है; और
(ग) कोयम्बतूर जिला के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ होगा कि कोल्लेगल तालुक उसमें से अपवर्जित है ।
(3) पश्चिम तट (स्थानीय प्राधिकारी) निर्वाचन-क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले उक्त परिषद् के दो आसीन सदस्य, *** और विधान सभा के सदस्यों द्वारा निर्वाचित अठारह आसीन सदस्यों में से ऐसे दो सदस्य, जिन्हें उक्त परिषद् का सभापति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, उक्त परिषद् के सदस्य नहीं रहेंगे ।
(4) यदि नियत दिन के ठीक पूर्व, राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित आसीन सदस्यों की कुल संख्या नौ है तो उनमें से ऐसा एक सदस्य, जिसे राज्यपाल आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, नियत दिन से, उक्त परिषद् का सदस्य नहीं रहेगा ।
(5) उपधारा (3) द्वारा यथाउपबंधित के सिवाय, किसी ऐसे परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र का, जिसका विस्तार उपधारा (2) के आधार पर परिवर्तित कर दिया गया है, प्रतिनिधित्व करने वाले उक्त परिषद् के प्रत्येक आसीन सदस्य के बारे में यह समझा जाएगा कि वह इस प्रकार परिवर्तित उस निर्वाचन-क्षेत्र द्वारा उक्त परिषद् के लिए निर्वाचित किया गया है ।
(6) नियत दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, उक्त परिषद् में उस दिन विद्यमान रिक्तियों को भरने के लिए सब स्थानीय प्राधिकारी निर्वाचन-क्षेत्रों में उपनिर्वाचन किए जाएंगे ।
(7) इस आशय से कि उक्त परिषद् के सदस्यों में से यथाशक्य निकटतम एक तिहाई, 1958 की अप्रैल के 20 वें दिन निवृत होते जाएं, और तत्पश्चात् प्रत्येक द्वितीय वर्ष की समाप्ति पर निवृत्त होते जाएं, राज्यपाल, निर्वाचन आयोग से परामर्श करने के पश्चात्, आदेश द्वारा उपधारा (6) के अधीन निर्वाचित सदस्यों की पदावधि की बाबत ऐसे उपबन्ध कर सकता है जैसे वह ठीक समझे तथा आसीन सदस्यों में से किसी की पदावधि में ऐसे उपान्तरण कर सकता है जैसे वह ठीक समझे ।
36. मैसूर विधान परिषद्-(1) नियत दिन से, नए मैसूर राज्य के लिए एक विधान परिषद् होगी ।
(2) [जब तक विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित नहीं किया जाता,] उक्त परिषद्-
(क) विद्यमान मैसूर राज्य की विधान परिषद् के सब आसीन सदस्यों से, और
(ख) धारा 7 की उपधारा (1) के खण्ड (ख), (ग), (घ) और (ङ) में विनिर्दिष्ट राज्यक्षेत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले 12 सदस्यों से, जो ऐसी रीति से चुने जाएंगे जो विहित की जाएं,
मिलकर बनेगी ।
। । । । ।
37. पंजाब विधान परिषद्-(1) नियत दिन से, नए पंजाब राज्य के लिए एक विधान परिषद् होगी ।
(2) [जब तक विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित नहीं किया जाता], उक्त परिषद्,-
(क) विद्यमान पंजाब राज्य की विधान सभा के सब आसीन सदस्यों से; और
(ख) छह व्यक्तियों से, जो ऐसी रीति में, जो विद्यमान पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन राज्य की विधान परिषद् के सदस्यों द्वारा उन व्यक्तियों में से, जो उक्त सभा के सदस्य नहीं हैं, निर्वाचित किए जाएं,
मिलकर बनेगी ।
। । । । ।
38. सभापति और उपसभापति-नियत दिन से और, यथास्थिति, नए मुम्बई, मैसूर या पंजाब राज्य की विधान परिषद् के प्रथम अधिवेशन पर्यन्त, वे व्यक्ति जो नियत दिन से ठीक पूर्व तत्स्थानी राज्य की विधान परिषद् के सभापति और उपसभापति हैं, परिषद् के क्रमशः सभापति और उपसभापति होंगे ।
39. प्रक्रिया के नियम-जब तक नए मुम्बई, मैसूर या पंजाब राज्य की विधान परिषद् द्वारा अनुच्छेद 208 के खण्ड (1) के अधीन नियम नहीं बनाए जाते तब तक नियत दिन के ठीक पूर्व तत्स्थानी राज्य की विधान परिषद् की बाबत प्रवृत्त प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियम नए राज्य की विधान परिषद् के सम्बन्ध में ऐसे उपान्तरों और अनुकूलनों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगे जैसे सभापति द्वारा उनमें किए जाएं ।
निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन
40. लोक सभा में स्थानों का आबंटन और राज्य विधान सभाओं को स्थानों का समनुदेशन-परिसीमन आयोग द्वारा परिसीमन अयोग अधिनियम, 1952 (1952 का 81) के अधीन (जिन्हें इस भाग में इसके पश्चात् क्रमशः भूतपूर्व आयोग और पूर्वतर अधिनियम कहा गया है) लोक सभा में प्रत्येक राज्य को आबंटित स्थानों की संख्या और प्रत्येक भाग क राज्य तथा जम्मू-कश्मीर से भिन्न प्रत्येक ख राज्य की विधान सभाओं को समनुदेशित स्थानों की संख्या तृतीय अनुसूची में दिखाए गए के अनुसार उपांतरित की जाएगी ।
41. अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति आदेशों का उपांतरण-राष्ट्रपति इस अधिनियम के आरम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, संविधान (अनुसूचित जातियां) आदेश, 1950, संविधान (अनुसूचित जातियां) (भाग ग राज्य) आदेश, 1951, संविधान (अनुसूचित जनजातियां) आदेश, 1950 और संविधान (अनुसूचित जनजातियां) (भाग ग राज्य) आदेश, 1951 में, आदेश द्वारा ऐसे उपांतरण करेंगे जैसे वे भाग 2 के उपबंधों के अधीन राज्यक्षेत्रीय परिवर्तनों और नए राज्यों के गठन को ध्यान में रखते हुए ठीक समझें ।
42. अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या का अवधारण-(1) उक्त आदेशों के इस प्रकार उपांतरित हो जाने के पश्चात् आन्ध्र प्रदेश, मुम्बई, केरल, मध्य प्रदेश, मद्रास, मैसूर, पंजाब और राजस्थान राज्यों में से प्रत्येक में, नियत दिन से, समाविष्ट राज्यक्षेत्र में अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों की पूर्वगत जनगणना के अनुसार जनसंख्या जनगणना प्राधिकारी द्वारा ऐसी रीति में निश्चित या प्राक्कलित की जाएगी जैसी कि विहित की जाए और उस प्राधिकारी द्वारा राजपत्र में अधिसूचित की जाएगी ।
(2) जनसंख्या के ऐसे अधिसूचित आंकड़े पूर्वगत जनगणना में निश्चित सुसंगत जनसंख्या आंकड़े माने जाएंगे और पूर्व प्रकाशित किन्हीं भी आकड़ों को अतिष्ठित करेंगे ।
43. परिसीमन आयोग का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र एक आयोग गठित करेगी जो परिसीमन आयोग कहलाएगा और वह निम्नलिखित तीन सदस्यों से मिलकर बनेगा :-
(क) केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाने वाले दो सदस्य, जिनमें से प्रत्येक ऐसा व्यक्ति होगा जो उच्चतम न्यायालय का या किसी उच्च न्यायालय का न्यायाधीश है; और
(ख) मुख्य निर्वाचन आयुक्त, पदेन सदस्य ।
(2) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन नियुक्त किए गए सदस्यों में से एक को आयोग के अध्यक्ष के रूप में नामनिर्देशित करेगी ।
44. आयोग के कर्तव्य-आयोग का यह कर्तव्य होगा कि वह-
(क) लोक सभा में और राज्य की विधान सभा में, धारा 42 में उल्लिखित राज्यों में से प्रत्येक राज्य की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए, उस धारा के अधीन अधिसूचित जनसंख्या आंकड़ों के आधार पर और संविधान और इस अधिनियम के सुसंगत उपबन्धों को ध्यान में रखते हुए, लोक सभा और राज्य की विधान सभा में स्थानों की संख्या, यदि कोई हों, अवधारित करे;
(ख) वे संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्र अवधारित करे जिनमें प्रत्येक नया राज्य विभाजित किया जाएगा और उक्त निर्वाचन-क्षेत्रों का विस्तार, ऐसे प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र को आबंटित स्थानों की संख्या, ऐसे प्रत्येक निर्वाचन-क्षेत्र में राज्य की अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित रखे जाने वाले स्थानों की संख्या, यदि कोई हो, अवधारित करे;
(ग) पूर्वतर अधिनियम की धारा 8 के अधीन किए गए भूतपूर्व आयोग के किन्हीं आदेशों को पुनरीक्षित या रद्द करे जिससे कि, संविधान और इस अधिनियम के उपबन्धों को ध्यान में रखते हुए, सभी संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के समुचित परिसीमन के लिए उपबन्ध किया जा सके ।
45. सहयुक्त सदस्य-(1) आयोग की धारा 44 के खण्ड (ख) के अधीन उसके कृत्यों के पालन में सहायता देने के प्रयोजन के लिए आयोग प्रत्येक नए राज्य की बाबत ऐसे पांच व्यक्तियों को सहयुक्त करेगा जो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे और जो ऐसे व्यक्ति होंगे जो या तो लोक सभा के या विद्यमान राज्य की विधान सभा के सदस्य हैं :
परन्तु जहां तक व्यवहार्य हो ऐसे व्यक्ति उन सदस्यों में से चुने जाएंगे जो नए राज्य के राज्यक्षेत्र के किसी भाग में निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन में भूतपूर्व आयोग के साथ सहयुक्त थे ।
(2) सहयुक्त सदस्यों में से किसी को मत देने का या आयोग के किसी विनिश्चय पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा ।
46. आकस्मिक रिक्तियां-यदि अध्यक्ष का पद या किसी सदस्य या सहयुक्त का पद उसकी मृत्यु या पदत्याग के कारण रिक्त हो जाता है तो वह केन्द्रीय सरकार द्वारा यथाशक्य शीघ्रता से, यथास्थिति, धारा 43 और धारा 45 के उपबन्धों के अनुसार भरा जाएगा ।
47. परिसीमन संबंधी प्रक्रिया-(1) पूर्वतर अधिनियम की धारा 7 के उपबन्ध आयोग के सम्बन्ध में ऐसे लागू होंगे जैसे वे भूतपूर्व आयोग के सम्बन्ध में लागू थे; और धारा 44 के खण्ड (ख) और (ग) में निर्दिष्ट बातों का अवधारण करने में आयोग, पूर्वतर अधिनियम की धारा 8 की उपधारा (2) के खंड (क) से लेकर (ङ) तक के खण्डों में अन्तर्विष्ट उपबंधों को ध्यान में रखेगा ।
(2) धारा 44 में निर्दिष्ट सब बातों का अवधारण करने के पश्चात् आयोग एक आदेश तैयार करेगा जो संसदीय और सभा निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन आदेश, 1956 के नाम से ज्ञात होगा; और उसकी अधिप्रमाणीकृत प्रतियां केन्द्रीय सरकार को और राज्य सरकारों में से हर एक को भेजेगा और तदुपरि वह आदेश भूतपूर्व आयोग द्वारा किए गए सब आदेशों को अतिष्ठित करेगा और विधि का पूरा बल रखेगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
(3) उक्त आदेश के केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार द्वारा प्राप्त किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र वह, यथास्थिति, लोक सभा के या राज्य की विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।
(4) उपधारा (5) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, लोक सभा में या राज्य की विधान सभा में विभिन्न निर्वाचन-क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व का पुनः समायोजन और उन निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन, जो उक्त आदेश में उपबंधित किया गया है, यथास्थिति, लोक सभा के लिए या राज्य की विधान सभा के लिए हर निर्वाचन के सम्बन्ध में, जो नियत दिन के पश्चात् किया जाए, लागू होगा और किसी अन्य विधि में अंतर्विष्ट उपबन्धों को अतिष्ठित करते हुए लागू होगा ।
(5) इस धारा की कोई बात लोक सभा में या किसी राज्य की विधान सभा में प्रतिनिधित्व पर तब तक प्रभाव नहीं डालेगी जब तक कि, यथास्थिति, उस सदन या सभा का जो नियत दिन को, विद्यमान हो या अस्तित्व में लाई गई हो, विघटन नहीं हो जाता ।
(6) उक्त आदेश की तारीख से छह मास के भीतर किसी समय, उसमें पाई गई कोई मुद्रण सम्बन्धी भूल और किसी आकस्मिक भूल या लोप से उसमें उद्भूत कोई अन्य गलती मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा भारत के राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ठीक की जा सकेगी ।
48. कतिपय निर्वाचनों संबंधी विशेष उपबंध-जहां नियत दिन को प्रारम्भ होने वाले वर्ष के दौरान, नए या पुनर्गठित राज्य को राज्य सभा में आबंटित किसी स्थान या स्थानों को, या ऐसे राज्य की विधान सभा या विधान परिषद् में, यदि कोई है, किसी स्थान या स्थानों को भरने के लिए कोई निर्वाचन किया जाता है तो कोई भी व्यक्ति जो किसी भी संबंधित राज्य में संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र या सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए तत्समय निर्वाचक है, लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की, यथास्थिति, धारा 3 की उपधारा (1), धारा 5 के खण्ड (ग) या धारा 6 की उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, यथास्थिति, उस नए या पुनर्गठित राज्य के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र या सभा निर्वाचन-क्षेत्र के लिए निर्वाचक समझा जाएगा :
स्पष्टीकरण-इस धारा में “नया या पुनर्गठित राज्य" से निम्नलिखित सारणी के प्रथम स्तम्भ में विनिर्दिष्ट राज्यों में से कोई राज्य अभिप्रेत है और, नए या पुनर्गठित राज्य के संबंध में, “संबंधित राज्य" से द्वितीय स्तम्भ में नए या पुनर्गठित राज्य के सामने विनिर्दिष्ट राज्य अभिप्रेत हैं ।
|
नया या पुनर्गठित राज्य |
संबंधित राज्य |
|
1.आंध्र प्रदेश |
मुम्बई और मैसूर |
|
2.मुम्बई |
आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश और मैसूर |
|
3.केरल |
मद्रास |
|
4.मध्य प्रदेश |
मुम्बई |
|
5.मद्रास |
केरल और मैसूर |
|
6.मैसूर |
आंध्र प्रदेश, मुम्बई और मद्रास । |
भाग 5
उच्च न्यायालय
49. नए राज्यों के लिए उच्च न्यायालय-(1) नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान मुम्बई, मध्य प्रदेश और पंजाब राज्यों की बाबत अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय, नियत दिन से, क्रमशः नए मुम्बई, मध्य प्रदेश और पंजाब राज्यों के लिए उच्च न्यायालय समझे जाएंगे ।
(2) नियत दिन से, नए केरल, मैसूर और राजस्थान राज्यों में से प्रत्येक के लिए एक उच्च न्यायालय स्थापित किया जाएगा ।
50. कतिपय न्यायालयों का उत्सादन-(1) नियत दिन से, जम्मू-कश्मीर के सिवाय सब विद्यमान भाग ख राज्यों के उच्च न्यायालय और अजमेर, भोपाल, कच्छ और विंध्य प्रदेश के लिए न्यायिक आयुक्तों के न्यायालय कार्य नहीं करेंगे और उन्हें इस अधिनियम द्वारा उत्सादित किया जाता है ।
(2) उपधारा (1) की कोई बात उस उपधारा द्वारा उत्सादित न्यायालयों में से किसी के द्वारा उस न्यायालय को तत्समय प्रवृत्त शक्तियों के अधीन, नियत दिन के पूर्व तामील की गई किसी सूचना, जारी किए गए किसी व्यादेश, दिए गए किसी निदेश या की गई किन्हीं कार्यवाहियों के प्रवृत्त रहने के प्रतिकूल नहीं होगी या उस पर प्रभाव नहीं डालेगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन उत्सादित उच्च न्यायालय का प्रत्येक ऐसा न्यायाधीश जिसे राष्ट्रपति, भारत के मुख्य न्यायाधिपति से परामर्श करने के पश्चात्, नियत दिन के पूर्व किए गए आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे, उस दिन से जो राष्ट्रपति द्वारा उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसे उच्च न्यायालय का न्यायाधीश अथवा, यदि ऐसा विनिर्दिष्ट किया जाए तो, मुख्य न्यायाधिपति, हो जाएगा ।
51. नए राज्यों के उच्च न्यायालयों के प्रधान स्थान और बैठक करने के अन्य स्थान-(1) किसी नए राज्य के लिए उच्च न्यायालय का प्रधान स्थान ऐसे स्थान पर होगा जो राष्ट्रपति, अधिसूचित आदेश द्वारा, नियत करे ।
(2) राष्ट्रपति किसी भी नए राज्य के राज्यपाल और उस राज्य के लिए उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति से परामर्श करने के पश्चात्, अधिसूचित आदेश द्वारा, उस राज्य के भीतर उच्च न्यायालय के प्रधान स्थान से भिन्न, एक या अधिक स्थानों पर उस उच्च न्यायालय के एक या अधिक स्थायी न्यायपीठों की स्थापना के लिए तथा उससे संबंधित किन्हीं अन्य विषयों के लिए उपबंध कर सकते हैं ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, किसी नए राज्य के उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और खण्ड न्यायालय उस राज्य में ऐसे अन्य स्थान या स्थानों पर बैठक कर सकते हैं जैसे या जिन्हें मुख्य न्यायाधिपति राज्यपाल के अनुमोदन से, नियत करे ।
52. नए राज्यों के उच्च न्यायालयों की आधिकारिता-नए राज्य के उच्च न्यायालय को उस नए राज्य में सम्मिलित राज्य-क्षेत्रों में से किसी भाग की बाबत सभी ऐसी आरम्भिक, अपीली और अन्य अधिकारिता होगी जो किसी विद्यमान राज्य के उच्च न्यायालय या न्यायिक आयुक्त के न्यायालय द्वारा उक्त राज्यक्षेत्रों के उस भाग के बारे में, नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि के अधीन, प्रयोक्तव्य है ।
53. अधिवक्ताओं, आदि को दर्ज करने की शक्ति-(1) नए राज्य के उच्च न्यायालय को अधिवक्ताओं और अटर्नियों को अनुमोदित करने, स्वीकृत करने, दर्ज करने, हटाने और निलंबित करने तथा अधिवक्ताओं और अटर्नियों की बाबत नियम बनाने की वही शक्तियां होंगी जो तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा, नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि के अधीन, प्रयोक्तव्य हैं ।
(2) नए राज्य के उच्च न्यायालय में सुनवाई का अधिकार वैसे ही सिद्धांतों के अनुसार विनियमित होगा जो तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय में सुनवाई के अधिकार की बाबत, नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि के अधीन, प्रवृत्त हैं :
परन्तु इस धारा द्वारा प्रदत्त शक्ति का प्रयोग करते हुए किसी नए राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए किसी नियम या दिए गए किसी निर्देश के अधीन रहते हुए, किसी व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व, नए राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट किसी उच्च न्यायालय या न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय करने या अटर्नी के रूप में कार्य करने का हकदार है, उस नए राज्य के उच्च न्यायालय में, यथास्थिति, अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय करने या अटर्नी के रूप में कार्य करने के हकदार अधिवक्ता या अटर्नी के रूप में मान्यता दी जाएगी ।
54. पद्धति और प्रक्रिया-इस भाग के उपबंधों के अधीन रहते हुए तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय में नियत दिन के ठीक पूर्व पद्धति और प्रक्रिया की बाबत प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, नए राज्य के उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी, और तदनुसार नए राज्य के उच्च न्यायालय को पद्धति और प्रक्रिया की बाबत नियम और आदेश बनाने की सभी ऐसी शक्तियां प्राप्त होंगी जो तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा नियत दिन के ठीक पूर्व प्रयोक्तव्य हैं :
परन्तु वे नियम या आदेश जो तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय में नियत दिन के ठीक पूर्व पद्धति और प्रक्रिया की बाबत प्रवृत्त हैं, जब तक नए राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए नियमों या आदेशों द्वारा उनमें फेरफार या उनका प्रतिसंहरण न किया जाए तब तक, नए राज्य के उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया के संबंध में, आवश्यक उपांतरों सहित लागू होंगे मानो वे उस न्यायालय द्वारा ही बनाए गए हों ।
55. उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा-तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा की बाबत नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, नए राज्य के उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा की बाबत लागू होगी ।
56. रिटों और अन्य आदेशिकाओं का प्ररूप-तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों और अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप की बाबत नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, नए राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों या अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप की बाबत लागू होगी ।
57. न्यायाधीशों की शक्तियां-तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति, एकल न्यायाधीशों और खण्ड न्यायालयों की शक्तियों के संबंध में और उन शक्तियों के प्रयोग के आनुषंगिक सभी विषयों की बाबत नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, नए राज्य के उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।
58. उच्चतम न्यायालय को अपीलों के बारे में प्रक्रिया-तत्स्थानी राज्य के उच्च न्यायालय और उसके न्यायाधीशों और खण्ड न्यायालयों से उच्चतम न्यायालय को अपीलों से संबंधित, नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरों सहित, नए राज्य के उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।
59. मुम्बई उच्च न्यायालय को कार्यवाहियों का अंतरण-(1) इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, नागपुर स्थित उच्च न्यायालय को (जो नियत दिन से नए मध्य प्रदेश राज्य का उच्च न्यायालय हो जाएगा और जिसे इस अधिनियम में मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय कहा गया है), उसी दिन से, विद्यमान मध्य प्रदेश राज्य से नए मुम्बई राज्य को अंतरित राज्यक्षेत्र की बाबत कोई अधिकारिता नहीं होगी ।
(2) नियत दिन के ठीक पूर्व नागपुर स्थित उच्च न्यायालय या हैदराबाद उच्च न्यायालय में लंबित ऐसी कार्यवाहियां जो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा, वादहेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित की गई है कि ऐसी कार्यवाहियां नए मुम्बई राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा (जिसे इस अधिनियम में मुम्बई उच्च न्यायालय कहा गया है) सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिए, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र मुम्बई उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी जाएंगी ।
(3) नियत दिन के ठीक पूर्व सौराष्ट्र उच्च न्यायालय या कच्छ के लिए न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में लंबित सब कार्यवाहियां मुम्बई उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएंगी ।
(4) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, जहां किसी कार्यवाही में, नियत दिन के पूर्व, नागपुर स्थित उच्च न्यायालय द्वारा पारित किन्हीं आदेशों की बाबत कोई अनुतोष चाहा गया हो, वहां अपीलों, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदनों, पुनर्विलोकन के लिए आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों को ग्रहण करने, सुनने और निबटाने की अधिकारिता मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को होगी और मुम्बई उच्च न्यायालय को न होगी :
परन्तु यदि ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण किए जाने के पश्चात् उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत होता है कि वे मुम्बई उच्च न्यायालय को अंतरित की जानी चाहिएं तो वह आदेश देगा कि वे कार्यवाहियां इस प्रकार अंतरित की जाएं और तदुपरि ऐसी कार्यवाहियां तदनुसार अंतरित कर दी जाएंगी ।
(5) उपधारा (2) या उपधारा (3) के आधार पर मुम्बई उच्च न्यायालय को अंतरित कार्यवाहियों में उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी न्यायालय द्वारा नियत दिन के पूर्व किया गया कोई आदेश सभी प्रयोजनों के लिए केवल उस न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु मुम्बई उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा, और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनकी बाबत उस न्यायालय की अधिकारिता उपधारा (4) के आधार पर बनी रहती है, किया गया कोई आदेश सभी प्रयोजनों के लिए केवल उस उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु मुम्बई उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
60. केरल उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार और उसको कार्यवाहियों का अंतरण-(1) नियत दिन से केरल राज्य के लिए उच्च न्यायालय की (जिसे इस अधिनियम में केरल उच्च न्यायालय कहा गया है) अधिकारिता का विस्तार लक्कादीव, मिनिकोय और अमीनदीवी द्वीप [संघ राज्यक्षेत्र] पर होगा ।
(2) इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, मद्रास स्थित उच्च न्यायालय को नियत दिन से, उक्त 1[संघ राज्यक्षेत्र] की बाबत या मद्रास राज्य से केरल राज्य को अंतरित किसी राज्यक्षेत्र की बाबत कोई अधिकारिता नहीं होगी ।
(3) नियत दिन के ठीक पूर्व मद्रास स्थित उच्च न्यायालय में लंबित ऐसी कार्यवाहियां जो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा, वादहेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित की गई हैं कि ऐसी कार्यवाहियां केरल उच्च न्यायालय द्वारा सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिएं, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र केरल उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी जाएंगी ।
(4) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, जहां किसी कार्यवाही में, नियत दिन के पूर्व, मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा पारित किन्हीं आदेशों की बाबत कोई अनुतोष चाहा गया हो, वहां अपीलों, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदनों, पुनर्विलोकन के लिए आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों को ग्रहण करने, सुनने और निबटाने की अधिकारिता मद्रास स्थित उच्च न्यायालय को होगी और केरल उच्च न्यायालय को न होगी :
परन्तु यदि ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण किए जाने के पश्चात् उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत होता है कि वे केरल उच्च न्यायालय को अंतरित की जानी चाहिएं तो वह आदेश देगा कि वे कार्यवाहियां इस प्रकार अंतरित की जाएं और तदुपरि ऐसी कार्यवाहियां तदनुसार अंतरित कर दी जाएंगी ।
(5) मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा-
(क) उपधारा (3) के आधार पर केरल उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में, नियत दिन के पूर्व; अथवा
(ख) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में, जिनकी बाबत मद्रास स्थित उच्च न्यायालय की अधिकारिता उपधारा (4) के आधार पर बनी रहती है,
दिया गया कोई आदेश सभी प्रयोजनों के लिए, केवल मद्रास स्थित उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु केरल उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
(6) नियत दिन के पूर्व तिरुवांकुर-कोचीन उच्च न्यायालय में लंबित सभी कार्यवाहियां किन्तु उनसे भिन्न जो धारा 66 की उपधारा (2) के अधीन उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा प्रमाणित की गई हैं, केरल उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएंगी और तिरुवांकुर-कोचीन उच्च न्यायालय द्वारा किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में नियत दिन के पूर्व दिया गया कोई आदेश सभी प्रयोजनों के लिए केवल उसी उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु केरल उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
61. मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को कार्यवाहियों का अंतरण-(1) नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान राजस्थान राज्य के उच्च न्यायालय में लंबित ऐसी कार्यवाहियां जो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा, वाद हेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित की गई हैं कि ऐसी कार्यवाहियां मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय द्वारा सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिएं, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी जाएंगी ।
(2) नियत दिन के ठीक पूर्व मध्य भारत उच्च न्यायालय या भोपाल के लिए न्यायिक आयुक्त के न्यायालय या विन्ध्य प्रदेश के लिए न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में लंबित सब कार्यवाहियां मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएंगी ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी न्यायालय द्वारा नियत दिन के पूर्व दिया गया कोई आदेश सभी प्रयोजनों के लिए केवल उस न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु मध्य प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में प्रभावी होगा ।
62. मैसूर उच्च न्यायालय को कार्यवाहियों का अन्तरण-(1) इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, मुम्बई उच्च न्यायालय को और मद्रास स्थित उच्च न्यायालय को नियत दिन से, यथास्थिति, विद्यमान मुम्बई राज्य से या मद्रास राज्य से नए मैसूर राज्य को अंतरित किसी राज्यक्षेत्र की बाबत कोई अधिकारिता नहीं होगी ।
(2) नियत दिन के ठीक पूर्व हैदराबाद के उच्च न्यायालय में या मुम्बई या मद्रास स्थित उच्च न्यायालय में लंबित ऐसी कार्यवाहियां जो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा वाद हेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित की गई हैं कि ऐसी कार्यवाहियां नए मैसूर राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा (जिसे इस अधिनियम में मैसूर उच्च न्यायालय कहा गया है) सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिएं, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र मैसूर उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी जाएंगी ।
(3) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, जहां किसी कार्यवाही में, नियत दिन के पूर्व, मुम्बई या मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश की बाबत कोई अनुतोष चाहा गया हो, वहां अपीलों, उच्च न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदनों, पुनर्विलोकन के लिए आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों को ग्रहण करने, सुनने और निबटाने की अधिकारिता, यथास्थिति, मुम्बई उच्च न्यायालय या मद्रास उच्च न्यायालय को होगी और मैसूर उच्च न्यायालय को न होगी :
परन्तु यदि ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के मुम्बई या मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण किए जाने के पश्चात् उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत होता है कि वे मैसूर उच्च न्यायालय को अंतरित की जानी चाहिए तो वह आदेश देगा कि वे कार्यवाहियां इस प्रकार अंतरित की जाएं और तदुपरि ऐसी कार्यवाहियां तदनुसार अंतरित कर दी जाएंगी ।
(4) उपधारा (2) के आधार पर मैसूर उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में नियत दिन के पूर्व हैदराबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिया गया कोई आदेश, सभी प्रयोजनों के लिए, केवल हैदराबाद उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु मैसूर उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
(5) मुम्बई या मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा-
(क) उपधारा (2) के आधार पर मैसूर उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में नियत दिन के पूर्व, अथवा
(ख) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में जिनकी बाबत मुम्बई या मद्रास स्थित उच्च न्यायालय की अधिकारिता उपधारा (3) के आधार पर बनी रहती है,
दिया गया कोई आदेश, सभी प्रयोजनों के लिए केवल मुम्बई या मद्रास स्थित उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु मैसूर उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
(6) नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान मैसूर राज्य के उच्च न्यायालय में, लंबित सभी कार्यवाहियां मैसूर उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएंगी, और विद्यमान मैसूर राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में नियत दिन के पूर्व दिया गया कोई आदेश, सभी प्रयोजनों के लिए, केवल उस उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु मैसूर उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
63. पंजाब उच्च न्यायालय को कार्यवाहियों का अंतरण-(1) नियत दिन के ठीक पूर्व पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन के उच्च न्यायालय में लंबित सभी कार्यवाहियां नए पंजाब राज्य के लिए उच्च न्यायालय (जिसे इस अधिनियम में पंजाब उच्च न्यायालय कहा गया है) अंतरित हो जाएंगी ।
(2) पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन के उच्च न्यायालय द्वारा नियत दिन के पूर्व दिया गया कोई आदेश, सभी प्रयोजनों के लिए, केवल उस उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में नहीं अपितु पंजाब उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
64. राजस्थान उच्च न्यायालय को कार्यवाहियों का अंतरण-(1) मुम्बई उच्च न्यायालय को, नियत दिन से, विद्यमान मुम्बई राज्य से नए राजस्थान राज्य को अंतरित राज्यक्षेत्र की बाबत कोई अधिकारिता नहीं होगी ।
(2) नियत दिन के ठीक पूर्व मुम्बई स्थित उच्च न्यायालय या मध्य भारत उच्च न्यायालय में लंबित ऐसी कार्यवाहियां जो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा, वाद हेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित की गई हैं कि ऐसी कार्यवाहियां नए राजस्थान राज्य के उच्च न्यायालय द्वारा (जिसे इस अधिनियम में राजस्थान उच्च न्यायालय कहा गया है) सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिएं, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र राजस्थान उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी जाएंगी ।
(3) नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान राजस्थान राज्य के उच्च न्यायालय में लंबित सभी कार्यवाहियां किन्तु उनसे भिन्न जो धारा 61 की उपधारा (1) के अधीन प्रमाणित की गई हैं, और नियत दिन के ठीक पूर्व अजमेर के लिए न्यायिक आयुक्त के न्यायालय में लंबित सभी कार्यवाहियां, राजस्थान उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएंगी ।
(4) उपधारा (2) या उपधारा (3) के आधार पर राजस्थान उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी न्यायालय द्वारा नियत दिन के पूर्व दिया गया कोई आदेश, सभी प्रयोजनों के लिए, केवल उस न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु राजस्थान उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
65. आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय-(1) नियत दिन से,-
(क) विद्यमान आन्ध्र राज्य के उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार, विद्यमान हैदराबाद राज्य से उस राज्य को अंतरित संपूर्ण राज्यक्षत्रों पर होगा;
(ख) उक्त उच्च न्यायालय आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय कहलाएगा; और
(ग) उक्त उच्च न्यायालय का प्रधान स्थान हैदराबाद में होगा ।
(2) नियत दिन के ठीक पूर्व हैदराबाद उच्च न्यायालय में लंबित सभी कार्यवाहियां, किन्तु उनसे भिन्न जो धारा 59 की उपधारा (2) के अधीन या धारा 62 की उपधारा (2) के अधीन उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा प्रमाणित की गई हैं, आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएंगी ।
(3) उपधारा (2) के आधार पर, आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में हैदराबाद उच्च न्यायालय द्वारा नियत दिन के पूर्व दिया गया कोई आदेश, सभी प्रयोजनों के लिए, केवल हैदराबाद उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
(4) किसी व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व, हैदराबाद उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय करने का हकदार है नियत दिन से, आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने के लिए हकदार अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी जाएगी :
परन्तु यदि ऐसा कोई व्यक्ति, नियत दिन से एक वर्ष के भीतर, मुम्बई उच्च न्यायालय को या मैसूर उच्च न्यायालय को ऐसा आवेदन करता है कि उसे उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने के लिए हकदार अधिवक्ता के रूप में मान्यता दी जाए तो उसे ऐसी मान्यता दी जाएगी और ऐसी मान्यता दिए जाने पर वह आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने के लिए हकदार अधिवक्ता के रूप में मान्य नहीं रहेगा ।
66. मद्रास में जोड़े गए क्षेत्रों के लिए उच्च न्यायालय-(1) इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, नियत दिन से, मद्रास स्थित उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार तिरुवांकुर-कोचीन राज्य से मद्रास राज्य को अंतरित संपूर्ण राज्यक्षेत्रों पर होगा ।
(2) नियत दिन के ठीक पूर्व तिरुवांकुर-कोचीन उच्च न्यायालय में लंबित ऐसी कार्यवाहियां, जो उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा, वाद हेतुक के प्रोद्भूत होने के स्थान और अन्य परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, प्रमाणित की गई हैं कि ऐसी कार्यवाहियां मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा सुनी और विनिश्चित की जानी चाहिएं, ऐसे प्रमाणन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र मद्रास स्थित उच्च न्यायालय को अंतरित कर दी जाएंगी ।
(3) उपधारा (1) और (2) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इसमें इसके पश्चात् उपबंधित के सिवाय, जहां किसी कार्यवाही में, नियत दिन के पूर्व, तिरुवांकुर-कोचीन के उच्च न्यायालय द्वारा पारित किसी आदेश की बाबत कोई अनुतोष चाहा गया है, वहां अपीलों, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदनों, पुनर्विलोकन के लिए आवेदनों और अन्य कार्यवाहियों को ग्रहण करने, सुनने और निबटाने की अधिकारिता केरल उच्च न्यायालय को होगी और मद्रास स्थित उच्च न्यायालय को न होगी :
परन्तु यदि ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के केरल उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण किए जाने के पश्चात् उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति को यह प्रतीत होता है कि वे मद्रास स्थित उच्च न्यायालय को अंतरित की जानी चाहिएं तो वह आदेश देगा कि वे कार्यवाहियां इस प्रकार अंतरित की जाएं और तदुपरि ऐसी कार्यवाहियां तदनुसार अंतरित कर दी जाएंगी ।
(4) निम्नलिखित न्यायालयों द्वारा, अर्थात् :-
(क) उपधारा (2) के आधार पर मद्रास स्थित उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में नियत दिन के पूर्व तिरुवांकुर-कोचीन उच्च न्यायालय द्वारा, अथवा
(ख) किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों में जिनकी बाबत केरल उच्च न्यायालय की अधिकारिता उपधारा (3) के आधार पर बनी रहती है, केरल उच्च न्यायालय द्वारा,
दिया गया कोई आदेश, सभी प्रयोजनों के लिए केवल तिरुवांकुर-कोचीन उच्च न्यायालय या केरल उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में ही नहीं अपितु मद्रास स्थित उच्च न्यायालय के आदेश के रूप में भी प्रभावी होगा ।
(5) ऐसा कोई व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व तिरुवांकुर-कोचीन उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने के लिए हकदार अधिवक्ता है और जिसे मद्रास स्थित उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायाधिपति, तिरुवांकुर-कोचीन से मद्रास को राज्यक्षेत्रों के अंतरण को ध्यान में रखते हुए, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, मद्रास स्थित उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने के लिए हकदार अधिवक्ता के रूप में, मद्रास स्थित उच्च न्यायालय द्वारा बनाए गए किसी नियम या दिए गए किसी निदेश के अधीन रहते हुए, मान्य होगा ।
67. अन्य उच्च न्यायालयों को अंतरित कार्यवाहियों में हाजिर होने या कार्य करने का अभिदाय-किसी व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व किसी विद्यमान राज्य के लिए उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में विधि-व्यवसाय करने या अटर्नी के रूप में कार्य करने का हकदार है और जिसे इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी उपबंध के अधीन उस उच्च न्यायालय से किसी अन्य उच्च न्यायालय को अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में हाजिर होने या कार्य करने के लिए प्राधिकृत किया गया था, उन कार्यवाहियों के संबंध में, अन्य उच्च न्यायालय में, यथास्थिति, हाजिर होने या कार्य करने का अधिकार होगा ।
68. निर्वचन-धारा 59 से धारा 66 तक के प्रयोजनों के लिए,-
(क) कार्यवाहियां न्यायालय में तब तक लंबित समझी जाएंगी जब तक उस न्यायालय ने पक्षकारों के बीच के सभी विवाद्यकों को, जिनके अंतर्गत कार्यवाही के खर्चों के विनिर्धारण की बाबत विवाद्यक भी है, निपटा न दिया हो और इसके अन्तर्गत अपीलें, उच्चतम न्यायालय को अपील करने की इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के लिए आवेदन, पुनरीक्षण के लिए अर्जियांऔर रिट के लिए अर्जियां भी होंगी;
(ख) उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उसके न्यायाधीश या खण्ड न्यायालय के प्रति निर्देश भी हैं और न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा दिए गए किसी आदेश के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उनके अन्तर्गत उस न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा पारित या दिया गया दण्डादेश, निर्णय या डिक्री के प्रति निर्देश भी है ।
69. व्यावृत्तियां-इस भाग की किसी बात का प्रभाव संविधान के किन्हीं उपबन्धों के किसी नए राज्य के उच्च न्यायालय को लागू होने पर नहीं पड़ेगा तथा यह भाग किसी ऐसे उपबन्ध के अधीन रहते हुए प्रभावी होगा, जिसे ऐसा उपबन्ध करने की शक्ति रखने वाला कोई विधान-मंडल या अन्य प्राधिकारी नियत दिन को या उसके पश्चात् उस उच्च न्यायालय की बाबत बनाए ।
भाग 6
व्यय का प्राधिकरण
70. नए राज्यों के व्यय का प्राधिकरण-प्रत्येक नए राज्य की दशा में, तत्स्थानी राज्य का राज्यपाल या राज प्रमुख, नियत दिन से स्त्र्पूर्वऱ् किसी भी समय, नए राज्य की संचित निधि में से किसी अवधि के लिए, जो 31 मार्च, 1957 के बाद की न होगी, ऐसा व्यय जो वह आवश्यक समझे, प्राधिकृत कर सकता है :
परन्तु नए राज्य का राज्यपाल, नियत दिन के पश्चात्, राज्य की संचित निधि में से उक्त अवधि के लिए ऐसा और व्यय, जो वह आवश्यक समझे, प्राधिकृत कर सकता है ।
71. विद्यमान विनियोग अधिनियमों के अधीन अंतरित राज्यक्षेत्रों में व्यय के लिए धन का विनियोग-(1) नियत दिन से, उस दिन के पूर्व आंध्र या मद्रास राज्य के विधान-मण्डल द्वारा 1956-57 के वित्तीय वर्ष के किसी भाग की बाबत किसी व्यय को पूरा करने के लिए उस राज्य की संचित निधि में से किसी धन के विनियोग के लिए पारित अधिनियम उस राज्य में अंतरित राज्यक्षेत्र के संबंध में भी प्रभावी होगा, और ऐसे अधिनियम द्वारा, उस राज्य में किसी सेवा के लिए व्यय की जाने वाली प्राधिकृत रकम में से ऐसे अन्तरित राज्यक्षेत्र में किसी रकम का खर्च करना उस राज्य सरकार के लिए विधिपूर्ण होगा ।
(2) आंध्र प्रदेश या मद्रास का राज्यपाल, नियत दिन के पश्चात्, उस राज्य के अंतरित राज्यक्षेत्र में किसी प्रयोजन या सेवा के लिए, राज्य की संचित निधि में से किसी अवधि के लिए, जो 31 मार्च, 1957 के बाद की न होगी, ऐसा व्यय जो वह आवश्यक समझे, प्राधिकृत कर सकता है ।
72. कतिपय राज्यों के लेखाओं के संबंध में रिपोर्टें-(1) जहां भाग 2 के उपबन्धों द्वारा किसी विद्यमान राज्य का संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसका कोई भाग किसी अन्य विद्यमान राज्य को या किसी नए राज्य को अंतरित कर दिया जाता है वहां अनुच्छेद 151 के खण्ड (2) में निर्दिष्ट भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की, नियत दिन के पूर्व किसी अवधि की बाबत विद्यमान राज्य के लेखाओं से संबंधित रिपोर्ट ऐसे राज्य के या ऐसे राज्यों में से प्रत्येक के राज्यपाल को प्रस्तुत की जाएगी जो राष्ट्रपति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, और उन रिपोर्टों को तदुपरि राज्यपाल उस राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगा ।
(2) राष्ट्रपति आदेश द्वारा-
(क) वित्तीय वर्ष 1955-56 के दौरान या किसी पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान किसी सेवा पर, मुम्बई, मध्य प्रदेश या पंजाब या भाग ख या भाग ग राज्यों में से किसी राज्य की संचित निधि में से उपगत किसी व्यय को, जो उस सेवा के लिए और उस वर्ष के लिए अनुदत्त रकम के आधिक्य में हो, और जैसा कि उपधारा (1) में निर्दिष्ट रिपोर्टों में प्रकट हो, सम्यक् रूप से प्राधिकृत घोषित कर सकता है, तथा
(ख) उक्त रिपोर्टों से उठने वाले किसी विषय पर कोई कार्यवाही की जाने के लिए उपबंध कर सकता है ।
73. कतिपय राज्यों के राज्यपालों के भत्ते और विशेषाधिकार-जब तक संसद् अनुच्छेद 158 के खण्ड (3) के अधीन संसद् इस निमित्त उपबन्ध न करे आंध्र प्रदेश के या मद्रास के या प्रत्येक नए राज्य के राज्यपाल के भत्ते और विशेषाधिकार तब तक वे ही होंगे जो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, अवधारित करे ।
74. राजस्व का वितरण-(1) संघ उत्पाद-शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1953 (1953 का 3) की धारा 3 और संविधान (राजस्व वितरण) आदेश, 1953 के पैरा 3 और 5, वित्तीय वर्ष 1956-57 की बाबत ऐसे उपांतरित रूप में प्रभावी होंगे जो चौथी अनुसूची में उपवर्णित हैं ।
(2) तीन वित्तीय वर्षों, अर्थात्, 1957-58, 1958-59 और 1959-60 में से प्रत्येक की बाबत निम्नलिखित राज्यों को सहायता अनुदान के रूप में निम्नलिखित राशियां भारत की संचित निधि पर भारित की जाएंगी, अर्थात् :-
(क) मुम्बई राज्य के लिए उतनी रकम, यदि कोई है, जिससे उक्त अनुच्छेद 270 और 272 के अधीन उस राज्य को देय कुल रकम का 8.58 प्रतिशत 248.04 लाख रुपए से कम पड़े;
(ख) केरल राज्य के लिए उतनी रकम, यदि कोई है, जिससे उक्त अनुच्छेद के अधीन उस राज्य की देय कुल रकम का 61.91 प्रतिशत 232.38 लाख रुपए से कम पड़े;
(ग) मद्रास राज्य के लिए उतनी रकम, यदि कोई है, जिससे उक्त अनुच्छेद के अधीन उस राज्य को देय कुल रकम का 2.97 प्रतिशत 24.65 लाख रुपए से कम पड़े,
(घ) मैसूर राज्य के लिए उतनी रकम, यदि कोई है, जिससे उक्त अनुच्छेद के अधीन उस राज्य को देय कुल रकम का 46.75 प्रतिशत 289.80 लाख रुपए से कम पड़े ।
भाग 7
कतिपय भाग क और भाग ख राज्यों की आस्तियों और दायित्वों का प्रभाजन
75. भाग का लागू होना-इस भाग के उपबन्ध नियत दिन के ठीक पूर्व ऐसे प्रत्येक भाग क या भाग ख राज्य की आस्तियों और दायित्वों के प्रभाजन के संबंध में लागू होंगे जिनका संपूर्ण राज्यक्षेत्र या उसका कोई भाग, भाग 2 के उपबनधों के आधार पर, अन्य राज्य को अंतरित कर दिया जाता है, या [संघ राज्यक्षेत्र] हो जाता है और “विद्यमान राज्य" पद का तदनुसार यह अर्थ लगाया जाएगा कि उससे ऐसा कोई भाग क राज्य या भाग ख राज्य अभिप्रेत है ।
76. भूमि और माल-(1) इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी विद्यमान राज्यों की सब भूमि और सब सामान, वस्तुएं और अन्य माल-
(क) यदि वे विद्यमान राज्य के भीतर हैं तो उस उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगे जिसमें वे स्थित हैं; अथवा
(ख) यदि वे विद्यमान राज्यों के बाहर हैं तो उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगे या यदि ऐसे दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हों तो प्रधान उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगे :
परन्तु जहां दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हों और केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि किसी माल या किसी वर्ग के माल का वितरण माल के अवस्थान के अनुसार न होकर अन्यथा होना चाहिए वहां केन्द्रीय सरकार, माल के न्यायसंगत और साम्ियक वितरण के लिए ऐसे निदेश दे सकती है जैसे वह उचित समझे, और तदनुसार वह माल उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएगा ।
(2) किसी विद्यमान राज्य में किसी वर्ग का कोई अनिर्गमित सामान उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएगा, या यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं, तो, उनके बीच उसका विभाजन 31 मार्च, 1956 को समाप्त होने वाली तीन वर्ष की अवधि में उन उत्तरवर्ती राज्यों में से प्रत्येक में क्रमशः सम्मिलित विद्यमान राज्य के राज्यक्षेत्रों के लिए उस वर्ग के सामान के लिए भेजे गए कुल मांगपत्रों के अनुपात में किन्तु सम्पूर्ण विद्यमान राज्य के ऊपर अधिकारिता रखने वाले सचिवालय और विभागाध्यक्ष के कार्यालयों से संबंधित मांगपत्रों को अपवर्जित करते हुए किया जाएगा :
परन्तु इस उपधारा की कोई भी बात ऐसे सामान को लागू नहीं होगी जो विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए, जैसे कि विशिष्ट संस्थाओं, कर्मशालाओं या उपक्रमों या सन्निर्माणधीन विशेष संकर्मों में प्रयोग या उपयोग के लिए रखा गया है ।
(3) इस धारा में “भूमि" पद के अन्तर्गत प्रत्येक प्रकार की स्थावर संपत्ति और ऐसी संपत्ति में या, उस पर के कोई भी अधिकार हैं; तथा माल" पद में सिक्के, बैंक नोट तथा करेन्सी नोट नहीं आते ।
77. खजाना और बैंक बैंक अतिशेष-नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान राज्य के सभी खजानों की कुल रोकड़ बाकी और भारतीय रिजर्व बैंक के पास उस राज्य के जमा अतिशेषों का योग उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएगा, या, यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं तो, उनके बीच जनसंख्या के अनुपात के अनुसार विभाजित किया जाएगा :
परन्तु ऐसे विभाजन के प्रयोजन के लिए, रोकड़ बाकी किसी एक खजाने से दूसरे खजाने को अन्तरित नहीं की जाएगी और प्रभाजन भारतीय रिजर्व बैंक की बहियों में नियत दिन उत्तरवर्ती राज्यों के जमा अतिशेषों का समायोजन करके किया जाएगा :
परन्तु यह और कि यदि किसी उत्तरवर्ती राज्य का भारतीय रिजर्व बैंक में कोई खाता नहीं है तो समायोजन ऐसी रीति में किया जाएगा जैसी केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे ।
78. करों की बकाया-सम्पत्ति पर किसी कर या शुल्क की बकाया को, जिसमें भू-राजस्व की बकाया भी है, वसूल करने का अधिकार उसी उत्तरवर्ती राज्य को होगा जिसमें संपत्ति स्थित है, और किसी अन्य कर या शुल्क की बकाया को वसूल करने का अधिकार उस उत्तरवर्ती राज्य को होगा जिसके राज्यक्षेत्र में उस कर या शुल्क के निर्धारण का स्थान सम्मिलित है ।
79. उधारों और अग्रिमों की वसूली का अधिकार-(1) किसी विद्यमान राज्य द्वारा उस राज्य के भीतर किसी क्षेत्र में किसी स्थानीय निकाय, सोसाइटी, कृषक या अन्य व्यक्ति को नियत दिन के पूर्व दिए गए किन्हीं उधारों या अग्रिमों को वसूल करने का अधिकार उस उत्तरवर्ती राज्य को होगा जिसमें वह क्षेत्र सम्मिलित है ।
(2) किसी विद्यमान राज्य द्वारा उस राज्य के बाहर किसी व्यक्ति या संस्था को नियत दिन के पूर्व दिए गए किन्हीं उधारों या अग्रिमों को वसूल करने का अधिकार उत्तरवर्ती राज्य को होगा, या, यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं तो, प्रधान उत्तरवर्ती राज्य को होगा :
परन्तु जहां दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं वहां, ऐसे किसी उधार या अग्रिम की बाबत वसूल की गई किसी रकम का विभाजन सभी उत्तरवर्ती राज्यों के बीच जनसंख्या के अनुपात के अनुसार किया जाएगा ।
80. कतिपय निधियों में जमा-किसी विद्यमान राज्य की नकदी बकाया विनिधान खाते अथवा सहायता निधि और साधारण निधि में किए गए विनिधान और केन्द्रीय सड़क निधि में किसी विद्यमान राज्य के जमाखाते राशियां उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगी, या, यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं तो, उसका विभाजन उनके बीच जनसंख्या के अनुपात के अनुसार किया जाएगा; और किसी ऐसी विशेष निधि में के विनिधान, जिसके उद्देश्य किसी विद्यमान राज्य में किसी स्थानीय क्षेत्र तक ही सीमित हों, उस उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगे जिसमें वे क्षेत्र सम्मिलित हैं ।
81. राज्य उपक्रमों की आस्तियां और दायित्व-(1) किसी विद्यमान राज्य के किसी वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम से सम्बन्धित आस्तियां और दायित्व उस उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगे जिसमें वे उपक्रम स्थित हैं ।
(2) जहां किसी विद्यमान राज्य द्वारा किसी ऐसे वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम के लिए अवक्षयण आरक्षित निधि रखी गई हो, वहां उस निधि में से किए गए विनिधानों की बाबत धारित प्रतिभूतियां उस उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगी जिसमें वह उपक्रम स्थित है ।
82. लोक ऋण-(1) विद्यमान हैदराबाद राज्य का लोक ऋण जो उन उधारों के कारण हो जो सरकारी प्रतिभूतियां पुरोधृत करके लिया गया है और 1956 के अक्तूबर के 31वें दिन के ठीक पूर्व जनता को बकाया है, उसी दिन से संघ का ऋण हो जाएगा, और ऋण का ऐसा अन्तरण होते ही यह समझा जाएगा कि केन्द्रीय सरकार ने उस राज्य को इस प्रकार अंतरित ऋण के बराबर रकम का उधार, ब्याज और अदायगी की बाबत उन्हीं निबंधनों पर दिया है जो उस राज्य द्वारा लिए गए उधारों को लागू हैं ।
(2) किसी अन्य विद्यमान राज्य का लोक ऋण जो ऐसे उधारों के कारण हो जो सरकारी प्रतिभूतियां जारी करके लिया गया है और नियत दिन के ठीक पूर्व जनता को बकाया है, उसी दिन से उत्तरवर्ती राज्य का ऋण हो जाएगा या, यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं तो, उनमें से ऐसे एक राज्य का ऋण हो जाएगा जिसे केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और ऐसी दशा में-
(क) अन्य उत्तरवर्ती राज्य इस प्रकार विनिर्दिष्ट उत्तरवर्ती राज्य को ऋण की शोधन व्यवस्था और अदायगी के लिए, समय-समय पर देय राशियों के अपने अंशों के देनदार होंगे, और
(ख) उक्त अंशों के अवधारण के प्रयोजन के लिए, उत्तरवर्ती राज्यों के बीच ऋण का विभाजन इस प्रकार किया गया समझा जाएगा मानो वह उपधारा (3) में निर्दिष्ट ऋण हो ।
(3) नियत दिन के पूर्व, केन्द्रीय सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक या किसी अन्य बैंक से लिए गए उधारों के कारण किसी विद्यमान राज्य का लोक ऋण, जिसमें हैदराबाद की दशा में वह उधार भी आता है जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (1) के अधीन दिया गया समझा गया है, उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएगा, या, यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं तो, उसका विभाजन उन राज्यों के बीच उन उत्तरवर्ती राज्यों में से प्रत्येक में क्रमशः सम्मिलित किए गए विद्यमान राज्य के राज्यक्षेत्र में सब पूंजी संकर्मों और अन्य पूंजी लागत पर नियत दिन तक उपगत कुल व्यय के अनुपात में किया जाएगा :
परन्तु ऐसे विभाजन के प्रयोजनों के लिए, ऐसी आस्तियों पर व्यय मात्र हो, जिनके लिए पूंजी खाते रखे गए हों, हिसाब में लिया जाएगा :
परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार से किसी विद्यमान राज्य की सरकार द्वारा नियत दिन से ठीक पूर्व किसी नए राज्य की या भाग 2 के उपबंधों द्वारा प्रभावित किसी राज्य की राजधानी के लिए भवनों, सड़कों और अन्य संकर्मों के निर्माण के सम्बन्ध में या उसके आनुषंगिक प्रयोजनों के लिए, लिया गया कोई उधार, उस दिन पर्यन्त इस प्रकार उपगत व्यय के परिमाण तक, पूर्णतया उस उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा जिसमें वह राजधानी सम्मिलित है ।
(4) जहां विद्यमान राज्य ने अपने द्वारा लिए गए किसी उधार की अदायगी के लिए कोई निक्षेप निधि या अवक्षयण निधि रखी हो वहां उस निधि से किए गए विनिधानों की बाबत धारित प्रतिभूतियां उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगी, या, यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं तो, उनका विभाजन उनके बीच उसी अनुपात में किया जाएगा जिसमें उपधारा (3) में निर्दिष्ट लोक ऋणों का विभाजन किया जाए ।
(5) इस धारा में सरकारी प्रतिभूति" पद से कोई ऐसी प्रतिभूति अभिप्रेत है जो लोक ऋण लेने के प्रयोजन के लिए राज्य सरकार द्वारा सर्जित और निर्गमित की गई है और जो लोक ऋण अधिनियम, 1944 (1944 का 18) की धारा 2 के खण्ड (2) में विनिर्दिष्ट, या उसके अधीन विहित, रूपों में से किसी रूप में है ।
83. आधिक्य में वसूल किए गए करों की वापसी-सम्पत्ति पर किसी कर या शुल्क, जिसमें भू-राजस्व भी है, की, उस रकम की बाबत जो आधिक्य में वसूल की गई है, वापस करने का किसी विद्यमान राज्य का दायित्व उस उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा जिसमें वह संपत्ति स्थित है, और किसी अन्य कर या शुल्क की उस रकम की बाबत जो आधिक्य में वसूल की गई है, वापस करने का किसी विद्यमान राज्य का दायित्व उस उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा जिसके राज्यक्षेत्र में उस कर या शुल्क के निर्धारण का स्थान सम्मिलित है ।
84. निक्षेप-किसी सिविल निक्षेप या स्थानीय निधि निक्षेप कीबाबत किसी विद्यमान राज्य का दायित्व, नियत दिन से, उस उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा जिसके क्षेत्र में निक्षेप किया गया है ।
85. भविष्य निधियां-नियत दिन को सेवारत किसी सरकारी सेवक के भविष्य निधि खाते की बाबत किसी विद्यमान राज्य का दायित्व, उस दिन से उस उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा जिसे वह सरकारी सेवक स्थायी रूप से आबंटित किया गया है ।
86. पेंशनें-पेंशनों की बाबत विद्यमान राज्य का दायित्व का उत्तरवर्ती राज्यों को संक्रमण या उनमें प्रभाजन में पांचवीं अनुसूची के उपबंधों के अनुसार होगा ।
87. संविदाएं-(1) जहां नियत दिन के पूर्व, किसी विद्यमान राज्य ने, राज्य के किन्हीं प्रयोजनों के लिए, अपनी कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में कोई संविदा की हो, वहां वह संविदा-
(क) यदि केवल एक ही उत्तरवर्ती राज्य है तो उस राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में;
(ख) यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं और संविदा के प्रयोजन, नियत दिन से, अनन्यतः उनमें से किसी एक के प्रयोजन हों तो, उस उत्तरवर्ती राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में; तथा
(ग) यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हों और संविदा के प्रयोजन उस दिन से, उनमें से अनन्यतः किसी एक के प्रयोजन हों तो, उस उत्तरवर्ती राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में,
की गई समझी जाएगी और वे सब अधिकार और दायित्व जो ऐसी किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हों, या प्रोद्भूत हों, उस सीमा तक, ऊपर विनिर्दिष्ट उत्तरवर्ती राज्य या प्रधान उत्तरवर्ती राज्य के अधिकार या दायित्व होंगे जिस तक वे विद्यमान राज्य के अधिकार या दायित्व होते :
परन्तु खण्ड (ग) में निर्दिष्ट प्रकार के मामले में, इस उपधारा द्वारा किया गया अधिकारों और दायित्वों का प्रारम्भिक आबंटन ऐसे वित्तीय समायोजन के अधीन होगा जो सभी संबंधित उत्तरवर्ती राज्यों के बीच करार पाया जाए, या ऐसे करार के अभाव में, जैसा केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे ।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि ऐसे दायित्वों के अंतर्गत, जो किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हों निम्नलिखित भी हैं :-
(क) संविदा से संबंधित कार्यवाहियों में किसी न्यायालय या अन्य अधिकरण द्वारा दिए गए आदेश या अधिनिर्णय की तुष्टि करने का कोई दायित्व; और
(ख) ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में या उनके संबंध में उपगत व्ययों की बाबत कोई दायित्व ।
(3) यह धारा उधारों, प्रत्याभूतियों और अन्य वित्तीय बाध्यताओं की बाबत दायित्वों के प्रभाजन से संबंधित इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रभावी होंगी; और बैंक अतिशेष तथा प्रतिभूतियों के विषय में कार्यवाही इस बात के होते हुए भी कि वे संविदात्मक अधिकारों की प्रकृति के हैं, उन उपबन्धों के अधीन की जाएगी ।
88. अनुयोज्य दोष की बाबत दायित्व-जहां, नियत दिन के ठीक पूर्व, किसी विद्यमान राज्य पर संविदा के भंग से भिन्न किसी अनुयोज्य दोष की बाबत कोई दायित्व हो, वहां, वह दायित्व-
(क) यदि केवल एक ही उत्तरवर्ती राज्य है तो, उस राज्य का दायित्व होगा;
(ख) यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं और वाद हेतुक पूर्णतया उस राज्यक्षेत्र के भीतर पैदा हुआ हो जो उस दिन से उनमें से किसी एक का राज्यक्षेत्र हो तो, उस उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा; तथा
(ग) किसी अन्य दशा में, प्रारम्भिकतः प्रधान उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा, किन्तु यह ऐसे वित्तीय समायोजन के अधीन होगा, जो सभी संबंधित उत्तरवर्ती राज्यों के बीच करार पाया जाए, या, ऐसे करार के अभाव में, जैसा केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे ।
89. सहकारी सोसाइटी के प्रत्याभूतिदाता के रूप में दायित्व-जहां, नियत दिन के ठीक पूर्व, कोई विद्यमान राज्य किसी रजिस्ट्रीकृत सहकारी सोसाइटी के किसी दायित्व की बाबत प्रत्याभूतिदाता के रूप में दायी हो, वहां विद्यमान राज्य का वह दायित्व-
(क) यदि केवल एक ही उत्तरवर्ती राज्य है तो, उस राज्य का दायित्व होगा;
(ख) यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं और उस सोसाइटी का कार्यक्षेत्र उस राज्यक्षेत्र तक सीमित हो जो उस दिन से उन राज्यों में से किसी एक का राज्यक्षेत्र है तो, उस उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा, तथा
(ग) किसी अन्य दशा में, प्रधान उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा :
परन्तु खण्ड (ग) में निर्दिष्ट प्रकार के किसी मामले में, दायित्वों का इस धारा के अधीन प्रारम्भिक आबंटन ऐसे वित्तीय समायोजन के अधीन होगा जो सभी उत्तरवर्ती राज्यों के बीच करार पाया जाए, या ऐसे करार के अभाव में, जैसा केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे ।
90. उचंत मदें-यदि कोई उचंत मद अन्ततः इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी में निर्दिष्ट प्रकार की आस्ति या दायित्व पर प्रभाव डालने वाली पाई जाए तो उसके संबंध में कार्यवाही उस उपबंध के अनुसार की जाएगी ।
91. अवशिष्टीय उपबंध-किसी विद्यमान राज्य में ऐसी किसी आस्ति या दायित्व का फायदा या भार जिसके बारे में इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में व्यवस्था नहीं की गई है,-
(क) यदि केवल एक ही उत्तरवर्ती राज्य है तो, उस राज्य को संक्रान्त हो जाएगा; और
(ख) यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हैं तो, प्रथमतः प्रधान उत्तरवर्ती राज्य को, ऐसे वित्तीय समायोजन के अधीन रहते हुए संक्रान्त हो जाएगा जो 1957 के अक्तूबर के प्रथम दिन के पूर्व सभी उत्तरवर्ती राज्यों के बीच करार पाया जाए, या ऐसे करार के अभाव में, जैसा केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे ।
92. कतिपय मामलों में आबंटन या समायोजन के लिए आदेश देने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-जहां उत्तरवर्ती राज्यों में से कोई राज्य इस भाग के उपबंधों में से किसी के आधार पर, किसी संपत्ति का हकदार हो जाए या कोई फायदा प्राप्त करे या किसी दायित्व के अधीन हो जाए, और नियत दिन से तीन वर्ष की अवधि के भीतर किसी राज्य द्वारा निर्देश किए जाने पर, केन्द्रीय सरकार की राय हो कि यह न्यायसंगत और साम्य पूर्ण है कि वह संपत्ति या वे फायदे अन्य उत्तरवर्ती राज्यों में से किसी एक राज्य या अधिक राज्यों को अंतरित किए जाने चाहिएं या उसमें से उसे अंश मिलना चाहिए या उस दायित्व के मद्दे अन्य उत्तरवर्ती राज्यों में से किसी एक राज्य या अधिक राज्यों द्वारा अभिदाय किया जाना चाहिए, वहां उक्त संपत्ति या फायदों का आबंटन ऐसी रीति से किया जाएगा, या अन्य उत्तरवर्ती राज्य दायित्व के अधीन होने वाले राज्य को उसकी बाबत ऐसा अभिदाय करेगा या करेंगे जो केन्द्रीय सरकार, संबंधित राज्य सरकारों से परामर्श करने के पश्चात् आदेश द्वारा अवधारित करे ।
93. कतिपय व्ययों का संचित निधि पर भारित किया जाना-इस भाग के उपबंधों के आधार पर संघ द्वारा किसी राज्य को या किसी राज्य द्वारा किसी अन्य राज्य को या संघ को संदेय सभी राशियां, यथास्थिति, भारत की संचित निधि पर या उस राज्य की संचित निधि पर, जिसके द्वारा ऐसी राशियां संदेय हैं, भारित होंगी ।
भाग 8
संघ की कतिपय आस्तियों और दायित्वों का प्रभाजन
94. परिभाषाएं-इस भाग में,-
(क) “विद्यमान राज्य" से अजमेर, भोपाल, कुर्ग, कच्छ और विंध्य प्रदेश के विद्यमान ग राज्यों में से कोई राज्य अभिप्रेत है;
(ख) “संघ के प्रयोजन" से संघ सूची में उल्लिखित विषयों में से किसी विषय के सापेक्ष सरकारी प्रयोजन अभिप्रेत हैं ।
95. संघ की कतिपय आस्तियों और दायित्वों का उत्तरवर्ती राज्यों को संक्रमण-इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए,-
(क) किसी विद्यमान राज्य के भीतर संघ की ऐसी आस्तियां जो नियत दिन के ठीक पूर्व उस राज्य के शासन के प्रयोजनों के लिए संघ द्वारा धारित हों, उस दिन से, तब के सिवाय उत्तरवर्ती राज्य को संक्रांत हो जाएंगी जब वे प्रयोजन जिनके लिए आस्तियां इस प्रकार धारित हैं संघ के प्रयोजन हों; और
(ख) किसी विद्यमान राज्य के शासन से उद्भूत, या उसके संबंध में, संघ के सभी दायित्व, नियत दिन से, तब के सिवाय उत्तरवर्ती राज्य के दायित्व होंगे जब ऐसे दायित्व संघ के प्रयोजन के सापेक्ष हों ।
96. करों की बकाया-किसी विद्यमान राज्य में शोध्य किसी ऐसे कर (जिसमें भू-राजस्व भी है) की बकाया, जो कर राज्य सूची में प्रगणित कर है, उत्तरवर्ती राज्य को संक्रान्त हो जाएंगी ।
97. उधार और अग्रिम-नियत दिन के ठीक पूर्व किसी विद्यमान राज्य में किसी स्थानीय निकाय, सोसाइटी, कृषक या अन्य व्यक्ति को दिए गए किन्हीं उधारों या अग्रिमों को वसूल करने का अधिकार तब के सिवाय उत्तरवर्ती राज्य को होगा जब ऐसा उधार या अग्रिम संघ के प्रयोजन के संबंध में दिया गया हो ।
98. केन्द्रीय सरकार को शोध्य ऋण-विद्यमान राज्य का कोई ऋण जो किसी ऐसे उधार के कारण हो जो केन्द्रीय सरकार द्वारा 1954 के अप्रैल के प्रथम दिन या उसके पश्चात् दिया गया हो, और जो नियत दिन के ठीक पूर्व बकाया हो, उत्तरवर्ती राज्य से केन्द्रीय सरकार को शोध्य ऋण होगा ।
99. भविष्य निधि-नियत दिन के ठीक पूर्व किसी विद्यमान राज्य में उसके उप-राज्यपाल या मुख्य आयुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन सेवारत किसी सरकारी सेवक के भविष्य निधि खाते की बाबत संघ का दायित्व, उस दिन से, उत्तरवर्ती राज्य का दायित्व होगा :
परन्तु केन्द्रीय सरकार, नियत दिन को संघ के यथाविद्यमान दायित्व के बराबर निधियां उत्तरवर्ती राज्य को, अंतरित करेगी ।
100. पेंशनें-जहां नियत दिन के पूर्व, किसी विद्यमान राज्य के उप-राज्यपाल या मुख्य आयुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन सेवारत कोई सरकारी सेवक, सेवा निवृत्त हो गया हो या सेवा निवृत्ति पूर्व छुट्टी पर अग्रसर हो गया हो वहां उसकी पेंशन की बाबत कोई भी बकाया दावा उत्तरवर्ती राज्य द्वारा तय किया जाए; किन्तु किसी ऐसे सरकारी सेवक को नियत दिन के पूर्व या पश्चात् मंजूर की गई पेंशन की बाबत, दायित्व, संघ का दायित्व होगा ।
101. संविदाएं-(1) नियत दिन के पूर्व, किसी विद्यमान राज्य के शासन के प्रयोजनों के लिए संघ द्वारा अपनी कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में की गई कोई संविदा, उस दिन से, तब तक उत्तरवर्ती राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में की गई समझी जाएगी जब तक संविदा के प्रयोजन संघ के प्रयोजन न हों; और वे सब अधिकार और दायित्व जो ऐसी किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हों, या प्रोद्भूत हों, उस सीमा तक उत्तरवर्ती राज्य के अधिकार या दायित्व होंगे जिस तक वे, यदि यह अधिनियम पारित न किया गया होता तो, संघ के अधिकार और दायित्व होते ।
(2) धारा 87 की उपधारा (2) या (3) के उपबन्ध किसी ऐसी संविदा की बाबत उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे किसी ऐसी संविदा की बाबत लागू हैं जिसे उस धारा की उपधारा (1) लागू होती है ।
भाग 9
कतिपय निगमों और अन्तरराज्यिय करारों और ठहरावों के बारे में उपबंध
102. कतिपय राज्य वित्तीय निगमों के बारे में उपबंध-(1) राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 62) के अधीन विद्यमान मध्य भारत, पंजाब, राजस्थान और तिरुवांकुर -कोचीन राज्यों के लिए स्थापित वित्तीय निगम, नियत दिन से, क्रमशः नए मध्य प्रदेश, पंजाब, राजस्थान और केरल राज्यों के लिए उक्त अधिनियम के अधीन स्थापित वित्तीय निगम समझे जाएंगे ।
(2) विद्यमान तिरुवांकुर -कोचीन, मध्य भारत और राजस्थान राज्यों के वित्तीय निगमों की समादत्त पूंजी में मद्रास, राजस्थान और मध्य प्रदेश राज्यों में से प्रत्येक के अंश के मद्दे केरल, मध्य प्रदेश और राजस्थान राज्य उतनी रकम का संदाय करने के दायी होंगे जितनी केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा अवधारित करे ।
(3) राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 62) के अधीन विद्यमान आन्ध प्रदेश और हैदराबाद राज्यों के लिए स्थापित वित्तीय निगम नियत दिन से, समामेलित हो जाएंगे और उक्त अधिनियम के अधीन आन्ध्र प्रदेश राज्य के लिए स्थापित वित्तीय निगम समझे जाएंगे ।
(4) केन्द्रीय सरकार विद्यमान आन्ध्र प्रदेश और हैदराबाद राज्यों की सरकारों से परामर्श करने के पश्चात् नियत दिन के पूर्व अधिसूचित आदेश द्वारा, आन्ध्र प्रदेश राज्य के लिए वित्तीय निगम के निदेशक बोर्ड के गठन के लिए और ऐसे पारिणामिक, आनुषंगिक और अनुपूरक विषयों के लिए उपबंध कर सकती है जो केन्द्रीय सरकार की राय में उपधारा (3) के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए आवश्यक हों ।
(5) आन्ध्र प्रदेश राज्य विद्यमान हैदराबाद राज्य के लिए वित्तीय निगम की समादत्त पूंजी के उसके अंश के मद्दे नए मैसूर और मुम्बई राज्यों में से प्रत्येक को उतनी रकम का संदाय करने का दायी होगा जितनी केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, अवधारित करे ।
(6) राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 62) के अधीन विद्यमान मुम्बई और सौराष्ट्र राज्यों के लिए स्थापित वित्तीय निगम, नियत दिन से, समामेलित हो जाएंगे और उक्त अधिनियम के अधीन मुम्बई राज्य के लिए स्थापित वित्तीय निगम समझे जाएंगे ।
(7) केन्द्रीय सरकार विद्यमान मुम्बई और सौराष्ट्र राज्यों की सरकारों से परामर्श करने के पश्चात्, नियत दिन के पूर्व, अधिसूचित आदेश द्वारा, नए मुम्बई राज्य के लिए वित्तीय निगम के निदेशक बोर्ड के गठन के लिए और ऐसे पारिणामिक, आनुषंगिक और अनुपूरक विषयों के लिए उपबंध कर सकती है जो, केन्द्रीय सरकार की राय में उपधारा (3) के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए आवश्यक हों ।
(8) नया मुम्बई राज्य विद्यमान मुम्बई राज्य के लिए वित्तीय निगम की समादत्त पूंजी के उसके अंश के मद्दे नए मैसूर और राजस्थान राज्यों में से प्रत्येक को उतनी रकम का संदाय करने का दायी होगा जितनी केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, अवधारित करे ।
103. मद्रास औद्योगिक विनिधान निगम के बारे में उपबंध-(1) विद्यमान मद्रास राज्य के लिए गठित मद्रास औद्योगिक विनिधान निगम, नियत दिन से, भाग 2 के उपबंधों द्वारा परिवर्तित क्षेत्र सहित, उस राज्य के लिए गठित समझा जाएगा ।
(2) मद्रास राज्य उक्त निगम की समादत्त पूंजी के उसके अंश के मद्दे केरल और मैसूर के राज्यों में से प्रत्येक को उतनी रकम का संदाय करने का दायी होगा जितनी केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा अवधारित करे ।
104. 1934 के अधिनियम 2 का संशोधन-नियत दिन से, भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 में निम्नलिखित संशोधन किए जाएंगे, अर्थात् :-
(1) धारा 2 में, खण्ड (च) के परन्तुक में, “उस राज्य में किसी केन्द्रीय सहकारी सोसाइटी को इस परिभाषा के अर्थ में राज्य सहकारी बैंक" शब्दों के स्थान पर “उस राज्य में कारबार करने वाली एक या एक से अधिक किन्हीं सहकारी सोसाइटियों को इस परिभाषा के अर्थ में राज्य सहकारी बैंक" शब्द रखे जाएंगे ;
(2) धारा 20 में,-
(क) “और भाग क राज्यों की सरकारें" शब्दों और अक्षर का लोप किया जाएगा;
(ख) “क्रमशः" शब्द से आरम्भ और “लेखे" शब्द पर समाप्त वाक्यांश के स्थान पर “केन्द्रीय सरकार लेखे" शब्द रखे जाएंगे;
(ग) “उनके विनिमय" शब्दों के स्थान पर “उसके विनिमय" शब्द रखे जाएंगे ;
(घ) “लोक ऋण" शब्दों के पूर्व “संघ के" शब्द अंतःस्थापित किए जाएंगे ;
(3) धारा 21 में,-
(क) उपधारा (1) में,-
(i) “और राज्य सरकारें" शब्द जहां कहीं भी आए हैं उनका लोप किया जाएगा;
(ii) । । । । । ।
(iii) परन्तुक में, या किसी राज्य सरकार" शब्दों का लोप किया जाएगा, और वे" शब्द के स्थान पर केन्द्रीय सरकार" शब्द रखे जाएंगे;
(ख) उपधारा (2) में और प्रत्येक राज्य सरकार" शब्दों का लोप किया जाएगा;
(ग) उपधारा (4) के स्थान पर निम्नलिखित उपधारा रखी जाएगी, अर्थात् :-
“(4) इस धारा के अधीन किया गया कोई करार किए जाने के पश्चात् यथासम्भव शीघ्र संसद् के समक्ष रखा जाएगा;" और
(घ) उपधारा 5 का लोप किया जाएगा ।
(4) धारा 21क की उपधारा (1) में, भाग ख" शब्द और अक्षर का लोप किया जाएगा ।
(5) धारा 21क के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-
‘21ख. 1 नवंबर, 1956 के पूर्व बैंक और कतिपय राज्यों के बीच किए गए करारों का प्रभाव-(1) रिजर्व बैंक और निम्नलिखित “स्पष्टीकरण" में विनिर्दिष्ट किसी राज्य की सरकार के बीच, धारा 21 या धारा 21क के अधीन किया गया और 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त, कोई करार उस दिन से ऐसे प्रभाव रखेगा मानो वह रिजर्व बैंक और तत्स्थानी राज्य की सरकार के बीच धारा 21क के अधीन उस दिन उस करार के साधारण प्रवर्तन को प्रभावित न करने वाले ऐसे उपान्तरों सहित, यदि कोई हों, जैसे रिजर्व बैंक और तत्स्थानी राज्य की सरकार के बीच करार पाए जाएं या ऐसे करार के अभाव में जैसे केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा किए जाएं, किया गया करार है ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में “तत्स्थानी राज्य" से,-
(क) रिजर्व बैंक और आन्ध्र राज्य के बीच करार की दशा में आन्ध्र प्रदेश राज्य;
(ख) रिजर्व बैंक और किसी अन्य भाग क राज्य के, जैसा वह 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन से पूर्व वर्तमान था, बीच करार की अवस्था में वैसे ही नाम वाला राज्य; और
(ग) रिजर्व बैंक और मैसूर या तिरुवांकुर -कोचीन के भाग ख राज्य के, जैसा वह 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन से पूर्व वर्तमान था, बीच करार की दशा में क्रमशः मैसूर या केरल राज्यऱ्
अभिप्रेत है ।
(2) रिजर्व बैंक और हैदराबाद, मध्य भारत या सौराष्ट्र के भाग ख राज्य की सरकार के बीच धारा 21क के अधीन हुए किसी करार की बाबत यह समझा जाएगा कि उसका पर्यवसान सन् 1956 के अक्तूबर के 31वें दिन को हो गया है ।ऱ्।
105. 1942 के अधिनियम 6 का संशोधन-बहु-एकक सहकारी सोसाइटी अधिनियम, 1942 की धारा 5 के पश्चात् निम्नलिखित धारा अंतःस्थापित की जाएगी, अर्थात् :-
‘5क. राज्यों के पुनर्गठन से प्रभावित कतिपय सहकारी सोसाइटियों के बारे में अन्तःकालीन उपबन्ध-(1) जहां राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के भाग 2 के उपबन्धों के आधार पर कोई ऐसी सहकारी सोसाइटी, जिसके उद्देश्य 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन के ठीक पहले एक राज्य तक सीमित थे, उस दिन से ही बहुएकक सहकारी सोसाइटी बन जाती है तो उसे ऐसी सहकारी सोसाइटी समझा जाएगा जिसको यह अधिनियम लागू होता है, और वह उस राज्य में वस्तुतः रजिस्ट्रीकृत समझी जाएगी जिसमें उस सहकारी सोसाइटी के कारबार का मुख्य स्थान स्थित है ।
(2) यदि सहकारी सोसाइटियों के केन्द्रीय रजिस्ट्रार को यह आवश्यक या समीचीन प्रतीत होता है कि ऐसी कोई सोसाइटी किसी रीति में पुनर्गठित या पुनर्संगठित की जानी चाहिए या उसे विघटित किया जाना चाहिए तो केन्द्रीय रजिस्ट्रार, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, सोसाइटी की साधारण सभा की ऐसी रीति से की गई बैठक में, जो कि इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाए, सोसाइटी के पुनर्गठन, पुनर्संगठन या विघटन की एक स्कीम रख सकेगा जिसके अन्तर्गत नई सहकारी सोसाइटियों के निर्माण तथा उस सोसाइटी की आस्तियों और दायित्वों का पूर्णतः या भागतः उस नई सहकारी सोसाइटी को अन्तरण के बारे में प्रस्थापनाएं भी होंगी ।
(3) यदि स्कीम उक्त बैठक में उपस्थित सदस्यों की बहुसंख्या द्वारा या तो उपान्तरों के बिना या ऐसे उपान्तरों सहित जिनसे कि केन्द्रीय रजिस्ट्रार सहमत हो, पारित संकल्प द्वारा मंजूर की जाती है तो रजिस्ट्रार स्कीम को प्रमाणित करेगा और ऐसे प्रमाणन पर वह स्कीम उस समय प्रवृत्त किसी विधि, विनियम या उपविधि में तत्प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी उन सब सोसाइटियों पर, जिन पर उस स्कीम का प्रभाव पड़ता है तथा ऐसी सभी सोसाइटियों के शेयरधारियों और लेनदारों पर, आबद्धकर होगी ।
(4) यदि स्कीम उपधारा (3) के अधीन मंजूर नहीं की जाती है तो केन्द्रीय रजिस्ट्रार समुचित उच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीश को, जिसे उसके मुख्य न्यायाधिपति द्वारा इस निमित्त नामनिर्देशित किया जाए, स्कीम निर्देशित कर सकेगा तथा उस स्कीम के बारे में उस न्यायाधीश का विनिश्चय अन्तिम होगा और उन सब सोसाइटियों पर, जो उस स्कीम से प्रभावित होती हैं, तथा ऐसी सभी सोसाइटियों के शेयरधारियों और लेनदारों पर, आबद्धकर होगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में “समुचित उच्च न्यायालय" से वह उच्च न्यायालय अभिप्रेत है जिसकी अधिकारिता के अन्दर बहु-एकक सहकारी सोसाइटी का मुख्य कारबार का स्थान स्थित है ।
5ख. प्रत्यायोजन की शक्ति-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि सहकारी सोसाइटियों के केन्द्रीय रजिस्ट्रार द्वारा इस अधिनियम के अधीन प्रयोग की जा सकने वाली कोई शक्ति या प्राधिकार, ऐसे विषयों के सम्बन्ध में तथा ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी राज्य के सहकारी सोसाइटियों के ऐसे रजिस्ट्रार द्वारा या केन्द्रीय सरकार के या राज्य सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी द्वारा भी प्रयोग की जा सकेगी, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए ।ऱ्।
106. कतिपय राज्य विद्युत् बोर्डों के बारे में उपबन्घ और उनकी आस्तियों और दायित्वों का प्रभाजन-(1) विद्यमान मुम्बई, मध्य प्रदेश और सौराष्ट्र राज्यों में किसी के लिए विद्युत् (प्रदाय) अधिनियम, 1948 (1948 का 54) के अधीन गठित राज्य विद्युत् बोर्ड नियत दिन से उन क्षेत्रों में, जिनकी बाबत वह उस दिन के ठीक पूर्व कार्य कर रहा था, इस धारा के उपबन्धों और ऐसे निदेशों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए जाएं, कार्य करता रहेगा ।
(2) केन्द्रीय सरकार द्वारा किसी ऐसे बोर्ड की बाबत उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए किन्हीं निदेशों के अन्तर्गत ऐसा निदेश भी होगा कि उक्त अधिनियम उस बोर्ड को लागू होने में ऐसे अपवादों और उपान्तरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगा जो केन्द्रीय सरकार ठीक समझे ।
(3) उपधारा (1) के अधीन चालू रखा गया राज्य विद्युत बोर्ड 1957 के नवम्बर के प्रथम दिन से या ऐसी पूर्वोत्तर तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा नियत करे, कार्य करना बन्द कर देगा और विघटित समझा जाएगा; तथा ऐसे विघटन पर उसकी आस्तियां और दायित्व,-
(क) सौराष्ट्र के लिए बोर्ड की दशा में, मुम्बई राज्य को संक्रांत हो जाएंगे, और
(ख) विद्यमान मुम्बई या मध्य प्रदेश के राज्य के लिए बोर्ड की दशा में उत्तरवर्ती राज्यों के बीच ऐसी रीति से प्रभाजित की जाएंगी जो बोर्ड के विघटन के एक वर्ष के भीतर उनमें करार पाई जाएं या यदि कोई करार नहीं हो पाए तो ऐसी रीति से प्रभाजित की जाएंगी जो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा अवधारित करे ।
(4) इस धारा के पूर्ववर्ती उपबन्धों की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह विद्यमान मुम्बई, मध्य प्रदेश और सौराष्ट्र राज्यों के उत्तरवर्ती राज्यों में से किसी सरकार को नियत दिन के पश्चात् किसी समय उक्त अधिनियम के उपबन्धों के अधीन उस उत्तरवर्ती राज्य के लिए राज्य विद्युत् बोर्ड गठित करने से निवारित करती है; और यदि ऐसे बोर्ड का इस प्रकार गठन उपधारा (1) के अधीन चालू रखे गए और उस उत्तरवर्ती राज्य के किसी भाग में कार्य कर रहे बोर्ड के विघटन से पहले किया जाए तो,-
(क) उस राज्य में विद्यमान बोर्ड से उसके सब उपक्रम, आस्तियां और दायित्व या उनमें से कोई ग्रहण करने हेतु नए बोर्ड को समर्थ बनाने के लिए उपबन्ध केन्द्रीय सरकार के आदेश से किया जा सकता है, और
(ख) विद्यमान बोर्ड के विघटन पर ऐसी कोई आस्तियां और दायित्व जो अन्यथा उपधारा (3) के उपबन्धों द्वारा या उनके अधीन उत्तरवर्ती राज्य की बजाय नए बोर्ड को संक्रान्त हो जाएंगे ।
107. विद्युत शक्ति के उत्पादन और प्रदाय तथा जल-प्रदाय के बारे में ठहराव का बना रहना-यदि केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत हो कि किसी क्षेत्र के लिए विद्युत् शक्ति के उत्पादन या प्रदाय या जल-प्रदाय के बारे में या ऐसे उत्पादन या प्रदाय के लिए किसी परियोजना के निष्पादन के बारे में ठहराव में उस क्षेत्र के लिए अहितकर रूप से उपान्तरण इस कारण हो गया है या होना संभाव्य है कि वह क्षेत्र भाग 2 के उपबन्धों के कारण उस राज्य से अन्तरित कर दिया गया है जिसमें, यथास्थिति, ऐसी शक्ति के उत्पादन और प्रदाय के लिए विद्युत स्टेशन और अन्य संस्थापन अथवा जल-प्रदाय के लिए आवाह क्षेत्र, जलाशय और अन्य संकर्म स्थित हैं, तो केन्द्रीय सरकार पहले वाले ठहराव को यावत्साध्य बनाए रखने के लिए राज्य सरकार या अन्य सम्बद्ध प्राधिकारी को ऐसे निदेश दे सकेगी, जो वह ठीक समझे ।
108. कतिपय कृषि शक्ति या बहुप्रयोजन योजनाओं से सम्बन्धित करार और ठहरावों का बना रहना-(1) केन्द्रीय सरकार और एक या अधिक विद्यमान राज्यों के बीच अथवा दो या अधिक विद्यमान राज्यों के बीच-
(क) नियत दिन के पूर्व निष्पादित किसी परियोजना के प्रशासन, बनाए रखने और प्रवर्तन के सम्बन्ध में, अथवा
(ख) ऐसी परियोजना के निष्पादन के परिणामस्वरूप मिलने वाले फायदों, जैसे, जल या विद्युत् शक्ति को प्राप्त करने और उसका उपयोग करने के अधिकार के वितरण से सम्बन्धित,
कोई करार या ठहराव, जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान था, ऐसे अनुकूलनों और उपांतरों के, यदि कोई हों, जो केन्द्रीय सरकार, और सम्बन्धित उत्तरवर्ती राज्य के बीच या सम्बन्धित उत्तरवर्ती राज्यों के बीच 1957 के नवम्बर के प्रथम दिन तक करार पाए जाएं (और जो ऐसी प्रकृति के हों जिसके करार या ठहराव के साधारण प्रवर्तन पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता हो) अथवा यदि उक्त तारीख तक कोई करार नहीं होता है तो, ऐसे अनुकूलनों और उपान्तरों के अधीन बना रहेगा जो केन्द्रीय सरकार के, आदेश द्वारा उनमें किए जाएं ।
(2) जहां भाग 2 के उपबन्धों से प्रभावित किसी विद्यमान राज्य या अधिक विद्यमान राज्यों से सम्बन्धित कोई परियोजना प्रारम्भ की जा चुकी हो किन्तु पूरी नहीं हुई हो अथवा भारत सरकार ने उसे नियत दिन के पूर्व द्वितीय पंचवर्षीय योजना में सम्मिलित करने के लिए स्वीकार किया हो तो,-
(क) उस दशा में जहां नियत दिन के पश्चात् उस परियोजना से एक ही उत्तरवर्ती राज्य का सम्बन्ध है, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के सिवाय; और
(ख) उस दशा में जहां नियत दिन के पश्चात् उस परियोजना से दो या अधिक उत्तररवर्ती राज्यों का सम्बन्ध है, उन उत्तरवर्ती राज्यों के बीच करार के सिवाय, या, यदि ऐसा कोई करार नहीं होता है तो, ऐसी रीति में के सिवाय जैसी केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निर्देश दे,
न तो उस परियोजना की परिधि में और न उसके प्रशासन, बनाए रखने या प्रवर्तन के सम्बन्ध में या उससे प्राप्त होने वाले फायदों के वितरण के सम्बन्ध में किसी उपबन्ध में ही कोई फेरफार किया जाएगा और केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर ऐसे निदेश दे सकती है जैसे वह परियोजना के सम्यक् रूप से पूरा करने के लिए, तथा तत्पश्चात् उसके प्रशासन, बनाए रखने और प्रवर्तन के लिए, आवश्यक समझती है ।
(3) इस धारा में “परियोजना" पद से सिंचाई जल-प्रदाय या जल निस्सारण के प्रयोजन के लिए या विद्युत-शक्ति के विकास के लिए या किसी अन्तरराज्यीय नदी या नदी घाटी के विनियमन या विकास के लिए कोई परियोजना अभिप्रेत है ।
109. कानूनी निगमों के बारे में साधारण उपबन्ध-(1) इस भाग के पूर्वगामी उपबन्धों द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, जहां किसी विद्यमान राज्य के लिए, किसी केन्द्रीय अधिनियम, राज्य अधिनियम या प्रांतीय अधिनियम के अधीन, कोई निगमित निकाय गठित किया गया हो और भाग 2 के उपबन्धों के आधार पर वह सम्पूर्णतः या भागतः किसी अन्य विद्यमान राज्य को या किसी नए राज्य को अन्तरित कर दिया जाता है तो, ऐसे अन्तरण के होते हुए भी, वह निगमित निकाय, नियत दिन से, उन क्षेत्रों में जिसकी बाबत वह नियत दिन के ठीक पूर्व कार्य करता था और प्रवृत्त था ऐसे निदेशों के अधीन रहते हुए जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर जारी किए जाएं, तब तक कार्य करता रहेगा और प्रवर्तित रहेगा जब तक विधि द्वारा उक्त निगमित निकाय की बाबत अन्य उपबन्ध नहीं कर दिया जाता ।
(2) ऐसे किसी निगमित निकाय की बाबत उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किन्हीं निदेशों के अन्तर्गत ऐसा निदेश भी होगा कि कोई ऐसी विधि, जिसके द्वारा उक्त निगमित निकाय शासित होता हो, उस निगमित निकाय को उसके लागू होने में ऐसे अपवादों या उपान्तरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट हों ।
110. कतिपय विद्यमान सड़क परिवहन अनुज्ञापत्रों के चालू रहने के बारे में अस्थायी उपबन्ध-(1) मोटर यान अधिनियम, 1939 (1939 का 4) की धारा 63 में किसी बात के होते हुए भी, किसी ऐसे विद्यमान राज्य के, जिसका सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या उसका कोई भाग किसी अन्य विद्यमान राज्य को या किसी नए राज्य को अन्तरित कर दिया जाता है, राज्य परिवहन प्राधिकारी द्वारा या उस विद्यमान राज्य में किसी प्रादेशिक परिवहन प्राधिकारी द्वारा अनुदत्त अनुज्ञापत्र, यदि ऐसा अनुज्ञापत्र, नियत दिन के ठीक पूर्व, इस प्रकार अन्तरित राज्यक्षेत्रों में के किसी क्षेत्र में विधिमान्य तथा प्रभावी था तो, उस क्षेत्र में तत्समय प्रवृत्त उस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उस आदेश के पश्चात् विधिमान्य और प्रभावी बना रहा समझा जाएगा; और ऐसे अन्तरित राज्यक्षेत्र में उपयोग के लिए ऐसे किसी अनुज्ञापत्र को विधिमान्य करने के प्रयोजन के लिए उसका किसी अन्य राज्य परिवहन प्राधिकारी द्वारा या प्रादेशिक परिवहन प्राधिकारी द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित किया जाना आवश्यक नहीं होगा :
परन्तु केन्द्रीय सरकार, उन शर्तों में, जो अनुज्ञापत्र देने वाले प्राधिकारी द्वारा अनुज्ञापत्र से संलग्न की गई हो; परिवर्धन, संशोधन या फेरफार, सम्बन्धित राज्य सरकार या राज्य सरकारों से परामर्श करने के पश्चात् कर सकती है ।
(2) किसी ऐसे अनुज्ञापत्र के अधीन किसी अन्तरित राज्यक्षेत्र में किसी यान को चलाने के लिए उस यान की बाबत, नियत दिन के पश्चात् कोई पथ-कर, प्रवेश फीस या वैसी प्रकृति के अन्य प्रभार, उद्गृहीत नहीं किए जाएंगे यदि उस यान को, उस दिन के ठीक पूर्व, उस राज्य की, जिसमें ऐसा अनुज्ञापत्र मंजूर किया गया था, सीमाओं के परे ऐसे यान को चलाने के लिए उसको किसी ऐसे पथ-कर, प्रवेश फीस या अन्य प्रभारों के संदाय से छूट प्राप्त हो :
परन्तु केन्द्रीय सरकार, यथास्थिति, किसी ऐसे पथ-कर, प्रवेश फीस या अन्य प्रभारों का उद्ग्रहण, सम्बन्धित राज्य सरकार या राज्य सरकारों से परामर्श करने के पश्चात् प्राधिकृत कर सकती है ।
111. कतिपय मामलों में छंटनी प्रतिकर से संबंधित विशेष उपबन्ध-किसी केन्द्रीय अधिनियम, राज्य अधिनियम या प्रांतीय अधिनियम के अधीन गठित कोई निगमित निकाय, सहकारी सोसाइटियों से सम्बन्धित किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई सहकारी सोसाइटी या किसी विद्यमान राज्य का कोई वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम, जहां इस अधिनियम के अधीन राज्यों के पुनर्गठन के कारण किसी भी रीति से पुनर्संगठित या पुनर्गठित किया जाए या किसी अन्य निगमित निकाय या उपक्रम में समामेलित किया जाए, या विघटित किया जाए, और ऐसे पुनर्संगठन, पुनर्गठन, समामेलन या विघटन के परिणामस्वरूप, ऐसे निगमित निकाय द्वारा या किसी ऐसे उपक्रम में नियोजित कोई कर्मकार किसी अन्य निगमित निकाय या उपक्रम को अन्तरित किया जाए या उसके द्वारा पुनर्नियोजित किया जाए, वहां, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 25च में किसी बात के होते हुए भी, ऐसा अन्तरण या पुनर्नियोजन उसे उक्त धारा के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा :
परन्तु यह तब जब-
(क) ऐसे अन्तरण या पुनर्नियोजन के पश्चात् कर्मकार को लागू होने वाले सेवा के निबन्धन और शर्तें, अन्तरण या पुनर्नियोजन के ठीक पूर्व कर्मकार को लागू निबन्धनों और शर्तों से कम अनुकूल न हों; और
(ख) उस निगमित निकाय या उपक्रम से, जहां कर्मकार को अन्तरित या पुनर्नियोजित किया गया हो, सम्बन्धित नियोजक, करार द्वारा या अन्यथा, उस कर्मकार को, उसकी छंटनी की दशा में, इस आधार पर कि उसकी सेवा चालू रही है और अन्तरण या पुनर्नियोजन द्वारा उसमें बाधा नहीं पड़ी है, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 25च के अधीन प्रतिकर के संदाय के लिए विधिक रूप से दायी हो ।
112. तिरुवांकुर की देवस्वम् आधिक्य निधि के बारे में उपबन्ध-(1) तिरुवांकुर -कोचीन राज्य से मद्रास राज्य को अन्तरित राज्यक्षेत्रों में हिन्दू मन्दिरों और पूजागृहों के प्रबन्ध के लिए, नियत दिन से, मद्रास राज्य में एक देवस्वम् निधि स्थापित की जाएगी ।
(2) तिरुवांकुर -कोचीन हिन्दू रिलीजियस इंस्टीट्यूशन्स ऐक्ट, 1950 की धारा 26 द्वारा गठित देवस्वम् आधिक्य निधि की नियत दिन को यथाविद्यमान आस्तियां ऐसी रीति में, जो केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा निदेश दे, 37.5 और 13.5 के अनुपात में दो भागों में विभाजित की जाएंगी, और लघुतर भाग, नियत दिन से, उपधारा (1) में उल्लिखित निधि को अन्तरित किया जाएगा ।
113. कतिपय राजकीय संस्थाओं में प्रसुविधाओं का बना रहना-केन्द्रीय सरकार, किसी नए राज्य में या आन्ध्र प्रदेश या मद्रास के राज्य में स्थित, छठी अनुसूची में विनिर्दिष्ट प्रवर्गों की संस्थाओं की बाबत निदेश दे सकती है कि ऐसी प्रसुविधाएं, जैसी कि निदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, लगे हुए राज्यों में से एक या अधिक राज्यों की सरकारों और व्यक्तियों को ऐसी अवधि के लिए दी जाएंगी जो विनिर्दिष्ट की जाएं; और तदुपरि ऐसी प्रसुविधाएं उक्त अवधि के लिए ऐसे निबन्धनों और शर्तों पर दी जाएंगी जो सम्बन्धित राज्य सरकारों के बीच 1957 के मार्च के 31वें दिन के पूर्व करार पाए जाएं, या, यदि उक्त तारीख तक कोई करार नहीं हो पाता है तो, जैसे केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, नियत करे ।
भाग 10
सेवाओं के बारे में उपबन्ध
114. अखिल भारतीय सेवाओं से संबंधित उपबन्ध-(1) इस धारा में “राज्य काडर" पद का,-
(क) भारतीय प्रशासनिक सेवा के सम्बन्ध में वही अर्थ है जो भारतीय प्रशासनिक सेवा (काडर) नियम, 1954 में उसका है; तथा
(ख) भारतीय पुलिस सेवा के सम्बन्ध में वही अर्थ है जो भारतीय पुलिस सेवा (काडर) नियम, 1954 में उसका है ।
(2) नए राज्यों में से प्रत्येक राज्य के लिए, नियत दिन से, भारतीय प्रशासनिक सेवा का एक राज्य काडर और भारतीय पुलिस सेवा का एक राज्य काडर गठित किया जाएगा ।
(3) उक्त काडरों में से प्रत्येक की प्रारम्भिक सदस्य-संख्या और संरचना ऐसी होगी, जो केन्द्रीय सरकार, नियत दिन के पूर्व, आदेश द्वारा अवधारित करे ।
(4) विद्यमान मुम्बई, मध्य प्रदेश, पंजाब और विन्ध्य प्रदेश के राज्यों के लिए और विद्यमान भाग ख राज्यों के लिए उक्त सेवाओं में से प्रत्येक के काडर नियत दिन से अस्तित्वहीन हो जाएंगे; और उक्त सेवाओं में से प्रत्येक के ऐसे सदस्य जो उक्त काडरों में थे नए राज्यों के लिए या नए विद्यमान राज्यों के लिए उसी सेवा के राज्य काडरों को ऐसी रीति से और ऐसी तारीख या तारीखों से आबंटित किए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
(5) इस धारा की कोई भी बात उपधारा (2) के अधीन गठित उक्त सेवाओं के राज्य काडरों के सम्बन्ध में और उक्त काडरों में उन सेवाओं के सदस्यों के सम्बन्ध में अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 (1951 का 61) या उसके अधीन बनाए गए नियमों के नियत दिन के पश्चात् प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।
115. अन्य सेवाओं से संबंधित उपबन्ध-(1) प्रत्येक व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व संघ के कार्यकलाप के सम्बन्ध में विद्यमान अजमेर, भोपाल, कुर्ग, कच्छ और विन्ध्य प्रदेश के राज्यों में से किसी के राज्यपाल या मुख्य आयुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन सेवा कर रहा है, या विद्यमान मैसूर, पंजाब, पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन तथा सौराष्ट्र के राज्यों में से किसी के कार्यकलाप के सम्बन्ध में सेवा कर रहा है, उस दिन से, उस विद्यमान राज्य के उत्तरवर्ती राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में सेवा करने के लिए आबंटित किया गया समझा जाएगा ।
(2) प्रत्येक व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व किसी ऐसे विद्यमान राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में सेवा कर रहा है जिसके राज्यक्षेत्र का भाग, भाग 2 के उपबन्धों द्वारा किसी अन्य राज्य को अन्तरित किया गया है, नियत दिन से, तब तक उस विद्यमान राज्य के प्रधान उत्तरवर्ती राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में अन्तिम रूप से सेवा करता रहेगा जब तक केन्द्रीय सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा उससे यह अपेक्षा न की जाए कि वह किसी उत्तरवर्ती राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में अनन्तिम रूप से सेवा करे ।
(3) केन्द्रीय सरकार, नियत दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, वह उत्तरवर्ती राज्य अवधारित करेगी जिसे उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रत्येक व्यक्ति सेवा के लिए अन्तिम रूप से आबंटित होगा और वह तारीख आधारित करेगी जिससे ऐसा आबंटन प्रभावी होगा या प्रभावी हुआ समझा जाएगा ।
(4) प्रत्येक व्यक्ति को जो उपधारा (3) के उपबन्धों के अधीन अन्तिम रूप से किसी उत्तरवर्ती राज्य को आबंटित किया जाए, यदि वह पहले से ही उस राज्य में सेवा न कर रहा हो तो, उस उत्तरवर्ती राज्य में, ऐसी तारीख से जो सम्बन्धित राज्यों के बीच करार पाई जाए, और ऐसे करार के अभाव में, जो केन्द्रीय सरकार अवधारित करे, सेवा करने के लिए उपलब्ध किया जाएगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित के सम्बन्ध में अपनी सहायता के प्रयोजन के लिए, आदेश द्वारा, एक या अधिक सलाहकार समितियां स्थापित कर सकती है :-
(क) नए राज्यों और आन्ध्र प्रदेश तथा मद्रास राज्यों के बीच सेवाओं का विभाजन और एकीकरण; तथा
(ख) इस धारा के उपबन्धों द्वारा प्रभावित सब व्यक्तियों के साथ ऋजु और साम्यापूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना और ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए किसी अभ्यावेदन पर उचित विचार करना ।
(6) इस धारा के पूर्वगामी उपबन्ध किसी ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में लागू नहीं होंगे जिसे धारा 114 के उपबन्ध लागू हैं ।
(7) इस धारा की कोई भी बात, नियत दिन के पश्चात् संघ के या किसी राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में सेवा करने वाले व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के अवधारण के सम्बन्ध में संविधान के भाग 14 के अध्याय 1 के उपबन्धों के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी :
परन्तु उपधारा (1) के या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के मामले को नियत दिन के ठीक पूर्व लागू होने वाली सेवा की शर्तों में उसके लिए अहितकर रूप में फेरफार केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के बिना नहीं किया जाएगा ।
116. अधिकारियों के उन्हीं पदों में बनाए रहने के बारे में उपबन्ध-(1) प्रत्येक व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व संघ के या किसी विद्यमान राज्य के कार्यकलाप के सम्बन्ध में, किसी ऐसे क्षेत्रे में जो उस दिन किसी अन्य विद्यमान राज्य या नए *** राज्य या [संघ राज्यक्षेत्र] के भीतर आता हो, किसी पद या अधिकार पद को धारण करता हो या उसके कर्तव्यों का निर्वहन करता हो, तब के सिवाय जब इस अधिनियम के उपबन्धों के आधार पर या उसके परिणामस्वरूप ऐसा पद या अधिकार पद अस्तित्वहीन हो जाता है अन्य ऐसे विद्यमान राज्य या नए 1*** राज्य या 2[संघ राज्यक्षेत्र] में जिसमें ऐसा क्षेत्र उस दिन सम्मिलित है उसी पद या अधिकार पद को धारण करता रहेगा और उस दिन से यथास्थिति, राज्य की सरकार द्वारा या उस राज्य में अन्य सम्बन्धित प्राधिकारी द्वारा, या केन्द्रीय सरकार द्वारा या ऐसे 2[संघ राज्यक्षेत्र] में अन्य समुचित प्राधिकारी द्वारा, ऐसे पद या अधिकार पद पर सम्यक् रूप से नियुक्त समझा जाएगा ।
(2) इस धारा की कोई बात किसी सक्षम प्राधिकारी को, नियत दिन के पश्चात् ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में उसके ऐसे पद या अधिकार पद पर बने रहने पर प्रभाव डालने वाला आदेश पारित करने से निवारित करने वाली नहीं समझी जाएगी ।
117. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार नियत दिन के पूर्व या पश्चात् किसी समय किसी राज्य सरकार को ऐसे निदेश दे सकती है जो उसे इस भाग के पूर्वगामी उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों और राज्य सरकार ऐसे निदेशों का अनुपालन करेगी ।
118. राज्य लोक सेवा आयोगों के बारे में उपबन्ध-(1) विद्यमान मुम्बई, मैसूर, पंजाब, राजस्थान और तिरुवांकुर-कोचीन राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग, नियत दिन से तत्स्थानी नए राज्यों के लोक सेवा आयोग समझे जाएंगे ।
(2) विद्यमान हैदराबाद, मध्य भारत, मध्य प्रदेश, पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन तथा सौराष्ट्र राज्यों के लिए लोक सेवा आयोग, नियत दिन से अस्तित्वहीन हो जाएंगे ।
(3) उपधारा (2) में उल्लिखित आयोगों में से किसी आयोग के अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियत दिन के ठीक पूर्व पद धारण करने वाला प्रत्येक व्यक्ति-
(क) आन्ध्र प्रदेश, मुम्बई, मध्य प्रदेश, पंजाब और मैसूर राज्यों के लिए लोक सेवा आयोगों में से ऐसे किसी एक का, जैसा कि राष्ट्रपति आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, सदस्य हो जाएगा, और यदि ऐसा विनिर्दिष्ट किया जाए तो उसका अध्यक्ष भी हो जाएगा, और
(ख) ऐसे सदस्य या अध्यक्ष के रूप में, उस राज्य सरकार से सेवा की ऐसी शर्तें प्राप्त करने का हकदार होगा जो उन शर्तों से कम अनुकूल नहीं होंगी जिनका वह नियत दिन के ठीक पूर्व उसे लागू उपबन्धों के अधीन हकदार था ।
(4) ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो नियत दिन को उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन किसी लोक सेवा आयोग का सदस्य हो जाता है, अनुच्छेद 316 के खण्ड 2 के परन्तुक के अधीन रहते हुए, नियत दिन के ठीक पूर्व उसे लागू उपबन्धों के अधीन यथा अवधारित अपनी पदावधि की समाप्ति पर्यन्त पद धारण करेगा या पद पर बना रहेगा ।
भाग 11
विधिक और प्रकीर्ण उपबन्ध
119. विधियों का राज्यक्षेत्रीय विस्तार-भाग 2 के उपबन्धों की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि उनसे उन राज्यक्षेत्रों में जिन पर नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त कोई विधि विस्तारित होती है या लागू होती है, कोई परिवर्तन हुआ है और ऐसी किसी विधि में किसी विद्यमान राज्य के प्रति राज्यक्षेत्रीय निर्देशों का, जब तक कि किसी सक्षम विधान-मण्डल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्यथा उपबन्धित न हो तब तक, यही अर्थ लगाया जाएगा मानो वे नियत दिन के ठीक पूर्व उस राज्य के भीतर के राज्यक्षेत्र हों ।
120. विधियों के अनुकूलन की शक्ति-भाग 2 के उपबंधों द्वारा बनाए गए या राज्यक्षेत्रीय रूप से परिवर्तित किए गए राज्यों [या संघ राज्यक्षेत्रों] में से किसी के संबंध में किसी विधि के लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए समुचित सरकार, नियत दिन से एक वर्ष के अवसान के पूर्व, आदेश द्वारा, उस विधि में ऐसे अनुकूलन तथा उपांतर, चाहे वे निरसन के रूप में हों या संशोधन के रूप में हों, जैसा आवश्यक या समीचीन हो, कर सकेगी और तदुपरि ऐसी प्रत्येक विधि, जब तक सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित नहीं कर दी जाए, तब तक इस प्रकार किए गए अनुकूलनों और उपान्तरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा में, “समुचित सरकार" पद से-
(क) संघ सूची में प्रगणित किसी विषय से संबंधित किसी विधि के बारे में, केन्द्रीय सरकार; और
(ख) किसी अन्य विधि के बारे में,-
(i) उसके किसी *** राज्य सरकार को लागू होने की बाबत, राज्य सरकार, और
(ii) उसके किसी [संघ राज्यक्षेत्र] को लागू होने की बाबत, केन्द्रीय सरकार,
अभिप्रेत है ।
121. विधियों के अर्थान्वयन की शक्ति-इस बात के होते हुए भी कि नियत दिन के पूर्व बनाई गई किसी विधि के अनुकूलन के लिए, धारा 120 के अधीन कोई उपबन्ध नहीं किया गया है या अपर्याप्त उपबंध किया गया है, ऐसी विधि को प्रवर्तित करने के लिए अपेक्षित या सशक्त किया गया कोई न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी, किसी ऐसे राज्य 1[या संघ राज्यक्षेत्र] के सम्बन्ध में, जो भाग 2 के उपबंधों द्वारा बनाया गया है या राज्यक्षेत्रीय रूप से परिवर्तित किया गया है, उसके लागू होने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए, उस विधि का अर्थान्वयन, उसके सार पर प्रभाव डाले बिना, ऐसी रीति से कर सकेगी जो उस न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकारी के समक्ष के मामले की बाबत आवश्यक या उचित हो ।
122. कानूनी कृत्यों का प्रयोग करने वाले प्राधिकारियों आदि को नामित करने की शक्ति-किसी 3[संघ राज्यक्षेत्र] की बाबत केन्द्रीय सरकार और किसी नए राज्य या किसी अंतरित राज्यक्षेत्र की बाबत राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसा प्राधिकारी, अधिकारी या व्यक्ति विनिर्दिष्ट कर सकेगी जो, नियत दिन से, उस दिन प्रवृत्त किसी विधि के अधीन ऐसे प्रयोक्तव्य कृत्यों का प्रयोग करने के लिए, जो उस अधिसूचना में उपवर्णित हो, सक्षम होगा और ऐसी विधि तदनुसार प्रभावी होगी ।
123. विधिक कार्यवाहियां-जहां संघ या कोई विद्यमान राज्य नियत दिन के ठीक पूर्व, इस अधिनियम के अधीन प्रभाजनाधीन किसी संपत्ति, अधिकार या दायित्व की बाबत किन्हीं विधिक कार्यवाहियों का पक्षकार हो, वहां वह उत्तरवर्ती राज्य को इस अधिनियम के उपबंधों के आधार पर उस सम्पत्ति या उन अधिकारों या दायित्वों का वारिस होता है, या उनमें कोई अंश अर्जित करता है, उन कार्यवाहियों के पक्षकार के रूप में संघ या विद्यमान राज्य के स्थान पर प्रतिस्थापित किया गया समझा जाएगा, या उसमें पक्षकार के रूप में जोड़ा जाएगा, और कार्यवाहियां तदनुसार चालू रखी जा सकेंगी ।
124. कतिपय न्यायालयों में विधि-व्यवसाय करने का [लीडरों का अधिकार-कोई व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व, भाग 2 के उपबंधों द्वारा प्रभावित किसी विद्यमान राज्य में, किन्हीं अधीनस्थ न्यायालयों में विधि-व्यवसाय करने के हकदार प्लीडर के रूप में नामावलित हो, उस दिन से छह मास की अवधि के लिए इस बात के होते हुए भी कि उन न्यायालयों की अधिकारिता के भीतर सम्पूर्ण राज्यक्षेत्र या उनका कोई भाग किसी अन्य राज्य को अंतरित कर दिया गया है, उन न्यायालयों में विधि-व्यवसाय करने का हकदार बना रहेगा ।
125. कतिपय लंबित कार्यवाहियों के बारे में उपबन्ध-(1) किसी ऐसे क्षेत्र में, जो उस दिन किसी राज्य के भीतर आता हो, नियत दिन के ठीक पूर्व, किसी न्यायालय (उच्च न्यायालय से भिन्न), अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी के समक्ष लंबित प्रत्येक कार्यवाही, यदि वह कार्यवाही अनन्यतः ऐसे राज्यक्षेत्र के किसी भाग से संबंधित हो जो राज्यक्षेत्र उस दिन से किसी अन्य राज्य के राज्य-क्षेत्र हैं [या संघ राज्यक्षेत्र बन गए हैं], 1[यथास्थिति], अन्य राज्य 1[या संघ राज्यक्षेत्र] में तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी को अंतरित हो जाएगी ।
(2) यदि कोई प्रश्न उठता है कि क्या उपधारा (1) के अधीन कोई कार्यवाही अंतरित हो जानी चाहिए तो वह उस क्षेत्र के सम्बन्ध में अधिकारिता रखने वाले उच्च न्यायालय को, जिस क्षेत्र में, वह न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी, जिसके समक्ष ऐसी कार्यवाही नियत दिन को लंबित है, कृत्य कर रहा है, निर्देशित किया जाएगा और उस उच्च न्यायालय का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(3) इस धारा में,-
(क) कार्यवाही" के अंतर्गत कोई वाद, मामला या अपील भी है; तथा
(ख) किसी राज्य 1[या संघ राज्यक्षेत्र] में तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी" से अभिप्रेत है-
(i) उस राज्य 1[या संघ राज्यक्षेत्र] का वह न्यायालय या अधिकरण जिसमें वह प्राधिकारी या अधिकारी जिसके समक्ष वह कार्यवाही, यदि वह नियत दिन के पश्चात् संस्थित की जाती तो, रखी जाती, अथवा
(ii) शंका की दशा में, उस राज्य 1[या संघ राज्यक्षेत्र] का ऐसा न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी जो नियत दिन के पश्चात्, 1[यथास्थितिट, उस राज्य की सरकार 1[या केन्द्रीय सरकारट द्वारा अथवा नियत दिन के पूर्व तत्स्थानी राज्य की सरकार द्वारा तत्स्थानी न्यायालय, अधिकरण, प्राधिकारी या अधिकारी के रूप में अवधारित किया जाए ।
126. [भाग ग राज्यों के राष्ट्रीय महत्व के प्राचीन संस्मारकों आदि की घोषणा ।] प्राचीन संस्मारक तथा पुरातत्वीय स्थल और अवशेष अधिनियम, 1958 (1958 का 24) की धारा 39 द्वारा (15-10-1959 से) निरसित ।
127. अधिनियम के अन्य विधियों से असंगत उपबंधों का प्रभाव-इस अधिनियम के उपबन्ध किसी अन्य विधि में उनसे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
128. कठिनाइयां दूर करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई आती है तो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, कोई भी बात कर सकेगा जो ऐसे उपबन्धों से असंगत न हो तथा जो उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो ।
129. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।
[(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पडे़गा ।ट
130. 1951 के अधिनियम 49 का निरसन-(1) गवर्नमेंट आफ पोर्ट सी स्टेट्स ऐक्ट, 1951, नियत दिन से निरसित किया जाता है ।
(2) उक्त निरसन किसी भाग ग राज्य के विधान-मंडल द्वारा इस प्रकार निरसित अधिनियम द्वारा उस विधान-मंडल को प्रदत्त किसी शक्ति के आधार पर बनाई गई किसी विधि पर प्रभाव नहीं डालेगा, और नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त ऐसी सब विधियां ऐसे अनुकूलनों और उपांतरों के अधीन रहते हुए जो धारा 120 के अधीन उनमें किए जाएं, तब तक प्रवृत्त रहेंगी जब तक कि वे सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित नहीं कर दी जातीं ।
प्रथम अनुसूची
[धारा 28 (3) देखिए]
नीचे की सारणी के प्रथम स्तम्भ में विनिर्दिष्ट निर्वाचन-क्षेत्र का उक्त अनुसूची के द्वितीय स्तम्भ में उसके सामने विनिर्दिष्ट विद्यमान राज्य की विधान सभा में प्रतिनिधित्व करने वाला प्रत्येक आसीन सदस्य, नियत दिन से, उस निर्वाचन-क्षेत्र के सामने तृतीय स्तम्भ में विनिर्दिष्ट राज्य की विधान सभा के लिए निर्वाचित समझा जाएगा और उस विधान सभा का सदस्य नहीं रहेगा जिसका वह उस दिन के ठीक पूर्व सदस्य था ।
सारणी
|
निर्वाचन-क्षेत्र का नाम |
विद्यमान राज्य |
वह राज्य जिसको अंतरित किया गया है
|
|
(1) |
(2) |
(3) |
|
1.पालमपुर-आबू-बड़ागांवदांता |
मुम्बई |
मुम्बई |
|
2.चांदगढ़ |
मुम्बई |
मुम्बई |
|
3.हलसूर |
हैदराबाद |
मुम्बई |
|
4.उदगीर |
हैदराबाद |
मुम्बई |
|
5.कोड़ंगल |
हैदराबाद |
आंध्र प्रदेश |
|
6.तांदूर-सेरम |
हैदराबाद |
मैसूर |
|
7.बिदार |
हैदराबाद |
मैसूर |
|
8.जहिराबाद |
हैदराबाद |
आन्ध्र प्रदेश |
|
9.मधोल |
हैदराबाद |
आन्ध्र प्रदेश |
|
10.देगलूर |
हैदराबाद |
मुम्बई |
|
11.किंवट |
हैदराबाद |
मुम्बई |
|
12.असिफाबाद |
हैदराबाद |
आन्ध्र प्रदेश |
|
13.मानपुरा |
मध्य भारत |
मध्य प्रदेश |
|
14.पानेमंगलूर |
मद्रास |
मैसूर |
द्वितीय अनुसूची
[धारा 35 (2) देखिए]
परिषद् निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन (मद्रास) आदेश, 1951 में उपांतरण
सारणी में-
(क) मद्रास (स्नातक) निर्वाचन-क्षेत्र से संबंधित प्रविष्टि के स्थान पर निम्नलिखित रखिए :-
मद्रास (स्नातक) सम्पूर्ण राज्य ... [6]";
(ख) मद्रास (शिक्षक) निर्वाचन-क्षेत्र से संबंधित द्वितीय स्तम्भ में की प्रविष्टि के स्थान पर सम्पूर्ण राज्य" प्रविष्टि रखिए;
(ग) तृतीय स्तम्भ में जहां कहीं 3" अंक आया है उसके स्थान पर 4" अंक रखिए; और
(घ) पश्चिम तट (स्थानीय प्राधिकारी) निर्वाचन-क्षेत्र से संबंधित प्रविष्टि का लोप कीजिए ।
तृत्तीय अनुसूची
(धारा 40 देखिए)
लोक सभा में स्थानों का आबंटन और राज्य विधान सभाओं को स्थानों का समनुदेशन
लोक सभा में प्रत्येक राज्य [और संघ राज्यक्षेत्र] को आबंटित स्थानों की संख्या और [जम्मू-कश्मीर से भिन्न] प्रत्येक 3[राज्य] को विधान सभा में समनुदेशित स्थानों की संख्या निम्नलिखित सारणी में दिखाए गए के अनुसार होगी :-
सारणी
|
*** |
लोक सभा में स्थानों की संख्या |
विधान सभा में स्थानों की संख्या |
|
1.आन्ध्र प्रदेश |
43 |
301 |
|
2.असम |
12 |
108 |
|
3.बिहार |
55 |
330 |
|
4.मुम्बई |
66 |
396 |
|
5.केरल |
18 |
126 |
|
6.मध्य प्रदेश |
36 |
288 |
|
7.मद्रास |
41 |
205 |
|
8.मैसूर |
26 |
208 |
|
9.उड़ीसा |
20 |
140 |
|
10.पंजाब |
22 |
154 |
|
11.राजस्थान |
22 |
176 |
|
12.उत्तर प्रदेश |
86 |
430 |
|
13.पश्चिमी बंगाल |
34 |
238 |
|
14.जम्मू-कश्मीर |
6 |
|
|
15.दिल्ली |
5 |
|
|
16.हिमाचल प्रदेश |
4 |
|
|
17.मणिपुर |
2 |
|
|
18.त्रिपुरा |
2 |
|
चतुर्थ अनुसूची
[धारा 74(1) देखिए]
1. संघ उत्पाद-शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1953 की धारा 3 का उपांतरित प्ररूप
3. संघ उत्पाद-शुल्क के भाग का राज्यों के बीच वितरण-(1) 1956 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारम्भ होने वाले वित्तीय वर्ष के प्रथम आधे भाग के दौरान भारत की संचित निधि में से नीचे की सारणी के स्तम्भ 1 में विनिर्दिष्ट राज्यों में से प्रत्येक को आधे वर्ष के लिए वितरणीय संघ उत्पाद-शुल्क का ऐसा प्रतिशत संदत्त किया जाएगा जो स्तम्भ 2 में उसके सामने दिया गया है :-
सारणी
|
राज्य |
प्रतिशत |
आन्ध्र प्रदेश . . . . . . . . 5.92
असम . . . . . . . . 2.61
बिहार . . . . . . . . 11.60
मुम्बई . . . . . . . . 10.37
हैदराबाद . . . . . . . . 5.39
मध्य भारत . . . . . . . . 2.29
मध्य प्रदेश . . . . . . . . 6.13
मद्रास . . . . . . . . 10.30
मैसूर . . . . . . . . 2.84
उड़ीसा . . . . . . . . 4.22
पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन. . . . . . 1.00
पंजाब . . . . . . . . 3.66
राजस्थान . . . . . . . . 4.41
सौराष्ट्र . . . . . . . . 1.19
तिरुवांकुर-कोचीन . . . . . . . 2.68
उत्तर प्रदेश . . . . . . . . 18.23
पश्चिमी बंगाल . . . . . . . 7.16
(2) उक्त वित्तीय वर्ष के दूसरे आधे भाग के दौरान भारत की संचित निधि में से नीचे की सारणी के स्तम्भ 1 में विनिर्दिष्ट राज्यों में से प्रत्येक को उस आधे वर्ष के लिए वितरणीय संघ उत्पाद-शुल्क का ऐसा प्रतिशत, जो स्तम्भ 2 में उसके सामने दिया गया है, और उक्त शुल्क का ऐसा अतिरिक्त प्रतिशत, यदि कोई हो, जो स्तम्भ 3 में उसके सामने दिया गया है, संदत्त किया जाएगा :
सारणी
|
राज्य |
प्रतिशत |
अतिरिक्त प्रतिशत |
|
आन्ध्र प्रदेश |
9.03 |
.. |
|
असम |
2.61 |
.. |
|
बिहार |
11.60 |
.. |
|
मुम्बई |
12.57 |
1.19 |
|
केरल |
1.49 |
2.42 |
|
मध्य प्रदेश |
6.25 |
.. |
|
मद्रास |
8.39 |
0.26 |
|
मैसूर |
2.90 |
2.62 |
|
उड़ीसा |
4.22 |
.. |
|
पंजाब |
4.66 |
.. |
|
राज्य |
प्रतिशत |
अतिरिक्त प्रतिशत |
|
राजस्थान |
4.40 |
.. |
|
उत्तर प्रदेश |
18.23 |
.. |
|
पश्चिमी बंगाल |
7.16 |
.. |
(3) इस धारा के प्रयोजनों के लिए-....
(क) 1956 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारम्भ होने वाले वित्तीय वर्ष के प्रथम आधे भाग और द्वितीय आधे भाग से यह समझा जाएगा कि वे उस वित्तीय वर्ष के क्रमशः प्रथम सात मास और अन्तिम पांच मास हैं ।
(ख) उक्त वित्तीय वर्ष के प्रथम आधे भाग और द्वितीय आधे भाग के लिए वितरणीय संघ उत्पाद-शुल्क उस वित्तीय वर्ष के लिए वितरणीय संघ उत्पाद-शुल्क का क्रमशः 7/12 और 5/12 समझा जाएगा ।
2. संविधान (राजस्व वितरण) आदेश, 1953 के पैरा 3 और 5 का उपांतरित प्ररूप
3. (1) अनुच्छेद 270 के खण्ड (2) के प्रयोजनों के लिए, 1956 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारम्भ होने वाले वित्तीय वर्ष के प्रथम आधे भाग के लिए भाग ग राज्यों को और द्वितीय आधे भाग के लिए [संघ राज्यक्षेत्रों को] संदेय आगम, आधे वर्ष के लिए आय पर करों के उतने शुद्ध आगमों के, जो संघ की उपलब्धियों की बाबत देय करों के शुद्ध आगमों के रूप में नहीं हैं, क्रमशः 23/4 प्रतिशत और 1 प्रतिशत माने जाएंगे ।
(2) अनुच्छेद 270 के खण्ड (2) के अधीन (जम्मू-कश्मीर राज्य से भिन्न) भाग क राज्यों और भाग ख राज्यों को उक्त वित्तीय वर्ष के प्रथम आधे भाग में समनुदेशित किया जाने वाला आय पर करों के शुद्ध आगमों का प्रतिशत, सिवाय वहां तक जहां तक कि ऐसे आगम भाग ग राज्यों को देय आगमों या संघ की उपलब्िधयों की बाबत देय करों के रूप में हैं, 55 प्रतिशत होगा; और इस प्रकार समनुदेशित की जाने वाली कुल रकम उक्त राज्यों में निम्नलिखित रूप में वितरित की जाएगी :-
|
राज्य |
प्रतिशत |
|
आन्ध्र प्रदेश |
5.49 |
|
असम |
2.25 |
|
बिहार |
9.75 |
|
मुम्बई |
17.50 |
|
हैदराबाद |
4.50 |
|
मध्य भारत |
1.75 |
|
मध्य प्रदेश |
5.25 |
|
मद्रास |
9.56 |
|
मैसूर |
2.45 |
|
उड़ीसा |
3.50 |
|
पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन |
0.75 |
|
पंजाब |
3.25 |
|
राजस्थान |
3.50 |
|
सौराष्ट्र |
1.00 |
|
तिरुवांकुर-कोचीन |
2.50 |
|
उत्तर प्रदेश |
15.75 |
|
पश्चिमी बंगाल |
11.25 |
(3) अनुच्छेद 270 के खण्ड (2) के अधीन [(जम्मू-कश्मीर राज्य से भिन्न) राज्योंट को उक्त वित्तीय वर्ष के द्वितीय आधे भाग में समनुदेशित किए जाने वाली आय पर करों के शुद्ध आगमों का प्रतिशत, सिवाय वहां तक जहां तक कि ऐसे आगम [संघ राज्यक्षेत्रोंट को देय आगमों या संघ की उपलब्धियों की बाबत देय करों के रूप में हैं, 55 प्रतिशत होगा; और इस प्रकार समनुदेशित की जाने वाली कुल रकम उक्त राज्यों में निम्नलिखित रूप से वितरित की जाएगी :-
|
राज्य |
प्रतिशत |
अतिरिक्त प्रतिशत |
|
आन्ध्र प्रदेश |
8.09 |
__ |
|
असम |
2.25 |
__ |
|
बिहार |
9.75 |
__ |
|
मुम्बई |
18.10 |
1.00 |
|
केरल |
1.38 |
2.26 |
|
मध्य प्रदेश |
5.14 |
__ |
|
मद्रास |
7.79 |
0.24 |
|
मैसूर |
3.74 |
2.25 |
|
उड़ीसा |
3.50 |
__ |
|
पंजाब |
4.00 |
__ |
|
राजस्थान |
3.51 |
__ |
|
उत्तर प्रदेश |
15.75 |
__ |
|
पश्चिमी बंगाल |
11.25 |
__ |
(4) इस पैरा के प्रयोजनों के लिए-
(क) 1956 के अप्रैल के प्रथम दिन को प्रारम्भ होने वाले वित्तीय वर्ष के प्रथम आधे भाग और द्वितीय आधे भाग से यह समझा जाएगा कि वे उस वित्तीय वर्ष के क्रमशः प्रथम सात मास और अंतिम पांच मास हैं;
(ख) उक्त वित्तीय वर्ष के प्रथम आधे भाग और द्वितीय आधे भाग के लिए आय पर करों के शुद्ध आगम उक्त वित्तीय वर्ष के लिए ऐसे करों के शुद्ध आगमों का क्रमशः 7/12 और 5/12 समझा जाएगा;
5. (1) अनुच्छेद 275 के खण्ड (1) के उपबंधों के अनुसार भारत की संचित निधि पर निम्नलिखित राशियां भारित की जाएंगी-
(क) उक्त वित्तीय वर्ष के प्रथम सात मासों में नीचे विनिर्दिष्ट राज्यों में से प्रत्येक के राजस्व को सहायता-अनुदान के रूप में, उनके सामने विनिर्दिष्ट राशियां :
(i) साधारण प्रयोजनों के लिए-
असम 58.33 लाख रुपए
मैसूर 23.33 लाख रुपए
उड़ीसा 43.75 लाख रुपए
पंजाब 72.92 लाख रुपए
सौराष्ट्र 23.33 लाख रुपए
तिरुवांकुर-कोचीन 26.47 लाख रुपए
पश्चिमी बंगाल 46.67 लाख रुपए
(ii) प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए-
बिहार 48.42 लाख रुपए
हैदराबाद 23.33 लाख रुपए
मध्य भारत 10.50 लाख रुपए
मध्य प्रदेश 29.17 लाख रुपए
उड़ीसा 18.67 लाख रुपए
पटियाला एण्ड ईस्ट पंजाब स्टेट्स यूनियन 5.25 लाख रुपए पंजाब 16.33 लाख रुपए
राजस्थान 23.33 लाख रुपए
(ख) उक्त वित्तीय वर्ष के शेष पांच मासों में, नीचे विनिर्दिष्ट राज्यों में से प्रत्येक के राजस्व को सहायता-अनुदान के रूप में उनके सामने विनिर्दिष्ट राशियां :
(i) साधारण प्रयोजनों के लिए-
असम 41.67 लाख रुपए
मैसूर 16.67 लाख रुपए
उड़ीसा 31.25 लाख रुपए
पंजाब 52.08 लाख रुपए
मुम्बई 16.67 लाख रुपए
केरल 16.93 लाख रुपए
मद्रास 1.82 लाख रुपए
पश्चिमी बंगाल 33.33 लाख रुपए
(ii) प्राथमिक शिक्षा के विस्तार के लिए-
बिहार 34.58 लाख रुपए
आन्ध्र प्रदेश 9.62 लाख रुपए
मैसूर 2.41 लाख रुपए
मुम्बई 12.10 लाख रुपए
मध्य प्रदेश 20.98 लाख रुपए
उड़ीसा 13.33 लाख रुपए
पंजाब 15.42 लाख रुपए
राजस्थान 16.56 लाख रुपए
(2) भारत की संचित निधि पर-
(क) उक्त वित्तीय वर्ष के प्रथम सात मासों में मैसूर, सौराष्ट्र और तिरुवांकुर-कोचीन राज्यों में से प्रत्येक को सहायता-अनुदान के रूप में, इस आदेश के पैरा 3 के उपपैरा (2) के अधीन और संघ उत्पाद-शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1953 की धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन उस राज्य को देय रकमों का योग क्रमशः 201.25 लाख रुपए, 160.42 लाख रुपए और 163.33 लाख रुपए से जितना कम पड़े उतनी राशि; और
(ख) उक्त वित्तीय वर्ष के शेष पांच मासों में मैसूर, मुम्बई, केरल और मद्रास राज्यों में से प्रत्येक को सहायता-अनुदान के रूप में, इस आदेश के पैरा 3 के उपपैरा (2) के अधीन और उक्त अधिनियम की धारा 3 की उपधारा (2) के अधीन अतिरिक्त प्रतिशत के रूप में उस राज्य को देय रकमों का योग क्रमशः 143.75 लाख रुपए, 114.58 लाख रुपए, 105.38 लाख रुपए और 11.29 लाख रुपए से जितना कम पड़े उतनी राशि,
भी पारित की जाएगी ।
(3) इस पैरा के अधीन देय कोई रकम या रकमें अनुच्छेद 275 के खंड (1) के परन्तुकों में से प्रत्येक के अधीन राज्यों को देय किसी रकम या किन्हीं रकमों के अतिरिक्त होंगी ।
पांचवीं अनुसूची
(धारा 86 देखिए)
पेंशनों के बारे में दायित्व का प्रभाजन
1. पैरा 3 में वर्णित समायोजनों के अधीन रहते हुए, उत्तरवर्ती राज्य या उत्तरवर्ती राज्यों में से प्रत्येक राज्य, नियत दिन के पूर्व किसी विद्यमान राज्य द्वारा मंजूर की गई पेंशनों की बाबत, अपने खजानों में से दी जाने वाली पेंशनें देगा ।
2. उक्त समयोजनों के अधीन रहते हुए, किसी विद्यमान राज्य के कार्यकलापों के संबंध में सेवा करने वाले उन अधिकारियों की पेंशनों के बारे में दायित्व, जो नियत दिन के पूर्व निवृत्त होते हैं, या सेवानिवृत्ति पूर्व छुट्टी पर चले जाते हैं, किन्तु पेंशनों के लिए जिनके दावे उस दिन के ठीक पूर्व बकाया हैं, उत्तरवर्ती राज्य का होगा और यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हों तो उनमें से उस राज्य का होगा जिसे केन्द्रीय सरकार आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
3. किसी ऐसे मामले में जहां दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हों, नियत दिन को प्रारम्भ होने वाली और 1957 के मार्च के 31वें दिन समाप्त होने वाली अवधि की बाबत तथा प्रत्येक पश्चात्वर्ती वित्तीय वर्ष की बाबत, पैरा 1 और 2 में निर्दिष्ट पेंशनों की बाबत सभी उत्तरवर्ती राज्यों में किए गए कुल संदायों की गणना की जाएगी । पेंशनों की बाबत विद्यमान राज्य के दायित्व की कुल रकम का प्रभाजन उत्तरवर्ती राज्यों के बीच जनसंख्या के अनुपात में किया जाएगा और अपने द्वारा देय अंश से अधिक का संदाय करने वाले किसी उत्तरवर्ती राज्य को आधिक्य की रकम की उत्तरवर्ती राज्य द्वारा या कम संदाय करने वाले राज्यों द्वारा प्रतिपूर्ति की जाएगी
4. (1) नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान राज्य के कार्यकलापों के संबंध में सेवा करने वाले और उस दिन को या उसके पश्चात् निवृत्त होने वाले किसी अधिकारी की पेंशन की बाबत दायित्व उस उत्तरवर्ती राज्य का होगा जो उसे पेंशन मंजूर करता है, किन्तु नियत दिन के पूर्व किसी विद्यमान राज्य के कार्यकलाप से संबंधित ऐसे किसी अधिकारी की सेवा के परिणामस्वरूप पेंशन का प्रभाग, यदि दो या अधिक उत्तरवर्ती राज्य हों तो उन राज्यों में जनसंख्या के अनुपात में आबंटित किया जाएगा और, वह सरकार, जो पेंशन मंजूर करती है, अन्य उत्तरवर्ती राज्यों में से प्रत्येक से इस दायित्व का अपना अंश प्राप्त करने का हकदार होगी ।
(2) यदि ऐसा कोई अधिकारी नियत दिन के पश्चात् एक से अधिक उत्तरवर्ती राज्य के कार्यकलापों के संबंध में सेवा कर रहा था तो, पेंशन मंजूर करने वाले राज्य से भिन्न उत्तरवर्ती राज्य, उस सरकार को जिसके द्वारा पेंशन मंजूर की गई है, ऐसी रकम की प्रतिपूर्ति करेगा जिसका नियत दिन के पश्चात् की उसकी सेवा के कारण दी जा सकने वाले पेंशन के प्रभाग से वही अनुपात होगा जो उस उत्तरवर्ती राज्य के अधीन नियत दिन के पश्चात् की उसकी अर्हक सेवा का उस अधिकारी की उसकी पेंशन के प्रयोजनार्थ परिकलित नियत दिन के पश्चात् की कुल सेवा से हो ।
(3) उक्त कुल अर्हक सेवा की गणना करने में, विद्यमान अजमेर, भोपाल, कुर्ग, कच्छ, और विन्ध्य प्रदेश राज्यों में से किसी के उपराज्यपाल या मुख्य आयुक्त के प्रशासनिक नियंत्रण के अधीन, संघ के कार्यकलापों के संबंध में ऐसे अधिकारी द्वारा नियत दिन के पूर्व की कोई सेवा जोड़ दी जाएगी मानो उक्त सेवा नियत दिन के पश्चात् उत्तरवर्ती राज्य के कार्यकलापों के संबंध में उस विद्यमान राज्य के प्रति सेवा थी ।
5. इस अनुसूची में पेंशन के प्रति किसी निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत पेंशन के संराशिकृत मूल्य के प्रति निर्देश भी है ।
छठी अनुसूची
(धारा 113 देखिए)
(1) इंजीनियरी महाविद्यालय और तकनीकी विद्यालय ।
(2) चिकित्सा महाविद्यालय ।
(3) कृषि महाविद्यालय ।
(4) पशु चिकित्सा महाविद्यालय ।
(5) विशेष उपचारों के लिए व्यवस्था करने वाले सरकारी अस्पताल, जैसे-
(i) यक्ष्मा अस्पताल और सैनिटोरियम,
(ii) कैंसर के अस्पताल,
(iii) रेडियम संस्थान,
(iv) मानसिक चिकित्सा अस्पताल,
(v) कुष्ठ रोग अस्पताल और सैनिटोरियम, तथा
(iv) यूनानी या आयुर्वेदिक उपचार की व्यवस्था करने वाले अस्पताल ।
(6) अनुसंधान संस्थान, जैसे,-
(i) कृषि अनुसंधान संस्थान,
(ii) सरकारी विश्लेषक विभाग, और
(iii) सीरम संस्थान ।
(7) केन्द्रीय जेलें ।
(8) बोर्सटल विद्यालय, सुधार विद्यालय और प्रमाणित विद्यालय ।
(9) पुलिस प्रशिक्षण महाविद्यालय और संस्थान ।
(10) अग्नि सेवा प्रशिक्षण विद्यालय ।
(11) अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और पिछड़े वर्गों के लिए होस्टल ।
(12) फोटो रजिस्ट्री कार्यालय ।
(13) केन्द्रीय अभिलेख कार्यालय ।
(14) वन विद्यालय ।
(15) अंगुलि छाप ब्यूरो ।
______

