प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962
(1962 का अधिनियम संख्यांक 34)
झ्र्15 सितम्बर, 1962ट
प्रपलायी अपराधियों के प्रत्यर्पण से झ्र्संबंधित विधि का समेकन और संशोधन
करने तथा उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक विषयों
का उपबंध करनेट के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के तेरहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :श्न्
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भश्न्(1) यह अधिनियम प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएंश्न्इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,श्न्
झ्र्(क) सम्मिश्र अपराधञ्ज् से किसी व्यक्ति का कोई ऐसा कार्य या आचरण अभिप्रेत है, जो पूर्णतः या भागतः किसी विदेशी राज्य या भारत में घटित हुआ है किंतु कुल मिलाकर उसका प्रभाव या आशयित प्रभाव, यथास्थिति, भारत में या किसी विदेशी राज्य में प्रत्यर्पण अपराध गठित करेगा ;ट
(ख) दोषसिद्धिञ्ज् और सिद्धदोषञ्ज् के अन्तर्गत ऐसी दोषसिद्धि या उसके प्रति निर्देश नहीं है जो विदेशी विधि के अधीन न्यायालय की अवज्ञा के लिए दोषसिद्धि है, किन्तु न्यायालय की अवज्ञा के लिए इस प्रकार सिद्धदोष व्यक्ति अभियुक्त व्यक्तिञ्ज् पद के अन्तर्गत आता है ;
झ्र्(ग) प्रत्यर्पण अपराधञ्ज् सेश्न्
(त्) ऐसे विदेशी राज्य के संबंध में, जो संधिबद्ध राज्य है, उस राज्य के साथ प्रत्पर्णण संधि में उपबंधित अपराध अभिप्रेत है ;
(त्त्) संधिबद्ध राज्य से भिन्न किसी विदेशी राज्य के संबंध में ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो भारत या किसी विदेशी राज्य की विधि के अधीन ऐसे कारावास से जिसकी अवधि एक वर्ष से कम की नहीं होगी दंडनीय है और इसके अंतर्गत सम्मिश्र अपराध है ;ट
(घ) प्रत्यर्पण संधिञ्ज् से प्रपलायी अपराधियों के प्रत्यर्पण के सम्बन्ध में किसी विदेशी राज्य के साथ भारत द्वारा की गई कोई संधि झ्र्करार या ठहरावट अभिप्रेत है और प्रपलायी अपराधियों के प्रत्यर्पण के सम्बन्ध में 1947 के अगस्त के 15वें दिन से पूर्व की गई ऐसी कोई संधि 5झ्र्करार या ठहरावट जिसका भारत पर विस्तार है और जो भारत पर आबद्धकर है इसके अन्तर्गत है ;
(ङ) विदेशी राज्यञ्ज् से ॥। भारत के बाहर का कोई राज्य अभिप्रेत है और ऐसे राज्य का प्रत्येक संघटक भाग, उपनिवेश या आश्रित देश इसके अन्तर्गत आता है ;
झ्र्(च) प्रपलायी अपराधीञ्ज् से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी विदेशी राज्य की अधिकारिता के भीतर किसी प्रत्यर्पण अपराध के लिए अभियुक्त है या सिद्धदोष ठहराया गया है और इसके अंतर्गत ऐसा व्यक्ति है जो, भारत में रहते हुए, किसी विदेशी राज्य में प्रत्यर्पण अपराध करने के लिए षड्यंत्र करता है, उसे करने का प्रयत्न करता है या उसका उद्दीपन करता है अथवा उसके किए जाने में सह-अपराधी के रूप में भाग लेता है ;ट
(छ) मजिस्ट्रेटञ्ज् से प्रथम वर्ग का मजिस्ट्रेट या प्रेसिडेन्सी मजिस्ट्रेट अभिप्रेत है ;
(ज) अधिसूचित आदेशञ्ज् से शासकीय राजपत्र में अधिसूचित आदेश अभिप्रेत है ;
(झ) विहितञ्ज् से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ञ) सन्धिबद्ध राज्यञ्ज् से ऐसा विदेशी राज्य अभिप्रेत है जिसके साथ प्रत्यर्पण सन्धि प्रवर्तन में है ।
3. अधिनियम का लागू होनाश्न् झ्र्(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अध्याय 3 से भिन्न उपबंध ऐसे विदेशी राज्य या उसके भाग को लागू होंगे जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए ।ट
(2) केन्द्रीय सरकार, उसी अधिसूचित आदेश द्वारा जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है या किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचित आदेश द्वारा ऐसे लागू होने को उन प्रपलायी अपराधियों तक निर्बन्धित कर सकेगी जो भारत के ऐसे भाग में जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट हो, पाए जाएं या जिनके वहां होने का संदेह हो ।
(3) जहां अधिसूचित आदेश का सम्बन्ध किसी सन्धिबद्ध राज्य से है, वहांश्न्
(क) उसमें उस राज्य के साथ हुई प्रत्यर्पण सन्धि पूर्ण रूप से उपवर्णित होगी ;
(ख) वह उस सन्धि से दीर्घतर कालावधि तक प्रवर्तित नहीं रहेगा ; और
(ग) केन्द्रीय सरकार, उसी अथवा किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचित आदेश द्वारा इस अधिनियम के लागू होने को ऐसे संशोधनों, अपवादों, शर्तों और विशेषताओं के अध्यधीन कर सकेगी जैसी उस राज्य के साथ सन्धि को कार्यान्वित करने के लिए समीचीन समझी जाएं ।
झ्र्(4) जहां किसी विदेशी राज्य के साथ भारत द्वारा कोई प्रत्यर्पण संधि नहीं की गई है वहां केन्द्रीय सरकार, अधिसूचित आदेश द्वारा, किसी ऐसे अभिसमय को, जिसके भारत और कोई विदेशी राज्य पक्षकार हैं, उस विदेशी राज्य के साथ भारत द्वारा की गई ऐसी प्रत्यर्पण संधि मान सकेगी जिसमें उस अभिसमय में विनिर्दिष्ट अपराधों को बाबत प्रत्यर्पण के लिए उपबंध किया गया है ।ट
अध्याय 2
विदेशी राज्यों को ॥। जिन पर अध्याय 3 लागू नहीं होता है,
प्रपलायी अपराधियों का प्रत्यर्पण
4. अभ्यर्पण के लिए अध्यपेक्षाश्न्किसी विदेशी राज्य ॥। के प्रपलायी अपराधी के अभ्यर्पण के लिए केन्द्रीय सरकार को अध्यपेक्षाश्न्
(क) उस विदेशी राज्य 6॥। के दिल्ली स्थित राजनयिक प्रतिनिधि के द्वारा की जा सकती है ; या
(ख) उस विदेशी राज्य 6॥। की सरकार द्वारा उस राज्य ॥। में स्थित उसके राजनयिक प्रतिनिधि की मार्फत केन्द्रीय सरकार से पत्र व्यवहार करके की जा सकती है,
और यदि इनमें से कोई भी रीति सुविधाजनक न हो तो अध्यपेक्षा ऐसी अन्य रीति से की जाएगी जैसी उस विदेशी राज्य 6॥। की सरकार द्वारा भारत सरकार के साथ ठहराव द्वारा तय की जाए ।
5. मजिस्ट्रेट द्वारा जांच का आदेशश्न्जहां ऐसी अध्यपेक्षा की जाती है वहां यदि केन्द्रीय सरकार ठीक समझती है तो वह किसी मजिस्ट्रेट को, जिसे ऐसे अपराध की जांच करने की अधिकारिता होती यदि वह अपराध उसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर किया गया होता, यह निदिष्ट करते हुए आदेश दे सकेगी कि वह मामले की जांच करे ।
6. गिरफ्तारी के लिए वांरट जानी करनाश्न्धारा 5 के अधीन केन्द्रीय सरकार के आदेश की प्राप्ति पर मजिस्ट्रेट प्रपलायी अपराधी को गिरफ्तार करने के लिए वारंट जारी करेगा ।
7. मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रक्रियाश्न्(1) जब प्रपलायी अपराधी मजिस्ट्रेट के समक्ष उपस्थित होता है या लाया जाता है तब मजिस्ट्रेट मामले की जांच, यथाशक्य उसी रीति से करेगा और उसे वैसी ही अधिकारिता और शक्तियां होंगी मानो वह मामला सेशन न्यायालय अथवा उच्च न्यायालय द्वारा विचारणीय हो ।
(2) पूर्वगामी उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, मजिस्ट्रेट विशेषकर ऐसा साक्ष्य लेगा जैसा विदेशी राज्य ॥। की अध्यपेक्षा के समर्थन में हो और जैसा प्रपलायी अपराधी की ओर से प्रस्तुत किया जाए, जिसके अन्तर्गत यह दर्शित करने वाला कोई साक्ष्य भी होगा कि वह अपराध जिसके लिए प्रपलायी अपराधी पर अभियोग लगाया गया है अथवा उसे सिद्धदोष ठहराया गया है, राजनीतिक स्वरूप का है या प्रत्यर्पण अपराध नहीं है ।
(3) यदि मजिस्ट्रेट की राय है कि विदेश राज्य 1॥। की अध्यपेक्षा के समर्थन में प्रथमदृष्ट्या मामला नहीं बन पाया है, तो वह प्रपलायी अपराधी को उन्मुक्त कर देगा ।
(4) यदि मजिस्ट्रेट की राय है कि विदेशी राज्य 1॥। की अध्यपेक्षा के समर्थन में प्रथमदृष्ट्या मामला बन गया है, तो वह प्रपलायी अपराधी को, केन्द्रीय सरकार के आदेशों की प्रतीक्षा करने तक के लिए कारबार के सुपुर्द कर सकेगा और जांच के परिणाम की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को करेगा और ऐसी रिपोर्ट के साथ ऐसा कोई लिखित कथन भी भेजेगा जिसे प्रपलायी अपराधी केन्द्रीय सरकार के विचारार्थ प्रस्तुत करना चाहे ।
8. प्रपलायी अपराधी का अभ्यर्पणश्न्यदि धारा 7 की उपधारा (4) के अधीन रिपोर्ट और कथन की प्राप्ति पर केन्द्रीय सरकार की राय है कि प्रपलायी अपराधी विदेशी राज्य 1॥। को अभ्यर्पित किया जाना चाहिए तो वह एक वारंट, प्रपलायी अपराधी की अभिरक्षा और उसके हटाए जाने के लिए और उसे वारंट में नामित व्यक्ति को और स्थान पर उसके सुपुर्द किए जाने के लिए जारी कर सकेगी ।
9. कतिपय मामलों में गिरफ्तारी का वारंट जारी करने की मजिस्ट्रेट की शक्तिश्न्(1) जहां किसी मजिस्ट्रेट को यह प्रतीत होता है कि उसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं में कोई व्यक्ति किसी विदेशी राज्य 1॥। का प्रपलायी अपराधी है तो वह मजिस्ट्रेट, यदि ठीक समझे तो, उस व्यक्ति की गिरफ्तारी का वारंट ऐसी इत्तिला और ऐसे साक्ष्य पर जारी कर सकता है जैसा उसकी राय में वारंट जारी करने को न्यायोचित ठहराता यदि वह अपराध, जिसके लिए उस व्यक्ति पर अभियोग लगाया गया है अथवा उसे सिद्धदोष ठहराया गया है, उसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर किया गया होता ।
(2) मजिस्ट्रेट उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए वारंट की रिपोर्ट तुरन्त केन्द्रीय सरकार को देगा और इत्तिला तथा साक्ष्य या उसकी प्रमाणित प्रतियां उस सरकार को भेजेगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए वारंट पर गिरफ्तार किया गया व्यक्ति तीन मास से अधिक तक निरुद्ध नहीं रखा जाएगा जब तक कि उस कालावधि के बीच मजिस्ट्रेट को केन्द्रीय सरकार से धारा 5 के अधीन ऐसे व्यक्ति के सम्बन्ध में किया गया कोई आदेश प्राप्त नहीं हो जाता ।
10. साक्ष्य में प्रदर्श, अभिसाक्ष्य और अन्य दस्तावेजों की प्राप्ति और उनका अधिप्रमाणनश्न्(1) किसी विदेशी राज्य 1॥। के किसी प्रपलायी अपराधी के विरुद्ध इस अध्याय के अधीन की जाने वाली किन्हीं कार्यवाहियों में प्रदर्श और अभिसाक्ष्य (चाहे उस व्यक्ति की उपस्थिति में या अन्यथा प्राप्त हों या लिए गए हों जिसके विरुद्ध उनका प्रयोग किया जाता है) और उनकी प्रतियां और तथ्यों के शासकीय प्रमाणपत्र और तथ्यों का कथन करने वाले न्यायिक दस्तावेज, यदि सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित हों तो, साक्ष्य के रूप में प्राप्त किए जा सकेंगे ।
(2) वारंट, अभिसाक्ष्य या शपथ पर कथन जिनका भारत से बाहर के किसी न्यायालय द्वारा लिया जाना या जारी किया जाना तात्पर्यित है या उनकी प्रतियां, या ऐसे किसी न्यायालय के समक्ष दोषसिद्धि के प्रमाणपत्र या तथ्यों का कथन करने वाले न्यायिक दस्तावेज, सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित समझे जांएगे, यदिश्न्
(क) वह वारंट ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है जो उस राज्य ॥। का है जहां वह जारी किया गया था या जो ऐसे राज्य में 2॥। या उसके लिए कार्य कर रहा था ;
(ख) वे अभिसाक्ष्य या कथन या उनकी प्रतियां, यथास्थिति, मूल अभिसाक्ष्य या कथन या उनकी सही प्रतियां ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या अधिकारी के हस्ताक्षर से प्रमाणित होनी तात्पर्यित है जो उस राज्य 2॥। का है जहां वे लिए गए थे या जो ऐसे राज्य 2॥। में या उसके लिए कार्य कर रहा था ;
(ग) दोषसिद्धि का प्रमाणपत्र या तथ्य का कथन करने वाली न्यायिक दस्तावेज ऐसे न्यायाधीश, मजिस्ट्रेट या अधिकारी द्वारा प्रमाणित होनी तात्पर्यित है जो उस राज्य ॥। का है जहां दोषसिद्धि हुई या जो ऐसे राज्य में या उसके लिए कार्य कर रहा है ;
(घ) यथास्थिति, वारंट, अभिसाक्ष्य, कथन, प्रतियां, प्रमाणपत्र और न्यायिक दस्तावेज किसी साक्षी की शपथ द्वारा या उस राज्य 1॥। के, जहां वे ॥। जारी किए या लिए या दिए गए थे, किसी मंत्री की शासकीय मुद्रा द्वारा अधिप्रमाणित किए गए हैं ।
11. अध्याय का उन कामनवेल्थ देशों को लागू न होना जिनको अध्याय 3 लागू होता हैश्न्इस अध्याय में अन्तर्विष्ट कोई बात प्रपलायी झ्र्अपराधियों को जिनको अध्याय 3 लागू होता हैट लागू नहीं होगी ।
अध्याय 3
प्रपलायी अपराधियों को प्रत्यर्पण ठहराव वाले झ्र्विदेशी राज्योंट को लौटाना
12. अध्याय का लागू होनाश्न्(1) यह अध्याय ऐसे किसी झ्र्विदेशी राज्यट को ही लागू होगा जिसे उस झ्र्राज्यट के साथ किए गए प्रत्यर्पण ठहराव के कारण उसे लागू करना केन्द्रीय सरकार को समीचीन प्रतीत हो ।
(2) प्रत्येक ऐसा लागूकरण अधिसूचित आदेश द्वारा होगा, और केन्द्रीय सरकार उसी या किसी पश्चात्वर्ती अधिसूचित आदेश द्वारा निदेश दे सकेगी कि यह अध्याय और अध्याय 1, 4 और 5 ऐसे किसी 5झ्र्विदेशी राज्यट के सम्बन्ध में ऐसे उपान्तरणों, अपवादों, शर्तों और विशेषताओं के अध्यधीन लागू होंगे जैसे वह उस ठहराव के कार्यान्वयन के लिए आदेश में विनिर्दिष्ट करना उचित समझे ।
13. कामनवैल्थ देशों के प्रपलायी अपराधियों का पकड़े जाने और लौटाए जाने के दायित्वाधीन होनाश्न्जब किसी 5झ्र्विदेशी राज्यट का जिसे यह अध्याय लागू होता है, कोई प्रपलायी अपराधी भारत में पाया जाता है तो वह पकड़े जाने और इस अध्याय में उपबन्धित रीति से उस 5झ्र्विदेशी राज्यट को लौटाए जाने के दायित्वाधीन होगा ।
14. पृष्ठांकित और अनन्तिम वारंटश्न्कोई भी प्रपलायी अपराधी भारत में किसी पृष्ठांकित वारंट या अनन्तिम वारंट के अधीन पकड़ा जा सकेगा ।
15. प्रपलायी अपराधी को पकड़ने के लिए पृष्ठांकित वारंटश्न्जब किसी प्रपलायी अपराधी को पकड़ने के लिए किसी 3झ्र्विदेशी राज्यट में, जिसको यह अध्याय लागू होता है, वारंट जारी किया गया है और ऐसा प्रपलायी अपराधी भारत में है या उसके यहां होने का संदेह है, तो केन्द्रीय सरकार, उस दशा में जिसमें उसका समाधान हो जाता है कि वह वारंट उसे जारी करने का विधिपूर्ण प्राधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा ही किया गया है, ऐसे वारंट को विहित रीति से पृष्ठांकित कर सकेगी और इस प्रकार पृष्ठांकित वारंट उसमें नामित व्यक्ति को पकड़ने और भारत में किसी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए पर्याप्त प्राधिकार होगा ।
16. प्रपलायी अपराधी को पकड़ने के लिए अनन्तिम वारंटश्न्(1) कोई भी मजिस्ट्रेट किसी 1झ्र्विदेशी राज्यट के, जिसको यह अध्याय लागू होता है, प्रपलायी अपराधी को पकड़ने के लिए, जो भारत में है या जिसके यहां होने का सन्देह है या जो यहां आ रहा है ऐसी इत्तिला पर और ऐसी परिस्थितियों के अधीन अनन्तिम वारंट जारी कर सकेगा जैसी उसके विचार में वारंट जारी करने को न्यायोचित ठहराती यदि वह अपराध, जिसका अभियोग प्रपलायी अपराधी पर लगाया गया है या वह सिद्धदोष ठहराया गया है, उसकी अधिकारिता के अन्दर किया गया होता ; और ऐसा वारन्ट तद्नुसार निष्पादित किया जा सकेगा ।
(2) अनन्तिम वारंट जारी करने वाला मजिस्ट्रेट वारंट के जारी करने की रिपोर्ट को उसकी इत्तिला या उसकी प्रमाणित प्रति के सहित तुरन्त केन्द्रीय सरकार को भेजेगा, और केन्द्रीय सरकार, यदि वह ठीक समझे तो ऐसे वारंट के अधीन पकड़े गए व्यक्ति को उन्मुक्त कर सकेगी ।
(3) प्रपलायी व्यक्ति जो अनन्तिम वारंट पर पकड़ा गया है एक समय पर सात दिन से अनधिक के इतने युक्तियुक्त समय के लिए, समय-समय पर, प्रतिप्रेषित किया जा सकेगा जितना उन परिस्थितियों में पृष्ठांकित वारंट पेश करने के लिए अपेक्षणीय प्रतीत हो ।
17. प्रपलायी अपराधी जब पकड़ा जाए तब उसके सम्बन्ध में कार्यवाहीश्न्(1) यदि उस मजिस्ट्रेट का जिसके समक्ष इस अध्याय के अधीन पकड़ा गया कोई व्यक्ति लाया जाता है, जांच पर समाधान हो जाता है कि प्रपलायी अपराधी को पकड़ने के लिए पृष्ठांकित वारंट सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित है और वह अपराध जिसका उस व्यक्ति पर अभियोग लगाया गया है या वह सिद्धदोष ठहराया गया है, प्रत्यर्पण अपराध है तो वह मजिस्ट्रेट, प्रपलायी अपराधी को उसके लौटाए जाने की प्रतीक्षा करने तक के लिए कारगार के सुपुर्द करेगा और सुपुर्दगी का एक प्रमाणपत्र तुरन्त केन्द्रीय सरकार को भेजेगा ।
(2) यदि ऐसी जांच पर मजिस्ट्रेट का यह विचार है कि पृष्ठांकित वारंट सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित नहीं है या कि वह अपराध जिसका ऐसे व्यक्ति पर अभियोग लगाया गया है या वह सिद्धदोष ठहराया गया है, प्रत्यर्पण अपराध नहीं है तो वह मजिस्ट्रेट केन्द्रीय सरकार के आदेशों की प्राप्ति तक के लिए ऐसे व्यक्ति को अभिरक्षा में निरुद्ध कर सकेगा अथवा उसे जमानत पर निर्मुक्त कर सकेगा ।
(3) मजिस्ट्रेट अपनी जांच के परिणाम की रिपोर्ट केन्द्रीय सरकार को करेगा और ऐसी रिपोर्ट के साथ, कोई लिखित कथन भी भेजेगा जिसे प्रपलायी अपराधी उस सरकार के विचारार्थ प्रस्तुत करने की इच्छा करे ।
18. प्रपलायी अपराधी को वारंट द्वारा लौटानाश्न्केन्द्रीय सरकार, प्रपलायी अपराधी को इस अध्याय के अधीन कारागार के सुपुर्द किए जाने के पश्चात् किसी भी समय एक वारंट उस प्रपलायी अपराधी की अभिरक्षा के लिए और उसे सम्बन्धित झ्र्विदेशी राज्यट को हटा दिए जाने के लिए और उस वारंट में नामित व्यक्ति को और स्थान पर उसके सुपुर्द किए जाने के लिए जारी कर सकेगा ।
अध्याय 4
अभियुक्त या सिद्धदोष व्यक्तियों का विदेशी राज्यों ॥। से अभ्यर्पण या लौटाया जाना
19. अभियुक्त या सिद्धदोष व्यक्ति के, जो किसी विदेशी राज्य में 2॥। है, भारत को अभ्यर्पण करने का, या लौटाने के लिए अध्यपेक्षा करने का ढंग या वारंट का प्ररूपश्न्(1) किसी ऐसे व्यक्ति के जो भारत में किए गए प्रत्यर्पण अपराध का अभियुक्त या उसका सिद्धदोष है और जो किसी विदेशी राज्य ॥। में, जिसे अध्याय 3 लागू नहीं होता है, है अथवा उसके वहां होने का संदेह है, अभ्यर्पण के लिए अध्यपेक्षा केन्द्रीय सरकार द्वारा,श्न्
(क) उस राज्य 3॥। के दिल्ली स्थित राजनयिक प्रतिनिधि को की जा सकेगी ; अथवा
(ख) उस राज्य 3॥। में भारत के राजनयिक प्रतिनिधि के मार्फत उस राज्य 3॥। की सरकार को की जा सकेगी,
और यदि इनमें से कोई भी रीति सुविधाजनक न हो तो अध्यपेक्षा ऐसी अन्य रीति से की जाएगी जैसी भारत सरकार द्वारा उस राज्य 3॥। के साथ ठहराव द्वारा तय की जाए ।
(2) किसी ऐसे व्यक्ति को पकड़ने के लिए, जो किसी ऐसे 1झ्र्विदेशी राज्यट में है या जिसके वहां होने का संदेह है जिसको अध्याय 3 लागू होता है, भारत में किसी मजिस्ट्रेट द्वारा जारी किया गया वारंट ऐसे प्ररूप में होगा जैसा विहित किया जाए ।
20. अभ्यर्पित या वापस किए गए अभियुक्त या सिद्धदोष व्यक्ति का ले जाया जानाश्न्किसी प्रत्यर्पण अपराध से सिद्धदोष या अभियुक्त व्यक्ति, जो किसी विदेशी राज्य 2॥। द्वारा अभ्यर्पित किया जाए या लौटाया जाए ऐसे राज्य 3॥। में जारी किए गए उसके अभ्यर्पण या लौटाए जाने के लिए गिरफ्तारी के वारंट के अधीन भारत में लाया जा सकेगा और विधि के अनुसार कार्यवाही किए जाने के लिए समुचित प्राधिकारी के सुपुर्द किया जा सकेगा ।
झ्र्21. विदेशी राज्य द्वारा अभ्यर्पित या लौटाए गए अभियुक्त या सिद्धदोष व्यक्ति का कतिपय अपराधों के लिए विचारण न किया जानाश्न्जब कभी किसी ऐसे अपराध के लिए अभियुक्त या सिद्धदोष व्यक्ति, जो यदि भारत में किया जाता तो प्रत्यर्पण अपराध होता, किसी विदेशी राज्य द्वारा अभ्यर्पित किया जाता है या लौटाया जाता है तब निम्नलिखित अपराध से भिन्न किसी अपराध के लिए ऐसे व्यक्ति का भारत में विचारण नहीं किया जाएगा, जब तक कि उसे उस राज्य को प्रत्यावर्तित नहीं कर दिया जाता या लौटने का अवसर नहीं मिल जाता, अर्थात् :श्न्
(क) वह प्रत्यर्पण अपराध, जिसके संबंध में वह अभ्यर्पित किया गया था या लौटाया गया था ; या
(ख) उस अपराध से भिन्न, जिसके संबंध में उसका अभ्यर्पण या लौटाए जाने का आदेश विधिपूर्वक नहीं किया जा सका है, उसकत्त् अभ्यर्पण या लौटाया जाना सुनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिए साबित तथ्यों द्वारा प्रकटित कोई लघु अपराध ; या
(ग) वह अपराध जिसकी बाबत विदेशी राज्य ने अपनी सहमति दे दी है ।ट
अध्याय 5
प्रकीर्ण
22. प्रपलायी अपराधियों को गिरफ्तार और अभ्यर्पित किए जाने या लौटाए जाने के दायित्वाधीन होनाश्न्किसी भी विदेशी राज्य 3॥। का प्रत्येक प्रपलायी अपराधी, इस अधिनियम के उपबंधों के अध्यधीन, पकड़े जाने और अभ्यर्पित किए जाने या लौटाए जाने के दायित्वाधीन होगा चाहे वह अपराध जिसके सम्बन्ध में अभ्यर्पण या लौटाया जाना चाहा गया है इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व किया गया हो अथवा पश्चात् किया गया हो और चाहे उस अपराध पर विचारण करने की अधिकारिता भारत में किसी न्यायालय को हो अथवा न हो ।
23. समुद्र अथवा आकाश में किए गए अपराधों के विषय में अधिकारिताश्न्यदि वह अपराध, जिसके सम्बन्ध में प्रपलायी अपराधी का अभ्यर्पण या लौटाया जाना चाहा गया है, भारत के या भारतीय राज्यक्षेत्रीय समुद्र के बाहर खुले समुद्र में किसी ऐसे जलयान के फलक पर या आकाश में किसी ऐसे वायुयान पर, जो भारत में किसी पत्तन या विमान क्षेत्र पर आता है, किया गया था, तो केन्द्रीय सरकार और कोई मजिस्ट्रेट जिसकी उस पत्तन या विमान क्षेत्र पर अधिकारिता है इस अधिनियम द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा ।
24. पकड़े गए व्यक्ति का उस दशा में उन्मोचन जिसमें उसे दो मास के अन्दर अभ्यर्पित नहीं किया जाता या लौटाया नहीं जाताश्न्यदि कोई प्रपलायी अपराधी, जो इस अधिनियम के अनुसरण में किसी विदेशी राज्य ॥। को अपने अभ्यर्पण या लौटाए जाने की प्रतीक्षा करने तक के लिए कारागार के सुपुर्द कर दिया गया हो, ऐसी सुपुर्दगी के पश्चात् दो मास के अन्दर भारत से बाहर नहीं ले जाया जाता है तो उच्च न्यायालय, प्रपलायी अपराधी द्वारा या उसकी ओर से आवेदन किए जाने पर और इस बात के साबित होने पर कि ऐसा आवेदन देने के आशय की युक्तियुक्त सूचना केन्द्रीय सरकार को दे दी गई है, ऐसे बन्दी के उन्मोचन के लिए आदेश दे सकेगा जब तक कि उसके प्रतिकूल पर्याप्त हेतुक दर्शित नहीं कर दिया जाता ।
25. गिरफ्तार किए गए व्यक्तियों की जमानत पर निर्मुक्तिश्न्ऐसे व्यक्ति की दशा में जो प्रपलायी अपराधी है और इस अधिनियम के अधीन गिरफ्तार या निरुद्ध किया गया है, झ्र्दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2)ट के जमानत से सम्बन्धित उपबंध उसी प्रकार लागू होंगे जैसे वे ऐसे व्यक्ति को लागू होते यदि उस पर भारत में वही अपराध करने का अभियोग लगाया गया होता जिसे करने का अभियोग उस पर लगाया गया है या वह सिद्धदोष ठहराया गया है, और ऐसी जमानत के संबंध में उस मजिस्ट्रेट को, जिसके समक्ष वह प्रपलायी अपराधी लाया जाता है, यथाशक्य, वैसी ही शक्तियां और अधिकारिता होगी जैसी उस संहिता के अधीन सेशन न्यायालय की होती है ।
26. प्रत्यर्पण अपराध का दुष्प्रेरणश्न्कोई प्रपलायी अपराधी जिस पर झ्र्किसी प्रत्यर्पण अपराध के किए जाने के दुष्प्रेरण का, उसे करने के लिए षड्यंत्र का, उसे करने के प्रयत्न का, उसके उद्दीपन का या उसके किए जाने में सह-अपराधी के रूप में भाग लेने काट अभियोग लगाया गया हो या वह सिद्धदोष ठहराया गया हो, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, ऐसे अपराध को करने के लिए अभियुक्त या सिद्धदोष समझा जाएगा और तद्नुसार गिरफ्तार किए जाने और अभ्यर्पित किए जाने का भागी होगा ।
27. वारंटों के अधीन अभिरक्षा और उससे निकल भागने पर दुबारा पकड़ने की वैधताश्न्ऐसे व्यक्ति के लिए जिसे किसी प्रपलायी अपराधी को पकड़ने के लिए वारंट निर्दिष्ट किया गया है वारंट में उल्लिखित व्यक्ति को अभिरक्षा में रखना और उसे वारंट में नामित स्थान पर ले जाना विधिपूर्ण होगा, और यदि ऐसा व्यक्ति किसी ऐसी अभिरक्षा से जिसके वह ऐसे वारंट के अनुसरण में सुपुर्द किया गया है, भाग निकलता है तो, उसी प्रकार पुनः पकड़ा जा सकेगा जिस प्रकार भारत की विधि के विरुद्ध अपराध से अभियुक्त व्यक्ति निकल भागने पर पुनः पकड़ा जा सकता है ।
28. प्रपलायी अपराधी के पास पाई गई सम्पत्तिश्न्प्रपलायी अपराधी की गिरफ्तारी के समय उसके पास पाई गई प्रत्येक वस्तु जो प्रत्यर्पण अपराध को साबित करने में साक्ष्य के रूप में सारवान् हो सकती है, उसके संबंध में पर व्यक्तियों के अधिकारों के, यदि कोई हों, अध्यधीन करके, प्रपलायी अपराधी के अभ्यर्पण या लौटाए जाने के समय उसके साथ ही परिदत्त की जा सकती है ।
29. किसी प्रपलायी अपराधी को उन्मुक्त करने की केन्द्रीय सरकार की शक्तिश्न्यदि केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि मामले की तुच्छ प्रकृति के कारण अथवा प्रपलायी अपराधी के अभ्यर्पण या लौटाए जाने के लिए किए गए आवेदन के सद्भावपूर्वक न होने के कारण या न्याय के हित में या राजनैतिक कारणों से अथवा अन्यथा यह अन्यायपूर्ण या असमीचीन होगा कि प्रपलायी अपराधी को अभ्यर्पित किया जाए या लौटाया जाए तो वह इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कार्यवाहियों को किसी समय आदेश द्वारा रोक सकेगी और निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन जारी किया गया या पृष्ठांकित कोई वारंट रद्द कर दिया जाए और उस व्यक्ति को जिसकी गिरफ्तारी के लिए वारंट जारी किया गया या पृष्ठांकित किया गया है, उन्मुक्त कर दिया जाए ।
30. समसामयिक अध्यपेक्षाएंश्न्यदि किसी प्रपलायी अपराधी के अभ्यर्पण के लिए अध्यपेक्षाएं एक से अधिक विदेशी राज्य ॥। से प्राप्त होती हैं तो केन्द्रीय सरकार मामले की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए प्रपलायी अपराधी को ऐसे राज्य या देश को अभ्यर्पित कर सकेगी, जिसे वह सरकार ठीक समझती है ।
31. अभ्यर्पण पर निर्बन्धनश्न् झ्र्(1)ट कोई प्रपलायी अपराधी किसी विदेशी राज्य 1॥। को उस दशा में अभ्यर्पित नहीं किया जाएगा या लौटाया नहीं जाएगा, जिसमेंश्न्
(क) अपराध जिसके सम्बन्ध में उसका अभ्यर्पण चाहा गया है राजनैतिक स्वरूप का है या वह उस मजिस्ट्रेट या न्यायालय को, जिसके समक्ष वह प्रस्तुत किया जाए, या केन्द्रीय सरकार को समाधानप्रद रूप में साबित कर देता है कि उसके अभ्यर्पण से संबंधित अध्यपेक्षा या वारंट, वास्तव में, राजनैतिक स्वरूप के अपराध के लिए उसका विचारण करने या उसे दण्डित करने की दृष्टि से किया गया है ;
(ख) उस अपराध का अभियोजन, जिसके संबंध में उसका अभ्यर्पण चाहा गया है, उस राज्य ॥। की विधि के अनुसार कालवर्जित है ;
झ्र्(ग) जब तक कि विदेशी राज्य की उस विधि द्वारा या विदेशी राज्य के साथ प्रत्यर्पण संधि में यह उपबंध नहीं किया जाता है कि निम्नलिखित अपराध से भिन्न किसी अपराध के लिए उक्त राज्य में प्रपलायी अपराधी का निरोध या विचारण नहीं किया जाएगा, अर्थात् :श्न्
(त्) वह प्रत्यर्पण अपराध, जिसके संबंध में उसे अभ्यर्पित या लौटाया जाना है ;
(त्त्) उस अपराध से भिन्न जिसकी बाबत उसके अभ्यर्पण या लौटाए जाने का आदेश विधिपूर्वक नहीं किया जा सका है, उसके अभ्यर्पण या वापसी सुनिश्चित करने के प्रयोजनों के लिए साबित तथ्यों द्वारा प्रकटित कोई लघु अपराध ; या
(त्त्त्) वह अपराध जिसकी बाबत केन्द्रीय सरकार ने अपनी सहमति दे दी हैट ;
(घ) उस पर भारत में किसी ऐसे अपराध का अभियोग लगाया है, जो वैसा अपराध नहीं है जिसके लिए उसका अभ्यर्पण या लौटाया जाना चाहा गया है या वह भारत में किसी दोषसिद्धि के अधीन दण्डादेश भुगत रहा है जब तक कि वह चाहे दोषमुक्ति द्वारा या अपने दण्ड के अवसान पर या अन्यथा उन्मुक्त नहीं कर दिया जाता ;
(ङ) मजिस्ट्रेट द्वारा उसे कारागार के सुपुर्द किए जाने की तारीख से पन्द्रह दिन समाप्त नहीं हो जाते ।
झ्र्(2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, अनुसूची में विनिर्दिष्ट अपराध राजनैतिक स्वरूप के अपराध नहीं माने जाएंगे ।
(3) केन्द्रीय सरकार, किसी विदेशी राज्य के साथ भारत द्वारी की गई प्रत्यर्पण संधि को ध्यान में रखते हुए, अधिसूचित आदेश द्वारा, अनुसूची में दी गई सूची में किसी अपराध को जोड़ सकेगी या उसका लोप कर सकेगी ।ट
32. धारा 29 और धारा 31 का किसी उपान्तर के बिना लागू होनाश्न्धारा 3 या धारा 12 में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, धारा 29 और धारा 31 के उपबंध प्रत्येक विदेशी राज्य 1॥। को किसी भी उपान्तर के बिना लागू होंगे ।
33. अधिनियम का विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 को प्रभावित न करनाश्न्इस अधिनियम की कोई भी बात विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) के उपबंधों या तद्धीन बनाए गए किसी आदेश को प्रभावित नहीं करेगी ।
झ्र्34. राज्यक्षेत्रातीत अधिकारिताश्न्किसी विदेशी राज्य में किसी व्यक्ति द्वारा किया गया कोई प्रत्यर्पण अपराध, भारत में किया गया समझा जाएगा और ऐसा व्यक्ति ऐसे अपराध के लिए भारत में अभियोजित किए जाने का दायी होगा ।
34क. प्रत्यर्पण से इंकार किए जाने पर अभियोजनश्न्जहां केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी विदेशी राज्य से प्रत्यर्पण के लिए अनुरोध के अनुसरण में किसी प्रपलायी अपराधी को अभ्यर्पित नहीं किया जा सकता है या लौटाया नहीं जा सकता है वहां वह, ऐसे प्रपलायी अपराधी के भारत में अभियोजन के लिए ऐसी कार्रवाई कर सकेगी, जो वह ठीक समझे ।
34ख. अनंतिम गिरफ्तारीश्न्(1) किसी विदेशी राज्य से किसी प्रपलायी अपराधी की तत्काल गिरफ्तारी के लिए अर्जेंट अनुरोध प्राप्त होने पर, केन्द्रीय सरकार सक्षम अधिकारिता वाले मजिस्ट्रेट से ऐसे प्रपलायी अपराधी की गिरफ्तारी के लिए अनंतिम वारंट जारी करने का अनुरोध कर सकेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन गिरफ्तार किया गया प्रपलायी अपराधी, उसकी गिरफ्तारी की तारीख से साठ दिन की समाप्ति पर उन्मोचित कर दिया जाएगा, यदि उक्त अवधि के भीतर उसके अभ्यर्पण या लौटाए जाने के लिए कोई अनुरोध प्राप्त नहीं होता है ।
34ग. मृत्यु शास्ति के स्थान पर आजीवन कारावास का उपबंधश्न्तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी ऐसे प्रपलायी अपराधी को, जिसने भारत में मृत्यु से दण्डनीय प्रत्यर्पण अपराध किया है, केन्द्रीय सरकार के अनुरोध पर किसी विदेशी राज्य द्वारा अभ्यर्पित किया जाता है या लौटाया जाता है और उस विदेशी राज्य की विधियों में ऐसे अपराध के लिए मृत्यु शास्ति का उपबंध नहीं है वहां ऐसा प्रपलायी अपराधी उस अपराध के लिए केवल आजीवन कारावास से दंडनीय होगा ।ट
35. अधिसूचित आदेशों और अधिसूचनाओं का संसद् के समक्ष रखा जानाश्न्इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक अधिसूचित आदेश या जारी की गई अधिसूचना बनाए जाने या जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।
36. नियम बनाने की शक्तिश्न्(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया या पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सब विषयों या उनमें से किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :श्न्
(क) प्ररूप जिसमें किसी प्रपलायी अपराधी के अभ्यर्पण के लिए अध्यपेक्षा की जा सकेगी ;
(ख) प्ररूप जिसमें उस झ्र्विदेशी राज्यट में, जिसको अध्याय 3 लागू होता है, किसी व्यक्ति को पकड़ने के लिए वारंट जारी किया जा सकेगा ;
(ग) रीति जिसके अनुसार इस अधिनियम के अधीन कोई वारंट पृष्ठांकित या अधिप्रमाणित किया जा सकेगा ;
(घ) प्रपलायी अपराधियों का जो इस अधिनियम के अधीन अभियुक्त या अभिरक्षा में हों हटाया जाना और तब तक के लिए उनका नियंत्रण और भरण-पोषण जब तक कि वे उन्हें प्राप्त करने के लिए हकदार के रूप में वारंट में नामित व्यक्तियों के हवाले नहीं कर दिए जाते ;
(ङ) किसी ऐसी सम्पत्ति का अभिग्रहण और व्ययन जो किसी ऐसे अभिकथित अपराध की जिसे यह अधिनियम लागू होता है विषय-वस्तु हो या उससे साबित करने के लिए अपेक्षित हो ;
(च) प्ररूप और रीति जिसमें या माध्यम जिससे कोई मजिस्ट्रेट केन्द्रीय सरकार को इस अधिनियम के अधीन रिपोर्ट देने के लिए अपेक्षित हो ;
(छ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
झ्र्(3) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।ट
37. निरसन और व्यावृत्तिश्न्(1) भारतीय प्रत्यर्पण अधिनियम, 1903 (1903 का 15) और उसकी तत्स्थानी कोई विधि, जो ऐसे राज्यक्षेत्रों में जो 1956 के नवम्बर के प्रथम दिन से पूर्व किसी भाग स्त्र्खऱ् राज्य में समाविष्ट थे, इस अधिनियम के प्रारम्भ के समय प्रवृत्त थी, और पूर्वोत्तर सीमान्त एजेन्सी तथा ट्यूसांग जिला (प्रत्यर्पण) विनियम, 1961 (1961 का 3) एतद्द्वारा निरसित किए जाते हैं ।
(2) 1870 से 1932 तक के प्रत्यर्पण अधिनियम और प्रपलायी अपराधी अधिनियम, 1881 जहां तक वे भारत को लागू होते हैं और भारत की विधि के भाग के रूप में प्रवर्तित होते हैं, एतद्द्वारा निरसित किए जाते हैं ।
झ्र्अनुसूची
झ्र्धारा 31 (2) देखिएट
वे अपराध जिन्हें राजनैतिक स्वरूप के अपराध नहीं माना जाएगा
अपराधों की निम्नलिखित सूची का अभिकथित अपराध की तारीख को भारत में प्रवृत्त विधि के अनुसार अर्थ लगाया जाएगा । जहां कहीं सुसंगत अधिनियम के नाम नहीं दिए गए हैं, वहां निर्दिष्ट धाराएं भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धाराएं है :श्न्
1. यान-हरण निवारण अधिनियम, 1982 (1982 का 65) के अधीन अपराध ।
2. सिविल विमानन सुरक्षा विधिविरुद्ध कार्यदमन अधिनियम, 1982 (1982 का 66) के अधीन अपराध ।
3. अंतरराष्ट्रीय रूप से संरक्षित व्यक्तियों के विरुद्ध, जिनके अंतर्गत राजनयिक अभिकर्ता हैं, अपराधों के लिए दंड के संबंध में न्यूयार्क में 14 दिसम्बर, 1973 को हस्ताक्षर के लिए रखे गए अभिसमय के प्रविषय के भीतर कोई अपराध ।
4. बंधक बनाने के विरुद्ध न्यूयार्क में 18 दिसम्बर, 1979 को हस्ताक्षर के लिए रखे गए अंतरराष्ट्रीय अभिसमय के प्रविषय के भीतर कोई अपराध ।
5. आपराधिक मानव वध, हत्या (धारा 299 से धारा 304) ।
6. खतरनाक आयुध या साधनों द्वारा स्वेच्छया उपहति या घोर उपहति कारित करना (धारा 321 से धारा 333) ।
7. विस्फोटक पदार्थ अधिनियम, 1908 (1908 का 6) के अधीन अपराध ।
8. जीवन को संकटापन्न करने के आशय से कोई अग्न्यायुध या गोलाबारूद कब्जे में रखना झ्र्आयुध अधिनियम, 1959 (1959 का 54) की धारा 27ट ।
9. गिरफ्तारी या निरोध को प्रतिरुद्ध करने या रोकने के आशय से अग्न्यायुध का उपयोग करना झ्र्आयुध अधिनियम, 1959 (1959 का 54) की धारा 28ट ।
10. जीवन को संकटापन्न करने के आशय से लोक उपयोग के लिए या अन्यथा प्रयुक्त संपत्ति को हानि या नुकसान कारित करना (धारा 440 के साथ पठित धारा 425) ।
11. सदोष अवरोध और सदोष परिरोध (धारा 339 के धारा 348) ।
12. व्यपहरण और अपहरण जिसके अंतर्गत बंधक बनाना है (धारा 359 से धारा 369 तक) ।
13. आतंकवाद और आतंकवादी कार्यों से संबंधित अपराध झ्र्आतंकवादी और विध्वंसक क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम, 1987 (1987 का 28)ट ।
14. ऊपर सूची में दिए गए किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करना, उसे करने के लिए षड्यंत्र करना या उसे कारित करने का प्रयत्न करना, उसका उद्दीपन करना, उसे किए जाने में सह-अपराधी के रूप में भाग लेना ।

