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परिसीमन अधिनियम, 2002 ( Delimitation Act, 2002 )


 

परिसीमन अधिनियम, 2002

(2002 का अधिनियम संख्यांक 33)

[3 जून, 2002]

लोक सभा में विभिन्न राज्यों को आबंटित स्थानों का प्रत्येक राज्य के लिए विधान सभा

के कुल स्थानों का, प्रत्येक राज्य को और ऐसे प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र को जहां विधान

सभा है, लोक सभा और राज्यों और संघ राज्यक्षेत्रों की विधान सभाओं के

निर्वाचन के लिए प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन का

पुनः समायोजन करने तथा उनसे संबंधित

विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के तिरपनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम परिसीमन अधिनियम, 2002 है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है;

(ख) सहयुक्त सदस्य" से धारा 5 के अधीन नामनिर्दिष्ट सदस्य अभिप्रेत है;

(ग) आयोग" से धारा 3 के अधीन गठित परिसीमन आयोग अभिप्रेत है;

(घ) निर्वाचन आयोग" अनुच्छेद 324 में निर्दिष्ट निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है;

(ङ) सदस्य" से आयोग का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है; और

() राज्य" के अंतर्गत ऐसा संघ राज्यक्षेत्र भी है जिसमें विधान सभा है, किन्तु इसके अंतर्गत जम्मू-कश्मीर राज्य नहीं है

3. परिसीमन आयोग का गठन-इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् केन्द्रीय सरकार यथाशक्यशीघ्र, परिसीमन आयोग के नाम से एक आयोग का गठन करेगी, जिसमें निम्नलिखित तीन सदस्य होंगे: -

(क) एक सदस्य, जो ऐसा व्यक्ति होगा, जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश है या रहा है, केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा और वह आयोग का अध्यक्ष होगा;

() मुख्य निर्वाचन आयुक्त या मुख्य निर्वाचन आयुक्त द्वारा नामनिर्दिष्ट कोई निर्वाचन आयुक्त, पदेन:

परंतु इस खंड के अधीन किसी सदस्य के रूप में निर्वाचन आयुक्त का नामनिर्देशन करने के पश्चात् इस खंड के अधीन कोई और नामनिर्देशन, धारा 6 के अधीन ऐसे सदस्य की आकस्मिक रिक्ति को भरने के सिवाय, नहीं किया जाएगा; और

(ग) संबद्ध राज्य का राज्य निर्वाचन आयुक्त, पदेन ।

 [स्पष्टीकरण-खंड (ग) के प्रयोजनों के लिए संबंधित राज्य के राज्य निर्वाचन आयुक्त से, -

(i) (मेघालय, मिजोरम और नागालैंड राज्यों से भिन्न) किसी राज्य से संबंधित आयोग के कर्तव्यों के संबंध में, अनुच्छेद 243] के खंड (1) के अधीन उस राज्य के राज्यपाल द्वारा नियुक्त राज्य निर्वाचन आयुक्त अभिप्रेत है; और

(ii) यथास्थिति, मेघालय राज्य या मिजोरम राज्य या नागालैंड राज्य से संबंधित आयोग के कर्तव्यों के संबंध में, ऐसे प्रयोजनों के लिए उस राज्य के राज्यपाल द्वारा नामनिर्देशित कोई व्यक्ति अभिप्रेत है ।]

4. आयोग के कर्तव्य-(1) वर्ष 1971 में हुई जनगणना में यथा अभिनिश्चित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर लोक सभा में विभिन्न राज्यों को स्थानों के आबंटन का और प्रत्येक राज्य के लिए विधान सभा के कुल स्थानों का परिसीमन अधिनियम, 1972(1972 का 76) की धारा 3 के अधीन गठित परिसीमन आयोग द्वारा किया गया पुनः समायोजन इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आयोग द्वारा किया गया पुनः समायोजन समझा जाएगा

(2) आयोग उपधारा (1) और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उबपंधों के अधीन रहते हुए, लोक सभा और राज्य विधान सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए वर्ष [2001] में हुई जनगणना में यथा अभिनिश्चित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर प्रत्येक राज्य के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में विभाजन का पुनः समायोजन करेगा:

परंतु जहां ऐसे पुनः समायोजन पर लोक सभा में किसी राज्य के लिए केवल एक स्थान आबंटित किया जाता है वहां उस राज्य से लोक सभा के निर्वाचनों के प्रयोजन के लिए संपूर्ण राज्य एक प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्र होगा ।

5. सहयुक्त सदस्य-(1) आयोग प्रत्येक राज्य के संबंध में अपने कार्यों में सहायता देने के प्रयोजन के लिए दस व्यक्तियों को अपने साथ सहयुक्त करेगा, जिनमें से पांच व्यक्ति उस राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले लोक सभा के सदस्य होंगे और पांच व्यक्ति उस राज्य की विधान सभा के सदस्य होंगे:

परंतु जहां किसी राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाले लोक सभा के सदस्यों की संख्या पांच या उससे कम है, वहां ऐसे सभी सदस्य उस राज्य के लिए सहयुक्त सदस्यत होंगे और पश्चात् कथित दशा में, सहयुक्त सदस्यों की कुल संख्या दस से उतनी संख्या से कम होगी जितनी से उस राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाली लोक सभा के सदस्यों की कुल संख्या पांच से कम है ।

(2) प्रत्येक राज्य से इस प्रकार सहयुक्त होने वाले व्यक्तियों को, लोक सभा के सदस्यों की दशा में, उस सदन के अध्यक्ष द्वारा, और राज्य विधान सभा के सदस्यों की दशा में, उस विधान सभा के अध्यक्ष द्वारा, यथास्थिति, लोक सभा या विधान सभा की संरचना का सम्यक् ध्यान रखते हुए, नामनिर्दिष्ट किया जाएगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन किए जाने वाले प्रथम नामनिर्देशन-

(क) इस अधिनियम के प्रारंभ से एक मास के अंदर विभिन्न विधान सभाओं के अध्यक्षों द्वारा और दो मास के अंदर लोक सभा के अध्यक्ष द्वारा, किए जाएंगे; और

(ख) मुख्य निर्वाचन आयुक्त को संसूचित किए जाएंगे, और यहां नामनिर्देशन विधान सभा के अध्यक्ष द्वारा किए जाते हैं, वहां लोक सभा के अध्यक्ष को भी संसूचित किए जाएंगे ।

(4) सहयुक्त सदस्यों में से किसी को भी आयोग के किसी विनिश्चय पर मत देने या हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा

(5) आयोग को निम्नलिखित को बुलाने की शक्ति होगी-

(क) भारत का महारजिस्ट्रार और जनगणना आयुक्त या उसका नामनिर्देशिती; या

(ख) भारत का महासर्वेक्षक या उसका नामनिर्देशिती; या

(ग) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार का कोई अन्य अधिकारी; या

(घ) भौगोलिक सूचना प्रणाली का कोई विशेषज्ञ; या

(ङ) कोई अन्य व्यक्ति, जिसकी विशेषज्ञता और ज्ञान को आयोग द्वारा उपधारा (1) में निर्दिष्ट व्यक्तियों द्वारा दी गई सहायता के अतिरिक्त सहायता देने के लिए आवश्यक समझा जाए तथा इस प्रकार बुलाए गए अधिकारी और व्यक्ति आयोग की सहायता करने के लिए कर्तव्यबद्ध होंगे । 

(6) निर्वाचन आयोग का सचिव, आयोग का पदेन सचिव होगा और आयोग के अध्यक्ष के पर्यक्षेवण के अधीन निर्वाचन आयोग के कर्मचारियों की सहायता से अपने कृत्यों का निर्वहन करेगा ।

6. आकस्मिक रिक्तियां-यदि अध्यक्ष या किसी सदस्य या किसी सहयुक्त का पद मृत्यु का त्यागपत्र के कारण रिक्त हो जाता है तो उसकी पूर्ति यथासाध्य शीघ्रता से, यथास्थिति, धारा 3 या धारा 5 के उपबंधों के अधीन और अनुसार केन्द्रीय सरकार द्वारा या संबद्ध अध्यक्ष द्वारा की जाएगी ।

7. आयोग की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) आयोग, अपनी प्रक्रिया स्वयं अवधारित करेगा और अपने कृत्यों का पालन करने में उसे किसी वाद का विचारण करते समय निम्नलिखित विषयों के बारे में सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी, अर्थात्: -

 (क) साक्षियों को समन करने और उनको हाजिर कराने की;

(ख) किसी दस्तावेज का पेश किया जाना अपेक्षित करने की; और

(ग) किसी न्यायालय या कार्यलय से किसी लोक अभिलेख की अध्यपेक्षा करने की ।

(2) आयोग को किसी व्यक्ति से, ऐसी बातों या विषयों के बारे में, जो आयोग की राय में उसके विचाराधीन किसी विषय के लिए उपयोगी या उससे सुसंगत हैं, जानकारी देने के लिए अपेक्षा करने की शक्ति होगी ।

(3) आयोग, अपने सदस्यों में से किसी सदस्य को, उपधारा (1) के खंड (क) से खंड (ग) और उपधारा (2) द्वारा उसको प्रदत्त शक्तियों में से किसी शक्ति का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगा और आयोग द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी सदस्य द्वारा उन शक्तियों में से किसी के प्रयोग में दिए गए आदेश या किए गए किसी कार्य के बारे में यह समझा जाएगा कि, यथास्थिति, वह आदेश या कार्य आयोग का है ।

(4) यदि सस्दयों की राय में मतभेद है तो बहुमत की राय मानी जाएगी और आयोग के कार्य और आदेश बहुमत के दृष्टिकोण के अनुसार अभिव्यक्त किए जाएंगे ।

(5) इस बात के होते हुए भी कि, कोई सदस्य या सहयुक्त सदस्य अस्थायी रूप से अनुपस्थित है, या आयोग या सहयुक्त सदस्यों के उस या किसी अन्य समूह में रिक्ति विद्यमान है, आयोग तथा सहयुक्त सदस्यों के किसी समूह को कार्य करने की शक्ति प्राप्त होगी और आयोग या किसी सहयुक्त सदस्यों के समूह का कोई कार्य या कार्यवाही केवल ऐसी अस्थायी अनुपस्थिति या ऐसी रिक्ति की विद्यमानता के आधार पर अविधिमान्य या प्रश्नगत नहीं होगी

(6) दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के प्रयोजनों के लिए आयोग को एक सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।

स्पष्टीकरण-साक्षियों को हाजिर कराने के प्रयोजनों के लिए, आयोग की अधिकारिता की स्थानीय सीमाएं भारत के राज्यक्षेत्र की सीमाएं होंगी ।

8. स्थानों की संख्या का पुनः समायोजन-आयोग, अनुच्छेद 81, अनुच्छेद 170, अनुच्छेद 330 और अनुच्छेद 332, के उपबंधों और दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के सिवाय संघ राज्यक्षेत्रों के संबंध में, संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 3 और धारा 39 तथा दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी राज्यक्षेत्र के संबंध में, अनुच्छेद 239कक के खंड (2) के उपखंड (ख) के उपबंधों को ध्यान में रखते हुए, आदेश द्वारा-

(क) वर्ष 1971 में हुई जनगणना में यथा अभिनिश्चित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर और धारा 4 के उपबंधों के अधीन रहते हुए लोक सभा में प्रत्येक राज्य के लिए आबंटित स्थानों की संख्या अवधारित करेगा और वर्ष [2001] में हुई जनगणना में यथा अभिनिश्चित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर उन स्थानों की, यदि कोई हों, संख्या अवधारित करेगी जिन्हें राज्य की अनुसूचित जातियों के लिए और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित किया जाना है; और

() वर्ष 1971 में हुई जनगणना में यथा अभिनिश्चित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर और धारा 4 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्रत्येक राज्य की विधान सभा के लिए स्थानों की कुल संख्या अवधारित करेगा और वर्ष 1[2001] में हुई जनगणना में अभिनिश्चित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर उन स्थानों की, यदि कोई हों, संख्या अवधारित करेगा जिन्हें राज्य की अनुसूचित जातियों के लिए और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षित किया जाना है:

परंतु खंड (ख) के अधीन किसी राज्य की विधान सभा के लिए स्थानों की कुल संख्या, खंड (क) के अधीन उस राज्य के लिए लोक सभा में आबंटित स्थानों की संख्या का पूर्णांकी गुणित होगा ।

9. निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन-(1) आयोग, प्रत्येक राज्य के लिए लोक सभा में आबंटित स्थानों तथा 1971 की जनगणना के आधार पर यथा पुनः समायोजित प्रत्येक राज्य की विधान सभा के लिए स्थानों को इसमें नीचे उपबन्धित रीति से, एक सदस्यीय प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में वितरित करेगा, तथा [2001] में हुई जनगणना में यथा अभिनिश्चित जनगणना के आंकड़ों के आधार पर उनका परिसीमन संविधान के उबपंधों और धारा 8 में विनिर्दिष्ट अधिनियम के उपबंधों और निम्नलिखित उपबंधों को भी ध्यान में रखते हुए करेगा, अर्थात्: -  

(क) सभी निर्वाचन-क्षेत्र यथासाध्य भौगोलिक रूप में संहृत क्षेत्र होंगे और उनका परिसीमन करते समय उनकी प्राकृतिक विशेषताओं, प्रशानिक इकाइयों की विद्यमान सीमाओं, संचार सुविधाओं और सार्वजनिक सुविधा को ध्यान में रखना होगा:

(ख) प्रत्येक विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्र का परिसीमन इस प्रकार किया जाएगा कि वह संपूर्ण रूप से एक ही संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र के अन्दर आ जाएं:

(ग) उन निर्वाचन-क्षेत्रों को, जिनमें अनुसूचित जातियों के लिए स्थान आरक्षित हैं, राज्य के विभिन्न भागों में वितरित किया जाएगा और यथासाध्य उन्हें उन क्षेत्रों में अवस्थान दिया जाएगा जिनमें पूरी जनसंख्या से उनकी जनसंख्या का अनुपात अपेक्षाकृत अधिक है; और

(घ) उन निर्वाचन-क्षेत्रों को जिनमें अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित हैं, यथासाध्य ऐसे क्षेत्र में अवस्थान दिया जाएगा जिनमें पूरी जनसंख्या से उनकी जनसंख्या का अनुपात अधिकतम है ।

(2) आयोग-

(क) निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए अपनी प्रस्थापनाओं को, किसी ऐसे सहयुक्त सदस्य की, विसम्मत प्रस्थापनाओं सहित, यदि कोई हों, जो उनका प्रकाशन चाहता है, भारत के राजपत्र में और सम्बद्ध राज्यों के राजपत्रों में और ऐसी अन्य रीति से, जो वह उचित समझता है, प्रकाशित करेगा;

(ख) ऐसी तारीख विनिर्दिष्ट करेगा जिसको या जिसके पश्चात् वह प्रस्थापनाओं पर आगे विचार करेगा;

(ग) उन सभी आक्षेपों और सुझावों पर विचार करेगा जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख से पहले प्राप्त हो गए हैं, और इस प्रकार विचार करने के प्रयोजन के लिए प्रत्येक राज्य में ऐसे स्थान या स्थानों पर, जिन्हें वह उचित समझता है, एक या अधिक सार्वजनिक बैठकें करेगा; और

(घ) तत्पश्चात् एक या अधिक आदेशों द्वारा प्रत्येक राज्य के-

(i) संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन; और

(ii) विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन; अवधारित करेगा ।

10. आदेशों का प्रकाशन और उनके प्रवर्तन की तारीख-(1) आयोग, धारा 8 या धारा 9 के अधीन किए गए अपने प्रत्येक आदेश को भारत के राजपत्र और संबद्ध राज्यों के राजपत्रों में प्रकाशित करवाएगा और साथ ही ऐसे आदेशों को कम से कम दो देशी भाषा के समाचारपत्रों में प्रकाशित करवाएगा और रेडियो, टेलीविजन और जनता को उपलब्ध अन्य संभव मीडिया में प्रचारित करेगा और संबद्ध राज्यों के राजपत्रों में ऐसे प्रकाशन के पश्चात्, प्रत्येक जिला निर्वाचन अधिकारी, अपनी अधिकारिता के अधीन के क्षेत्र से संबंधित ऐसे आदेशों के राजपत्रित पाठ को सार्वजनिक सूचना के लिए अपने कार्यालय के किसी सहजदृश्य स्थान में लगवाएगा ।

(2) भारत के राजपत्र में प्रकाशित होने पर ऐसा प्रत्येक आदेश विधि का बल रखेगा और किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

(3) ऐसे प्रकाशन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, ऐसा प्रत्येक आदेश लोक सभा और संबद्ध राज्यों की विधान सभाओं के समक्ष रखा जाएगा ।

(4) उपधारा (5) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, लोक सभा में या किसी राज्य विधान सभा में विभिन्न प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व का पुनःसमायोजन और ऐसे किसी आदेश में उपबंधित उन निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन, उस आदेश के भारत के राजपत्र में प्रकाशित होने के पश्चात्, होने वाले, यथास्थिति, उन लोक सभा या विधान सभा के प्रत्येक निर्वाचन के संबंध में लागू होंगे और तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या ऐसी विधि के अधीन जारी किए गए किसी आदेश या अधिसूचना में अंतर्विष्ट ऐसे प्रतिनिधित्व और परिसीमन, जहां तक कि ऐसा प्रतिनिधित्व और परिसीमन इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हो, से संबंधित उपबंधों को अतिष्ठित हुए उसी प्रकार लागू होंगे : [परंतु इस उपधारा की कोई बात झारखंड राज्य के संबंध में प्रकाशित परिसीमन आदेशों को लागू नहीं होगी ।]

(5) इस धारा की कोई बात, यथास्थिति, संसदीय निर्वाचन-क्षेत्रों या किसी राज्य के विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के बारे में आयोग के, जो अंतिम आदेश होते हैं, उनके भारत के राजपत्र में प्रकाशित होने की तारीख को विद्यमान, यथास्थिति, लोक सभा या विधान सभा के प्रतिनिधित्व पर तब तक प्रभाव नहीं डालेगी, जब तक लोक सभा या विधान सभा का विघटन नहीं होता है और ऐसी लोक सभा या विधान सभा की किसी रिक्ति की पूर्ति के लिए कोई उपनिर्वाचन उन विधियों और आदेशों के उपबंधों के, जिन्हें उपधारा (4) द्वारा अतिष्ठित किया गया है, आधार पर इस प्रकार किया जाएगा मानो उक्त उपबंधों को अतिष्ठित न किया गया हो ।

(6) आयोग, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अपने प्रत्येक आदेश को उस उपधारा में उपबंधित रीति में, धारा 3 के अधीन [ऐसी अवधि के भीतर जो 31 जुलाई, 2008 के बाद की नहीं होगी] पूरा करने और उसे प्रकाशित करने का प्रयास करेगा

[10क. कतिपय मामलों में परिसीमन का आस्थगन-(1) धारा 4, धारा 8 और धारा 9 में अतंर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, यदि राष्ट्रपति का यह समाधान हो जाता है कि ऐसी स्थिति उत्पन्न हो गई है, जिससे भारत की एकता और अखंडता संकट में है या शांति और लोक व्यवस्था को गंभीर खतरा है, तो वह, आदेश द्वारा, किसी राज्य में परिसीमन कार्रवाई को आस्थगित कर सकेंगी ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

10ख. झारखंड राज्य की बाबत परिसीमन आयोग के आदेश का कोई विधिक प्रभाव होना-धारा 10 की उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, झारखंड राज्य की बाबत आदेश ओ०एन० 63 (अ), तारीख 30 अप्रैल, 2007  और ओ०एन० 110 (अ), तारीख 17 अगस्त, 2007 द्वारा उक्त धारा के अधीन प्रकाशित स्थानों की संख्या के पुनः समायोजन और निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित अंतिम आदेशों का कोई विधिक प्रभाव नहीं होगा और उक्त आदेशों के प्रकाशन से पूर्व यथा विद्यमान निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन, परिसीमन (संशोधन) अधिनियम, 2008 के प्रारंभ के पश्चात् कराए गए, यथास्थिति, लोक सभा या विधान सभा के लिए प्रत्येक निर्वाचन के संबंध में वर्ष 2026 तक प्रवृत्त बना रहेगा ।]

11. परिसीमन आदेशों को अद्यतन बनाए रखने की शक्ति-(1) निर्वाचन आयोग भारत के राजपत्र में और संबद्ध राज्य के राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा समय-समय पर-

(क) आयोग, धारा 9 के अधीन किए गए आदेशों में से किसी में मुद्रण संबंधी भूल या अनवधानता से हुई किसी भूल या लोप के कारण उसमें उत्पन्न होने वाली किसी गलती को ठीक कर सकेगा; और

(ख) जहां उक्त आदेशों में से किसी आदेश में वर्णित किसी जिले या किसी प्रादेशिक खण्ड की सीमाओं या उसके नाम में कोई परिवर्तन किए जाते हैं वहां आदेशों को अद्यतन करने के लिए ऐसे संशोधन कर सकेगा जो उसे आवश्यक या समचीन प्रतीत होते हैं, किंतु यह इस प्रकार करेगा कि किसी अधिसूचना से किसी निर्वाचन-क्षेत्रों की सीमाओं या क्षेत्रफल या विस्तार में परिवर्तन नहीं होगा ।

(2) इस धारा के अधीन प्रत्येक अधिसूचना को, उसके जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, लोक सभा और संबद्ध राज्य की विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।

12. निरसन-परिसीमन अधिनियम, 1972 (1972 का 76) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

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