चिट फंड अधिनियम, 1982
(1982 का अधिनियम संख्यांक 40)
[19 अगस्त, 1982]
चिट फंडों के विनियमन और उससे सम्बन्धित विषयों
का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के तैंतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम चिट फंड अधिनियम, 1982 है ।
(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे और भिन्न-भिन्न राज्यों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) अनुमोदित बैंक" से भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 (1955 का 23) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक, या भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 3 के अधीन गठित समनुषंगी बैंक, या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक, या प्रादेशिक ग्रामीण बैंक अधिनियम, 1976 (1976 का 21) की धारा 3 के अधीन स्थापित प्रादेशिक ग्रामीण बैंक, या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित तत्स्थानी नया बैंक या बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खण्ड (ग) के अधीन परिभाषित बैंककारी कम्पनी, या उस अधिनियम की धारा 51 के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा अधिसूचित बैंककारी संस्था या कोई अन्य ऐसी बैंककारी संस्था अभिप्रेत है जो राज्य सरकार द्वारा रिजर्व बैंक के परामर्श से इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित की जाए ;
(ख) चिट" से कोई ऐसा संव्यवहार अभिप्रेत है, चाहे वह चिट, चिट फंड, चिट्टी, कुरी या किसी अन्य नाम से पुकारा जाता हो, जिसके द्वारा या जिसके अधीन कोई व्यक्ति, व्यक्तियों की किसी विनिर्दिष्ट संख्या के साथ यह करार करता है, कि उनमें से प्रत्येक व्यक्ति एक निश्चित अवधि में कालिक किस्तों के रूप में एक निश्चित धनराशि का (या उसके बदले में अनाज की निश्चित मात्रा का) अभिदाय करेगा और ऐसा प्रत्येक अभिदाता अपनी बारी पर, जो लाट द्वारा या नीलामी द्वारा या निविदा द्वारा या चिट करार में विनिर्दिष्ट की जाने वाली अन्य रीति से अवधारित हुई हो, इनामी रकम पाने का हकदार होगा ।
स्पष्टीकरण-इस खण्ड के अर्थ में, कोई संव्यवहार चिट नहीं है यदि ऐसे संव्यवहार में,-
(i) अभिदाताओं में से केवल कुछ ही अभिदाता आगामी अभिदायों का संदाय करने के किसी दायित्व के बिना इनामी रकम प्राप्त करते हैं, किन्तु सब नहीं ; या
(ii) सभी अभिदाता बारी-बारी से चिट की रकम आगामी अभिदायों का संदाय करने के दायित्व के साथ प्राप्त करते हैं ;
(ग) चिट करार" से वह दस्तावेज अभिप्रेत है जिसमें प्रधान और अभिदाताओं के बीच चिट से सम्बन्धित करार-अनुच्छेद हों ;
(घ) चिट रकम" से सभी अभिदाताओं द्वारा चिट की किसी किस्त के लिए, बट्टे की कोई कटौती किए बिना या अन्यथा, संदेय अभिदायों की कुल रकम अभिप्रेत है ;
(ङ) चिट कारबार" से चिट के संचालन का कारबार अभिप्रेत है ;
(च) व्यतिक्रमी अभिदाता" से ऐसा अभिदाता अभिप्रेत है जिसने चिट करार के निबन्धनों के अनुसार शोध्य अभिदायों का संदाय करने में व्यतिक्रम किया है ;
(छ) बट्टा" से ऐसी धनराशि या अनाज की मात्रा अभिप्रेत है जो इनामी अभिदाता को चिट करार के निबन्धनों के अधीन छोङनी पङती है और जो उक्त करार के अधीन चिट चलाने के व्यय को पूरा करने के लिए या अभिदाताओं के बीच वितरण के लिए या दोनों के लिए अलग रख दी जाती है ;
(ज) लाभांश" से बट्टे की उस रकम में, जो चिट करार के अधीन चिट की प्रत्येक किस्त पर अभिदाताओं के बीच आनुपातिक वितरण के लिए उपलब्ध हो, अभिदाता का शेयर अभिप्रेत है ;
(झ) इनाम निकालना" से वह रीति अभिप्रेत है जो चिट की किसी किस्त में इनामी अभिदाता अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए चिट करार में विनिर्दिष्ट है ;
(ञ) प्रधान" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो चिट करार के अधीन चिट के संचालन के लिए उत्तरदायी है और इसके अन्तर्गत धारा 39 के अधीन प्रधान के कृत्यों का निर्वहन करने वाला कोई व्यक्ति भी है ;
(ट) गैर-इनामी अभिदाता" के अन्तर्गत व्यतिक्रमी अभिदाता नहीं है ;
(ठ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(ड) इनामी रकम" से चिट रकम और बट्टे के बीच का अन्तर अभिप्रेत है और टिकट के किसी प्रभाग की दशा में, चिट रकम और टिकट के उस प्रभाग के आनुपातिक बट्टे के बीच का अन्तर अभिप्रेत है तथा जब इनामी रकम नकद से भिन्न रूप में संदेय है तब इनामी रकम का मूल्य तब का मूल्य होगा जब वह संदेय हो जाता है ;
(ढ) इनामी अभिदाता" से ऐसा अभिदाता अभिप्रेत है जिसने इनामी रकम या तो प्राप्त कर ली है या पाने का हकदार है ;
(ण) रजिस्ट्रार" से धारा 61 के अधीन नियुक्त चिट रजिस्ट्रार अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत उस धारा के अधीन नियुक्त अपर, संयुक्त, उप या सहायक रजिस्ट्रार भी है ;
(त) रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है ;
(थ) संघ राज्यक्षेत्र के सम्बन्ध में राज्य सरकार" से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त उस संघ राज्यक्षेत्र का प्रशासक अभिप्रेत है ;
(द) अभिदाता" के अन्तर्गत टिकट का कोई प्रभाग धारण करने वाला कोई व्यक्ति और लिखित समनुदेशन द्वारा या विधि की क्रिया द्वारा किसी टिकट या उसके प्रभाग का अन्तरिती भी है ;
(ध) टिकट" से चिट में अभिदाता का शेयर अभिप्रेत है ।
3. अधिनियम का अन्य विधियों, ज्ञापन, अनुच्छेदों आदि पर अध्यारोही होना-इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से जैसा अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय-
(क) इस अधिनियम के उपबन्ध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में, या ज्ञापन या संगम-अनुच्छेदों या उपविधियों में या किसी करार या किसी संकल्प में, चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात्, यथास्थिति, रजिस्ट्रीकृत, निष्पादित या पारित हो, किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे, और
(ख) पूर्वोक्त ज्ञापन, अनुच्छेदों, उपविधियों, करार या संकल्प में अन्तर्विष्ट कोई उपबन्ध, जहां तक वह इस अधिनियम के उपबन्धों के विरुद्ध है, यथास्थिति, शून्य हो जाएगा या शून्य होगा ।
अध्याय 2
चिटों का रजिस्ट्रीकरण, प्रारम्भ और चिट कारबार का संचालन
4. अधिनियम के अधीन मंजूर या रजिस्ट्रीकृत न की गई चिटों का प्रतिषेध-(1) कोई चिट उस राज्य सरकार की, जिसकी अधिकारिता के भीतर चिट प्रारम्भ की जानी है या उसका संचालन किया जाना है अथवा ऐसे अधिकारी की जो उस सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त किया जाए, पूर्व मंजूरी प्राप्त किए बिना और जब तक कि चिट उस राज्य में इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार, रजिस्ट्रीकृत नहीं करा ली जाती है, प्रारम्भ नहीं की जाएगी या उसका संचालन नहीं किया जाएगा :
परन्तु इस उपधारा के अधीन अभिप्राप्त मंजूरी व्यपगत हो जाएगी यदि ऐसी मंजूरी की तारीख से छह मास के भीतर या ऐसी अतिरिक्त अवधि या अवधियों के भीतर, जो कुल मिलाकर छह मास से अधिक नहीं होगी और जो राज्य सरकार इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर अनुज्ञात करे, चिट रजिस्ट्रीकृत नहीं करा ली जाती है ।
(2) उपधारा (1) के अधीन मंजूरी अभिप्राप्त करने के प्रयोजन के लिए आवेदन प्रधान द्वारा ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से किया जाएगा, जो विहित की जाए ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट पूर्व मंजूरी से उस दशा में इंकार किया जा सकेगा यदि प्रधान को-
(क) इस अधिनियम के अधीन या चिट कारबार का विनियमन करने वाले किसी अन्य अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया था और ऐसे किसी अपराध के लिए कारावास से दण्डादिष्ट किया गया था ; या
(ख) उसने ऐसी फीसों का संदाय करने या ऐसे विवरण या अभिलेख फाइल करने में व्यतिक्रम किया था जो इस अधिनियम के अधीन संदत्त किए जाने या फाइल किए जाने के लिए अपेक्षित है या उसने इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबन्धों का अतिक्रमण किया है ; या
(ग) किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया था जिसमें नैतिक अधमता अन्तर्वलित है और ऐसे किसी अपराध के लिए कारावास से दण्डादिष्ट किया गया था, जब तक कि उसकी निर्मुक्ति से पांच वर्ष की अवधि न बीत गई हो :
परन्तु ऐसी किसी मंजूरी से इंकार करने से पूर्व प्रधान को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।
(4) राज्य सरकार का वह आदेश, तथा उपधारा (5) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उपधारा (1) के अधीन सशक्त अधिकारी का वह आदेश, जिसके द्वारा इस धारा के अधीन पूर्व मंजूरी दी गई है या देने से इंकार किया गया है, अन्तिम होगा ।
(5) कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) के अधीन सशक्त किसी अधिकारी द्वारा पूर्व मंजूरी देने से इंकार किए जाने से व्यथित है, ऐसे इंकार किए जाने की उसे संसूचना दी जाने की तारीख के तीस दिन के भीतर राज्य सरकार को अपील कर सकेगा और ऐसी अपील में उस सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
5. कुछ दशाओं को छोङकर अभिदायों की मांग किए जाने का प्रतिषेध-कोई भी व्यक्ति जनता से किसी चिट में टिकटों के लिए अभिदाय करने की मांग करने वाली कोई सूचना, परिपत्र, प्रास्पेक्टस, प्रस्ताव या अन्य दस्तावेज तब तक जारी नहीं करेगा या नहीं कराएगा जब तक कि ऐसी सूचना, परिपत्र, प्रास्पेक्टस, प्रस्ताव या अन्य दस्तावेज में यह कथन न हो कि धारा 4 के अधीन अपेक्षित पूर्व अभिमंजूरी प्राप्त कर ली गई है, और ऐसी मंजूरी की विशिष्टियां न हों ।
6. चिट करार का प्ररूप-(1) प्रत्येक चिट करार दो प्रतियों में होगा और अभिदाताओं में से प्रत्येक के द्वारा या किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो उसके द्वारा लिखित रूप में प्राधिकृत हो, और प्रधान द्वारा हस्ताक्षरित किया जाएगा और कम से कम दो साक्षियों द्वारा अनुप्रमाणित किया जाएगा और उसमें निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात् :-
(क) प्रत्येक अभिदाता का पूरा नाम और निवास-स्थान का पता ;
(ख) प्रत्येक अभिदाता द्वारा धारित टिकटों की संख्या जिसके अन्तर्गत किसी टिकट का प्रभाग भी है ;
(ग) किस्तों की संख्या, प्रत्येक किस्त पर प्रत्येक टिकट के लिए संदेय रकम और ऐसी किस्तों का संदाय करने में किसी व्यतिक्रम पर संदेय ब्याज या शास्ति, यदि कोई हो ;
(घ) चिट के प्रारम्भ होने की अधिसंभाव्य तारीख और चिट की कालावधि ;
(ङ) प्रत्येक किस्त पर इनामी अभिदाता अभिनिश्चित करने की रीति ;
(च) बट्टे की वह अधिकतम रकम, जो किसी किस्त पर इनामी अभिदाता को छोङनी होगी ;
(छ) वह रीति और अनुपात जिसमें बट्टे को, यथास्थिति, लाभांश, प्रधान के कमीशन या पारिश्रमिक या चिट चलाने के लिए व्यय के रूप में वितरित किया जा सकेगा ;
(ज) वह तारीख, समय और स्थान, जहां चिट का इनाम निकाला जाना है ;
(झ) वह किस्त, जिसमें प्रधान को चिट की रकम प्राप्त होनी है ;
(ञ) उस अनुमोदित बैंक का नाम, जिसमें प्रधान द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन चिट धन जमा किए जाएंगे ;
(ट) जहां प्रधान एक व्यष्टि है, वहां वह रीति, जिसमें चिट उस दशा में बनाए रखी जाएगी, जब ऐसे व्यष्टि की मृत्यु हो जाती है, या वह विकृतचित्त हो जाता है या अन्यथा असमर्थ हो जाता है ;
(ठ) वे परिणाम जिनके लिए गैर-इनामी या इनामी अभिदाता या प्रधान उस दशा में दायी होगा जब चिट करार के किन्हीं उपबन्धों का अतिक्रमण होता है ;
(ड) वे शर्तें जिनके अधीन कोई अभिदाता व्यतिक्रमी अभिदाता माना जाएगा ;
(ढ) प्रधान द्वारा प्रस्थापित की जाने वाली प्रतिभूति की प्रकृति और विशिष्टियां ;
(ण) वे तारीखें जिनको और वह समय जिसके दौरान प्रधान धारा 44 के उपबंधों के अधीन रहते हुए गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाताओं को चिट-अभिलेखों का निरीक्षण करने देगा ;
(त) प्रत्येक अभिदाता के नामनिर्देशितियों के नाम, अर्थात् उन व्यक्तियों के नाम जिन्हें चिट के अधीन अभिदाता को प्रोद्भूत होने वाले फायदों का, अभिदाता को मृत्यु हो जाने की दशा में या जब वह अन्यथा करार करने के अयोग्य हो जाता है, संदाय किया जा सकेगा ; और
(थ) कोई अन्य विशिष्टियां, जो समय-समय पर विहित की जाएं ।
स्पष्टीकरण-यदि करार की पृथक्-पृथक् प्रतियों पर प्रत्येक अभिदाता के हस्ताक्षर प्राप्त कर लिए जाते हैं तो वह इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए पर्याप्त होगा ।
(2) चिट की कालावधि उसके प्रारम्भ होने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि से अधिक नहीं होगी :
परन्तु यदि राज्य सरकार का समाधान हो जाता है कि निम्नलिखित बातों को, अर्थात् :-
(क) प्रधान की वित्तीय दशा को ;
(ख) उसके कार्य करने की पद्धतियों को ;
(ग) भावी अभिदाताओं के हितों को ;
(घ) प्रतिभूति के बारे में अपेक्षाओं को ; और
(ङ) ऐसी अन्य बातों जो मामले की परिस्थिति में अपेक्षित हों, ध्यान में रखते हुए चिट की कालावधि बढ़ाना आवश्यक है तो वह उक्त कालावधि की दस वर्ष तक बढ़ाने की अनुज्ञा दे सकेगी ।
(3) उपधारा (1) के खण्ड (च) में निर्दिष्ट बट्टे की रकम चिट की रकम के [चालीस प्रतिशतट से अधिक नहीं होगी ।
(4) जहां चिट की किसी किस्त पर इनामी अभिदाता का अवधारण नीलाम द्वारा किया जाना है और एक से अधिक व्यक्ति अधिकतम बट्टा देने की प्रस्थापना करते हैं, वहां इनामी अभिदाता का अवधारण लाट द्वारा किया जाएगा ।
7. चिट करार का फाइल किया जाना-(1) प्रधान प्रत्येक चिट करार की दो प्रतियां रजिस्ट्रार के यहां फाइल करेगा ।
(2) रजिस्ट्रार चिट करार की एक प्रति रखेगा रहेगा और दूसरी प्रति प्रधान को इस पृष्ठांकन सहित लौटा देगा कि चिट करार रजिस्ट्रीकृत कर लिया गया है :
परन्तु रजिस्ट्रार निम्नलिखित आधारों में से किसी एक या अधिक पर चिट करार को रजिस्ट्रीकृत करने से इंकार कर सकेगा, अर्थात् :-
(क) कि धारा 20 के अधीन प्रधान द्वारा प्रस्थापित प्रतिभूति अपर्याप्त है,
(ख) कि प्रधान इस अधिनियम के अधीन या चिट का कारबार का विनियमन करने वाले किसी अन्य अधिनियम के अधीन किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया था और ऐसे किसी अपराध के लिए कारावास से दण्डादिष्ट किया गया था ;
(ग) कि प्रधान ने ऐसी फीसों का संदाय करने या कोई विवरण या अभिलेख फाइल करने में व्यतिक्रम किया था, जिनका इस अधिनियम के अधीन संदाय या फाइल किया जाना अपेक्षित था, अथवा इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के किसी उपबंध का अतिक्रमण किया था ;
(घ) कि प्रधान किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया था जिसमें नैतिक अधमता अन्तर्वलित है और ऐसे किसी अपराध के लिए कारावास से दण्डादिष्ट किया गया था, जब तक कि उसकी निर्मुक्ति से पांच वर्ष की अवधि न बीत गई हो :
परन्तु यह और कि प्रथम परन्तुक के अधीन किसी चिट को रजिस्ट्रीकृत करने से इन्कार करने के पूर्व प्रधान को सुनवाई का उचित अवसर दिया जाएगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन किया गया प्रत्येक पृष्ठांकन इस बात का निश्चायक साक्ष्य होगा कि चिट इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत है और किसी चिट का रजिस्ट्रीकरण व्यपगत हो जाएगा, यदि प्रधान द्वारा धारा 9 की उपधारा (1) के अधीन घोषणा ऐसे पृष्ठांकन की तारीख से तीन मास के भीतर या कुल मिलाकर तीन मास से अनधिक ऐसी अतिरिक्त अवधि या अवधियों के भीतर, जो रजिस्ट्रार अपने को इस निमित्त आवेदन किए जाने पर अनुज्ञात करे, फाइल नहीं की जाती है ।
8. कम्पनी द्वारा चिट प्रारम्भ आदि करने और आरक्षित निधि का सृजन करने के लिए न्यूनतम पूंजी की अपेक्षाएं-(1) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई कम्पनी चिट कारबार का प्रारम्भ या संचालन तब तक नहीं करेगी, जब तक कि उसके पास कम से कम एक लाख रुपए की समादत्त शेयर पूंजी न हो ।
(2) इस अधिनियम के प्रारम्भ पर ऐसी प्रत्येक कम्पनी, जिसकी समादत्त शेयर पूंजी एक लाख रुपए से कम है और जो चिट कारबार का संचालन कर रही है, ऐसे प्रारम्भ की तारीख से तीन वर्ष की अवधि के अवसान के पूर्व, अपनी समादत्त शेयर पूंजी को बढ़ाकर कम से कम एक लाख रुपए तक कर लेगी :
परन्तु यदि राज्य सरकार लोक हित में या किसी कठिनाई से बचने के लिए यह आवश्यक समझती है तो वह किसी कम्पनी की बाबत तीन वर्ष की उक्त अवधि को ऐसी अतिरिक्त अवधि या अवधियों के लिए बढ़ा सकेगी, जो कुल मिलाकर दो वर्ष से अधिक न हो :
परन्तु यह और कि ऐसी कोई कम्पनी कोई ऐसी नई चिट, जिसकी अवधि तीन वर्ष की उक्त अवधि से या प्रथम परन्तुक के अधीन बढ़ाई गई ऐसी अवधि या अवधियों से अधिक हो जाए, तब तक प्रारम्भ नहीं करेगी जब तक कि वह अपनी समादत्त पूंजी को बढ़ाकर कम से कम एक लाख रुपए नहीं कर लेती है ।
(3) चिट कारबार करने वाली प्रत्येक कम्पनी एक आरक्षित निधि स्थापित करेगी और उसे बनाए रखेगी और उस आरक्षित निधि में प्रत्येक वर्ष के लाभ के अतिशेष में से, जो उसके शेयरों पर कोई लाभांश घोषित किए जाने से पूर्व उसके लाभ और हानि लेखा में प्रकट हुआ हो, ऐसे लाभ के कम से कम दस प्रतिशत के बराबर रकम अन्तरित करेगी ।
(4) कोई भी कम्पनी रजिस्ट्रार के पूर्व अनुमोदन से ही आरक्षित निधि में से किसी राशि या राशियों का विनियोजन अन्यथा नहीं, करेगी और ऐसा अनुमोदन प्राप्त करने के लिए वह रजिस्ट्रार को विहित प्ररूप में आवेदन करेगी जिसमें उन परिस्थितियों को स्पष्ट किया जाएगा जो ऐसे विनियोजन के सम्बन्ध में हों ।
9. चिट का प्रारम्भ-(1) प्रत्येक प्रधान चिट करार में विनिर्दिष्ट सभी टिकटों का पूर्णतया अभिदाय हो जाने के पश्चात् उस आशय की घोषणा रजिस्ट्रार के यहां फाइल करेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन घोषणा फाइल की जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, रजिस्ट्रार अपना यह समाधान कर लेने के पश्चात् कि चिट की मंजूरी, रजिस्ट्रीकरण तथा अन्य विषयों से सम्बन्धित अपेक्षाओं का सम्यक् रूप से पालन कर लिया गया है, प्रधान को चिट के प्रारम्भ का प्रमाणपत्र प्रदान करेगा ।
(3) कोई भी प्रधान कोई नीलाम तब तक प्रारम्भ नहीं करेगा या किसी चिट का इनाम तब तक नहीं निकालेगा या किसी चिट की रकम का विनियोजन तब तक नहीं करेगा जब तक कि उसने उपधारा (2) में निर्दिष्ट प्रारम्भ का प्रमाणपत्र अभिप्राप्त न कर लिया हो ।
10. अभिदाताओं को चिट करार की प्रतियों का दिया जाना-(1) प्रधान धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन प्रारम्भ का प्रमाणपत्र प्राप्त करने के पश्चात् यथाशीघ्र, किन्तु चिट का प्रथम इनाम निकालने की तारीख के अपश्चात्, प्रत्येक अभिदाता को चिट करार की एक प्रति देगा जो उसकी प्रमाणित सही प्रति हो ।
(2) प्रधान उस मास की, जिसमें चिट की प्रथम किस्त का इनाम निकाला जाता है, समाप्ति के पश्चात् पन्द्रह दिन के भीतर रजिस्ट्रार के यहां इस आशय का प्रमाणपत्र फाइल करेगा कि उपधारा (1) के उपबन्धों का पालन कर लिया गया है ।
11. चिट", चिट फंड", चिट्टी" या कुरी" शब्दों का प्रयोग-(1) कोई भी व्यक्ति चिट कारबार तब तक नहीं करेगा जब तक कि वह अपने नाम के भाग के रूप में, चिट", चिट फंड", चिट्टी" या कुरी" शब्दों में से किसी शब्द का प्रयोग नहीं करता है और चिट कारबार करने वाले व्यक्ति से भिन्न कोई भी व्यक्ति अपने नाम के भाग के रूप में ऐसे किसी शब्द का प्रयोग नहीं करेगा ।
(2) जहां इस अधिनियम के प्रारम्भ पर,-
(क) कोई व्यक्ति अपने नाम के भाग के रूप में ऐसे शब्दों में से, जो उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट हैं, किसी शब्द का प्रयोग किए बिना चिट कारबार कर रहा है ; या
(ख) कोई ऐसा व्यक्ति जो चिट कारबार नहीं कर रहा है, अपने नाम के भाग के रूप में ऐसे किसी शब्द का प्रयोग कर रहा है,
वहां वह ऐसे प्रारम्भ से एक वर्ष की अवधि के भीतर, यथास्थिति, ऐसे किसी शब्द को अपने नाम के भाग के रूप में जोङ लेगा या ऐसे शब्द को अपने नाम में से हटा देगा :
परन्तु यदि राज्य सरकार लोक हित में या किसी कठिनाई से बचने के लिए आवश्यक समझती है तो वह एक वर्ष की उक्त अवधि को, ऐसी अतिरिक्त अवधि या अवधियों के लिए बढ़ा सकेगी जो कुल मिलाकर एक वर्ष से अधिक न हो ।
12. कम्पनी द्वारा चिट कारबार से भिन्न कारबार का संव्यवहार करने का प्रतिषेध-(1) कोई कम्पनी, जो चिट कारबार कर रही है, राज्य सरकार की साधारण या विशेष अनुज्ञा के बिना किसी अन्य कारबार का संचालन नहीं करेगी ।
(2) जहां इस अधिनियम के प्रारम्भ पर कोई कम्पनी चिट कारबार के अतिरिक्त कोई कारबार कर रही है वहां वह ऐसे प्रारम्भ से तीन वर्ष की अवधि का अवसान हो जाने के पूर्व उस अन्य कारबार का परिसमापन कर देगी :
परन्तु यदि राज्य सरकार लोक हित में या किसी कठिनाई से बचने के लिए आवश्यक समझती है तो वह तीन वर्ष की उक्त अवधि को ऐसी अतिरिक्त अवधि या अवधियों के लिए बढ़ा सकेगी जो कुल मिलाकर दो वर्ष से अधिक न हों ।
13. चिटों की कुल रकम-(1) कोई प्रधान, जो फर्म या अन्य व्यष्टि-संगम या कम्पनी या सहकारी सोसाइटी से भिन्न हो, ऐसी चिटों का प्रारम्भ या संचालन नहीं करेगा जिसकी कुल चिट रकम किसी समय पर [एक लाख रुपएट से अधिक हो जाती है ।
(2) जहां प्रधान कोई फर्म या अन्य व्यष्टि-संगम है वहां उस फर्म या अन्य संगम द्वारा संचालित चिटों को कुल चिट रकम किसी भी समय पर,-
(क) जहां फर्म के भागीदारों या संगम गठित करने वाले व्यष्टियों की संख्या चार से कम नहीं है वहां [छह लाख] रुपए की राशि से अधिक नहीं होगी ;
(ख) किसी अन्य दशा में, प्रत्येक ऐसे भागीदार या व्यष्टि के सम्बन्ध में 1[एक लाख रुपएट के आधार पर संगणित राशि से अधिक नहीं होगी ।
(3) जहां प्रधान कोई कम्पनी या सहकारी सोसाइटी है वहां उसके द्वारा संचालित चिटों की कुल चिट रकम किसी समय पर, यथास्थिति, कम्पनी या सहकारी सोसाइटी के स्वामित्व की शुद्ध निधियों के दस गुने से अधिक नहीं होगी ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, स्वामित्व की शुद्ध निधियां" से कम्पनी या सहकारी सोसाइटी के अंतिम लेखा परीक्षित तुलनीपत्र में यथाप्रकटित समादत्त पूंजी और खुली आरक्षितियों का योग, जो उक्त तुलनपत्र में यथाप्रकटित हानि, आस्थगित राजस्व, व्यय और अन्य अमूर्त आस्तियों के, यदि कोई हों, संचित अतिशेष की रकम को घटा कर आए, अभिप्रेत है ।
14. निधियों का उपयोग-(1) चिट कारबार करने वाला कोई व्यक्ति ऐसे कारबार के संबंध में संगृहीत धन (जो ऐसे व्यक्ति को संदेय कमीशन या पारिश्रमिक अथवा किसी व्यतिक्रमी अभिदाता से प्राप्त ब्याज या शास्ति से, यदि कोई हो, भिन्न है) का उपयोग निम्नलिखित प्रयोजनों के सिवाय किसी अन्य प्रयोजन के लिए नहीं करेगा, अर्थात् :-
(क) चिट कारबार करना ; या
(ख) गैर-इनामी अभिदाताओं द्वारा संदत्त अभिदायों की प्रतिभूति पर उन्हें उधार और अग्रिम देना ; या
(ग) भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की धारा 20 के अर्थ में न्यासी प्रतिभूतियों में विनिहित करना ; या
(घ) चिट करार में वर्णित अनुमोदित बैंकों में निक्षेप करना ।
(2) जहां चिट कारबार करने वाले किसी व्यक्ति ने इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व ऐसे कारबार के सम्बन्ध में संगृहीत धन का उपयोग उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों से भिन्न प्रयोजनों के लिए किया है वहां वह यह सुनिश्चित करेगा कि ऐसे धन का उतना भाग जो ऐसे प्रारम्भ के पूर्व वसूल नहीं किया गया है, ऐसे प्रारम्भ से तीन वर्ष की अवधि के अवसान के पूर्व वसूल किया जाए :
परन्तु यदि राज्य सरकार लोक हित में या किसी कठिनाई से बचने के लिए आवश्यक समझे तो वह तीन वर्ष की उक्त अवधि को ऐसी अतिरिक्त अवधि या अवधियों के लिए बढ़ा सकेगी जो कुल मिलाकर एक वर्ष से अधिक न हो ।
15. चिट करार का परिवर्तन-किसी चिट करार को प्रधान और उस चिट के सभी अभिदाताओं की लिखित सम्मति से ही परिवर्तित, परिवर्धित या रद्द किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
16. चिटों का संचालन करने की तारीख, समय और स्थान-(1) प्रत्येक चिट में इनाम, चिट करार में वर्णित तारीख, समय और स्थान पर निकाला जाएगा और प्रधान द्वारा सभी अभिदाताओं को उसकी सूचना ऐसे प्ररूप में और ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, जारी की जाएगी ।
(2) प्रत्येक ऐसा इनाम चिट करार के उपबंधों के अनुसार और कम से कम दो अभिदाताओं की उपस्थिति में संचालित किया जाएगा ।
(3) जहां कोई इनाम इस आधार पर कि दो अभिदाता, जिनका इनाम निकाले जाने के समय उपधारा (2) के अधीन उपस्थित होना अपेक्षित है, उपस्थित नहीं थे या किसी अन्य आधार पर नहीं निकाला गया था, वहां रजिस्ट्रार स्वप्रेरणा से या प्रधान या अभिदाताओं में से किसी के द्वारा किए गए आवेदन पर यह निदेश दे सकेगा कि इनाम उसकी उपस्थिति में या उसके द्वारा प्रतिनियुक्त किसी व्यक्ति की उपस्थिति में निकाला जाएगा ।
17. कार्यवाहियों के कार्यवृत्त-(1) प्रत्येक इनाम निकालने की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त इनाम निकालने की समाप्ति के तुरन्त बाद तैयार किए जाएंगे और उस प्रयोजन के लिए रखी जाने वाली बही में दर्ज किए जाएंगे और उन पर प्रधान द्वारा, इनामी अभिदाताओं द्वारा, यदि वे उपस्थित हों, या उनके प्राधिकृत अभिकर्ताओं द्वारा और कम से कम दो ऐसे अन्य अभिदाताओं द्वारा जो उपस्थित हों और जहां धारा 16 की उपधारा (3) के अधीन निदेश दिया गया है वहां रजिस्ट्रार द्वारा या उस उपधारा के अधीन उसके द्वारा प्रतिनियुक्त व्यक्ति द्वारा भी हस्ताक्षर किए जाएंगे ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट कार्यवृत्त में निम्नलिखित बातों का स्पष्ट रूप में कथन होगा :-
(क) किस तारीख को और किस समय कार्यवाहियां आरम्भ हुईं और समाप्त हुईं और किस स्थान पर इनाम निकाला गया ;
(ख) चिट की किस्त का संख्यांक जिससे कार्यवाहियां संबंधित हैं ;
(ग) उपस्थित अभिदाताओं के नाम ;
(घ) वह व्यक्ति या वे व्यक्ति जो किस्त में इनाम की रकम के हकदार होते हैं ;
(ङ) बट्टे की रकम ;
(च) असंदत्त इनाम की रकम के, यदि कोई हो, व्ययन की बाबत पूर्ण विशिष्टियां ; और
(छ) कोई अन्य विशिष्टियां, जो विहित की जाएं ।
18. कार्यवृत्त की प्रतियों का रजिस्ट्रार के यहां फाइल किया जाना-प्रत्येक इनाम निकालने की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त की सही प्रतिलिपि, जो उस रूप में प्रधान द्वारा प्रमाणित की गई हो, प्रधान द्वारा रजिस्ट्रार के यहां ऐसे इनाम की जिससे वह सम्बन्धित है, तारीख से इक्कीस दिन के भीतर, फाइल की जाएगी ।
19. कारबार का नया स्थान खोलने पर निर्बन्धन-(1) चिट कारबार करने वाला कोई व्यक्ति ऐसे रजिस्ट्रार के, जिसकी क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर, यथास्थिति, उस व्यक्ति का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय या कारबार का मुख्य स्थान स्थित है, पूर्व अनुमोदन के बिना कारबार का कोई नया स्थान नहीं खोलेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अनुमोदन करने के पूर्व, रजिस्ट्रार राज्य के उस रजिस्ट्रार से, जिसकी क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर कारबार का नया स्थान खोलने की प्रस्थापना है, परामर्श करेगा और प्रधान की वित्तीय स्थिति और परिचालन प्रणालियों और इस बात को कि कारबार का स्थान खोलने से कहां तक लोक हित की पूर्ति होगी तथा ऐसी अन्य बातों को ध्यान में रखेगा, जो विहित की जाएं ।
(3) जहां चिट कारबार करने वाला कोई व्यक्ति उस राज्य से, जिसमें उसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय या उसके कारबार का स्थान या मुख्य स्थान स्थित है, (जिसे इसमें इसके पश्चात् उद्गम वाला राज्य कहा गया है) भिन्न किसी राज्य में कारबार का नया स्थान खोलता है वहां उस राज्य का रजिस्ट्रार, जिसमें कारबार का ऐसा नया स्थान खोला जाता है, ऐसी किन्हीं शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का पालन भी कर सकेगा जिनका कारबार के ऐसे नए स्थान पर किए जा रहे चिट कारबार के बारे में उद्गम वाले राज्य के रजिस्ट्रार द्वारा प्रयोग किया जा सकता है और पालन किया जा सकता है ।
(4) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, कारबार का स्थान" के अन्तर्गत कोई शाखा कार्यालय, उप-कार्यालय या कारबार का कोई ऐसा स्थान भी होगा, जहां ऐसे व्यक्ति द्वारा चिट कारबार का संचालन किया जाए ।
अध्याय 3
प्रधान के अधिकार और कर्तव्य
20. प्रधान द्वारा दी जाने वाली प्रतिभूति-(1) चिट के उचित संचालन के लिए प्रत्येक प्रधान, धारा 4 के अधीन पूर्व मंजूरी के लिए आवेदन करने के पूर्व,-
[(क) रजिस्ट्रार के नाम से,-
(i) चिट रकम के पचास प्रतिशत के बराबर की रकम नकद रूप में किसी अनुमोदित बैंक में जमा करेगा ; और
(ii) चिट रकम के पचास प्रतिशत के बराबर की रकम किसी अनुमोदित बैंक से बैंक प्रत्याभूति के रूप में जमा करेगा ; या]
(ख) चिट रकम के कम से कम डेढ़ गुने अंकित मूल्य या बाजार मूल्य की (इनमें से जो भी कम हो) सरकारी प्रतिभूतियों का रजिस्ट्रार के पक्ष में अन्तरण करेगा ; या
(ग) ऐसी अन्य प्रतिभूतियों का, जो ऐसी प्रतिभूतियां हों जिनमें कोई न्यासी भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की धारा 20 के अधीन धन का विनिधान करे और जो ऐसे मूल्य की हों, जो राज्य सरकार द्वारा समय-समय पर विहित किया जाए, रजिस्ट्रार के पक्ष में अंतरण करेगा :
परन्तु खण्ड (ग) में निर्दिष्ट प्रतिभूतियों का मूल्य, किसी भी दशा में, चिट की रकम के मूल्य से डेढ़ गुने से कम नहीं होगा ।
(2) जहां कोई प्रधान एक से अधिक चिटों का संचालन करता है, वहां वह प्रत्येक चिट के सम्बन्ध में उपधारा (1) के उपबन्धों के अनुसार प्रतिभूति देगा ।
(3) रजिस्ट्रार, चिट के चालू रहने के दौरान किसी भी समय प्रतिभूति के प्रतिस्थापन की अनुज्ञा दे सकेगा :
परन्तु प्रतिस्थापित प्रतिभूति का अंकित मूल्य या बाजार मूल्य (इनमें से जो भी कम हो) प्रधान द्वारा उपधारा (1) के अधीन दी गई प्रतिभूति के मूल्य से कम नहीं होगा ।
(4) प्रधान द्वारा उपधारा (1) के अधीन दी गई प्रतिभूति या उपधारा (3) के अधीन प्रतिस्थापित कोई प्रतिभूति किसी डिक्री के निष्पादन में या अन्यथा कुर्की के लिए तब तक दायी नहीं होगी जब तक चिट समाप्त नहीं हो जाती है और सभी अभिदाताओं के दावों की पूर्ण रूप से तुष्टि नहीं हो जाती है ।
(5) जहां चिट समाप्त हो जाती है और स्वयं रजिस्ट्रार का समाधान हो जाता है कि सभी अभिदाताओं के दावे पूर्णतः तुष्ट हो गए हैं वहां वह, यथास्थिति, प्रधान द्वारा उपधारा (1) के अधीन दी गई प्रतिभूति या उपधारा (3) के अधीन प्रतिस्थापित प्रतिभूति की निर्मुक्ति का आदेश करेगा और ऐसा करते समय, वह ऐसी प्रक्रिया का अनुसरण करेगा, जो विहित की जाए ।
(6) उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, इस धारा के अधीन दी गई प्रतिभूति के संबंध में उस चिट के चालू रहने के दौरान, जिससे वह संबंधित है, प्रधान द्वारा कार्यवाही नहीं की जाएगी और उसके संबंध में अन्तरण या अन्य विल्लंगम के तौर पर प्रधान द्वारा की गई कोई कार्यवाही अकृत और शून्य होगी ।
21. प्रधान के अधिकार-(1) प्रधान-
(क) चिट करार में तत्प्रतिकूल किसी उपबंध के न होने पर, चिट करार में विनिर्दिष्ट बट्टे की कटौती के बिना, प्रथम किस्त पर चिट रकम अभिप्राप्त करने का, इस शर्त के अधीन रहते हुए कि वह चिट में एक टिकट के लिए अभिदाय करेगा, हकदार होगा :
परन्तु किसी दशा में जहां प्रधान ने एक से अधिक टिकटों के लिए अभिदाय किया है, वहां वह चिट में एक चिट की रकम से अधिक रकम बिना पट्टे के प्राप्त करने का पात्र नहीं होगा ;
(ख) ऐसी रकम का, जो चिट रकम के पांच प्रतिशत से अधिक न हो, और जो चिट करार में नियत की जाए, कमीशन, पारिश्रमिक के रूप में या चिट चलाने के व्यय को पूरा करने के लिए हकदार होगा ;
(ग) उस ब्याज और शास्ति का, यदि कोई हो, जो किस्तों के संदाय में किसी व्यतिक्रम पर संदेय है तथा ऐसी अन्य रकमों का, जो उसे चिट करार के उपबन्धों के अधीन संदेय हों, हकदार होगा ;
(घ) अभिदाताओं से सभी अभिदाय प्राप्त करने और वसूल करने और इनामी अभिदाताओं को इनामी रकमों का वितरण करने का हकदार होगा ;
(ङ) किसी इनामी अभिदाता से उसके द्वारा संदेय भावी अभिदायों के सम्यक् संदाय के लिए पर्याप्त प्रतिभूति की मांग करने का हकदार होगा ।
स्पष्टीकरण-इस खण्ड के प्रयोजनों के लिए कोई प्रतिभूति पर्याप्त तब समझी जाएगी जब उसका मूल्य एक-तिहाई से अधिक हो या जब उसमें ऐसी स्थावर सम्पत्तियां हों, जिनका मूल्य इनामी अभिदाता द्वारा शोध्य रकम के डेढ़ गुने से अधिक हो ;
(च) व्यतिक्रमी अभिदाताओं के स्थान पर दूसरे अभिदाताओं को रखने का हकदार होगा ; और
(छ) ऐसे अन्य सभी कार्य, जो चिट के सम्यक् और उचित संचालन के लिए आवश्यक हों, करने का हकदार होगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के खण्ड (ङ) के अधीन प्रतिभूति के रूप में प्रस्थापित सम्पत्ति के मूल्य से संबंधित कोई विवाद उत्पन्न होता है वहां उसे धारा 64 के अधीन माध्यस्थम् के लिए रजिस्ट्रार को निर्दिष्ट किया जाएगा ।
22. प्रधान के कर्तव्य-(1) प्रधान, इनामी अभिदाता द्वारा भावी अभिदायों के सम्यक् संदाय के लिए पर्याप्त प्रतिभूति के दिए जाने पर, उसे इनामी रकम देने के लिए आबद्ध होगा :
परन्तु यदि इनामी अभिदाता इनामी रकम में से सभी भावी अभिदायों की रकम की कटौती किए जाने के लिए सहमत होता है तो वह किसी भी प्रकार की प्रतिभूति के बिना इनामी रकम का संदाय पाने का हकदार होगा और ऐसी दशा में प्रधान इनामी अभिदाता को इनामी रकम का, इनाम निकालने की तारीख से सात दिन के भीतर या ठीक आगामी किस्त की तारीख से पूर्व, इनमें से जो भी पहले हो, संदाय करेगा :
परन्तु यह और कि जहां प्रथम परन्तुक के अधीन इनामी रकम इनामी अभिदाता को संदत्त कर दी गई है, वहां काटी गई रकम प्रधान द्वारा चिट करार में वर्णित किसी अनुमोदित बैंक में जमा की जाएगी और इस प्रकार जमा की गई रकम को वह, भावी अभिदायों का संदाय करने के सिवाय, नहीं निकालेगा ।
(2) यदि किसी इनाम के निकलने के संबंध में शोध्य इनामी रकम, इनामी अभिदाता के व्यतिक्रम के कारण ठीक आगामी किस्त की तारीख तक असंदत्त रह जाती है तो प्रधान उस इनामी रकम को चिट करार में वर्णित किसी अनुमोदित बैंक में एक पृथक् खाते में तत्काल जमा कर देगा और ऐसे जमा करने के तथ्य की लिखित सूचना और उसके कारण इनामी अभिदाता और रजिस्ट्रार को देगा :
परन्तु जहां कोई इनामी अभिदाता, किसी चिट की किसी किस्त की बाबत इनामी रकम का इनाम निकलने की तारीख से दो मास की अवधि के भीतर संग्रहण नहीं कर लेता है, वहां प्रधान को यह स्वतंत्रता होगी कि वह ऐसी किस्त की बाबत एक अन्य इनाम निकाले ।
(3) इनामी रकम या उपधारा (1) के अधीन भावी अभिदायों की रकम के प्रत्येक संदाय की और उपधारा (2) के अधीन इनामी रकम के निक्षिप्त किए जाने की सूचना ठीक आगामी इनाम निकलने के समय अभिदाताओं को दी जाएगी और ऐसे संदाय या निक्षेप की विशिष्टियां उस इनाम के निकलने की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त में दर्ज की जाएंगी ।
(4) प्रधान धारा 21 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) या खण्ड (ग) के अधीन जितनी रकम के लिए हकदार है उससे अधिक किसी रकम को अपने लिए विनियोजित नहीं करेगा :
परन्तु जहां प्रधान स्वयं इनामी अभिदाता है, वहां वह स्वयं धारा 31 के उपबंधों का अनुपालन करते हुए इनामी रकम को अपने लिए विनियोजित करने का हकदार होगा :
परन्तु यह और कि प्रधान उपधारा (1) के द्वितीय परन्तुक के अधीन जमा की गई रकम पर प्रोद्भूत होने वाले ब्याज को अपने लिए विनियोजित कर सकेगा ।
(5) प्रधान किसी व्यक्ति को किसी चिट के अभिदाता के रूप में उस दशा में सम्मिलित नहीं करेगा जब ऐसे सम्मिलित किए जाने से चिट करार में वर्णित टिकटों की कुल संख्या में वृद्धि हो जाती है ।
(6) प्रधान, चिट करार के अनुसार, लाभांश को अभिदाताओं में या तो नकद, अनाज के रूप में या आगामी किस्त के लिए, यदि कोई हों, संदेय अभिदायों में समायोजन के रूप में वितरित करेगा ।
23. प्रधान द्वारा रखी जाने वाली बहियां, अभिलेख, आदि-प्रधान, यथास्थिति, अपने रजिस्ट्रीकृत कार्यालय में या अपने कारबार के स्थान या मुख्य स्थान में, अथवा जहां प्रधान का उस राज्य से, जिसमें उसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय या उसके कारबार का मुख्य स्थान स्थित है, भिन्न राज्य में चिट कारबार के संचालन के लिए कोई शाखा कार्यालय, उप कार्यालय या कारबार का कोई स्थान है, वहां ऐसे शाखा कार्यालय, उप कार्यालय या कारबार के स्थान में, उस राज्य में संचालित कारबार की बाबत-
(क) एक रजिस्टर रखेगा, जिसमें निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी :-
(i) प्रत्येक चिट में अभिदाताओं के नाम और पूरे पते तथा प्रत्येक अभिदाता द्वारा धारित टिकटों की संख्या ;
(ii) वे तारीखें जिनको अभिदाताओं ने चिट करार पर हस्ताक्षर किए हैं ; और
(ii) किसी अभिदाता द्वारा किसी टिकट के समनुदेशन की दशा में, समनुदेशिती का नाम और पूरा पता तथा समनुदेशन की तारीख और वह तारीख जिसको समनुदेशन को प्रधान द्वारा मान्यता दी गई है ;
(ख) एक बही रखेगा जिसमें प्रत्येक इनाम निकालने की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त होंगे ;
(ग) एक खाता रखेगा, जिसमें निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी :-
(i) प्रत्येक चिट में अभिदाताओं द्वारा संदत्त रकमें और ऐसे संदायों की तारीखें ;
(ii) इनामी अभिदाताओं को संदत्त रकमें और ऐसे संदायों को तारीखें ; और
(iii) चिट करार में वर्णित किसी अनुमोदित बैंक में निक्षेप की दशा में ऐसा निक्षेप किए जाने की तारीख और रकम ;
(घ) विहित प्ररूप में एक रजिस्टर रखेगा जिसमें प्रधान द्वारा अपने कार्यालय में संचालित सभी चिटों की बाबत, अनुमोदित बैंकों में, इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन अपेक्षित जमा की गई रकमें दर्शित होंगी ; और
(ङ) ऐसे अन्य रजिस्टर और बहियां ऐसे प्ररूप में रखेगा, जो उस राज्य सरकार द्वारा, जिसकी अधिकारिता के भीतर चिट संचालित की जाती है, विहित किया जाए ।
24. तुलनपत्र-कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्रत्येक प्रधान, चिट कारबार की बाबत, यथास्थिति, प्रत्येक कलैण्डर वर्ष की या प्रधान के वित्तीय वर्ष की अन्तिम तारीख को यथाविद्यमान तुलनपत्र और लेखा वर्ष से सम्बन्धित लाभ-हानि लेखा तैयार करेगा और रजिस्ट्रार के यहां फाइल करेगा जो अनुसूची के भाग 1 और भार 2 में उपवर्णित प्ररूपों में या उनसे इतने मिलते-जुलते रूप में होगा जो परिस्थितियों में अनुज्ञेय हो और जिसकी लेखापरीक्षा कम्पनी अधिनियम, 1956 के अधीन लेखापरीक्षकों के रूप में कार्य करने के लिए अर्हित लेखापरीक्षकों द्वारा या धारा 61 के अधीन नियुक्त चिट-लेखापरीक्षक द्वारा की गई हो :
परन्तु जहां किसी तुलनपत्र की लेखापरीक्षा कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन लेखापरीक्षकों के रूप में कार्य करने के लिए अर्हित लेखापरीक्षकों द्वारा की जाती है, वहां धारा 61 के अधीन नियुक्त चिट-लेखापरीक्षक को तुलनपत्र की किसी भी समय लेखापरीक्षा करने का अधिकार होगा यदि वह रजिस्ट्रार द्वारा उस निमित्त प्राधिकृत किया गया हो ।
25. अभिदाताओं के प्रति प्रधान का दायित्व-(1) प्रत्येक प्रधान अभिदाताओं को उन रकमों का हिसाब देने का दायी होगा जो उन्हें शोध्य हैं ।
(2) जहां किसी चिट में एक से अधिक प्रधान हैं, वहां उनमें से प्रत्येक संयुक्ततः और पृथक्तः, और यदि प्रधान के कोई फर्म या अन्य व्यष्टि निकाय है, तो उस भागीदारों या व्यष्टि या व्यष्टियों में से प्रत्येक संयुक्ततः और पृथक्तः, और यदि प्रधान कोई कम्पनी है तो वह कम्पनी उस रूप में चिट से उत्पन्न होने वाली बाध्यताओं के सम्बन्ध में अभिदाताओं के प्रति दायी होगी ।
26. प्रधान का अलग हो जाना-(1) कोई प्रधान, या जहां किसी चिट में एक से अधिक प्रधान हैं, वहां उनमें से कोई अपने को चिट से तब तक अलग नहीं करेगा, जब तब वह समाप्त नहीं हो जाती है और जब तक कि ऐसे अलग होने के बारे में गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाताओं द्वारा लिखित रूप में अनुमति नहीं दे दी जाती है और ऐसी अनुमति की एक प्रति धारा 41 के अधीन रजिस्ट्रार के पास फाइल नहीं कर दी जाती है ।
(2) प्रधानों में से किसी एक के चिट अलग हो जाने से धारा 20 या धारा 31 के अधीन उसके द्वारा दी गई प्रतिभूति पर प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
अध्याय 4
गैर-इनामी अभिदाताओं के अधिकार और कर्तव्य
27. गैर-इनामी अभिदाताओं द्वारा अभिदायों का संदाय किया जाना और रसीद प्राप्त करना-प्रत्येक गैर-इनामी अभिदाता प्रत्येक किस्त की बाबत शोध्य अपना अभिदाय चिट करार में वर्णित तारीखों और समयों तथा स्थानों पर करेगा और ऐसा संदाय करने पर प्रधान से रसीद प्राप्त करने का हकदार होगा ।
28. व्यतिक्रमी अभिदाताओं का हटाया जाना-(1) ऐसे गैर-इनामी अभिदाता का, जो चिट करार के निबंधनों के अनुसार अपने अभिदाय का संदाय करने में व्यतिक्रम करता है, नाम अभिदाताओं की सूची में से हटाया जा सकेगा और ऐसे हटाए जाने की लिखित सूचना प्रधान द्वारा व्यतिक्रमी अभिदाता को ऐसे हटाए जाने के चौदह दिन के भीतर दी जाएगी :
परन्तु यदि व्यतिक्रमी व्यतिक्रम की गई किस्त का संदाय, ब्याज सहित, ऐसी दर पर जो विहित की जाए, ऐसी सूचना की प्राप्ति के सात दिन के भीतर कर देता है, तो उसका नाम ऐसे अभिदाताओं की सूची में पुनः प्रविष्ट कर लिया जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन ऐसे हटाए जाने की, प्रधान द्वारा रखी गई सुसंगत पुस्तक से हटाए जाने की तारीख सहित प्रविष्टि की जाएगी ।
(3) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रविष्टि की सही प्रतिलिपि, ऐसे हटाए जाने की तारीख से चौदह दिन के भीतर प्रधान द्वारा रजिस्ट्रार के यहां फाइल की जाएगी ।
(4) जो व्यतिक्रमी अभिदाता अभिदाताओं की सूची से अपना नाम हटाए जाने से व्यथित है, वह हटाए जाने की सूचना की प्राप्ति की तारीख से सात दिन के भीतर मामले को धारा 64 के अधीन माध्यस्थम् के लिए रजिस्ट्रार को निर्दिष्ट कर सकता है ।
29. अभिदाताओं का प्रतिस्थापन-(1) प्रधान, अभिदाताओं की सूची में उस व्यतिक्रमी अभिदाता के स्थान पर, जिसका नाम धारा 28 की उपधारा (1) के अधीन हटाया गया है, किसी व्यक्ति को (जिसे इस अध्याय में इसके पश्चात् प्रतिस्थापित अभिदाता कहा गया है) प्रतिस्थापित कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक प्रतिस्थापन की प्रविष्टि उसकी तारीख सहित, प्रधान द्वारा रखी गई सुसंगत पुस्तक में की जाएगी और ऐसी प्रत्येक प्रविष्टि की सही प्रतिलिपि ऐसे प्रतिस्थापन की तारीख से चौदह दिन के भीतर प्रधान द्वारा रजिस्ट्रार के यहां फाइल की जाएगी ।
30. व्यतिक्रमी अभिदाताओं को शोध्य रकमें-(1) प्रधान प्रतिस्थापन की तारीख से पूर्व की अवधि से संबंधित किस्तों के प्रति (जिनके अन्तर्गत व्यतिक्रमी अभिदाता से प्राप्य बकाया भी है) प्रतिस्थापित अभिदाता द्वारा देय और उससे वसूल की गई रकमों में से, उतनी रकम जो व्यतिक्रमी अभिदाता द्वारा किए गए अभिदायों की रकम के, जिसमें से ऐसी कटौतियां कर दी गई हैं जिनके लिए उपबंध चिट करार में किया जाए, बराबर है, चिट करार में उल्लिखित किसी अनुमोदित बैंक में एक अभिज्ञेय पृथक् खाते में ठीक उत्तरवर्ती किस्त की तारीख से पूर्व जमा करेगा और इस प्रकार जमा किए जाने के तथ्य की सूचना व्यतिक्रमी अभिदाता तथा रजिस्ट्रार को देगा तथा इस प्रकार जमा की गई रकम को व्यतिक्रमी अभिदाता को संदाय करने के लिए ही निकालेगा, अन्यथा नहीं ।
(2) उपधारा (1) के अधीन इस प्रकार जमा की गई रकम व्यतिक्रमी अभिदाता करे, जब भी उसके लिए दावा करे, तब उसको संदत्त की जाएगी और इस प्रकार जमा की गई रकम को प्रधान ऐसे संदाय से भिन्न किसी अन्य प्रयोजन के लिए नहीं निकालेगा ।
(3) किसी ऐसे व्यतिक्रमी अभिदाता के, जिसे चिट की समाप्ति तक प्रतिस्थापित नहीं किया गया है, अभिदायों को चिट की समाप्ति की तारीख से पन्द्रह दिन के भीतर, ऐसी कटौतियां करके जिनके लिए चिट करार में उपबन्ध किए गए हों, उस व्यतिक्रमी अभिदाता को संदत्त दिया जाएगा ।
अध्याय 5
इनामी अभिदाताओं के अधिकार और कर्तव्य
31. इनामी अभिदाता द्वारा प्रतिभूति का दिया जाना-प्रत्येक इनामी अभिदाता यदि उसने, अपने को शोध्य इनामी रकम में से सभी भावी अभिदायों की रकम की कटौती की जाने की प्रस्थापना नहीं की है तो सभी भावी अभिदायों के संदाय के लिए पर्याप्त प्रतिभूति देगा और प्रधान उसे लेगा और यदि प्रधान इनामी अभिदाता है तो वह रजिस्ट्रार के समाधान प्रदरूप में सभी भावी अभिदायों के सम्यक् संदाय के लिए प्रतिभूति देगा ।
32. इनामी अभिदाता द्वारा नियमित रूप से अभिदायों का संदाय किया जाना-प्रत्येक इनामी अभिदाता चिट करार में वर्णित तारीखों, समयों और स्थानों पर नियमित रूप से अपने अभिदायों का संदाय करेगा और ऐसा करने में उसके असफल रहने पर वह सभी भावी अभिदायों का समेकित संदाय तुरन्त करने का दायी होगा ।
33. प्रधान द्वारा भावी अभिदायों की लिखित सूचना द्वारा मांग की जाना-(1) प्रधान किसी व्यतिक्रमी इनामी अभिदाता से धारा 32 के अधीन समेकित संदाय का दावा करने का हकदार नहीं होगा जब तक कि वह उसकी लिखित रूप में मांग नहीं करता है ।
(2) जहां किसी व्यतिक्रमी इनामी अभिदाता से भावी अभिदायों के समेकित संदाय के लिए प्रधान द्वारा इस अधिनियम के अधीन कोई विवाद उठाया जाता है और यदि ऐसा अभिदाता विवाद की सुनवाई के लिए लगी तारीख को या उसके पूर्व प्रधान को उस तारीख तक के अभिदायों की बकाया का, उन पर उस दर से ब्याज सहित, जो चिट करार में उपबन्धित हो, और विवाद के न्यायनिर्णयन के खर्च का, संदाय कर देता है, तो तत्प्रतिकूल संविदा के होते हुए भी, रजिस्ट्रार या उसका नामनिर्देशिती जो विवाद की सुनवाई कर रहा है, अभिदाता को यह निदेश देने वाला आदेश करेगा कि वह प्रधान को भावी अभिदायों का संदाय उन तारीखों को या उनके पूर्व, जिनको वे शोध्य होते हैं, करे और अभिदाता द्वारा ऐसे संदायों में व्यतिक्रम की दशा में, प्रधान को इस बात की स्वतंत्रता होगी कि वह उस आदेश के निष्पादन में, सभी भावी अभिदायों और ब्याज की खर्च सहित, यदि कोई हो, उसमें से अभिदाता द्वारा उनकी बाबत पहले ही संदत्त रकम को, यदि कोई हो, घटाकर वसूली कर ले :
परन्तु यदि ऐसा कोई विवाद वचन-पत्र के आधार पर है, तो इस उपधारा के अधीन कोई आदेश तब तक पारित नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसे वचन-पत्र में स्पष्ट रूप से यह कथन न हो कि वचन-पत्र के अधीन शोध्य रकम चिट के अभिदायों के संदाय के लिए है ।
(3) कोई व्यक्ति, जो प्रतिभूति के रूप में दी गई सम्पत्ति में या उसके किसी भाग में कोई हित रखता है, उपधारा (2) के अधीन संदाय करने का हकदार होगा ।
(4) भावी अभिदायों के सभी समेकित संदायों को, जो प्रधान ने वसूल किए हैं, चिट करार में वर्णित अनुमोदित बैंक में, उसके द्वारा ठीक आगामी किस्त की तारीख के पूर्व जमा किया जाएगा और इस प्रकार जमा की गई रकम केवल भावी अभिदायों के संदाय के लिए ही निकाली जाएगी, अन्यथा नहीं ।
(5) जहां कोई संपत्ति भावी अभिदायों के समेकित संदाय के बदले में प्राप्त की जाती है, वहां वह भावी अभिदायों के सम्यक् संदाय के लिए प्रतिभूति के रूप में रहेगी ।
अध्याय 6
अन्तरण
34. प्रधान के अधिकारों के अन्तरण पर निर्बन्धन-(1) इनामी अभिदाताओं से अभिदायों को प्राप्त करने के लिए प्रधान के अधिकारों का कोई अन्तरण रजिस्ट्रार को लिखित रूप में पूर्व मंजूरी के बिना नहीं किया जाएगा ।
(2) यदि इनामी अभिदाताओं से अभिदायों को प्राप्त करने के प्रधान के अधिकारों के किसी अन्तरण से गैर-इनामी या असंदत्त इनामी अभिदाता के हितों के विफल होने या उनमें विलम्ब होने की संभाव्यता है तो वह अन्तरण ऐसे अभिदाता की प्ररेणा पर शून्यकरणीय होगा ।
(3) जब किसी अभिदाता द्वारा किसी अन्तरण के सम्बन्ध में उपधारा (2) के अधीन विवाद उठाया जाता है तब यह साबित करने का भार अन्तरिती पर होगा कि प्रधान उस अन्तरण के समय पर ऋण शोधक्षम परिस्थिति में था और उस अन्तरण से ऐसे अभिदाता के हित विफल नहीं होते हैं या उनमें विलम्ब नहीं होता है ।
35. गैर-इनामी अभिदाता के अधिकारों का अन्तरण लिखित रूप में होना-गैर-इनामी अभिदाता द्वारा चिट में अपने अधिकारों का प्रत्येक अन्तरण लिखित रूप में होगा, जो कम से कम दो साक्षियों द्वारा सम्यक् रूप में अनुप्रमाणित होगा और प्रधान के यहां फाइल किया जाएगा ।
36. प्रधान द्वारा अन्तरण को मान्यता-धारा 35 के अधीन प्रत्येक अन्तरण को, अन्तरण के प्रस्ताव की प्रधान द्वारा प्राप्ति की तारीख से चौदह दिन की अवधि के भीतर, उसके द्वारा मान्यता दी जाएगी, किन्तु यदि अन्तरिती ऋण शोधक्षम नहीं है या अन्तरण किसी विधि के उपबन्धों को, जिसके अन्तर्गत यह अधिनियम भी है, विफल करने की दृष्टि से किया गया था तो वह मान्यता नहीं देगा, और अंतरण को मान्यता देने या न देने का प्रधान का विनिश्चय संबंधित पक्षकारों को तुरन्त संसूचित किया जाएगा ।
37. बहियों में अंतरिती के नाम की प्रविष्टि-प्रधान धारा 34 या धारा 35 के अधीन प्रत्येक अन्तरण की प्रविष्टि चिट की बहियों में तुरन्त करेगा और ऐसी प्रविष्टि की सही प्रतिलिपि रजिस्ट्रार के पास, ऐसी प्रविष्टि की जाने की तारीख से चौदह दिन के भीतर फाइल करेगा ।
अध्याय 7
अभिदाताओं के साधारण निकाय के अधिवेशन
38. अभिदाताओं के साधारण निकाय के अधिवेशन-(1) प्रधान, कोई विशेष संकल्प पारित करने के किसी प्रस्ताव पर विचार करने के लिए अभिदाताओं के साधारण निकाय का विशेष अधिवेशन स्वप्रेरणा से बुला सकेगा ।
(2) प्रधान ऐसा अधिवेशन गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाताओं की संख्या में से कम से कम पच्चीस प्रतिशत अभिदाताओं की लिखित अध्यपेक्षा पर बुलाएगा और इस प्रकार बुलाया गया अधिवेशन अध्यपेक्षा की प्राप्ति की तारीख के तीस दिन के भीतर किया जाएगा और यदि प्रधान ऐसी अध्यपेक्षा की प्राप्ति के चौदह दिन के भीतर ऐसा अधिवेशन बुलाने से इन्कार करता है या बुलाने में असफल रहता है तो गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाताओं की संख्या में से कम से कम पच्चीस प्रतिशत अभिदाता इस तथ्य की सूचना रजिस्ट्रार को दे सकेंगे ।
(3) रजिस्ट्रार उपधारा (2) के अधीन किसी सूचना की प्राप्ति के इक्कीस दिन के भीतर अभिदाताओं के साधारण निकाय का विशेष अधिवेशन बुलाएगा या बुलाने का निदेश देगा और ऐसा निदेश प्राप्त हो जाने पर प्रधान का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे निदेश का अनुपालन करे ।
(4) इस धारा के अधीन अधिवेशन की कम से कम चौदह दिन की सूचना सभी अभिदाताओं को दी जाएगी, जिसमें उस अधिवेशन का उद्देश्य, तारीख, समय और स्थान विनिर्दिष्ट होगा और अधिवेशन की सूचना के साथ विशेष संकल्प की प्रति भी भेजी जाएगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा और धारा 39 के प्रयोजनों के लिए, विशेष संकल्प" से ऐसा संकल्प अभिप्रेत है जो अभिदाताओं के साधारण निकाय के उस प्रयोजन के लिए विशेषतः बुलाए गए अधिवेशन में, चिट के अभिदाताओं के कम से कम दो-तिहाई बहुमत द्वारा, जो स्वयं या परोक्षी द्वारा अधिवेशन में उपस्थित हों और जो सभी गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाताओं द्वारा, यदि कोई हों, अभिदाय की गई, यथास्थिति, रकम या अनाज के मूल्य के कम से कम तीन-चौथाई का प्रतिनिधित्व करते हैं, पारित किया जाता है ।
अध्याय 8
चिटों की समाप्ति
39. कुछ मामलों में चिटों को जारी रखने के लिए उपबंध-(1) जहां किसी प्रधान की मृत्यु हो जाती है या वह विकृतचित्त हो जाता है या अन्यथा असमर्थ हो जाता है वहां चिट को, चिट करार के उपबंधों के अनुसार, जारी रखा जा सकेगा ।
(2) जहां कोई प्रधान दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है या धारा 29 के अधीन चिट से अलग हो जाता है या किसी किस्त पर या ठीक आगामी किस्त के पूर्व किसी अन्य तारीख को, जो किसी विशेष संकल्प द्वारा तय पाई गई हो, चिट का संचालन करने में असफल रहता है, वहां ऐसे संकल्प द्वारा प्राधिकृत ऐसे अभिदाताओं में से कोई एक या एक से अधिक अभिदाता, चिट के भावी संचालन के लिए चिट करार में कोई उपबन्ध न होने पर, प्रधान का स्थान ले सकेंगे और चिट जारी रख सकेंगे या चिट के भावी संचालन के लिए अन्य व्यवस्थाएं कर सकेंगे ।
40. चिटों की समाप्ति-निम्नलिखित दशाओं में चिट समाप्त हो गई समझी जाएगी, अर्थात् :-
(क) जब चिट करार में उसके लिए विनिर्दिष्ट अवधि का अवसान हो गया है : परन्तु यह तब जब कि सभी अभिदाताओं की शोध्य रकमों का संदाय पूरा कर दिया गया हो ; या
(ख) जब सभी गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाता और प्रधान चिट की समाप्ति के लिए लिखित रूप में सम्मति दे देते हैं और ऐसी सम्मति की प्रतिलिपि रजिस्ट्रार के यहां धारा 41 द्वारा अपेक्षित रूप में फाइल कर दी जाती है ; और
(ग) जहां प्रधान की मृत्यु हो जाती है या वह विकृतचित्त हो जाता है या अन्यथा असमर्थ हो जाता है और चिट को, चिट करार के उपबन्धों के अनुसार जारी नहीं रखा जाता है :
परन्तु ऐसी दशा में जहां प्रधान कोई फर्म है वहां यदि किसी भागीदार की मृत्यु हो जाती है या वह विकृतचित्त हो जाता है या अन्यथा असमर्थ हो जाता है, तो चिट समाप्त हो गई नहीं समझी जाएगी और उत्तरजीवी भागीदार चिट करार में कोई तत्प्रतिकूल उपबन्ध न होने पर चिट का संचालन करेगा या करेंगे ।
41. अनुमति या सम्मति की प्रतिलिपि का रजिस्ट्रार के यहां फाइल किया जाना-धारा 26 में निर्दिष्ट प्रत्येक अनुमति की और धारा 40 के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट प्रत्येक सम्मति की सही प्रतिलिपि, ऐसी अनुमति या सम्मति की तारीख सहित, यथास्थिति, प्रधान द्वारा या उत्तरजीवी भागीदार या भागीदारों द्वारा, रजिस्ट्रार के यहां ऐसी अनुमति या सम्मति की तारीख से चौदह दिन के भीतर फाइल की जाएगी ।
42. गैर-इनामी अभिदाताओं के अभिदायों का वापस किया जाना-धारा 40 के खंड (क) और खंड (ख) में विनिर्दिष्ट मामलों को छोङकर,-
(क) प्रत्येक गैर-इनामी अभिदाता, जब तक कि इस अधिनियम में या चिट करार में उसके लिए अन्यथा उपबन्ध न किया गया हो, चिट की समाप्ति पर अपने अभिदाय, अपने द्वारा उपार्जित लाभांश के लिए, यदि कोई हों, कोई कटौती किए बिना वापस पाने का हकदार होगा :
परन्तु कोई ऐसा व्यक्ति, जिसे धारा 35 के उपबन्धों के अनुसार गैर-इनामी अभिदाता के अधिकारों का अन्तरण किया गया है, अपने अभिदायों के अतिरिक्त ऐसे गैर-इनामी अभिदाता द्वारा किए गए अभिदायों को भी इस धारा में विनिर्दिष्ट शर्तों के अधीन रहते हुए, पाने का हकदार होगा ;
(ख) यदि कोई चिट, चिट करार में मूलतः नियत तारीख से पूर्व समाप्त हो जाती है तो गैर-इनामी अभिदाता का दावा उस तारीख को उद्भूत हुआ समझा जाएगा, जिसको उसे उसकी सूचना मिलती है ।
43. अभिदाताओं को शोध्यों का चिट आस्तियों पर प्रथम भार होना-चिट कारबार के संबंध में प्रधान से अभिदाता को शोध्य कोई रकम चिट आस्तियों पर प्रथम भार होगी ।
अध्याय 9
दस्तावेजों का निरीक्षण
44. प्रधान द्वारा कुछ अभिदाताओं को चिट अभिलेखों का निरीक्षण करने देना-प्रत्येक प्रधान, पांच रुपए से अनधिक ऐसी फीस के संदाय पर जो चिट करार में विनिर्दिष्ट की जाए, गैर-इनामी अभिदाताओं और असंदत्त इनामी अभिदाताओं को, इनाम निकालने की सभी तारीखों को या ऐसी अन्य तारीखों को और ऐसे समय के भीतर, जिनके लिए चिट करार में उपबंध किया जाए, प्रतिभूति बंधपत्रों और दस्तावेजों के, इनामी अभिदाताओं से ली गई या प्रधान द्वारा अभिदाता के रूप में दी गई रसीदों और अन्य अभिलेखों और सभी चिट अभिलेखों के, जिनके अन्तर्गत लेखाबहियां, पासबुकें, तुलनपत्र तथा लाभ और हानि के लेखे हैं, तथा ऐसे अन्य अभिलेखों की जिनसे चिट की वास्तविक वित्तीय स्थिति प्रकट हो, निरीक्षण के लिए सभी युक्तियुक्त सुविधाएं देगा ।
45. प्रधान द्वारा चिट अभिलेखों का परिरक्षण-किसी चिट से संबंधित सभी अभिलेख प्रधान द्वारा चिट की समाप्ति की तारीख से आठ वर्ष की अवधि तक रखे जाएंगे ।
46. रजिस्ट्रार द्वारा चिट बहियों और अभिलेखों का निरीक्षण-(1) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 209 और धारा 209क के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, रजिस्ट्रार या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अधिकारी, किसी कार्य दिवस को कार्य समय के दौरान, प्रधान के परिसर में सूचना देकर या सूचना दिए बिना, चिट बहियों और चिट के सभी अभिलेखों का निरीक्षण कर सकेगा और प्रत्येक प्रधान का यह कर्तव्य होगा कि वह रजिस्ट्रार या इस प्रकार प्राधिकृत अधिकारी के समक्ष ऐसी सभी बहियां और अभिलेख, जो उसकी अभिरक्षा या शक्ति में हों, रखे और चिटों से संबंधित कोई विवरण या जानकारी, जिसको वह प्रधान से अपेक्षा करे, उतने समय के भीतर दे जो वह विनिर्दिष्ट करे ।
(2) रजिस्ट्रार या राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत कोई अधिकारी, प्रधान को सात दिन की लिखित सूचना देने के पश्चात् उसे यह निदेश दे सकेगा कि वह ऐसी चिट बहियां और अभिलेख, जिनकी वह अपेक्षा करे, ऐसे समय और स्थान पर जो सूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, निरीक्षण के लिए उसके समक्ष प्रस्तुत करे ।
(3) यदि उपधारा (1) या उपधारा (2) के अधीन निरीक्षण करने के पश्चात् कोई त्रुटियां पाई जाती हैं तो रजिस्ट्रार ऐसी त्रुटियों को प्रधान की जानकारी में लाएगा और प्रधान को यह निदेश देने वाला आदेश भी कर सकेगा कि वह उसमें विनिर्दिष्ट समय के भीतर त्रुटियों को सुधारने के लिए ऐसी कार्रवाई करे जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए ।
(4) प्रत्येक प्रधान उपधारा (3) के अधीन किए गए आदेश में अन्तर्विष्ट निदेशों का अनुपालन करने के लिए बाध्य होगा ।
47. चिट बहियों और अभिलेखों का निरीक्षण करने की रिजर्व बैंक की शक्ति-(1) धारा 46 की कोई बात, भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 45ढ के उपबंधों के अधीन किसी प्रधान की बहियों और अभिलेखों का निरीक्षण करने की रिजर्व बैंक की शक्ति पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।
(2) यदि रिजर्व बैंक आवश्यक समझता है तो प्रधान की बहियों और अभिलेखों के निरीक्षण पर अपनी रिपोर्ट की या अपनी रिपोर्ट के ऐसे भाग की एक प्रति प्रधान को आवश्यक कार्रवाई करने के लिए भेज सकेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन रिपोर्ट की या उसके किसी भाग की प्राप्ति पर प्रत्येक प्रधान, रिजर्व बैंक द्वारा उस निमित्त दिए गए निदेशों का, यदि कोई हों, अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा और यदि अपेक्षा की जाए तो अपने द्वारा की गई कार्रवाई के संबंध में नियतकालिक रिपोर्टें भेजेगा ।
(4) रिजर्व बैंक, प्रधान की बहियों और अभिलेखों के निरीक्षण पर रिपोर्ट की एक प्रति उस राज्य सरकार को भी, जिसकी अधिकारिता के भीतर कम्पनी का, यदि प्रधान एक कम्पनी है, रजिस्ट्रीकृत कार्यालय या अन्य मामले में प्रधान के कारबार का स्थान या मुख्य स्थान स्थित है, ऐसी कार्रवाई के लिए भेज सकेगा, जो आवश्यक समझी जाए ।
अध्याय 10
चिटों का परिसमापन
48. वे परिस्थितियां जिनके अधीन चिटों का परिसमापन किया जा सकेगा-किसी चिट का परिसमापन उस रजिस्ट्रार द्वारा, जिसकी क्षेत्रीय अधिकारिता के भीतर वह चिट रजिस्ट्रीकृत की गई है, या तो स्वप्रेरणा से या किसी गैर-इनामी या असंदत्त इनामी अभिदाता द्वारा किए गए आवेदन पर तब किया जा सकेगा,-
(क) यदि चिट धारा 40 के खण्ड (ग) के अधीन पर्यवसित हो गई है ; या
(ख) यदि प्रधान धारा 20 में विनिर्दिष्ट प्रतिभूति के संबंध में कोई ऐसा कार्य करता है, जो प्रतिभूति की प्रकृति या उसके मूल्य का तात्त्विक रूप में ह्रास करने के लिए प्रकल्पित है ; या
(ग) यदि वह इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी उपबन्ध के अधीन जमा करने के लिए अपेक्षित कोई रकम जमा करने में असफल रहता है ; या
(घ) यदि रजिस्ट्रार के समाधानप्रद रूप में यह साबित हो जाता है कि प्रधान अभिदाताओं को शोध्य रकमों का संदाय करने में असमर्थ है ; या
(ङ) यदि रजिस्ट्रार द्वारा किसी अभिदाता के पक्ष में, उसे चिट कारबार के संबंध में प्रधान द्वारा शोध्य रकमों की बाबत पारित किसी आदेश पर जारी किया गया निष्पादन या अन्य आदेशिका सम्पूर्णतः या भागतः तुष्ट किए बिना वापस कर दी जाती है ; या
(च) यदि यह साबित हो जाता है कि प्रधान की ओर से किन्हीं इनामी अभिदाताओं से प्रतिभूतियां लेने के विषय में कपट या दुरभिसंधि की गई है ; या
(छ) यदि प्रधान ने अभिदाता के रूप में अपनी हैसियत में इनामी रकम को भावी अभिदायों के लिए पर्याप्त प्रतिभूति दिए बिना विनियोजित कर लिया है ; या
(ज) यदि रजिस्ट्रार का यह समाधान हो गया है कि चिट के कार्यकलाप का संचालन ऐसी रीति में किया जा रहा है, जो अभिदाताओं के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाली है ; या
(झ) यदि यह न्यायसंगत और साम्यापूर्ण है कि चिट का परिसमापन कर दिया जाना चाहिए ।
स्पष्टीकरण-खण्ड (घ) के प्रयोजनों के लिए, यह अवधारण करने में कि अभिदाताओं को शोध्य रकमों का संदाय करने में प्रधान असमर्थ है, रजिस्ट्रार चिट के संबंध में उसके समाश्रित और भावी दायित्वों को ध्यान में रखेगा ।
49. परिसमापन के लिए आवेदन-चिट के परिसमापन के लिए आवेदन किसी गैर-इनामी या असंदत्त इनामी अभिदाता द्वारा रजिस्ट्रार को अर्जी पेश करके किया जाएगा जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा विहित रीति में हस्ताक्षरित और सत्यापित होगी और उसमें ऐसी विशिष्टियां होंगी, जो विहित की जाएं :
परन्तु धारा 48 के खण्ड (घ) या खण्ड (झ) के अधीन किसी चिट के परिसमापन के लिए आवेदन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि ऐसा आवेदन-
(क) ऐसे गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाताओं द्वारा पेश न किया गया हो जा सभी गैर-इनामी और असंदत्त इनामी अभिदाताओं द्वारा, यदि कोई हों, यथास्थिति, अभिदत्त रकम के या अनाज के मूल्य के कम से कम पच्चीस प्रतिशत का प्रतिनिधितव करते हों, या
(ख) उस राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से पेश न किया गया हो जिसकी अधिकारिता के भीतर चिट आरम्भ की गई है या उसका संचालन किया जाता है ।
स्पष्टीकरण-परन्तुक के खण्ड (क) के प्रयोजनों के लिए, किसी टिकट के किसी प्रभाग का अभिदाता केवल उस भाग तक के लिए अभिदाता समझा जाएगा ।
50. परिसमापन कार्यवाहियों का वर्जन-धारा 48 और धारा 49 में किसी बात के होते हुए भी, रजिस्ट्रार चिट के परिसमापन के लिए कोई अर्जी निम्नलिखित दशाओं में ग्रहण नहीं करेगा, अर्थात् :-
(क) यदि प्रधान के विरुद्ध दिवाला से सम्बन्धित कार्यवाहियां लम्बित हैं ; या
(ख) जहां प्रधान कोई फर्म है वहां यदि सभी भागीदारों या उसके एक भागीदार को छोङकर सभी भागीदारों के विरुद्ध दिवाले से सम्बन्धित कार्यवाहियां लम्बित हैं या फर्म के विघटन के लिए कार्यवाहियां लम्बित हैं ; या
(ग) जहां प्रधान कोई कम्पनी या सहकारी सोसाइटी है वहां यदि ऐसी कम्पनी या सहकारी सोसाइटी के परिसमापन के लिए कार्यवाहियां लम्बित हैं ।
51. परिसमापन आदेश का प्रारम्भ और प्रभाव-किसी चिट के परिसमापन के लिए कोई आदेश ऐसे सभी अभिदाताओं के पक्ष में प्रवर्तित होगा, जिन्हें प्रधान द्वारा रकमें शोध्य हैं और वह परिसमापन के लिए आवेदन के पेश किए जाने की तारीख से प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा ।
52. व्यादेश-रजिस्ट्रार, प्रधान या ऐसे किसी अभिदाता के आवेदन पर, जिसे चिट के संबंध में रकमें शोध्य हैं, इस अधिनियम के अधीन चिट के परिसमापन के लिए आवेदन पेश किए जाने के पश्चात् और किसी अंतरिम रिसीवर की नियुक्ति के लिए या चिट के परिसमापन के लिए आदेश किए जाने के पूर्व किसी समय, किन्हीं अन्य कार्यवाहियों को, जो प्रधान के विरुद्ध उसके द्वारा शोध्य रकमों की वसूली के लिए संस्थित की गई है, ऐसे निबन्धनों पर रोक सकेगा, जो रजिस्ट्रार ठीक समझे ।
53. रजिस्ट्रार की शक्तियां-रजिस्ट्रार इस अध्याय के अधीन आवेदन की सुनवाई के पश्चात् उसे खर्चे सहित या उसके बिना खारिज कर सकेगा या सुनवाई को सशर्त या शर्त के बिना स्थगित कर सकेगा या कोई अंतरिम आदेश या ऐसा अन्य आदेश कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
54. रजिस्ट्रार या अन्य व्यक्ति में चिट आस्तियों का निहित होना-किसी चिट के परिसमापन के लिए कोई आदेश किए जाने पर, ऐसी चिट से संबंधित संपूर्ण चिट आस्तियां, उन अभिदाताओं के बीच वितरण के लिए जिन्हें चिट के संबंध में रकमें शोध्य हैं, रजिस्ट्रार या उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति में निहित हो जाएंगी ।
55. परिसमापन आदेश होने पर वादों, आदि का रोका जाना-जब कोई परिसमापन आदेश किया जा चुका है या रिसीवर नियुक्त किया जा चुका है तब चिट के संबंध में किसी अभिदाता को शोध्य रकमों की वसूली के लिए उस अभिदाता द्वारा प्रधान के विरुद्ध कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाहियां, चिट के परिसमापन के लिए रजिस्ट्रार की मंजूरी से ही और ऐसे निबन्धनों पर जो वह अधिरोपित करना ठीक समझे, जारी रखी जाएंगी या प्रारंभ की जाएंगी, अन्यथा नहीं ।
56. परिसमापन आदेश का अधिसूचित किया जाना-परिसमापन आदेश किए जाने पर रजिस्ट्रार चिट से संबंधित अपनी बही में उसकी प्रविष्टि करेगा और राजपत्र में यह अधिसूचित करेगा कि ऐसा आदेश कर दिया गया है ।
57. प्रधान आदि के दिवालिया होने पर परिसमापन कार्यवाहियों का बन्द किया जाना या कम्पनी का परिसमापन और ऐसी कार्यवाहियों का अन्तरण-जब किसी चिट के परिसमापन के लिए कार्यवाहियों के लम्बित होने के दौरान, प्रधान को दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जाता है या जहां प्रधान कोई फर्म है वहां उसके सभी भागीदार या उसके एक भागीदार को छोङकर सभी भागीदार दिवालिया न्यायनिर्णीत किए जाते हैं, या जहां प्रधान कोई कम्पनी है वहां न्यायालय द्वारा उस कम्पनी के परिसमापन का आदेश दिया जाता है तब इस अध्याय के अधीन परिसमापन कार्यवाहियां परिविरत हो जाएंगी और चिट आस्तियों का वितरण, यथास्थिति, दिवाला विषयक न्यायालय द्वारा या कम्पनी का परिसमापन करने वाले न्यायालय द्वारा, धारा 43 और धारा 52 के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किया जाएगा ।
58. प्रधान के लिए प्रतिकर का अधिनिर्णय-(1) जहां चिट के परिसमापन के लिए आवेदन खारिज कर दिया जाता है और रजिस्ट्रार का यह समाधान हो जाता है कि अर्जी तुच्छ या तंग करने वाली है वहां वह प्रधान के आवेदन पर, अर्जीदार के विरुद्ध ऐसी रकम अधिनिर्णीत कर सकेगा, जो एक हजार रुपए से अधिक न हो, और जो वह आवेदन के पेश किए जाने और उस पर की कार्यवाहियों से हुए प्रधान के व्ययों या क्षति के लिए प्रधान को प्रतिकर के रूप में देने के लिए युक्तियुक्त समझे और ऐसी रकम ऐसी रीति से वसूल की जाएगी मानो वह अधिनिर्णय किसी सिविल न्यायालय की डिक्री हो ।
(2) उपधारा (1) के अधीन कोई अधिनिर्णय किए जाने पर, चिट के किसी परिसमापन के लिए किसी आवेदन की बाबत प्रतिकर के लिए कोई वाद ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
59. अपील करने का अधिकार-किसी चिट के परिसमापन की किन्हीं कार्यवाहियों में रजिस्ट्रार के विनिश्चय या आदेश से व्यथित प्रधान या कोई अभिदाता या कोई अन्य व्यक्ति, ऐसे विनिश्चय या आदेश की तारीख से साठ दिन के भीतर, राज्य सरकार को अपील कर सकेगा ।
60. परिसीमा-(1) जहां किसी चिट का परिसमापन करने से इंकार करने वाला कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन किया गया है वहां गैर-इनामी अभिदाताओं के संबंध में वह चिट, आवेदन पेश किए जाने की तारीख से ऐसे आदेश की तारीख तक निलंबित समझी जाएगी और चिट करार में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे गैर-इनामी अभिदाता को, जो परिसमापन के लिए अर्जी दी जाने की तारीख को व्यतिक्रमी नहीं था, ऐसे आदेश की तारीख को व्यतिक्रमी नहीं समझा जाएगा ।
(2) जहां किसी चिट का परिसमापन करने से इंकार करने वाला कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन किया गया है वहां किसी ऐसे वाद या अन्य विधिक कार्यवाही (उस वाद या आवेदन से भिन्न जिसके संबंध में न्यायालय की इजाजत प्राप्त कर ली गई है) के लिए, जो यदि चिट के परिसमापन के लिए आवेदन पेश न किया जाता तो लाया जा सकता था या संस्थित की जा सकती थी, विहित परिसीमा की कालावधि की संगणना करने में, आवेदन के पेश किए जाने की तारीख से चिट का परिसमापन करने से इंकार करने वाले आदेश की तारीख तक की अवधि को अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(3) इस अध्याय की कोई बात, चिट के परिसमापन की कार्यवाहियों में अंतिम लाभांश की घोषणा के पश्चात् अभिदाता को शोध्य रकम के अतिशेष के लिए, यदि कोई हो, स्वयं प्रधान के विरुद्ध कार्यवाही करने के अभिदाता के अधिकारों पर प्रभाव नहीं डालेगी और ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों के लिए विहित परिसीमा की कालावधि की संगणना करने में, चिट के परिसमापन के लिए आवेदन के पेश किए जाने की तारीख से अंतिम लाभांश की घोषणा की तारीख तक की अवधि को अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
अध्याय 11
अधिकारियों की नियुक्ति और फीस का उद्ग्रहण
61. रजिस्ट्रार और अन्य अधिकारियों की नियुक्ति-(1) राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक चिट रजिस्ट्रार और इतने अपर, संयुक्त, उप और सहायक रजिस्ट्रार नियुक्त कर सकेगी, जितने इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन रजिस्ट्रार को सौंपे गए कर्तव्यों का निर्वहन करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों ।
(2) रजिस्ट्रार इतने चिट-निरीक्षक और चिट-लेखापरीक्षक नियुक्त कर सकेगा जितने इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन चिट-निरीक्षकों या चिट-लेखापरीक्षकों को सौंपे गए कर्तव्यों का निर्वहन किए जाने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों ।
(3) सभी चिट-निरीक्षक और चिट-लेखापरीक्षक इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उन पर अधिरोपित कर्तव्यों का निर्वहन, रजिस्ट्रार के सामान्य अधीक्षण और नियंत्रण के अधीन करेंगे ।
(4) यदि रजिस्ट्रार की राय है कि किसी चिट के लेखाओं को उचित रूप से नहीं रखा गया है और ऐसे लेखाओं की लेखा-परीक्षा की जानी चाहिए, तो उसके लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह लेखापरीक्षक द्वारा ऐसे लेखाओं की लेखा-परीक्षा करवाए ।
(5) चिट के प्रधान का, जिसके लेखाओं की लेखा-परीक्षा उपधारा (4) के अधीन लेखापरीक्षक द्वारा की जानी है, यह कर्तव्य होगा कि वह चिट-लेखापरीक्षक के समक्ष चिट से संबंधित सभी लेखाओं, बहियों और अन्य अभिलेखों को पेश करे और उसे ऐसी जानकारी दे जो अपेक्षित हो, और उसे ऐसी सभी सहायता और सुविधाएं दे जो चिट के लेखाओं की लेखा-परीक्षा के बारे में आवश्यक या युक्तियुक्त हों ।
(6) प्रधान चिट-लेखापरीक्षक को ऐसी फीसों का संदाय करेगा, जो उपधारा (4) के अधीन चिट के लेखाओं की लेखा-परीक्षा के लिए विहित की जाएं
परन्तु चिट रकम की मात्रा के आधार पर विभिन्न चिटों के लिए फीस के विभिन्न मापमान विहित किए जा सकेंगे ।
62. रजिस्ट्रार के कार्यालय में दस्तावेजों का निरीक्षण-किसी चिट का प्रधान या चिट का कोई अभिदाता या किसी प्रधान या अभिदाता के वारिस या विधिक प्रतिनिधि ऐसी फीसों के संदाय पर, जो विहित की जाएं,-
(क) रजिस्ट्रार द्वारा रखे गए संबंधित चिट के दस्तावेजों का निरीक्षण कर सकेंगे ; या
(ख) किसी ऐसे दस्तावेज या अभिलेख की प्रमाणित प्रतिलिपि या उसका उद्धरण प्राप्त कर सकेंगे ।
63. फीसों का उद्ग्रहण-(1) रजिस्ट्रार को निम्नलिखित के लिए ऐसी फीसों का संदाय किया जाएगा जो राज्य सरकार समय-समय पर विहित करे :-
(क) धारा 4 के अधीन पूर्व मंजूरी जारी करना ;
(ख) रजिस्ट्रार के यहां चिट करार फाइल करना और धारा 7 के अधीन चिट का रजिस्ट्रीकरण ;
(ग) रजिस्ट्रार के यहां घोषणा फाइल करना और धारा 9 के अधीन प्रारम्भ के प्रमाणपत्र का अनुदान ;
(घ) इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों के अधीन दस्तावेजों की प्रतिलिपियों का फाइल किया जाना ;
(ङ) धारा 61 के अधीन प्रधान के लेखाओं की लेखा-परीक्षा ;
(च) धारा 62 के अधीन दस्तावेजों का निरीक्षण ;
(छ) धारा 62 के अधीन दस्तावेजों और अभिलेखों की प्रमाणित प्रतियां या उनके उद्धरण प्राप्त करना ;
(ज) ऐसे अन्य विषय जो राज्य सरकार को आवश्यक प्रतीत हों ।
(2) उपधारा (1) के अधीन विहित फीसों की सारणी रजिस्ट्रार के कार्यालय में सूचना-पट्ट पर प्रदर्शित की जाएंगी ।
अध्याय 12
विवाद और माध्यस्थम्
64. चिट कारबार से संबंधित विवाद-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, किसी चिट कारबार के प्रबंध से संबंधित कोई विवाद रजिस्ट्रार को, विवाद के पक्षकारों में से किसी के द्वारा माध्यस्थम् के लिए उस दशा में निर्देशित किया जाएगा जब विवाद का प्रत्येक पक्षकार निम्नलिखित में से कोई एक या दूसरा है, अर्थात् :-
(क) कोई प्रधान, इनामी अभिदाता या गैर-इनामी अभिदाता जिसके अन्तर्गत व्यतिक्रमी अभिदाता, भूतपूर्व अभिदाता अथवा चिट के किसी अभिदाता अथवा मृत अभिदाता की मार्फत दावा करने वाला कोई व्यक्ति है ;
(ख) अभिदाता, भूतपूर्व अभिदाता या मृत अभिदाता का कोई प्रतिभू ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए किसी चिट कारबार के प्रबंध से संबंधित विवाद के अन्तर्गत निम्नलिखित होंगे :-
(i) प्रधान द्वारा या उसके विरुद्ध किसी ऐसे ऋण या मांग के लिए दावा, जो उसे अभिदाता द्वारा शोध्य हो या उसके द्वारा अभिदाता, भूतपूर्व अभिदाता अथवा मृत अभिदाता के नामनिर्देशिती, वारिस या विधिक प्रतिनिधि को शोध्य हो, चाहे ऐसे ऋण या मांग को स्वीकार किया गया हो या नहीं ;
(ii) प्रतिभू द्वारा किसी ऐसी राशि या मांग के लिए दावा, जो उसे मुख्य उधार लेने वाले से किसी प्रधान से लिए गए उधार की बाबत शोध्य हो और जो मुख्य उधार लेने वाले के व्यतिक्रम के कारण प्रतिभू से वसूल किया गया हो, चाहे ऐसी राशि या मांग को स्वीकार किया गया हो या नहीं ; तथा
(iii) अभिदाता, भूतपूर्व अभिदाता अथवा मृत अभिदाता के नामनिर्देशिती, वारिस या विधिक प्रतिनिधि द्वारा प्रधान को ऐसी भूमि या किसी अन्य आस्ति के, जिसे प्रधान ने समनुदेशन की शर्तों के भंग के कारण पुनःप्राप्त कर लिया है, कब्जे का परिदान करने से इंकार या उसमें असफलता ।
(2) जब कोई ऐसा प्रश्न उठता है कि रजिस्ट्रार के अधिनिर्णय के लिए निर्देशित कोई मामला उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए विवाद है या नहीं, तो रजिस्ट्रार ऐसे प्रश्न का विनिश्चय करेगा और उस पर उसका विनिश्चय अंतिम होगा ।
(3) किसी सिविल न्यायालय को, उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी विवाद के बारे में कोई वाद या अन्य कार्यवाही ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी ।
65. परिसीमा की कालावधि-(1) परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) में किसी बात के होते हुए भी, किन्तु इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट विनिर्दिष्ट उपबंधों के अधीन रहते हुए, धारा 64 के अधीन रजिस्ट्रार को निर्दिष्ट किसी विवाद की दशा में,-
(क) जब विवाद किसी मृत अभिदाता से प्रधान को शोध्य रकम की, जिसके अन्तर्गत उस पर ब्याज भी है, वसूली से संबंधित है, परिसीमा की कालावधि तीन वर्ष होगी जिसकी संगणना उस तारीख से की जाएगी, जिसको ऐसे अभिदाता की मृत्यु हो जाती है या वह अभिदाता नहीं रहता है ; या
(ख) जब विवाद किसी प्रधान और किसी अभिदाता या भूतपूर्व अभिदाता या किसी मृत अभिदाता के नामनिर्देशिती, वारिस अथवा विधिक प्रतिनिधि के बीच है और विवाद, विवाद के किसी पक्षकार द्वारा किए गए किसी कार्य या लोप से संबंधित है, परिसीमा की कालावधि उस तारीख से तीन वर्ष होगी जिसको वह कार्य या लोप हुआ था जिसके बारे में वह विवाद उत्पन्न हुआ है ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट विवादों को छोङकर, जो धारा 64 के अधीन रजिस्ट्रार को निर्देशित किए जाने के लिए अपेक्षित है, किसी अन्य विवाद की दशा में परिसीमा की कालावधि का विनियमन परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के उपबंधों द्वारा ऐसे किया जाएगा मानो विवाद, वाद था और रजिस्ट्रार, सिविल न्यायालय था ।
(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, रजिस्ट्रार उसमें विनिर्दिष्ट परिसीमा की कालावधि की समाप्ति के पश्चात् कोई विवाद ग्रहण कर सकेगा, यदि आवेदक रजिस्ट्रार का समाधान कर देता है कि ऐसी अवधि के भीतर विवाद निर्देशित न करने के लिए उसके पास पर्याप्त कारण था ।
66. विवादों का निपटारा-(1) यदि रजिस्ट्रार का यह समाधान हो जाता है कि उसे निर्देशित किया गया या उसकी जानकारी में लाया गया कोई मामला धारा 64 के अर्थान्तर्गत विवाद है तो रजिस्ट्रार ऐसे नियमों के अधीन रहते हुए, जो विहित किए जाएं, विवाद का स्वयं निपटारा करेगा या उसे निपटारे के लिए अपने द्वारा नियुक्त व्यक्ति को (जिसे इस अध्याय में इसके पश्चात् नामनिर्देशिती कहा गया है) निर्देशित करेगा ।
(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई विवाद निपटारे के लिए नामनिर्देशिती को निर्दिष्ट किया गया है वहां रजिस्ट्रार किसी भी समय, ऐसे विवाद को ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, नामनिर्देशिती से वापस ले सकेगा और विवाद का स्वयं निपटारा कर सकेगा अथवा उसे निपटारे के लिए पुनः अपने द्वारा नियुक्त किसी अन्य नामनिर्देशिती को निर्दिष्ट कर सकेगा ।
67. विवादों के निपटारे के लिए प्रक्रिया और रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती की शक्तियां-(1) धारा 66 के अधीन विवाद की सुनवाई करने वाले रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती को, उस धारा के अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों के अतिरिक्त निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात् :-
(क) व्यक्तियों को समन करना और हाजिर कराना तथा शपथ पर उनकी परीक्षा करना ;
(ख) दस्तावेजों का प्रकटीकरण और निरीक्षण की अपेक्षा करना ;
(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य लेना ;
(घ) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या उसकी प्रतिलिपियों की अध्यपेक्षा करना ;
(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ;
(च) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।
(2) किसी विवाद की सुनवाई में किसी पक्षकार का विधि व्यवसायी द्वारा प्रतिनिधित्व रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती की अनुज्ञा से ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
(3) (क) यदि रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती का यह समाधान हो जाता है कि किसी व्यक्ति ने, चाहे वह अभिदाता हो या नहीं, ऐसे व्यक्ति की सम्पत्ति में कोई हित अर्जित कर लिया है, जो विवाद का एक पक्षकार है, तो वह आदेश दे सकेगा कि ऐसे व्यक्ति को जिसने सम्पत्ति में हित अर्जित कर लिया है, विवाद के पक्षकार के रूप में सम्मिलित किया जाए और कोई ऐसा विनिश्चय जो उस विवाद की बाबत रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती द्वारा दिया जाए, इस प्रकार सम्मिलित पक्षकार पर उसी रीति में आबद्धकर होगा मानो वह विवाद का मूल पक्षकार था ।
(ख) जहां कोई विवाद किसी गलत व्यक्ति के नाम में निर्दिष्ट किया गया है या जहां सभी आवश्यक पक्षकारों को सम्मिलित नहीं किया गया है वहां यदि रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती का यह समाधान हो जाता है कि यह वास्तविक गलती के कारण हुआ है तो वह किसी अन्य व्यक्ति को विवाद की सुनवाई के किसी भी प्रक्रम पर विवाद के पक्षकार के रूप में ऐसे निबन्धनों पर, जो वह न्यायसंगत समझे, प्रतिस्थापित किए जाने या जोड़े जाने के लिए आदेश दे सकेगा ।
(ग) रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर, या तो दोनों पक्षकारों में से किसी के आवेदन पर या उसके बिना और ऐसे निबन्धनों पर जो रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती को न्यायसंगत प्रतीत हों, आदेश दे सकेगा कि किसी ऐसे पक्षकार का नाम काट दिया जाए जिसे अनुचित रूप से सम्मिलित किया गया था ।
(घ) कोई व्यक्ति जो विवाद का पक्षकार है और एक ही वाद हेतुक के संबंध में एक से अधिक अनुतोषों का हकदार है, ऐसे अनुतोषों में से सभी या किसी का दावा कर सकेगा, किन्तु यदि वह ऐसे किसी अनुतोष के लिए दावा करने का लोप करता है तो वह उस अनुतोष के लिए कोई दावा, रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती की इजाजत से ही करने का हकदार होगा, अन्यथा नहीं ।
68. निर्णय के पूर्व कुर्की और अन्य अन्तर्वर्ती आदेश-(1) जहां कोई विवाद धारा 64 के अधीन निर्दिष्ट किया गया है और विवाद की सुनवाई करने वाले रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती का जांच करने पर या अन्यथा यह समाधान हो जाता है कि ऐसे विवाद का कोई पक्षकार किसी ऐसे अधिनिर्णय के निष्पादन या किसी ऐसे आदेश के पालन को, जो दिया जाए, विफल करने या उसमें बाधा डालने के आशय से,-
(क) अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग का व्ययन करने वाला है ; या
(ख) अपनी सम्पूर्ण सम्पत्ति या उसके किसी भाग को रजिस्ट्रार की अधिकारिता से हटाने वाला है,
तो वह, जब तक कि पर्याप्त प्रतिभूति न दे दी जाए, उक्त सम्पत्ति की सशर्त कुर्की का निदेश दे सकेगा और ऐसी कुर्की का वैसा ही प्रभाव होगा मानो वह किसी सक्षम सिविल न्यायालय द्वारा की गई हो ।
(2) जहां रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती उपधारा (1) के अधीन सम्पत्ति की कुर्की का निदेश देता है वहां वह उस व्यक्ति को, जिसकी सम्पत्ति इस प्रकार कुर्क की गई है, ऐसी प्रतिभूति जो वह पर्याप्त समझे, विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर देने की अपेक्षा करने वाली सूचना जारी करेगा और यदि वह व्यक्ति ऐसी प्रतिभूति देने में असफल रहता है तो रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती आदेश की पुष्टि कर सकेगा और विवाद के विनिश्चय के पश्चात् इस प्रकार कुर्क की गई सम्पत्ति का दावे मद्धे, यदि वह अधिनिर्णीत किया गया हो, व्ययन किए जाने के लिए निदेश दे सकेगा ।(3) इस धारा के अधीन की गई किसी कुर्की से ऐसे व्यक्तियों के, जो विवाद के पक्षकार नहीं हैं, ऐसे अधिकारों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा जो सम्पत्ति की कुर्की के पूर्व अस्तित्व में हों अथवा कोई ऐसा व्यक्ति जो उस व्यक्ति के विरुद्ध डिक्री धारण करता है, जिसकी सम्पत्ति इस प्रकार कुर्क की गई है, ऐसी डिक्री के अधीन कुर्क की गई सम्पत्ति के विक्रय के लिए आवेदन करने से वर्जित नहीं होगा ।
(4) रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती, न्याय के उद्देश्यों के विफल होने का निवारण करने की दृष्टि से, उपधारा (1) में निर्दिष्ट विवाद में अधिनिर्णय के लम्बित रहने तक ऐसे अन्तर्वर्ती आदेश कर सकेगा जो न्यायसंगत और सुविधापूर्ण प्रतीत हों ।
69. रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती का विनिश्चय-जब कोई विवाद इस अध्याय के अधीन माध्यस्थम् के लिए निर्देशित किया जाता है, तो रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती विवाद के पक्षकारों को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, विवाद के सम्बन्ध में और उन व्ययों के संबंध में, जो विवाद के पक्षकारों द्वारा कार्यवाहियों की बाबत किए गए हों, और रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती को संदेय फीसों तथा व्ययों के सम्बन्ध में अधिनिर्णय दे सकेगा और ऐसा अधिनिर्णय केवल इस आधार पर अविधिमान्य नहीं होगा कि वह रजिस्ट्रार द्वारा विवाद का विनिश्चय करने के लिए नियत अवधि के, यदि कोई हो, अवसान के पश्चात् किया गया था, और वह इस बात के अधीन रहते हुए कि धारा 70 के अधीन उसके विरुद्ध अपील की जा सकेगी अन्तिम और विवाद के पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ।
70. रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती के विनिश्चय के विरुद्ध अपील-रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती द्वारा पारित किसी आदेश से या धारा 69 के अधीन रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती के अधिनिर्णय से व्यथित कोई पक्षकार आदेश या अधिनिर्णय की तारीख से दो मास के भीतर, राज्य सरकार को अपील कर सकेगा ।
71. धन कैसे वसूल किया जाएगा-किसी धन के संदाय के लिए, धारा 68 या धारा 69 के अधीन रजिस्ट्रार या नामनिर्देशिती द्वारा पारित प्रत्येक आदेश और धारा 70 के अधीन राज्य सरकार द्वारा अपील में पारित प्रत्येक आदेश, यदि उसका पालन न किया गया हो तो,-
(क) रजिस्ट्रार द्वारा जारी किए गए प्रमाणपत्र पर, सिविल न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा और वैसी ही रीति से निष्पादित किया जाएगा जैसे कि वह ऐसे न्यायालय की डिक्री ; या
(ख) उस विधि के उपबन्धों के अनुसार निष्पादित किया जाएगा जो भू-राजस्व की बकाया के रूप में रकमों की वसूली के लिए उस समय प्रवृत्त हो :
परन्तु खण्ड (ख) के अधीन निष्पादन के लिए कोई आवेदन, आदेश में नियत तारीख से और यदि ऐसी तारीख नियत नहीं की गई है तो आदेश की तारीख से, तीन वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
72. प्रमाणपत्र के जारी किए जाने के पश्चात् किए गए सम्पत्ति के प्राइवेट अन्तरण का प्रधान के विरुद्ध शून्य होना-धारा 71 के अधीन रजिस्ट्रार द्वारा प्रमाणपत्र के जारी किए जाने के पश्चात् सम्पत्ति का कोई प्राइवेट अन्तरण या उसका परिदान या उस पर सृजित कोई विल्लंगम या भार उस प्रधान के विरुद्ध अकृत और शून्य होगा जिसके आवेदन पर उक्त प्रमाणपत्र जारी किया गया था ।
अध्याय 13
प्रकीर्ण
73. रिजर्व बैंक का सलाह सम्बन्धी कार्य-रिजर्व बैंक, स्वप्रेरणा से या किसी राज्य सरकार के अनुरोध पर, इस अधिनियम की बाबत नीति के प्रश्नों पर उस राज्य सरकार को ऐसी सलाह दे सकेगा जो वह ठीक समझे ।
74. अपीलें-(1) कोई प्रधान जो-
(क) धारा 7 के अधीन चिट करार को रजिस्ट्रीकृत करने से इन्कार करने वाले ;
(ख) धारा 9 की उपधारा (2) के अधीन प्रारम्भ का प्रमाणपत्र देने से इन्कार करने वाले ;
(ग) धारा 20 की उपधारा (1) के अधीन या धारा 31 के अधीन कोई प्रतिभूति स्वीकार करने से इन्कार करने वाले ; या
(घ) धारा 20 या धारा 31 के अधीन प्रभारित प्रतिभूति निर्मुक्त करने से इन्कार करने वाले
रजिस्ट्रार के विनिश्चय से व्यथित है, वह ऐसे विनिश्चय के उसे संसूचित किए जाने के तीस दिन के भीतर, राज्य सरकार को अथवा ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी को, जो राज्य सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस निमित्त सशक्त किया जाए, अपील कर सकेगा ।
(2) धारा 34 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रार के आदेश से व्यथित कोई प्रधान या कोई अन्य व्यक्ति, उसे ऐसे आदेश के संसूचित किए जाने के तीस दिन के भीतर, राज्य सरकार को अथवा ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी को, जो राज्य सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस निमित्त सशक्त किया जाए, अपील कर सकेगा ।
(3) राज्य सरकार अथवा पूर्वोक्त ऐसा अधिकारी या प्राधिकारी, अपीलार्थी को अपना अभ्यावेदन करने का अवसर देने के पश्चात् अपील पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे और ऐसा आदेश अन्तिम होगा ।
75. दस्तावेज फाइल करने के लिए समय बढ़ाने की रजिस्ट्रार की शक्तियां-रजिस्ट्रार, स्वविवेकानुसार और प्रधान द्वारा धारा 28 की उपधारा (3), धारा 29 की उपधारा (2), धारा 37 या धारा 41 के अधीन दस्तावेजों के फाइल किए जाने के लिए विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर किए गए लिखित आवेदन पर, प्रधान को ऐसे दस्तावेजों की प्रतिलिपियां फाइल करने के लिए और समय दे सकेगा जो पन्द्रह दिन से अधिक न हो ।
76. शास्तियां-(1) जो कोई धारा 4, 5, 8, 9, 11, 12, 13, 14, 19, 20, 22, 24, 30, 31, धारा 33 की उपधारा (4), धारा 46, 47, या धारा 61 की उपधारा (5) के उपबन्धों में से किसी उपबंध का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन का दुष्प्रेरण करेगा, वह दोषसिद्धि पर, कारावास से जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
(2) कोई प्रधान जो,-
(क) इस अधिनियम के अधीन फाइल की जाने के लिए अपेक्षित कोई दस्तावेज, उसके लिए विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर या ऐसे और समय के भीतर जो अनुज्ञात किया जाए, फाइल करने में असफल रहेगा ; या
(ख) उस तारीख, समय और स्थान के सम्बन्ध में, जिसको और जहां चिट का इनाम निकाला जाना है, चिट करार की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में असफल रहेगा या जो धारा 38 की उपधारा (3) के अधीन दिए गए किसी निदेश की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में असफल रहेगा ; या
(ग) इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य अपेक्षा का उल्लंघन करेगा या अनुपालन करने में असफल रहेगा,
दोषसिद्धि पर, ऐसे जुर्माने से, जो तीन हजार रुपए तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा ।
(3) जो कोई इस अधिनियम के अधीन फाइल की जाने के लिए अपेक्षित किसी दस्तावेज में जानबूझकर ऐसा मिथ्या कथन करेगा जो किसी तात्त्विक विशिष्टि में मिथ्या है, वह दोषसिद्धि पर, कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से जो पांच हजार रुपए तक हो सकेगा, या दोनों से, दण्डनीय होगा ।
77. द्वितीय और पश्चात्वर्ती दोषसिद्धियों के लिए शास्ति-यदि धारा 76 की उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन किसी अपराध के लिए सिद्धदोष व्यक्ति, उक्त उपधाराओं में से किसी उपधारा के अधीन किसी अपराध के लिए पुनःदोषसिद्ध किया जाता है तो वह द्वितीय और प्रत्येक पश्चात्वर्ती अपराध के लिए कारावास से, जो दो वर्ष तक का हो सकेगा, दण्डनीय होगा और जुर्माने से भी दण्डनीय होगा ।
78. जुर्माने का उपयोजन-इस अधिनियम के अधीन कोई जुर्माना अधिरोपित करने वाला न्यायालय निदेश दे सकेगा कि सम्पूर्ण जुर्माना या उसका कोई भाग कार्यवाहियों के खर्चों में या उनके के प्रति संदाय उपयोजित किया जाएगा ।
79. कम्पनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया हो वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति जो ऐसे अपराध के किए जाने के समय उस कम्पनी के कारबार के संचालन के लिए उस कम्पनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कम्पनी भी ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे तथा तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और दण्डित किए जाने के भागी होंगे :
परन्तु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को ऐसे दण्ड का भागी नहीं बनाएगी जो इस अधिनियम में उपबन्धित है, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कम्पनी के किसी निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबन्धक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा तथा अपने विरुद्ध कार्यवाही की जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-
(क) कम्पनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ; तथा
(ख) फर्म के सम्बन्ध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
80. अपराधों का संज्ञान-(1) धारा 11 के अधीन सभी अपराध संज्ञेय होंगे ।
(2) महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय से अवर कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दण्डनीय किसी अपराध का विचारण नहीं करेगा ।
81. अपराधों का शमन करने की शक्ति-(1) ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं, राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त सशक्त कोई अधिकारी, इस अधिनियम के अधीन दाण्डिक कार्यवाहियों के संस्थित किए जाने के पूर्व या पश्चात् ऐसे व्यक्ति से जिसने इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किया है या युक्तियुक्त रूप से यह संदिग्ध है कि उसने अपराध किया है, ऐसे अपराध के शमन के तौर पर ऐसी रकम से, जो विहित की जाए, अनधिक धनराशि प्रतिगृहीत कर सकेगा ।
(2) जब किसी अपराध का शमन उपधारा (1) के अधीन किया गया है तब यदि अपराधी अभिरक्षा में है तो वह उन्मोचित कर दिया जाएगा और ऐसे अपराध के सम्बन्ध में कोई और कार्यवाही उसके विरुद्ध नहीं की जाएगी ।
82. किसी स्थान में प्रवेश करने और तलाशी लेने और किन्हीं दस्तावेजों का अभिग्रहण करने की शक्ति-(1) यदि रजिस्ट्रार या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के पास यह संदेह करने का कारण है कि कोई व्यक्ति इस अधिनियम के उपबंधों के उल्लंघन में किसी स्थान पर चिट का संचालन करता है या चिट के संचालन के लिए उत्तरदायी है तो वह ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएंगे, किसी भी युक्तियुक्त समय पर किसी स्थान में प्रवेश कर सकेगा और उसकीतलाशी ले सकेगा और ऐसी बहियों, रजिस्टरों, लेखाओं या दस्तावेजों का अभिग्रहण कर सकेगा, जो आवश्यक हो ।
(2) रजिस्ट्रार या उसके द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत अधिकारी, पुलिस थाने के भारसाधक अधिकारी को सहायता के लिए आवेदन कर सकेगा और उपधारा (1) के अधीन अपने कर्तव्यों के निर्वहन में पुलिस अधिकारियों को अपने साथ चलने और सहायता करने के लिए ले जा सकेगा ।
(3) उपधारा (1) के अधीन सभी तलाशियां दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबन्धों के अनुसार की जाएंगी ।
83. अधिकारियों का लोक सेवक होना-रजिस्ट्रार और इस अधिनियम के अधीन किन्हीं कृत्यों का पालन करने के लिए राज्य सरकार द्वारा नियुक्त सभी अधिकारी, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
84. प्रत्यायोजन की शक्ति-राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किसी शक्ति (अपील सुनने या नियम बनाने की शक्ति से भिन्न) का राज्य सरकार के किसी ऐसे अधिकारी द्वारा भी, ऐसे निबंधनों और शर्तों के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो उसमें विनिर्दिष्ट की जाएं, प्रयोग किया जा सकेगा ।
85. अधिनियम का कुछ चिटों को लागू न होना-इस अधिनियम की कोई भी बात,-
(क) इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व आरम्भ की गई किसी चिट के सम्बन्ध में ; या
(ख) किसी ऐसी चिट के सम्बन्ध में जिसकी रकम, या जहां दो या अधिक चिटें एक ही प्रधान द्वारा एक साथ प्रारंभ की गई या संचालित की गई हैं वहां उनकी कुल रकम एक सौ रुपए से अधिक नहीं है,लागू न होगी ।
86. बैंकों द्वारा चिट कारबार का संचालन न किया जाना-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, कोई भी बैंक इस अधिनियम के प्रारम्भ के पश्चात् कोई चिट कारबार प्रारंभ या संचालित नहीं करेगा ।
(2) जहां किसी बैंक द्वारा कोई चिट ऐसे प्रारंभ के पूर्व प्रारंभ की गई थी वहां ऐसी चिट ऐसे प्रारंभ के पश्चात् तब तक जब तक वह पूरी न हो जाए जारी रखी जा सकेगी, और चिट करार के उपबंध और ऐसी विधियां, यदि कोई हों, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के ठीक पूर्व उसे लागू थीं, ऐसी चिट को लागू होंगी ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजन के लिए बैंक" से कोई अनुमोदित बैंक या भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) की धारा 2 के खण्ड (खत्त्) में यथा परिभाषित सहकारी बैंक अभिप्रेत है ।
87. छूट देने की शक्ति-राज्य सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करके, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी व्यक्ति या किसी वर्ग के व्यक्तियों को या किसी चिट या किसी वर्ग की चिटों को, इस अधिनियम के सभी या किन्हीं उपबन्धों से छूट दे सकेगी ।
88. इस अधिनियम के अधीन की गई कार्यवाही का संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात की बाबत कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही, राज्य सरकार, रजिस्ट्रार अथवा राज्य सरकार या रिजर्व बैंक के अन्य अधिकारियों अथवा इस अधिनियम के अधीन किन्हीं शक्तियों का प्रयोग या किन्हीं कृत्यों का निर्वहन करने वाले उसके किसी अधिकारी के विरुद्ध न होगी ।
89. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करके, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियमों में निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों का उपबन्ध किया जा सकेगा, अर्थात् :-
(क) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन पूर्व मंजूरी अभिप्राप्त करने के लिए आवेदन किया जा सकेगा ;
(ख) वे अतिरिक्त विशिष्टियां जो धारा 6 की उपधारा (1) के खण्ड (थ) के अधीन चिट करार में अन्तर्विष्ट हो सकेंगी ;
(ग) वे विशिष्टियां जो धारा 17 के अधीन इनाम निकालने की कार्यवाहियों के कार्यवृत्त में सम्मिलित की जा सकेंगी ;
(घ) धारा 20 के अधीन प्रतिभूति देने के प्रयोजन के लिए अनाज चिट में रजिस्ट्रार द्वारा मूल्यांकन की रीति ;
(ङ) धारा 20 के अधीन प्रधान द्वारा दी गई प्रतिभूति की निर्मुक्ति के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ;
(च) वे रजिस्टर और बहियां और वह प्ररूप जिसमें ऐसे रजिस्टर और बहियां धारा 23 के अधीन प्रधान द्वारा रखी जा सकेंगी ;
(छ) वह समय जिसके भीतर चिट कारबार सम्बन्धी तुलनपत्र या लाभ और हानि लेखा धारा 24 के अधीन फाइल किया जाएगा ;
(ज) वह दर जिस पर धारा 28 के अधीन किसी व्यतिक्रमी अभिदाता द्वारा न दी गई किस्तों पर ब्याज संदेय होगा ;
(झ) वे विशिष्टियां जो धारा 49 के अधीन चिटों के परिसमापन के लिए आवेदन में सम्मिलित की जा सकेंगी ;
(ञ) अध्याय 10 के अधीन चिटों के परिसमापन के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ;
(ट) धारा 63 के अधीन संदेय फीसें ;
(ठ) चिट कारबार के तुलनपत्रों और लाभ और हानि लेखाओं की लेखा परीक्षा और लेखापरीक्षा प्रमाणपत्रों का जारी किया जाना ;
(ड) वह प्ररूप और रीति जिसमें कोई विवाद धारा 64 के अधीन रजिस्ट्रार को निर्दिष्ट किया जाएगा ;
(ढ) धारा 64 के अधीन रजिस्ट्रार या उसके नामनिर्देशिती को निर्दिष्ट विवादों के निपटारे के लिए उसके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया ;
(ण) धारा 67 की उपधारा (1) के खण्ड (च) में निर्दिष्ट विषय ;
(त) वे शर्तें जिनके अधीन और वह रकम जिसके संदाय पर धारा 81 के अधीन अपराधों का शमन किया जा सकेगा ;
(थ) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे इस अधिनियम के अधीन अपील की जा सकेगी और ऐसी अपील के लिए संदेय फीसें ;
(द) इस अधिनियम के अधीन सूचनाओं या अन्य आदेशिकाओं का जारी और तामील किया जाना ;
(ध) इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी धनराशि को प्राप्त करने की प्रक्रिया और उसकी रीति ;
(न) कोई अन्य ऐसा विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।
(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र दो सदन वाले राज्य विधान-मण्डल की दशा में, प्रत्येक सदन के समक्ष या एक सदन वाले विधान-मण्डल की दशा में, उस सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
90. निरसन और व्यावृत्ति-(1) आन्ध्र प्रदेश चिट फण्ड्स ऐक्ट, 1971 (1971 का आन्ध्र प्रदेश ऐक्ट 9), केरल चिट्टीज ऐक्ट, 1975 (1975 का केरल ऐक्ट 23), महाराष्ट्र चिट फण्ड्स ऐक्ट, 1974 (1974 का महाराष्ट्र ऐक्ट 55), तमिलनाडु चिट फण्ड्स ऐक्ट, 1961 (1961 का तमिलनाडु ऐक्ट 24) जैसा कि वह तमिलनाडु राज्य में और चण्डीगढ़ और दिल्ली संघ राज्यक्षेत्रों में प्रवृत्त है, उत्तर प्रदेश चिट फण्ड्स ऐक्ट, 1975 (1975 का उत्तर प्रदेश ऐक्ट 53), गोवा, दमण एंड दीव चिट फण्ड्स ऐक्ट, 1973 (1973 का गोवा, दमण और दीव ऐक्ट 16) और पांडिचेरी चिट फण्ड्स ऐक्ट, 1966 (1966 का पांडिचेरी ऐक्ट 18) इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं और साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धारा 6 के उपबंध ऐसे निरसन को उसी प्रकार लागू होंगे मानो इस प्रकार निरसित ऐसा प्रत्येक अधिनियम केन्द्रीय अधिनियम था ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उपधारा (1) में वर्णित अधिनियम, इस अधिनियम के प्रारंभ पर प्रवृत्त चिटों को उसी रीति से लागू बने रहेंगे जैसे वे ऐसी चिटों को ऐसे प्रारम्भ से पहले लागू थे ।
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