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भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 ( Airports Economic Regulatory Authority of India Act, 2008 )


 

भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008

(2008 का अधिनियम संख्यांक 27)

[5 दिसम्बर, 2008]

विमानपत्तनों पर दी जाने वाली वैमानिक सेवाओं के लिए टैरिफ और अन्य प्रभारों को

 विनियमित करने और विमानपत्तनों के कार्यपालन मानकों को मानीटर करने के लिए

विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण की स्थापना करने और विवादों का

न्यायनिर्णयन और अपीलों का निपटान करने के लिए अपील

 अधिकरण की भी स्थापना करने तथा उनसे संबंधित या

 उनके आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

 अधिनियम

भारत गणराज्य के उनसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, प्रारंभ और लागू होना-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

(3) यह-

() संघ के सशस्त्र बलों या परासैनिक बलों के या उनके नियंत्रण के अध्यधीन विमानपत्तनों और हवाई मैदानों से भिन्न सभी विमानपत्तनों, जिन पर वायु परिवहन सेवाएं प्रचालित की जाती हैं या प्रचालित की जाने के लिए आशयित हैं;

(ख) सभी प्राइवेट विमानपत्तनों और पट्टाधृत विमानपत्तनों;

(ग) सभी सिविल अंतःक्षेत्रों;

(घ) सभी मुख्य विमानपत्तनों, को लागू होता है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो-

(क) वैमानिक सेवा" से निम्नलिखित के लिए उपलब्ध कराई गई सेवा अभिप्रेत है,-

(i)             वायु यातायात प्रबंध के लिए विमान संचालन निगरानी और सहायक संचार;

(ii)            विमान के उतरने, ठहरने या पार्क करने अथवा किसी विमानपत्तन पर विमान प्रचालनों के संबंध में

                प्रस्थापित कोई अन्य जमीनी सुविधा; 

(iii)          विमानपत्तन पर जमीनी सुरक्षा सेवा;

(iv)  विमानपत्तन पर विमान यात्रियों एवं स्थोरा से संबंधित ग्राउंड हैंडलिंग सेवाएं;

(v)   विमानपत्तन पर स्थोरा सुविधा;

(vi)  विमानपत्तन पर विमान के लिए ईंधन की आपूर्ति; और

(vii) विमानपत्तन पर स्टेक होल्डर के लिए है, जिसके लिए प्रभार, लेखबद्ध किए गए कारणों से केन्द्रीय

सरकार की राय में प्राधिकरण द्वारा विनिश्चय किया जा सकेगा;

(ख) विमानपत्तन" से विमानों के उतरने और उड़ान भरने का क्षेत्र अभिप्रेत है, जिस पर प्रायः रनवे और वायुयान अनुरक्षण तथा यात्री सुविधाएं होती हैं और इसके अंतर्गत वायुयान अधिनियम, 1934 (1934 का 22) की धारा 2 के खंड (2) में यथापरिभाषित विमान क्षेत्र भी है;

(ग) विमानपत्तन उपयोक्ता" से किसी विमानपत्तन पर यात्री या स्थोरा सुविधाओं का उपभोग करने वाला कोई व्यक्ति अभिप्रेत है;

() अपील अधिकरण" से धारा 17 के अधीन स्थापित विमानपत्तन आर्थिक विनियामक अपील अधिकरण अभिप्रेत है;

() प्राधिकरण" से धारा 3 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अभिप्रेत है;

(च) सिविल अंतःक्षेत्र" से ऐसा क्षेत्र, यदि कोई हो, अभिप्रेत है जो ऐसे विमानपत्तन से किन्हीं वायु परिवहन सेवाओं का उपयोग करने वाले व्यक्तियों द्वारा उपयोग के लिए या ऐसी सेवा द्वारा यात्री सामान अथवा स्थोरा की उठाई-धराई के लिए संघ के किसी सशस्त्र बल के किसी विमानपत्तन में आबंटित किया गया है और इसके अंतर्गत ऐसे क्षेत्र पर किसी भवन और संरचना की भूमि भी है;

(छ) अध्यक्ष" से धारा 4 की उपधारा (2) के अधीन नियुक्त प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है;

(ज) पट्टे पर विमानपत्तन" से ऐसा विमानपत्तन अभिप्रेत है, जिसकी बाबत भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 1994 (1994 का 55) की धारा 12क के अधीन पट्टा दिया गया है;

(झ) महा विमानपत्तन" से ऐसा विमानपत्तन, जिसकी क्षमता वार्षिक 15 लाख से अधिक यात्रियों की है या उतने के लिए अभिहित किया गया है या कोई ऐसा अन्य विमानपत्तन अभिप्रेत है, जिसे केन्द्रीय सरकार उस रूप में, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे;

(ञ) सदस्य" से प्राधिकरण का सदस्य अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अध्यक्ष भी है;

(ट) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ठ) प्राइवेट विमानपत्तन" का वही अर्थ है जो भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 1994 (1994 का 55) की धारा 2 के खंड (ढढ) में है;

(ड) विनियम" से इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं;

(ढ) सेवा प्रदाता" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है, जो वैमानिक सेवाएं प्रदान करता है और किसी विमानपत्तन पर आरोहण करने वाले यात्रियों से उपयोक्ता विकास फीस उद्गृहीत और प्रभारित करने के लिए पात्र है तथा जिसके अंतर्गत वह प्राधिकरण भी है, जो विमानपत्तन का प्रबंध करता है;

(ण) पणधारी" के अंतर्गत किसी विमानपत्तन का अनुज्ञप्तिधारी, वहां प्रचालनरत एयरलाइन, ऐसा व्यक्ति जो वैमानिकी सेवाएं प्रदान करता है, और व्यष्टियों का कोई संगम जो, प्राधिकरण की राय में, यात्री या स्थोरा सुविधा उपयोक्ताओं का प्रतिनिधित्व करता है, भी है;

(त) उन शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 1994 (1994 का 55) में परिभाषित हैं; वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं ।

अध्याय 2

विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण

3. प्राधिकरण की स्थापना-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से तीन मास के भीतर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण के नाम से ज्ञात, इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन उसको प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग करने और सौंपे गए कृत्यों का निर्वहन करने के लिए, एक प्राधिकरण की स्थापना करेगी ।

(2) प्राधिकरण, पूर्वोक्त नाम का, शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला, एक निगमित निकाय होगा जिसे जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण और व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद ला सकेगा या उस पद वाद लाया जा सकेगा ।

(3) प्राधिकरण का मुख्य कार्यालय ऐसे स्थान पर होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे

4. प्राधिकरण की संरचना-(1) प्राधिकरण, अध्यक्ष और दो ऐसे अन्य सदस्यों से मिलकर बनेगा, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगेः

परंतु जब भी प्राधिकरण किसी रक्षा वायुक्षेत्र में सिविल अंतःक्षेत्र से संबंधित विषय का विनिश्चय कर रहा हो तो उसमें रक्षा मंत्रालय द्वारा नामनिर्देशित किया जाने वाला भारत सरकार के अपर सचिव से अन्यून की पंक्ति का एक अतिरिक्त सदस्य होगा ।

(2) प्राधिकरण का अध्यक्ष और सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा विमानन, अर्थशास्त्र, विधि, वाणिज्य या उपभोक्ता मामलों में पर्याप्त ज्ञान और वृत्तिक अनुभव रखने वाले योग्य और सत्यनिष्ठा वाले व्यक्तियों में से नियुक्त किए जाएंगेः

परंतु कोई व्यक्ति जो सरकार की सेवा में है या रहा है, सदस्य के रूप में तभी नियुक्त किया जाएगा जब ऐसे व्यक्ति ने भारत सरकार के सचिव या अपर सचिव का पद या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार में कोई समतुल्य पद तीन वर्ष से अन्यून की कुल अवधि के लिए धारण किया हो ।

(3) अध्यक्ष और अन्य सदस्य पूर्णकालिक सदस्य होंगे ।

(4) अध्यक्ष या अन्य सदस्य, कोई अन्य पद धारण नहीं करेंगे ।

(5) अध्यक्ष, प्राधिकरण का मुख्य कार्यपालक होगा ।

(6) प्राधिकरण का अध्यक्ष और अन्य सदस्य, केन्द्रीय सरकार द्वारा, धारा 5 में निर्दिष्ट चयन समिति की सिफारिश पर नियुक्त किए जाएंगे ।

5. सदस्यों की सिफारिश करने के लिए चयन समिति का गठन-(1) केन्द्रीय सरकार, धारा 4 की उपधारा (6) के प्रयोजन के लिए, एक चयन समिति का गठन करेगी जो निम्नलिखित से मिलकर बनेगी, अर्थात्ः-

(क) मंत्रिमंडल सचिव                                                                                                                         अध्यक्ष;

(ख) सचिव, सिविल विमानन मंत्रालय                                                                                           सदस्य;

(ग) सचिव, विधि कार्य विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय                                                          सदस्य;

(घ) सचिव, रक्षा मंत्रालय                                                                                                                   सदस्य;

(ङ) सिविल विमानन मंत्रालय द्वारा नामनिर्देशित एक विशेषज्ञ                                              सदस्य ।

(2) केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष या किसी सदस्य की मृत्यु, पद त्याग या हटाए जाने के कारण किसी रिक्ति के होने की तारीख से

एक मास के भीतर और अध्यक्ष या किसी सदस्य की अधिवर्षिता से या पदावधि के अंत से छह मास पूर्व, रिक्ति को भरने के लिए चयन समिति को निर्देश करेगी ।

(3) चयन समिति, उस तारीख से जिसको उसे निर्देश किया जाता है, एक मास के भीतर अध्यक्ष और सदस्यों के चयन को अंतिम रूप देगी ।

(4) चयन समिति, उसको निर्दिष्ट प्रत्येक रिक्ति के लिए, दो नामों के पैनल की सिफारिश करेगी ।

(5) चयन समिति, प्राधिकरण के अध्यक्ष या अन्य सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए किसी व्यक्ति की सिफारिश करने से पूर्व, अपना यह समाधान करेगी कि ऐसे व्यक्ति का कोई वित्तीय या अन्य हित नहीं है जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ।

(6) अध्यक्ष या अन्य सदस्य की कोई नियुक्ति केवल इस कारण से अविधिमान्य नहीं होगी कि चयन समिति में कोई रिक्ति है

6. अध्यक्ष और सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें, आदि-(1) अध्यक्ष और अन्य सदस्य उस रूप में अपने पद ग्रहण करने की तारीख से, पांच वर्ष की अवधि तक पद धारण करेगा किंतु पुनर्नियुक्ति का पात्र नहीं होगाः

परंतु कोई अध्यक्ष या अन्य सदस्य उस रूप में अपना पद, -

(क) अध्यक्ष की दशा में पैंसठ वर्ष; और

(ख) किसी अन्य सदस्य की दशा में बासठ वर्ष,

की आयु प्राप्त करने के पश्चात् धारण नहीं करेगा ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, किसी सदस्य को प्राधिकरण के अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया जा सकेगा किन्तु कोई व्यक्ति जो अध्यक्ष रह चुका है, सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए पात्र नहीं होगा ।

(2) अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।

(3) अध्यक्ष और अन्य सदस्यों के वेतन, भत्तों और उनकी सेवा की अन्य शर्तों में उनकी नियुक्ति के पश्चात् उनके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

(4) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अध्यक्ष या कोई सदस्य, -

(क) केन्द्रीय सरकार को कम से कम तीन मास की लिखित सूचना देकर अपना पद त्याग सकेगा; या

(ख) धारा 8 के उपबंधों के अनुसार उसके पद से हटाया जा सकेगा ।

(5) अध्यक्ष या किसी सदस्य के इस प्रकार पद पर न रह जाने पर, -

(क) केन्द्रीय सरकार या किसी राज्य सरकार के अधीन अपने पद पर न रह जाने की तारीख से दो वर्ष की अवधि के लिए किसी और नियोजन के लिए पात्र नहीं होगा;

(ख) उस तारीख से, जिसको वह ऐसे पद पर नहीं रह जाता है दो वर्ष की अवधि तक कोई वाणिज्ियक नियोजन जिसके अंतर्गत प्राइवेट नियोजन भी है, स्वीकार नहीं करेगा; या

(ग) किसी अन्य रीति में प्राधिकरण के समक्ष किसी व्यक्ति का प्रतिनिधित्व नहीं करेगा ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के अधीन नियोजन" के अंतर्गत भारत के राज्यक्षेत्र के भीतर किसी स्थानीय या अन्य प्राधिकारी के अधीन या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार के नियंत्रणाधीन या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगम या सोसाइटी के अधीन नियोजन भी है;

(ख) वाणिज्यिक नियोजन" से किसी भी क्षेत्र में व्यापारिक, वाणिज्यिक, औद्योगिक या वित्तीय कारबार में लगे हुए किसी व्यक्ति के अधीन किसी भी हैसियत में या उसके अभिकरण में नियोजन अभिप्रेत है, और इसके अंतर्गत किसी कंपनी का निदेशक या फर्म का भागीदार भी है तथा इसके अंतर्गत स्वतंत्र रूप से या किसी फर्म के भागीदार के रूप में या सलाहकार या परामर्शी के रूप में व्यवसाय स्थापित करना भी है ।

7. अध्यक्ष की शक्ति-अध्यक्ष को प्राधिकरण के कार्यकलापों के संचालन में साधारण अधीक्षण और निदेश देने की शक्ति होगी और वह प्राधिकरण के अधिवेशनों की अध्यक्षता करने के अतिरिक्त, प्राधिकरण की ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करेगा और ऐसी अन्य शक्तियों और कृत्यों का निर्वहन करेगा जो विहित किए जाएं ।

8. सदस्यों का हटाया जाना और निलंबन-(1) केन्द्रीय सरकार, अध्यक्ष या अन्य सदस्य को पद से आदेश द्वारा हटा सकेगी, यदि, यथास्थिति, अध्यक्ष या ऐसा अन्य सदस्य, -

(क) दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या

(ख) किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या

(ग) शारीरिक या मानसिक रूप से सदस्य के रूप में कार्य करने में असमर्थ हो गया है; या

(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है जिससे सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

() जिसने अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है जिससे उसके पद पर बने रहने से लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है; या

(च) अपनी पदावधि के दौरान किसी भी समय किसी अन्य नियोजन में लगा रहा है ।

(2) अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य को, उसके पद से, केन्द्रीय सरकार के ऐसे आदेश के सिवाय, जब उसके साबित कदाचार या असमर्थता के आधार पर केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त विहित प्रक्रिया के अनुसार की गई किसी जांच के पश्चात् केन्द्रीय सरकार इस निष्कर्ष पर पहुंचती है कि सदस्य को किसी ऐसे आधार पर हटाया जाना चाहिए, नहीं हटाया जाएगा ।

(3) केन्द्रीय सरकार, ऐसे किसी सदस्य को, जिसके संबंध में उपधारा (2) के अधीन कोई जांच आरंभ की जा रही हो या लंबित हो तब तक निलंबित कर सकेगी जब तक केन्द्रीय सरकार ने जांच की रिपोर्ट की प्राप्ति पर कोई आदेश पारित न किया हो ।

9. प्राधिकरण के सचिव, विशेषज्ञों, वृत्तिकों और अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, एक सचिव को इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों के निर्वहन के लिए नियुक्त कर सकेगी ।

(2) प्राधिकरण, ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को नियुक्त कर सकेगा जो वह इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझे ।

(3) प्राधिकरण के सचिव और अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें और ऐसे अधिकारियों तथा अन्य कर्मचारियों की संख्या ऐसी होगी, जो विहित की जाए ।

(4) प्राधिकरण, विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट प्रक्रिया के अनुसार उतनी संख्या में सत्यनिष्ठा और उत्कृष्ट योग्यता वाले ऐसे विशेषज्ञों और वृत्तिकों को, जिनके पास अर्थशास्त्र, विधि कारबार या विमानन से संबंधित ऐसी अन्य विद्या शाखाओं में विशेष ज्ञान और अनुभव है जो इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण की उसके कृत्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए आवश्यक समझे जाएं, नियुक्त कर सकेगा ।

10. अधिवेशन-(1) प्राधिकरण ऐसे स्थानों और समय पर अधिवेशन करेगा और अपने अधिवेशनों में कारबार के संव्यवहार के संबंध में (जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है) प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।

(2) अध्यक्ष, प्राधिकरण के अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा और यदि अध्यक्ष किसी कारण से प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा अपने में से चुना गया कोई अन्य सदस्य उस अधिवेशन की अध्यक्षता करेगा ।

(3) प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में उसके समक्ष आने वाले सभी प्रश्नों का विनिश्चय उपस्थित और मत देने वाले सदस्यों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और मतों के बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष को अथवा पीठासीन सदस्य को दूसरे या निर्णायक मत का प्रयोग करने का अधिकार होगा ।

(4) उपधारा (1) में जैसा अन्यथा उपबंधित है उसके सिवाय प्रत्येक सदस्य का एक मत होगा ।

11. अधिप्रमाणन-प्राधिकरण के सभी आदेश और विनिश्चय प्राधिकरण के सचिव या इस निमित्त प्राधिकरण द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे ।

12. रिक्तियों, आदि से प्राधिकरण की कार्यवाहियों का अविधिमान्य होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाहियां केवल इस कारण से अविधिमान्य नहीं होंगी कि-

(क) प्राधिकरण में कोई रिक्ित है या उसके गठन में कोई त्रुटि है; या

(ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है; या

(ग) प्राधिकरण की प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण पर प्रभाव नहीं डालती है ।

अध्याय 3

प्राधिकरण की शक्तियां और कृत्य

13. प्राधिकरण के कृत्य-(1) प्राधिकरण, महा विमानपत्तनों के संबंध में निम्नलिखित कृत्यों का निर्वहन करेगा, अर्थात्ः-

(क) निम्नलिखित को ध्यान में रखते हुए वैमानिक सेवाओं के लिए टैरिफ अवधारित करना, -

(i) विमानपत्तन सुविधाओं के सुधार के लिए उपगत पूंजी व्यय और समय से किया गया विनिधान;

(ii) प्रदान की गई सेवा, उसकी क्वालिटी और अन्य सुसंगत बातें;

(iii) दक्षता में सुधार लाने के लिए लागत;

(iv) महा विमानपत्तन का मितव्ययी और व्यवहार्य प्रचालन;

(v) वैमानिकी सेवाओं से भिन्न सेवाओं से प्राप्त राजस्व;

(vi) किसी करार या समझौता ज्ञापन में या अन्यथा केन्द्रीय सरकार द्वारा प्रस्थापित रियायत;

(vii) कोई अन्य बात जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए सुसंगत होः

परन्तु उपखंड (i) से उपखंड (vii) में विनिर्दिष्ट उपरोक्त सभी या किसी बात को ध्यान में रखते हुए, भिन्न-भिन्न विमानपत्तनों के लिए भिन्न-भिन्न टैरिफ संरचनाएं नियत की जा सकेंगी;

(ख) महा विमानपत्तनों के संबंध में विकास फीस की रकम अवधारित करना;

(ग) वायुयान अधिनियम, 1934 (1934 का 22) के अधीन बनाए गए वायुयान नियम, 1937 के नियम 88 के अधीन उद्गृहीत यात्री सेवा फीस की रकम अवधारित करना;

(घ) सेवा की क्वालिटी, निरंतरता और विश्वसनीयता से संबंधित ऐसे उपवर्णित कार्यपालन मानकों को जो केन्द्रीय सरकार या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी प्राधिकारी द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं, मानीटर करना;

(ङ) ऐसी सूचना मांगना जो खंड (क) के अधीन टैरिफ के अवधारण के लिए आवश्यक हो;

(च) टैरिफ से संबंधित ऐसे अन्य कृत्यों का निर्वहन करना जो उसे केन्द्रीय सरकार द्वारा सौंपे जाएं या जो इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हों ।

(2) प्राधिकरण, पांच वर्ष में एक बार टैरिफ का अवधारण करेगा और यदि ऐसा करना समुचित और लोकहित में समझा जाए

तो इस प्रकार अवधारित टैरिफ का उक्त पांच वर्ष की अवधि के दौरान, समय-समय पर, संशोधन कर सकेगा ।

(3) प्राधिकरण, उपधारा (1) के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करते समय भारत की प्रभुता और अखंडता के हित राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता के विरुद्ध कार्य नहीं करेगा

(4) प्राधिकरण, अन्य बातों के साथ, अपनी शक्तियों का प्रयोग और अपने कृत्यों का निर्वहन करते समय-

(क) विमानपत्तन के सभी पणधारियों से सम्यक् परामर्श करके;

(ख) सभी पणधारियों को अपने निवेदन प्राधिकरण को करने के लिए अनुज्ञात करके;

(ग) प्राधिकरण के सभी विनिश्चयों का पूर्ण रूप से दस्तावेजीकरण और स्पष्ट करके,

पारदर्शिता सुनिश्चित करेगा ।

14. जानकारी मांगने, अन्वेषण करने आदि की प्राधिकरण की शक्तियां-(1) जहां प्राधिकरण ऐसा करना समीचीन समझता है, वहां वह लिखित आदेश द्वारा, -

(क) किसी सेवा प्रदाता से किसी भी समय लिखित में उसके कृत्यों से संबंधित ऐसी जानकारी या स्पष्टीकरण मांग सकेगा जिनकी प्राधिकरण, सेवा प्रदाता के संपादन का निर्धारण करने के लिए अपेक्षा करे; या

(ख) किसी सेवा प्रदाता के कार्यकलाप से संबंधित कोई जांच करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा; और

(ग) किसी सेवा प्रदाता की लेखा बहियों या अन्य दस्तावेजों का निरीक्षण करने के लिए अपने अधिकारियों या कर्मचारियों में से किसी को निदेश दे सकेगा ।

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन किसी सेवा प्रदाता के कार्यकलाप के संबंध में कोई जांच की गई है, वहां-

(क) यदि ऐसा सेवा प्रदाता सरकार का कोई विभाग है तो सरकारी विभाग का प्रत्येक कार्यालय;

(ख) यदि ऐसा सेवा प्रदाता कोई कंपनी है तो प्रत्येक निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी; या

(ग) यदि ऐसा सेवा प्रदाता कोई फर्म है तो प्रत्येक भागीदार, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी; या

(घ) ऐसा प्रत्येक अन्य व्यक्ति या व्यक्तियों का निकाय, जिसका खंड (ख) या खंड (ग) में उल्लिखित व्यक्तियों में से किसी के साथ कारबार के अनुक्रम में संबंध रहा था,

जांच करने वाले प्राधिकरण के समक्ष अपनी अभिरक्षा या नियंत्रण में की ऐसी सभी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेज जो, ऐसी जांच की विषय-वस्तु से संबंधित है, पेश करने के लिए और प्राधिकरण को, यथास्थिति, उससे संबंधित ऐसा विवरण या जानकारी भी, जिसकी उससे अपेक्षा की जाए, ऐसे समय के भीतर जो विनिर्दिष्ट किया जाए, प्राधिकरण को प्रस्तुत करने के लिए आबद्ध होगा ।

(3) प्रत्येक सेवा प्रदाता ऐसी लेखा बहियां या अन्य दस्तावेज रखेगा जो विहित किए जाएं ।

(4) प्राधिकरण को, सेवा प्रदाताओं के कार्य को मानीटर करने के लिए ऐसे निदेश जारी करने की शक्ति होगी जो वह सेवा प्रदाताओं द्वारा समुचित कार्यकरण के लिए आवश्यक समझे ।

15. कतिपय निदेश देने की प्राधिकरण की शक्ति-प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के प्रयोजन के लिए, सेवा प्रदाताओं को समय-समय पर, ऐसे निदेश दे सकेगा, जो वह आवश्यक समझे ।

16. अभिग्रहण की शक्ति-प्राधिकरण या उसके द्वारा इस निमित्त विशेष रूप से प्राधिकृत कोई अन्य अधिकारी, किसी ऐसे भवन या स्थान में प्रवेश कर सकेगा जहां प्राधिकरण के पास यह विश्वास करने का कारण है कि जांच की विषयवस्तु से संबंधित कोई दस्तावेज मिल सकेगा और किसी ऐसे दस्तावेज को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 100 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जहां तक वे लागू हों, अभिगृहीत कर सकेगा या उसके उद्धरण या उसकी प्रतियां ले सकेगा ।

अध्याय 4

अपील अधिकरण

17. अपील अधिकरण की स्थापना-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विमानपत्तन आर्थिक विनियामक अपील अधिकरण के नाम से ज्ञात एक अपील अधिकरण की स्थापना करेगी जो-

(क) (i) दो या अधिक सेवा प्रदाताओं के बीच;

(ii) सेवा प्रदाता और उपभोक्ताओं के समूह के बीच, किसी विवाद का न्यायनिर्णयन करेगाः

परन्तु यदि अपील अधिकरण उचित समझे तो ऐसे विवाद से संबंधित किसी विषय पर प्राधिकरण की राय अभिप्राप्त कर सकेगाः

परन्तु यह और कि इस खंड की कोई बात निम्नलिखित से संबंधित विषयों की बाबत लागू नहीं होगी-

(i) एकाधिकार व्यापारिक व्यवहार, अवरोधक व्यापारिक व्यवहार और अनुचित व्यापारिक व्यवहार जो एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार अधिनियम, 1969 (1969 का 54) की धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन स्थापित एकाधिकार तथा अवरोधक व्यापारिक व्यवहार आयोग की अधिकारिता के अध्यधीन है;

(ii) उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 (1986 का 68) की धारा 9 के अधीन स्थापित उपभोक्ता विवाद प्रतितोष पीठ या उपभोक्ता विवाद प्रतितोष आयोग या राष्ट्रीय उपभोक्ता प्रतितोष आयोग के समक्ष चलाने योग्य किसी व्यष्टिक उपभोक्ता का परिवाद;

(iii) जो प्रतिस्पर्धा अधिनियम, 2002 (2003 का 12) के कार्यक्षेत्र के भीतर हैं;

(iv) बेदखली आदेश जो भारतीय विमानपत्तन अधिनियम, 1994 (1994 का 55) की धारा 28 के अधीन अपीलीय है;

(ख) इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण के किसी निदेश, विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध अपील की सुनवाई और उसका निपटारा करेगा ।

18. विवाद के निपटारे के लिए आवेदन और अपील अधिकरण को अपील-(1) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी या कोई व्यक्ति धारा 17 के खंड (क) में निर्दिष्ट किसी विवाद के न्यायनिर्णयन के लिए अपील अधिकरण को आवेदन कर सकेगा ।

(2) केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी या प्राधिकरण के किसी निदेश, विनिश्चय या आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति अपील अधिकरण को अपील कर सकेगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन प्रत्येक अपील उस तारीख से, जिसको प्राधिकरण द्वारा दिए गए निदेश या किए गए आदेश या विनिश्चय की प्रति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार या स्थानीय प्राधिकारी या व्यथित व्यक्ति को प्राप्त होती है, तीस दिन की अवधि के भीतर की जाएगी और यह ऐसे प्ररूप में होगी, ऐसी रीति से सत्यापित की जाएगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाएः

परन्तु अपील अधिकरण उक्त तीस दिन की अवधि के अवसान के पश्चात् किसी अपील को ग्रहण कर सकेगा यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि उस अवधि के भीतर इसके फाइल न करने के लिए पर्याप्त कारण था ।

(4) अपील अधिकरण, उपधारा (1) के अधीन आवेदन या उपधारा (2) के अधीन अपील की प्राप्ति पर, विवाद या अपील के पक्षकारों को सुनवाई का अवसर देने के पश्चात् उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगा, जो वह ठीक समझे

(5) अपील अधिकरण, यथास्थिति, विवाद या अपील के पक्षकारों और प्राधिकरण को उसके द्वारा किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रति भेजेगा ।

(6) उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन या उपधारा (2) के अधीन की गई अपील पर उसके द्वारा यथासंभव शीघ्रता से कार्रवाई की जाएगी और उसके द्वारा, यथास्थिति, आवेदन या अपील की प्राप्ति की तारीख से नब्बे दिन के भीतर आवेदन या अपील का अंतिम रूप से निपटारा किए जाने का प्रयास किया जाएगाः

परन्तु जहां ऐसे आवेदन या अपील का निपटारा उक्त नब्बे दिन की अवधि के भीतर नहीं किया जा सकता है, वहां अपील अधिकरण उक्त अवधि के भीतर आवेदन या अपील का निपटारा नहीं किए जाने के कारणों को लेखबद्ध करेगा

(7) अपील अधिकरण, उपधारा (1) के अधीन किसी आवेदन में किसी विवाद या उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण के किसी निदेश या आदेश या विनिश्चय के विरुद्ध की गई अपील की वैधता या औचित्य या सत्यता की परीक्षा करने के प्रयोजन के लिए, स्वप्रेरणा से या अन्यथा ऐसे आवेदन या अपील के निपटारे से सुसंगत अभिलेखों को मंगा सकेगा और ऐसे आदेश कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।

19. अपील अधिकरण की संरचना-(1) अपील अधिकरण अध्यक्ष और दो से अनधिक सदस्यों से मिलकर बनेगा, जो केन्द्रीय सराकर द्वारा राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियुक्त किए जाएंगेः

परंतु तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन स्थापित किसी अन्य अधिकरण में उस रूप में पद धारण करने वाले अध्यक्ष या किसी सदस्य को, उस अधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य होने के अतिरिक्त, इस अधिनियम के अधीन अपील अधिकरण के, यथास्थिति, अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्त किया जा सकेगा ।

(2) अपील अधिकरण के अध्यक्ष और सदस्यों का चयन केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के मुख्य न्यायमूर्ति या उसके नामनिर्देशिती के परामर्श से किया जाएगा ।

20. अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति के लिए अर्हताएं-(1) अपील अधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए कोई व्यक्ति तभी अर्हित होगा, जब-

() वह अध्यक्ष की दशा में, उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश या किसी उच्च न्यायालय का मुख्य न्यायमूर्ति है या रहा है;

(ख) सदस्य की दशा में, उसने भारत सरकार के सचिव का पद या केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार में विमानन या अर्थशास्त्र या विधि के क्षेत्र में व्यौहार करने वाले मंत्रालयों या विभागों में कोई समतुल्य पद, दो वर्ष से अन्यून की कुल अवधि के लिए धारण किया है या ऐसा व्यक्ति जो विमानन या अर्थशास्त्र या विधि के क्षेत्र में विशेष अनुभव रखता है ।

21. पदावधि-अपील अधिकरण का अध्यक्ष और प्रत्येक अन्य सदस्य उस तारीख से जिसको वह अपना पद-भार ग्रहण करता है, तीन वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए उस रूप में पद धारण करेगाः

परन्तु कोई अध्यक्ष या अन्य सदस्य, -

(क) अध्यक्ष की दशा में सत्तर वर्ष की आयु;

(ख) सदस्य की दशा में पैंसठ वर्ष की आयु,

प्राप्त करने के पश्चात् उस रूप में पद धारण नहीं करेगा ।

22. सेवा के निबंधन और शर्तें-अपील अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएंः

परन्तु अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य के वेतन और भत्तों तथा सेवा के अन्य निबंधन और शर्तों में, नियुक्ति के पश्चात् उसके लिए अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

23. रिक्तियां-यदि अपील अधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य के पद में अस्थायी अनुपस्थिति से भिन्न किसी कारण से कोई रिक्ति हो जाती है तो केन्द्रीय सरकार किसी अन्य व्यक्ति को उस रिक्ति को भरने के लिए इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार नियुक्त करेगी और कार्यवाहियां, उस प्रक्रम से जिस पर रिक्ति भरी जाती है, अपील अधिकरण के समक्ष चालू रखी जा सकेंगी ।

24. पद से हटाया जाना और त्यागपत्र-(1) केन्द्रीय सरकार, अपील अधिकरण के ऐसे अध्यक्ष या किसी सदस्य को पद से हटा सकेगी-

(क) जो दिवालिया न्यायनिर्णीत किया गया है; या

(ख) जो किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है, जिसमें, केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या

() जो अध्यक्ष या किसी सदस्य के रूप में कार्य करने के लिए शारीरिक या मानसिक रूप से असमर्थ हो गया है; या

(घ) जिसने ऐसा वित्तीय या अन्य हित अर्जित कर लिया है, जिससे अध्यक्ष या सदस्य के रूप में उसके कृत्यों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है; या

() जिसने अपने पद का ऐसा दुरुपयोग किया है जिससे उसके पद पर बने रहने से लोकहित पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, अपील अधिकरण के अध्यक्ष या सदस्य को उस उपधारा के खंड (घ) या खंड (ङ) में विनिर्दिष्ट आधार पर उसके पद से तभी हटाया जाएगा जब उच्चतम न्यायालय ने केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त निर्दिष्ट किए जाने पर ऐसी प्रक्रिया के अनुसार जिसे वह इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, जांच किए जाने पर यह रिपोर्ट दे दी हो कि अध्यक्ष या किसी सदस्य को ऐसे आधारों पर हटाया जाना चाहिए ।

(3) केन्द्रीय सरकार, अपील अधिकरण के ऐसे अध्यक्ष या सदस्य को, जिसके संबंध में उपधारा (2) के अधीन उच्चतम न्यायालय को निर्देश किया गया है, तभी निलंबित कर सकेगी जब केन्द्रीय सरकार ने ऐसे निर्देश पर उच्चतम न्यायालय से रिपोर्ट प्राप्त होने पर कोई आदेश पारित कर दिया हो ।

25. अपील अधिकरण के कर्मचारिवृन्द-(1) केन्द्रीय सरकार, अपील अधिकरण को ऐसे अधिकारी और कर्मचारी उपलब्ध कराएगी, जो वह ठीक समझे ।

(2) अपील अधिकरण के अधिकारी और कर्मचारी, अध्यक्ष के साधारण अधीक्षण के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करेंगे

(3) अपील अधिकरण के ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी, जो विहित की जाएं ।

26. बहुमत द्वारा विनिश्चय किया जाना-यदि, अध्यक्ष या अन्य सदस्यों की किसी विषय पर राय में मतभेद है, तो ऐसे विषय को बहुमत की राय के अनुसार विनिश्चित किया जाएगा ।

27. सदस्यों आदि का लोक सेवक होना-अपील अधिकरण के अध्यक्ष, सदस्य और अन्य अधिकारियों तथा कर्मचारियों को भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थांतर्गत लोक सेवक समझा जाएगा ।

28. सिविल न्यायालय की अधिकारिता का होना-किसी सिविल न्यायालय को ऐसे किसी विषय के संबंध में, वाद या कार्यवाहियों को ग्रहण करने की अधिकारिता नहीं होगी जिनका अवधारण करने के लिए अपील अधिकरण इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन सशक्त है और इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त किसी शक्ति के अनुसरण में की गई या की जाने वाली कार्रवाई की बाबत किसी न्यायालय या अन्य प्राधिकरण द्वारा व्यादेश प्रदान नहीं किया जाएगा ।

29. अपील अधिकरण की प्रक्रिया और शक्तियां-(1) अपील अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित प्रक्रिया द्वारा आबद्ध नहीं होगा, किन्तु नैसर्गिक न्याय के सिद्धान्तों द्वारा मार्गदर्शित होगा और इस अधिनियम के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए अपील अधिकरण को अपनी स्वयं की प्रक्रिया विनियमित करने की शक्ति होगी ।

(2) अपील अधिकरण को इस अधिनियम के अधीन कृत्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनों के लिए, निम्नलिखित विषयों के संबंध में वही शक्तियां होंगी जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन किसी वाद का विचारण करते समय किसी सिविल न्यायालय में निहित हैं, अर्थात्ः-

(क) किसी व्यक्ति को समन करना और हाजिर कराना तथा उसकी शपथ पर परीक्षा करना;

(ख) दस्तावेजों के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

(ग) शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

() भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, किसी कार्यालय से किसी लोक अभिलेख या दस्तावेज या ऐसे अभिलेख या दस्तावेज की प्रति की अध्यपेक्षा करना;

(ङ) साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

(च) अपने विनिश्चयों का पुनर्विलोकन करना;

(छ) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करना या उसका एकपक्षीय रूप से विनिश्चय करना;

(ज) किसी आवेदन को व्यतिक्रम के लिए खारिज करने के आदेश को या अपने द्वारा एकपक्षीय रूप से पारित किए गए किसी आदेश को अपास्त करना; और

(झ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाए ।

(3) अपील अधिकरण के समक्ष प्रत्येक कार्यवाही भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थांतर्गत तथा 196 के प्रयोजनों के लिए न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और अपील अधिकरण को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 195 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा

30. विधिक प्रतिनिधित्व का अधिकार-आवेदक या अपीलार्थी, अपील अधिकरण के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए या तो स्वयं हाजिर हो सकेगा, या एक या अधिक चार्टर्ड अकाउंटेंटों या कंपनी सचिवों या लागत लेखापालों या विधि व्यवसायियों या अपने अधिकारियों में से किसी को प्राधिकृत कर सकेगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) चार्टर्ड अकाउंटेंट" चार्टर्ड अकाउंटेंट अधिनियम, 1949 (1949 का 38) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथा परिभाषित ऐसा चार्टर्ड अकाउंटेंट अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

(ख) कंपनी सचिव" से कंपनी सचिव अधिनियम, 1980 (1980 का 56) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ग) में यथा परिभाषित ऐसा कंपनी सचिव अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;

(ग) लागत लेखापाल" से लागत और संकर्म लेखापाल अधनियम, 1959 (1959 का 23) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ख) में यथा परिभाषित ऐसा लागत लेखापाल अभिप्रेत है जिसने उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) के अधीन व्यवसाय प्रमाणपत्र अभिप्राप्त कर लिया है;     

(घ) विधि व्यवसायी" से कोई अधिवक्ता, वकील या किसी उच्च न्यायलय का अटर्नी अभिप्रेत है और जिसके अंतर्गत व्यवसायरत प्लीडर भी है ।

31. उच्चतम न्यायालय को अपील-(1) सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में या किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, अपील अधिकरण के किसी ऐसे आदेश के विरुद्ध जो अन्तर्वर्ती आदेश नहीं है, अपील, उच्चतम न्यायालय को उस संहिता की धारा 100 में विनिर्दिष्ट एक या अधिक आधारों पर होगी ।

(2) अपील अधिकरण द्वारा पक्षकारों की सहमति से किए गए किसी विनिश्चय या आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं होगी

(3) इस धारा के अधीन प्रत्येक अपील, उस विनिश्चय या आदेश की तारीख से जिसके विरुद्ध अपील की जाती है, नब्बे दिन की अवधि के भीतर की जाएगीः

परन्तु उच्चतम न्यायालय यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी समय से अपील करने में पर्याप्त कारणों से निवारित हो गया था तो नब्बे दिन की उक्त अवधि की समाप्ति के पश्चात् भी अपील ग्रहण कर सकेगा

32. अपील अधिकरण द्वारा पारित आदेश का डिक्री के रूप में निष्पादनीय होना-(1) इस अधिनियम के अधीन अपील अधिकरण द्वारा पारित आदेश, अपील अधिकरण द्वारा सिविल न्यायालय की डिक्री के रूप में निष्पादनीय होगा और इस प्रयोजन के लिए अपील अधिकरण को सिविल न्यायालय की सभी शक्तियां होंगी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी अपील अधिकरण, उसके द्वारा किए गए किसी आदेश को स्थानीय अधिकारिता रखने वाले किसी सिविल न्यायालय को संप्रेषित कर सकेगा और ऐसा सिविल न्यायालय उस आदेश को इस प्रकार निष्पादित करेगा मानो वह उस न्यायालय द्वारा की गई डिक्री हो ।

अध्याय 5

वित्त, लेखा और संपरीक्षा

33. बजट-प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में आगामी वित्तीय वर्ष के लिए अपना बजट ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किए जाएं, प्राधिकरण की प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय को दर्शित करते हुए तैयार करेगा और उसे केन्द्रीय सरकार को सूचना के लिए अग्रेषित करेगा ।

34. केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुदान-केन्द्रीय सरकार, संसद् द्वारा इस निमित्त विधि द्वारा किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्, प्राधिकरण को ऐसी धनराशियों का अनुदान दे सकेगी, जो अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्तों तथा प्रशासनिक व्ययों का, जिनके अंतर्गत प्राधिकरण के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय या उनके संबंध में वेतन और भत्ते तथा पेंशन भी हैं, संदाय किए जाने के लिए अपेक्षित हैं ।

35. लेखाओं का वार्षिक विवरण-(1) प्राधिकरण, उचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगा तथा लेखाओं का एक वार्षिक विवरण, ऐसे प्ररूप में तैयार करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से विहित किया जाए ।

(2) प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा ऐसे अंतरालों पर की जाएगी, जो उसके द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक या इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण के लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में उसके द्वारा नियुक्त किसी व्यक्ति को, उस संपरीक्षा के संबंध में वही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो साधारणतया, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को सरकारी लेखाओं की संपरीक्षा के संबंध में होते हैं और उसे विशिष्टतया बहियां, लेखे से संबंधित वाउचर तथा अन्य दस्तावेज और कागजपत्र पेश किए जाने की मांग करने और प्राधिकरण के किसी भी कार्यालय का निरीक्षण करने का अधिकार होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति द्वारा प्रमाणित प्राधिकरण के लेखे, उनकी संपरीक्षा रिपोर्ट सहित केन्द्रीय सरकार को प्रतिवर्ष अग्रेषित किए जाएंगे और केन्द्रीय सरकार उन्हें संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखवाएगी ।

36. विवरणियों आदि का केन्द्रीय सरकार को दिया जाना-(1) प्राधिकरण, केन्द्रीय सरकार को ऐसे समय पर और ऐसे प्ररूप में तथा ऐसी रीति से जो विहित की जाएं या जो केन्द्रीय सरकार निदेश दे, प्राधिकरण की अधिकारिता के अधीन किसी विषय के संबंध में ऐसी विवरणियां और विवरण तथा ऐसी विशिष्टियां देगा जिनकी केन्द्रीय सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे ।

(2) प्राधिकरण, प्रत्येक वर्ष में एक बार वार्षिक रिपोर्ट ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर जो विहित किए जाएं तैयार करेगा जिसमें पूर्ववर्ती वर्ष के दौरान उसके क्रियाकलापों का संक्षिप्त विवरण होगा और रिपोर्ट की प्रतियां केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित की जाएंगी ।

(3) उपधारा (2) के अधीन प्राप्त रिपोर्ट की एक प्रति, उसके प्राप्त होने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार द्वारा यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

अध्याय 6

अपराध और शास्तियां

37. अपील अधिकरण के आदेशों के अनुपालन में जानबूझकर असफल रहने के लिए शास्ति-यदि कोई व्यक्ति, अपील अधिकरण के आदेश का अनुपालन करने में जानबूझकर असफल रहेगा तो वह जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक हो सकेगा और द्वितीय या पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में, जुर्माने से, जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा और लगातार उल्लंघन की दशा में, अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसा व्यतिक्रम जारी रहता है, दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

38. इस अधिनियम के अधीन आदेशों और निदेशों के अननुपालन के लिए दंड-जो कोई, इस अधिनियम के अधीन दिए गए किसी आदेश या निदेश का अनुपालन करने में असफल रहेगा या इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या विनियमों के उपबंधों का उल्लंघन करेगा या उल्लंघन करने का प्रयास करेगा या उल्लंघन करने के लिए दुष्प्ररेण करेगा, तो वह जुर्माने से, जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा और द्वितीय या किसी पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में, जुर्माने से, जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा और लगातार उल्लंघन की दशा में, अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसा व्यतिक्रम जारी रहता है, चार हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

39. प्राधिकरण या अपील अधिकरण के आदेश के अननुपालन के लिए दंड-यदि कोई व्यक्ति प्राधिकरण या अपील अधिकरण के अध्याय 4 के अधीन पारित आदेश का अनुपालन करने में जानबूझकर असफल रहेगा तो वह जुर्माने से जो एक लाख रुपए तक का हो सकेगा, और द्वितीय या किसी पश्चात्वर्ती अपराध की दशा में, जुर्माने से, जो दो लाख रुपए तक का हो सकेगा, और लगातार असफलता की दशा में, अतिरिक्त जुर्माने से, जो प्रत्येक दिन के लिए, जिसके दौरान ऐसा व्यतिक्रम जारी रहता है, चार हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा

40. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां, इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय, कंपनी के कारोबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:

परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को, इस अधिनियम में उपबंधित किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध, कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

() कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या अन्य व्यष्टियों का अन्य संगम है; और

(ख) निदेशक" से कंपनी में कोई पूर्णकालिक निदेशक और फर्म के संबंध में उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

41. सरकारी विभागों द्वारा अपराध-(1) जहां, इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध सरकार के किसी विभाग या उसके किसी उपक्रमों द्वारा किया गया है, वहां विभाग या उसके उपक्रमों के अध्यक्ष उस अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे जब तक कि वे यह साबित नहीं कर देते हैं कि अपराध उनकी जानकारी के बिना किया गया था या उन्होंने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध सरकार के किसी विभाग या उसके उपक्रमों द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध, विभाग या उसके उपक्रमों के अध्यक्ष से भिन्न किसी अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।

अध्याय 7

प्रकीर्ण

42. केन्द्रीय सरकार द्वारा निदेश-(1) केन्द्रीय सरकार, समय-समय पर प्राधिकरण को ऐसे निदेश दे सकेगी जिन्हें वह भारत की प्रभुता और अखंडता, राज्य की सुरक्षा, विदेशी राज्यों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंधों, लोक व्यवस्था, शिष्टता या नैतिकता के हित में आवश्यक समझे ।

(2) पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना प्राधिकरण, अपनी शक्तियों का प्रयोग या अपने कृत्यों का पालन करने में, नीति विषयक प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जो केन्द्रीय सरकार उसे समय-समय पर लिखित में देः

परन्तु प्राधिकरण को इस उपधारा के अधीन कोई निदेश देने से पूर्व अपने विचार अभिव्यक्त करने का एक यथासाध्य अवसर दिया जाएगा ।

(3) कोई प्रश्न नीति विषयक है या नहीं, इस बारे में केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

43. प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण के अध्यक्ष, सदस्य, अधिकारी और अन्य कर्मचारी, जब वे इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या जब उनका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित हो, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थांतर्गत लोक सेवक समझे जाएंगे

44. अधिकारिता का वर्जन-किसी सिविल न्यायालय को किसी ऐसे मामले के संबंध में अधिकारिता नहीं होगी जिसका अवधारण करने के लिए इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन प्राधिकरण सशक्त है ।

45. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों या विनियमों के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या प्राधिकरण या उसके किसी सदस्य, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

46. धन और आय पर कर से छूट-धन-कर अधिनियम, 1957 (1957 का 27), आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) या धन, आय, लाभ या अभिलाभ पर कर से संबंधित तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकरण, अपने धन, व्युत्पन्न आय, लाभ या अभिलाभ के संबंध में धन-कर, आय-कर या किसी अन्य कर का संदाय करने का दायी नहीं होगा ।

47. अपराधों का संज्ञान-कोई भी न्यायालय, इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान प्राधिकरण के या प्राधिकरण द्वारा इस प्रयोजन के लिए सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी अधिकारी के लिखित परिवाद पर करने के सिवाय, नहीं करेगा ।

48. शक्तियों का प्रत्यायोजन-प्राधिकरण, लिखित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, प्राधिकरण के अध्यक्ष या किसी सदस्य या किसी अधिकारी को ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाएं, इस अधिनियम के अधीन अपनी ऐसी शक्तियों और कृत्यों को (विवादों का निपटारा करने की शक्ति और विनियम बनाने की शक्ति को छोड़कर) जो वह आवश्यक समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगा ।

49. केन्द्रीय सरकार की प्राधिकरण को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) यदि किसी समय केन्द्रीय सरकार की यह राय हो कि-

(क) गंभीर आपात के कारण प्राधिकरण इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या इसके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है; या

(ख) प्राधिकरण ने केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए किसी निदेश के अनुपालन में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में बार-बार व्यतिक्रम किया है और उस व्यतिक्रम के परिणामस्वरूप प्राधिकरण की वित्तीय स्थिति, या किसी विमानपत्तन, हेलीपत्तन, सिविल अंतःक्षेत्र, वैमानिक संचार स्टेशन के प्रशासन को हानि हुई है; या

(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं जिनके कारण लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है तो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अधिक से अधिक छह मास तक की उतनी अवधि के लिए जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्राधिकरण को अतिष्ठित कर सकेगीः

परंतु खंड (ख) में वर्णित कारणों से इस उपधारा के अधीन कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व केन्द्रीय सरकार, प्राधिकरण को यह कारण दर्शित करने के लिए युक्तियुक्त अवसर देगी कि उसे अतिष्ठित क्यों न कर दिया जाए और प्राधिकरण के स्पष्टीकरणों और आक्षेपों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर, -

(क) सभी सदस्य, अधिक्रमण की तारीख से ही, उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे;

(ख) ऐसी सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका प्रयोग या निर्वहन इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्राधिकरण द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकेगा, जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता है, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा, जैसा केन्द्रीय सरकार निदेश दे, प्रयोग और निर्वहन किया जाएगा;

(ग) प्राधिकरण के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन सभी संपत्ति जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता है, केन्द्रीय सरकार में निहित रहेगी ।

(3) उपधारा (1) के अधीन जारी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति पर, केन्द्रीय सरकार, -

(क) अधिक्रमण की अवधि को ऐसी छह मास से अनधिक की और अवधि के लिए विस्तार कर सकेगी जो वह आवश्यक समझे; या

(ख) नई नियुक्ति द्वारा प्राधिकरण का पुनर्गठन कर सकेगी और ऐसी दशा में वे सदस्य जिन्होंने उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन अपने पद रिक्त किए थे, नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझे जाएंगेः

परंतु केन्द्रीय सरकार, अधिक्रमण की अवधि की समाप्ति से पूर्व किसी भी समय, चाहे उपधारा (1) के अधीन मूलतः विनिर्दिष्ट की गई हो या इस उपधारा के अधीन विस्तारित की गई हो, इस उपधारा के खंड (ख) के अधीन कार्रवाई कर सकेगी ।

(4) केन्द्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना जारी कराएगी और इस धारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई की और उन परिस्थितियों की, जिनके कारण ऐसी कार्रवाई की गई है पूरी रिपोर्ट शीघ्रातिशीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।

50. अन्य विधियों का लागू होना, वर्जित होना-इस अधिनियम के उपबंध तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के उपबंधों के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में ।

51. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

() धारा 6 की उपधारा (2) के अधीन अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

(ख) वह प्ररूप और रीति जिसमें तथा वह प्राधिकारी जिसके समक्ष धारा 6 की उपधारा (4) के अधीन पद और गोपनीयता की शपथ ली जाएगी और हस्ताक्षर किए जाएंगे;

(ग) धारा 7 के अधीन अध्यक्ष द्वारा प्रयोग की जाने वाली शक्तियां और निर्वहन किए जाने वाले कृत्य;

(घ) धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन की गई किसी जांच के संचालन के लिए प्रक्रिया;

(ङ) धारा 9 की उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण के सचिव, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(च) धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (घ) के अधीन मानीटर की जाने वाली सेवा की क्वालिटी, निरंतरता और विश्वसनीयता से संबंधित कार्य निष्पादक मानक;

() वे लेखा बहियां या अन्य दस्तावेज जो धारा 14 की उपधारा (3) के अधीन सेवा-प्रदाता द्वारा रखे जाने अपेक्षित हैं;

(ज) वह प्ररूप और रीति, जिसमें धारा 18 की उपधारा (3) के अधीन प्ररूप का सत्यापन किया जाएगा और प्ररूप के साथ दी जाने वाली फीस;

(झ) धारा 22 के अधीन अपील अधिकरण के अध्यक्ष और अन्य सदस्यों को संदेय वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा के अन्य निबंधन और शर्तें;

(ञ) धारा 25 की उपधारा (3) के अधीन अपील अधिकरण के ऐसे अधिकारियों और कर्मचारियों के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की अन्य शर्तें;

() वे विषय जिनकी बाबत प्राधिकरण को धारा 29 की उपधारा (2) के खंड () के अधीन सिविल न्यायालय की शक्तियां होंगी;

(ठ) धारा 33 के अधीन वह प्ररूप जिसमें प्राधिकरण अपना बजट ऐसे समय पर प्रत्येक वित्तीय वर्ष में तैयार करेगा और वह समय जिस पर ऐसा बजट धारा 33 के अधीन तैयार किया जाएगा;

(ड) धारा 35 की उपधारा (1) के अधीन वह प्ररूप जिसमें समुचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखे जाएंगे तथा प्राधिकरण द्वारा लेखाओं का वार्षिक विवरण तैयार किया जाएगा;

(ढ) वह प्ररूप, रीति और समय जिसमें धारा 36 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण द्वारा विवरणियां और विवरण दिए जाएंगे;

() वह प्ररूप और समय जिसमें धारा 36 की उपधारा (2) के अधीन प्राधिकरण द्वारा वार्षिक रिपोर्ट तैयार की जाएगी;

(त) कोई अन्य विषय जो नियमों द्वारा विहित किया जाना है या विहित किया जाए अथवा जिसकी बाबत उपबंध किया जाना है या किया जाए ।

52. विनियम बनाने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से संगत हों ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) वह प्रक्रिया जिसके अनुसार धारा 9 की उपधारा (4) के अधीन विशेषज्ञ और वृत्तिक लगाए जा सकेंगे;

(ख) धारा 10 की उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण के अधिवेशनों का स्थान और समय तथा ऐसे अधिवेशनों में अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया (जिसके अंतर्गत उसके अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है);

(ग) कोई अन्य विषय, जिसको विनियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाना अपेक्षित हो या विनिर्दिष्ट किया जाए ।

53. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम और प्राधिकरण द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम अथवा विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

54. कतिपय अधिनियमितियों का संशोधन-इस अधिनियम की अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियां उसमें विनिर्दिष्ट रीति से संशोधित की जाएंगी और ऐसे संशोधन प्राधिकरण के स्थापन की तारीख से प्रभावी होंगे ।

55. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है, तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक प्रतीत हों:

परन्तु इस धारा के अधीन कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारम्भ की तारीख से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

 

अनुसूची

(धारा 54 देखिए)

वायुयान अधिनियम, 1934 (1934 का अधिनियम संख्यांक 22) का संशोधन

धारा 5, उपधारा (2), खंड (कख) में, वायु परिवहन सेवाओं के प्रचालकों के टैरिफ का अनुमोदन, अननुमोदन या पुनरीक्षण है;" शब्दों के स्थान पर, वायु परिवहन सेवाओं के प्रचालकों के टैरिफ का [भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 की धारा 13 उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट टैरिफ से भिन्नट अनुमोदन, अननुमोदन या पुनरीक्षण है;" शब्द रखें ।

भारतीय विमानपत्तन प्राधिकरण अधिनियम, 1994 (1994 का अधिनियम संख्यांक 55) का संशोधन

1. धारा 22क, प्राधिकरण" शब्द से प्रारंभ होने वाले और उपयोजित की जाएगी: - " शब्दों से समाप्त होने वाले भाग के स्थान पर निम्नलिखित रखें: -

प्राधिकरण, -

(i) इस निमित्त केन्द्रीय सरकार के पूर्वानुमोदन के पश्चात् भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 की धारा 2 के खंड () में निर्दिष्ट महा विमानपत्तनों से भिन्न किसी विमानपत्तन से यानारोहण करने वाले यात्रियों से ऐसी दर से, जो विहित की जाए, विकास फीस उद्गृहीत और संगृहीत कर सकेगा;

(ii) भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 की धारा 2 के खंड (ज) में निर्दिष्ट महा विमानपत्तन से यानारोहण करने वाले यात्रियों से ऐसी दर से, जो भारतीय विमानपत्तन आर्थिक विनियामक प्राधिकरण अधिनियम, 2008 की धारा 13 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन अवधारित की जाए, विकास फीस उद्गृहीत और संगृहीत कर सकेगा,

तथा ऐसी फीस प्राधिकरण के पास जमा की जाएगी और निम्नलिखित प्रयोजनों के लिए विहित रीति से विनियमित और उपयोजित की जाएगी: - " ।

2. धारा 41, उपधारा (2) के खंड (ङङ) में, विकास फीस की दर और" शब्दों के स्थान पर महा विमानपत्तनों से भिन्न विमानपत्तनों के संबंध में विकास फीस की दर और" शब्द रखें ।

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