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तटरक्षक अधिनियम, 1978 ( Coast Guard Act, 1978 )


 

तटरक्षक अधिनियम, 1978

(1978 का अधिनियम संख्यांक 30)

[18 अगस्त, 1978]

भारत के सामुद्रिक क्षेत्रों में सामुद्रिक और अन्य राष्ट्रीय हितों के संरक्षण

की दृष्टि से ऐसे क्षेत्रों की सुरक्षा सुनिश्चित करने तथा उससे

संबंधित बातों के लिए संघ के सशस्त्र बल

के गठन और विनियमन का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

भारत गणराज्य के उनतीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम तटरक्षक अधिनियम, 1978 है ।

(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) मुख्य विधि आफिसर" और विधि आफिसर" से तटरक्षक का, धारा 115 के अधीन नियुक्त, क्रमशः मुख्य विधि आफिसर और कोई विधि आफिसर अभिप्रेत है ;

(ख) सिविल अपराध" से ऐसा अपराध अभिप्रेत है जो किसी दंड न्यायालय द्वारा विचारणीय है ;

(ग) सिविल कारागार" से ऐसी जेल या ऐसा स्थान अभिप्रेत है जिसका उपयोग किसी आपराधिक बंदी के निरोध के लिए कारागार अधिनियम, 1894 (1894 का 9) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन किया जाता है ;

(घ) तटरक्षक" से इस अधिनियम के अधीन गठित तटरक्षक अभिप्रेत है ;

(ङ) तटरक्षक न्यायालय" से धारा 64 के अधीन संयोजित न्यायालय अभिप्रेत है ;

() तटरक्षक की अभिरक्षा" से नियमों के अनुसार तटरक्षक के किसी सदस्य की गिरफ्तारी या परिरोध अभिप्रेत है ;

(छ) कमान आफिसर" से, जहां इसका प्रयोग इस अधिनियम के किसी उपबंध में तटरक्षक के किसी यूनिट या पोत के प्रति निर्देश से किया गया है वहां, ऐसा आफिसर अभिप्रेत है जिसका कर्तव्य, नियमों के अधीन उस यूनिट या पोत की बाबत, उस उपबंध में निर्दिष्ट प्रकार के विषयों के संबंध में, कमान आफिसर के कृत्यों का निर्वहन करना है ;

(ज) दंड न्यायालय" से भारत के किसी भाग में कोई मामूली दंड न्यायालय अभिप्रेत है ;

(झ) उप-महानिरीक्षक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त तटरक्षक का उप-महानिरीक्षक अभिप्रेत है ;

(ञ) महानिदेशक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त तटरक्षक का महानिदेशक अभिप्रेत है ;

(ट) अभ्यावेशित व्यक्ति" से इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित कोई अधीनस्थ आफिसर, नौसैनिक या अन्य व्यक्ति अभिप्रेत है ;

(ठ) महानिरीक्षक" से धारा 5 के अधीन नियुक्त तटरक्षक का महानिरीक्षक अभिप्रेत है  ;

(ड) भारत का सामुद्रिक क्षेत्र" से भारत का राज्यक्षेत्रीय सागर खंड, स्पर्शी क्षेत्र, महाद्वीपीय मग्नतट भूमि, अनन्य आर्थिक क्षेत्र या अन्य सामुद्रिक क्षेत्र अभिप्रेत है ;

() तटरक्षक का सदस्य" से कोई आफिसर, अधीनस्थ आफिसर, नौसैनिक या अन्य अभ्यावेशित व्यक्ति अभिप्रेत है ;

(ण) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

() अपराध" से इस अधिनियम के अधीन दंडनीय कोई कार्य या लोप अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत सिविल अपराध भी है ;

(थ) आफिसर" से तटरक्षक के आफिसर के रूप में नियुक्त या वेतन पाने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है, किन्तु इसके अंतर्गत कोई अधीनस्थ आफिसर, नौसैनिक या अन्य अभ्यावेशित व्यक्ति नहीं है ;

(द) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

(ध) नियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाया गया नियम अभिप्रेत है ;

(न) नौसैनिक" से तटरक्षक का ऐसा सदस्य अभिप्रेत है जो तटरक्षक का आफिसर, अधीनस्थ आफिसर या अन्य अभ्यावेशित व्यक्ति नहीं है ;

(प) पोत के फलक पर" पद में के सिवाय पोत" से तटरक्षक जलयान अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत तटरक्षक का या उसके नियंत्रण के अधीन कोई स्थापन या स्टेशन भी है, चाहे वह भारत के भीतर हो या बाहर ;

(फ) स्किपर" से किसी पोत का समादेशन करने वाला कोई अधीनस्थ आफिसर अभिप्रेत है ;

() अधीनस्थ आफिसर" से तटरक्षक के प्रधान अधिकारी, प्रधान सहायक इंजीनियर, उत्तम अधिकारी, उत्तम सहायक इंजीनियर, अधिकारी  [, सहायक इंजीनियर या प्रधान यांत्रिकट के रूप में नियुक्त या वेतन पाने वाला व्यक्ति अभिप्रेत है  ;

(भ) वरिष्ठ आफिसर" से, जहां इसका प्रयोग ऐसे किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में किया गया है जो इस अधिनियम के अधीन है, वहां ऐसा कोई आफिसर या अधीनस्थ आफिसर अभिप्रेत है जो,-

                (i) नियमों के अधीन उस व्यक्ति से ज्येष्ठ है ; या

                (ii) इस अधिनियम या नियमों के अधीन उस व्यक्ति को समादेश देने का हकदार है ;

(म) राज्यक्षेत्रीय सागर खंड", स्पर्शी क्षेत्र", महाद्वीपीय मग्नतटभूमि" और अनन्य आर्थिक क्षेत्र" के वही अर्थ होंगे जो उनके राज्यक्षेत्रीय सागर खंड, महाद्वीपीय मग्नतटभूमि, अनन्य आर्थिक क्षेत्र और अन्य सामुद्रिक क्षेत्र अधिनियम, 1976 (1976 का 80) में हैं ;

(य) उन सभी शब्दों और पदों के, जो इस अधिनियम में प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं है, किन्तु भारतीय दंड संहिता    (1860 का 45) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके उस संहिता में हैं ।

3. इस अधिनियम के अधीन व्यक्ति-(1) निम्नलिखित व्यक्ति, चाहे वे कहीं भी हों, इस अधिनियम के अधीन होंगे, अर्थात् :-

                                (क) आफिसर ;

                                (ख) अधीनस्थ आफिसर और इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित अन्य व्यक्ति ;

                (ग) ऐसे व्यक्ति, जिनसे केन्द्रीय सरकार के साधारण या विशेष आदेश द्वारा किसी पोत में सेवा करने की अपेक्षा की गई है, ऐसे विस्तार तक और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं ; और

(घ) ऐसे व्यक्ति, जिनकी बाबत यह आदेश हुआ है कि उन्हें तटरक्षक के किसी पोत या वायुयान के फलक पर आने दिया जाए या जो उसके यात्री हैं, ऐसे विस्तार तक और ऐसी शर्तों के अधीन रहते हुए जो विहित की जाएं ।

                (2) उपधारा (1) के खंड (क) और खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रत्येक व्यक्ति इस प्रकार तब तक अधीन बना रहेगा जब तक कि वह इस अधिनियम और नियमों के उपबन्धों के अनुसार, तटरक्षक से सेवानिवृत्त नहीं हो जाता है या सेवा से उन्मोचित, निर्मुक्त या पदच्युत नहीं कर दिया जाता है या हटा नहीं दिया जाता है ।

अध्याय 2

तटरक्षक का गठन और तटरक्षक के सदस्यों की सेवा की शर्तें

4. तटरक्षक का गठन-(1) भारत के सामुद्रिक क्षेत्रों में सामुद्रिक और अन्य राष्ट्रीय हितों के संरक्षण की दृष्टि से ऐसे क्षेत्रों की सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए भारत संघ का तटरक्षक नामक एक सशस्त्र बल होगा ।

(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, तटरक्षक का गठन ऐसी रीति से किया जाएगा जो विहित की जाए और तटरक्षक के सदस्यों की सेवा की शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।

5. नियंत्रण, निदेशन, आदि-(1) तटरक्षक का साधारण अधीक्षण, निदेशन और नियंत्रण, केन्द्रीय सरकार में निहित होगा और वही उसका प्रयोग करेगी और उसके तथा इस अधिनियम और नियमों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए तटरक्षक का समादेशन और अधीक्षण ऐसे आफिसर में निहित होगा जिसे केन्द्रीय सरकार तटरक्षक के महानिदेशक के रूप में नियुक्त करे ।

(2) इस अधिनियम के अधीन महानिदेशक के कर्तव्यों के निर्वहन में उसकी सहायता करने के लिए इतने महानिरीक्षक, उप-महानिरीक्षक, कमांडेंट और अन्य आफिसर होंगे, जितने केन्द्रीय सरकार नियुक्त करे ।

6. अभ्यावेशन-(1) तटरक्षक में अभ्यावेशित किए जाने वाले व्यक्ति, अभ्यावेशन का ढंग और अभ्यावेशन की प्रक्रिया वह होगी जो विहित की जाए ।

(2) इस अधिनियम और नियमों में किसी बात के होते हुए भी, ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को सम्यक् रूप से अभ्यावेशित किया गया समझा जाएगा जिसने लगातार तीन मास तक इस अधिनियम के अधीन अभ्यावेशित व्यक्ति के रूप में वेतन प्राप्त किया है और जिसका नाम तटरक्षक की नामावली में रहा है ।

7. भारत के बाहर सेवा करने का दायित्व-तटरक्षक का प्रत्येक सदस्य भारत के किसी भाग में तथा भारत के बाहर भी सेवा करने के दायित्व के अधीन होगा ।

8. राजनिष्ठा की शपथ-तटरक्षक का प्रत्येक सदस्य तटरक्षक में नियुक्ति या अभ्यावेशन के पश्चात्, यथाशक्य शीघ्र, अपने कमान आफिसर या अन्य विहित आफिसर के समक्ष, विहित प्ररूप में, शपथ लेगा या प्रतिज्ञान करेगा और उस पर हस्ताक्षर करेगा ।

9. पद-त्याग और पद से अलग होना-विहित प्राधिकारी की लिखित पूर्व अनुज्ञा के बिना तटरक्षक के किसी सदस्य को,-

                (क) उस अवधि के दौरान, जिसके लिए वह वचनबद्ध है, अपना पदत्याग देने की ; या

                (ख) अपने पद के सभी या उनमें से किन्हीं कर्तव्यों से अलग होने की,स्वतन्त्रता नहीं होगी ।

10. अधिनियम के अधीन सेवा की अवधि-तटरक्षक का प्रत्येक सदस्य राष्ट्रपति के प्रसाद-पर्यन्त पद धारण करेगा

11. केन्द्रीय सरकार और अन्य आफिसरों द्वारा पदच्युत किया जाना या हटाया जाना-इस अधिनियम और नियमों के उपबंधों के अधीन रहते हुए,

(क) केन्द्रीय सरकार, तटरक्षक के किसी सदस्य को पदच्युत कर सकेगी या हटा सकेगी ;

() महानिदेशक या कोई महानिरीक्षक, आफिसर से भिन्न किसी व्यक्ति को तटरक्षक से पदच्युत कर सकेगा या हटा सकेगा ;

(ग) कोई विहित आफिसर, जो उप-महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, आफिसर या अधीनस्थ आफिसर से भिन्न किसी ऐसे व्यक्ति को, जो उसके समादेश के अधीन है, तटरक्षक से पदच्युत कर सकेगा या हटा सकेगा ।

12. सेवा की समाप्ति का प्रमाणपत्र-ऐसे अभ्यावेशित व्यक्ति को, जो तटरक्षक से सेवानिवृत्त हो गया है या जिसे सेवा से उन्मोचित, निर्मुक्त या पदच्युत कर दिया गया है या हटा दिया गया है या जिसे पद त्याग करने के लिए अनुज्ञात कर दिया गया है, उस आफिसर द्वारा जिसके समादेश के अधीन वह है, ऐसी भाषा में जो उस व्यक्ति की मातृ भाषा है और हिंदी या अंग्रेजी में भी, एक प्रमाणपत्र दिया जाएगा, जिसमें निम्नलिखित बातें बताई जाएंगी, अर्थात् :-

                (क) उसकी सेवा को समाप्त करने वाला प्राधिकारी ;

                (ख) ऐसी सेवा की समाप्ति के कारण ; और

                (ग) तटरक्षक में उसकी सेवा की पूर्ण अवधि ।

13. संगम बनाने, वाक्-स्वातंत्र्य आदि के अधिकार के संबंध में निर्बंधन-(1) तटरक्षक का कोई सदस्य, केन्द्रीय सरकार या विहित प्राधिकारी की लिखित पूर्व मंजूरी के बिना,-

(क) किसी व्यापार संघ, श्रम संघ या राजनीतिक संगम का न तो सदस्य होगा और न उससे किसी प्रकार से सहयोजित होगा ; या

(ख) किसी सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन का, जो तटरक्षक के भाग के रूप में मान्यताप्राप्त नहीं है या जो केवल सामाजिक, आमोद-प्रमोद या धार्मिक स्वरूप का नहीं है, न तो सदस्य होगा न उससे किसी प्रकार से सहयोजित होगा ; या

() प्रेस से तो पत्र-व्यवहार करेगा और कोई पुस्तक, पत्र या अन्य दस्तावेज प्रकाशित करेगा और प्रकाशित कराएगा, किन्तु उस दशा में ऐसा कर सकेगा जबकि ऐसा पत्र-व्यवहार या प्रकाशन उसके कर्तव्यों के सद्भावपूर्वक निर्वहन के लिए है या बिल्कुल साहित्यिक, कलात्मक या वैज्ञानिक प्रकृति का है या विहित प्रकृति का है

स्पष्टीकरण-यदि कोई प्रश्न उठता है कि इस उपधारा के खंड (ख) के अधीन कोई सोसाइटी, संस्था, संगम या संगठन बिल्कुल सामाजिक, आमोद-प्रमोद या धार्मिक स्वरूप का है या नहीं तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।

(2) तटरक्षक का कोई सदस्य ऐसे किसी अधिवेशन में न तो भाग लेगा और न उसे संबोधित करेगा और न ऐसे किसी प्रदर्शन में भाग लेगा जो किन्हीं राजनीतिक प्रयोजनों से या ऐसे अन्य प्रयोजनों से, जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, व्यक्तियों के किसी निकाय द्वारा संगठित किया गया है ।

अध्याय 3

तटरक्षक के कर्तव्य और कृत्य

14. तटरक्षक के कर्तव्य और कृत्य-(1) तटरक्षक का यह कर्तव्य होगा कि वह ऐसे उपायों द्वारा जो वह उचित समझे, भारत के सामुद्रिक क्षेत्र में भारत के सामुद्रिक तथा अन्य राष्ट्रीय हितों की संरक्षा करे ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उसमें निर्दिष्ट उपायों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा, अर्थात् :-

(क) किसी सामुद्रिक क्षेत्र में कृत्रिम द्वीपों, समुद्र में तट से दूर टर्मिनलों, संस्थापनों तथा अन्य संरचनाओं और युक्तियों की सुरक्षा और संरक्षण को सुनिश्चिय करना ;

(ख) मछुआरों की संरक्षण देना, जिसके अंतर्गत समुद्र में, जब वे संकट में हों, उनकी सहायता करना भी है ;

(ग) ऐसे उपाय करना जो सामुद्रिक पर्यावरण को परिरक्षित और सुरक्षित रखने और सामुद्रिक प्रदूषण को रोकने और नियंत्रित करने के लिए आवश्यक हैं ;

                (घ) तस्करी विरोधी संक्रियाओं में सीमा-शुल्क तथा अन्य प्राधिकारियों की सहायता करना ;

                (ङ) ऐसी अधिनियमितियों के उपबंधों को प्रवर्तित करना जो उस समय सामुद्रिक क्षेत्र में प्रवृत्त हैं ; और

                (च) ऐसी अन्य बातें, जिनके अन्तर्गत समुद्र में जीवन और संपत्ति की सुरक्षा के उपाय तथा वैज्ञानिक आंकड़े एकत्रित करना भी है, जो विहित की जाएं ।

(3) तटरक्षक इस धारा के अधीन अपने कृत्यों का पालन ऐसे नियमों के अनुसार और उनके अधीन रहते हुए करेगा जो विहित किए जाएं और ऐसे नियमों में, विशेष कर यह सुनिश्चित करने के लिए, उपबंध हो सकेंगे कि तटरक्षक संघ के अभिकरणों, संस्थानों तथा प्राधिकारियों के निकट सम्पर्क में इस प्रकार कार्य कर सके कि प्रयत्नों की पुनरावृत्ति न हो ।

अध्याय 4

अपराध

15. अपराधियों के साथ वार्ताचार, आदि-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है,-

                (क) अपराधी से विश्वासघातपूर्वक वार्ताचार करेगा या उसे आसूचना देगा ; या

                (ख) कोई जानकारी, जो उसने अपराधी से प्राप्त की है, समुचित प्राधिकारियों को बताने में जानबूझकर असफल रहेगा ; या

                (ग) किसी प्रकार से अपराधी की सहायता करेगा ; या

                (घ) किसी अपराधी द्वारा पकड़े जाने पर, स्वेच्छा से उसकी सेवा या सहायता करेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए अपराधी" के अंतर्गत निम्नलिखित भी हैं,-

(क) सभी सशस्त्र विद्रोही, सशस्त्र बागी, सशस्त्र बलवाकारी, जलदस्यु और ऐसा कोई सशस्त्र व्यक्ति, जिसके विरुद्ध कार्रवाई करना ऐसे किसी व्यक्ति का, जो इस अधिनियम अधीन है, कर्तव्य है ; और

(ख) कोई ऐसा व्यक्ति या ऐसे व्यक्ति जो भारत के सामुद्रिक क्षेत्र में तस्करी, विधिविरुद्ध खोज, विदोहन या किसी अन्य विधि विरुद्ध क्रियाकलाप में लगा हुआ है या लगे हुए हैं ।

16. पदस्थान का अभित्यजन और कर्तव्य की उपेक्षा-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है,-

                (क) अपने पदस्थान का अभित्यजन करेगा ;या

                (ख) अपने पहरे पर सोएगा ; या

                (ग) अपने पर अधिरोपित कर्तव्य के पालन में असफल रहेगा या उसकी उपेक्षा करेगा ; या

(घ) तटरक्षक को प्रतिबाधित करने वाले किन्हीं शब्दों, आचार या परिकल्पना को जानबूझकर छिपाएगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

17. विद्रोह-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) तटरक्षक में या भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायुसेना बलों में या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों में विद्रोह आरम्भ करेगा, उद्दीप्त करेगा, कारित करेगा या कारित करने के लिए किन्हीं अन्य व्यक्तियों के साथ षड्यंत्र करेगा ; या

                (ख) ऐसे किसी विद्रोह में सम्मिलित होगा ; या

                (ग) ऐसे किसी विद्रोह में उपस्थित होते हुए, उसे दबाने के लिए अपने अधिकतम प्रयास नहीं करेगा ; या

                (घ) यह जानते हुए या इस बात का विश्वास करने का कारण रखते हुए कि ऐसा कोई विद्रोह या ऐसा विद्रोह करने का आशय या ऐसा कोई षड्यंत्र अस्तित्व में है, उसकी इत्तिला अपने कमान आफिसर या अन्य वरिष्ठ आफिसर को अविलम्ब नहीं देगा ; या

(ङ) तटरक्षक के या भारत के सैनिक, नौसैनिक या वायुसेना बलों के या उनसे सहयोग करने वाले किन्हीं बलों के किसी व्यक्ति को उसके कर्तव्य से या संघ के प्रति उसकी राजनिष्ठा से विचलित करने का प्रयास करेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, मृत्यु या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा :

परन्तु इस धारा के अधीन अधिनिर्णीत मृत्यु के दंडादेश का पालन तब तक नहीं किया जाएगा जब तक कि उसकी पुष्टि केन्द्रीय सरकार द्वारा नहीं कर दी जाती ।

18. पोतों या विमानों के फलक पर के व्यक्तियों द्वारा, तटरक्षक कार्मिकों को राजनिष्ठा से विचलित किया जाना-यदि कोई व्यक्ति, जो अन्यथा इस अधिनियम के अधीन नहीं है, तटरक्षक के किसी पोत या वायुयान के फलक पर या ऐसे किसी पोत या वायुयान के फलक पर होते हुए, जो तटरक्षक की सेवा में है, किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, संविधान के प्रति उसकी राजनिष्ठा या राज्य के प्रति उसकी भक्ति या अपने वरिष्ठ आफिसरों के प्रति उसके कर्तव्य से विचलित करने का प्रयास करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

19. वरिष्ठ आफिसरों पर आघात करना या उन्हें धमकी देना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

                (क) अपने वरिष्ठ आफिसर पर आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या हमला करेगा ; या

                (ख) ऐसे आफिसर के प्रति धमकी भरी भाषा का प्रयोग करेगा ; या

                (ग) ऐसे आफिसर के प्रति अनधीनता द्योतक भाषा का प्रयोग करेगा ; या

(घ) ऐसे आफिसर के प्रति अवमानपूर्ण व्यवहार करेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा :

परन्तु खंड (ग) और खंड (घ) में विनिर्दिष्ट अपराधों की दशा में कारावास पांच वर्ष से अधिक का नहीं होगा ।

20. वरिष्ठ आफिसर की अवज्ञा-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा अपने पद के निष्पादन में स्वयं दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की, चाहे वह मौखिक रूप से या लिखकर या संकेत द्वारा या अन्यथा दिया गया हो, ऐसी रीति से अवज्ञा करेगा जिससे प्राधिकार का जानबूझकर किया गया तिरस्कार दर्शित होता है, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अपने वरिष्ठ आफिसर द्वारा दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा करेगा तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

21. अधीनस्थों के साथ बुरा बर्ताव करना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी ऐसे व्यक्ति पर, जो रैंक या पद में उसके अधीनस्थ है और जो इस अधिनियम के अधीन है, आपराधिक बल का प्रयोग करेगा या उसके साथ अन्यथा बुरा बर्ताव करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

22. झगड़ा करना, लड़ना और विच्छृंखल आचरण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है,-

(क) किसी अन्य व्यक्ति से, चाहे वह व्यक्ति इस अधिनियम के अधीन है या नहीं, झगड़ा करेगा, लड़ेगा या उस पर आघात करेगा ; या

() झगड़ा या उपद्रव खड़ा करने की प्रवृत्ति वाले निन्दामय या प्रकोपक शब्दों या अंगविक्षेपों का प्रयोग करेगा ; या

(ग) विच्छृंखलता से आचरण करेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

23. कलंकास्पद आचरण के कुछ प्रकार-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

                (क) क्रूर, अशिष्ट या अप्राकृतिक प्रकार के किसी कंलकास्पद आचरण का दोषी होगा ; या

(ख) कर्तव्य से बचने के लिए रोगी बन जाएगा या अपने में रोग या अंगशैथिल्य का ढोंग करेगा, या अपने में उसे उत्पन्न करेगा, या निरोग होने में साशय विलंब करेगा या अपने रोग या अंगशैथिल्य को गुरुतर बनाएगा ; या

(ग) अपने-आप को या किसी अन्य व्यक्ति को सेवा के अयोग्य बनाने के आशय से अपने-आप को या उस व्यक्ति को स्वेच्छया उपहति कारित करेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

24. मत्तता-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, मत्त होने का दोषी होगा तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषिसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

(2) यदि कोई व्यक्ति अल्कोहल या किसी औषधि के प्रभाव के कारण, चाहे अकेले या किन्हीं अन्य परिस्थितियों में, इस बात के लिए अयोग्य है कि उसे उसका कर्तव्य या कोई ऐसा कर्तव्य सौंपा जाए जिसका पालन करने के लिए उसे कहा जाए या वह विच्छृंखल ढंग से व्यवहार करता है या ऐसे ढंग से व्यवहार करता है जिसके कारण तटरक्षक की बदनामी होनी संभाव्य है तो उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए उसे मत्तता का दोषी समझा जाएगा ।

25. अभित्यजन करना और अभित्यजन में सहायता करना-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अपने पोत या ऐसे स्थान से जहां उसके कर्तव्यवश उससे उपस्थित होने की अपेक्षा है, इस आशय से अनुपस्थित रहेगा कि वह उस पोत या स्थान पर वापस नहीं आएगा या अपने पोत या ड्यूटी के स्थान से अनुपस्थित होते हुए, किसी भी समय या किन्हीं भी परिस्थितियों में, कोई ऐसा कार्य करेगा जिससे यह दर्शित होता है कि उसका आशय उस पोत या स्थान पर वापस आने का है, तो उसके बारे में यह कहा जाएगा कि उसने अभित्यजन किया है

 [(2) प्रत्येक ऐसा व्यक्ति, जो तटरक्षक का अभित्यजन करेगा या अभित्यजन करने का प्रयत्न करेगा, तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा और ऐसे प्रत्येक मामले में उसके,-

(क) ऐसे सभी वेतन, उद्धारण पुरस्कार, प्राईजधन और भत्ते, जो उसके द्वारा उपार्जित किए गए हों ;

(ख) ऐसी पेंशन और उपदान, पदक और अलंकरण, जो उसे दिए गए हों ; और

() ऐसे सभी वस्त्र और चीजबस्त, जिन्हें उसने पोत फलक या उस स्थान पर छोड़ा हो, जहां से उसने अभित्यजन किया है,

समपहृत हो जाएंगे जब तक कि ऐसे अधिकरण द्वारा, जिसने उसका विचारण किया है या केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक द्वारा अन्यथा निदेश न दे दिया जाए ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, सभी वेतन, उद्धारण पुरस्कार, प्राईजधन और भत्ते ऐसे व्यक्ति द्वारा तब उपार्जित किए गए समझे जाएंगे जब ऐसे वेतन, उद्धारण पुरस्कार, प्राईजधन और भत्ते देय हो गए हैं किन्तु उसे संदत्त नहीं किए गए हैं ।]

(3) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, जानबूझकर ऐसे किसी अभित्याजक को संश्रय देगा तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

26. पोत से अनधिकृत रूप से निकल जाना और छुट्टी के बिना अनुपस्थिति-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन का दोषी हुए बिना, अपने पोत को या ड्यूटी के स्थान को छोड़ेगा, या छुट्टी लिए बिना अनुपस्थित रहेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा तथा उसे वेतन और भत्तों में ऐसी कटौती करके भी दंडित किया जाएगा, जो विहित की जाए ।

27. पोत या वायुयान खो देना-(1) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक के किसी पोत को या ऐसे किसी पोत को जो तटरक्षक की सेवा में है, जानबूझकर खोएगा, उत्कूलित करेगा या परिसंकटग्रस्त करेगा या उसका खोया जाना, उत्कूलित या परिसंकटग्रस्त किया जाना सहन करेगा या तटरक्षक के किसी वायुयान को या ऐसे किसी वायुयान को जो तटरक्षक की सेवा में है, खोएगा या उसका खोया जाना सहन करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

(2) यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, उपेक्षा से या किसी व्यक्तिक्रम द्वारा तटरक्षक के किसी पोत को या ऐसे किसी पोत को जो तटरक्षक की सेवा में है, खोएगा, उत्कूलित करेगा या परिसंकटग्रस्त करेगा या उसका खोया जाना या उत्कूलित या परिसंकटग्रस्त किया जाना सहन करेगा अथवा तटरक्षक के किसी वायुयान को या ऐसे किसी वायुयान को, जो तटरक्षक की सेवा में है, खोएगा या उसका खोया जाना सहन करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

28. खतरनाक अप्राधिकृत उड़ान-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक के किसी वायुयान की या ऐसे किसी वायुयान को जो तटरक्षक की सेवा में है, उड़ान करने या उसके प्रयोग में अथवा ऐसे किसी वायुयान या वायुयान की सामग्री के संबंध में किसी ऐसे कार्य या उपेक्षा के लिए दोषी है जिससे किसी व्यक्ति के जीवन की हानि या उसे शारीरिक क्षति होती है या होनी संभाव्य है, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर,-

() उस दशा में, जबकि वह जानबूझकर ऐसा कार्य करता है या जानबूझकर उपेक्षा से कार्य करता है, कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और

(ख) किसी अन्य दशा में, कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

29. अशुद्ध प्रमाणपत्र-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक के किसी वायुयान के संबंध में या ऐसे किसी वायुयान के संबंध में जो तटरक्षक की सेवा में है, या उसकी किसी सामग्री के संबंध में किसी प्रमाणपत्र पर उसकी शुद्धता सुनिश्चित किए बिना, हस्ताक्षर करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

30. नीची उड़ान भरना और उड़ान द्वारा क्षोभ उत्पन्न करना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक के किसी वायुयान का या ऐसे किसी वायुयान का, जो तटरक्षक की सेवा में है, चालक होते हुए,-

                (क) वायुयान को भूमि से उड़ाते समय या उसे भूमि पर उतारते समय को छोड़कर उसे ऐसी ऊंचाई पर उड़ाएगा जो उसके कमान आफिसर द्वारा प्राधिकृत ऊंचाई से कम है ; या

                (ख) ऐसे उड़ाएगा जिससे किसी व्यक्ति को अनावश्यक क्षोभ हो या क्षोभ होना संभाव्य हो,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

31. किसी वायुयान के कप्तान के विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक के किसी वायुयान के या ऐसे किसी वायुयान के, जो तटरक्षक की सेवा में है, कप्तान द्वारा, चाहे वह कप्तान इस अधिनियम के अधीन हो या न हो, वायुयान को उड़ाने या उसका प्रबंध या सुरक्षा करने से संबंधित सभी बातों के बारे में दिए गए किसी विधिपूर्ण समादेश की अवज्ञा करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

32. मिथ्या अभियोग लगाना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

                (क) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई मिथ्या अभियोग यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाएगा कि ऐसा अभियोग मिथ्या है ; या

                (ख) किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई परिवाद करने में, कोई ऐसा कथन, जिससे ऐसे व्यक्ति के चरित्र पर प्रभाव पङता है, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए करेगा कि ऐसा कथन मिथ्या है या जानते हुए या जानबूझकर किसी तात्त्विक तथ्य को छिपाएगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

33. शासकीय दस्तावेजों का मिथ्याकरण तथा मिथ्या घोषणाएं करना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) अपने द्वारा तैयार की गई या हस्ताक्षरित किसी रिपोर्ट, विवरणी, सूची, प्रमाणपत्र, पुस्तक या अन्य दस्तावेज में या उसकी विषय-वस्तु में जिसकी यथार्थता अभिनिश्चित करना उसका कर्तव्य है, जानते हुए कोई मिथ्या या कपटपूर्ण कथन करेगा या करने में संसर्गी होगा ; या

() धोखा देने के आशय से, खंड () में वर्णित प्रकार की किसी दस्तावेज में जानते हुए कोई लोप करेगा या करने में संसर्गी होगा ; या

                (ग) जानते हुए और किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाने के आशय से या जानते हुए और कपट-वंचन करने के आशय से किसी ऐसी दस्तावेज को, जिसे परिरक्षित रखना या प्रस्तुत करना उसका कर्तव्य है, छिपा लेगा, विरूपित करेगा, परिवर्तित करेगा, या उसे लेकर भाग जाएगा ; या

(घ) जहां किसी बात के बारे में घोषणा करना उसका पदीय कर्तव्य है, वहां जानते हुए मिथ्या घोषणा करेगा ; या

(ङ) ऐसे कथन द्वारा जो मिथ्या है और जिसके मिथ्या होने का उसे या तो ज्ञान है या विश्वास है या जिसके सत्य होने का उसे विश्वास नहीं है अथवा किसी पुस्तक या अभिलेख में कोई मिथ्या प्रविष्टि करके या उसमें की मिथ्या प्रविष्टि का उपयोग करके अथवा मिथ्या कथन अन्तर्विष्ट करने वाली कोई दस्तावेज बनाकर अथवा कोई सही प्रविष्टि करने में या सत्य कथन अन्तर्विष्ट करने वाली दस्तावेज बनाने में लोप करके, अपने लिए या किसी अन्य व्यक्ति के लिए कोई पेंशन, भत्ता या अन्य फायदा या विशेषाधिकार अभिप्राप्त करेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

34. संपत्ति संबंधी अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

(क) सरकार की या तटरक्षक के किसी मेस या संस्था की या ऐसे किसी व्यक्ति की, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी संपत्ति की चोरी करेगा ; या

() ऐसी किसी सम्पत्ति का बेईमानी से दुर्विनियोग करेगा या उसको अपने उपयोग के लिए संपरिवर्तित करेगा ; या

                (ग) ऐसी किसी संपत्ति की बाबत आपराधिक न्यासभंग करेगा ; या

(घ) ऐसी किसी संपत्ति को जिसकी बाबत खंड (क), खंड (ख) और खंड (ग) के अधीन अपराधों में से कोई अपराध किया गया है, यह जानते हुए या यह विश्वास करने का कारण रखते हुए कि ऐसा अपराध किया गया है, बेईमानी से प्राप्त करेगा या रखे रहेगा ; या

(ङ) सरकार की किसी संपत्ति को, जो उसे सौंपी गई है, जानबूझकर नष्ट करेगा या नुकसान पहुंचाएगा ; या

(च) कपट-वंचन करने या किसी व्यक्ति को सदोष अभिलाभ या किसी अन्य व्यक्ति को सदोष हानि पहुंचाने के आशय से कोई अन्य बात करेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि दस वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

35. संपत्ति को नुकसान पहुंचना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई ऐसा कार्य करेगा जिससे सरकार की किसी संपत्ति को नुकसान पहुंचता है या वह नष्ट होती है, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, कारावास का, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

36. अप्राधिकृत माल को फलक पर ले लेना-तटरक्षक के किसी पोत का या किसी ऐसे पोत का जो तटरक्षक की सेवा में है, प्रत्येक कमान आफिसर या अधीनस्थ आफिसर, जो किसी ऐसे पोत के फलक पर के, जो खुले समुद्र में या किसी पत्तन, संकरी खाड़ी या बन्दरगाह में ध्वस्त हो गया है या आसन्न खतरे में है, माल या वाणिज्या को उसके उचित स्वामियों के लिए उसके परिरक्षण के प्रयोजन से प्राप्त करने या प्राप्त करने की अनुज्ञा देने के सिवाय अथवा ऐसे माल या वाणिज्या के सिवाय जिसे फलक पर लेने या प्राप्त करने के लिए केन्द्रीय सरकार या उसके वरिष्ठ आफिसर ने उसे किसी समय आदेश दिया है, किसी भी प्रकार के माल या वाणिज्या को पोत के या पोत पर व्यक्तियों के उपयोगार्थ से अन्यथा ऐसे पोत के फलक पर प्राप्त करेगा या प्राप्त करने की अनुज्ञा देगा, तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर तटरक्षक से पदच्युत किए जाने का या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

37. अभिरक्षा में लिए गए जलयान, यान या वायुयान से संबंधित कागज-पत्रों के बारे में अपराध-(1) सभी कागज-पत्र, पोत भाटक पत्र, वहन-पत्र, पासपोर्ट और अन्य दस्तावेजों का, जो तटरक्षक द्वारा अभिरक्षा में लिए गए किसी जलयान, यान या वायुयान के फलक पर लिए जाएं, अभिगृहीत किए जाएं या पाए जाएं, सम्यक् रूप से परिरक्षण किया जाएगा और कमान आफिसर या स्किपर उन्हें अपने अगले वरिष्ठ आफिसर के पास भेजेगा ।

(2) ऐसा प्रत्येक कमान आफिसर या स्किपर, जो उपधारा (1) में अपेक्षित रूप में दस्तावेजों को भेजने में असफल रहेगा, तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, तटरक्षक से पदच्युत किए जाने का या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

38. अभिरक्षा में लिए गए जलयान, यान या वायुयान की बाबत अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

() अभिरक्षा में लिए गए किसी जलयान, यान या वायुयान से, समुचित प्राधिकार के बिना, कोई धन या माल ले जाएगा ; या

() उक्त जलयान, यान या वायुयान के फलक पर किसी व्यक्ति को लूटेगा, पीटेगा या उससे दुर्व्यवहार करेगा ; या

(ग) ऐसे किसी जलयान, यान या वायुयान के फलक पर के माल को, उसमें की किसी चीज या उसकी किसी चीज का बेईमानी से दुर्विनियोग करने के आशय से, तोड़ेगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

39. विधिविरुद्ध फिरौती लेना-पोत का प्रत्येक कमान आफिसर या स्किपर, जो-

                (क) तटरक्षक द्वारा अभिरक्षा में लिए गए किसी जलयान, यान, वायुयान, माल या चीज को फिरौती लेकर छोड़ देने का करार किसी व्यक्ति के साथ विधिविरुद्ध रूप से करेगा ; या

() फिरौती लेकर छोड़ देने के किसी अवधि करार के अनुसरण में या अन्यथा दुस्संधि करके किसी ऐसे जलयान, यान, वायुयान, माल या चीज को, जिसे तटरक्षक द्वारा अभिरक्षा में लिया गया है, वस्तुतः छोड़ेगा या प्रत्यावर्तित करेगा,

तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

40. तटरक्षक न्यायालयों के संबंध में अपराध-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, निम्नलिखित अपराधों में से कोई अपराध करेगा, अर्थात् :-

                (क) किसी तटरक्षक न्यायालय के समक्ष साक्षी के रूप में हाजिर होने के लिए सम्यक् रूप से समन या आदिष्ट किए जाने पर हाजिर होने में जानबूझकर या उचित प्रतिहेतु के बिना, व्यतिक्रम करेगा ; या

                (ख) ऐसी कोई शपथ लेने से या प्रतिज्ञान करने से इन्कार करेगा, जिसके लिए जाने या किए जाने की तटरक्षक न्यायालय द्वारा वैध रूप से अपेक्षा की गई है ; या

() अपनी शक्ति या नियंत्रण में की कोई ऐसी दस्तावेज पेश या परिदत्त करने से इंकार करेगा जिसे पेश या परिदत्त किए जाने की तटरक्षक न्यायालय द्वारा वैध रूप से अपेक्षा की गई है ; या

() जब वह साक्षी है तब किसी ऐसे प्रश्न का उत्तर देने से इंकार करेगा जिसका उत्तर देने के लिए वह विधि द्वारा आबद्ध है ; या

(ङ) तटरक्षक न्यायालय के लिए अपमानजनक या धमकी भरी भाषा का प्रयोग करके या उसकी कार्यवाहियों में कोई विघ्न या विक्षोभ कारित करके उस न्यायालय के अवमान का दोषी होगा,

तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

41. अभिरक्षा से निकल भागना-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, विधिपूर्ण अभिरक्षा में होते हुए निकल भागेगा या निकल भागने का प्रयत्न करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा

42. अधिनियम, नियमों और आदेशों का अतिक्रमण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, इस अधिनियम के किसी उपबंध का या इस अधिनियम के अधीन किसी विधिपूर्ण प्राधिकारी द्वारा जारी किए गए किसी नियम या आदेश का पालन करने में उपेक्षा करेगा या उसका उल्लंघन करेगा, तो वह, उस दशा में जब ऐसी उपेक्षा या उल्लंघन के लिए इस अधिनियम में किसी अन्य दंड का उपबंध नहीं है, तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

43. अभ्यावेशन के समय मिथ्या उत्तर देना-यदि किसी व्यक्ति के बारे में, जो इस अधिनियम के अधीन हो गया है, यह पता चलता है कि उसने अपने अभ्यावेशन के समय अभ्यावेशन के लिए विहित प्ररूप में दिए गए किसी ऐसे प्रश्न का मिथ्या उत्तर जानबूझकर दिया था जो अभ्यावेशन करने वाले उस आफिसर ने उससे प्रश्न पूछा था, जिसके समक्ष वह अभ्यावेशन के प्रयोजन के लिए हाजिर हुआ था, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि पांच वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा

44. सुव्यवस्था और अनुशासन के विरुद्ध अपराध-यदि कोई व्यक्ति जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक की सुव्यवस्था और अनुशासन पर प्रतिकूल प्रभाव डालने वाले ऐसे कार्य या लोप या अव्यवस्था या उपेक्षा का दोषी होगा, जो इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट नहीं है, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर कारावास का, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा

45. प्रयत्न-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 44 तक में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से कोई अपराध करने का प्रयत्न करेगा और ऐसा प्रयत्न करने में उस अपराध के किए जाने की दिशा में कोई कार्य करेगा तो वह उस दशा में जबकि ऐसे प्रयत्न के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर,-

(क) यदि प्रयतित अपराध मृत्यु से दंडनीय है तो कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और

(ख) यदि प्रयतित अपराध कारावास से दंडनीय है तो कारावास का, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि से आधी तक हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

46. किए गए अपराधों का दुष्प्रेरण-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 44 तक में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर उस दशा में जबकि दुष्प्रेरित कार्य दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया है, उस अपराध के लिए उपबंधित कारावास का या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा

47. मृत्यु से दण्डनीय ऐसे अपराधों का दुष्प्रेरण जो नहीं किए गए हैं-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है,   धारा 17 के अधीन मृत्यु से दण्डनीय किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जबकि वह अपराध उस दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है, कारावास का, जिसकी अवधि चौदह वर्ष तक की हो सकेगी या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

48. कारावास से दण्डनीय ऐसे अपराधों का दुष्प्रेरण जो नहीं किए गए हैं-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 44 तक में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट और कारावास से दण्डनीय अपराधों में से किसी अपराध के किए जाने का दुष्प्रेरण करेगा, तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा दोषसिद्धि पर, उस दशा में जबकि वह अपराध ऐसे दुष्प्रेरण के परिणामस्वरूप नहीं किया गया है और ऐसे दुष्प्रेरण के दंड के लिए इस अधिनियम द्वारा कोई अभिव्यक्त उपबंध नहीं किया गया है, कारावास का, जिसकी अवधि उस अपराध के लिए उपबंधित दीर्घतम अवधि की आधी तक हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

49. सिविल अपराध-धारा 50 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, भारत में या भारत से बाहर किसी स्थान पर कोई सिविल अपराध करेगा, तो उसे इस अधिनियम के विरुद्ध अपराध का दोषी समझा जाएगा और यदि उस पर वह अपराध इस धारा के अधीन आरोपित किया जाता है तो वह तटरक्षक न्यायालय द्वारा विचारण किए जाने का और दोषसिद्धि पर, निम्नलिखित रूप से दण्डित किए जाने का भागी होगा, अर्थात् :-

(क) यदि अपराध ऐसा है जो भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन मृत्यु से दण्डनीय है, तो वह किसी ऐसे दण्ड का, जो उस अपराध के लिए पूर्वोक्त विधि द्वारा नियत किया गया है या ऐसे लघुतर दण्ड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ; और

(ख) किसी अन्य दशा में, वह किसी ऐसे दण्ड का, जो उस अपराध के लिए भारत में प्रवृत्त किसी विधि द्वारा नियत किया गया है, या कारावास का जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, या ऐसे लघुतर दंड का, जो इस अधिनियम में वर्णित है, भागी होगा ।

50. सिविल अपराध, जो तटरक्षक न्यायालय द्वारा विचारणीय नहीं हैं-यदि कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध जो इस अधिनियम के अधीन नहीं है, हत्या का या हत्या की कोटि में न आने वाले आपराधिक मानववध का या ऐसे व्यक्ति से बलात्संग करने का अपराध करेगा, तो उसे इस अधिनियम के विरुद्ध किसी अपराध का दोषी तभी समझा जाएगा और तटरक्षक न्यायालय द्वारा उसका विचारण तभी किया जाएगा जबकि वह उक्त अपराधों में से कोई अपराध-

                (क) भारत के बाहर किसी स्थान पर करता है ; या

                (ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट किसी स्थान पर करता है ।

51. अधिनियम के अधीन अपराधों के विचारण के लिए परिसीमाकाल-(1) किसी ऐसे व्यक्ति का, जो ऐसा अपराधी नहीं है जिसने पकड़े जाने से अपने को बचा लिया है या जो गिरफ्तारी से बचा है अथवा जिसने अभित्यजन या अभ्यावेशन के समय मिथ्या प्रविष्टि या विद्रोह का अपराध किया है, उसके द्वारा किए गए किसी अपराध के लिए इस अधिनियम के अनुसरण में तभी विचारण किया जाएगा या उसे तभी दण्डित किया जाएगा जबकि ऐसा विचारण  [ऐसे अपराध के किए जाने से तीन वर्ष के भीतर प्रारंभ कर दिया जाता है, अन्यथा नहीं और ऐसी कालावधि का प्रारंभ,-

(क) अपराध की तारीख को ; या

() जहां अपराध से व्यथित व्यक्ति या कार्रवाई प्रारंभ करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को अपराध के किए जाने की जानकारी नहीं थी, उस पहले दिन को, जिसको ऐसे व्यक्ति या प्राधिकारी को ऐसे अपराध की जानकारी होती है ; या

(ग) जहां इस बात की जानकारी नहीं है कि किसके द्वारा अपराध किया गया था, उस पहले दिन को, जिसको अपराध से व्यथित व्यक्ति यह कार्रवाई प्रारंभ करने के लिए सक्षम प्राधिकारी को अपराधी की पहचान होती है,

इनमें से जो भी पूर्वतर हो, होगा ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए, इस उपधारा में वर्णित कालावधि की संगणना करने में ऐसे किसी व्यक्ति द्वारा, युद्ध कैदी के रूप में शत्रु राज्यक्षेत्र में या अपराध के करने के पश्चात् गिरफ्तारी से बचने में व्यतीत किया गया कोई समय अपवर्जित किया जाएगा ।]

 [(1क) जहां किसी अपराध के संबंध में कोई कार्यवाही न्यायालय के किसी व्यादेश या आदेश द्वारा रोक दी गई है, वहां इस धारा के अधीन परिसीमा की कालावधि की संगणना करने में व्यादेश या आदेश के चालू रहने की कालावधि, वह दिन, जिसको वह जारी किया गया या दिया गया था और वह दिन जिसको वह वापस लिया गया था, अपवर्जित किया जाएगा ।]

(2) अभित्यजन या अभ्यावेशन के समय मिथ्या प्रविष्टि करने के अपराध के लिए कोई विचारण उस दशा में प्रारम्भ नहीं किया जाएगा, जबकि प्रश्नगत व्यक्ति ने, जो आफिसर नहीं है, अपराध किए जाने के पश्चात् तटरक्षक में कम से कम तीन वर्ष तक अनुकरणीय रीति से निरन्तर सेवा की है ।

52. इस अधिनियम के अधीन रह जाने की दशा में किसी व्यक्ति का विचारण, आदि-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी व्यक्ति द्वारा उस समय किया गया था जब वह इस अधिनियम के अधीन था और वह व्यक्ति अपराध किए जाने के पश्चात् इस अधिनियम के अधीन नहीं रह गया है, वहां उसे उसी प्रकार तटरक्षक न्यायालय की अभिरक्षा में लिया और रखा जा सकेगा और ऐसे अपराध के लिए उसका विचारण और उसे दण्डित किया जा सकेगा मानो वह इस अधिनियम के अधीन ही बना रहा है ।

(2) ऐसे किसी व्यक्ति का ऐसे अपराध के लिए विचारण तभी किया जाएगा जबकि ऐसा विचारण उस व्यक्ति के  [इस अधिनियम के अधीन न रह जाने के पश्चात् दो वर्ष की कालावधि के भीतर प्रारंभ कर दिया जाता है, अन्यथा नहीं ; और ऐसी कालावधि की संगणना करने में वह समय जिसके दौरान ऐसा व्यक्ति फरार रह कर या स्वयं को छिपाकर गिरफ्तारी से बचा है या जहां अपराध के संबंध में कार्यवाही किसी व्यादेश या आदेश द्वारा रोक दी गई है वहां व्यादेश या आदेश के चालू रहने की कालावधि, वह दिन, जिसको वह जारी किया गया या दिया गया था और वह दिन, जिसको वह वापस लिया गया था, अपवर्जित किया जाएगा ;]

परन्तु इस उपधारा की कोई बात विद्रोह या अभित्यजन के अपराध के लिए ऐसे किसी व्यक्ति के विचारण को लागू नहीं होगी ।

अध्याय 5

दंड

53. तटरक्षक न्यायालयों द्वारा अधिनिर्णेय दंड-(1) ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो तटरक्षक न्यायालयों द्वारा दोषसिद्ध किए गए हैं, किए गए अपराधों के बारे में निम्नलिखित मापमान के अनुसार दण्ड दिए जा सकेंगे, अर्थात् :-

                (क) मृत्यु ;

                (ख) कारावास, जो आजीवन या किसी अन्य लघुतर अवधि का हो सकेगा ;

                (ग) तटरक्षक से पदच्युति ;

                (घ) तटरक्षक की अभिरक्षा में ऐसी अवधि के लिए निरोध जो दो वर्ष से अधिक की नहीं है ;

                (ङ) नौसैनिक की दशा में सामान्य सैनिक के रूप में या निम्नतर रैंक पर अवनति ;

(च) रैंक में ज्येष्ठता का समपहरण, सेवा की पूर्ण अवधि का या उसके किसी भाग का समपहरण जिससे उसे प्रोन्नति के प्रयोजन के लिए न गिना जाए ;

() सेवा की अवधि का इसलिए समपहरण कि उसे वेतनवृद्धि, पेंशन या किसी अन्य विहित प्रयोजन के लिए गिना जाए

(ज) सिविल अपराधों की बाबत जुर्माना ;

                (झ) वेतन और भत्तों में कटौती ;

(ञ) तीव्र धिग्दण्ड या धिग्दण्ड, किन्तु उत्तम नाविक या उत्तम यांत्रिक के रैंक से नीचे के व्यक्तियों को नहीं ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्रत्येक दण्ड, उपर्युक्त मापमान में अपने से पूर्ववर्ती प्रत्येक दण्ड से कोटि में निम्नतर समझा जाएगा ।

54. तटरक्षक न्यायालयों द्वारा अधिनिर्णेय आनुकल्पिक दण्ड-इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, तटरक्षक न्यायालय ऐसे किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, धारा 15 से धारा 48 तक में (जिनमें ये दोनों धाराएं भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट अपराधों में से किसी के लिए दोषसिद्ध किए जाने पर, या तो वह विशिष्ट दण्ड जिससे उस अपराध के दण्डनीय होने का कथन उक्त धाराओं में है या उसके बदले में, धारा 53 में दिए गए दण्डों में से कोई निम्नतर मापमान का दण्ड, अपराध की प्रकृति और गम्भीरता को ध्यान में रखते हुए, अधिनिर्णीत कर सकेगा ।

55. दंडों का संयोजन-धारा 58 के उपबंधों के अधीन रहते हुए तटरक्षक न्यायालय के दंडादेश द्वारा, किसी अन्य दंड के अतिरिक्त या उसके बिना, धारा 53 की उपधारा (1) के खंड (ग) में विनिर्दिष्ट दंड और उस उपधारा के खंड (ङ) से खंड (ञ) तक में (जिनमें ये दोनों खंड भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट दंडों में से कोई एक या अधिक दंड अधिनिर्णीत किए जा सकेंगे ।

56. तटरक्षक न्यायालय द्वारा दंडित किए जाने से अन्यथा दंडित किया जाना-ऐसे व्यक्तियों द्वारा, जो इस अधिनियम के अधीन हैं, किए गए अपराधों के बारे में दंड तटरक्षक न्यायालय के मध्यक्षेप के बिना धारा 57  [या धारा 57क] में कथित रीति से भी दिए जा सकेंगे ।

57. लघु दंड-धारा 58 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, कोई कमान आफिसर या ऐसा अन्य आफिसर, जिसे केन्द्रीय सरकार की सहमति से महानिदेशक विनिर्दिष्ट करे, ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो आफिसर नहीं है और जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप है, विहित रीति से कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति को निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड विहित विस्तार तक अधिनिर्णीत कर सकेगा, अर्थात् :-

                (क) कारावास से, जिसकी अवधि तीन मास से अधिक की नहीं होगी ;

                (ख) तटरक्षक से पदच्युति ;

                (ग) तटरक्षक की अभिरक्षा में निरोध, जिसकी अवधि तीन मास से अधिक की नहीं होगी ;

                (घ) नौसैनिकों की दशा में, सामान्य सैनिक के रूप में या निम्नतर रैंक पर अवनति ;

                (ङ) सिविल अपराधों की बाबत जुर्माना ;

                (च) वेतन और भत्तों में कटौती ;

                (छ) सदाचरण के बिल्लों से वंचित किया जाना ;

                (ज) धिग्दंड ;

                (झ) उत्तम नाविक या उत्तम यांत्रिक से नीचे के रैंक के व्यक्तियों की दशा में, अतिरिक्त काम तथा परेड, जो चौदह दिन से अधिक की नहीं होगी ;

                (ञ) छुट्टी का ऐसी अवधि के लिए रोका जाना जो साठ दिन से अधिक की नहीं होगी ;

                (ट) भर्त्सना :

परन्तु खंड (क) में (घ) तक में (जिनमें ये दोनों खंड भी सम्मिलित हैं) विनिर्दिष्ट कोई दंड :-

                (क) अधीनस्थ आफिसर की दशा में, तभी दिया जाएगा जबकि उसका अनुमोदन ऐसे आफिसर द्वारा कर दिया जाता है जो महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, अन्यथा नहीं ; और

                (ख) अन्य व्यक्तियों की दशा में, तभी दिया जाएगा जबकि उसका अनुमोदन ऐसे आफिसर द्वारा कर दिया जाता है जो उप-महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, अन्यथा नहीं ।

 [57क. कमांडेंट के रैंक के नीचे के आफिसरों को दंड-(1) महानिदेशक या कोई आफिसर, जो उप-महानिदेशक से नीचे की रैंक का नहीं है, जिसे किसी क्षेत्र का कमांडर नियुक्त किया जाता है या ऐसा अन्य आफिसर, जो केन्द्रीय सरकार की सहमति से महानिदेशक द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाता है, विहित रीति से किसी ऐसे आफिसर के विरुद्ध जो कमांडेंट की रैंक से नीचे का है जिस पर इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का आरोप लगाया गया है, कार्यवाही कर सकेगा और ऐसे व्यक्ति को निम्नलिखित दंडों में से एक या अधिक दंड दे सकेगा, अर्थात् :-

() रैंक में ज्येष्ठता का समपहरण या उनमें से किसी भी दशा में, जिसकी प्रोन्नति सेवा काल पर निर्भर करती है, प्रोन्नति के प्रयोजनों के लिए बारह मास से अनधिक की कालावधि के लिए सेवा का समपहरण, किन्तु यह अधिनिर्णय के पूर्व तटरक्षक न्यायालय द्वारा विचारण किए जाने का चयन करने के अभियुक्त के अधिकार के अधीन होगा ;

() रैंक में ज्येष्ठता का समपहरण या उनमें से किसी भी दशा में, जिसकी प्रोन्नति सेवा काल पर निर्भर करती है, प्रोन्नति के प्रयोजनों के लिए छह मास से अनधिक की कालावधि के लिए सेवा का समपहरण, किन्तु यह अधिनिर्णय के पूर्व तटरक्षक न्यायालय द्वारा विचारण किए जाने का चयन करने के अभियुक्त के अधिकार के अधीन होगा ;

                (ग) वेतन और भत्तों की कटौती ;

                (घ) तीव्र धिग्दंड ;

परन्तु खंड () में विनिर्दिष्ट कोई दंड महानिदेशक से भिन्न किसी आफिसर द्वारा अधिरोपित नहीं किया जाएगा :

                परन्तु यह और कि खंड (ख) में विनिर्दिष्ट कोई दंड किसी ऐसे आफिसर द्वारा जो उप-निरीक्षक से नीचे की रैंक का हो, जिसे किसी क्षेत्र का कमांडर नियुक्त किया जाता है, अधिरोपित नहीं किया जाएगा ।]

58. दंड अधिनिर्णीत किए जाने के विषय में उपबंध-(1) वे दंड, जो इस अधिनियम के अधीन दिए जा सकेंगे, इस धारा के उपबंधों के अनुसार अधिनिर्णीत किए जाएंगे ।

(2) ऐसे सभी मामलों में, जिनमें इस अधिनियम के अधीन कारावास का दंडादेश दिया जाता है, उसके साथ पदच्युति का दंडादेश भी होगा ।

(3) कारावास का दंडादेश कठिन या सादे या अंशतः कठिन और अंशतः सादे कारावास के लिए हो सकेगा ।

(4) किसी आफिसर को इस अधिनियम, के अधीन किसी अपराध के लिए निरुद्ध नहीं किया जाएगा ।

(5) किसी भी अधीनस्थ आफिसर को अभित्यजन के सिवाय किसी अन्य अपराध के लिए निरोध का दंडादेश नहीं दिया जाएगा

(6) निरोध के किसी दंडादेश के साथ तटरक्षक से पदच्युति का दंडादेश नहीं होगा ।

(7) ऐसे सभी मामलों में, जिनमें चौदह दिन से अधिक की अवधि के निरोध का दंडादेश दिया जाता है, निरोध की अवधि के दौरान वेतन और भत्ते रोकने का भी दंडादेश दिया जाएगा ।

 [(8) जहां वेतन और भत्तों की कटौती, बिना छुट्टी अनुपस्थिति के लिए की जाती है वहां अनुपस्थिति सभी प्रयोजनों के लिए विनियमित की गई समझी जाएगी ।

अध्याय 6

गिरफ्तारी तथा विचारण के पूर्व की कार्यवाहियां

59. अपराधियों की अभिरक्षा-(1) यदि किसी व्यक्ति पर, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी अपराध का आरोप है, तो उसे किसी वरिष्ठ आफिसर के आदेश से तटरक्षक की अभिरक्षा में लिया जा सकेगा ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, कोई आफिसर यह आदेश दे सकेगा कि किसी ऐसे अन्य आफिसर को, भले ही वह उच्चतर रैंक का हो, जो झगड़ा, दंगा या उपद्रव करने में लगा हो, तटरक्षक की अभिरक्षा में ले लिया जाए

60. निरोध के संबंध में कमान आफिसर का कर्तव्य-(1) प्रत्येक कमान आफिसर का यह कर्तव्य होगा कि वह इस बात की सतर्कता बरते कि जब उसके समादेशाधीन किसी व्यक्ति पर किसी अपराध का आरोप लगाया जाता है तब उस व्यक्ति को, उस आरोप का अन्वेषण किए गए बिना, उस समय के पश्चात् जब उसको अभिरक्षा में सुपुर्द किए जाने की रिपोर्ट ऐसे आफिसर को दी गई है, अड़तालीस घंटे से अधिक के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध तभी रखा जाए जबकि अड़तालीस घंटे के अन्दर ऐसे अन्वेषण का किया जाना लोक सेवा की दृष्टि से उसे असाध्य प्रतीत होता है, अन्यथा नहीं ।

(2) कमान आफिसर ऐसे प्रत्येक व्यक्ति के मामले की, जिसे अड़तालीस घंटे से अधिक की अवधि के लिए अभिरक्षा में निरुद्ध रखा गया है, और ऐसे निरुद्ध रखे जाने के कारणों की रिपोर्ट उस उप-महानिरीक्षक को, जिसके अधीन वह सेवा कर रहा है या ऐसे अन्य आफिसर को देगा जिसको, उस व्यक्ति का जिस पर आरोप है, विचारण करने के लिए तटरक्षक न्यायालय संयोजित करने का आवेदन किया जा सकेगा ।

(3) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अड़तालीस घंटे की अवधि की गणना करने में, रविवार और अन्य लोक अवकाश दिन नहीं गिने जाएंगे ।

(4) इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय सरकार उस रीति और उस अवधि का उपबन्ध करने वाले नियम बना सकेगी जिस रीति से और जिस अवधि के लिए कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है उसके द्वारा किए गए किसी अपराध के लिए किसी सक्षम प्राधिकारी द्वारा विचारण लंबित रहने तक तटरक्षक की अभिरक्षा में लिया जा सकेगा और निरुद्ध रखा   जा सकेगा ।

61. सिविल प्राधिकारियों द्वारा गिरफ्तारी-जब कभी कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का अभियुक्त है, किसी मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर की अधिकारिता के अंदर है तब वह मजिस्ट्रेट या पुलिस आफिसर उस व्यक्ति के कमान आफिसर द्वारा या ऐसे आफिसर द्वारा, जिसे कमान आफिसर ने इस निमित्त प्राधिकृत किया है, हस्ताक्षरित उस भाव का लिखित आवेदन प्राप्त होने पर उसके पकड़े जाने और तटरक्षक की अभिरक्षा में दिए जाने में सहायता करेगा ।

62. अभित्याजकों को पकड़ना-(1) जब कभी कोई ऐसा व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन करता है, तब उस यूनिट या पोत का, जिसका वह सदस्य है, कमान आफिसर ऐसे अभित्यजन की इत्तिला ऐसे सिविल प्राधिकारियों को देगा जो उसकी राय में अभित्याजक को पकड़ने में सहायता देने में समर्थ हैं और तब वे प्राधिकारी उक्त अभित्याजक को पकड़ने के लिए उसी रीति से कार्रवाई करेंगे मानो वह ऐसा व्यक्ति है जिसे पकड़ने के लिए किसी मजिस्ट्रेट द्वारा वारंट निकाला गया है और अभित्याजक को पकड़ लिए जाने पर उसे तटरक्षक की अभिरक्षा में दे देंगे ।

(2) कोई भी पुलिस आफिसर किसी ऐसे व्यक्ति को जिसके बारे में युक्तियुक्त रूप से यह विश्वास है कि वह इस अधिनियम के अधीन है और अभित्याजक है या प्राधिकार के बिना यात्रा कर रहा है, बिना वारंट गिरफ्तार कर सकेगा और उसके साथ विधि के अनुसार बर्ताव किए जाने के लिए उसे अविलंब निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष लाएगा

63. तटरक्षक के पुलिस आफिसर-(1) महानिदेशक या कोई विहित आफिसर उपधारा (2) और उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट कृत्यों का निर्वहन करने के लिए व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति के कर्तव्य हैं-किसी अपराध के लिए परिरुद्ध व्यक्तियों को अपने भारसाधन में लेना, तटरक्षक में सेवा करने वाले या उससे संलग्न व्यक्तियों में सुव्यवस्था और अनुशासन बनाए रखना तथा उनके द्वारा उसका भंग किया जाना निवारित करना ।

(3) धारा 59 में किसी बात के होते हुए भी, उपधारा (1) के अधीन नियुक्त व्यक्ति किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है और जो कोई अपराध करता है या जिस पर किसी अपराध का आरोप है, विचारण के लिए किसी भी समय गिरफ्तार और निरुद्ध कर सकेगा तथा तटरक्षक न्यायालय द्वारा या किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो धारा 57 के अधीन प्राधिकार का प्रयोग कर रहा है, अधिनिर्णीत दंडादेश के अनुसरण में दंड को कार्यान्वित भी कर सकेगा, किन्तु वह अपने प्राधिकार से कोई दंड नहीं देगा :

परन्तु किसी आफिसर को किसी अन्य आफिसर के आदेश पर ही इस प्रकार गिरफ्तार या निरुद्ध किया जाएगा, अन्यथा नहीं

अध्याय 7

तटरक्षक न्यायालय

64. तटरक्षक न्यायालय संयोजित करने की शक्ति-(1) तटरक्षक न्यायालय, केन्द्रीय सरकार द्वारा या महानिदेशक द्वारा या महानिदेशक के अधिपत्र से इस निमित्त सशक्त किए गए किसी आफिसर द्वारा (जिसे इस अधिनियम में इसके पश्चात् संयोजक प्राधिकारी कहा गया है) संयोजित किया जा सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन जारी किए गए अधिपत्र में ऐसे निर्बंधन, आरक्षण या शर्तें हो सकेंगी जो महानिदेशक उचित समझे

65. तटरक्षक न्यायालय की संरचना-(1) तटरक्षक न्यायालय कम से कम पांच ऐसे आफिसरों से मिलकर बनेगा जिनमें से प्रत्येक कम से कम तीन वर्ष तक सहायक कमांडेंट का पद धारण कर चुका हो ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के प्रयोजनों के लिए सहायक कमांडेंट" के अन्तर्गत उससे उच्चतर रैंक का कोई पद और ऐसा कोई पद, जिसे केन्द्रीय सरकार ने अधिसूचना द्वारा उसके बराबर का पद घोषित कर दिया है तथा इस प्रकार घोषित पद से रैंक में उच्चतर कोई पद भी है ।

(2) प्रत्येक तटरक्षक न्यायालय में उसका वरिष्ठतम सदस्य पीठासीन आफिसर होगा ।

(3) कोई तटरक्षक न्यायालय तभी सम्यक् रूप से गठित होगा जबकि उसके सदस्य कम से कम दो पोतों से लिए गए हों, अन्यथा नहीं ।

(4) कोई तटरक्षक न्यायालय किसी आफिसर के विचारण के लिए तभी सम्यक् रूप से गठित होगा जबकि न्यायालय का पीठासीन आफिसर और कम से कम दो सदस्य उसी रैंक के हैं, जिस रैंक का अभियुक्त है या उससे उच्चतर रैंक के हैं, अन्यथा नहीं ।

66. तटरक्षक न्यायालय का विघटन-(1) यदि विचारण प्रारंभ होने के पश्चात् किसी तटरक्षक न्यायालय में उन आफिसरों की संख्या, जिनसे मिलकर वह बना है, उस न्यूनतम संख्या से, जो इस अधिनियम द्वारा अपेक्षित है, कम हो जाती है तो उसे विघटित कर दिया जाएगा ।

(2) यदि निष्कर्ष निकलने के पहले विधि आफिसर या अभियुक्त की रुग्णता के कारण विचारण चलाते रहना असंभव हो जाता है जो तटरक्षक न्यायालय को विघटित कर दिया जाएगा ।

(3) यदि तटरक्षक न्यायालय का संयोजक प्राधिकारी यह समझता है कि सेवा की अत्यावश्यकताओं या अनुशासनिक आवश्यकताओं के कारण उक्त तटरक्षक न्यायालय का चालू रहना असंभव या असमीचीन हो गया है तो वह ऐसे न्यायालय को विघटित कर सकेगा ।

(4) जहां कि तटरक्षक न्यायालय को इस धारा के अधीन विघटित कर दिया जाता है वहां अभियुक्त का विचारण फिर से किया जा सकेगा ।

67. तटरक्षक न्यायालय की शक्तियां-प्रत्येक तटरक्षक न्यायालय को किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, ऐसे अपराध के लिए, जो उसके अधीन दंडनीय है, विचारण करने और उसके द्वारा प्राधिकृत कोई दंडादेश पारित करने की शक्ति होगी ।

68. द्वितीय विचारण का प्रतिषेध-(1) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी तटरक्षक न्यायालय द्वारा या दंड न्यायालय द्वारा किसी अपराध से दोषमुक्त या उसके लिए दोषसिद्ध कर दिया गया है या उसके बारे में धारा 57 के अधीन कार्यवाही कर दी गई है, तब वह उसी अपराध के लिए तटरक्षक न्यायालय द्वारा पुनः विचारण किए जाने या उक्त धारा के अधीन पुनः कार्यवाही किए जाने के दायित्व के अधीन नहीं होगा

(2) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, किसी तटरक्षक न्यायालय द्वारा किसी अपराध से दोषमुक्त या उसके लिए दोषसिद्ध कर दिया गया है या उसके बारे में धारा 57 के अधीन कोई कार्यवाही कर दी गई है तब वह उसी अपराध के लिए या उन्हीं तथ्यों पर किसी दंड न्यायालय द्वारा पुनः विचारण के दायित्व के अधीन नहीं होगा ।

69. दंडादेश की अवधि के दौरान अधिनियम का लागू होना-(1) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, कोई तटरक्षक न्यायालय कारावास का दंडादेश देता है तब यह अधिनियम उसके दंडादेश की अवधि के दौरान उसे लागू होगा, भले ही उसे तटरक्षक से पदच्युत कर दिया गया है या वह अन्यथा इस अधिनियम के अधीन नहीं रह गया है और उसे ऐसे रखा, हटाया या कारावासित और दंडित किया जा सकेगा मानो वह इस अधिनियम के अधीन बना रहा है ।

(2) जब किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक न्यायालय द्वारा मृत्यु दंडादेश दिया जाता है तब यह अधिनियम उसे तब तक लागू होगा जब तक कि वह दंडादेश कार्यान्वित नहीं कर दिया जाता ।

70. विचारण का स्थान-तटरक्षक न्यायालय समुद्र तट पर या पोत पर अधिविष्ट हो सकेगा ।

71. दंड न्यायालय और तटरक्षक न्यायालय में से किसी एक का चयन-जब किसी अपराध के संबंध में दंड न्यायालय और तटरक्षक न्यायालय में से प्रत्येक को अधिकारिता है तब यह विनिश्चय करना कि कार्यवाहियां किस न्यायालय के समक्ष संस्थित की जाएं, उस महानिदेशक या महानिरीक्षिक या उप-महानिरीक्षक के, जिसके कमान में अभियुक्त व्यक्ति सेवा कर रहा है या ऐसे अन्य आफिसर के, जो विहित किया जाए विवेकाधीन होगा और यदि वह आफिसर यह विनिश्चय करता है कि कार्यवाहियां तटरक्षक न्यायालय के समक्ष संस्थित की जाएं, तो यह निदेश देना कि अभियुक्त व्यक्ति को तटरक्षक की अभिरक्षा में निरुद्ध किया जाए, उसके विवेकाधीन होगा

72. दंड न्यायालय की यह अपेक्षा करने की शक्ति कि अपराधी सौंपा जाए-(1) जब अधिकारिता रखने वाले दंड न्यायालय की यह राय है कि किसी अभिकथित अपराध के बारे में कार्यवाहियां उसी के समक्ष संस्थित की जानी चाहिएं, तब वह लिखित सूचना द्वारा धारा 71 में निर्दिष्ट आफिसर से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह स्वविकल्प से या तो अपराधी को विधि के अनुसार उसके विरुद्ध कार्यवाही किए जाने के लिए किसी निकटतम मजिस्ट्रेट को सौंप दे या जब तक कि केन्द्रीय सरकार को निर्देश नहीं कर दिया जाता तब तक के लिए कार्यवाहियों को मुल्तवी कर दे

(2) ऐसे प्रत्येक मामले में उक्त आफिसर या तो उस अध्यपेक्षा के अनुपालन में अपराधी को सौंप देगा या इस प्रश्न को कि कार्यवाहियां किस न्यायालय के समक्ष संस्थित की जानी हैं, केन्द्रीय सरकार को उसके द्वारा अवधारण के लिए तत्क्षण निर्देशित करेगा और ऐसे निर्देश पर केन्द्रीय सरकार का आदेश अंतिम होगा ।

अध्याय 8

तटरक्षक न्यायालयों की प्रक्रिया

73. विधि आफिसर-प्रत्येक तटरक्षक न्यायालय में एक विधि आफिसर या यदि ऐसा कोई आफिसर उपलब्ध नहीं है तो मुख्य विधि आफिसर या विधि आफिसर द्वारा अनुमोदित कोई आफिसर हाजिर रहेगा ।

74. आक्षेप-(1) तटरक्षक न्यायालय द्वारा सभी विचारणों में, जैसे ही न्यायालय समवेत हो वैसे ही, पीठासीन आफिसर और सदस्यों के नाम अभियुक्त को पढ़कर सुनाए जाएंगे और तब उससे यह पूछा जाएगा कि क्या वह न्यायालयासीन किसी आफिसर द्वारा अपनी विचारण किए जाने पर आक्षेप करता है ।

(2) यदि अभियुक्त किसी ऐसे आफिसर के बारे में आक्षेप करता है तो उसका आक्षेप और उस पर उस आफिसर का, जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, उत्तर भी सुना और अभिलिखित किया जाएगा और न्यायालय के बाकी आफिसर, उस आक्षेप पर उस आफिसर की अनुपस्थिति में, जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, विनिश्चिय करेंगे

(3) यदि आक्षेप मतदान करने के हकदार आफिसरों में से आधे या उससे अधिक आफिसरों के मतों से मंजूर कर लिया जाता है तो आक्षेप मंजूर किया जाएगा और वह सदस्य, जिसके बारे में आक्षेप किया गया है, निवृत हो जाएगा और उस रिक्ति को विहित रीति से किसी अन्य आफिसर से, इस शर्त के अधीन रहते हुए भरा जाएगा कि अभियुक्त को उसके बारे में भी आक्षेप करने का वही अधिकार होगा ।

(4) जब कोई आक्षेप नहीं किया गया है या जब आक्षेप किया गया है और उसे नामंजूर कर दिया गया है या ऐसे प्रत्येक आफिसर का स्थान, जिसके बारे में सफलतापूर्वक आक्षेप किया गया है, किसी अन्य ऐसे आफिसर से भर दिया गया है जिसके बारे में कोई आक्षेप नहीं किया गया है या मंजूर नहीं किया गया है, तब न्यायालय विचारण के लिए अग्रसर होगा ।

75. सदस्य, विधि आफिसर और साक्षी को शपथ दिलाना-(1) इसके पूर्व कि विचारण प्रारम्भ हो, तटरक्षक न्यायालय के प्रत्येक सदस्य को और, यथास्थिति, विधि आफिसर या धारा 73 के अधीन अनुमोदित आफिसर को विहित रीति से शपथ दिलाई जाएगी या उससे प्रतिज्ञान कराया जाएगा ।

(2) तटरक्षक न्यायालय के समक्ष साक्ष्य देने वाले  [व्यक्तिट की परीक्षा विहित प्ररूप में सम्यक् रूप से उसे शपथ दिलाने या उससे प्रतिज्ञान कराने के पश्चात् की जाएगी ।

(3) उपधारा (2) के उपबन्ध वहां लागू नहीं होंगे जहां कि साक्षी बारह वर्ष से कम आयु का बालक है और तटरक्षक न्यायालय की यह राय है कि यद्यपि साक्षी सत्य बोलने के कर्तव्य को समझता है तथापि वह शपथ या प्रतिज्ञान की प्रकृति को नहीं समझता ।

76. सदस्यों द्वारा मतदान-(1) उपधारा (2) और (3) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, तटरक्षक न्यायालय का प्रत्येक विनिश्चय स्पष्ट बहुमत से पारित किया जाएगा और जहां या तो निष्कर्ष या दंडादेश के बारे में मत बराबर हैं वहां विनिश्चय अभियुक्त के पक्ष में होगा ।

(2) तटरक्षक न्यायालय द्वारा मृत्यु दंडादेश उस न्यायालय के कम से कम दो-तिहाई सदस्यों की सहमति के बिना पारित नहीं किया जाएगा

(3) आक्षेप या निष्कर्ष या दंडादेश के मामलों से भिन्न मामलों में, पीठासीन आफिसर को निर्णायक मत देने का अधिकार होगा

77. साक्ष्य के बारे में साधारण नियम-भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, तटरक्षक न्यायालय के समक्ष की सब कार्यवाहियों को लागू होगा ।

78.  न्यायिक अवेक्षा-तटरक्षक न्यायालय किसी ऐसी बात की न्यायिक अवेक्षा कर सकेगा जो तटरक्षक के आफिसरों के रूप में सदस्यों के साधारण ज्ञान में होती है ।

79. साक्षियों को समन करना-(1) संयोजक प्राधिकारी, तटरक्षक न्यायालय का पीठासीन आफिसर या, यथास्थिति, विधि आफिसर या धारा 73 के अधीन अनुमोदित आफिसर या अभियुक्त व्यक्ति का कमान आफिसर स्वहस्ताक्षरित समन द्वारा किसी व्यक्ति की या तो साक्ष्य देने के लिए या कोई दस्तावेज या अन्य वस्तु पेश करने के लिए उस समय और स्थान पर, जो समन में वर्णित किया जाए, हाजिरी की अपेक्षा कर सकेगा

(2) उस साक्षी की दशा में, जो इस अधिनियम के अधीन है, समन उसके कमान आफिसर को भेजा जाएगा और वह आफिसर उसकी उस पर तदनुसार तामील करेगा ।

(3) किसी अन्य साक्षी की दशा में, समन उस मजिस्ट्रेट का भेजा जाएगा जिसकी अधिकारिता के अन्दर वह है या निवास करता है और वह मजिस्ट्रेट समन को ऐसे कार्यान्वित करेगा मानो साक्षी से उस मजिस्ट्रेट के न्यायालय में आने की अपेक्षा की गई हो ।

(4) जब किसी साक्षी से उसके कब्जे या शक्ति में की किसी विशिष्ट दस्तावेज या अन्य वस्तु को पेश करने की अपेक्षा की जाती है तब समन में उचित प्रमितता के साथ उसका वर्णन किया जाएगा ।

80. पेश किए जाने से छूट प्राप्त दस्तावेजें-(1) धारा 79 की कोई भी बात भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) की धारा 123 और धारा 124 के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली अथवा डाक या तार प्राधिकारियों की अभिरक्षा में के किसी पत्र, पोस्टकार्ड, तार या अन्य दस्तावेज को लागू होने वाली नहीं समझी जाएगी ।

(2) यदि किसी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय की राय में ऐसी अभिरक्षा में की किसी दस्तावेज की किसी तटरक्षक न्यायालय के प्रयोजन के लिए आवश्यकता है तो वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसी दस्तावेज ऐसे व्यक्ति को परिदत्त करें जिसे वह मजिस्ट्रेट या न्यायालय निर्दिष्ट करे ।

(3) यदि किसी अन्य मजिस्ट्रेट या किसी पुलिस आयुक्त या जिला पुलिस अधीक्षक की राय में किसी ऐसी दस्तावेज की ऐसे ही किसी प्रयोजन के लिए आवश्यकता है तो वह, यथास्थिति, डाक या तार प्राधिकारियों से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वे ऐसी दस्तावेज की तलाश कराएं और उसे ऐसे किसी मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट, सेशन न्यायालय या उच्च न्यायालय के आदेश होने तक उसे रोके रखें ।

81. साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन-(1) जब कभी तटरक्षक न्यायालय द्वारा किए जा रहे विचारण के दौरान न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि न्याय के उद्देश्यों के लिए यह आवश्यक है कि किसी साक्षी की परीक्षा की जाए और ऐसे साक्षी की हाजिरी इतने विलम्ब, व्यय या असुविधा के बिना, जितना कि मामले की परिस्थितियों में अनुचित होगा, नहीं कराई जा सकती है तब ऐसा न्यायालय मुख्य विधि आफिसर को संबोधित कर सकेगा कि उस साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए कमीशन निकाला जाए ।

(2) तब, यदि मुख्य विधि आफिसर यह आवश्यक समझता है तो, वह साक्षी का साक्ष्य लेने के लिए किसी ऐसे महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग के न्यायिक मजिस्ट्रेट के नाम, जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर वह साक्षी निवास करता है, कमीशन निकाल सकेगा ।

(3) वह मजिस्ट्रेट जिसके नाम कमीशन निकाला गया है या, यदि वह मुख्य महानगर मजिस्ट्रेट या मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट है तो, वह या ऐसा महानगर मजिस्ट्रेट या प्रथम वर्ग न्यायिक मजिस्ट्रेट जिसे उसने इस निमित्त नियुक्त किया है, उस स्थान पर जाएगा जहां साक्षी है या साक्षी को अपने समक्ष आने के लिए समन करेगा और उस रीति से उसका साक्ष्य लिखेगा और इस प्रयोजन के लिए उन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के अधीन वारण्ट मामलों के विचारणों के लिए हैं ।

(4) जब साक्षी भारत से बाहर किसी स्थान पर निवास करता है तब कमीशन उस प्ररूप में और उस रीति से निकाला जा सकेगा जो दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 285 की उपधारा (3) में विनिर्दिष्ट है ।

82. साक्षी की कमीशन पर परीक्षा-(1) ऐसे मामले में, जिसमें धारा 81 के अधीन कमीशन निकाला गया है, अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति क्रमशः कोई ऐसे लिखित परिप्रश्न भेज सकेंगे जिन्हें न्यायालय विवाद्यक से सुसंगत समझे और ऐसे कमीशन का निष्पादन करने वाला मजिस्ट्रेट ऐसे परिप्रश्नों पर साक्षी की परीक्षा करेगा

(2) अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष काउन्सेल की मार्फत या उस दशा को छोड़कर जब कि अभियुक्त व्यक्ति अभिरक्षा में है स्वयं हाजिर हो सकेंगे और उक्त साक्षी की, यथास्थिति, परीक्षा, प्रतिपरीक्षा और पुनः परीक्षा कर सकेंगे ।

(3) धारा 81 के अधीन निकाले गए कमीशन को सम्यक् रूप से निष्पादित किए जाने के पश्चात्, उसे उस साक्षी के अभिसाक्ष्य सहित, जिसकी उसके अधीन परीक्षा की गई है, मुख्य विधि आफिसर को लौटा दिया जाएगा ।

(4) उपधारा (3) के अधीन लौटाए गए कमीशन और अभिसाक्ष्य की प्राप्ति पर, मुख्य विधि आफिसर उसे उस तटरक्षक न्यायालय को, जिसकी प्रेरणा पर वह कमीशन निकाला गया था या, यदि वह न्यायालय विघटित कर दिया गया है तो, अभियुक्त व्यक्ति के विचारण के लिए संयोजित किसी अन्य न्यायालय को अग्रेषित करेगा और वह कमीशन, तत्सम्बन्धी विवरणी और अभिसाक्ष्य अभियोजक और अभियुक्त व्यक्ति द्वारा निरीक्षण के लिए खुले रहेंगे और सब न्यायसंगत अपवादों के अधीन रहते हुए, मामले में या तो अभियोजक द्वारा या अभियुक्त द्वारा साक्ष्य में पढ़े जा सकेंगे और न्यायालय की कार्यवाही के भाग होंगे ।

(5) ऐसे प्रत्येक मामले में जिसमें धारा 81 के अधीन कमीशन निकाला गया है, विचारण ऐसे विनिर्दिष्ट समय के लिए, जो कमीशन के निष्पादन और लौटाए जाने के लिए उचित रूप से पर्याप्त हों, स्थगित किया जा सकेगा ।

83. आनुकल्पिक निष्कर्ष-यदि किसी अभियुक्त पर तटरक्षक न्यायालय के समक्ष किसी एक अपराध का आरोप लगाया गया है और साक्ष्य से यह प्रतीत होता है कि उसने कोई भिन्न अपराध किया है तो उसे उस अपराध के लिए दोषसिद्ध किया जा सकेगा, जिसके बारे में यह दर्शित किया गया है कि उसने वह अपराध किया है, भले ही उस पर उसका आरोप न लगाया गया हो ।

84. हस्ताक्षरों के बारे में उपधारणा-इस अधिनियम के अधीन किसी भी कार्यवाही में ऐसा कोई आवेदन, प्रमाणपत्र, वारंट, उत्तर या अन्य दस्तावेज, जिसका सरकार की सेवा में के किसी आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, पेश किए जाने पर उसके बारे में, जब तक तत्प्रतिकूल साबित नहीं कर दिया जाता, यह उपधारणा की जाएगी कि वह उस व्यक्ति द्वारा और उस हैसियत में सम्यक् रूप से हस्ताक्षरित है जिसके द्वारा और जिस हैसियत में उसका हस्ताक्षरित किया जाना तात्पर्यित है ।

85. अभ्यावेशन पत्र-(1) कोई अभ्यावेशन पत्र, जो किसी अभ्यावेशन आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों में इस बात का साक्ष्य होगा कि अभ्यावेशित व्यक्ति ने प्रश्नों के वही उत्तर दिए थे जिनका उसके द्वारा दिया जाना उसमें व्यपदिष्ट है ।

(2) ऐसे व्यक्ति का अभ्यावेशन उसके मूल अभ्यावेशन पत्र या उसकी ऐसी प्रतिलिपि, जो अभ्यावेशन पत्र को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होनी तात्पर्यित है, पेश करके साबित किया जा सकेगा ।

86. कुछ दस्तावेजों के बारे में उपधारणा-(1) तटरक्षक की किसी यूनिट या पोत में किसी व्यक्ति के सेवा में होने या ऐसी यूनिट या पोत से किसी व्यक्ति की पदच्युति या उन्मोचन के संबंध में या किसी व्यक्ति की इन परिस्थितियों के बारे में कि उसने तटरक्षक की किसी यूनिट या पोत में सेवा नहीं की है या वह उसका अंग नहीं था, कोई पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज उस दशा में जबकि उसका केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक द्वारा या उसकी ओर से या किसी विहित आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, उन तथ्यों का साक्ष्य होगा जिनका कथन उस पत्र, विवरणी या अन्य दस्तावेज में है ।

(2) तटरक्षक की सूची या राजपत्र, जिसका प्राधिकार से प्रकाशित होना तात्पर्यित है, उसमें वर्णित आफिसरों की प्रास्थिति तथा रैंक का और उसके द्वारा धारित किसी नियुक्ति का तथा तटरक्षक की उस यूनिट या पोत का जिसके वे अंग हैं, साक्ष्य होगा ।

(3) जहां इस अधिनियम या किसी नियम के अनुसरण में या अन्यथा शासकीय कर्तव्यों के निर्वहन में कोई अभिलेख किसी पोत की पुस्तकों में लेखबद्ध किया गया है और कमान आफिसर द्वारा या उस आफिसर द्वारा, जिसका कर्तव्य ऐसा अभिलेख लेखबद्ध करना है, हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है, वहां ऐसा अभिलेख उन तथ्यों का साक्ष्य होगा जिनका उसमें कथन किया गया है ।

(4) किसी पोत की पुस्तक में के किसी अभिलेख की प्रतिलिपि, जो ऐसी पुस्तक को अभिरक्षा में रखने वाले आफिसर द्वारा शुद्ध प्रतिलिपि के रूप में प्रमाणित होनी तात्पर्यित है, ऐसे अभिलेख का साक्ष्य होगी ।

(5) जहां किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के आरोप पर विचारण हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी आफिसर या ऐसे अन्य व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, या तटरक्षक के किसी यूनिट या पोत की अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है या उसे ऐसे आफिसर या व्यक्ति द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र, जिसका, यथास्थिति, ऐसे आफिसर द्वारा या उस यूनिट या पोत के, जिसका कि वह व्यक्ति अंग है, कमान आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान तथा इस बात का कथन है कि उसका पहनावा कैसा था, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।

(6) जहां किसी ऐसे व्यक्ति का, जो इस अधिनियम के अधीन है, अभित्यजन या अनुचित रूप से पोत छोड़ने या छुट्टी के बिना अनुपस्थिति के आरोप पर विचारण हो रहा है और ऐसे व्यक्ति ने किसी ऐसे पुलिस आफिसर की, जो किसी पुलिस थाने के भारसाधक आफिसर से नीचे के रैंक का नहीं है, अभिरक्षा में अपने को अभ्यर्पित कर दिया है या उसे ऐसे आफिसर द्वारा पकड़ लिया गया है, वहां ऐसा प्रमाणपत्र, जिसका ऐसे पुलिस आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित होना तात्पर्यित है और जिसमें ऐसे अभ्यर्पण या पकड़े जाने का तथ्य, तारीख और स्थान तथा इस बात का कथन है कि उसका पहनावा कैसा था, ऐसी कथित बातों का साक्ष्य होगा ।

(7) कोई दस्तावेज, जिसका सरकार के रासायनिक परीक्षक या सहायक रासायनिक परीक्षक  [या सरकार के किसी वैज्ञानिक विशेषज्ञ अर्थात् मुख्य विस्फोटक निरीक्षक, निदेशक, अंगुलि छाप ब्यूरो, निदेशक, हाफकिन संस्थान, मुम्बई, किसी केन्द्रीय न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला या किसी राज्य न्यायालयिक विज्ञान प्रयोगशाला के निदेशक और सरकार के सीरम विज्ञानीट द्वारा हस्ताक्षरित ऐसी रिपोर्ट होना तात्पर्यित है जो ऐसे किसी पदार्थ या चीज के बारे में है जो परीक्षा या विश्लेषण और रिपोर्ट के लिए उसे सम्यक् रूप से भेजी गई थी, इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही में साक्ष्य के रूप में प्रयुक्त की जा सकेगी ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में पोत की पुस्तक" पद के अन्तर्गत ऐसी कोई शासकीय पुस्तक, दस्तावेज या सूची भी है जिसमें पोत में नियुक्त व्यक्ति या व्यक्तियों के नाम या नामों का होना तात्पर्यित है ।

87. पूर्व दोषसिद्धियों और साधारणशील का साक्ष्य-(1) जब किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, तटरक्षक न्यायालय ने किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया है तब वह तटरक्षक न्यायालय ऐसे व्यक्ति की किसी तटरक्षक न्यायालय या दंड न्यायालय द्वारा की गई पूर्व दोषसिद्धियों की या धारा 57  [या धारा 57कट के अधीन किए गए किसी पूर्व दण्ड अधिनिर्णय की जांच कर सकेगा और उसका साक्ष्य प्राप्त तथा लेखबद्ध कर सकेगा और इसके अतिरिक्त ऐसे व्यक्ति के साधारण शील की तथा ऐसी अन्य बातों की, जो विहित की जाएं, जांच कर सकेगा और उन्हें लेखबद्ध कर सकेगा ।

(2) इस धारा के अधीन प्राप्त किया गया साक्ष्य या तो मौखिक या तटरक्षक न्यायालय की पुस्तकों की या अन्य शासकीय अभिलेखों की प्रविष्टियों के रूप में या उनमें से प्रमाणित उद्धरणों के रूप में हो सकेगा और उस व्यक्ति को, जिसका विचारण किया गया है, विचारण के पूर्व यह सूचना देना आवश्यक नहीं होगा कि उसकी पूर्व दोषसिद्धियों या शील के बारे में, साक्ष्य प्राप्त किया जाएगा ।

88. अभियुक्त का पागलपन-(1) जब कभी तटरक्षक न्यायालय द्वारा विचारण के दौरान न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि वह व्यक्ति, जिस पर आरोप है, चित्त-विकृति के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ है या उसने अभिकथित कार्य किया तो था किन्तु वह चित्त-विकृति के कारण उस कार्य की प्रकृति को जानने में या यह जानने में कि वह दोषपूर्ण या विधि के प्रतिकूल है असमर्थ था, तब न्यायालय तद्नुसार निष्कर्ष लेखबद्ध करेगा

(2)  तटरक्षक न्यायालय का पीठासीन आफिसर मामले की रिपोर्ट संयोजक प्राधिकारी को तत्काल करेगा ।

(3) संयोजक प्राधिकारी, जिसे तटरक्षक न्यायालय के निष्कर्ष की रिपोर्ट उपधारा (2) के अधीन की जाती है, अभियुक्त व्यक्ति को विहित रीति से अभिरक्षा में रखे जाने का आदेश देगा तथा केन्द्रीय सरकार के आदेशों के लिए मामले की रिपोर्ट करेगा ।

(4) उपधारा (3) के अधीन रिपोर्ट की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार अभियुक्त व्यक्ति को किसी पागलखाने में या सुरक्षित अभिरक्षा के अन्य उपयुक्त स्थान में निरुद्ध किए जाने का आदेश दे सकेगी ।

89. पागल अभियुक्त का आगे चल कर विचारण के उपयुक्त हो जाना-जहां कोई अभियुक्त चित्त-विकृति के कारण अपनी प्रतिरक्षा करने में असमर्थ पाए जाने पर धारा 88 के अधीन अभिरक्षा या निरोध में है, वहां इस निमित्त विहित आफिसर,-

(क) यदि ऐसा व्यक्ति धारा 88 की उपधारा (3) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सक आफिसर की इस रिपोर्ट पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है ; या

() यदि ऐसा व्यक्ति धारा 88 की उपधारा (4) के अधीन किसी जेल में निरुद्ध है तो कारागारों के महानिरीक्षक के इस प्रमाणपत्र पर और यदि ऐसा व्यक्ति उस उपधारा के अधीन किसी पागलखाने में निरुद्ध है तो उस पागलखाने के परिदर्शकों में से किन्हीं दो या अधिक के इस प्रमाणपत्र पर और यदि उस उपधारा के अधीन वह किसी अन्य स्थान में निरुद्ध है तो विहित प्राधिकारी के इस प्रमाणपत्र पर कि वह अपनी प्रतिरक्षा करने में समर्थ है,

उस व्यक्ति का विचारण उस अपराध के लिए, जिसका आरोप उस पर मूलतः लगाया गया था, उसी या किसी अन्य तटरक्षक न्यायालय द्वारा या यदि अपराध सिविल अपराध है तो किसी दंड न्यायालय द्वारा कराने के लिए कार्यवाही कर सकेगा ।

90. धारा 89 के अधीन किए गए आदेशों का केन्द्रीय सरकार को पारेषण-अभियुक्त के विचारण के लिए किसी आफिसर द्वारा धारा 9 के अधीन किए गए प्रत्येक आदेश की एक प्रतिलिपि केन्द्रीय सरकार को तत्काल भेजी जाएगी

91. पागल अभियुक्त की निर्मुक्ति-जहां कोई व्यक्ति धारा 88 की उपधारा (3) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (4) के अधीन निरोध में है, वहां-

() यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (3) के अधीन अभिरक्षा में है तो किसी चिकित्सक आफिसर को ऐसी रिपोर्ट   पर ; या

(ख) यदि ऐसा व्यक्ति उक्त उपधारा (4) के अधीन निरोध में है तो धारा 89 के खण्ड (ख) में वर्णित प्राधिकारियों में से किसी के ऐसे प्रमाणपत्र पर कि उस आफिसर या प्राधिकारी के विचार में उस व्यक्ति की निर्मुक्ति उसके स्वयं अपने को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने के संकट के बिना की जा सकती है,

केन्द्रीय सरकार यह आदेश दे सकेगी कि ऐसे व्यक्ति को निर्मुक्त कर दिया जाए या अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जाए या, यदि उसे पहले ही किसी लोक पागलखाने में नहीं भेज दिया गया है तो, उसे ऐसे पागलखाने में भेज दिया जाए

92. पागल अभियुक्त का उसके नातेदारों को सौंपा जाना-जहां ऐसे व्यक्ति का जो धारा 88 की उपधारा (3) के अधीन अभिरक्षा में या उस धारा की उपधारा (4) के अधीन निरोध में है, कोई नातेदार या मित्र चाहता है कि उसे उसकी देख-रेख और अभिरक्षा में रखे जाने के लिए उसको सौंप दिया जाए, वहां केन्द्रीय सरकार ऐसे नातेदार या मित्र के आवेदन पर और उस सरकार के समाधानप्रद रूप में ऐसी प्रतिभूति उसके द्वारा दिए जाने पर कि सौंपे गए व्यक्ति की समुचित देख-रेख की जाएगी और उसे स्वयं अपने को या किसी अन्य व्यक्ति को क्षति करने से निवारित रखा जाएगा तथा सौंपे गए व्यक्ति को ऐसे आफिसर के समक्ष और ऐसे समयों पर और स्थानों पर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं, निरीक्षण के लिए पेश किया जाएगा, ऐसे व्यक्ति को ऐसे नातेदार या मित्र को सौंप दिए जाने का आदेश दे सकेगी ।

93. विचारण लंबित रहने तक संपत्ति की अभिरक्षा और व्ययन के लिए आदेश-जब कोई संपत्ति, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो कोई अपराध करने के लिए उपयोग में लाई गई प्रतीत होती है, किसी तटरक्षक न्यायालय के समक्ष विचारण के दौरान पेश की जाए, तब न्यायालय विचारण की समाप्ति होने तक के लिए ऐसी संपत्ति की उचित अभिरक्षा के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे और यदि संपत्ति शीघ्रतया या प्रकृत्या क्षयशील है तो, ऐसा साक्ष्य जो वह आवश्यक समझे लेखबद्ध करने के पश्चात्, उसे बेच देने या अन्यथा व्ययनित करने का आदेश दे सकेगा ।

94. जिस संपत्ति के बारे में अपराध किया गया है उसके व्ययन के लिए आदेश-(1) किसी तटरक्षक न्यायालय के समक्ष विचारण की समाप्ति के पश्चात्, ऐसा आफिसर जो उस उप-महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है जिसके कमान में विचारण किया गया था, ऐसी किसी सम्पत्ति या दस्तावेज को, जो उस न्यायालय के समक्ष पेश की गई है या उसकी अभिरक्षा में है या जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है या जो कोई अपराध करने के लिए प्रयुक्त की गई है, नष्ट करके, अधिहरण करके, ऐसे किसी व्यक्ति को परिदत्त करके जो उसके कब्जे का हकदार होने का दावा करता है, या अन्यथा व्ययनित करने के लिए ऐसा आदेश कर सकेगा जो वह ठीक समझे

(2) जहां उपधारा (1) के अधीन कोई आदेश ऐसी संपत्ति के बारे में किया गया है, जिसके बारे में कोई अपराध किया गया प्रतीत होता है, वहां आदेश करने वाले प्राधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित उस आदेश की प्रतिलिपि, चाहे विचारण भारत के अन्दर हुआ हो या न हुआ हो, ऐसे मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी जिसकी अधिकारिता में वह संपत्ति उस समय स्थित है और तब वह मजिस्ट्रेट उस आदेश को ऐसे कार्यान्वित कराएगा मानो वह उसके द्वारा दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंधों के अधीन पारित आदेश हो ।

(3) इस धारा में संपत्ति" शब्द के अन्तर्गत, उस संपत्ति की दशा में जिसके बारे में अपराध किया गया प्रतीत होता है, न केवल वह संपत्ति आती है जो मूलतः किसी व्यक्ति के कब्जे में या नियंत्रण में रही है, बल्कि वह संपत्ति भी आती है जिसमें या जिसके बदले में उसका संपरिवर्तन या विनिमय किया गया है और वह सब कुछ आता है जो ऐसे संपरिवर्तन या विनिमय द्वारा तुरन्त या अन्यथा अर्जित किया गया है ।

95. इस अधिनियम के अधीन कार्यवाहियों के संबंध में तटरक्षक न्यायालय की शक्तियां-तटरक्षक न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किया गया विचारण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझा जाएगा और तटरक्षक न्यायालय दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और धारा 346 के अर्थ में न्यायालय समझा जाएगा ।

अध्याय 9

दंडादेशों का निष्पादन और निलंबन

96. मृत्यु दंडादेश का रूप-तटरक्षक न्यायालय मृत्यु का दंडादेश अधिनिर्णीत करने में स्वविवेकानुसार निदेश देगा कि अपराधी की मृत्यु ऐसे घटित की जाए की जाए कि जब तक वह मर न जाए तब तक उसे गर्दन में फांसी लगा कर लटकाए रखा जाए या उसे गोली से मार दिया जाए ।

97. जब तक मृत्यु दंड का निष्पादन ने हो जाए तब तक अन्तरिम अभिरक्षा-उस व्यक्ति को, जिसे मृत्यु का दंडादेश दिया गया है, तब तक तटरक्षक की अभिरक्षा में निरुद्ध रखा जा सकेगा या अभिरक्षा में रखे जाने के लिए सिविल कारागार में भेजा जा सकेगा जब तक कि केन्द्रीय सरकार, महानिदेशक या उस तटरक्षक न्यायालय के संयोजक प्राधिकारी से जिसके द्वारा उसे मृत्यु का दंडादेश दिया गया है या अन्य विहित आफिसर से आदेश प्राप्त नहीं हो जाता और केन्द्रीय सरकार, महानिदेशक या संयोजक प्राधिकारी या ऐसे आफिसर का आदेश उस व्यक्ति को अभिरक्षा में रखने के लिए पर्याप्त अधिपत्र होगा ।

98. मृत्यु दण्डादेश का निष्पादन-(1) जब किसी मृत्यु दंडादेश का निष्पादन किया जाना है तब महानिदेशक या संयोजक प्राधिकारी या विहित आफिसर ऐसे समय, स्थान और रीति के विषय में निदेश देगा जिसमें ऐसा दंडादेश कार्यान्वित किया जाना है और ऐसे आफिसर या प्राधिकारी का विहित प्ररूप में दिया गया आदेश ऐसे दंडादेश के निष्पादन के लिए पर्याप्त अधिपत्र होगा ।

(2) विहित प्ररूप के साथ केन्द्रीय सरकार का यह प्रमाणित करने वाला आदेश संलग्न किया जाएगा कि केन्द्रीय सरकार ने उस दंडादेश की संपुष्टि कर दी है ।

99. कारावास या निरोध के दंडादेश का प्रारम्भ-जब कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन कारावास या निरोध से दंडादिष्ट किया जाता है तब उस दंडादेश की अवधि उस दिन से प्रारम्भ हुई मानी जाएगी जिस दिन दंडादेश अधिनिर्णीत किया    गया था ।

100. कारावास के दण्डादेश का निष्पादन-(1) जब कभी इस अधिनियम के अधीन कारावास का कोई दंडादेश पारित किया जाता है या जब कभी मृत्यु के दण्डादेश को कारावास के रूप में लघुकृत किया जाता है तब उस तटरक्षक न्यायालय का पीठासीन आफिसर जिसने दंडादेश पारित किया है या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, यह निदेश देगा कि दण्डादेश किसी सिविल कारागार में परिरोध द्वारा कार्यान्वित किया जाएगा ।

(2) जब उपधारा (1) के अधीन कोई निदेश दिया गया है तब दण्डादिष्ट व्यक्ति का कमान आफिसर या ऐसा अन्य आफिसर, जो विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को, जिसमें ऐसे व्यक्ति को परिरोध में रखा जाना है, विहित प्ररूप में अधिपत्र भेजेगा और अधिपत्र के साथ उसे ऐसे कारागार को भेजने की व्यवस्था करेगा

101. अपराधी की अस्थायी अभिरक्षा-जहां यह निदेश दिया गया है कि कारावास का दंडादेश किसी सिविल कारागार में भोगा जाए, वहां अपराधी को उस समय तक, जब तक कि उसे किसी सिविल कारागार में भेजना संभव नहीं है, तटरक्षक की अभिरक्षा में या किसी अन्य उचित स्थान में रखा जा सकेगा ।

102. बन्दी को एक स्थान से दूसरे स्थान को ले जाना-जो व्यक्ति कारावास के दंडादेश के अधीन है, वह एक स्थान से दूसरे स्थान को अपने ले जाए जाने के दौरान या जब वह पोत या वायुयान के फलक पर या अन्यथा है, ऐसे अवरोध के अधीन होगा जो उसके सुरक्षित रूप से ले जाए जाने और वहां से हटाए जाने के लिए आवश्यक है ।

103. कुछ आदेशों का कारागार आफिसरों को संसूचित किया जाना-जब कभी ऐसे दंडादेश, आदेश या अधिपत्र को, जिसके अधीन कोई व्यक्ति सिविल कारागार में परिरुद्ध है, अपास्त करने या उसमें फेरफार करने का कोई आदेश इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से किया जाता है तब ऐसे आदेश के अनुसार एक अधिपत्र, ऐसा आदेश करने वाले आफिसर या उसके स्टाफ आफिसर या ऐसे अन्य व्यक्ति द्वारा, जो विहित किया जाए, उस कारागार के भारसाधक आफिसर को भेजा जाएगा जिसमें वह व्यक्ति परिरुद्ध है ।

104. जुर्माने के दंडादेश का निष्पादन-जब किसी तटरक्षक न्यायालय द्वारा धारा 53 के अधीन जुर्माने का दंडादेश अधिरोपित किया जाता है तब ऐसे दंडादेश की न्यायालय के पीठासीन आफिसर द्वारा हस्ताक्षरित और प्रमाणित प्रति भारत में किसी मजिस्ट्रेट को भेजी जा सकेगी और वह मजिस्ट्रेट उस जुर्माने को दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) के उपबंधों के अनुसार ऐसे वसूल कराएगा मानो वह उस मजिस्ट्रेट द्वारा अधिरोपित जुर्माने का दंडादेश है ।

105. आदेश या अधिपत्र में अप्ररूपिता या गलती-जब कभी किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन कारावास से दंडादिष्ट किया जाता है और वह उस दंडादेश को किसी ऐसे स्थान या रीति से भोग रहा है, जिसमें कि वह इस अधिनियम के अनुसरण में किसी विधिपूर्ण आदेश या अधिपत्र के अधीन परिरुद्ध किया जा सकता है, तब ऐसे व्यक्ति का परिरोध केवल इस कारण अवैध नहीं समझा जाएगा कि उस आदेश, अधिपत्र या अन्य दस्तावेज या उस प्राधिकार में या उसके सम्बन्ध में, जिसके द्वारा या जिसके अनुसरण में वह व्यक्ति ऐसे स्थान में लाया गया था या परिरुद्ध है, कोई अप्ररूपिता या गलती है और ऐसे किसी आदेश, अधिपत्र या दस्तावेज में तद्नुसार संशोधित किया जा सकेगा ।

106. उस अपराधी का कारावास या निरोध जो पहले से ही दण्डादेश के अधीन है-जब कभी तटरक्षक न्यायालय द्वारा कोई दंडादेश किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध पारित किया जाता है, जो पहले से ही कारावास या निरोध के किसी ऐसे दंडादेश के अधीन है, जो किसी पूर्ववर्ती अपराध के लिए उसके विरुद्ध इस अधिनियम के अधीन पारित किया गया है, तब न्यायालय उस अपराध के लिए, जिसके लिए उसका विचारण हो रहा है, कारावास या निरोध का ऐसा दंडादेश अधिनिर्णीत कर सकेगा जो उस कारावास या निरोध के दण्डादेश का अवसान हो जाने के पश्चात् प्रारम्भ होगा जिसके लिए उसे पहले दंडादिष्ट किया गया है :

परन्तु किसी ऐसे निरोध की अवधि में से, जो इस धारा के अनुसरण में अधिनिर्णीत दंडादेश द्वारा किसी व्यक्ति पर अधिरोपित किया गया है, इतनी अवधि का परिहार हो गया समझा जाएगा जितनी निरोध की कुल अवधि को दो वर्ष से अधिक लम्बी बना देती है ।

107. कारावास या निरोध के दंडादेश का निलम्बन-(1) जहां किसी व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के अधीन है, कारावास या निरोध से दंडादिष्ट किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार, महानिदेशक, दंडादेश अधिरोपित करने वाला कमान आफिसर या कोई विहित आफिसर दंडादेश को निलम्बित कर सकेगा, चाहे अपराधी को कारागार या तटरक्षक की अभिरक्षा में पहले ही सुपुर्द कर दिया गया हो या नहीं ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर ऐसे दंडादिष्ट अपराधी की दशा में निदेश दे सकेगा कि जब तक ऐसे प्राधिकारी या आफिसर के आदेश अभिप्राप्त न कर लिए जाएं तब तक अपराधी को कारागार या तटरक्षक की अभिरक्षा में सुपुर्द नहीं किया जाएगा ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) द्वारा प्रदत्त शक्तियों का प्रयोग किसी ऐसे दंडादेश की दशा में किया जा सकेगा जो घटा दिया गया है, या लघुकृत कर दिया गया है ।

108. निलंबन पर निर्मुक्ति-जहां कोई दंडादेश धारा 107 के अधीन निलम्बित किया जाता है, वहां अपराधी को अभिरक्षा से तत्काल निर्मुक्त कर दिया जाएगा ।

109. निलंबन की अवधि की संगणना-वह अवधि जिसके दौरान दंडादेश निलम्बित है, उस दंडादेश की अवधि का भाग मानी जाएगी ।

110. निलंबन के पश्चात् आदेश-धारा 107 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर दंडादेश निलम्बित रहने के दौरान किसी भी समय आदेश दे सकेगा कि-

                (क) अपराधी उस दंडादेश के अनवसित प्रभाग को भोगने के लिए सुपुर्द किया जाए ; या

                (ख) दंडादेश का परिहार किया जाए ।

111. निलंबन के पश्चात् मामले पर पुनर्विचार-(1) जहां कोई दंडादेश निलंबित किया गया है, वहां धारा 107 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा अथवा धारा 107 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा सम्यक् रूप से प्राधिकृत किसी ऐसे आफिसर द्वारा, जो उप-महानिरीक्षक के रैंक से नीचे का नहीं है, मामले पर पुनर्विचार किसी भी समय किया जा सकेगा और अधिक से अधिक चार मास के अंतरालों पर किया जाएगा ।

(2) जहां ऐसे प्राधिकृत आफिसर को ऐसे पुनर्विचार पर यह प्रतीत होता है कि अपराधी का आचरण दोषसिद्धि के पश्चात् ऐसा रहा है कि दंडादेश का परिहार करना न्यायोचित होगा, वहां वह मामले को धारा 107 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर को निर्देशित करेगा ।

112. निलंबन के पश्चात् नया दंडादेश-जहां किसी अपराधी को, उस समय के दौरान जब उसका दंडादेश इस अधिनियम के अधीन निलम्बित है, किसी अन्य अपराध के लिए दंडादिष्ट किया जाता है, वहां-

(क) यदि अतिरिक्त दंडादेश भी इस अधिनियम के अधीन निलम्बित किया जाता है, तो वे दोनों दंडादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे ;

(ख) यदि अतिरिक्त दंडादेश तीन मास या उससे अधिक की अवधि के लिए है और इस अधिनियम के अधीन निलंबित नहीं किया जाता है, तो अपराधी पूर्ववर्ती दंडादेश के अनवसित प्रभाग के लिए भी कारागार या तटरक्षक की अभिरक्षा में सुपुर्द किया जाएगा, किन्तु दोनों दंडादेश साथ-साथ भोगे जाएंगे ; और

                (ग) यदि अतिरिक्त दंडादेश तीन मास से कम की अवधि के लिए है, और इस अधिनियम के अधीन निलंबित नहीं किया जाता है, तो अपराधी केवल उसी दंडादेश पर सुपुर्द किया जाएगा और पूर्ववर्ती दंडादेश किसी ऐसे आदेश के अधीन रहते हुए निलंबित रहेगा जो धारा 110 या धारा 111 के अधीन पारित किया जाए ।

113. निलंबन की शक्ति की परिधि-धारा 107 और धारा 110 द्वारा प्रदत्त शक्तियों में कमी करने, परिहार करने और लघुकरण की शक्ति के अतिरिक्त होंगी, न कि उसके अल्पीकरण में ।

114. निलंबन और परिहार का पदच्युति पर प्रभाव-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन किसी अन्य दंडादेश के अतिरिक्त पदच्युति का दंड अधिनिर्णीत किया जाता है और ऐसा अन्य दंडादेश धारा 107 के अधीन निलंबित किया जाता है, वहां ऐसी पदच्युति तब तक प्रभावशील नहीं होगी जब तक कि धारा 107 में विनिर्दिष्ट प्राधिकारी या आफिसर द्वारा वैसा आदेश नहीं कर दिया जाता

(2) यदि धारा 110 के अधीन ऐसे अन्य दंडादेश का परिहार किया जाता है तो पदच्युति के दंड का भी परिहार कर दिया जाएगा

अध्याय 10

मुख्य विधि आफिसर और विधि आफिसर

115. मुख्य विधि आफिसर और विधि आफिसरों की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार द्वारा एक मुख्य विधि आफिसर और उतने विधि आफिसर नियुक्त किए जाएंगे जितने केन्द्रीय सरकार उचित समझे ।

(2) कोई व्यक्ति तभी मुख्य विधि आफिसर नियुक्त होने के लिए अर्हित होगा जबकि-

                (क) वह भारत का नागरिक है ; और

                (ख) उसने भारत के राज्यक्षेत्र में कम से कम दस वर्ष तक न्यायिक पद धारण किया है ; या

() वह किसी उच्च न्यायालय या दो या अधिक ऐसे न्यायालयों का लगातार कम से कम दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा है :

परन्तु यदि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि सेवा की अत्यावश्यकताओं को देखते हुए, ऐसा करना आवश्यक और समीचीन है, तो वह कारणों को लेखबद्ध करते हुए किसी व्यक्ति की बाबत खंड (ख) या खंड (ग) में विनिर्दिष्ट अर्हता को शिथिल कर सकेगी ।

(3) कोई व्यक्ति तभी विधि आफिसर नियुक्त होने के लिए अर्हित होगा जबकि वह-

                (क) भारत का नागरिक है ; और

                (ख) किसी उच्च न्यायालय के अधिवक्ता के रूप में नामांकित किए जाने के लिए अर्हित है ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए-

() ऐसी अवधि की संगणना करने में, जिसके दौरान कोई व्यक्ति किसी उच्च न्यायालय का अधिवक्ता रहा है, वह अवधि भी सम्मिलित की जाएगी जिसके दौरान वह अधिवक्ता बनने के पश्चात् न्यायिक पद धारण किए हुए था ;

                (ख) न्यायिक पद" के अन्तर्गत विधि आफिसर का पद भी समझा जाएगा ।

116. मुख्य विधि आफिसर के कृत्य-(1) मुख्य विधि आफिसर का तटरक्षक से संबंधित ऐसे विधिक और न्यायिक प्रकार के कृत्यों का पालन करने का कर्तव्य होगा जो उसे समय-समय पर केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक द्वारा निर्दिष्ट किए जाएं या सौंपे जाएं और ऐसे कृत्यों का निर्वहन करने का कर्तव्य होगा जो उसे इस अधिनियम द्वारा या इसके अधीन प्रदत्त किए जाएं ।

(2) मुख्य विधि आफिसर के कृत्यों का, उसकी अनुपस्थिति में या अन्यथा, ऐसे विधि आफिसर द्वारा पालन किया जाएगा जिसे महानिदेशक द्वारा इस निमित्त पदाभिहित किया जाए ।

अध्याय 11

तटरक्षक न्यायालयों की कार्यवाहियों का न्यायिक पुनर्विलोकन

117. मुख्य विधि आफिसर द्वारा न्यायिक पुनर्विलोकन-(1) तटरक्षक न्यायालयों द्वारा किए गए विचारणों की सभी कार्यवाहियों का पुनर्विलोकन मुख्य विधि आफिसर द्वारा या तो स्वप्रेरणा से या किसी ऐसे व्यक्ति के, जो किसी दंडादेश या निष्कर्ष से व्यथित है, विहित समय के अन्दर किए गए आवेदन पर किया जाएगा और मुख्य विधि आफिसर ऐसे पुनर्विलोकन की रिपोर्ट, ऐसी सिफारिशों सहित, जो उसे न्यायसंगत और उचित प्रतीत हों, महानिदेशक को उसके विचारार्थ और ऐसी कार्रवाई के लिए, जो महानिदेशक ठीक समझे, भेजेगा ।

(2) जहां किसी व्यथित व्यक्ति ने उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन किया है वहां, यदि मामले की परिस्थितियों के अनुसार ऐसा करना अपेक्षित है तो, मुख्य विधि आफिसर उसे स्वयं या किसी विधि व्यवसायी या तटरक्षक के किसी आफिसर के माध्यम से सुने जाने का अवसर दे सकेगा ।

118. महानिदेशक द्वारा विचार-(1) महानिदेशक, धारा 117 के अधीन रिपोर्ट की और सिफारिशों की प्राप्ति पर, यदि कोई हों, मृत्यु दंडादेशों के सब मामलों में और उन सब मामलों में जिनमें तटरक्षक न्यायालय केन्द्रीय सरकार द्वारा संयोजित किया गया है, कार्यवाहियां और रिपोर्ट ऐसी सिफारिशों सहित जिन्हें करना वह ठीक समझे, केन्द्रीय सरकार को भेजेगा और अन्य मामलों में भेज सकेगा ।

(2) धारा 117 की या इस धारा की कोई भी बात, मुख्य विधि आफिसर या महानिदेशक को इस अधिनियम के अधीन पारित दोषमुक्ति का आदेश अपास्त किए जाने की कोई सिफारिश करने के लिए या केन्द्रीय सरकार को ऐसा आदेश अपास्त करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी ।

अध्याय 12

निष्कर्षों और दंडादेशों का उपांतरण, क्षमा, दंडादेशों का लघुकरण और परिहार

119. निष्कर्षों और दंडादेशों के विरुद्ध केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक को अर्जियां-ऐसा कोई व्यक्ति, जो इस अधिनियम के अधीन है और किसी तटरक्षक न्यायालय के निष्कर्ष या दंडादेश से अपने को व्यथित समझता है, केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक के समक्ष अर्जी पेश कर सकेगा, और, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक उस पर ऐसा आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे ।

120. निष्कर्षों और दंडादेशों के बारे में केन्द्रीय सरकार और महानिदेशक की शक्तियां-(1) जहां किसी व्यक्ति का इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन विचारण किया जाता है, वहां केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक, उस मामले में, जिसमें दोषसिद्धि की गई है-

(क) निष्कर्ष और दंडादेश को अपास्त कर सकेगा, और अभियुक्त को दोषमुक्त या उन्मोचित कर सकेगा या यह आदेश दे सकेगा कि उसका पुनः विचारण किया जाए ; या

(ख) उस दशा में दंडादेश में कोई उपांतरण किए बिना निष्कर्ष को परिवर्तित कर सकेगा, जब ऐसा दंडादेश, परिवर्तित निष्कर्ष पर वैध रूप से पारित किया जा सकता हो, या

(ग) निष्कर्ष को परिवर्तित करते हुए या उसके बिना, दंडादेश को घटा सकेगा या अधिनिर्णीत दंड को मापमान में उससे नीचे के दंड में लघुकृत कर सकेगा ; या

(घ) शर्तों के सहित या उनके बिना उस व्यक्ति को क्षमा कर सकेगा या अधिनिर्णीत संपूर्ण दंड का या उसके किसी भाग का परिहार कर सकेगा ; या

(ङ) शर्तों के सहित या उनके बिना, उस व्यक्ति को पैरोल पर निर्मुक्त कर सकेगा :

परन्तु कारावास के दंडादेश को अधिनिर्णीत कारावास की अवधि से अधिक की अवधि के निरोध के दंडादेश में लघुकृत नहीं किया जाएगा :

परन्तु यह और कि इस धारा की कोई बात, केन्द्रीय सरकार या महानिदेशक को दंडादेश में वृद्धि करने के लिए प्राधिकृत नहीं करेगी ।

(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन उपांतरित दंडादेश ऐसे निष्पादित किया जाएगा मानो वह मूलतः पारित किया गया था ।

(3) यदि वह शर्त, जिस पर किसी व्यक्ति को क्षमा किया गया है, या पैरोल पर निर्मुक्त किया गया है या दंड का परिहार किया गया है, उस प्राधिकारी की राय में पूरी नहीं की गई है जिसने क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार प्रदान किया था तो वह प्राधिकारी क्षमा या निर्मुक्ति या परिहार को रद्द कर सकेगा और तब अधिनिर्णीत दंडादेश ऐसे क्रियान्वित किया जाएगा, मानो वह क्षमा, निर्मुक्ति या परिहार प्रदान नहीं किया गया था :

परन्तु ऐसा व्यक्ति, जिसे कारावास या निरोध का दंडादेश दिया गया है, दंडादेश का अनवसित प्रभाग ही भोगेगा

अध्याय 13

प्रकीर्ण

121. तटरक्षक के सदस्यों को प्रदान किए जाने योग्य शक्तियां और उन पर अधिरोपित किए जाने योग्य कर्तव्य-(1) केन्द्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए और भारत के तट के समीप के ऐसे अंतर्देशीय क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, तटरक्षक का कोई सदस्य-

(i) पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 (1920 का 34) ; उत्प्रवास अधिनियम, 1922 (1922 का 7) ; विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939 (1939 का 16) ; विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) ; वाणिज्य पोत परिवहन अधिनियम, 1958 (1958 का 44) ; सीमाशुल्क अधिनियम, 1962 (1962 का 52), पासपोर्ट अधिनियम, 1967 (1967 का 15) ; विदेशी मुद्रा विनियमन अधिनियम, 1973 (1973 का 46) या राज्यक्षेत्रीय सागर-खण्ड महाद्वीपीय मग्नतट भूमि, अनन्य आर्थिक क्षेत्र और अन्य सामुद्रिक क्षेत्र अधिनियम, 1976 (1976 का 80) के अधीन दंडनीय अपराध या किसी अन्य केन्द्रीय अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी संज्ञेय अपराध को रोकने के प्रयोजन के लिए ; या

(ii) किसी ऐसे व्यक्ति को पकड़ने के प्रयोजन के लिए जिसने खंड (i) में निर्दिष्ट कोई अपराध किया है,

उस अधिनियम या किसी ऐसे अन्य केन्द्रीय अधिनियम के अधीन जो उक्त आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, ऐसी शक्तियों का प्रयोग या कर्तव्यों का निर्वहन कर सकेगा जो शक्तियां और कर्तव्य ऐसे हैं जिनका उक्त प्रयोजनों के लिए प्रयोग या निर्वहन करने के लिए, केन्द्रीय सरकार की राय में, उस अधिनियम द्वारा या ऐसे अन्य अधिनियम द्वारा तत्समान या निम्नतर रैंक के आफिसर को सशक्त किया गया है ।

(2) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, संबंधित राज्य सरकार की सहमति से यह निदेश दे सकेगी कि उन शक्तियों या कर्तव्यों में से, जिनका प्रयोग या निर्वहन किसी पुलिस आफिसर द्वारा राज्य के किसी अधिनियम के अधीन किया जा सकता है, किसी शक्ति या कर्तव्य का, तटरक्षक के किसी ऐसे सदस्य द्वारा जो, केन्द्रीय सरकार की राय में, तत्समान या उससे उच्चतर रैंक का है, ऐसी शर्तों और निर्बंधनों के अधीन रहते हुए और भारत के तट के समीप के अंतर्देशीय क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर जो उस आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, प्रयोग या निर्वहन किया जा सकेगा ।

(3) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी शर्तों और निर्बंधनों के अधीन रहते हुए और भारत के किसी सामुद्रिक क्षेत्र के किसी ऐसे क्षेत्र की स्थानीय सीमाओं के भीतर, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, तटरक्षक का कोई सदस्य-

(i) किसी ऐसी अधिनियमिति के अधीन दंडनीय कोई अपराध रोकने के प्रयोजन के लिए, जो उस समय उस क्षेत्र में विस्तारित है ; या

(ii) खंड (i) में निर्दिष्ट अपराध करने वाले किसी व्यक्ति को पकड़ने के प्रयोजन के लिए,

उस अधिनियमिति के अधीन ऐसी शक्तियों का प्रयोग या कर्तव्यों का निर्वहन कर सकेगा जो उक्त आदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं और जो शक्तियां और कर्तव्य ऐसे हैं जिनका उक्त प्रयोजनों के लिए प्रयोग या निर्वहन करने के लिए केन्द्रीय सरकार की राय में, उस अधिनियमिति द्वारा तत्समान या निम्नतर रैंक के आफिसर को सशक्त किया गया है ।

                (4) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक आदेश, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस आदेश में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह आदेश नहीं बनाया जाना चाहिए, तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु आदेश के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

122. तटरक्षक के सदस्यों के कार्यों के लिए संरक्षण-(1) किसी सक्षम प्राधिकारी के वारंट या आदेश के अनुसरण में तटरक्षक के किसी सदस्य द्वारा किए गए किसी कार्य के लिए उसके विरुद्ध किसी वाद या कार्यवाही में उसके लिए यह अभिवाक् करना विधिपूर्ण होगा कि उसने ऐसा कार्य ऐसे वारंट या आदेश के प्राधिकार के अधीन किया था

(2) ऐसा कोई अभिवाक् उस कार्य का निदेश देने वाले वारंट या आदेश को पेश करके साबित किया जा सकेगा और यदि उसे इस प्रकार साबित कर दिया जाता है तो तटरक्षक के सदस्य को, उसके द्वारा इस प्रकार किए गए कार्य के बारे में दायित्व से, उस प्राधिकारी की अधिकारिता में, जिसने ऐसा वारंट या आदेश जारी किया था, कोई त्रुटि होते हुए भी, उन्मोचित कर दिया जाएगा ।

(3) उस समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, कोई विधिक कार्यवाही (चाहे सिविल हो या दांडिक) जो तटरक्षक के किसी सदस्य के विरुद्ध इस अधिनियम या नियमों के किसी उपबंध द्वारा या उसके अनुसरण में प्रदत्त शक्तियों के अधीन किए गए या किए जाने के लिए आशयित कार्य के लिए विधिपूर्वक लाई जाए, उस कार्य के, जिसकी शिकायत की गई है, किए जाने के पश्चात् तीन मास के भीतर प्रारंभ की जाएगी, अन्यथा नहीं और ऐसी कार्यवाही की और उसके हेतुक की लिखित सूचना प्रतिवादी को या उसके वरिष्ठ अधिकारी को ऐसी कार्यवाही के प्रारंभ के कम से कम एक मास पूर्व दी जाएगी ।

123. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए नियम अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे-

                (क) तटरक्षक का गठन, शासन, कमान और अनुशासन ;

                (ख) तटरक्षक में व्यक्तियों का अभ्यावेशन तथा तटरक्षक के अन्य सदस्यों की भर्ती ;

() तटरक्षक के सदस्यों की सेवा की शर्तें (जिनमें सेवा विशेषाधिकार और वेतन तथा भत्तों से कटौतिया सम्मिलित हैं) ;

() आफिसरों, अधीनस्थ आफिसरों और अन्य अभ्यावेशित व्यक्तियों के रैंक, पूर्विकता, कमान की शक्तियां और प्राधिकार

(ङ) आफिसरों, अधीनस्थ आफिसरों तथा अन्य अभ्यावेशित व्यक्तियों का सेवा से हटाया जाना, सेवानिवृत्ति, सेवा से निर्मुक्ति या उन्मोचन ;

                (च) वे प्रयोजन तथा अन्य बातें, जो धारा 13 के अधीन विहित की जानी अपेक्षित हैं ;

                 [(चक) वह रीति जिसमें धारा 57क के अधीन कार्यवाहियां प्रारंभ की जा सकेंगी ;ट

                (छ) ऐसी अतिरिक्त बारे जिनकी बाबत तटरक्षक अपने कृत्यों के पालन में उपाय करे ;

                (ज) तटरक्षक न्यायालयों का संयोजन, गठन, स्थगन, विघटन तथा बैठकें, ऐसे न्यायालयों द्वारा विचारणों में पालन की जाने वाली प्रक्रिया, वे व्यक्ति जिनके द्वारा अभियुक्त की ऐसे विचारणों में प्रतिरक्षा की जा सकेगी और उनमें ऐसे व्यक्तियों की हाजिरी ;

(झ) तटरक्षक न्यायालयों से संबंधित इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन किए जाने वाले आदेशों के प्ररूप और मृत्यु, कारावास तथा निरोध के अधिनिर्णीत तथा दंड ;

                (ञ) तटरक्षक न्यायालयों के दंडादेशों को कार्यान्वित करना ;

() इस अधिनियम को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक कोई बात, जहां तक उसका संबंध इस अधिनियम के अधीन विचारणीय या दंडनीय अपराधों के अन्वेषण, गिरफ्तारी, अभिरक्षा, विचारण और दंड से है ;

                (ठ) धारा 120 के अधीन शक्तियों के प्रयोग से संबंधित प्रक्रिया ;

                (ड) तटरक्षक में पालन की जाने वाली औपचारिकताएं तथा दिए जाने वाले सम्मान ;

(ढ) कोई अन्य बात जो विहित की जानी है या विहित की जा सकती है या जिसके बारे में इस अधिनियम में कोई उपबंध नहीं है या अपर्याप्त उपबंध है और केन्द्रीय सरकार की राय में इस अधिनियम के उचित कार्यान्वयन के लिए उपबंध आवश्यक है ।

(2) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा, किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

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