भारतीय दंड संहिता की धारा 118 के अनुसार, जो कोई मॄत्यु या 1[आजीवन कारावास] से दंडनीय अपराध का किया जाना सुकर बनाने के आशय से या संभाव्यतः तद््द्वारा सुकर बनाएगा यह जानते हुए,
ऐसे अपराध के किए जाने की परिकल्पना के अस्तित्व को किसी, कार्य या अवैध लोप द्वारा स्वेच्छया छिपाएगा या ऐसी परिकल्पना के बारे में ऐसा व्यपदेशन करेगा जिसका मिथ्या होना वह जानता है,
यदि अपराध कर दिया जाए--यदि अपराध नहीं किया जाए--यदि ऐसा अपराध कर दिया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि सात वर्ष तक की हो सकेगी, अथवा यदि अपराध न किया जाए, तो वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि तीन वर्ष तक की हो सकेगी, दंडित किया जाएगा और दोनों दशाओं में से हर एक में जुर्माने से भी दंडनीय होगा ।
दृष्टांत
क, यह जानते हुए कि ख स्थान पर डकैती पड़ने वाली है, मजिस्ट्रेट को यह मिथ्या इत्तिला देता है कि डकैती ग स्थान पर, जो विपरीत दिशा में है, पड़ने वाली है और इस आशय से कि तद््द्वारा उस अपराध का किया जाना सुकर बनाए मजिस्ट्रेट को भुलावा देता है । डकैती परिकल्पना के अनुसरण में ख स्थान पर पड़ती है । क इस धारा के अधीन दंडनीय है ।
| अपराध | सजा | संज्ञेय | जमानत | विचारणीय |
|---|---|---|---|---|
| जनता द्वारा अपराध के कमीशन को उकसाना, या दस से अधिक व्यक्तियों द्वारा | 3 साल या जुर्माना या दोनों | किये गए अपराध के समान | गैर जमानती | उस अदालत के द्वारा जिसमे किया गया अपराध जाने योग्य है |

