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माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 ( Arbitration and Conciliation Act, 1996 )


 

माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996

(1996 का अधिनियम संख्यांक 26)

[16 अगस्त, 1996]

देशी माध्यस्थम्, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् और विदेशी

माध्यस्थम् पंचाटों के प्रवर्तन से संबंधित विधि को समेकित और

संशोधित करने के लिए तथा सुलह से संबंधित विधि

को भी परिभाषित करने के लिए और

उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक

विषयों के लिए

अधिनियम

                उद्देशिका-संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग ने 1985 में अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् विषयक       सं० रा० अं० व्या० वि० आ० आदर्श विधि को अंगीकार किया है ;

                और संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने सिफारिश की है कि सभी देश, माध्यस्थम् प्रक्रियाओं संबंधी विधि की एकरूपता की वांछनीयता और अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् पद्धति की विनिर्दिष्ट आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए उक्त आदर्श विधि पर सम्यक् रूप से विचार करें ;

                और संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय व्यापार विधि आयोग ने 1980 में सं० रा० अं० व्या० वि० आ० सुलह नियमों को अंगीकार किया है ;

                और संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने उन दशाओं में जहां अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक संबंधों के संदर्भ में कोई विवाद उद्भूत होता है और पक्षकार सुलह के माध्यम से उस विवाद का सौहार्द्रपूर्ण निपटारा चाहते हैं, उक्त नियमों के उपयोग की सिफारिश की है ;

                और उक्त आदर्श विधि और नियमों ने अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक संबंधों से उद्भूत होने वाले विवादों के उचित और दक्ष निपटारे के लिए एकीकृत विधिक संरचना की स्थापना के लिए महत्वपूर्ण योगदान किया है;

                और यह समीचीन है कि पूर्वोक्त आदर्श विधि और नियमों को ध्यान में रखते हुए माध्यस्थम् और सुलह के संबंध में विधि बनाई जाए ;

                भारत गणराज्य के सैंतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम माध्यस्थम् और सुलह अधिनियम, 1996 है ।

                (2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है:

परंतु यह कि भाग 1, भाग 3 और भाग 4 का विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य पर केवल वहां तक होगा जहां तक वे, यथास्थिति, अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् या अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक सुलह को लागू होते हैं ।

स्पष्टीकरण-इस उपधारा में अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक सुलह" पद का वही अर्थ है जो धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (च) में अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्" पद का इस उपांतरण के अधीन रहते हुए है कि उसमें आने वाले माध्यस्थम्" शब्द के स्थान पर सुलह" शब्द रखा जाएगा ।

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।

भाग 1

माध्यस्थम्

अध्याय 1

साधारण उपबंध

2. परिभाषाएं-(1) इस भाग में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) माध्यस्थम्" से कोई माध्यस्थम् अभिप्रेत है चाहे जो स्थायी माध्यस्थम् संस्था द्वारा किया गया हो या न किया गया हो ;

(ख) माध्यस्थम् करार" से धारा 7 में निर्दिष्ट कोई करार अभिप्रेत है ;

(ग) माध्यस्थम् पंचाट" के अंतर्गत कोई अंतरिम पंचाट भी है ;

(घ) माध्यस्थम् अधिकरण" से एक मात्र मध्यस्थ या मध्यस्थों का कोई पैनल अभिप्रेत है ;

(ङ) न्यायालय" से किसी जिले में आरंभिक अधिकारिता वाला प्रधान सिविल न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अपनी मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करने वाला उच्च न्यायालय भी है, जो माध्यस्थम् की विषय-वस्तु होने वाले प्रश्नों का, यदि वे वाद की विषय-वस्तु होते तो, विनिश्चय करने की अधिकारिता रखता, किन्तु ऐसे प्रधान सिविल न्यायालय से अवर श्रेणी का कोई सिविल न्यायालय या कोई लघुवाद न्यायालय इसके अन्तर्गत नहीं आता है ;

(च) अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम्" से ऐसे विवादों से संबंधित कोई माध्यस्थम् अभिप्रेत है जो ऐसे विधिक संबंधों से, चाहे वे संविदात्मक हों या न हों जो भारत में प्रवृत्त विधि के अधीन वाणिज्यिक समझे गए हों, उद्भूत हों और जहां पक्षकारों में से कम से कम एक-

                (i) ऐसा कोई व्यष्टि है जो भारत से भिन्न किसी देश का राष्ट्रिक है या उसका अभ्यासतः निवासी है ; या

                (ii) ऐसा एक निगमित निकाय है, जो भारत से भिन्न किसी देश में निगमित है ; या

                (iii) ऐसी कोई कंपनी या संगम या व्यष्टि निकाय है जिसका केन्द्रीय प्रबंध और नियंत्रण भारत से भिन्न किसी देश से किया जाता है ; या

                (iv) कोई विदेश की सरकार है ;

(छ) विधिक प्रतिनिधि" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी मृत व्यक्ति की सम्पदा का विधि की दृष्टि में प्रतिनिधित्व करता है, और ऐसा कोई व्यक्ति, जो मृतक की सम्पदा में दखलन्दाजी करता है, और, जहां कोई पक्षकार प्रतिनिधि की हैसियत में कार्य करता है वहां वह व्यक्ति जिसे इस प्रकार कार्य करने वाले पक्षकार की मृत्यु हो जाने पर सम्पदा न्यायगत होती है, भी इसके अंतर्गत आता है ;

(ज) पक्षकार" से माध्यस्थम् करार का कोई पक्षकार अभिप्रेत है ।

                (2) परिधि-यह भाग वहां लागू होगा जहां माध्यस्थम् का स्थान भारत में है ।

                (3) यह भाग तत्समय प्रवृत्त ऐसी किसी अन्य विधि पर प्रभाव नहीं डालेगा, जिसके आधार पर कतिपय विवाद माध्यस्थम् के लिए निवेदित न किए जा सकेंगे ।

                (4) यह भाग धारा 40 की उपधारा (1), धारा 41 और धारा 43 को छोड़कर तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन प्रत्येक माध्यस्थम् को इस प्रकार लागू होगा मानो कि वह माध्यस्थम् किसी माध्यस्थम् करार के अनुसरण में था और मानो कि उक्त अन्य अधिनियमिति कोई माध्यस्थम् करार थी, सिवाय इसके कि जहां तक इस भाग के उपबंध उस अन्य अधिनियमिति या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों से असंगत है ।

                (5) उपधारा (4) के उपबंधों के अधीन रहते हुए और जहां तक तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा या भारत और किसी अन्य देश या देशों के बीच किसी करार में अन्यथा उपबंधित है, उसके सिवाय, यह भाग सभी माध्यस्थमों को और उनसे संबंधित सभी कार्यवाहियों को लागू होगा ।

                (6) निर्देशों का अर्थान्वयन-जहां इस भाग में, धारा 28 को छोड़कर, पक्षकार कतिपय विवाद्यकों को अवधारित करने के लिए स्वतन्त्र है वहां उस स्वतंत्रता में पक्षकारों का उस विवाद को अवधारित करने के लिए किसी व्यक्ति को जिनके अंतर्गत कोई संस्था भी है, प्राधिकृत करने का अधिकार सम्मिलित होगा ।

                (7) इस भाग के अधीन किया गया माध्यस्थम् पंचाट, देशी पंचाट समझा जाएगा ।

                (8) जहां इस भाग में-

                                (क) इस तथ्य का निर्देश किया गया है कि पक्षकारों में करार पाया गया है अथवा यह कि वे करार कर सकते हैं ; या

                                (ख) किसी अन्य प्रकार से पक्षकारों के किसी करार का निर्देश किया गया है ,

वहां उस करार के अन्तर्गत उस करार में निर्दिष्ट कोई माध्यस्थम् नियम भी होंगे ।

                (9) जहां इस भाग में, धारा 25 के खंड (क) या धारा 32 की उपधारा (2) के खंड (क) से भिन्न, किसी दावे के प्रति निर्देश किया गया है, वहां यह किसी प्रतिदावे को भी लागू होगा और जहां यह किसी प्रतिरक्षा के प्रति निर्देश करता है, वहां यह उस प्रतिदावे के किसी प्रतिरक्षा को भी लागू होगा ।

3. लिखित संसूचनाओं की प्राप्ति-(1) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो,-

(क) कोई लिखित संसूचना प्राप्त की गई समझी जाएगी यदि वह प्रेषिती को व्यक्तिगत रूप से या उसके कारबार के स्थान, आभ्यासिक निवास या डाक के पते पर, परिदत्त की जाती है ; और

(ख) यदि खंड (क) में निर्दिष्ट स्थानों में से कोई भी युक्तियुक्त जांच करने के पश्चात् नहीं पाया जाता है तो कोई लिखित संसूचना प्राप्त की गई समझी जाएगी यदि प्रेषिती के अंतिम ज्ञात कारबार के स्थान, आभ्यासिक निवास या डाक के पते पर रजिस्ट्रीकृत पत्र द्वारा या ऐसे किसी अन्य साधन द्वारा, जो उसे परिदत्त किए जाने का प्रयास करने के अभिलेख की व्यवस्था करता है, भेजी जाती है ।

                (2) संसूचना उस दिन प्राप्त की गई समझी जाएगी जिस दिन वह इस प्रकार परिदत्त की जाती है ।

                (3) यह धारा किसी न्यायिक प्राधिकारी की कार्यवाहियों के संबंध में लिखित संसूचनाओं को लागू नहीं होती है ।

4. आपत्ति करने के अधिकार का अधित्यजन-कोई पक्षकार, जो यह जानता है कि-

                                (क) इस भाग के ऐसे किसी उपबंध का, जिसे पक्षकार अल्पीकृत कर सकते हैं, या

                                (ख) माध्यस्थम् करार के अधीन किसी अपेक्षा का,

अनुपालन नहीं किया गया है और फिर भी असम्यक् विलंब के बिना या यदि आपत्ति का कथन करने के लिए किसी कालावधि का उपबंध किया गया है तो उस कालावधि के भीतर ऐसे अननुपालन के लिए अपनी आपत्ति का कथन किए बिना माध्यस्थम् के लिए अग्रसर होता है, उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उसने इस प्रकार आपत्ति करने के अपने अधिकार का अधित्यजन कर दिया है ।

5. न्यायिक मध्यक्षेप का विस्तार-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, इस भाग द्वारा शासित मामलों में, कोई न्यायिक प्राधिकारी उस दशा के सिवाय मध्यक्षेप नहीं करेगा, जिसके लिए इस भाग में ऐसा उपबंध किया गया हो ।

6. प्रशासनिक सहायता-माध्यस्थम् कार्यवाहियों का संचालन सुकर बनाने की दृष्टि से पक्षकार या पक्षकारों की सम्मति से माध्यस्थम् अधिकरण, किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति द्वारा प्रशासनिक सहायता के लिए व्यवस्था कर सकेगा ।

अध्याय 2

माध्यस्थम् करार

7. माध्यस्थम् करार-(1) इस भाग में माध्यस्थम् करार" से पक्षकारों द्वारा ऐसे सभी या कतिपय विवाद माध्यस्थम् के लिए निवेदित करने के लिए किया गया करार अभिप्रेत है जो परिनिश्चित विधिक संबंध, चाहे संविदात्मक हो या न हो, की बाबत उनके बीच उद्भूत हुए हों या हो सकते हों ।

                (2) माध्यस्थम् करार, किसी संविदा में माध्यस्थम् खंड के रूप में या किसी पृथक् करार के रूप में हो सकता है ।

                (3) माध्यस्थम् करार लिखित रूप में होगा ।

                (4) माध्यस्थम् करार लिखित रूप में है यदि वह,-

(क)         पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित किसी दस्तावेज में ;

(ख) पत्रों के आदान-प्रदान, टेलेक्स, तार या दूरसंचार के ऐसे अन्य साधनों में, जो करार के अभिलेख की व्यवस्था करते हैं, या

(ग) दावे और प्रतिरक्षा के कथनों के आदान-प्रदान में, जिनमें करार की विद्यमानता का एक पक्षकार द्वारा अभिकथन किया गया है और दूसरे पक्षकार द्वारा उससे इंकार नहीं किया गया है ,

अंतर्विष्ट है ।

                (5) माध्यस्थम् खंड वाले किसी दस्तावेज के प्रति किसी संविदा में निर्देश, माध्यस्थम् करार का गठन करेगा यदि संविदा लिखित रूप में है और निर्देश ऐसा है जो उस माध्यस्थम् खंड को संविदा का भाग बनाता है ।

8. जहां माध्यस्थम् करार हो वहां माध्यस्थम् के लिए पक्षकारों को निर्दिष्ट करने की शक्ति-(1) कोई न्यायिक प्राधिकारी, जिसके समक्ष किसी ऐसे मामले में ऐसा अनुयोग लाया जाता है, जो किसी माध्यस्थम् करार का विषय है, यदि कोई पक्षकार ऐसा आवेदन करता है जो उसके पश्चात् नहीं है जब वह विवाद के सार पर अपना प्रथम कथन प्रस्तुत करता है, तो वह पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट कर सकता है ।

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट आवेदन को तब तक ग्रहण नहीं किया जाएगा जब तक कि उसके साथ मूल माध्यस्थम् करार या उसकी सम्यक् रूप से प्रमाणित प्रति न हो ।

                (3) इस बात के होते हुए भी कि उपधारा (1) के अधीन कोई आवेदन किया गया है और यह कि विवाद न्यायिक प्राधिकारी के समक्ष लंबित है, माध्यस्थम् प्रारम्भ किया जा सकता है या चालू रखा जा सकता है और कोई माध्यस्थम् पंचाट दिया जा सकता है ।

9. न्यायालय द्वारा अंतरिम उपाय, आदि-कोई पक्षकार, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के पूर्व या उनके दौरान या माध्यस्थम् पंचाट किए जाने के पश्चात् किसी समय किंतु इससे पूर्व कि वह धारा 36 के अनुसार प्रवृत्त किया जाता है किसी न्यायालय को-

(i) माध्यस्थम् कार्यवाहियों के प्रयोजनों के लिए किसी अप्राप्तवय या विकृतचित्त व्यक्ति के लिए संरक्षक की नियुक्ति के लिए ; या

(ii) निम्नलिखित विषयों में से किसी के संबंध में संरक्षण के किसी अंतरिम अध्युपाय के लिए, अर्थात् :-

(क) किसी माल का, जो माध्यस्थम् करार की विषय-वस्तु है, परिरक्षण, अंतरिम अभिरक्षा या विक्रय ;

(ख) माध्यस्थम् में विवादग्रस्त रकम सुरक्षित करने;

(ग) किसी संपत्ति या वस्तु का, जो माध्यस्थम् में विषय-वस्तु या विवाद है या जिसके बारे में कोई प्रश्न उसमें उद्भूत हो सकता है, निरोध, परिरक्षण या निरीक्षण और पूर्वोक्त प्रयोजनों में से किसी के लिए किसी पक्षकार के कब्जे में किसी भूमि पर या भवन में किसी व्यक्ति को प्रवेश करने देने के लिए प्राधिकृत करने, या कोई ऐसा नमूना लेने के लिए या कोई ऐसा संप्रेक्षण या प्रयोग कराए जाने के लिए जो पूर्ण जानकारी या साक्ष्य प्राप्त करने के प्रयोजन के लिए आवश्यक या समीचीन हो, प्राधिकृत करने ;

(घ) अंतरिम व्यादेश या किसी रिसीवर की नियुक्ति करने ;

(ङ) संरक्षण का ऐसा अन्य अंतरिम उपाय करने के लिए जो न्यायालय को न्यायोचित और सुविधाजनक प्रतीत हो, आवेदन कर सकेगा,

और न्यायालय को आदेश करने की वही शक्तियां होंगी जो अपने समक्ष किसी कार्यवाही के प्रयोजन के लिए और उसके संबंध में उसे हैं ।

अध्याय 3

माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना

10. मध्यस्थों की संख्या-(1) पक्षकार मध्यस्थों की संख्या अवधारित करने के लिए स्वतंत्र हैं परन्तु ऐसी संख्या, कोई सम संख्या नहीं होगी ।

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट अवधारण करने में असफल रहने पर माध्यस्थम् अधिकरण एकमात्र मध्यस्थ से मिलकर बनेगा ।

11. मध्यस्थों की नियुक्ति-(1) किसी भी राष्ट्रिकता को कोई व्यक्ति, जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, मध्यस्थ हो सकता है ।

                (2) उपधारा (6) के अधीन रहते हुए, पक्षकार मध्यस्थ या मध्यस्थों को नियुक्त करने के लिए किसी प्रक्रिया पर करार करने के लिए स्वतंत्र हैं ।

                (3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर, तीन मध्यस्थों वाले किसी मध्यस्थ में, प्रत्येक पक्षकार एक मध्यस्थ नियुक्त करेगा और दो नियुक्त मध्यस्थ ऐसे तीसरे मध्यस्थ को नियुक्त करेंगे, जो पीठासीन मध्यस्थ के रूप में कार्य करेगा ।

                (4) यदि उपधारा (3) की नियुक्ति की प्रक्रिया लागू होती है और-

(क) कोई पक्षकार किसी मध्यस्थ को नियुक्त करने में, दूसरे पक्षकार से ऐसा करने के किसी अनुरोध की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर, असफल रहता है, या

(ख) दो नियुक्त मध्यस्थ अपनी नियुक्ति की तारीख से तीस दिन के भीतर तीसरे मध्यस्थ पर सहमत होने में असफल रहते हैं,

तो नियुक्ति, किसी पक्षकार के अनुरोध पर, मुख्य न्यायमूर्ति द्वारा या उसके द्वारा पदाभिहित किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा की जाएगी ।

                (5) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर, एकमात्र मध्यस्थ वाले किसी मध्यस्थ में, यदि पक्षकार किसी मध्यस्थ पर, एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार से किए गए किसी अनुरोध की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर इस प्रकार सहमत होने में असफल रहते हैं, तो नियुक्ति, किसी पक्षकार के अनुरोध पर मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा की  जाएगी ।

                (6) जहां पक्षकारों द्वारा करार पाई गई किसी नियुक्ति की प्रक्रिया के अधीन,-

(क) कोई पक्षकार उस प्रक्रिया के अधीन अपेक्षित रूप में कार्य करने में असफल रहता है, या

(ख) पक्षकार अथवा दो नियुक्त मध्यस्थ, उस प्रक्रिया के अधीन उनसे अपेक्षित किसी करार पर पहुंचने में असफल रहते हैं, या

(ग) कोई व्यक्ित, जिसके अन्तर्गत कोई संस्था है, उस प्रक्रिया के अधीन उसे सौंपे गए किसी कृत्य का निष्पादन करने में असफल रहता है,

वहां कोई पक्षकार, मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित किसी व्यक्ति या संस्था से, जब तक कि नियुक्ति प्रक्रिया के किसी करार में नियुक्ति सुनिश्चित कराने के अन्य साधनों के लिए उपबंध न किया गया हो, आवश्यक उपाय करने के लिए अनुरोध कर सकता है ।

                (7) उपधारा (4) या उपधारा (5) या उपधारा (6) के अनुसार मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित व्यक्ति या संस्था को सौंपे गए किसी विषय पर कोई विनिश्चय अंतिम होगा ।

                (8) किसी मध्यस्थ की नियुक्ति करने में मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित व्यक्ति या संस्था, निम्नलिखित का सम्यक् रूप से ध्यान रखेगी-

                                (क) पक्षकारों के करार द्वारा अपेक्षित मध्यस्थ की कोई अर्हता, और

                                (ख) अन्य बातें, जिनसे किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष मध्यस्थ की नियुक्ति सुनिश्चित किए जाने की संभावना है ।

                (9) किसी अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में एकमात्र या तीसरे मध्यस्थ की नियुक्ति की दशा में, जहां पक्षकार विभिन्न राष्ट्रीयताओं के हैं वहां भारत का मुख्य न्यायमूर्ति या उसके द्वारा पदाभिहित व्यक्ति या संस्था, पक्षकारों की राष्ट्रीयता से भिन्न किसी राष्ट्रीयता वाला कोई मध्यस्थ नियुक्त कर सकेगी ।

                (10) मुख्य न्यायमूर्ति, कोई ऐसी स्कीम बना सकेगा जो वह उपधारा (4) या उपधारा (5) या उपधारा (6) द्वारा उसे सौंपे गए विषयों के निपटारे के लिए समुचित समझे ।

                (11) जहां विभिन्न उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायमूर्तियों या उनके पदाभिहितों से उपधारा (4) या उपधारा (5) या  उपधारा (6) के अधीन एक से अधिक बार अनुरोध किया गया है, वहां केवल वही मुख्य न्यायमूर्ति या उसका पदाभिहित ही, जिससे सुसंगत उपधारा के अधीन प्रथम बार अनुरोध किया गया है, ऐसे अनुरोध की बाबत विनिश्चय करने के लिए सक्षम होगा ।

                (12) (क) जहां उपधारा (4), उपधारा (5), उपधारा (6), उपधारा (7), उपधारा (8) और उपधारा (10) में निर्दिष्ट विषय किसी अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में उद्भूत होते हैं वहां उन उपधाराओं में मुख्य न्यायमूर्ति" के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह भारत के मुख्य न्यायमूर्ति" के प्रति निर्देश है ।

                (ख) जहां उपधारा (4), उपधारा (5), उपधारा (6), उपधारा (7), उपधारा (8) और उपधारा (10) में निर्दिष्ट विषय किसी अन्य माध्यस्थम् में उद्भूत होते हैं वहां उन उपधाराओं में मुख्य न्यायमूर्ति" के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह ऐसे उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के प्रति निर्देश है जिसकी स्थानीय परिसीमाओं के भीतर धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (ङ) में निर्दिष्ट प्रधान सिविल न्यायालय स्थित है और, जहां स्वयं उच्च न्यायालय ही उस खंड में निर्दिष्ट न्यायालय है, वहां उस उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति के प्रति निर्देश है ।

12. आक्षेप के लिए आधार-(1) जहां किसी व्यक्ति से किसी मध्यस्थ के रूप में उसकी संभावित नियुक्ति के संबंध में प्रस्ताव किया जाता है वहां वह किसी ऐसी परिस्थिति को लिखित रूप में प्रकट करेगा जिससे उसकी स्वतंत्रता या निष्पक्षता के बारे में उचित शंकाएं उठने की संभावना हो ।

                (2) कोई मध्यस्थ, अपनी नियुक्ति के समय से और संपूर्ण माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान, विलम्ब के बिना पक्षकारों को उपधारा (1) में निर्दिष्ट किन्हीं परिस्थितियों को लिखित रूप में तब प्रकट करेगा जब कि उसके द्वारा उनके बारे में पहले ही सूचित न कर दिया गया हो ।

                (3) किसी मध्यस्थ पर केवल तभी आक्षेप किया जा सकेगा, यदि-

(क) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हों जो उसकी स्वतंत्रता या निष्पक्षता के बारे में उचित शंकाओं को उत्पन्न करती हों, या

(ख) उसके पास पक्षकारों द्वारा तय पाई गई अर्हताएं न हों ।

                (4) कोई पक्षकार, ऐसे किसी मध्यस्थ पर, जो उसके द्वारा नियुक्त हो या जिसकी नियुक्ति में उसने भाग लिया हो, केवल उन कारणों से जिनसे वह नियुक्ति किए जाने के पश्चात् अवगत होता है, आक्षेप कर सकेगा ।

13. आक्षेप करने की प्रक्रिया-(1) उपधारा (4) के अधीन रहते हुए पक्षकार, किसी मध्यस्थ पर आक्षेप करने के लिए किसी प्रक्रिया पर करार करने के लिए स्वतंत्र हैं ।

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर, कोई पक्षकार, जो किसी मध्यस्थ पर आक्षेप करने का आशय रखता है, माध्यस्थम् अधिकरण के गठन से अवगत होने के पश्चात् या धारा 12 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट किन्हीं परिस्थितियों से अवगत होने के पश्चात् पन्द्रह दिन के भीतर माध्यस्थम् अधिकरण पर आक्षेप करने के कारणों का लिखित कथन भेजेगा ।

                (3) जब तक कि वह मध्यस्थ, जिस पर उपधारा (2) के अधीन आक्षेप किया गया है, अपने पद से हट नहीं जाता है या अन्य पक्षकार आक्षेप से सहमत नहीं हो जाता है, माध्यस्थम् अधिकरण, आक्षेप पर विनिश्चय करेगा ।

                (4) यदि पक्षकारों द्वारा करार पाई गई किसी प्रक्रिया के अधीन या उपधारा (2) के अधीन प्रक्रिया के अधीन कोई आक्षेप सफल नहीं होता है तो माध्यस्थम् अधिकरण, माध्यस्थम् कार्यवाहियों को चालू रखेगा और माध्यस्थम् पंचाट देगा ।

                (5) जहां उपधारा (4) के अधीन कोई माध्यस्थम् पंचाट दिया जाता है वहां मध्यस्थ पर आक्षेप करने वाला पक्षकार, धारा 34 के अनुसार ऐसा माध्यस्थम् पंचाट अपास्त करने के लिए आवेदन कर सकेगा ।

                (6) जहां कोई माध्यस्थम् पंचाट उपधारा (5) के अधीन किए गए आवेदन पर अपास्त किया जाता है वहां न्यायालय यह विनिश्चय कर सकेगा कि क्या वह मध्यस्थ, जिस पर आक्षेप किया गया है, किसी फीस का हकदार है ।

14. कार्य करने में असफलता या असंभवता-(1) किसी मध्यस्थ का आदेश पर्यवसित हो जाएगा, यदि वह-

(क) विधितः या वस्तुतः अपने कृत्यों का पालन करने में असफल हो जाता है या अन्य कारणों से असम्यक् विलम्ब के बिना कार्य करने में असफल रहता है, और

(ख) अपने पद से हट जाता है या पक्षकार उसके आदेश की समाप्ति के लिए करार कर लेते हैं ।

                (2) यदि उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट आधारों में से किसी से संबंधित कोई विवाद शेष रहता है तो कोई पक्षकार, जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, न्यायालय को आदेश की समाप्ति पर विनिश्चय करने के लिए आवेदन कर   सकेगा ।

                (3) यदि इस धारा या धारा 13 की उपधारा (3) के अधीन कोई मध्यस्थ अपने पद से हट जाता है या कोई पक्षकार किसी मध्यस्थ के आदेश की समाप्ति के लिए सहमत हो जाता है तो उसमें इस धारा या धारा 12 की उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी आधार की विधिमान्यता की स्वीकृति अंतर्हित नहीं होगी ।

15. आदेश की समाप्ति और मध्यस्थ का प्रतिस्थापन-(1) धारा 13 या धारा 14 में निर्दिष्ट परिस्थितियों के साथ-साथ किसी मध्यस्थ का आदेश-

                                (क) जहां वह किसी कारण से अपने पद से हट जाता है, या

                                (ख) पक्षकारों के करार द्वारा या उसके अनुसरण में,

समाप्त हो जाएगा ।

                (2) जहां किसी मध्यस्थ का आदेश समाप्त हो जाता है वहां प्रतिस्थानी मध्यस्थ, उन नियमों के अनुसार, जो प्रतिस्थापित होने वाले मध्यस्थ की नियुक्ति को लागू थे, नियुक्त किया जाएगा ।

                (3) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, जहां कोई मध्यस्थ उपधारा (2) के अधीन प्रतिस्थापित किया जाता है वहां पहले की गई कोई सुनवाई माध्यस्थम् अधिकरण के विवेकानुसार पुनः की जा सकेगी ।

                (4) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, इस धारा के अधीन किसी मध्यस्थ के प्रतिस्थापन के पूर्व माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा किया गया कोई आदेश या विनिर्णय केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगा कि माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना में कोई परिवर्तन हुआ है ।

अध्याय 4

माध्यस्थम् अधिकरणों की अधिकारिता

16. माध्यस्थम् अधिकरण की अपनी अधिकारिता के बारे में विनिर्णय करने की सक्षमता-(1) माध्यस्थम् अधिकरण, अपनी अधिकारिता के बारे में स्वयं विनिर्णय कर सकेगा, जिसके अंतर्गत माध्यस्थम् करार की विद्यमानता या विधिमान्यता की बाबत किसी आक्षेप पर विनिर्णय भी है और उस प्रयोजन के लिए,-

(क) कोई माध्यस्थम् खंड, जो किसी संविदा का भागरूप है, संविदा के अन्य निबंधनों से स्वतंत्र किसी करार के रूप में माना जाएगा, और

(ख) माध्यस्थम् अधिकरण का ऐसा कोई विनिश्चय कि संविदा अकृत और शून्य है, माध्यस्थम् खंड को विधितः अविधिमान्य नहीं करेगा ।

                (2) यह अभिवाक् कि माध्यस्थम् अधिकरण को अधिकारिता नहीं है, प्रतिरक्षा का कथन प्रस्तुत किए जाने के पश्चात् नहीं किया जाएगा; तथापि, कोई पक्षकार, केवल इस कारण यह अभिवाक् करने से निवारित नहीं किया जाएगा कि उसने किसी मध्यस्थ को नियुक्त किया है या उसकी नियुक्ति में भाग लिया है ।

                (3) यह अभिवाक् कि माध्यस्थम् अधिकरण अपने प्राधिकरण की परिधि का अतिक्रमण कर रहा है, यथाशीघ्र जैसे ही मामला, उसके प्राधिकार की परिधि से परे अधिकथित किया जाता है, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान किया जाएगा ।

                (4) माध्यस्थम् अधिकरण उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट मामलों में से किसी में भी परवर्ती अभिवाक् को, यदि वह विलम्ब को न्यायोचित समझता है तो, ग्रहण कर सकता है ।

                (5) माध्यस्थम् अधिकरण, उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट किसी अभिवाक् पर विनिश्चय करेगा और जहां माध्यस्थम् अधिकरण, अभिवाक् को नामंजूर करने का विनिश्चय करता है वहां वह माध्यस्थम् कार्यवाहियों को जारी रखेगा और माध्यस्थम् पंचाट देगा ।

                (6) ऐसे किसी माध्यस्थम् पंचाट से व्यथित कोई पक्षकार ऐसे किसी माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करने के लिए धारा 34 के अनुसार आवेदन कर सकेगा ।

17. माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा आदिष्ट अंतरिम उपाय-(1) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, माध्यस्थम् अधिकरण, किसी पक्षकार के अनुरोध पर, किसी पक्षकार को संरक्षण का कोई ऐसा अंतरिम उपाय करने के लिए जैसा माध्यस्थम् अधिकरण विवाद की विषय-वस्तु के संबंध में आवश्यक समझे, आदेश दे सकेगा ।

                (2) माध्यस्थम् अधिकरण, किसी पक्षकार से उपधारा (1) के अधीन आदिष्ट उपाय के संबंध में समुचित सुरक्षा का उपबंध करने की अपेक्षा कर सकेगा ।

अध्याय 5

माध्यस्थम् कार्यवाहियों का संचालन

18. पक्षकारों से समान बर्ताव-पक्षकारों से समानता का बर्ताव किया जाएगा और प्रत्येक पक्षकार को अपना मामला प्रस्तुत करने का पूर्ण अवसर दिया जाएगा ।

19. प्रक्रिया के नियमों का अवधारण-(1) माध्यस्थम् अधिकरण, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) से आबद्ध नहीं होगा ।

                (2) इस भाग के अधीन रहते हुए, पक्षकार, माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अपनी कार्यवाहियों के संचालन में अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर करार करने के लिए स्वतंत्र हैं ।

                (3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर माध्यस्थम् अधिकरण, इस भाग के अधीन रहते हुए ऐसी रीति से, जो वह समुचित समझे, कार्यवाहियों का संचालन कर सकेगा ।

                (4) उपधारा (3) के अधीन माध्यस्थम् अधिकरण की शक्ति में किसी साक्ष्य की ग्राह्यता, सुसंगता, तात्विकता और महत्व का अवधारण करने की शक्ति भी सम्मिलित है ।

20. माध्यस्थम् का स्थान-(1) पक्षकार, माध्यस्थम् के स्थान के लिए करार करने के लिए स्वतंत्र हैं ।

                (2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर माध्यस्थम् के स्थान का अवधारण, मामले की परिस्थितियों का ध्यान रखते हुए, जिनके अन्तर्गत पक्षकार की सुविधा भी है, माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा किया जाएगा ।

                (3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, माध्यस्थम् अधिकरण, जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार नहीं किया गया हो, किसी ऐसे स्थान पर, जो वह अपने सदस्यों के बीच परामर्श के लिए, साक्षियों, विशेषज्ञों या पक्षकारों को सुनने के लिए या दस्तावेजों, माल या अन्य सम्पत्ति के निरीक्षण के लिए समुचित समझता है, बैठक कर सकेगा ।

21. माध्यस्थम् कार्यवाहियों का प्रारम्भ-जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, किसी विशिष्ट विवाद के संबंध में माध्यस्थम् कार्यवाहियां उस तारीख को प्रारम्भ होंगी, जिसको उस विवाद को माध्यस्थम् को निर्देशित करने के लिए अनुरोध प्रत्यर्थी द्वारा प्राप्त किया जाता है ।

22. भाषा-(1) पक्षकार माध्यस्थम् कार्यवाहियों में प्रयोग की जाने वाली भाषा या भाषाओं पर करार करने के लिए    स्वतंत्र   हैं ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट किसी करार के न होने पर, माध्यस्थम् अधिकरण, माध्यस्थम् कार्यवाहियों में प्रयोग की जाने वाली भाषा या भाषाओं का अवधारण करेगा ।

(3) करार या अवधारण, जब तक कि अन्यथा विनिर्दिष्ट न हो, किसी पक्षकार द्वारा किए गए किसी लिखित कथन, माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा किसी सुनवाई और किसी माध्यस्थम् पंचाट, विनिश्चय या अन्य संसूचना को लागू होगा ।

(4) माध्यस्थम् अधिकरण यह आदेश कर सकेगा कि किसी दस्तावेजी साक्ष्य के साथ उसका उस भाषा या उन भाषाओं में, जो पक्षकारों द्वारा करार की गई हैं या माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अवधारित की गई हैं, अनुवाद होगा ।

23. दावा और प्रतिरक्षा के कथन-(1) पक्षकारों द्वारा करार पाई गई या माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अवधारित की गई कालावधि के भीतर, दावेदार, अपने दावे का समर्थन करने वाले तथ्यों, विवाद्यक मुद्दों और मांगे गए अनुतोष या उपचार का कथन करेगा और प्रत्यर्थी, इन विशिष्टियों के संबंध में अपनी प्रतिरक्षा का कथन करेगा जब तक कि पक्षकारों ने उन कथनों के अपेक्षित तत्वों के बारे में अन्यथा करार न किया हो ।

(2) पक्षकार अपने कथनों के साथ ऐसे सभी दस्तावेजों को, जिन्हें वे सुसंगत समझें, प्रस्तुत कर सकेंगे या उन दस्तावेजों अथवा अन्य साक्ष्य का जो वे प्रस्तुत करेंगे, कोई संदर्भ दे सकेंगे ।

(3) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, कोई भी पक्षकार, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान अपने दावे या प्रतिरक्षा को संशोधित या अनुपूरित कर सकेगा जब तक कि माध्यस्थम् अधिकरण उसे करने में विलंब को ध्यान में रखते हुए संशोधन या अनुपूर्ति को अनुज्ञात करना उचित न समझे ।

24. सुनवाई और लिखित कार्यवाहियां-(1) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, माध्यस्थम् अधिकरण, यह विनिश्चय करेगा कि क्या साक्ष्य की प्रस्तुति के लिए मौखिक सुनवाई की जाए या मौखिक बहस की जाए या क्या कार्यवाहियां दस्तावेजों और अन्य सामग्री के आधार पर संचालित की जाएंगी :

परंतु माध्यस्थम् अधिकरण, किसी पक्षकार द्वारा अनुरोध किए जाने पर कार्यवाहियों के उचित प्रक्रम पर मौखिक सुनवाई करेगा जब तक कि पक्षकारों द्वारा यह करार न किया गया हो कि कोई मौखिक सुनवाई नहीं की जाएगी ।

(2) पक्षकारों को किसी सुनवाई की या दस्तावेजों, माल या अन्य संपत्ति के निरीक्षण के प्रयोजनों के लिए माध्यस्थम् अधिकरण की किसी बैठक की पर्याप्त अग्रिम सूचना दी जाएगी ।

(3) किसी एक पक्षकार द्वारा माध्यस्थम् अधिकरण को दिए गए सभी कथन, दस्तावेज या अन्य जानकारी को अथवा किए गए आवेदनों को दूसरे पक्षकार को संसूचित किया जाएगा और कोई विशेषज्ञ रिपोर्ट या साक्ष्यिक दस्तावेज, जिस पर माध्यस्थम् अधिकरण अपना विनिश्चय करने में निर्भर रह सकता है, पक्षकारों को संसूचित किया जाएगा ।

25. किसी पक्षकार का व्यतिक्रम-जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, जहां पर्याप्त हेतुक दर्शित  किए बिना,-

(क) दावेदार धारा 23 की उपधारा (1) के अनुसार दावे का अपना कथन संसूचित करने में असफल रहता है, वहां, माध्यस्थम् अधिकरण, कार्यवाहियों को समाप्त कर देगा ;

(ख) प्रत्यर्थी धारा 23 की उपधारा (1) के अनुसार प्रतिरक्षा का अपना कथन संसूचित करने में असफल रहता है, वहां माध्यस्थम् अधिकरण, उस असफलता को दावेदार द्वारा किए गए अभिकथन को स्वयं में स्वीकृति के रूप में माने बिना कार्यवाहियों को चालू रखेगा;

(ग) यदि कोई पक्षकार मौखिक सुनवाई पर उपसंजात होने में या दस्तावेजी साक्ष्य प्रस्तुत करने में असफल रहता है तो माध्यस्थम् अधिकरण कार्यवाहियों को जारी रख सकेगा और उसके समक्ष उपलब्ध साक्ष्य पर माध्यस्थम् पंचाट दे सकेगा ।

26. माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा नियुक्त विशेषज्ञ-(1) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, माध्यस्थम् अधिकरण-

(क) माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अवधारित किए जाने वाले विनिर्दिष्ट विवाद्यकों पर उसे रिपोर्ट करने के लिए एक या अधिक विशेषज्ञ नियुक्त कर सकेगा ; और

(ख) किसी पक्षकार से विशेषज्ञ को कोई सुसंगत जानकारी देने या किसी सुसंगत दस्तावेज, माल या अन्य संपत्ति को उसके निरीक्षण के लिए प्रस्तुत करने या उसकी उस तक पहुंच की व्यवस्था करने की अपेक्षा कर सकेगा ।

                (2) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो यदि कोई पक्षकार ऐसा अनुरोध करता है या यदि माध्यस्थम् अधिकरण यह आवश्यक समझता है तो विशेषज्ञ, अपनी लिखित या मौखिक रिपोर्ट के परिदान के पश्चात् किसी मौखिक सुनवाई में भाग ले सकेगा जहां पक्षकारों को, उससे प्रश्न पूछने और विवाद्यक प्रश्नों पर साक्ष्य देने के लिए विशेषज्ञ साक्षियों को प्रस्तुत करने का अवसर प्राप्त होगा ।

                (3) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो, विशेषज्ञ, किसी पक्षकार के अनुरोध पर, उस पक्षकार को परीक्षा के लिए विशेषज्ञ के कब्जे में के सभी दस्तावेज, माल या सम्पत्ति को, उपलब्ध कराएगा जिसे उसको अपनी रिपोर्ट तैयार करने के लिए उपलब्ध कराया गया था ।

27. साक्ष्य लेने में न्यायालय की सहायता-(1) माध्यस्थम् अधिकरण या माध्यस्थम् अधिकरण के अनुमोदन से कोई पक्षकार, साक्ष्य लेने में सहायता के लिए न्यायालय को आवेदन कर सकेगा ।

                (2) आवेदन में निम्नलिखित विनिर्दिष्ट होगा-

                                (क) पक्षकारों और मध्यस्थों के नाम और पते ;

                                (ख) दावे की साधारण प्रकृति और मांगा गया अनुतोष ;

                                (ग) अभिप्राप्त किया जाने वाला साक्ष्य, विशिष्टत :-

(i) साक्षी या विशेषज्ञ साक्षी के रूप में सुने जाने वाले किसी व्यक्ति का नाम और पता और अपेक्षित परिसाक्ष्य की विषय-वस्तु का कथन ;

(ii) प्रस्तुत किए जाने वाले किसी दस्तावेज और निरीक्षण की जाने वाली संपत्ति का वर्णन ।

                (3) न्यायालय, अपनी सक्षमता के भीतर और साक्ष्य लेने संबंधी अपने नियमों के अनुसार, यह आदेश देकर अनुरोध का निष्पादन कर सकेगा कि साक्ष्य सीधे माध्यस्थम् अधिकरण को दी जाए ।

                (4) न्यायालय, उपधारा (3) के अधीन कोई आदेश करते समय, साक्षियों को वैसी ही आदेशिकाएं जारी कर सकेगा जो वह अपने समक्ष विचारण किए जाने वाले वादों में जारी कर सकता है ।

                (5) ऐसी आदेशिका के अनुसार हाजिर होने में असफल रहने वाले, या कोई अन्य व्यतिक्रम करने वाले या अपना साक्ष्य देने से इन्कार करने वाले वाले या माध्यस्थम् कार्यवाहियों के संचालन के दौरान माध्यस्थम् अधिकरण के किसी अवमान के दोषी व्यक्ति, माध्यस्थम् अधिकरण के व्यपदेशन पर न्यायालय के आदेश द्वारा वैसे ही अलाभों, शास्तियों और दण्डों के अधीन होंगे जैसे वे न्यायालय के समक्ष विचारण किए गए वादों में वैसे ही अपराधों के लिए उपगत करते ।

                (6) इस धारा में आदेशिका" पद के अन्तर्गत साक्षियों की परीक्षा किए जाने के लिए समन और कमीशन और दस्तावेज पेश करने के लिए समन भी है ।

अध्याय 6

माध्यस्थम् पंचाट का दिया जाना और कार्यवाहियों का समापन

28. विवाद के सार को लागू नियम-(1) जहां माध्यस्थम् का स्थान भारत में स्थित है, -

(क) किसी अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् से भिन्न माध्यस्थम् में, माध्यस्थम् अधिकरण, माध्यस्थम् के लिए सौंपे गए विवाद का विनिश्चय, भारत में तत्समय प्रवृत्त मूल विधि के अनुसार करेगा;

(ख) अन्तरराष्ट्रीय वाणिज्यिक माध्यस्थम् में,-

(i) माध्यस्थम् अधिकरण, विवाद का विनिश्चय विवाद के सार को लागू, पक्षकारों द्वारा अभिहित विधि के नियमों के अनुसार करेगा;

(ii) पक्षकारों द्वारा किसी देश विशेष की विधि या विधिक प्रणाली के किसी अभिद्यान का, जब तक कि अन्यथा अभिव्यक्त न हो, यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह प्रत्यक्षतः उस देश की मौलिक विधि के प्रति न कि उसके विधि-संघर्ष नियमों के प्रति निर्देश है;

(iii) पक्षकारों द्वारा खंड (क) के अधीन विधि का कोई अभिधान न करने पर माध्यस्थम् अधिकरण, उस विधि के नियमों को लागू करेगा जिसे वह विवाद की सभी विद्यमान परिवर्ती परिस्थितियों में समुचित समझे ।

                (2) माध्यस्थम् अधिकरण, उसके अनुसार जो न्यायसंगत और ठीक हो, के अनुसार या सुलहकर्ता के रूप में केवल तभी विनिश्चय करेगा जब पक्षकारों ने उसे इस प्रकार करने के लिए अभिव्यक्त रूप से प्राधिकृत किया हो ।

                (3) सभी मामलों में, माध्यस्थम् अधिकरण, संविदा के निबंधनों के अनुसार विनिश्चय करेगा और संव्यवहार को लागू व्यापार की प्रथाओं को ध्यान में रखेगा ।

29. मध्यस्थों के पैनल द्वारा विनिश्चय किया जाना-(1) जब तक पक्षकारों ने अन्यथा करार न किया हो, उन माध्यस्थम् कार्यवाहियों में जिनमें एक से अधिक मध्यस्थ हों, माध्यस्थम् अधिकरण का कोई भी विनिश्चय उसके सभी सदस्यों के बहुमत से किया जाएगा ।

                (2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, यदि पक्षकारों द्वारा या माध्यस्थम् अधिकरण के सभी सदस्यों द्वारा प्राधिकृत किया जाए, तो प्रक्रिया संबंधी प्रश्न, पीठासीन मध्यस्थ द्वारा विनिश्चित किए जा सकेंगे ।

30. समझौता-(1) माध्यस्थम् अधिकरण के लिए, विवाद के समझौते को प्रोत्साहित करना, माध्यस्थम् करार से बेमेल नहीं है और पक्षकारों की सहमति से, माध्यस्थम् अधिकरण, समझौता प्रोत्साहित करने के लिए माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान, किसी समय मध्यस्थता, सुलह या अन्य प्रक्रियाओं का प्रयोग कर सकता है ।

                (2) यदि माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान, पक्षकार विवाद तय करते हैं तो माध्यस्थम् अधिकरण, कार्यवाहियों का समापन करेगा और यदि, पक्षकारों द्वारा अनुरोध किया जाए और माध्यस्थम् अधिकरण उसके लिए आक्षेप न करे, तो करार पाए गए निबंधनों पर समझौते को माध्यस्थम् पंचाट के रूप में अभिलिखित करेगा ।

                (3) करार पाए गए निबंधनों पर माध्यस्थम् पंचाट धारा 31 के अनुसार दिया जाएगा और उसमें यह अभिकथित होगा कि वह माध्यस्थम् पंचाट है ।

                (4) करार पाए गए निबंधनों पर माध्यस्थम् पंचाट की वही प्रास्थिति होगी और उसका वही प्रभाव होगा, जो विवाद के सार पर किसी अन्य माध्यस्थम्  पंचाट का होता है ।

31. माध्यस्थम् पंचाट का प्ररूप और उसकी विषय-वस्तु-(1) माध्यस्थम् पंचाट लिखित में दिया जाएगा और माध्यस्थम् अधिकरण के सदस्यों द्वारा उस पर हस्ताक्षर किए जाएंगे ।

                (2) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, ऐसी माध्यस्थम् कार्यवाहियों में जिनमें एक से अधिक मध्यस्थ हैं, माध्यस्थम् अधिकरण के सभी सदस्यों में से बहुमत के हस्ताक्षर पर्याप्त होंगे यह तब जब कि किसी लोप किए गए हस्ताक्षर के लिए कारण अभिकथित किए गए हों ।

                (3) माध्यस्थम् पंचाट में वे कारण अभिकथित होंगे जिन पर वह आधारित हैं, जब तक कि-

                                (क) पक्षकारों ने यह करार न किया हो कि कोई कारण नहीं दिए जाने हैं, या

                                (ख) पंचाट, धारा 30 के अधीन करार पाए गए निबंधनों पर माध्यस्थम् पंचाट है ।

                (4) माध्यस्थम् पंचाट में, धारा 20 के अनुसार अवधारित उसकी तारीख और माध्यस्थम् का स्थान अभिकथित होगा और पंचाट उस स्थान पर दिया गया समझा जाएगा ।

(5) माध्यस्थम् पंचाट दिए जाने के पश्चात्, प्रत्येक पक्षकार को उसकी एक हस्ताक्षरित प्रति दी जाएगी ।

                (6) माध्यस्थम् अधिकरण, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के दौरान किसी भी समय, ऐसे किसी विषय पर जिस पर कि वह अंतिम माध्यस्थम् पंचाट दे सकता है, अंतरिम पंचाट दे सकेगा ।

                (7) (क) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न पाया जाए, जहां और जहां तक कि कोई माध्यस्थम् पंचाट धन के संदाय के लिए है, माध्यस्थम् अधिकरण, उस राशि में, जिसके लिए पंचाट दिया गया है, संपूर्ण धन पर या उसके किसी भाग पर, वह तारीख जिसको पंचाट दिया गया है, के बीच की संपूर्ण अवधि या उसके किसी भाग के लिए ऐसी दर से जो वह ठीक समझे, ब्याज सम्मिलित कर सकेगा ।

                (ख) उस राशि पर, जिसका संदाय किए जाने का माध्यस्थम् पंचाट द्वारा निदेश किया गया है, जब तक कि पंचाट में अन्यथा निदेश न किया गया हो, पंचाट की तारीख से संदाय किए जाने की तारीख तक, अठारह प्रतिशत वार्षिक की दर से ब्याज संदेय होगा ।

                (8) जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न पाया गया हो-

                                (क) माध्यस्थम् का खर्च माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा नियत किया जाएगा ;

                                (ख) माध्यस्थम् अधिकरण निम्नलिखित विनिर्दिष्ट करेगा,-

                                                (i) खर्चे का हकदार पक्षकार,

                                                (ii) वह पक्षकार, जो खर्च का संदाय करेगा,

                                                (iii) खर्च की रकम या उक्त रकम अवधारित करने की पद्धति, और

                                                (iv) वह रीति, जिससे खर्चे का संदाय किया जाएगा ।

                स्पष्टीकरण-खंड (क) के प्रयोजन के लिए, खर्च" से निम्नलिखित से संबंधित उचित खर्च अभिप्रेत हैं-

                                                (i) मध्यस्थों और साक्षियों की फीस और व्यय,

                                                (ii) विधिक फीस और व्यय,

                                                (iii) माध्यस्थम् का पर्यवेक्षण करने वाली संस्था की प्रशासन-फीस, और

                                                (iv) माध्यस्थम् कार्यवाहियों और माध्यस्थम् पंचाट के संबंध में उपगत कोई अन्य व्यय ।

32. कार्यवाहियों का समापन-(1) माध्यस्थम् कार्यवाहियों का समापन, अंतिम माध्यस्थम् पंचाट द्वारा या उपधारा (2)      के अधीन माध्यस्थम् अधिकरण के आदेश द्वारा होगा ।

                (2) माध्यस्थम् अधिकरण, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के समापन का वहां आदेश देगा, जहां-

(क) दावेदार अपने दावे को, जब तक कि प्रत्यर्थी आदेश पर आक्षेप नहीं करता है और विवाद का अंतिम परिनिर्धारण अभिप्राप्त करने में, माध्यस्थम् अधिकरण उसके विधिसम्मत हितों को मान्यता नहीं देता है, प्रत्याहृत कर लेता है ;

(ख) पक्षकार कार्यवाहियों के समापन के लिए सहमत हो जाते हैं ; या

(ग) माध्यस्थम् अधिकरण का यह निष्कर्ष है कि कार्यवाहियों का जारी रखना, अन्य किसी कारण से अनावश्यक या असंभव हो गया है ।

                (3) धारा 33 और धारा 34 की उपधारा (4) के अधीन रहते हुए, माध्यस्थम् अधिकरण की समाज्ञा का, माध्यस्थम् कार्यवाहियों के समापन के साथ, अंत हो जाएगा ।

33. पंचाट का सुधार और निर्वचन, अतिरिक्त पंचाट-(1) जब तक कि पक्षकार अन्य समयाविधि के लिए सहमत न हुए हों, माध्यस्थम् पंचाट की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर,-

(क) कोई पक्षकार, दूसरे पक्षकार को सूचना देकर, माध्यस्थम् पंचाट में हुई किसी संगणना की गलती, किसी लिपिकीय या टंकण संबंधी या उसी प्रकृति की किसी अन्य गलती का सुधार करने के लिए माध्यस्थम् अधिकरण से अनुरोध कर सकेगा, और

(ख) यदि पक्षकार इसके लिए सहमत हों तो कोई पक्षकार, दूसरे पक्षकार को सूचना देकर, पंचाट की किसी विनिर्दिष्ट बात या भाग का निर्वचन करने के लिए, माध्यस्थम् अधिकरण से अनुरोध कर सकेगा ।

                (2) यदि माध्यस्थम् अधिकरण, उपधारा (1) के अधीन किए गए अनुरोध को न्यायसंगत समझता है तो वह, अनुरोध की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर सुधार करेगा या निर्वचन करेगा और ऐसा निर्वचन माध्यस्थम् पंचाट का भाग होगा ।

                (3) माध्यस्थम् अधिकरण, स्वप्रेरणा पर, उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट प्रकार की किसी गलती को, माध्यस्थम् पंचाट की तारीख से तीस दिन के भीतर सुधार सकेगा ।

                (4) जब तक कि पक्षकारों ने अन्यथा करार न किया हो, एक पक्षकार, दूसरे पक्षकार को सूचना देकर, माध्यस्थम् पंचाट की प्राप्ति से तीस दिन के भीतर माध्यस्थम् कार्यवाहियों में प्रस्तुत किए गए उन दावों की बाबत जिन पर माध्यस्थम् पंचाट में लोप हो गया है, एक अतिरिक्त माध्यस्थम् पंचाट देने के लिए माध्यस्थम् अधिकरण से अनुरोध कर सकेगा ।

                (5) यदि माध्यस्थम् अधिकरण, उपधारा (4) के अधीन किए गए किसी अनुरोध को न्यायसंगत समझता है, तो वह ऐसे अनुरोध की प्राप्ति से साठ दिन के भीतर, अतिरिक्त माध्यस्थम् पंचाट देगा ।

                (6) माध्यस्थम् अधिकरण, यदि आवश्यक हो तो, उस समयावधि को बढ़ा सकेगा जिसके भीतर वह उपधारा (2) या उपधारा (5) के अधीन सुधार करेगा, निर्वचन करेगा या अतिरिक्त पंचाट देगा ।

                (7) धारा 31, इस धारा के अधीन किए गए माध्यस्थम् पंचाट के सुधार या निर्वचन या अतिरिक्त माध्यस्थम् पंचाट को,   लागू होगी ।

अध्याय 7

माध्यस्थम् पंचाट के विरुद्ध उपाय

34. माध्यस्थम् पंचाट अपास्त करने के लिए आवेदन-(1) माध्यस्थम् पंचाट के विरुद्ध, न्यायालय का आश्रय केवल उपधारा (2) या उपधारा (3) के अनुसार, ऐसे पंचाट को अपास्त करने के लिए आवेदन करके ही लिया जा सकेगा ।

                (2) कोई माध्यस्थम् पंचाट न्यायालय द्वारा तभी अपास्त किया जा सकेगा, यदि-

                                (क) आवेदन करने वाला पक्षकार यह सबूत देता है कि-

                                                (i) कोई पक्षकार किसी असमर्थता से ग्रस्त था, या

(ii) माध्यस्थम् करार उस विधि के, जिसके अधीन पक्षकारों ने उसे किया है या इस बारे में कोई संकेत न होने पर, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन विधिमान्य नहीं है ; या

(iii) आवेदन करने वाले पक्षकार को, मध्यस्थ की नियुक्ति की या माध्यस्थम् कार्यवाहियों की उचित सूचना नहीं दी गई थी, या वह अपना मामला प्रस्तुत करने में अन्यथा असमर्थ था ; या

(iv) माध्यस्थम् पंचाट ऐसे विवाद से संबंधित है जो अनुध्यात नहीं किया गया है या माध्यस्थम् के लिए निवेदन करने के लिए रख गए निबंधनों के भीतर नहीं आता है या उसमें ऐसी बातों के बारे में विनिश्चय है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित विषयक्षेत्र से बाहर है :

परन्तु यदि, माध्यस्थम् के लिए निवेदित किए गए विषयों पर विनिश्चयों को उन विषयों के बारे में किए गए विनिश्चयों से पृथक् किया जा सकता है, जिन्हें निवेदित नहीं किया गया है, तो माध्यस्थम् पंचाट के केवल उस भाग को, जिसमें माध्यस्थम् के लिए निवेदित न किए गए विषयों पर विनिश्चय है, अपास्त किया जा सकेगा ; या

(v) माध्यस्थम् अधिकरण की संरचना या माध्यस्थम् प्रक्रिया, पक्षकारों के करार के अनुसार नहीं थी, जब तक कि ऐसा करार इस भाग के उपबंधों के विरोध में न हो और जिससे पक्षकार नहीं हट सकते थे, या ऐसे करार के अभाव में, इस भाग के अनुसार नहीं थी ; या

(ख) न्यायालय का यह निष्कर्ष है कि-

(i) विवाद की विषय-वस्तु, तत्समय प्रवृत्त विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटाए जाने योग्य नहीं हैं ; या

(ii) माध्यस्थम् पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध है ।

स्पष्टीकरण-उपखंड (ii) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी शंका को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कोई पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध है यदि पंचाट का दिया जाना कपट या भ्रष्ट आचरण द्वारा उत्प्रेरित या प्रभावित किया गया था या धारा 75 अथवा धारा 81 के अतिक्रमण में था ।

                (3) अपास्त करने के लिए कोई आवेदन, उस तारीख से, जिसको आवेदन करने वाले पक्षकार ने माध्यस्थम् पंचाट प्राप्त किया था, या यदि अनुरोध धारा 33 के अधीन किया गया है तो उस तारीख से, जिसको माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अनुरोध का निपटारा किया गया था, तीन मास के अवसान के पश्चात् नहीं किया जाएगा :

                परन्तु यह कि जहां न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि आवेदक उक्त तीन मास की अवधि के भीतर आवेदन करने से पर्याप्त कारणों से निवारित किया गया था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि में आवेदन ग्रहण कर सकेगा किन्तु इसके पश्चात् नहीं ।

                (4) उपधारा (1) के अधीन आवेदन प्राप्त होने पर, जहां यह समुचित हो और इसके लिए किसी पक्षकार द्वारा अनुरोध किया जाए, वहां न्यायालय, माध्यस्थम् अधिकरण को इस बात का अवसर देने के लिए कि वह माध्यस्थम् कार्यवाहियों को चालू रख सके या ऐसी कोई अन्य कार्रवाई कर सके जिससे माध्यस्थम् अधिकरण की राय में माध्यस्थम् पंचाट के अपास्त करने के लिए आधार समाप्त हो जाएं, कार्यवाहियों को उतनी अवधि के लिए स्थगित कर सकेगा जो उसके द्वारा अवधारित की जाएं ।

अध्याय 8

माध्यस्थम् पंचाटों की अंतिमता और उनका प्रवर्तन

35. माध्यस्थम् पंचाटों की अंतिमता-इस भाग के अधीन माध्यस्थम् पंचाट अंतिम होगा और पक्षकारों तथा, यथास्थिति, उनके अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों पर, बाध्यकारी होगा ।

36. प्रवर्तन-जहां धारा 34 के अधीन माध्यस्थम् पंचाट को अपास्त करने के लिए आवेदन करने का समय समाप्त हो गया है या ऐसा आवेदन किए जाने पर, उसे नामंजूर कर दिया गया है, वहां पंचाट, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन उसी रीति से प्रवर्तित किया जाएगा मानो वह न्यायालय की डिक्री हो ।

अध्याय 9

अपीलें

37. अपीलनीय आदेश-(1) निम्नलिखित आदेशों से (न कि अन्यों से) कोई अपील उस न्यायालय में होगी जो आदेश पारित करने वाले न्यायालय की मूल डिक्रियों से अपील सुनने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत हो, अर्थात् :-

                                (क) धारा 9 के अधीन किसी उपाय को मंजूर करना या मंजूर करने से इंकार करना ;

                                (ख) धारा 34 के अधीन माध्यस्थम् पंचाट अपास्त करना या अपास्त करने से इंकार करना ।

                (2) माध्यस्थम् अधिकरण के,-

                                (क) धारा 16 की उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट अभिवचन स्वीकार करने के ; या

                (ख) धारा 17 के अधीन किसी अंतरिम उपाय को मंजूर करने या मंजूर करने से इंकार करने के, किसी आदेश से भी अपील न्यायालय में होगी ।

(3) इस धारा के अधीन अपील में पारित किसी आदेश से द्वितीय अपील नहीं होगी, किन्तु इस धारा की कोई भी बात, उच्चतम न्यायालय में अपील करने के किसी अधिकार पर प्रभाव न डालेगी या उसे छीन न लेगी ।

 

 

 

अध्याय 10

प्रकीर्ण

38. निक्षेप-(1) माध्यस्थम् अधिकरण, धारा 31 की उपधारा (8) में निर्दिष्ट खर्च के लिए अग्रिम के रूप में, यथास्थिति, निक्षेप या अनुपूरक निक्षेप की रकम नियत कर सकेगा, जिसकी वह उसे निवेदित दावे की बाबत, उपगत होने की प्रत्याशा करता है :

परन्तु जहां, दावे से अलग एक प्रतिदावा माध्यस्थम् अधिकरण को निवेदित किया गया है, वहां वह दावे और प्रतिदावे के लिए निक्षेप की पृथक् रकम नियत कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट निक्षेप, पक्षकारों द्वारा बराबर हिस्सों में संदेय होगा :

परंतु जहां निक्षेप के अपने हिस्से की रकम का संदाय करने में कोई पक्षकार असफल रहता है, वहां दूसरा पक्षकार उक्त हिस्से का संदाय कर सकता है :

परंतु यह और कि जहां दूसरा पक्षकार भी दावे या प्रतिदावे की बाबत, पूर्वोक्त हिस्से का संदाय नहीं करता है वहां माध्यस्थम् अधिकरण, यथास्थिति, ऐसे दावे या प्रतिदावे की बाबत, माध्यस्थम् कार्यवाहियों को निलंबित या समाप्त कर सकेगा ।

(3) माध्यस्थम् कार्यवाहियों के समापन पर माध्यस्थम् अधिकरण प्राप्त निक्षेपों का पक्षकारों को हिसाब देगा और किसी व्यय न किए गए अतिशेष को, यथास्थिति, पक्षकार या पक्षकारों को वापस करेगा ।

39. खर्च की बाबत माध्यस्थम् पंचाट और निक्षेप पर धारणाधिकार-(1) उपधारा (2) के उपबंधों और माध्यस्थम् करार में किसी प्रतिकूल उपबंध के अधीन रहते हुए, माध्यस्थम् अधिकरण का, माध्यस्थम् के किसी असंदत्त खर्च के लिए माध्यस्थम् पंचाट पर धारणाधिकार होगा ।

(2) यदि किसी मामले में, माध्यस्थम् अधिकरण, उसके द्वारा मांगे गए खर्च के संदाय पर के सिवाय अपना पंचाट देने से इंकार करता है तो, न्यायालय, इस निमित्त किसी आवेदन पर यह आदेश दे सकेगा कि, मांगा गया खर्च आवेदक द्वारा न्यायालय को संदाय करने पर, माध्यस्थम् अधिकरण आवेदक को माध्यस्थम् पंचाट देगा और ऐसी जांच के पश्चात्, जो वह ठीक समझे, यदि कोई हो, यह और आदेश देगा कि न्यायालय में इस प्रकार संदत्त रकम में से ऐसी राशि, जो न्यायालय ठीक समझे, खर्च के रूप में माध्यस्थम् अधिकरण को संदत्त की जाएगी तथा धन का कोई अतिशेष, यदि कोई है, आवेदक को वापस किया जाएगा ।

(3) जब तक कि मांगी गई फीस उसके और माध्यस्थम् अधिकरण के बीच लिखित करार द्वारा नियत नहीं कर दी जाती है उपधारा (2) के अधीन आवेदन, किसी पक्षकार द्वारा किया जा सकेगा तथा माध्यस्थम् अधिकरण, ऐसे किसी आवेदन पर उपसंजात होने और सुने जाने के लिए हकदार होगा ।

(4) जहां ऐसे खर्च की बाबत कोई प्रश्न उठता है और माध्यस्थम् पंचाट में उनसे संबंधित पर्याप्त उपबंध अंतर्विष्ट नहीं है वहां न्यायालय, माध्यस्थम् के खर्च की बाबत ऐसा आदेश दे सकेगा, जो वह ठीक समझे ।

40. माध्यस्थम् करार का उसके पक्षकार की मृत्यु के कारण प्रभावोन्मुक्त होना-(1) माध्यस्थम् करार उसके किसी पक्षकार की मृत्यु के कारण, न तो मृतक के और न किसी अन्य पक्षकार के संबंध में प्रभावोन्मुक्त होगा, किन्तु ऐसी दशा में वह मृतक के विधिक प्रतिनिधि के द्वारा या उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा ।

(2) किसी मध्यस्थ का आदेश किसी ऐसे पक्षकार की मृत्यु के कारण समाप्त नहीं हो जाएगा, जिसके द्वारा वह नियुक्त किया गया था ।

(3) इस धारा की कोई भी बात किसी ऐसी विधि के प्रवर्तन पर प्रभाव नहीं डालेगी, जिसके आधार पर किसी कार्रवाई का कोई अधिकार किसी व्यक्ति की मृत्यु के कारण निर्वापित हो जाता है ।

41. दिवाले की दशा में उपबंध-(1) जहां किसी संविदा में, जिसका कोई पक्षकार दिवालिया हो, किसी निबंधन द्वारा यह उपबंधित हो कि उससे या उसके संबंध में पैदा होने वाला कोई विवाद माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत किया जाएगा वहां, यदि रिसीवर संविदा अंगीकृत कर ले तो, उक्त निबंधन जहां तक वह ऐसे किसी विवाद से संबंधित हो, रिसीवर के द्वारा या उसके विरुद्ध प्रवर्तनीय होगा ।

(2) जहां कि कोई व्यक्ति, जो दिवालिया न्यायनिर्णीत किया जा चुका हो, दिवाले की कार्यवाही के प्रारम्भ के पूर्व किसी माध्यस्थम् करार का पक्षकार हो गया हो और किसी ऐसे विषय का, जिसे करार लागू हो अवधारित किया जाना दिवाले की कार्यवाही के संबंध में या प्रयोजनों के लिए अपेक्षित हैं वहां, यदि मामला ऐसा हो, जिसे उपधारा (1) लागू नहीं होती है तो कोई अन्य पक्षकार या रिसीवर, दिवाले की कार्यवाही में अधिकारिता रखने वाले न्यायिक प्राधिकारी से यह निदेश देने वाले आदेश के लिए आवेदन कर सकेगा कि प्रश्नगत मामला माध्यस्थम् करार के अनुसार माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत किया जाएगा और यदि न्यायिक प्राधिकारी की यह राय हो कि मामले की सब परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए मामला माध्यस्थम् द्वारा अवधारित किया जाना चाहिए, तो वह तद्नुसार आदेश दे सकेगा ।

(3) इस धारा में रिसीवर" पद के अन्तर्गत शासकीय समनुदेशिती आता है ।

42. अधिकारिता-इस भाग में अन्यत्र या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, जहां किसी  माध्यस्थम् करार की बाबत इस भाग के अधीन कोई आवेदन किसी न्यायालय में किया गया है तो वहां ऐसी माध्यस्थम् कार्यवाहियों तथा उक्त करार से उद्भूत होने वाले सभी पश्चात्वर्ती आवेदनों पर उसी न्यायालय की अधिकारिता होगी और माध्यस्थम् कार्यवाहियां उसी न्यायालय में की जाएंगी और अन्य किसी न्यायालय में नहीं की जाएंगी ।

43. परिसीमाएं-(1) परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) माध्यस्थमों को वैसे ही लागू होगा जैसे वह न्यायालय में की कार्यवाहियों को लागू होता है ।

(2) इस धारा और परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) के प्रयोजनों के लिए, कोई माध्यस्थम् धारा 21 में निर्दिष्ट तारीख को प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा ।

(3) जहां भावी विवादों को माध्यस्थम् के लिए निवेदित करने के किसी माध्यस्थम् करार में यह उपबंध किया गया है कि जब तक कि करार द्वारा नियत किए गए समय के भीतर माध्यस्थम् कार्यवाही प्रारम्भ करने के लिए कदम न उठाया जाए, कोई ऐसा दावा, जिसको करार लागू होता है, वर्जित होगा और कोई ऐसा विवाद पैदा होता है, जिसको यह करार लागू होता है, वहां न्यायालय, यदि उसकी राय है कि मामले की परिस्थितियों में अन्यथा असम्यक् कठिनाई होगी और इस बात के होते हुए भी कि इस प्रकार नियत किया गया समय समाप्त हो गया है, ऐसे निबंधनों पर, यदि कोई हो, जो मामले में न्याय के लिए अपेक्षित हो, समय को इतनी कालावधि के लिए विस्तारित कर सकेगा जितनी वह उचित समझे ।

(4) जहां न्यायालय आदेश दे कि माध्यस्थम् पंचाट अपास्त कर दिया जाए, वहां इस प्रकार निवेदित किए गए विवाद के बारे में कार्यवाही के (जिसके अन्तर्गत माध्यस्थम् भी है) प्रारम्भ के लिए परिसीमा अधिनियम, 1963 (1963 का 36) द्वारा विहित समय की संगणना करने में माध्यस्थम् के प्रारम्भ और न्यायालय के आदेश की तारीख के बीच की कालावधि अपवर्जित कर दी जाएगी ।

भाग 2

कतिपय विदेशी पंचाटों का प्रवर्तन

अध्याय 1

न्यूयार्क अभिसमय पंचाट

44. परिभाषा-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, विदेशी पंचाट" से ऐसा माध्यस्थम् पंचाट अभिप्रेत है जो व्यक्तियों के बीच उन विधिक संबंधों से, चाहे वे संविदात्मक हों या न हों, जिन्हें भारत में प्रवृत्त विधि के अधीन वाणिज्यिक समझा गया है, उत्पन्न होने वाले मतभेदों के बारे में है ; और जो 11 अक्तूबर, 1960 को या उसके पश्चात्-

(क) ऐसे माध्यस्थम् के, जिसको पहली अनुसूची में दिया गया अभिसमय लागू होता है, किसी लिखित करार के अनुसरण में किया गया है ; और

(ख) ऐसे राज्यक्षेत्रों में से किसी में किया गया है जिन्हें केन्द्रीय सरकार, यह सामाधान हो जाने पर कि व्यतिकारी उपबंध किए गए हैं राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसा राज्यक्षेत्र घोषित करे, जिनको उक्त अभिसमय लागू होता है ।

45. पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट करने की न्यायिक प्राधिकारी की शक्ति-भाग 1 में, या सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, जबकि किसी ऐसे विषय के बारे में जिसके संबंध में धारा 44 में निर्दिष्ट पक्षकारों ने कोई करार किया है किसी न्यायिक प्राधिकारी के हाथ में मामला चला गया हो, तब वह न्यायालय पक्षकारों में से किसी भी पक्षकार या उसकी मार्फत या उससे व्युत्पन्न अधिकार के अधीन दावा करने वाले किसी व्यक्ति के निवेदन पर पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए उस दशा में ही निर्देशित करेगा जब कि उसका यह निष्कर्ष होता है कि उक्त करार अकृत और शून्य है, अप्रवर्तनशील है या पालन किए जाने के योग्य नहीं है ।

46. विदेशी पंचाट कब आबद्धकर होंगे-किसी विदेशी पंचाट को, जो इस अध्याय के अधीन प्रवर्तनीय हो, उन व्यक्तियों पर जिनके बीच यह किया गया था, सभी प्रयोजनों के लिए आबद्धकर माना जाएगा और तद्नुसार उन व्यक्तियों में से कोई भी व्यक्ति, प्रतिरक्षा के रूप में, मुजराई के तौर पर या अन्यथा भारत में किन्हीं विधिक कार्यवाहियों में उस पर निर्भर कर सकेगा और इस अध्याय में किसी विदेशी पंचाट को प्रवृत्त करने के संबंध में किन्हीं निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि उसके अन्तर्गत पंचाट पर निर्भर करने के प्रतिनिर्देश भी है ।

47. साक्ष्य-(1) वह पक्षकार जो किसी विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए आवेदन कर रहा है, आवेदन के समय न्यायालय के समक्ष,-

(क) मूल पंचाट या उसकी प्रति, जो उस रीति से सम्यक्तः अधिप्रमाणित होगी, जो उस देश की, जिसमें उसे किया गया था, विधि द्वारा अपेक्षित है ;

(ख) माध्यस्थम् के लिए किया गया मूल करार या उसकी सम्यक्तः प्रमाणित प्रति ; और

(ग) ऐसा साक्ष्य, जो यह साबित करने के लिए आवश्यक हो कि पंचाट विदेशी पंचाट है,

प्रस्तुत करेगा ।

                (2) यदि उपधारा (1) के अधीन पेश किए जाने के लिए अपेक्षित पंचाट या करार विदेशी भाषा में है, तो पंचाट का प्रवर्तन चाहने वाला पक्षकार अंग्रेजी भाषा में उसका अनुवाद पेश करेगा जो उस देश के, जिसका कि वह निवासी है, राजनयिक या कौंसलीय अभिकर्ता द्वारा सही प्रमाणित होगा या वह ऐसी अन्य रीति से सही प्रमाणित होगा जो भारत में प्रवृत्त विधि के अनुसार पर्याप्त हो ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा में और इस अध्याय की निम्नलिखित सभी धाराओं में, न्यायालय" से किसी जिले में आरंभिक अधिकारिता वाला प्रधान सिविल न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत अपनी मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करने वाला ऐसा उच्च न्यायालय भी है जो पंचाट की विषय-वस्तु होने वाले प्रश्नों का यदि वे वाद की विषय-वस्तु होते तो, विनिश्चय करने की अधिकारिता रखता, किन्तु ऐसे प्रधान सिविल न्यायालय से निम्न श्रेणी का कोई सिविल न्यायालय या कोई लघुवाद न्यायालय इसके अन्तर्गत नहीं आता है ।

48. विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए शर्तें-(1) उस पक्षकार के निवेदन पर जिसके विरुद्ध किसी विदेशी पंचाट का अवलंब लिया जा रहा है, विदेशी पंचाट को प्रवृत्त करने से इंकार केवल उस दशा में किया जा सकेगा जब कि वह पक्षकार, न्यायालय को यह सबूत दे देता है कि-

(क) धारा 44 में निर्दिष्ट करार के पक्षकार, उनको लागू होने वाली विधि के अधीन किसी असमर्थता से ग्रस्त थे या उक्त करार उस विधि के अधीन, जिसके अधीन पक्षकारों ने उसे किया है या उसके बारे में कोई संकेत न होने पर, उस देश की विधि के अधीन, जहां पंचाट किया गया था, विधिमान्य नहीं हैं ; या

(ख) उस पक्षकार को, जिसके विरुद्ध पंचाट का अवलंब लिया जा रहा है मध्यस्थ की नियुक्ति की या माध्यस्थम् कार्यवाहियों की उचित सूचना नहीं दी गई थी, या वह अन्यथा अपना पक्ष-कथन प्रस्तुत करने में असमर्थ था ; या

(ग) पंचाट में ऐसे मतभेद पर विचार किया गया है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदन के निबन्धनों द्वारा अनुध्यात नहीं है या उनके अंतर्गत नहीं आता है या इसमें माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत करने के विषय क्षेत्र से बाहर के विषयों पर विनिश्चय अंतर्विष्ट है :

परन्तु यदि माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत विषयों संबंधी विनिश्चयों को उन विषयों से संबंधित विनिश्चयों से पृथक् किया जा सकता है, जो इस प्रकार माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत नहीं किए गए हैं तो पंचाट के उस भाग को, जिसमें माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत विषयों के बारे में विनिश्चय अंतर्विष्ट है, प्रवर्तित किया जा सकेगा ; या

(घ) माध्यस्थम् प्राधिकरण का गठन या माध्यस्थम् की प्रक्रिया पक्षकारों के करार के अनुसार नहीं थी या ऐसे करार के अभाव में, उस देश की जहां माध्यस्थम् किया गया था, विधि के अनुसार नहीं थी ; या

(ङ) पंचाट अभी पक्षकारों पर आबद्धकर नहीं हुआ है, या उस देश के जिसमें या जिसकी विधि के अधीन, उस पंचाट को किया गया था सक्षम प्राधिकारी द्वारा इसे अपास्त या निलंबित किया गया है ।

                (2) किसी माध्यस्थम् पंचाट का प्रवर्तन करने से उस दशा में भी इंकार किया जा सकेगा जबकि न्यायालय यह निष्कर्ष निकालता है कि-

                                (क) मतभेद की विषय-वस्तु का निपटारा भारत की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा नहीं किया जा सकता है ; या

                                (ख) पंचाट का प्रवर्तन भारत की लोक नीति के विरुद्ध होगा ।

                स्पष्टीकरण-खण्ड (ख) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, किसी शंका को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कोई पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध होगा यदि पंचाट का किया जाना कपट या भ्रष्टाचार द्वारा उत्प्रेरित या प्रभावित किया गया था ।

                (3) यदि उपधारा (1) के खंड (ङ) में निर्दिष्ट सक्षम प्राधिकारी को पंचाट को अपास्त करने या निलंबित करने के लिए कोई आवेदन किया गया है तो न्यायालय, यदि ऐसा करना उचित समझता है पंचाट के प्रवर्तन पर विनिश्चय देना स्थगित कर सकेगा और पंचाट के प्रवर्तन का दावा करने वाले पक्षकार के आवेदन पर, दूसरे पक्षकार को उचित प्रतिभूति देने के लिए आदेश भी कर सकेगा ।

49. विदेशी पंचाटों को प्रवर्तित करना-जहां न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि विदेशी पंचाट, इस अध्याय के अधीन प्रवर्तनीय है, वहां वह पंचाट, उस न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा ।

50. अपीलीय आदेश-(1) ऐसे किसी आदेश से कोई अपील, जिसमें-

                                (क) धारा 45 के अधीन पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्देशित करने ;

                                (ख) धारा 48 के अधीन किसी विदेशी पंचाट को प्रवर्तित करने,

से इंकार कर दिया गया हो, उस न्यायालय में होगी जो ऐसे आदेश की अपील सुनने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत हो ।

                (2) इस धारा के अधीन अपील में पारित किसी आदेश से द्वितीय अपील नहीं होगी, किन्तु इस धारा में की कोई भी बात उच्चतम न्यायालय में अपील करने के किसी अधिकार पर प्रभाव न डालेगी और न उसे ले लेगी ।

51. व्यावृत्ति-इस अध्याय की कोई बात उन अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नही डालेगी जो, यदि यह अध्याय अधिनियमित न किया गया होता, तो भारत में किसी पंचाट को प्रवर्तित कराने या भारत में ऐसे किसी पंचाट का लाभ उठाने के संबंध में किसी व्यक्ति को प्राप्त होते ।

52. अध्याय 2 का लागू होना-इस भाग का अध्याय 2 ऐसे विदेशी पंचाटों के संबंध में लागू नहीं होगा, जिनको यह अध्याय लागू होता है ।

अध्याय 2

जेनेवा अभिसमय पंचाट

53. निर्वचन-इस अध्याय में, विदेशी पंचाट" से ऐसा माध्यस्थम् पंचाट अभिप्रेत है जो उन विषयों से संबंधित मतभेदों पर, जिन्हें भारत में प्रवृत्त किसी विधि के अधीन वाणिज्यिक समझा जाता है, 28 जुलाई, 1924 के पश्चात्-

(क) ऐसे माध्यस्थम् करार के अनुसरण में दिया गया है जिसे दूसरी अनुसूची में उपवर्णित प्रोटोकोल लागू होता है ; तथा

(ख) ऐसे व्यक्तियों के बीच दिया गया है जिनमें से एक ऐसी शक्तियों में से किसी एक की अधिकारिता के अधीन है जिनकी बाबत भारत सरकार अपना यह समाधान हो जाने पर कि व्यतिकारी उपबंध कर दिए गए हैं, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित करे कि वे उस अभिसमय के पक्षकार हैं, जो तीसरी अनुसूची में उपवर्णित हैं और जिनमें से दूसरा पूर्वोक्त शक्तियों में से किसी अन्य की अधिकारिता के अधीन है ; तथा

(ग) ऐसे राज्यक्षेत्रों में से एक में दिया गया है जिन्हें भारत सरकार अपना यह समाधान हो जाने पर कि व्यतिकारी उपबंध कर दिए गए हैं, वैसी ही अधिसूचना द्वारा, ऐसे राज्यक्षेत्र घोषित करे जिनको उक्त अभिसमय लागू है, और यदि पंचाट की विधिमान्यता को चुनौती देने के प्रयोजन के लिए कोई कार्यवाहियां उस देश में लंबित हैं जिसमें वह दिया गया था तो पंचाट के बारे में इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए यह नहीं समझा जाएगा कि वह अंतिम है ।

54. न्यायिक प्राधिकारी की पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट करने की शक्ति-भाग 1 में या सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में किसी बात के होते हुए भी, कोई न्यायिक प्राधिकारी, ऐसे व्यक्तियों के बीच की गई किसी संविदा के संबंध में विवाद को हाथ में लेने के पश्चात् जिनको धारा 53 लागू होती है और जिसके अंतर्गत कोई ऐसा माध्यस्थम् करार भी है जिसमें चाहे वर्तमान या भावी विवादों को निर्दिष्ट किया गया है और जो उस धारा के अधीन विधिमान्य हो और जिसे कार्यान्वित किया जा सके, उन पक्षकारों में से किसी एक के या उसके द्वारा या उसके अधीन दावा करने वाले किसी व्यक्ति के आवेदन पर मध्यस्थों के विनिश्चय के लिए पक्षकारों को निर्दिष्ट करेगा और ऐसे निर्देश से न्यायिक प्राधिकारी की सक्षमता पर तब कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा, यदि करार पर या माध्यस्थम् में कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती है या वह अप्रवर्तनीय हो जाता है ।

55. विदेशी पंचाट कब आबद्धकर होंगे-कोई विदेशी पंचाट, जो इस अध्याय के अधीन प्रवर्तनीय होगा उन व्यक्तियों पर, जिनके बीच उसे किया गया है, सभी प्रयोजनों के लिए आबद्धकर समझा जाएगा और तद्नुसार उस व्यक्तियों में से किसी व्यक्ति द्वारा भारत में किन्हीं विधिक कार्यवाहियों में प्रतिरक्षा मुजराई के रूप में या अन्यथा उस पर निर्भर किया जा सकेगा और इस अध्याय में विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के प्रति किए गए किन्हीं निर्देशों का अर्थान्वयन ऐसे किया जाएगा मानो उसमें पंचाट पर निर्भर करने के प्रति निर्देश सम्मिलित है ।

56. साक्ष्य-(1) किसी विदेशी पंचाट को प्रवर्तित कराने के लिए आवेदन करने वाला पक्षकार, आवेदन करते समय न्यायालय के समक्ष निम्नलिखित पेश करेगा-

(क) मूल पंचाट या जिस देश में वह दिया गया था, उस देश की विधि द्वारा अपेक्षित रीति से सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित उसकी प्रति ; तथा

(ख) यह साबित करने के लिए साक्ष्य कि पंचाट अंतिम हो गया है, तथा

(ग) ऐसा साक्ष्य जो यह साबित करने के लिए आवश्यक हो कि धारा 57 की उपधारा (1) के खंड (क) और खंड (ग) में वर्णित शर्तों की पूर्ति हो जाती है ।

                (2) जहां कि उपधारा (1) के अधीन पेश करने के लिए अपेक्षित दस्तावेज विदेशी भाषा में है वहां पंचाट का प्रवर्तन चाहने वाला पक्षकार अंग्रेजी भाषा में उसका ऐसा अनुवाद पेश करेगा जो उस देश के राजनयिक या कौंसलीय अभिकर्ता ने, जिस देश का वह पक्षकार है, यह प्रमाणित किया है कि वह सही अनुवाद है या जिसकी बाबत ऐसी अन्य रीति से यह प्रमाणित किया गया है कि वह सही अनुवाद है जो भारत में प्रवृत्त विधि के अनुसार पर्याप्त हो ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा में और इस अध्याय की निम्नलिखित सभी धाराओं में, न्यायालय" से किसी जिले में आरंभिक अधिकारिता वाला प्रधान सिविल न्यायालय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत अपनी मामूली आरंभिक सिविल अधिकारिता का प्रयोग करने वाला ऐसा उच्च न्यायालय भी है जो पंचाट की विषय-वस्तु होने वाले प्रश्नों का, यदि वे वाद की विषय-वस्तु होते तो विनिश्चय करने की अधिकारिता रखता, किन्तु ऐसे प्रधान सिविल न्यायालय से निम्न श्रेणी का कोई सिविल न्यायालय या कोई लघुवाद न्यायालय इसके अन्तर्गत नहीं आता है ।

57. विदेशी पंचाट के प्रवर्तन के लिए शर्तें-(1) इस वास्ते कि विदेशी पंचाट इस अध्याय के अधीन प्रवर्तनीय हो यह बात आवश्यक होगी कि-

(क) पंचाट उस माध्यस्थम् के निवेदन के अनुसरण में किया गया है जो उस विधि के अधीन विधिमान्य हो, जो उसे लागू है ;

(ख) पंचाट की विषयवस्तु ऐसी है जिसका भारत की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटारा किया जा      सकता हो ;

(ग) पंचाट उस माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा किया गया हो जिसके बारे में माध्यस्थम् के निवेदन में उपबंध किया गया हो या जिसका गठन पक्षकारों द्वारा करार पाई गई रीति से हुआ है और उस विधि के अनुसार किया गया हो जो माध्यस्थम् प्रक्रिया के संबंध में लागू हो ;

(घ) पंचाट उस देश में, जिसमें उसे दिया गया है, इस अर्थ में अंतिम हो गया हो कि उस पर इस रूप में विचार नहीं किया जा सके यदि उसका विरोध करने या उसके विरुद्ध अपील करने की स्वतंत्रता है या यह साबित कर दिया जाता है कि पंचाट की विधिमान्यता को चुनौती देने के प्रयोजन के लिए कोई कार्यवाहियां लंबित हैं ;

(ङ) पंचाट का प्रवर्तन, भारत की लोक नीति या विधि के प्रतिकूल नहीं है ।

                स्पष्टीकरण-खंड (ङ) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना किसी शंका को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि कोई पंचाट भारत की लोक नीति के विरुद्ध है यदि पंचाट का दिया जाना कपट या भ्रष्टाचार द्वारा उत्प्रेरित या प्रभावित किया गया था ।

                (2) यदि उपधारा (1) में अधिकथित शर्तें भी पूरी कर दी जाती हैं तो भी पंचाट के प्रवर्तन से इंकार किया जा सकता है यदि न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि-

                                (क) पंचाट जिस देश में दिया गया था, वहां उसे बातिल किया जा चुका है, या

                (ख) जिस पक्षकार के विरुद्ध उस पंचाट को प्रवर्तित कराने का प्रयास है, उसे माध्यस्थम् कार्यवाहियों की सूचना इतने समय पूर्व नहीं दी गई थी कि वह अपना पक्षकथन प्रस्तुत कर सकता अथवा किसी विधिक असमर्थता से ग्रस्त होने से उसका प्रतिनिधित्व उचित प्रकार से नहीं हुआ था, या

                (ग) पंचाट ऐसे मतभेदों से संबंधित नहीं है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित निबंधनों द्वारा अनुध्यात थे या उसके अन्तर्गत आते थे या उसमें ऐसी बातों के बारे में विनिश्चय है जो माध्यस्थम् के लिए निवेदित विषय-क्षेत्र के बाहर है :

                परन्तु यदि उस पंचाट में माध्यस्थम् अधिकरण को निवेदित सभी मतभेदों का समावेश नहीं किया गया है तो न्यायालय, यदि उचित समझता है तो वह या तो उसके प्रवर्तन को स्थगित कर सकेगा या, ऐसी प्रतिभूति के दिए जाने की शर्त पर जैसा कि न्यायालय निश्चित करे, उसका प्रवर्तन किए जाने की मंजूरी दे सकेगा ।

(3) यदि वह पक्षकार जिसके विरुद्ध पंचाट किया गया है, यह साबित कर देता है कि माध्यस्थम् प्रक्रिया को शासित करने वाली विधि के अधीन, उपधारा (1) के खंड (क) और (ग) तथा उपधारा (2) के खंड (ख) और (ग) में निर्दिष्ट आधारों से भिन्न ऐसा कोई आधार है, जिससे वह उस पंचाट की विधिमान्यता विवादास्पद करने का हकदार है तो न्यायालय, यदि वह ठीक समझे तो ऐसे पक्षकार को उतना युक्तियुक्त समय देते हुए जिसके भीतर कि सक्षम अधिकरण पंचाट को बातिल कर सकेगा, उस पंचाट को प्रवर्तित करने से इंकार कर सकेगा या उस पर विचार करना स्थगित कर सकेगा ।

58. विदेशी पंचाटों को प्रवर्तित करना-जहां न्यायालय का यह समाधान हो जाता है कि विदेशी पंचाट इस अध्याय के अधीन प्रवर्तनीय है, वहां पंचाट को न्यायालय की डिक्री समझा जाएगा ।

59. अपीलनीय आदेश-(1) ऐसे किसी आदेश से कोई अपील, जिसमें-

                (क) धारा 54 के अधीन पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए निर्दिष्ट करने ; और

                (ख) धारा 57 के अधीन किसी विदेशी पंचाट को प्रदर्शित करने,

से इंकार कर दिया गया हो, उस न्यायालय में होगी, जो ऐसे आदेश की अपील सुनने के लिए विधि द्वारा प्राधिकृत हो ।

                (2) इस धारा के अधीन अपील में पारित किसी आदेश से द्वितीय अपील नहीं होगी, किन्तु इस धारा में की कोई भी बात उच्चतम न्यायालय में अपील करने के किसी अधिकार पर प्रभाव न डालेगी और न उसे ले लेगी ।

60. व्यावृत्ति-इस अध्याय की कोई बात, उन अधिकारों पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगी जो, यदि यह अध्याय अधिनियमित न किया गया होता, तो भारत में किसी पंचाट को प्रवर्तित कराने या भारत में ऐसे किसी पंचाट का लाभ उठाने के संबंध में किसी व्यक्ति को प्राप्त होते ।

भाग 3

सुलह

61. लागू होना और विस्तार-(1) तत्समय प्रवृत्त किसी विधि द्वारा अन्यथा उपबंधित के सिवाय और जब तक कि पक्षकारों ने अन्यथा करार न किया हो, यह भाग विधिक संबंध से, जो चाहे संविदाजात हो या नहीं, उद्भूत विवादों के सुलह की और उससे संबंधित सभी कार्यवाहियों को लागू होगा ।

                (2) यह भाग वहां लागू नहीं होगा जहां तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के आधार पर कतिपय विवादों को सुलह के लिए प्रस्तुत नहीं किया जा सकता है ।

62. सुलह कार्यवाहियों का आरंभ-(1) सुलह के लिए शुरूआत करने वाला पक्षकार इस भाग के अधीन विवाद का विषय संक्षेप में परिलक्षित करते हुए सुलह के लिए लिखित आमंत्रण, दूसरे पक्षकार को भेजेगा ।

                (2) सुलह कार्यवाहियां तभी प्रारम्भ होंगी जब दूसरा पक्षकार लिखित में सुलह के लिए आमंत्रण स्वीकार कर लेगा ।

                (3) यदि दूसरा पक्षकार आमंत्रण को नामंजूर करता है तो कोई सुलह कार्यवाही नहीं होगी ।

                (4) यदि सुलह की शुरूआत करने वाला पक्षकार, उस तारीख से, जिसको वह आमंत्रण भेजता है, तीस दिन के भीतर या ऐसी अन्य समयावधि के भीतर, जो आमंत्रण में विनिर्दिष्ट की जाए, कोई उत्तर प्राप्त नहीं करता है तो वह उसे सुलह के आमंत्रण को अस्वीकार करने के रूप में मान सकेगा और यदि वह ऐसा चयन करता है तो वह दूसरे पक्षकार को तद्नुसार लिखित में सूचित करेगा ।

63. सुलहकर्ताओं की संख्या-(1) एक सुलहकर्ता होगा, जब तक कि पक्षकार यह करार नहीं करते हैं कि दो या तीन सुलहकर्ता हों ।

                (2) जहां एक से अधिक सुलहकर्ता हैं वहां उन्हें साधारण नियम के अनुसार संयुक्त रूप से कार्य करना चाहिए ।

64. सुलहकर्ताओं की नियुक्ति-(1) उपधारा (2) के अधीन रहते हुए,-

                (क) एक सुलहकर्ता वाली सुलह कार्यवाहियों में पक्षकार एक सुलहकर्ता के नाम पर करार कर सकेंगे ;

                (ख) दो सुलहकर्ताओं वाली सुलह कार्यवाहियों में प्रत्येक पक्षकार एक सुलहकर्ता नियुक्त कर सकेगा ;

                (ग) तीन सुलहकर्ताओं वाली कार्यवाहियों में प्रत्येक पक्षकार एक सुलहकर्ता नियुक्त कर सकेगा और पक्षकार तीसरे सुलहकर्ता के नाम पर करार कर सकेंगे, जो पीठासीन सुलहकर्ता के रूप में कार्य करेगा ।

(2) पक्षकार, सुलहकर्ताओं की नियुक्ति के संबंध में किसी उचित संस्था या व्यक्ति की सहायता के लिए कह सकेंगे और विशेष रूप से,-

(क) कोई पक्षकार, ऐसी किसी संस्था या व्यक्ति से सुलहकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए उचित व्यक्तियों के नामों की सिफारिश करने के लिए अनुरोध कर सकेगा ; या

(ख) पक्षकार, किसी ऐसी संस्था या व्यक्ति द्वारा सीधे ही एक या अधिक सुलहकर्ताओं की नियुक्ति करने के लिए करार कर सकेंगे :

                परन्तु सुलहकर्ता के रूप में कार्य करने के लिए व्यक्तियों की सिफारिश करने या नियुक्ति करने में संस्था या व्यक्ति, ऐसी बातों को ध्यान में रखेगा जिनसे किसी स्वतंत्र और निष्पक्ष सुलहकर्ता की नियुक्ति सुनिश्चित करने की संभावना हो और एकल या तीसरे सुलहकर्ता की बाबत पक्षकारों की राष्ट्रिकताओं से भिन्न राष्ट्रिकता के किसी सुलहकर्ता की नियुक्ति करने की उपयुक्तता को भी ध्यान में रखेगा ।

65. सुलहकर्ता को कथनों का दिया जाना-(1) सुलहकर्ता, अपनी नियुक्ति होने पर, प्रत्येक पक्षकार से, विवाद की साधारण प्रकृति का और विवाद के प्रश्नों का वर्णन करते हुए एक संक्षिप्त लिखित कथन उसे देने के लिए अनुरोध कर सकेगा । प्रत्येक पक्षकार दूसरे पक्षकार को ऐसे कथन की एक प्रति भेजेगा ।

                (2) सुलहकर्ता, प्रत्येक पक्षकार से अपनी स्थिति और उसके समर्थन में तथ्यों और आधारों का एक और लिखित कथन उसे देने के लिए, जो ऐसे किन्हीं दस्तावेजों और अन्य साक्ष्य से अनुपूरित होगा, जिसे ऐसा पक्षकार समुचित समझे, अनुरोध कर सकेगा । पक्षकार, ऐसे कथन, दस्तावेजों और अन्य साक्ष्य की एक प्रति दूसरे पक्षकार को भेजेगा ।

                (3) सुलह कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर सुलहकर्ता, कोई ऐसी अतिरिक्त जानकारी देने के लिए, जो वह समुचित समझे, किसी पक्षकार से अनुरोध कर सकेगा ।

                स्पष्टीकरण-इस धारा और इस भाग की निम्नलिखित सभी धाराओं में, सुलहकर्ता" पद, यथास्थिति, एकल सुलहकर्ता,    दो या तीन सुलहकर्ताओं को लागू होगा ।

66. सुलहकर्ता का कतिपय अधिनियमितियों द्वारा बाध्य होना-सुलहकर्ता, सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) या भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) द्वारा बाध्य नहीं होगा ।

67. सुलहकर्ता की भूमिका-(1) सुलहकर्ता, पक्षकारों की उनके विवाद के सोहार्द्रपूर्ण समझौते पर पहुंचने के उनके प्रयास में, स्वतंत्र और निष्पक्ष रीति से सहायता करेगा ।

                (2) सुलहकर्ता, वस्तुनिष्ठा, औचित्य और न्याय के सिद्धांतों से मार्गदर्शित होगा जिनमें अन्य बातों के साथ-साथ, पक्षकारों के अधिकारों और बाध्यताओं, संबंधित व्यापार की प्रथाओं और विवाद की परिवर्ती परिस्थितियों का, जिनमें पक्षकारों के बीच कोई पूर्ववर्ती कारबारी व्यवहार भी है, ध्यान रखा जाएगा ।

                (3) सुलहकर्ता, सुलह कार्यवाहियों का संचालन ऐसी रीति से करेगा, जो वह समुचित समझे, जिसमें मामले की परिस्थितियां, वे इच्छाएं जो पक्षकार व्यक्त करे, जिसमें किसी पक्षकार का कोई ऐसा अनुरोध भी है कि सुलहकर्ता मौखिक कथन सुने और विवाद के शीघ्र निपटारे की आवश्यकता का ध्यान रखा जाएगा ।

                (4) सुलहकर्ता, सुलह कार्यवाहियों के किसी भी प्रक्रम पर विवाद के निपटारे के लिए प्रस्ताव तैयार कर सकेगा । ऐसे प्रस्तावों का लिखित में होना आवश्यक नहीं होगा और उसके लिए कारणों के किसी कथन का साथ होना आवश्यक नहीं होगा ।

68. प्रशासनिक सहायता-सुलह कार्यवाहियों का संचालन सुकर बनाने के लिए पक्षकार, या पक्षकारों की सहमति से सुलहकर्ता, किसी उपयुक्त संस्था या व्यक्ति द्वारा प्रशासनिक सहायता की व्यवस्था कर सकेगा ।

69. सुलहकर्ता और पक्षकारों के बीच संपर्क-(1) सुलहकर्ता, पक्षकारों को मिलने के लिए आमंत्रित कर सकेगा या उनमें मौखिक या लिखित रूप में संपर्क कर सकेगा । वह पक्षकारों से एक साथ या उनमें से प्रत्येक के साथ पृथक्तः मिल सकेगा या संपर्क कर सकेगा ।

                (2) जब तक कि पक्षकारों में उस स्थान के बारे में करार न हो जाए जहां सुलहकर्ता के साथ बैठक होगी, ऐसा स्थान सुलह कार्यवाहियों की परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए, पक्षकारों से परामर्श करने के पश्चात्, सुलहकर्ता द्वारा अवधारित किया जाएगा ।

70. जानकारी का प्रकटीकरण-जब सुलहकर्ता किसी पक्षकार से विवाद से संबंधित तथ्यपरक जानकारी प्राप्त करता है, तब वह, दूसरे पक्षकार को उस जानकारी का सार प्रकट करेगा जिससे कि दूसरे पक्षकार को कोई ऐसा स्पष्टीकरण प्रस्तुत करने का अवसर मिल सके जिसे वह समुचित समझे :

                परन्तु जब कोई पक्षकार, इस विनिर्दिष्ट शर्त के अधीन रहते हुए सुलहकर्ता को कोई जानकारी देता है कि उसे गोपनीय रखा जाए, तब सुलहकर्ता उक्त जानकारी को दूसरे पक्षकार को प्रकट नहीं करेगा ।

71. पक्षकारों का सुलहकर्ता से सहयोग-पक्षकार, सद्भावना से सुलहकर्ता से सहयोग करेंगे और विशेष रूप में लिखित सामग्री प्रस्तुत करने, साक्ष्य देने और बैठकों में सम्मिलित होने के सुलहकर्ता के अनुरोध के अनुपालन का प्रयास करेंगे ।

72. विवादों के निपटारे के लिए पक्षकारों द्वारा सुझाव-प्रत्येक पक्षकार, स्वप्रेरणा से या सुलहकर्ता के आमन्त्रण पर, विवाद के निपटारे के लिए सुझाव सुलहकर्ता को प्रस्तुत करेगा ।

73. समझौता करार-(1) जब सुलहकर्ता को यह प्रतीत हो कि किसी समझौते के ऐसे तत्व मौजूद हैं जो पक्षकारों को स्वीकार्य हो सकते हैं, तब वह किसी संभावित समझौते के निबंधन तैयार करेगा और उन्हें पक्षकारों को उनके विचार व्यक्त करने के लिए देगा । पक्षकारों के विचार प्राप्त होने के पश्चात्, सुलहकर्ता ऐसे विचारों को ध्यान में रखते हुए किसी संभावित समझौते के निबन्धन पुनः तैयार कर सकेगा ।

                (2) यदि पक्षकार, विवाद के किसी समझौते पर करार करते हैं तो वे एक लिखित समझौता करार तैयार करा सकेंगे और उस पर हस्ताक्षर कर सकेंगे । यदि पक्षकारों द्वारा अनुरोध किया जाए, तो सुलहकर्ता समझौता करार तैयार कर सकेगा या तैयार करने में पक्षकारों की सहायता कर सकेगा ।

                (3) जब पक्षकार समझौता करार पर हस्ताक्षर करेंगे तब वह अंतिम होगा और पक्षकारों तथा उनके अधीन दावा करने वाले व्यक्तियों पर आबद्धकर होगा ।

                (4) सुलहकर्ता, समझौता करार को अधिप्रमाणित करेगा और उसकी एक प्रति प्रत्येक पक्षकार को देगा ।

74. समझौता करार की प्रास्थिति और प्रभाव-समझौता करार की वही प्रास्थिति और प्रभाव होगा मानो वह विवाद के सार पर करार पाए गए निबन्धनों पर धारा 30 के अधीन किसी माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा दिया गया कोई माध्यस्थम् पंचाट है ।

75. गोपनीयता-तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, सुलहकर्ता और पक्षकार, सुलह कार्यवाहियों से संबंधित सभी बातें गोपनीय रखेंगे । उसके सिवाय कि जहां क्रियान्वयन और संप्रवर्तन के प्रयोजनों के लिए उसका प्रकटीकरण आवश्यक हो, गोपनीयता का विस्तार समझौता करार तक भी होगा ।

76. सुलह कार्यवाहियों का समापन-सुलह कार्यवाहियों का-

                                (क) करार की तारीख को, पक्षकारों द्वारा समझौता करार पर हस्ताक्षर करके ; या

                (ख) घोषणा की तारीख को, पक्षकारों के साथ परामर्श करने के पश्चात् सुलहकर्ता की इस प्रभाव की लिखित घोषणा द्वारा कि सुलह के लिए आगे प्रयास अब न्यायसंगत नहीं है ; या

                (ग) घोषणा की तारीख को, पक्षकारों द्वारा सुलहकर्ता को संबोधित इस प्रभाव की लिखित घोषणा द्वारा कि सुलह कार्यवाहियों का समापन किया जाता है ; या

                (घ) घोषणा की तारीख को, एक पक्षकार द्वारा दूसरे पक्षकार को और सुलहकर्ता को, यदि नियुक्त किया गया है, इस प्रभाव की लिखित घोषणा द्वारा कि सुलह कार्यवाहियों का समापन किया जाता है,

समापन हो जाएगा ।

77. माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियों का सहारा लेना-पक्षकार, सुलह कार्यवाहियों के दौरान, उस विवाद की बाबत, जो सुलह कार्यवाहियों की विषयवस्तु है, उसके सिवाय कि जहां किसी पक्षकार की यह राय है कि उसके अधिकारों के संरक्षण के लिए ऐसी कार्यवाहियां आवश्यक हैं वहां वह माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियां आरम्भ कर सकता है, कोई माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियां आरंभ नहीं करेंगे ।

78. खर्च-(1) सुलह कार्यवाहियों के समापन पर सुलहकर्ता, सुलह का खर्च नियत करेगा और उसकी लिखित सूचना पक्षकारों को देगा ।

                (2) उपधारा (1) के प्रयोजन के लिए, खर्चों" से निम्नलिखित से संबंधित युक्तियुक्त खर्च अभिप्रेत हैं-

                                (क) सुलहकर्ता की और पक्षकारों की सहमति से सुलहकर्ता द्वारा अनुरोध किए गए साक्षियों की फीस और व्यय ;

                                (ख) पक्षकारों की सहमति से सुलहकर्ता द्वारा अनुरोध की गई कोई विशेषज्ञ सलाह ;

                                (ग) धारा 64 की उपधारा (2) के खंड (ख) और धारा 68 के अनुसरण में उपबंधित कोई सहायता ;

                                (घ) सुलह कार्यवाहियों और समझौता करार के संबंध में उपगत कोई अन्य व्यय ।

                (3) जब तक कि समझौता करार में किसी भिन्न प्रभाजन का उपबंध न किया गया हो, पक्षकारों द्वारा बराबर-बराबर खर्च वहन किए जाएंगे । किसी पक्षकार द्वारा उपगत सभी अन्य व्यय, उसी पक्षकार द्वारा वहन किए जाएंगे ।

79. निक्षेप-(1) सुलहकर्ता, धारा 78 की उपधारा (2) में निर्दिष्ट खर्चों को, जिनके उपगत होने की वह प्रत्याशा करता है, अग्रिम के रूप में समान रकम का निक्षेप करने के लिए प्रत्येक पक्षकार को निदेश दे सकेगा ।

                (2) सुलह कार्यवाहियों के दौरान, सुलहकर्ता, प्रत्येक पक्षकार को समान रकम का अनुपूरक निक्षेप करने के लिए निदेश दे सकेगा ।

                (3) यदि उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन अपेक्षित निक्षेपों का पूर्ण संदाय दोनों पक्षकारों द्वारा तीस दिन के भीतर नहीं किया जाता है तो सुलहकर्ता, कार्यवाहियों को निलंबित कर सकेगा या पक्षकारों को कार्यवाहियों के समापन की लिखित घोषणा कर सकेगा, जो उक्त घोषणा की तारीख को प्रभावी होगी ।

                (4) सुलह कार्यवाहियों के समापन पर, सुलहकर्ता, प्राप्त निक्षेपों का लेखा पक्षकारों को देगा और व्यय न किया गया कोई अतिशेष पक्षकारों को वापस करेगा ।

80. अन्य कार्यवाहियों में सुलहकर्ता की भूमिका-जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो,-

(क) सुलहकर्ता किसी ऐसे विवाद के बारे में जो किसी सुलह कार्यवाही को विषय-वस्तु है, किसी माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाही में माध्यस्थम् के रूप में या किसी पक्षकार के प्रतिनिधि या परामर्शी के रूप में कार्य नहीं करेगा ;

(ख) पक्षकारों द्वारा सुलहकर्ता को किसी माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियों में साक्षी के रूप में पेश नहीं किया जाएगा ।

81. अन्य कार्यवाहियों में साक्ष्य की ग्राह्यता-पक्षकार, माध्यस्थम् या न्यायिक कार्यवाहियों में, चाहे ऐसी कार्यवाहियां उस विवाद से संबंधित हों या न हों, जो सुलह कार्यवाहियों की विषय-वस्तु हैं-

                                (क) विवाद के संभाव्य निपटारे की बाबत दूसरे पक्षकार द्वारा व्यक्त किए गए विचारों या दिए गए सुझावों पर ;

                                (ख) सुलह कार्यवाहियों के अनुक्रम में दूसरे पक्षकार द्वारा की गई स्वीकृतियों पर ;

                                (ग) सुलहकर्ता द्वारा दिए गए प्रस्तावों पर ;

                (घ) इस तथ्य पर कि दूसरे पक्षकार ने सुलहकर्ता द्वारा निपटारे के लिए दिए गए प्रस्ताव को स्वीकार करने की अपनी रजामंदी उपदर्शित की थी,

निर्भर नहीं करेंगे या उन्हें साक्ष्य के रूप में पुरःस्थापित नहीं करेंगे ।

भाग 4

अनुपूरक उपबंध

82. नियम बनाने की उच्च न्यायालय की शक्ति-उच्च न्यायालय इस अधिनियम के अधीन न्यायालय के समक्ष सभी कार्यवाहियों के संबंध में इस अधिनियम से संगत नियम बना सकेगा ।

83. कठिनाइयों का दूर किया जाना-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो और कठिनाई को दूर करने के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो :

                परन्तु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

                (2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

84. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

                (2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

85. निरसन और व्यावृत्ति-(1) माध्यस्थम् (प्रोटोकोल और अभिसमय) अधिनियम, 1937 (1937 का 6), माध्यस्थम् अधिनियम, 1940 (1940 का 10) और विदेशी पंचाट (मान्यता और प्रवर्तन) अधिनियम, 1961 (1961 का 45) इसके द्वारा निरसित किए जाते हैं ।

                (2) ऐसे निरसन के होते हुए भी,-

(क) उक्त अधिनियमितियों में के उपबंध, ऐसी माध्यस्थम् कार्यवाहियों के संबंध में, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व आरंभ हुई थी, तब तक लागू होंगे जब तक कि पक्षकारों द्वारा अन्यथा करार न किया गया हो किन्तु यह अधिनियम ऐसी माध्यस्थम् कार्यवाहियों के संबंध में लागू होगा जो इस अधिनियम के प्रवृत्त होने पर या उसके पश्चात् प्रारंभ हुई है ;

(ख) उक्त अधिनियमितियों के अधीन बनाए गए सभी नियम और प्रकाशित अधिसूचनाएं उस विस्तार तक जिस तक वे इस अधिनियम के विरुद्ध नहीं हैं, क्रमशः इस अधिनियम के अधीन की गई या जारी की गई समझी जाएंगी ।

86. 1996 के अध्यादेश सं० 27 का निरसन और व्यावृत्ति-(1) माध्यस्थम् और सुलह (तीसरा) अध्यादेश, 1996 इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के किसी उपबंध के अनुसरण में किया गया आदेश, बनाया गया नियम, जारी की गई अधिसूचना, बनाई गई स्कीम या की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई, बनाई गई या जारी की गई समझी जाएगी ।

पहली अनुसूची

(धारा 44 देखिए)

विदेशी माध्यस्थम् पंचाटों की मान्यता और प्रवर्तन के बारे

में अभिसमय

अनुच्छेद 1

                1. यह अभिसमय उस राज्य से, जहां ऐसे पंचाटों की मान्यता और प्रवर्तन को चाहा गया है, भिन्न राज्य के अन्दर किए गए और ऐसे व्यक्तियों के, चाहे वे देहदारी हैं या विधिक, आपनी मतभेदों के कारण उत्पन्न हुए, माध्यस्थम् पंचाटों की मान्यता और प्रवर्तन को लागू होगा । यह उन माध्यस्थम् पंचाटों को भी लागू होगा जो ऐसे राज्य में, जहां उनकी मान्यता और प्रवर्तन को चाहा गया है, देशी पंचाट नहीं माने गए हैं ।

2. माध्यस्थम् पंचाट" पद के अन्तर्गत न केवल ऐसे पंचाट हैं जो हर मामले के लिए नियुक्त मध्यस्थों द्वारा किए गए हैं,  किन्तु उनमें ऐसे पंचाट भी हैं, जो स्थायी माध्यस्थम् निकायों द्वारा, जिनमें पक्षकारों ने निवेदन किया है, किए गए हैं ।

3. जब इस अभिसमय को हस्ताक्षरित, अनुसमर्थित या अंगीकृत किया जाता है, या इसके अनुच्छेद 10 के अधीन उसका विस्तारण अधिसूचित किया जाता है तो पारस्परिकता के आधार पर कोई राज्य यह घोषित कर सकेगा कि वह इस अभिसमय को अन्य संविदाकारी राज्य के राज्यक्षेत्र में ही किए गए पंचाटों की मान्यता और प्रवर्तन को लागू करेगा । वह यह भी घोषित कर सकेगा कि वह इस अभिसमय को विधिक संबंधों से चाहे वे संविदात्मक हों या नहीं जो उस राज्य की जो ऐसी घोषणा कर रहा है राष्ट्रीय विधि के अधीन वाणिज्यिक माने जाते हैं, उत्पन्न होने वाले मतभेदों को ही लागू करेगा ।

अनुच्छेद 2

                1. हर संविदाकारी राज्य ऐसे लिखित करार को मान्यता देगा जिसके अधीन पक्षकार ऐसे सभी या किन्हीं मतभेदों को जो परिनिश्चित विधिक संबंध के बारे में चाहे वह संविदात्मक हो या नहीं माध्यस्थम् द्वारा निपटाए जाने योग्य विषयवस्तु के संबंध में जो उनके बीच उत्पन्न हुए हैं या उत्पन्न हों, माध्यस्थम् को प्रस्तुत करने का जिम्मा लेते हैं ।

2. लिखित करार" पद के अन्तर्गत किसी संविदा में ऐसा माध्यस्थम् खंड या ऐसा माध्यस्थम् करार भी सम्मिलित होगा जो पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित होगा या पत्रों या तारों के आदान-प्रदान में समाविष्ट होगा

3. जब कि ऐसे विषय के बारे में जिसके संबंध में अनुच्छेद के अर्थ में पक्षकारों ने कोई करार किया है, किसी संविदाकारी राज्य के न्यायालय के हाथ में मामला चला गया हो तब वह न्यायालय पक्षकारों में से किसी भी पक्षकार के निवेदन पर पक्षकारों को माध्यस्थम् के लिए उस दशा में ही निर्देशित करेगा जब उसका यह निष्कर्ष होता है कि उक्त करार अकृत और शून्य, अप्रवर्तनशील या पालन किए जाने के अयोग्य नहीं है ।

अनुच्छेद 3

हर संविदाकारी राज्य माध्यस्थम् पंचाटों को आबद्धकर रूप में मान्यता देगा और वह ऐसे राज्यक्षेत्र के, जहां निम्नलिखित अनुच्छेदों में अधिकथित शर्तों के अधीन पंचाट पर निर्भर किया जा रहा है प्रक्रिया के नियमों के अनुसरण में उनका प्रवर्तन करेगा । ऐसे माध्यस्थम् संबंधी पंचाटों की जिनको यह अभिसमय लागू होता है मान्यता या प्रवर्तन पर उन शर्तों या फीसों या प्रभारों से सारतः अधिक दुर्भर शर्तें या अधिक फीसें या प्रभार अधिरोपित नहीं किए जाएंगे जो कि देशी माध्यस्थम् पंचाटों की मान्यता या प्रवर्तन पर अधिरोपित किए जाते हैं ।

अनुच्छेद 4

                1. पूर्ववर्ती अनुच्छेद में वर्णित मान्यता और प्रवर्तन अभिप्राप्त करने के लिए, मान्यता और प्रवर्तन के लिए आवेदन करने वाला पक्षकार आवेदन करते समय, निम्नलिखित देगा :-

                                (क) सम्यक्तः अधिप्रमाणित मूल पंचाट या उसकी सम्यक्तः प्रमाणित प्रति,

                                (ख) अनुच्छेद 2 में निर्दिष्ट मूल करार या उसकी सम्यक्तः प्रमाणित प्रति ।

                2. यदि इस देश की जिसमें पंचाट पर निर्भर किया जा रहा है, किसी राजभाषा में उक्त पंचाट या करार नहीं किया गया है, तो वह पक्षकार, जो पंचाट की मान्यता और प्रवर्तन के लिए आवेदन कर रहा है, इन दस्तावेजों का अनुवाद उस भाषा में पेश करेगा । ऐसा अनुवाद किसी पदधारी या शपथगृहीत अनुवादक द्वारा या किसी राजनयिक या कौंसलीय अभिकर्ता द्वारा प्रमाणित किया जाएगा ।

अनुच्छेद 5

                1. उस पक्षकार के निवेदन पर जिसके विरुद्ध पंचाट का अवलंब लिया जा रहा है, पंचाट को मान्यता देने और प्रवर्तित करने से इंकार केवल उस दशा में किया जा सकेगा, जबकि मान्यता और प्रवर्तन चाहने की दशा में वह पक्षकार सक्षम प्राधिकारी को यह सबूत दे देता है कि-

(क) अनुच्छेद 2 में निर्दिष्ट करार के पक्षकार उनको लागू होने वाली विधि के अधीन, किसी असमर्थता से ग्रस्त थे, या उक्त करार उस विधि के अधीन, जिसके अधीन पक्षकारों ने उसे किया है, या उसमें उसके बारे में कोई संकेत न होने पर, उस देश की विधि के अधीन, जहां पंचाट किया गया था, विधिमान्य नहीं है ; या

(ख) उस पक्षकार को जिसके विरुद्ध पंचाट का अवलंब लिया जा रहा है, मध्यस्थ की नियुक्ति या माध्यस्थम् कार्यवाहियों की उचित सूचना नहीं दी गई थी, या वह अन्यथा अपने पक्ष कथन को प्रस्तुत करने में असमर्थ था ; या

(ग) पंचाट में ऐसे मतभेद पर विचार किया गया है, जो माध्यस्थम् के लिए निवेदन के निबंधनों द्वारा अनुध्यात नहीं है या उनके अन्तर्गत नहीं आता है, या इसमें माध्यस्थम् के लिए निवेदन के विषय क्षेत्र से बाहर के विषयों पर विनिश्चय अन्तर्विष्ट है, परन्तु यदि माध्यस्थम् के लिए निवेदित विषय संबंधी विनिश्चयों को उन विषयों से संबंधित विनिश्चयों से पृथक् किया जा सकता है, जो इस प्रकार माध्यस्थम् के लिए निवेदित नहीं किए गए हैं, तो पंचाट के उस भाग को जिसमें माध्यस्थम् के लिए निवेदित विषयों के बारे में विनिश्चय अन्तर्विष्ट हैं, मान्यता दी जा सकेगी और उसे प्रवर्तित किया जा सकेगा ; या

(घ) माध्यस्थम् प्राधिकरण का गठन या माध्यस्थम् की प्रक्रिया पक्षकारों के करार के अनुसार नहीं थी, या ऐसे करार के अभाव में, यह उस देश की, जहां माध्यस्थम् किया गया था, विधि के अनुसार नहीं थी, या

(ङ) पंचाट अभी पक्षकारों पर आबद्धकर नहीं हुआ है या उस देश के जिसमें या जिसकी विधि के अधीन, उस पंचाट को किया गया था, सक्षम प्राधिकारी द्वारा इसे अपास्त या निलंबित किया गया है ।

                2. किसी माध्यस्थम् पंचाट को मान्यता देने और प्रवर्तन करने से उस दशा में भी इंकार किया जा सकेगा, जबकि उस देश का, जहां मान्यता और प्रवर्तन चाहा गया है, समक्ष प्राधिकारी यह निष्कर्ष निकालता है, कि-

                                (क) मतभेद की विषयवस्तु का निपटारा उस देश की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा नहीं किया जा सकता है ; या

                                (ख) पंचाट की मान्यता या प्रवर्तन उस देश की लोक नीति के विरुद्ध होगा ।

अनुच्छेद 6

                यदि अनुच्छेद 5(1)(ङ) में निर्दिष्ट किसी सक्षम प्राधिकारी को पंचाट को अपास्त करने या निलंबित करने के लिए कोई आवेदन किया गया है, तो वह प्राधिकारी जिसके समक्ष पंचाट पर निर्भर किया जा रहा है, उस दशा में पंचाट के प्रवर्तन पर विनिश्चय देना स्थगित कर सकेगा, यदि वह ऐसा करना उचित समझता है, और पंचाट के प्रवर्तन का दावा करने वाले पक्षकार के आवेदन पर दूसरे पक्षकार को उचित प्रतिभूति देने के लिए आदेश भी दे सकेगा ।

अनुच्छेद 7

1. वर्तमान अभिसमय के उपबंध, संविदाकारी राज्यों द्वारा किए गए माध्यस्थम् पंचाटों की मान्यता और प्रवर्तन के बारे में बहुपक्षीय या द्विपक्षीय करारों की विधिमान्यता पर प्रभाव नहीं डालेंगे और न वे किसी हितबद्ध पक्षकार को ऐसे किसी अधिकार से वंचित करेंगे जिससे वह माध्यस्थम् पंचाट से उस देश की, जहां ऐसे पंचाट पर निर्भर किया जा रहा है ; विधि या संधियों द्वारा अनुज्ञात रीति से और विस्तार तक लाभ उठा सकेगा ।

2. 1923 के माध्यस्थम् खंडों के बारे में जेनेवा प्रोटोकोल और विदेशी माध्यस्थम् पंचाटों के निष्पादन के बारे में, 1927 के जेनेवा अभिसमय का प्रभाव संविदाकारी राज्य पर उनके इस अभिसमय द्वारा आबद्ध हो जाने पर और उस विस्तार तक जिस विस्तार तक वे आबद्ध हो गए थे, समाप्त हो जाएगा ।

अनुच्छेद 8

                1. यह अभिसमय संयुक्त राष्ट्र के किसी सदस्य की ओर से तथा ऐसे किसी अन्य राज्य की ओर से भी, जो संयुक्त राष्ट्र के किसी विशिष्ट अभिकरण का सदस्य है, या इसके पश्चात् सदस्य बन जाता है, या जो अन्तरराष्ट्रीय न्यायालय के स्टेट्यूट का या किसी अन्य राज्य का, जिसको संयुक्त राष्ट्र की साधारण सभा द्वारा निमंत्रण दिया गया है, पक्षकार है या इसके पश्चात् पक्षकार बन जाता है, 31 दिसम्बर, 1958 तक हस्ताक्षर के लिए खुला रहेगा ।

                2. इस अभिसमय का अनुसमर्थन किया जाएगा और अनुसमर्थन की लिखत संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के पास निक्षिप्त की जाएगी ।

 

 

अनुच्छेद 9

                1. यह अभिसमय अंगीकरण के लिए अनुच्छेद 8 में निर्दिष्ट सभी राज्यों के लिए खुला रहेगा ।

                2. अंगीकरण का कार्य अंगीकार-पत्र को संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के पास निक्षिप्त करके कार्यान्वित किया जाएगा ।

अनुच्छेद 10

                1. कोई भी राज्य, हस्ताक्षर, अनुसमर्थन या अंगीकरण के समय यह घोषित कर सकेगा कि यह अभिसमय उन सभी राज्यक्षेत्रों या उनमें से किसी राज्यक्षेत्र पर जिन अन्तरराष्ट्रीय संबंधों के लिए वह जिम्मेदार हैं विस्तारित होगा । ऐसी घोषणा तभी प्रभावी होगी जबकि अभिसमय संबद्ध राज्य के लिए प्रवृत्त होता है ।

                2. तत्पश्चात् किसी भी समय ऐसा कोई विस्तारण संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को संबोधित अधिसूचना द्वारा किया जाएगा और संयुक्त राष्ट्र के महासचिव द्वारा इस अधिसूचना की प्राप्ति के दिन के पश्चात् नब्बेवें दिन या सम्बद्ध राज्य के लिए अभिसमय के प्रवृत्त होने की तारीख में से, जो कोई भी पश्चात्वर्ती हो, उस दिन से प्रभावी होगा ।

                3. उन राज्यक्षेत्रों के संबंध में जिनको यह अभिसमय हस्ताक्षर, अनुसमर्थन या अंगीकरण के समय विस्तारित नहीं किया गया है, हर सम्बद्ध राज्य इस अभिसमय का लागू होना ऐसे राज्यक्षेत्रों तक विस्तारित करने के लिए आवश्यक कदम उठाने की संभाव्यता पर विचार करेगा जो ऐसे राज्यक्षेत्रों की सरकारों की सम्मति के अध्यधीन होगा जहां संवैधानिक कारणों से यह आवश्यक है ।

अनुच्छेद 11

                संपरिसंघीय या अनेकात्मक राज्य की दशा में, निम्नलिखित उपबंध लागू होंगे :-

(क) इस अभिसमय के उन अनुच्छेदों के बारे में, जो परिसंघीय प्राधिकारी की विधायी अधिकारिता में आते हैं, परिसंघीय सरकार की बाध्यताएं इस विस्तार तक वही होंगी, जो कि उन संविदाकारी राज्यों की है, जो परिसंघीय राज्य   नहीं हैं ;

(ख) इस अभिसमय के उन अनुच्छेदों के बारे में, जो घटक राज्यों या प्रांतों की, जो परिसंघ की संवैधानिक प्रणाली के अधीन विधायी कार्य करने के लिए आबद्ध नहीं हैं, विधायी अधिकारिता के अन्दर आते हैं, परिसंघीय सरकार घटक राज्यों या प्रांतों के समुचित प्राधिकारियों का ध्यान अनुकूल सिफारिश सहित यथासंभव शीघ्र ऐसे अनुच्छेदों की ओर आकर्षित   करेगी ;

(ग) इस अभिसमय का परिसंघीय राज्य पक्षकार, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव के माध्यम से पारेषित किसी अन्य संविदाकारी राज्य के निवेदन पर, परिसंघ और उसकी घटक इकाइयों की इस अभिसमय के किसी विशिष्ट उपबंध के बारे में विधि और प्रथा के संबंध में एक विवरण उस विस्तार को दर्शित करते हुए देगा, जहां तक कि विधायी या अन्य कार्य द्वारा उस उपबंध को कार्यान्वित किया गया है ।

अनुच्छेद 12

                1. तीसरे अनुसमर्थन या अंगीकार-पत्र के निक्षेप की तारीख से अगले नब्बेवें दिन को यह अभिसयम प्रवृत्त हो जाएगा ।

                2. तीसरे अनुसमर्थन या अंगीकार-पत्र के निक्षेप के पश्चात्, हर राज्य के लिए, जो इस अभिसमय को अनुसमर्थित या अंगीकार कर रहा है, यह ऐसे राज्य द्वारा अपने अनुसमर्थन या अंगीकार-पत्र का निक्षेप करने के पश्चात् नब्बेवें दिन को प्रवृत्त हो जाएगा ।

अनुच्छेद 13

                1. कोई संविदाकारी राज्य संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को लिखित अधिसूचना द्वारा इस अभिसमय का प्रत्याख्यान कर   सकेगा । प्रत्याख्यान महासचिव द्वारा अधिसूचना की प्राप्ति की तारीख से एक वर्ष के पश्चात् प्रभावी होगा ।

2. कोई राज्य जिसने अनुच्छेद 10 के अधीन घोषणा की है या अधिसूचना निकाली है, तत्पश्चात् किसी भी समय, संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को अधिसूचना द्वारा यह घोषित कर सकेगा कि महासचिव द्वारा अधिसूचना की प्राप्ति की तारीख से एक वर्ष के पश्चात् इस अभिसमय का विस्तारण सम्बद्ध राज्यक्षेत्र पर होना समाप्त हो जाएगा ।

3. यह अभिसमय उन माध्यस्थम् पंचाटों को लागू होता रहेगा जिसके संबंध में प्रत्याख्यान के प्रभावी होने के पूर्व मान्यता या प्रवर्तन विषयक कार्यवाहियां चलाई गई हैं ।

अनुच्छेद 14

                कोई संविदाकारी राज्य उसी विस्तार तक ही अन्य संविदाकारी राज्यों के विरुद्ध इस अभिसमय का लाभ उठाने का हकदार होगा जिस विस्तार तक वह स्वयं अभिसमय को लागू करने के लिए आबद्ध है ।

 

अनुच्छेद 15

                संयुक्त राष्ट्र के महासचिव अनुच्छेद 8 से अनुध्यात राज्यों को निम्नलिखित बातें अधिसूचित करेंगे :-

                                (क) अनुच्छेद 8 के अनुसार हस्ताक्षर और अनुसमर्थन ;

                                (ख) अनुच्छेद 9 के अनुसार अंगीकरण ;

                                (ग) अनुच्छेद 1, 10 और 11 के अधीन घोषणाएं और अधिसूचनाएं ;

                                (घ) वह तारीख, जिसको यह अभिसमय अनुच्छेद 12 के अनुसार प्रवृत्त होता है ;

                                (ङ) अनुच्छेद 13 के अनुसार प्रत्याख्यान और अधिसूचनाएं ।

अनुच्छेद 16

                1. यह अभिसमय, जिसके चीनी, अंग्रेजी, फ्रांसीसी, रूसी और स्पेनी पाठ भी समान रूप से अधिप्रमाणित होंगे, संयुक्त राष्ट्र के अभिलेखागार में निक्षिप्त किया जाएगा ।

                2. संयुक्त राष्ट्र के महासचिव इस अभिसमय की एक प्रमाणित प्रति अनुच्छेद 13 से अनुध्यात राज्यों को पारेषित करेंगे ।

दूसरी अनुसूची

(धारा 53 देखिए)

माध्यस्थम् खंड संबंधी प्रोटोकोल

                अधोहस्ताक्षरकर्ता, सम्यक् रूप से प्राधिकृत होते हुए यह घोषित करते हैं कि जिन देशों का हम प्रतिनिधित्व करते हैं उन देशों की ओर से हम निम्नलिखित उपबंध प्रतिगृहीत करते हैं :

                1. संविदाकारी राज्यों में से हर एक विभिन्न संविदाकारी राज्यों की अपनी-अपनी अधिकारिता के अधीन दो पक्षकारों के बीच, चाहे विद्यमान चाहे भावी मतभेदों संबंधी ऐसे करार की विधिमान्यता को स्वीकारता है जिसके जरिए संविदा के पक्षकारों ने यह करार किया है उन सभी या किन्हीं मतभेदों को वे माध्यस्थम् के लिए सुपुर्द करेंगे जो ऐसी संविदा के सिलसिले में ऐसे किन्हीं वाणिज्यिक विषयों या किन्हीं अन्य विषयों के संबंध में पैदा हों जो माध्यस्थम् द्वारा निपटाए जाने के लायक हैं, भले ही वह माध्यस्थम् ऐसे किसी देश में होना हो या न होना हो जिसकी अधिकारिता के अधीन पक्षकारों में से कोई भी नहीं है :

                हर संविदाकारी राज्य ऊपर बताई हुई अपनी बाध्यता ऐसी संविदाओं तक ही सीमित रखने का अपना अधिकार अपने हाथ में रखता है जो उसकी अपनी राष्ट्रीय विधि के अधीन वाणिज्यिक स्वरूप की समझी जाती है । जो कोई भी संविदाकारी राज्य इस अधिकार को काम में लाए वह लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल को इस बात की सूचना देगा जिससे कि अन्य संविदाकारी राज्यों को इसकी जानकारी दी जा सके ।

                2. माध्यस्थम् प्रक्रिया, जिसके अन्तर्गत माध्यस्थम् अधिकरण का गठन है, पक्षकारों को इच्छानुसार तथा उस देश की विधि के अनुसार जिसके राज्यक्षेत्र के अन्तर्गत यह माध्यस्थम् होता है, शासित की जाएगी ।

                संविदाकारी राज्य इस बात का करार करते हैं कि वे प्रक्रिया संबंधी उन सब कदमों के उठाए जाने के लिए सुगमता प्रदान करेंगे जो विद्यमान मतभेदों को लागू माध्यस्थम् प्रक्रिया को नियत करने वाली उनकी विधि के उपबंधों के अनुसार उनके राज्यक्षेत्रों में उठाए जाने के लिए अपेक्षित हों ।

                3. प्रत्येक संविदाकारी राज्य यह वचनबंध करता है कि पूर्ववर्ती अनुच्छेदों के अधीन जो कोई माध्यस्थम् पंचाट उसके अपने राज्यक्षेत्र के अंदर दिए जाएं उनका निष्पादन वह अपने प्राधिकारियों द्वारा तथा अपनी राष्ट्रीय विधियों के उपबंधों के अनुसार   कराएगा ।

                4. संविदाकारी पक्षकारों के अधिकरण ऐसी संविदा विषयक विवाद अपने संज्ञान में आने पर जो उन व्यक्तियों के बीच की  गई है, जिन्हें अनुच्छेद 1 लागू है और जिसके अंतर्गत, चाहे तो विद्यमान या भावी मतभेदों के निर्दिष्ट किए जाने संबंधी ऐसा माध्यस्थम् करार भी है, जो उक्त अनुच्छेद के आधार पर विधिमान्य है, और क्रियान्वित किया जा सकता है, पक्षकारों को उनमें से किसी के आवेदन पर माध्यस्थम् के विनिश्चय के लिए निर्देशित करेगा ।

                ऐसा निर्देश न्यायिक अधिकरणों की सक्षमता पर उस दशा में प्रतिकूल प्रभाव नहीं डालेगा जिसमें कि वह करार या माध्यस्थम् आगे नहीं चल सकता या अप्रवर्तनीय हो गया है ।

                5. यह प्रोटोकोल जो सब राज्यों के हस्ताक्षर के लिए खुला रहेगा, अनुसमर्थित किया जाएगा । वह अनुसमर्थन लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल के यहां यथासम्भव शीघ्र निक्षिप्त किया जाएगा और वह सेक्रेटरी जनरल ऐसे निक्षेप की सूचना सब हस्ताक्षरकर्ता राज्यों को देगा ।

                6. यह प्रोटोकोल वैसे ही प्रवृत्त हो जाएगा जैसे ही दो अनुसमर्थन निक्षिप्त कर दिए जाते हैं । उसके पश्चात् यह हर संविदाकारी राज्य की दशा में उसके अनुसमर्थन के निक्षेप की उक्त सेक्रेटरी जनरल द्वारा सूचना दिए जाने के एक मास के पश्चात् प्रभावशील हो जाएगा ।

                7. वर्तमान प्रोटोकोल का किसी संविदाकारी राज्य द्वारा एक वर्ष की सूचना देने के पश्चात् प्रत्याख्यान किया जा सकेगा । प्रत्याख्यान लीग के सेक्रेटरी जनरल अधिसूचना की प्रतियां सब हस्ताक्षरकर्ता राज्यों को भेजेगा और उन्हें उस तारीख की इत्तिला देगा जिसको वह प्राप्त हुई थी । प्रत्याख्यान उस तारीख से एक वर्ष के पश्चात् प्रभावशील होगा जिसको उसकी अधिसूचना सेक्रेटरी जनरल को दी गई थी तथा वह केवल अधिसूचना देने वाले राज्य के संबंध में ही प्रवर्तनशील होगा ।

                8. संविदाकारी राज्य यह घोषित कर सकेंगे कि इस प्रोटोकोल के उनके प्रतिग्रहण के अंतर्गत निम्नलिखित राज्यक्षेत्रों में से कोई या सब नहीं आते, अर्थात् उनके उपनिवेश, विदेशी कब्जाधीन क्षेत्र या राज्यक्षेत्र, संरक्षित देश या वे राज्यक्षेत्र जिन पर वे आदेश का प्रयोग करते हैं ।

                उक्त राज्य इस प्रकार अपवर्जित किसी राज्यक्षेत्र की ओर से पृथक्तः इसके बाद में अनुषक्त हो सकेंगे । ऐसी अनुषक्ति की यथा संभवशीघ्र जानकारी लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल को दी जाएगी । वह सेक्रेटरी जनरल ऐसी अनुषक्तियों की अधिसूचना सब हस्ताक्षरकर्ता राज्यों को देगा । ये अनुषक्तियां हस्ताक्षरकर्ता राज्यों को सेक्रेटरी जनरल द्वारा दी गई अधिसूचना की तारीख से एक मास के पश्चात् प्रभावशील हो जाएंगी ।

                संविदाकारी राज्य ऊपर निर्दिष्ट राज्यक्षेत्र में से किसी की ओर से पृथक्तः इस प्रोटोकोल को प्रत्याख्यात भी कर सकेंगे । ऐसे प्रत्याख्यापन को अनुच्छेद 7 लागू होगा ।

तीसरी अनुसूची

(धारा 53 देखिए)

विदेशी माध्यस्थम् पंचाटों के निष्पादनों से संबंधित अभिसमय

अनुच्छेद 1

                (1) ऐसे किसी भी उच्च संविदाकारी पक्षकार के जिसे वह अभिसमय लागू है, राज्यक्षेत्र में वह माध्यस्थम् पंचाट जो 24 सितम्बर, 1923 को जेनेवा में उद्घाटित माध्यस्थम् खंडों विषयक प्रोटोकोल की व्याप्ति के अन्तर्गत आने वाले ऐसे करार के अनुसरण में जो विद्यमान या भविष्यवर्ती मतभेदों से संबंधित हैं (और जिसे इसमें इसके पश्चात् माध्यस्थम् के लिए निवेदन" कहा गया है) आबद्धकर माना जाएगा तथा उस राज्यक्षेत्र में प्रक्रिया विषयक नियमों के अनुसार प्रवृत्त किया जाएगा जिसमें उस पंचाट पर निर्भर रहा जाता है । परन्तु यह तब जब कि उक्त पंचाट उन उच्च संविदाकारी पक्षों में से किसी एक के राज्यक्षेत्र के अंदर दिया गया है जिसे कि यह अभिसयम लागू है और जो उन व्यक्तियों के बीच है जो उच्च संविदाकारी पक्षकारों में से किसी एक की अधिकारिता के अधीन है ।

                (2) ऐसी मान्यता या प्रवर्तन अभिप्राप्त करने के लिए यह अतिरिक्त बात आवश्यक होगी-

(क) कि वह पंचाट ऐसे माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत करने के अनुसरण में दिया गया है जो उसे लागू विधि के अधीन विधिमान्य है ;

(ख) कि उस पंचाट की विषयवस्तु उस देश की विधि के अधीन माध्यस्थम् द्वारा निपटाए जाने के लायक है जिस देश में उस पंचाट पर निर्भर रहने का प्रयास है ;

(ग) कि वह पंचाट माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत निवेदन करने में उपबंधित अथवा पक्षकारों द्वारा करार पाई गई रीति से गठित तथा माध्यस्थम् प्रक्रिया के विषय में लागू विधि के अनुरूप गठित माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा दिया गया है ;

(घ) कि वह पंचाट उस देश में जिसमें वह दिया गया है, इस अर्थ में अंतिम स्वरूप का हो गया है कि वह इस स्वरूप का उस दशा में न समझा जाएगा कि (उन देशों में जिनमें कि इस प्रकार की प्रक्रिया विद्यमान है) न्यायालय में उसके बारे में विरोध, अपील या पुनर्विलोकन किया जा सकता है अथवा जिसमें कि यह सिद्ध कर दिया जाता है कि उस पंचाट की विधिमान्यता को विवादास्पद करने वाली कोई कार्यवाहियां लंबित हैं ;

(ङ) कि उस पंचाट की मान्यता देना या उसका प्रवर्तन करना लोक नीति के प्रतिकूल नहीं है और न उस देश की विधि के सिद्धान्तों के प्रतिकूल है जिसमें कि उस पर निर्भर रहने का प्रयास है ।

अनुच्छेद 2

                यद्यपि इसके अनुच्छेद 1 में अधिकथित शर्तें पूरी हो गई हों तथापि उस पंचाट की मान्यता उस दशा में न दी जाएगी तथा उसका प्रवर्तन उस दशा में न किया जाएगा जिसमें कि न्यायालय का समाधान हो जाता है-

                                (क) कि वह पंचाट उस देश में बातिल कर दिया गया है जिसमें वह दिया गया था ;

                (ख) कि जिस पक्षकार के विरुद्ध उस पंचाट को काम में लाने का प्रयास है उसे माध्यस्थम् कार्यवाहियों की सूचना इतने समय के अन्दर न दी गई थी जो अपना पक्ष कथन प्रस्तुत करने के लिए उसे समर्थन करने के वास्ते पर्याप्त हो अथवा विधिक अक्षमता के अधीन होते हुए जिसका प्रतिनिधित्व समुचित रूप से नहीं किया गया था ;

                (ग) कि वह पंचाट उन मतभेदों के संबंध में नहीं है जो माध्यस्थम् के लिए प्रस्तुत निवेदन करने के निबंधनों द्वारा संकल्पित थे अथवा उनकी व्याप्ति के अंतर्गत आते थे, अथवा उस पंचाट में उन विषयों संबंधी विनिश्चय अंतर्विष्ट हैं जो माध्यस्थम् निर्देश के प्रविषय के बाहर हैं ।

यदि पंचाट में उन सब प्रश्नों का अभिनिश्चय नहीं किया गया है जो माध्यस्थम् अधिकरण को प्रस्तुत किए गए थे तो जिस देश में उस पंचाट को मान्यता दिए जाने या उसके प्रवर्तन कराए जाने का प्रयास है उस देश का सक्षम प्राधिकारी उस दशा में जिसमें वह यह करना ठीक समझता है ऐसी मान्यता देना या ऐसा प्रवर्तित करना मुल्तवी कर सकेगा या वह ऐसी मान्यता या प्रवर्तन को ऐसी प्रत्याभूति की शर्त पर मंजूर कर सकेगा जैसी यह प्राधिकारी विनिश्चय करे ।

अनुच्छेद 3

                यदि वह पक्षकार जिसके विरुद्ध पंचाट किया गया है यह साबित कर देता है कि माध्यस्थम् प्रक्रिया को लागू विधि के अधीन ऐसा कोई आधार, जो अनुच्छेद 1 के खंड (क) और (ग) में तथा अनुच्छेद 2 के खंड (ख) और (ग) में निर्दिष्ट आधारों से भिन्न है, विद्यमान हैं जिससे उसे उस पंचाट की विधिमान्यता को न्यायालय में विवादास्पद करने का हक प्राप्त हो जाता है, तो यदि न्यायालय ऐसा करना ठीक समझता है तो वह या तो उस पंचाट को मान्यता देने या उसके प्रवर्तन करने से इंकार कर सकेगा अथवा उस पक्षकार को उस बात के लिए युक्तियुक्त समय देकर कि वह उसके अंदर उस पंचाट को सक्षम अधिकरण द्वारा बातिल करा ले उस पर विचार स्थगित कर सकेगा ।

अनुच्छेद 4

                जो पक्षकार किसी पंचाट पर निर्भर रह रहा है या उसका प्रवर्तन कराने का दावा करता है उसके लिए यह आवश्यक होगा कि वह विशिष्टत :-

(1) मूल पंचाट या उस देश की विधि की अपेक्षाओं के अनुसार जिसमें वह किया गया था, सम्यक् रूप से अधिप्रमाणित उसकी प्रति ;

(2) यह साबित करने के लिए कि जिस देश में वह दिया गया था उस देश में वह अनुच्छेद 1 (घ) में परिभाषित अर्थ के अंदर अंतिम स्वरूप का हो गया हो, दस्तावेजी या अन्य साक्ष्य ;

(3) जब आवश्यक हो, तब यह साबित करने के लिए कि अनुच्छेद के पैरा (1) और पैरा (2) के खंड (क) और (ग) में अधिकथित शर्त पूरी हो गई हैं, दस्तावेजी या अन्य साक्ष्य दे,

                पंचाट का तथा इस अनुच्छेद में वर्णित अन्य दस्तावेजों का उस देश की राजभाषा में अनुवाद, जिसमें उस पंचाट पर निर्भर रहा जा रहा है, मांगा जा सकेगा । ऐसे अनुवादों की बाबत उस देश के जिसका कि वह पक्षकार है जो उस पंचाट पर निर्भर रह रहा है, राजनयिक या कौंसलीय अभिकर्ता द्वारा अथवा उस देश के जिसमें कि उस पंचाट पर निर्भर रहने का प्रयास है, शपथगृहीत अनुवादक द्वारा यह प्रमाणित किया जाना आवश्यक होगा कि वह सही है ।

अनुच्छेद 5

                ऊपर दिए गए अनुच्छेदों के उपबंधों से कोई भी हितबद्ध पक्षकार माध्यस्थम् पंचाट का उस रीति से तथा उस विस्तार तक जो उस देश की विधि या संधियों द्वारा अनुज्ञात है जिसमें कि उस पंचाट पर निर्भर रहने का प्रयास है, लाभ उठाने के उसके अधिकार से वंचित हो जाएगा

अनुच्छेद 6

                यह अभिसयम 24 सितम्बर, 1923 में जेनेवा में उद्घाटित माध्यस्थम् खंड प्रोटोकोल के प्रवर्तन में आने के पश्चात् दिए गए माध्यस्थम् पंचाटों को ही लागू है

अनुच्छेद 7

                यह अभिसमय, जो 1923 के माध्यस्थम् खंड प्रोटोकोल के सब हस्ताक्षरकर्ताओं के हस्ताक्षर के लिए खुला रहेगा, अनुसमर्थित किया जाएगा

                यह लीग आफ नेशन्स के उन सदस्यों की तथा गैर-सदस्य राज्यों की ओर से ही जिनकी ओर से 1923 का प्रोटोकोल अनुसमर्थित कर दिया गया है, अनुसमर्थित किया जा सकेगा

                यह अनुसमर्थन लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल के यहां यथासंभव शीघ्र निक्षिप्त किए जाएंगे वह सेक्रेटरी जनरल ऐसे निक्षेप की अधिसूचना सब हस्ताक्षरकर्ताओं को देगा

अनुच्छेद 8

                यह अभिसमय दो उच्च संविदाकारी पक्षों की ओर से अनुसमर्थित कर दिए जाने के तीन मास पश्चात् प्रवृत्त हो जाएगा तत्पश्चात् यह हर उच्च संविदाकारी पक्ष की दशा में उसकी ओर से अनुसमर्थन लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल के यहां निक्षिप्त किए जाने के तीन मास के पश्चात् प्रभावशील हो जाएगा

अनुच्छेद 9

                इस अभिसमय का प्रत्याख्यान लीग के किसी सदस्य की अथवा किसी गैर-सदस्य राज्य की ओर से किया जा सकेगा प्रत्याख्यान लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल को लिखित रूप में अधिसूचित किया जाएगा, जो अधिसूचनाओं के अनुरूप प्रमाणित उसकी प्रति सब अन्य संविदाकारी पक्षों को उस तारीख को, जिसको वह उसे प्राप्त हुआ था, उसी समय जानकारी देते हुए   रन्त भेजेगा

                वह प्रत्याख्यान उस उच्च संविदाकारी पक्ष की बाबत ही जिसने उसकी अधिसूचना दी है तथा लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल को ऐसी अधिसूचना के मिलने के एक वर्ष के पश्चात् ही प्रवृत्त होगा

                माध्यस्थम् खंड प्रोटोकोल का प्रत्याख्यान स्वयमेव ही इस अभिसमय का प्रत्याख्यान हो जाएगा

अनुच्छेद 10

                यह अभिसमय उन उपनिवेशों, संरक्षित या ऐसे राज्यक्षेत्रों को जो किसी उच्च संविदाकारी पक्ष के अधिराजत्वाधीन या मैंडेट के अधीन हैं, तब के सिवाय लागू होगा, जब कि वे विशेषतः वर्णित कर दिए गए हैं

                यह अभिसमय उन उपनिवेशों, संरक्षित देशों या राज्यक्षेत्रों में से, जिन्हें 24 सितम्बर, 1923 को जेनेवा में उद्घाटित माध्यस्थम् खंड प्रोटोकोल लागू है एक या अधिक की ऐसी किसी घोषणा के जरिए किसी समय लागू किया जा सकेगा जो लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल को महान संविदाकारी पक्षों में से किसी एक द्वारा संबोधित है

                ऐसी घोषणा उसके निक्षिप्त किए जाने के तीन मास के पश्चात् प्रभावशील होगी

                उच्च संविदाकारी पक्षकार ऊपर निर्दिष्ट सब उपनिवेशों, संरक्षित देशों या राज्यक्षेत्र के लिए या उनमें से किसी के लिए किसी समय पर भी इस अभिसमय को प्रत्याख्यान कर सकेंगे ऐसे प्रत्याख्यान को इसका अनुच्छेद 9 लागू होगा

अनुच्छेद 11

                इस अभिसमय की प्रमाणित प्रति लीग आफ नेशन्स के सेक्रेटरी जनरल द्वारा लीग आफ नेशन्स के हर सदस्य को तथा हर    गैर-सदस्य राज्य को जो इसे हस्ताक्षरित करता है, भेजी जाएगी

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