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रंगभेद विरोधी (संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) अधिनियम, 1981 ( Anti-Apartheid (United Nation Convention) Act, 1981 )


 

रंगभेद विरोधी (संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) अधिनियम, 1981

 

(1981 का अधिनियम संख्यांक 48)

[18 दिसम्बर, 1981]

रंगभेद के अपराध के दमन और दण्ड से संबंधित

अन्तरराष्ट्रीय कन्वेंशन को प्रभावी

करने के लिए

अधिनियम

रंगभेद के अपराध के दमन और दण्ड से संबंधित अन्तरराष्ट्रीय कन्वेंशन को संयुक्त राष्ट्र की महासभा ने 30 नवम्बर, 1973 को अंगीकार किया था;

और भारत को, जिसने उक्त कन्वेंशन को अंगीकार किया है, उसे प्रभावी करने के लिए उपबन्ध करना चाहिए;

भारत गणराज्य के बत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो:-

1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम रंगभेद विरोधी (संयुक्त राष्ट्र कन्वेंशन) अधिनियम, 1981 है ।

(2) इसका विस्तार सम्पूर्ण भारत पर है ।

2. रंगभेद के अपराध के दमन और दण्ड से सम्बन्धित अन्तरराष्ट्रीय कन्वेंशन का लागू होना-(1) किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, रंगभेद अपराध के दमन और दण्ड से संबंधित अन्तरराष्ट्रीय कन्वेंशन के ऐसे उपबन्ध, जो अनुसूची में उपवर्णित हैं, भारत में विधि का बल रखेंगे ।

(2) केन्द्रीय सरकार, उक्त कन्वेंशन में उपवर्णित उपबन्धों के, सम्यक् रूप से किए गए और अंगीकृत, संशोधनों के अनुरूप अनुसूची का संशोधन, समय-समय पर राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, कर सकेगी ।

(3) उपधारा (2) के अधीन जारी की गई प्रत्येक अधिसूचना उसके जारी किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखी जाएगी ।

3. अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक उत्तरदायित्व के लिए दण्ड-प्रत्येक व्यक्ित, जिसको उक्त कन्वेंशन के अनुच्छेद 3 के अधीन अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक उत्तरदायित्व, जैसा कि वह अनुसूची में उपवर्णित है, लागू होता है, मृत्यु दण्ड से या आजीवन कारावास से या कारावास से, जो दस वर्ष तक का हो सकेगा, दण्डित किया जाएगा और जुर्माने का भी दायी होगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए उक्त कन्वेंशन के अनुच्छेद 3 के खण्ड (क) में अनुच्छेद 2 के प्रति निर्देश का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वह उस कन्वेंशन के अनुच्छेद 2 के, जैसा कि वह अनुसूची में उपवर्णित है, उपबन्धों के प्रति निर्देश है ।

4. कम्पनियों, संगठनों या संस्थाओं द्वारा अपराध-यदि इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी या किसी संगठन या किसी संस्था द्वारा किया गया है तो ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी, संगठन या संस्था के कारबार या कार्यकलाप के संचालन के लिए, यथास्थिति, उस कंपनी, संगठन या संस्था का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, अपराध का दोषी समझा जाएगा और तदनुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दण्डित किए जाने का भागी होगा:

परन्तु इस धारा की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को इस अधिनियम में उपबन्धित किसी दण्ड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए कंपनीञ्ज् से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है ।

5. विचारण का स्थान-धारा 3 के अधीन अपराध करने वाले किसी व्यक्ति का अपराध के लिए विचारण किसी ऐसे स्थान पर, जहां वह पाया जाता है या किसी ऐसे अन्य स्थान पर किया जा सकेगा, जो केंद्रीय सरकार राजपत्र में प्रकाशित साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस निमित्त निदिष्ट करे ।

6. गिरफ्तारी या अभियोजन के लिए केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी-धारा 3 के अधीन किसी अपराध के बारे में किसी व्यक्ति की गिरफ्तारी या उसका अभियोजन केंद्रीय सरकार या ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी की, जो इस सरकार द्वारा इस निमित्त लिखित आदेश द्वारा प्राधिकृत किया जाए, पूर्व मंजूरी से ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।

7. प्रत्यर्पण अधिनियम विषयक उपबन्ध-प्रत्यर्पण अधिनियम, 1962 (1962 का 34) के प्रयोजनों के लिए धारा 3 के अधीन अपराध राजनीतिक प्रकृति का अपराध नहीं जाना जाएगा ।

अनुसूची

(धारा 2 और 3 देखिए)

रंगभेद के अपराध के दमन और दंड से सम्बन्धित अन्तरराष्ट्रीय कन्वेंशन के उपबन्ध जो विधि का बल रखेंगे

।                              ।                              ।                              ।

अनुच्छेद 2

वर्तमान कन्वेंशन के प्रयोजन के लिए रंगभेद का “अपराध” पद, जिसके अन्तर्गत मूलवंश के आधार पर पृथक्करण और भेदभाव की वैसी ही नीति और व्यवहार हैं जो दक्षिणी अफ्रीका में किए जाते हैं, निम्नलिखित अमानवीय कार्यों को लागू होगा जो एक मूलवंश के व्यक्तियों के समूह द्वारा दूसरे मूलवंश के व्यक्तियों के समूह पर प्रभुत्व स्थापित करने और बनाए रखने तथा सुनियोजित ढंग से उन्हें सताने के प्रयोजनों से किए जाते हैं, अर्थात् :-

(क) किसी मूलवंश के समूह या समूहों के सदस्य या सदस्यों को जीवन और दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार से निम्न प्रकार वंचित करना-

(i) किसी मूलवंश के समूह या समूहों के सदस्यों की हत्या करना;

(ii) किसी मूलवंश के समूह या समूहों के सदस्यों को गंभीर शारीरिक या मानसिक नुकसान पहुंचाना, उनकी स्वतंत्रता या गरिमा का अतिलंघन करना या उन्हें यातना देना या उनसे क्रूर, अमानवीय या अपमानजनक व्यवहार करना या दंड देना;

(iii) किसी मूलवंश के समूह या समूहों के सदस्यों की मनमानी गिरफ्तारी करना और अवैध कारावास   में रखना ;

(ख) किसी मूलवंश के समूह या समूहों पर जानबूझकर ऐसी जीवन की परिस्थितियां अधिरोपित करना जो उसके या उनके पूर्णतः या भागतः भौतिक विनाश के लिए हों;

                ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

                                (ङ) किसी मूलवंश के समूह या समूहों के सदस्यों के श्रम का, विशिष्टतया उनसे बलात् श्रम करवा कर, शोषण ;

(च) संगठनों और व्यक्तियों का, उनके मूल अधिकारों और स्वतंत्रता से वंचित करके, इस कारण उत्पीड़न करना कि वे रंगभेद का विरोध करते हैं ।

अनुच्छेद 3

                व्यक्तियों, संगठनों और संस्थाओं के सदस्यों और राज्य के प्रतिनिधियों को, चाहे वे ऐसे राज्य के राज्यक्षेत्र में, जिसमें कार्य किए जाते हैं, या किसी अन्य राज्य में निवास करते हैं, अन्तरराष्ट्रीय आपराधिक उत्तरदायित्व, उसके हेतुक पर विचार किए बिना, तब लागू होगा, जब वे-

(क) वर्तमान कन्वेंशन के अनुच्छेद 2 में वर्णित कार्य करते हैं, उनमें भाग लेते हैं, उनका सीधे उद्दीपन करते हैं, या उनके किए जाने का षड़यंत्र करते हैं;

(ख) रंगभेद के अपराध के किए जाने को सीधे दुष्प्रेरित करते हैं, प्रोत्साहित करते हैं या उसमें सहयोग देते हैं ।

।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

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