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विवादग्रस्त निर्वाचन (प्रधान मंत्री और अध्यक्ष) ( Disputed Elections (Prime Minister and Speaker) Rules, 1977 )


 

विवादग्रस्त निर्वाचन (प्रधान मंत्री और अध्यक्ष)

अधिनियम, 1977

(1977 का अधिनियम संख्यांक 16)

[18 अप्रैल, 1977]

प्रधान मंत्री और लोक सभा के अध्यक्ष की दशा में संसद् के लिए

विवादग्रस्त निर्वाचनों का निपटारा करने के लिए

प्राधिकरणों का और उनसे सम्बन्धित

विषयों का उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के अट्ठाईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विवादग्रस्त निर्वाचन (प्रधान मंत्री और अध्यक्ष) अधिनियम, 1977 है

                (2) यह 3 फरवरी, 1977 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो,-

                                () प्राधिकरण" से अर्जी के विचारण के लिए धारा 4 के अधीन गठित प्राधिकरण अभिप्रेत है ;

                () अभ्यर्थी" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी निर्वाचन में अभ्यर्थी के रूप में सम्यक्तः नामनिर्दिष्ट किया गया है या सम्यक्तः नामनिर्दिष्ट होने का दावा करता है ;

() खर्चे" से इस अधिनियम के अधीन अर्जी के विचारण के या उससे आनुषंगिक सब खर्चे, प्रभार और व्यय अभिप्रेत हैं ;

() निर्वाचन" से प्रधान मंत्री की दशा में या अध्यक्ष की दशा में निर्वाचन अभिप्रेत है ;

() प्रधान मंत्री की दशा में निर्वाचन" से संसद् के किसी भी सदन के लिए ऐसे व्यक्ति का निर्वाचन अभिप्रेत है जो ऐसे निर्वाचन के समय प्रधान मंत्री का पद धारण करता है या ऐसे निर्वाचन के पश्चात् प्रधान मंत्री नियुक्त किया जाता है ;

() अध्यक्ष की दशा में निर्वाचन" से लोक सभा के लिए किसी ऐसे व्यक्ति का निर्वाचन अभिप्रेत है जो ऐसे निर्वाचन के समय अध्यक्ष का पद धारण करता है या ऐसे निर्वाचन के पश्चात् उस सदन के लिए अध्यक्ष चुना जाता है ;

() अर्जी" से किसी निर्वाचन को प्रश्नगत करने वाली अर्जी अभिप्रेत है ;

() विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;

() निर्वाचित अभ्यर्थी" से वह अभ्यर्थी अभिप्रेत है जिसका नाम, यथास्थिति, प्रधान मंत्री की दशा में निर्वाचन में या अध्यक्ष की दशा में निर्वाचन में सम्यक्तः निर्वाचित रूप में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 67 के अधीन प्रकाशित कर दिया गया है ;

() उन सभी पदों के जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) में परिभाषित हैं, किन्तु इस अधिनियम में परिभाषित नहीं हैं वही अर्थ होंगे जो उस अधिनियम में हैं

अध्याय 2

विवादग्रस्त निर्वाचनों के लिए प्राधिकरण

3. विवादग्रस्त निर्वाचनों के सम्बन्ध में अर्जियां-कोई भी निर्वाचन इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार पेश की गई अर्जी द्वारा ही प्रश्नगत किया जाएगा, अन्यथा नहीं

4. अर्जी का विचारण करने के लिए प्राधिकरण-(1) प्रत्येक अर्जी का विचारण उस प्राधिकरण द्वारा किया जाएगा जिसका केन्द्रीय सरकार ने, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, उस प्रयोजन के लिए गठन किया है

                (2) प्राधिकरण में केवल एक सदस्य होगा जो उच्चतम न्यायालय का न्यायाधीश हो और भारत के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा इस निमित्त नामनिर्दिष्ट किया जाए

                (3) यदि पूर्वोक्त सदस्य के पद में किसी कारण से कोई रिक्ति हो जाती है तो मुख्य न्यायाधिपति, यथासाध्य शीघ्र, उस रिक्ति को भरने के लिए किसी व्यक्ति को नामनिर्दिष्ट करेगा और तब उस अर्जी का विचारण ऐसे चालू रहेगा मानो वह सदस्य ऐसी अर्जी के विचारण के प्रारम्भ से प्राधिकरण था :

                परन्तु यदि प्राधिकरण ठीक समझता है तो वह उन साक्षियों में से, जिनकी पहले परीक्षा की जा चुकी है, किसी को पुनः बुला सकेगा और उसकी पुनः परीक्षा कर सकेगा

अध्याय 3

विवादग्रस्त निर्वाचनों के सम्बन्ध में अर्जियों का पेश किया जाना

5. अर्जी का पेश किया जाना-(1) किसी निर्वाचन को प्रश्नगत करने वाली अर्जी लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951(1951 का 43) की धारा 100 की उपधारा (1) और धारा 101 में विनिर्दिष्ट आधारों में से एक या अधिक आधारों पर निर्वाचन आयोग को ऐसे निर्वाचन का कोई अभ्यर्थी या निर्वाचक निर्वाचित अभ्यर्थी के निर्वाचन की तारीख से या यदि निर्वाचन में एक से अधिक निवार्चित अभ्यर्थी हैं और उनके निर्वाचन की तारीखें भिन्न हैं, तो उन तारीखों में से अन्तिम तारीख से पैंतालीस दिन के भीतर पेश कर सकेगा किन्तु उससे पहले नहीं :

                परन्तु किसी ऐसे व्यक्ति के निर्वाचन को प्रश्नगत करने वाली कोई अर्जी, जो ऐसे निर्वाचन के समय, यथास्थिति, प्रधान मंत्री या लोक सभा के अध्यक्ष का पद धारण नहीं करता है और जो ऐसे निर्वाचन के पश्चात् किन्तु ऐसी अर्जी पेश करने के समय की समाप्ति के पूर्व उस पद के लिए नियुक्त किया गया है या चुना गया है, उस तारीख से पैंतालीस दिन के भीतर पेश की जा सकेगी, जिसको ऐसा व्यक्ति प्रधान मंत्री नियुक्त किया गया था या लोक सभा का अध्यक्ष चुना गया था

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा में, निर्वाचक" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो उस निर्वाचन में, जिससे अर्जी सम्बन्धित है, मतदान करने का हकदार था, भले ही उसने ऐसे निर्वाचन में मतदान किया हो या किया हो

                (2) कोई अर्जी निर्वाचन आयोग को उस समय पेश की गई समझी जाएगी जब वह निर्वाचन आयोग को या ऐसे अधिकारी को, जो उसके द्वारा इस निमित्त नियुक्त किया जाए, निम्नलिखित व्यक्ति द्वारा दी जाती है, अर्थात्: -

                                () अर्जी देने वाला व्यक्ति, या

                                () अर्जी देने वाले व्यक्ति द्वारा इस निमित्त लिखित रूप में प्राधिकृत कोई व्यक्ति

                (3) प्रत्येक अर्जी के साथ उसकी उतनी प्रतियां होंगी जितने प्रत्यर्थी उन अर्जी में वर्णित हैं तथा एक और प्रति निर्वाचन आयोग के उपयोग के लिए होगी और अर्जीदार ऐसी प्रत्येक प्रति को अपने हस्ताक्षर ने अनुप्रमाणित करेगा कि वह अर्जी की सही प्रति है

                (4) अर्जी पेश करने के समय अर्जीदार खर्चे के लिए प्रतिभूति के रूप में दो हजार रुपए की राशि निर्वाचन आयोग में ऐसी रीति से निक्षिप्त करेगा जो विहित की जाए

                (5) अर्जी का विचारण करने वाला प्राधिकरण अर्जी के विचारण के दौरान किसी भी समय अर्जीदार से खर्चे के लिए ऐसी अतिरिक्त प्रतिभूति देने की मांग कर सकेगा जो वह निदेश दे

                (6) कोई व्यक्ति धारा 10 की उपधारा (3) के अधीन अर्जी में प्रत्यर्थी के रूप में संयोजित किए जाने का हकदार तब तक नहीं होगा जब तक वह व्यक्ति खर्चे के लिए ऐसी प्रतिभूति दे दे जो प्राधिकरण द्वारा निदिष्ट की जाए

6. अर्जी के पक्षकार-अर्जीदार अपनी अर्जी में प्रत्यर्थी के रूप में निम्नलिखित को संयोजित करेगा, अर्थात्: -

() जब अर्जीदार इस घोषणा के लिए कि सब निर्वाचित अभ्यर्थियों या उनमें से किसी का निर्वाचन शून्य है, दावा करने के अतिरिक्त इस अतिरिक्त घोषणा के लिए भी दावा करता है कि वह स्वयं या कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक्तः निर्वाचित हो गया है, तब निर्वाचन लड़ने वाले ऐसे अभ्यर्थियों को जो अर्जीदार से भिन्न हैं और जब ऐसी अतिरिक्त घोषणा के लिए दावा नहीं किया गया है, तब निर्वाचित सभी अभ्यर्थियों को; तथा

                                () किसी अन्य अभ्यर्थी को, जिसके विरुद्ध किसी भ्रष्ट आचरण के अभिकथन अर्जी में किए जाते हैं

7. अर्जी की अन्तर्वस्तुएं-(1) अर्जी-

                () में उन तात्त्विक तथ्यों का संक्षिप्त कथन होगा जिन पर अर्जीदार निर्भर करता है;

                () में ऐसे किसी भ्रष्ट आचरण की, जिसका अर्जीदार अभिकथन करता है, पूरी विशिष्टियों का उल्लेख उन पक्षकारों के नामों के यथासम्भवपूर्ण विवरण सहित किया जाएगा, जिनके बारे में यह अभिकथन है कि उन्होंने ऐसा भ्रष्ट आचरण किया है और ऐसा प्रत्येक आचरण करने की तारीख और स्थान का उल्लेख किया जाएगा; तथा

                () पर अर्जीदार हस्ताक्षर करेगा और वह ऐसी रीति से सत्यापित की जाएगी जो अभिवचनों के सत्यापन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) में अधिकथित है:

परन्तु जब अर्जीदार किसी भ्रष्ट आचरण का अभिकथन करता है तब ऐसे भ्रष्ट आचरण के अभिकथन और उसकी विशिष्टियों के समर्थन में विहित प्ररूप में एक शपथ पत्र भी अर्जी के साथ होगा

(2) अर्जी के साथ लगी हुई किसी अनुसूची या उपाबन्ध पर भी अर्जीदार हस्ताक्षर करेगा और उसे उसी रीति से सत्यापित किया जाएगा जिस रीति से अर्जी सत्यापित की जाती है

8. वह अनुतोष जिसका दावा अर्जीदार कर सकेगा-कोई अर्जीदार इस घोषणा का कि सभी निर्वाचित अभ्यर्थियों या उनमें से किसी का निर्वाचन शून्य है, दावा करने के अतिरिक्त इस अतिरिक्त घोषणा का भी दावा कर सकेगा कि वह स्वयं यो कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक्तः निर्वाचित हो गया है

9. अर्जियां प्राप्त होने पर प्रक्रिया-(1) निर्वाचन आयोग धारा 5 के अधीन अर्जी प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, अर्जी का विचारण करने के लिए उसे प्राधिकरण को भेजेगा

(2) जहां एक ही निर्वाचन के सम्बन्ध में धारा 5 के अधीन एक से अधिक अर्जियां प्राप्त हुई हैं वहां निर्वाचन आयोग उन्हें प्राधिकरण को भेजेगा और ऐसा प्राधिकरण, अपने विवेकानुसार, उनका अलग-अलग या एक या अधिक ग्रुपों में विचारण कर सकेगा

अध्याय 4

अर्जियों का विचारण

10. अर्जियों का विचारण-(1) इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, किसी अर्जी के विचारण के लिए प्राधिकरण उसका विचारण नई दिल्ली में करेगा

(2) प्राधिकरण अर्जी को खारिज कर देगा, -

                () यदि अर्जी धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अवधि के भीतर पेश नहीं की गई है;

                () यदि अर्जी धारा 5 की उपधारा (3) या उपधारा (4) के उपबन्धों या धारा 6 के उपबन्धों का अनुपालन नहीं करती है

स्पष्टीकरण-इस उपधारा के अधीन अर्जी को खारिज करने वाला कोई आदेश धारा 16 के खण्ड () के अधीन किया गया आदेश समझा जाएगा

(3) कोई अभ्यर्थी, जो किसी अर्जी में पहले से ही प्रत्यर्थी नहीं है, विचारण के प्रारम्भ की तारीख से चौदह दिन के भीतर प्राधिकरण को स्वयं आवेदन करके और खर्चों के लिए प्रतिभूति के बारे में किसी ऐसे आदेश के अधीन रहते हुए प्रत्यर्थी के रूप में संयोजित किए जाने का हकदार होगा जो प्राधिकरण द्वारा किया जाए

स्पष्टीकरण-इस उपधारा और धारा 15 के प्रयोजनों के लिए किसी अर्जी का विचारण उस तारीख को प्रारम्भ हुआ समझा जाएगा जो प्राधिकरण के समक्ष प्रत्यर्थियों के हाजिर होने और अर्जी में किए गए दावे या दावों का उत्तर देने के लिए नियत की गई है

(4) प्राधिकरण खर्चे सम्बन्धी ऐसे निबन्धनों पर और अन्यथा भी, जो वह ठीक समझे, अर्जी में अभिकथित किसी भ्रष्ट आचरण की विशिष्टियों का ऐसी रीति से संशोधन या परिवर्धन करने की अनुज्ञा दे सकेगा जो अर्जी का उचित और प्रभावी विचारण सुनिश्चित करने के लिए उसकी राय में आवश्यक हो; किन्तु वह अर्जी का कोई ऐसा संशोधन अनुज्ञात नहीं करेगा जिसका प्रभाव किसी ऐसे भ्रष्ट आचरण की विशिष्टियां रखना हो जिसका अर्जी में पहले से अभिकथन नहीं किया गया है

(5) अर्जी का विचारण, जहां तक विचारण के बारे में न्याय के हितों से संगत रहते हुए साध्य हो, उसकी समाप्ति तक दिन प्रतिदिन चालू रहेगा, किन्तु तब नहीं जब प्राधिकरण उन कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, यह निष्कर्ष निकाले कि विचारण को अगले दिन से परे स्थगित करना आवश्यक है

(6) प्रत्येक अर्जी का यथासंभव शीघ्रता से विचारण किया जाएगा और विचारण को उस तारीख से, जिसको वह प्रारम्भ हुआ था, छह मास के भीतर समाप्त करने का प्रयत्न किया जाएगा

11. प्राधिकरण के समक्ष प्रक्रिया-(1) इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, प्राधिकरण प्रत्येक अर्जी का विचारण, जहां तक हो सके, उस प्रक्रिया के अनुसार करेगा जो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन वादों के विचारण को लागू होती है:

परन्तु यदि प्राधिकरण की यह राय है कि ऐसे साक्षी या साक्षियों का साक्ष्य अर्जी के विनिश्चय के लिए तात्त्विक नहीं है या ऐसे साक्षी या साक्षियों को पेश करने वाला पक्षकार तुच्छ आधारों पर या कार्यवाहियां विलम्बित करने की दृष्टि से ऐसा कर रहा है तो प्राधिकरण को यह विवेकाधिकार होगा कि वह ऐसे कारणों से, जो अभिलिखित किए जाएंगे, साक्षी या साक्षियों की परीक्षा करने से इन्कार कर दे

(2) ऐसे किसी विचारण के प्रयोजनों के लिए, प्राधिकरण को निम्नलिखित विषयों की बाबत वही शक्तियां होंगी जो सिविल न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता 1908 (1908 का 5) के अधीन वाद का विचारण करते समय होती हैं, अर्थात्: -

                () किसी व्यक्ति को समन करना या हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;

                () किसी दस्तावेज के प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करना;

                () शपथपत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;

                () किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक-अभिलेख या उसकी प्रति की अध्यपेक्षा करना;

                () साक्षियों या दस्तावेजों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना;

                () ऐसे अन्य विषय जो विहित किए जाएं

(3) यह समझा जाएगा कि इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) के उपबन्ध किसी अर्जी के विचारण की सब बातों को लागू होते हैं

(4) प्राधिकरण के समक्ष कोई कार्यवाही भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 के अर्थ में न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी

12. मतदान की गोपनीयता का अतिलंघन किया जाना-किसी साक्षी या अन्य व्यक्ति से यह कथन करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी कि उसने निर्वाचन में किस को मत दिया है

13. अपराध में फंसाने वाले प्रश्नों का उत्तर देना और संरक्षण-प्रमाणपत्र-(1) किसी साक्षी को अर्जी के विचारण में विवाद्यक विषय से सुसंगत किसी विषय के बारे में किए गए प्रश्न का उत्तर देने की छूट इस आधार पर नहीं दी जाएगी कि ऐसे प्रश्न का उत्तर ऐसे साक्षी को अपराध में फंसा सकता है या उसकी प्रवृत्ति अपराध में फंसाने की हो सकती है अथवा वह ऐसे साक्षी को किसी शास्ति या समपहरण के खतरे में डाल सकता है या उसकी प्रवृत्ति खतरे में डालने वाली हो सकती है:

परन्तु-

                () वह साक्षी, जो उन सब प्रश्नों का सही उत्तर देता है जिनका उत्तर देने की उससे अपेक्षा की गई है, प्राधिकरण से संरक्षण-प्रमाणपत्र प्राप्त करने का हकदार होगा, तथा

                () प्राधिकरण द्वारा या उसके समक्ष किए गए प्रश्न का जो उत्तर साक्षी ने दिया है, वह किसी सिविल या दाण्डिक कार्यवाही में साक्ष्य में उसके विरुद्ध ग्राह्य नहीं होगा किन्तु उस साक्ष्य के सम्बन्ध में शपथ-भंग के लिए किसी दाण्डिक कार्यवाही में ग्राह्य होगा

(2) जब किसी साक्षी को संरक्षण-प्रमाणपत्र दिया गया है तब वह किसी न्यायालय में उसका अभिवचन कर सकेगा और ऐसे किसी विषय से, जिसके सम्बन्ध में ऐसा प्रमाणपत्र है, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) के अध्याय 9 के अधीन या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) के भाग 7 के अधीन उद्भूत होने वाले किसी आरोप के विरुद्ध या उसके सम्बन्ध में वह संपूर्ण प्रतिरक्षा के रूप में होगा, किन्तु उसके बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह निर्वाचन से संसक्त किसी ऐसी निरर्हता से, जो इस अधिनियम या किसी अन्य विधि द्वारा अधिरोपित है, उसे अवमुक्त करता है

14. साक्षियों के व्यय-प्राधिकरण के समक्ष साक्ष्य देने के लिए हाजिर होने में जिस व्यक्ति ने उचित व्यय उपगत किया है उसको प्राधिकरण वह व्यय अनुज्ञात कर सकेगा और जब तक कि प्राधिकरण अन्यथा निदेश दे तब तक वह व्यय खर्चे का भाग समझा जाएगा

15. स्थान के लिए दावा किए जाने पर प्रत्यारोप-(1) जब अर्जी में इस घोषणा का दावा किया जाता है कि निर्वाचित अभ्यर्थी से भिन्न कोई अभ्यर्थी सम्यक्तः निर्वाचित हो गया है तब निर्वाचित अभ्यर्थी या कोई अन्य पक्षकार यह साबित करने के लिए साक्ष्य दे सकेगा कि यदि ऐसा अभ्यर्थी निर्वाचित अभ्यर्थी होता और उसके निर्वाचन को, प्रश्नगत करने के लिए अर्जी पेश की गई होती तो ऐसे अभ्यर्थी का निर्वाचन शून्य होता:

परन्तु जब तक निर्वाचित अभ्यर्थी या पूर्वोक्त जैसा अन्य पक्षकार ऐसा करने के अपने आशय की सूचना प्राधिकरण को विचारण के प्रारंभ होने की तारीख से चौदह दिन के भीतर नहीं दे देता है और धारा 5 की क्रमशः उपधारा (4), (5) और (6) में निर्दिष्ट प्रतिभूति और अतिरिक्त प्रतिभूति भी नहीं दे देता है तब तक वह ऐसा साक्ष्य देने का हकदार नहीं होगा

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट प्रत्येक सूचना के साथ वह कथन और विशिष्टियां होंगी जो अर्जी की दशा में धारा 7 द्वारा अपेक्षित हैं और वे वैसी ही रीति से हस्ताक्षरित और सत्यापित होंगी

16. प्राधिकरण का विनिश्चय-अर्जी का विचारण समाप्त होने पर प्राधिकरण-

                () अर्जी को खारिज करने का, अथवा

                () यह घोषणा करने का कि सब निर्वाचित अभ्यर्थियों या उनमें से किसी का निर्वाचन शून्य है, अथवा

                () यह घोषणा करने का कि सब निर्वाचित अभ्यर्थियों या उनमें से किसी का निर्वाचन शून्य है और अर्जीदार या कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक्तः निर्वाचित हो गया है,

आदेश करेगा

17. प्राधिकरण द्वारा किए जाने वाले अन्य आदेश-(1) धारा 16 के अधीन आदेश करते समय प्राधिकरण-

                () जब अर्जी में यह आरोप लगाया गया हो कि निर्वाचन में कोई भ्रष्ट आचरण किया गया है तब-

(i) यह निष्कर्ष कि निर्वाचन में किसी भ्रष्ट आचरण का किया जाना साबित हुआ है या नहीं और उस भ्रष्ट आचरण की प्रकृति अभिलिखित करते हुए; तथा

(ii) उन सब व्यक्तियों के नाम, यदि कोई हों, जिनकी बाबत विचारण में यह साबित हुआ है कि वे किसी भ्रष्ट आचरण के दोषी हैं और उस आचरण की प्रकृति अभिलिखित करते हुए; तथा

                () संदेय खर्चे की कुल रकम नियत करते हुए और उन व्यक्तियों को विनिर्दिष्ट करते हुए जिनके द्वारा और जिनको खर्चे दिए जाएंगे,

आदेश भी करेगा:

                परन्तु जब तक उस व्यक्ति को, जो अर्जी का पक्षकार नहीं है-

() प्राधिकरण के समक्ष उपस्थित होने के लिए और यह हेतुक दर्शित करने के लिए कि उसे क्यों ऐसे नामित किया जाए, सूचना नहीं दे दी गई है, तथा

() यदि वह सूचना के अनुसरण में उपस्थित होता है, तो उस प्राधिकरण द्वारा पहले ही जिस साक्षी की परीक्षा की जा चुकी है और जिसने उसके विरुद्ध साक्ष्य दिया है उसकी प्रतिपरीक्षा करने का, अपनी प्रतिरक्षा में साक्ष्य पेश करने या कराने का और अपनी सुनवाई का अवसर नहीं दे दिया गया है,

तब तक उसे खण्ड () के उपखण्ड (ii) के अधीन आदेश में नामित नहीं किया जाएगा

                (2) इस धारा में और धारा 18 में अभिकर्ता" पद का वही अर्थ है जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 123 में है

18. निर्वाचन को शून्य घोषित करने के आधार-(1) उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए यदि प्राधिकरण की यह राय है कि-

                () निर्वाचित अभ्यर्थी अपने निर्वाचन की तारीख को स्थान भरने के वास्ते चुने जाने के लिए संविधान या लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) या इस अधिनियम या संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) के अधीन अर्हित नहीं था या निरर्हित कर दिया गया था; या

                () निर्वाचित अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता ने अथवा निर्वाचित अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सहमति से किसी अन्य व्यक्ति ने कोई भ्रष्ट आचरण किया है; या

                () कोई नामनिर्देशन अनुचित रूप में नामंजूर किया गया है; या

                () निर्वाचन परिणाम, जहां तक कि उसका सम्बन्ध निर्वाचित अभ्यर्थी से है, -

                                (i) किसी नामनिर्देशन के अनुचित रूप से स्वीकार किए जाने से, या

                (ii) ऐसे किसी भ्रष्ट आचरण से, जो निर्वाचित अभ्यर्थी के हित में उसके निर्वाचन अभिकर्ता से भिन्न अभिकर्ता द्वारा किया गया है, या

(iii) किसी मत के अनुचित रूप से लिए जाने से इंकार करने या अस्वीकृत किए जाने या ऐसे किसी मत के, जो शून्य हो, लिए जाने के कारण से, या

                                (iv) संविधान या इस अधिनियम या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों या आदेशों के उपबन्धों के किसी अननुपालन से,

तात्त्विक रूप में प्रभावित हुआ है, तो प्राधिकरण यह घोषणा करेगा कि निर्वाचित अभ्यर्थी का निर्वाचन शून्य है

                (2) यदि प्राधिकरण की यह राय है कि निर्वाचित अभ्यर्थी अपने निर्वाचन अभिकर्ता से भिन्न अभिकर्ता द्वारा किसी भ्रष्ट आचरण का दोषी रहा है, किन्तु प्राधिकरण का यह समाधान हो जाता है कि-

() अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता ने निर्वाचन में ऐसा कोई भ्रष्ट आचरण नहीं किया था और ऐसा प्रत्येक आचरण अभ्यर्थी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता के आदेशों के प्रतिकूल था और उसकी या उसके निर्वाचन अभिकर्ता की सहमति के बिना किया गया था;

() अभ्यर्थी और उसके निर्वाचन अभिकर्ता ने निर्वाचन में भ्रष्ट आचरण किए जाने का निवारण करने के लिए सब उचित उपाय किए थे, तथा

() निर्वाचन अन्य सब बातों में अभ्यर्थी या उसके अभिकर्ताओं में से किसी की ओर से किसी भी भ्रष्ट आचरण से मुक्त था,

तो प्राधिकरण यह विश्वास कर सकेगा कि निर्वाचित अभ्यर्थी का निर्वाचन शून्य नहीं है

19. वे आधार जिन पर निर्वाचित अभ्यर्थी से भिन्न अभ्यर्थी निर्वाचित घोषित किया जा सकेगा-यदि ऐसे किसी व्यक्ति ने, जिसने अर्जी दाखिल की है, निर्वाचित अभ्यर्थी के निर्वाचन को प्रश्नगत के अतिरिक्त इस घोषणा के लिए दावा किया है कि वह स्वयं या कोई अन्य अभ्यर्थी सम्यक्तः निर्वाचित हो गया है और प्राधिकरण की यह राय है कि-

                () अर्जीदार या ऐसे अन्य अभ्यर्थी को विधिमान्य मतों में से बहुसंख्यक मत वास्तव में प्राप्त हुए हैं, या

                () निर्वाचित अभ्यर्थी को भ्रष्ट आचरण द्वारा जो मत अभिप्राप्त हुए हैं, वे यदि अभिप्राप्त हुए होते तो अर्जीदार या ऐसे अन्य अभ्यर्थी को विधिमान्य मतों में से बहुसंख्यक मत अभिप्राप्त हुए होते,

तो प्राधिकरण निर्वाचित अभ्यर्थी के निर्वाचन को शून्य घोषित करने के पश्चात् यह घोषणा करेगा कि, यथास्थिति, अर्जीदार या ऐसा अन्य अभ्यर्थी सम्यक्तः निर्वाचित हो गया है

20. प्राधिकरण के आदेशों की संसूचना-प्राधिकरण अर्जी का विचारण समाप्त हो जाने पर यथाशीघ्र, विनिश्चय के सारांश की प्रज्ञापना निर्वाचन आयोग और, यथास्थिति, संसद् के सदन के अध्यक्ष या सभापति को देगा और तत्पश्चात् यथाशीघ्र विनिश्चय की अधिप्रमाणित प्रति निर्वाचन आयोग को भेजेगा

21. खर्चे-खर्चों का अधिनिर्णय प्राधिकरण के विवेकाधीन होगा:

परन्तु जब अर्जी धारा 16 के खण्ड () के अधीन खारिज की जाती है, तब निर्वाचित अभ्यर्थी ऐसे खर्चे पाने का हकदार होगा जो उसने अर्जी का प्रतिविरोध करने में उपगत किए हैं और उसके अनुसार प्राधिकरण खर्चे का आदेश निर्वाचित अभ्यर्थी के पक्ष में करेगा

22. प्राधिकरण के आदेशों का अन्तिम होना-इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा किया गया कोई भी आदेश किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा

23. प्राधिकरण के आदेशों का प्रभाव-(1) इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा किया गया कोई आदेश प्राधिकरण द्वारा सुनाए जाने पर यथाशीघ्र प्रभावी होगा

(2) जब निर्वाचित अभ्यर्थी का निर्वाचन धारा 16 के अधीन आदेश द्वारा शून्य घोषित कर दिया जाता है तब वे कार्य और कार्यवाहियां, जिनमें उस निर्वाचित अभ्यर्थी ने उस आदेश की तारीख के पूर्व संसद्-सदस्य के रूप में या प्रधान मंत्री के रूप में या लोक सभा के अध्यक्ष के रूप में भाग लिया है, उस आदेश के कारण तो अविधिमान्य होंगी और ऐसा अभ्यर्थी ऐसे भाग लेने के आधार पर किसी दायित्व या शास्ति के लिए दायी होगा

अध्याय 5

प्रकीर्ण

24. अर्जियों का वापस लिया जाना और उपशमन-निर्वाचन अर्जियों के वापस लिए जाने और उनके उपशमन के सम्बन्ध में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 109 से धारा 116 के (जिनमें ये दोनों धाराएं सम्मिलित हैं) उपबन्ध इस अधिनियम के अधीन अर्जियों के वापस लिए जाने और उनके उपशमन के सम्बन्ध में इन उपान्तरों के अधीन रहते हुए यावत्शक्य लागू होंगे कि उनमें निर्वाचन अर्जी, उच्च न्यायालय और अर्जीदार के प्रति निर्देशों का यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे क्रमशः इस अधिनियम के अधीन अर्जी, ऐसी अर्जी की सुनवाई के लिए प्राधिकरण और ऐसी अर्जी के सम्बन्ध में अर्जीदार के प्रति निर्देश हैं

25. प्रतिभूति निक्षेपों में से खर्चे का संदाय और ऐसे निक्षेपों की वापसी-(1) यदि इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन खर्चों की बाबत किसी आदेश में किसी व्यक्ति को किसी पक्षकार द्वारा खर्चों का संदाय किए जाने के लिए निदेश है तो ऐसे खर्चे, यदि वे पहले ही संदत्त नहीं किए गए हैं तो, ऐसे पक्षकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन किए गए प्रतिभूति निक्षेप में से और यदि कोई अतिरिक्त प्रतिभूति निक्षेप है तो उसमें से भी पूर्णतः या यथासम्भव ऐसे लिखित आवेदन पर दिए जाएंगे जो उस व्यक्ति ने, जिसके पक्ष में खर्चे अधिनिर्णीत किए गए हैं, उस आदेश की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर निर्वाचन आयोग से उस निमित्त किया है

(2) यदि किसी उक्त प्रतिभूति निक्षेप में से कोई अतिशेष, उपधारा (1) में निर्दिष्ट खर्चे का उस उपधारा के अधीन संदाय करने के पश्चात् बच जाता है, तो ऐसा अतिशेष, या जब खर्चे अधिनिर्णीत नहीं किए गए हैं या पूर्वोक्त आवेदन एक वर्ष की उक्त अवधि के भीतर नहीं किया गया है तब उक्त प्रतिभूति निक्षेप की पूरी रकम उस व्यक्ति को, जिसने निक्षेप किए हैं, या यदि उसकी मृत्यु ऐसा निक्षेप करने के पश्चात् हो जाती है तो उसके विधिक प्रतिनिधि को निर्वाचन आयोग से, यथास्थिति, उक्त व्यक्ति या उसके विधिक प्रतिनिधि द्वारा लिखित रूप में किए गए आवेदन पर वापस कर दी जाएगी

26. खर्चे सम्बन्धी आदेशों का निष्पादन-इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन खर्चों की बाबत कोई आदेश आरम्भिक अधिकारिता वाले उस प्रधान सिविल न्यायालय के समक्ष पेश किया जा सकेगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर उस व्यक्ति का निवास स्थान या कारबार का स्थान है, जिसे किसी धनराशि का संदाय करने के लिए ऐसे आदेश में निदेश दिया गया है, या जहां ऐसा स्थान प्रेसिडेंसी नगर के भीतर है वहां उस नगर में अधिकारिता रखने वाले लघुवाद न्यायालय के समक्ष पेश किया जा सकेगा और ऐसा न्यायालय ऐसी रीति से और ऐसी प्रक्रिया द्वारा उस आदेश का निष्पादन करेगा या कराएगा मानो वह वाद में धन के संदाय के लिए उसके द्वारा दी गई डिक्री हो :

परन्तु जहां ऐसा कोई खर्चा या उसका कोई प्रभाग धारा 25 की उपधारा (1) के अधीन किए गए आवेदन पर वसूल किया जा सकता है वहां इस धारा के अधीन कोई आवेदन उक्त आदेश की तारीख से एक वर्ष की अवधि के भीतर नहीं किया जाएगा किन्तु ऐसा आवेदन उक्त अवधि के भीतर तब किया जा सकेगा जब वह किसी खर्चे के उस अतिशेष की वसूली के लिए हो जो उस उपधारा के अधीन किए गए आवेदन के पश्चात् इस कारण वसूल नहीं किया जा सका है कि उस उपधारा में निर्दिष्ट प्रतिभूति निक्षेपों की रकम अपर्याप्त है

27. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजन उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी

(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्: -

                () खर्चे के लिए प्रतिभूति के रूप में अर्जीदार द्वारा किया जाने वाला निक्षेप या अतिरिक्त निक्षेप;

                () प्राधिकरणों के कृत्यों के निर्वहन में उसकी सहायता करने के लिए अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति और ऐसे अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा की शर्तें;

() इस अधिनियम के अधीन किए गए निक्षेपों की अभिरक्षा, धारा 25 के अधीन किए गए आवेदन पर ऐसे निक्षेपों में से खर्चें का संदाय और ऐसे आवेदनों के निपटारे से सम्बन्धित अन्य विषय;

                () यदि कोई फीस इस अधिनियम के अधीन किसी अर्जी या आवेदन के सम्बन्ध में संदेय है तो वह फीस;

                () कोई अन्य विषय जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित किया जाना है या जिसके लिए उपबन्ध किया जाना है

(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा

28. निरसन और व्यावृत्ति-(1) विवादग्रस्त निर्वाचन (प्रधान मंत्री और अध्यक्ष) अध्यादेश, 1977 (1977 का 4) इसके द्वारा निरसित किया जाता है

(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, उक्त अध्यादेश के उपबन्धों के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई इस अधिनियम के तत्समान उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी

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