भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955
(1955 का अधिनियम संख्यांक 23)
[8 मई, 1955]
भारत के लिए एक स्टेट बैंक गठित करने, उसे भारत के
इंपीरियल बैंक का उपक्रम अंतरित करने तथा
उससे संसक्त या आनुषंगिक अन्य
विषयों के वास्ते उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
यतः बैंककारी सुविधाओं का बड़े पैमाने पर, विशिष्ट रूप से ग्रामीण और अर्ध-नगरीय क्षेत्रों में, विस्तार करने के लिए तथा विभिन्न प्रकार के अन्य लोक प्रयोजनों के लिए भारत के लिए एक स्टेट बैंक गठित करना और उसे भारत के इंपीरियल बैंक का उपक्रम अंतरित करना तथा उससे संसक्त या आनुषंगिक अन्य विषयों के लिए उपबंध करना समीचीन है;
अतः भारत गणराज्य के छठे वर्ष में संसद् द्वारा निम्न रूप से यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1955 है ।
(2) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) नियत दिन" से वह तारीख अभिप्रेत है जिसको यह अधिनियम प्रवृत्त होना है;
(ख) केन्द्रीय बोर्ड" से स्टेट बैंक के निदेशकों का केन्द्रीय बोर्ड अभिप्रेत है;
[(खख) अध्यक्ष" से केन्द्रीय बोर्ड का अध्यक्ष अभिप्रेत है;]
(ग) माल" के अंतर्गत सोना-चांदी, भांड और वाणिज्या है;
(घ) इंपीरियल बैंक" से इंपीरियल बैंक आफ इंडिया ऐक्ट, 1920 (1920 का 47) के अधीन गठित भारत का इंपीरियल बैंक अभिप्रेत है;
3[(घघ) स्थानीय बोर्ड" से धारा 21 के अधीन गठित स्थानीय बोर्ड अभिप्रेत है;]
(ङ) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(च) रिजर्व बैंक" से भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 (1934 का 2) के अधीन गठित भारतीय रिजर्व बैंक अभिप्रेत है;
(छ) स्टेट बैंक" से इस अधिनियम के अधीन गठित भारतीय स्टेट बैंक अभिप्रेत है;
[(ज) समनुषंगी बैंक" से भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) द्वारा यथापरिभाषित समनुषंगी बैंक अभिप्रेत है;]
। । । । । । ।
[(ञ) कर्मकार" का वही अर्थ है जो औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में है;]
अध्याय 2
स्टेट बैंक का निगमन और उसकी अंश (शेयर) पूंजी
3. स्टेट बैंक की स्थापना-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार बैंककारी कारबार और अन्य कारबार चलाने के लिए तथा इंपीरियल बैंक का उपक्रम ले लेने के प्रयोजन के लिए भारतीय स्टेट बैंक नामक बैंक गठित किया जाएगा ।
(2) इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार जो व्यक्ति स्टेट बैंक के अंश (शेयर) धारी समय-समय पर हों उन व्यक्तियों को उस समय तक साथ रखकर जब तक वे स्टेट बैंक के अंश (शेयर) धारी रहें, [केन्द्रीय सरकार, भारतीय स्टेट बैंक नाम से एक निगमित निकाय गठित करेगी,] जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा होगी और उक्त नाम से वह वाद चलाएगा और उस पर वाद चलाया जाएगा ।
(3) स्टेट बैंक की यह शक्ति होगी कि जिन प्रयोजनों के लिए वह गठित किया गया है उनके लिए जंगम या स्थावर संपत्ति अर्जित और धारण करे और उसका व्ययन करे ।
[4. प्राधिकृत पूंजी-इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, स्टेट बैंक की प्राधिकृत पूंजी पांच हजार करोड़ रुपए होगी, जो दस-दस रुपए के पांच सौ करोड़ रुपए के पूर्णतः समादत्त अंशों (शेयरों) में विभाजित होगी :
परन्तु केन्द्रीय बोर्ड अंशों (शेयरों) के अभिहित या अंकित मूल्य को घटा सकेगा और प्राधिकृत पूंजी को ऐसे अंकित मूल्य में विभाजित कर सकेगा जो वह, रिजर्व बैंक के अनुमोदन से विनिश्चित करे :
परन्तु यह और कि केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से, प्राधिकृत पूंजी को बढ़ा या घटा सकेगी, फिर भी सभी मामलों में शेयर पूर्णतः समादत्त अंश (शेयर) बने रहेंगे ।]
5. पुरोधृत अंश (शेयर) पूंजी-(1) स्टेट बैंक की पुरोधृत अंश (शेयर पूंजी) नियत दिन को पांच करोड़ बासठ लाख पचास हजार रुपए होगी जो पांच लाख बासठ हजार पांच सौ अंशों (शेयरों) में विभाजित होगी और जो सब की सब इंपीरियल बैंक के उन अंशों (शेयरों) के बदले में रिजर्व बैंक को आबंटित कर दी जाएगी [जो धारा 6 के अधीन रिजर्व बैंक को अंतरित और उसमें निहित कर दिए गए हैं] ।
[(2) स्टेट बैंक की पुरोधृत पूंजी साधारण अंशों (शेयरों) या साधारण और अधिमानी अंशों (शेयरों) से मिलकर बनेगी :
परन्तु अधिमानी अंशों (शेयरों) का पुरोधरण रिजर्व बैंक द्वारा अधिमानी अंशों (शेयरों) का वर्ग, ऐसे अधिमानी अंशों (शेयरों) के प्रत्येक वर्ग के पुरोधरण की सीमा (चाहे शाश्वत या अमोचनीय या मोचनीय हो) विनिर्दिष्ट करते हुए बनाए गए मार्गदर्शक सिद्धांतों और ऐसे निबंधनों और शर्तों के अनुसार जिसके अधीन रहते हुए, प्रत्येक वर्ग के अधिमानी अंशों (शेयरों) को पुरोधृत किया जा सकेगा, होगा :
परन्तु यह और कि केन्द्रीय बोर्ड, समय-समय पर, रिजर्व बैंक और केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से, साधारण या अधिमानी अंशों (शेयरों) के पुरोधरण द्वारा पुरोधृत पूंजी को, चाहे सार्वजनिक निर्गमन या अधिकारिक निर्गमन या अधिमानी आबंटन या निजी स्थान द्वारा ऐसी प्रक्रिया के अनुसार, जो विहित की जाए, को बढ़ा सकेगा :
परन्तु यह भी कि केन्द्रीय सरकार, सभी समयों पर, स्टेट बैंक के साधारण अंशों (शेयरों) वाली पुरोधृत पूंजी के इक्यावन प्रतिशत से अन्यून अंश (शेयर) धारण करेगी ।
(3) पुरोधृत अंश (शेयर) पूंजी में बारह करोड़ पचास लाख रुपए से अधिक की कोई वृद्धि केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना उपधारा (2) के अधीन नहीं की जाएगी ।
[(4) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय बोर्ड, समय-समय पर, विद्यमान साधारण अंश धारकों (शेयर धारकों) को बोनस अंशों (शेयरों) के निर्गमन के रूप में पुरोधृत पूंजी को ऐसी रीति में बढ़ा सकेगा, जो केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात्, निदेश दे ।
(5) स्टेट बैंक पुरोधृत पूंजी में वृद्धि मद्दे निर्गमित अंशों (शेयरों) के संबंध में धन प्राप्त कर सकेगा, उनकी मांग कर सकेगा, असंदत्त अशों (शेयरों) को समपहृत कर सकेगा और उन्हें ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, पुनः जारी कर सकेगा ।]
अध्याय 3
इम्पीरियल बैंक के उपक्रम का स्टेट बैंक को अन्तरण
6. इंपीरियल बैंक की आस्तियों और दायित्वों का स्टेट बैंक को अंतरण-(1) इस अधिनियम में अंतर्विष्ट अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, नियत दिन को,-
(क) इंपीरियल बैंक की पूंजी में के सारे अंश (शेयर) सब न्यासों, दायित्वों और विल्लंगमों से मुक्त होकर रिजर्व बैंक को अंतरित हो जाएंगे और उसमें निहित हो जाएंगे; और
(ख) इंपीरियल बैंक का उपक्रम, स्टेट बैंक को अंतरित हो जाएगा और उसमें निहित हो जाएगा ।
(2) इंपीरियल बैंक के उपक्रम के बारे में यह समझा जाएगा कि उसके अन्तर्गत इंपीरियल बैंक के सब अधिकार, शक्तियां, प्राधिकार और विशेषाधिकार तथा नकदी अतिशेषों (रोकड़ बाकी), आरक्षित निधियों, विनिधानों सहित सब जंगम, स्थावर संपत्ति और नियत दिन से ठीक पूर्व उस बैंक के कब्जे में जो संपत्ति भी हो उसमें या उससे पैदा होने वाले सब अन्य हित और अधिकार हैं तथा उससे संबद्ध सब पुस्तकें, लेखा और दस्तावेज तथा बैंक के उस समय विद्यमान किसी प्रकार के सब ऋण, दायित्व और बाध्यताएं भी ऐसे उपक्रम के अंतर्गत समझे जाएंगे ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन या द्वारा अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित अवस्था को छोड़कर, सब संविदाएं विलेख, बंधपत्र, करार, मुख्तारनामे, वैध-प्रतिनिधित्व-अनुदान और किसी प्रकार की अन्य लिखतें, जो नियत दिन से ठीक पूर्व विद्यमान हैं या प्रभावशील है और इंपीरियल बैंक जिनका एक पक्षकार है या जो इंपीरियल बैंक के पक्ष में हैं, स्टेट बैंक के विरुद्ध या पक्ष में यथास्थिति वैसा ही पूरा बल और प्रभाव रखेंगी और ऐसे पूर्णतः और प्रभावपूर्वक प्रवृत्त या क्रियान्वित की जा सकेंगी मानो इंपीरियल बैंक की जगह स्टेट बैंक उनका पक्षकार रहा हो अथवा मानो वे स्टेट बैंक के पक्ष में जारी की गई हों ।]
(4) यदि इंपीरियल बैंक के द्वारा या खिलाफ किया गया कोई वाद, अपील या किसी प्रकार की अन्य विधिक कार्यवाही नियत दिन को लंबित है, तो वह इंपीरियल बैंक के उपक्रम के स्टेट बैंक को अंतरित किए जाने के या इस अधिनियम में अंतर्विष्ट किसी बात के कारण उपशांत, बंद या प्रतिकूलतः प्रभावित नहीं होगी पंरतु वह वाद, अपील या अन्य कार्यवाही स्टेट बैंक के द्वारा या खिलाफ चालू रखी, अभियोजित और प्रवृत्त की जा सकेगी ।
7. इंपीरियल बैंक के वर्तमान अधिकारियों और कर्मचारियों की सेवाओं का स्टेट बैंक को अंतरण-(1) नियत दिन से तुरंत पूर्व इंपीरियल बैंक के नियोजन में के प्रबन्ध निदेशक, उप प्रबन्ध निदेशक और अन्य निदेशकों को छोड़कर, इंपीरियल बैंक का प्रत्येक अधिकारी या अन्य कर्मचारी नियत दिन को और उस दिन से स्टेट बैंक का, यथास्थिति, अधिकारी या अन्य कर्मचारी हो जाएगा और उसमें अपना पद या नौकरी उसी अवधि तक, उसी पारिश्रमिक पर और उन्हीं अधिकारों और शर्तों पर तथा पेंशन, उपदान और अन्य विषयों के संबंध में उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों के साथ धारण करेगा जिन पर यदि इंपीरियल बैंक का उपक्रम स्टेट बैंक में निहित नहीं होता तो वह उसे नियत दिन को धारण करता और जब तक कि और यदि स्टेट बैंक में उसका नियोजन समाप्त नहीं हो जाता या जब तक कि उसका पारिश्रमिक, निबंधन या शर्तें स्टेट बैंक द्वारा सम्यक् रूप से परिवर्तित नहीं कर दी जातीं तब तक वह वैसा करता रहेगा ।
(2) जो कोई व्यक्ति नियत दिन पर इंपीरियल बैंक से या किसी भविष्य-निधि, पेंशन निधि या अन्य निधि से अथवा ऐसी निधि का प्रशासन करने वाले किसी प्राधिकारी से पेंशन या अन्य अधिवार्षिकी या अनुकंपा भत्ते या फायदे का हकदार है या उसे प्राप्त करता है वह स्टेट बैंक द्वारा या किसी भविष्य-निधि, पेंशन निधि, या अन्य निधि से अथवा ऐसी निधि का प्रशासन करने वाले किसी प्राधिकारी द्वारा वही पेंशन, भत्ता या फायदा दिए जाने और उसे प्राप्त करने का तब तक हकदार बना रहेगा, जब तक वह उन शर्तों का पालन करता है जिन पर वह पेंशन, भत्ता या फायदा अनुदान किया गया था तथा यदि यह प्रश्न उठता है कि उसने ऐसी शर्तों का उस प्रकार पालन किया है या नहीं, तो उस प्रश्न की अवधारण केन्द्रीय सरकार द्वारा किया जाएगा और उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी 1954 के 19 दिसबर के पश्चात् और नियत दिन से पूर्व की गई कोई नियुक्ति या किसी व्यक्ति को दी गई प्रोन्नति, वेतन वृद्धि, दी गई पेंशन, भत्ता या कोई अन्य फायदा, जो सामान्यतया किया या दिया नहीं जाता या जो 1954 के 19 दिसम्बर से पूर्व प्रवृत्त इंपोरियल बैंक के या किसी भविष्य-निधि, पेंशन या अन्य निधि के नियमों या प्राधिकरणों के अधीन सामान्यतया अनुज्ञेय नहीं होगा, प्रभावशील नहीं होगा या स्टेट बैंक से अथवा किसी भविष्य-निधि, पेंशन निधि या अन्य निधि से अथवा निधि का प्रशासन करने वाले किसी प्राधिकारी द्वारा देय या उससे दावा किया जाने योग्य उस सूरत के सिवाय नहीं होगा जिसमें कि केन्द्रीय सरकार ने सामान्य या विशेष आदेश द्वारा उस नियुक्ति, प्रोन्नति या वृद्धि की पुष्टि कर दी है या, यथास्थिति, उस पेंशन, भत्ते या अन्य फायदे को चालू रखने का निदेश दे दिया है ।
(4) औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी इंपीरियल बैंक के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी की सेवाओं का उस बैंक से स्टेट बैंक को अंतरण ऐसे अधिकारी या अन्य कर्मचारी को उस अधिनियम या अन्य विधि के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा तथा ऐसा कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा ग्रहण नहीं किया जाएगा ।
(5) नियत दिन से ठीक पूर्व इंपीरियल बैंक के किसी स्थानीय बोर्ड के प्रबंध निदेशक, उप प्रबंध निदेशक, निदेशक या सदस्य के रूप में पद धारण करने वाले किसी व्यक्ति के बारे में यह समझा जाएगा कि नियत दिन को उसने उस रूप में अपना पद रिक्त कर दिया है और इस अधिनियम में या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में अथवा किसी करार या संविदा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी वह अपने पद को हानि के लिए या अपने नियोजन से संबद्ध किसी करार या संविदा की समय पूर्व समाप्ति के लिए कोई प्रतिकर ऐसी पेंशन, प्रतिकर या अन्य फायदे के सिवाय, जो इस बात का ध्यान रखकर कि यदि यह अधिनियम पारित नहीं किया गया होता और यदि वह व्यक्ति साधारण अनुक्रम में अपने नियोजन से निवृत्त होता, तो इंपीरियल बैंक के अधिकारी के रूप में उसे मिलता, स्टेट बैंक द्वारा उसे अनुदत्त किया जाए, इंपीरियल बैंक से पाने का हकदार नहीं होगा ।
(6) जहां कि इंपीरियल बैंक के किसी प्रबंध निदेशक, उपप्रबंध निदेशक, निदेशक, अधिकारी या अन्य कर्मचारी को 1954 के 19 दिसंबर के पश्चात् और नियत दिन से पूर्व प्रतिकर या उपदान के रूप में कोई राशि दे दी गई है वहां यदि वह अदायगी केंद्रीय सरकार द्वारा साधारण या विशेष आदेश द्वारा पुष्ट न कर दी गई हो, तो स्टेट बैंक इस प्रकार दी गई किसी राशि को वापस कराने का दावा करने का हकदार होगा ।
8. इंपीरियल बैंक की विद्यमान भविष्य निधियां और अन्य निधियां-जो व्यक्ति नियत दिन से ठीक पूर्व निम्नलिखित निधियों में अर्थात् :-
(क) भारत के इंपीरियल बैंक के कर्मचारियों की भविष्य-निधि के,
(ख) भारत के इंपीरियल बैंक के कर्मचारियों की पेंशन और प्रत्याभूति निधि के,
(ग) बैंक आफ बोंबे अधिकारियों की पेंशन और प्रत्याभूति निधि के,
(घ) बैंक आफ मद्रास पेंशन और उपदान निधि के, और
(ङ) बैंक आफ मद्रास अधिकारी भविष्य-निधि और पारस्परिक प्रत्याभूति निधि के,
न्यासी हैं उनके स्थान में ऐसे व्यक्तियों को न्यासियों के रूप में प्रतिस्थापित किया जाएगा जैसे केंद्रीय सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे ।
9. इंपीरियल बैंक के अंश (शेयर) धारियों को प्रतिकर का दिया जाना-(1) प्रत्येक व्यक्ति, जो इंपीरियल बैंक में अंशों (शेयरों) के धारक के रूप में नियत दिन से रजिस्ट्रीकृत हैं, प्रथम अनुसूची में अंतर्विष्ट उपबंधों के अनुसार प्रतिकर पाने का हकदार होगा ।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट कोई बात, इंपीरियल बैंक में किसी अंश (शेयर) के धारक और ऐसे किसी अन्य व्यक्ति के बीच के, जो ऐसे अंश (शेयर) में कोई हित रखता है, पारस्परिक अधिकारों को प्रभावित नहीं करेगी और ऐसा अन्य व्यक्ति अपने हित को रिजर्व बैंक के खिलाफ तो नहीं किंतु ऐसे अंश (शेयर) के धारक को दिए गए प्रतिकर के खिलाफ प्रवृत्त कराने का हकदार होगा ।
अध्याय 4
अंश (शेयर)
10. अंशों (शेयरों) की अंतरणीयता-(1) उपधारा (2) में अन्यथा उपबंधित अवस्था को छोड़कर, स्टेट बैंक के अंश (शेयर) निर्बाध रूप से अंतरणी होंगे ।
[(2) स्टेट बैंक के जिन अंशों (शेयरों) को केन्द्रीय सरकार धारण किए हुए है यदि उनमें से किन्हीं अंशों (शेयरों) के अंतरण के परिणामस्वरूप उन अंशों (शेयरों) की संख्या, उन्हें वह धारण किए हुए हैं, स्टेट बैंक को [साधारण अंशों (शेयरों) वाली पुरोधृत पूंजी के इक्यावन प्रतिशतट से कम हो जाती है, तो केन्द्रीय सरकार अपने द्वारा धारित ऐसे किन्हीं अंशों (शेयरों) का अंतरण करने के लिए हकदार उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात से न हो जाएगी ।]
[10क. नामनिर्देशन करने का रजिस्ट्रीकृत अंश धारकों (शेयर धारकों) का अधिकार-(1) प्रत्येक व्यष्टिक रजिस्ट्रीकृत अंश धारक (शेयर धारक) किसी भी समय, विहित रीति में, ऐसे किसी व्यष्टि को नामनिर्देशित कर सकेगा, जिसे उसकी मृत्यु की दशा में अंशों (शेयरों) में उसके सभी अधिकार निहित होंगे ।
(2) जहां अंश (शेयर) एक से अधिक व्यष्टियों के नाम में संयुक्त रूप से रजिस्ट्रीकृत हैं, वहां संयुक्त धारक एक साथ विहित रीति में ऐसी किसी व्यष्टि को नामनिर्देशित कर सकेंगे, जिसे सभी संयुक्त धारकों की मृत्यु की दशा में अंशों (शेयरों) में उनके सभी अधिकार निहित होंगे ।
(3) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी या किसी व्ययन में, चाहे वसीयती हो या अन्यथा, जहां अंशों (शेयरों) के संबंध में कोई नामनिर्देशन विहित रीति में किया जाता है और जो नामनिर्देशिती को अशों (शेयरों) को विहित करने का अधिकार प्रदत्त करने के लिए आशयित है, वहां नामनिर्देशिती, यथास्थिति, अंश धारकों (शेयर धारकों) या सभी संयुक्त धारकों की मृत्यु हो जाने पर, ऐसे शेयरों के संबंध में, यथास्थिति, सभी अंश धारकों (शेयर धारकों) या संयुक्त धारकों के अधिकारों का हकदार हो जाएगा और सभी अन्य व्यक्तियों को, जब तक नामनिर्देशन को विहित रीति में परिवर्तित या रद्द नहीं किया जाता है, अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) जहां नामनिर्देशिती अवयस्क है, वहां अंशों (शेयरों) के व्यष्टिक रजिस्ट्रीकृत धारक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह नामनिर्देशिती की अवयस्कता के दौरान उसकी मृत्यु होने की दशा में अंशों (शेयरों) का हकदार बनने के लिए, विहित रीति में, किसी व्यक्ति को नियुक्त करने के लिए नामनिर्देशन करे ।]
[11. मताधिकार पर निर्बधन- [केन्द्रीय सरकार] से भिन्न कोई अंश (शेयर) धारी पुरोधृत पूंजी के दस प्रतिशत से अधिक अपने द्वारा धृत किन्हीं अंशों (शेयरों) के संबंध में, मताधिकार का प्रयोग करने का हकदार नही होगा:
परन्तु ऐसा अंश (शेयर) धारी, ऐसे उच्चतर प्रतिशत पर मताधिकार का प्रयोग करने का हकदार होगा, जो केन्द्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात्, विनिर्दिष्ट करे:]
[परन्तु यह और कि स्टेट बैंक में कोई अधिमानी अंश (शेयर) पूंजी धारित करने वाले अंश धारक (शेयर धारक) को, ऐसी पूंजी के संबंध में, स्टेट बैंक के समक्ष रखे गए केवल ऐसे संकल्पों के संबंध में मताधिकार होगा, जो उसके अधिमानी अंशों (शेयरों) से संलग्न अधिकारों पर सीधे प्रभाव डालते हैं:
परन्तु यह भी कि केंद्रीय सरकार से भिन्न कोई अधिमानी अंश धारक (शेयर धारक) केवल अधिमानी अंश (शेयर) पूंजी धारण करने वाले सभी अंश धारकों (शेयर धारकों) के कुल मताधिकारों के दस प्रतिशत से अधिक में उसके द्वारा धारित अधिमानी अंशों (शेयरों) के संबंध में मताधिकारों का प्रयोग करने के लिए हकदार नहीं होगा ।]
12. अंश (शेयर) अनुमोदित प्रतिभूतियां होंगे-इस धारा में इसके पश्चात् निर्देशित अधिनियमों में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी स्टेट बैंक के अंश (शेयर) भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की धारा 20 में प्रगणित प्रतिभूतियों के अंतर्गत तथा बीमा अधिनियम, 1938 (1938 का 4) । । । के प्रयोजनों के लिए अनुमोदित प्रतिभूतियां समझे जाएंगे ।
[13. अंश (शेयर) धारियों का रजिस्टर-(1) स्टेट बैंक, अंश (शेयर) धारियों की एक या अधिक पुस्तकों का एक रजिस्टर, अपने केन्द्रीय कार्यालय में रखेगा और जहां तक निम्नलिखित विशिष्टियां उपलब्ध हों, उन्हें उसमें प्रविष्ट करेगा, अर्थात्: -
(I) अंश (शेयर) धारियों के नाम, पते और उपजीविकाएं, यदि कोई हों, तथा प्रत्येक अंश (शेयर) धारी द्वारा धारित अंशों (शेयरों) में से प्रत्येक अंश (शेयर) को उसकी द्योतक संख्या द्वारा सुभिन्नतः इंगति करते हुए उन अंशों (शेयरों) का विवरण;
(II) वह तारीख जिसको प्रत्येक व्यक्ति अंश (शेयर) धारी के रूप में इस प्रकार प्रविष्ट किया जाता है;
(III) वह तारीख जिसको कोई व्यक्ति अंश (शेयर) धारी नहीं रह जाता; और
(IV) ऐसी अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं:
[परंतु इस उपधारा की कोई बात किसी निक्षेपागार के पास धारित अंशों (शेयरों) को लागू नहीं होगी ।]
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, स्टेट बैंक के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि वह ऐसे रक्षोपायों के अधीन रहते हुए जो विहित किए जाएं, अंश (शेयर) धारियों का रजिस्टर [कम्प्यूटर फ्लापियों या डिस्केट्स या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक रूप में] रखे ।
(3) भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) में किसी बात के होते हुए भी अंश (शेयर) धारियों के रजिस्टर की प्रति या उसमें से कोई उद्धरण, जिसको स्टेट बैंक के इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी के हस्ताक्षर से शुद्ध प्रति होना प्रमाणित किया गया हो, सभी विधिक कार्यवाहियों में साक्ष्य में ग्राह्य होगा ।]
[13क. हिताधिकारी स्वामियों का रजिस्टर-निक्षेपगार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 11 के अधीन किसी निक्षेपागार द्वारा रखा गया हिताधिकारी स्वामियों का रजिस्टर इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अंश धारकों (शेयर धारकों) का रजिस्टर समझा जाएगा ।]
। । । । । । ।
[15. अंश (शेयर) धारियों के रजिस्टर में न्यासों का प्रविष्ट न किया जाना-किसी अभिव्यक्त, विवक्षित या आन्वयिक न्यास की सूचना, स्टेट बैंक द्वारा अंश (शेयर) धारियों के रजिस्टर में प्रविष्ट नहीं की जाएगी या उसके द्वारा नहीं ली जाएगी:]
[परंतु इस धारा की कोई बात, किसी निक्षेपागार को, हिताधिकारी स्वामियों की ओर से रजिस्ट्रीकृत स्वामी के रूप में उसके द्वारा धारित अंशों (शेयरों) की बाबत लागू नहीं होगी ।
स्पष्टीकरण-धारा 13, धारा 13क और इस धारा के प्रयोजनों के लिए हिताधिकारी स्वामी", निक्षेपगार" और रजिस्ट्रीकृत स्वामी" पदों का क्रमशः वही अर्थ होगा जो उनका निक्षेपागार अधिनियम, 1996 (1996 का 22) की धारा 2 की उपधारा (1) के खंड (क), खंड (ङ) और खंड (ञ) में हैं ।]
अध्याय 5
प्रबंध
16. कार्यालय, शाखाएं और अभिकरण-(1) जब तक केन्द्रीय सरकार द्वारा शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा अन्यथा उपबन्धित न किया जाए, तब तक स्टेट बैंक का केन्द्रीय कार्यालय [मुम्बई में होगा और उससे निगमित केंद्र के नाम से भी जाना जाएगा] ।
(2) स्टेट बैंक के, 5[मुम्बई, कोलकाता और चेन्नई] में और भारत में ऐसे स्थानों पर, जैसे केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय बोर्ड से परामर्श करके अवधारित करे, स्थानीय प्रधान कार्यालय होंगे ।
(3) स्टेट बैंक, इम्पीरियल बैंक की सब शाखाओं या अभिकरणों को, जो नियत दिन से ठीक पूर्व [भारत में] विद्यमान थे, अपनी शाखाओं या अभिकरणों के रूप में बनाए रखेगा तथा ऐसी कोई शाखा रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन के बिना बन्द नहीं की जा सकेगी ।
(4) स्टेट बैंक उपधारा (3) में निर्देशित शाखाओं या अभिकरणों के अतिरिक्त भारत में या उसके बाहर किसी स्थान पर शाखाएं या अभिकरण स्थापित कर सकेगा ।
(5) उपधारा (4) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी स्टेट बैंक उपधारा (3) में निर्देशित शाखाओं के अतिरिक्त नियत दिन से पांच वर्षों या ऐसे बढ़ाए गए समय के भीतर, जैसा केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, कम से कम चार सौ शाखाएं स्थापित करेगा और वे स्थान, जहां ऐसी अतिरिक्त शाखाएं स्थापित की जानी हैं, किसी ऐसे कार्यक्रम के अनुसार अवधारित किए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार द्वारा रिजर्व बैंक और स्टेट बैंक से परामर्श करके समय-समय पर तैयार किया जाए तथा इस प्रकार स्थापित की गई कोई शाखा रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन के बिना बन्द नहीं की जाएगी ।
17. प्रबन्ध-(1) स्टेट बैंक के कार्यों और कारबार का साधारण अधीक्षण और निदेशन केन्द्रीय बोर्ड को सौंपा जाएगा जो ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा और ऐसे कार्य तथा ऐसी बातें कर सकेगा जैसी स्टेट बैंक द्वारा प्रयुक्त की जा सकती हैं और जो स्टेट बैंक द्वारा साधारण अधिवेशन में किए जाने के लिए इस अधिनियम द्वारा अभिव्यक्त रूप से निदेशित या अपेक्षित नहीं है ।
(2) अपने कृत्यों के निर्वहन में केन्द्रीय बोर्ड लोक हित का ध्यान रखते हुए, व्यापारिक सिद्धांतों पर चलेगा ।
18. केन्द्रीय बोर्ड केन्द्रीय सरकार के निदेशों के अनुसार कार्य करेगा-(1) अपने कृत्यों के [जिनके अन्तर्गत समनुषंगी बैंक से संबंधित कृत्य आते हैं], निर्वहन में स्टेट बैंक लोक हित अन्तर्ग्रस्त रखने वाली नीति के मामलों में ऐसे निदेशों के अनुसार कार्य करेगा जैसे केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक के गर्वनर और स्टेट बैंक के अध्यक्ष से परामर्श करके उसे दे ।
(2) [सभी निदेश केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए जाएंगे] तथा यदि यह प्रश्न उठता है कि कोई निदेश लोक हित अन्तर्ग्रस्त रखने वाली नीति के मामले से सम्बद्ध है या नहीं, तो उस पर केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
19. केन्द्रीय बोर्ड का गठन- । । । केन्द्रीय बोर्ड निम्नलिखित से मिलकर गठित होगा, अर्थात्: -
(क) एक अध्यक्ष [जो केंद्रीय सरकार द्वारा रिजर्व बैंक के परामर्श से नियुक्त किया जाएगा];
1[(ख) चार से अनधिक उतने प्रबंध निदेशक, जितने केन्द्रीय सरकार द्वारा, रिजर्व बैंक के परामर्श से नियुक्त किए जाएं;]
। । । । । । ।
(ग) यदि [केन्द्रीय सरकार] से भिन्न उन अंश (शेयर) धारियों की अंश (शेयर) धृति की कुल रकम, जिनके नाम उस तारीख से, जो निदेशकों के निर्वाचन के लिए नियत की गई है तीन मास पूर्व [अंश (शेयर) धारियों के रजिस्टर] में हैं-
(I) कुल पुरोधृत पूंजी से दस प्रतिशत से अधिक नहीं हैं, तो दो निदेशक;
(II) ऐसी पूंजी के दस प्रतिशत से तो अधिक हैं किन्तु पच्चीस प्रतिशत से अधिक नहीं हैं, तो तीन निदेशक; तथा
(III) ऐसी पूंजी के पच्चीस प्रतिशत से अधिक हैं, तो चार निदेशक, जो विहित रीति से अंश (शेयर) धारियों द्वारा निर्वाचन किए जाएंगे;
[(गक) ऐसा एक निदेशक जो स्टेट बैंक के उन कर्मचारियों में से जो कर्मकार हैं, उस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में उपबंधित रीति से केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा;
(गख) ऐसा एक निदेशक जो स्टेट बैंक के उन कर्मचारियों में से, जो कर्मकार नहीं हैं, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में उपबंधित रीति से केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा;]
(घ) दो से अन्यून और छह से अनधिक निदेशक जो 3। । । केन्द्रीय सरकार द्वारा उन व्यक्तियों में से नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे, जिन व्यक्तियों को सरकारी संस्थाओं के कामकाज का तथा ग्राम्य अर्थ व्यवस्था का विशेष ज्ञान है अथवा वाणिज्य, उद्योग, बैंककारी और वित्त व्यवस्था का अनुभव प्राप्त है;]
(ङ) ऐसा एक निदेशक, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा; और
1[(च) एक निदेशक, जिसके पास वाणिज्यिक बैंकों के विनियमन या अधीक्षण से संबंधित विषयों में आवश्यक विशेषज्ञता और अनुभव हो, जो रिजर्व बैंक की सिफारिश पर केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्देशित किया जाएगा ।]
। । । । । । ।
[19क. अंश धारकों (शेयरों धारकों) द्वारा निर्वाचित निदेशकों के निर्वाचन के लिए अर्हताएं-(1) धारा 19 के खंड (ग) के अधीन निर्वाचित निदेशकों के पास, -
(क) निम्नलिखित एक या अधिक क्षेत्रों के संबंध में विशेष ज्ञान या अनुभव होगा, अर्थात्: -
(I) कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था,
(II) बैंककारी,
(III) सहकारिता,
(IV) अर्थशास्त्र,
(V) वित्त,
(VI) विधि,
(VII) लघु उद्योग,
(VIII) ऐसा कोई अन्य क्षेत्र, जिसका विशेष ज्ञान और जिसमें अनुभव रिजर्व बैंक की राय में, स्टेट बैंक के लिए उपयोगी होगा;
(ख) जो जमाकर्ताओं के हितों का प्रतिनिधित्व करेंगे; या
(ग) जो कृषकों, कर्मकारों और शिल्पियों के हितों का प्रतिनिधित्व करेंगे ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना और इस अधिनियम या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति धारा 19 के खंड (ग) के अधीन निदेशक के रूप में निर्वाचित किए जाने के लिए तभी पात्र होगा जब वह ट्रेक रिकार्ड, सत्यनिष्ठा और ऐसे अन्य मानदंडों पर, जो इस संबंध में रिजर्व बैंक, समय-समय पर, अधिसूचित करे, सही और समुचित प्रास्थिति वाला व्यक्ति है और रिजर्व बैंक इस उपधारा के अधीन जारी अधिसूचना में सही और समुचित प्रास्थिति का अवधारण करने वाले प्राधिकारी, ऐसे अवधारण की रीति, ऐसे अवधारणों के लिए अनुसरित की जाने वाली प्रक्रिया और ऐसे अन्य विषयों को, जो आवश्यक या उसके आनुषंगिक समझे जाएं, विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
(3) जहां रिजर्व बैंक की यह राय है कि धारा 19 के खंड (ग) के अधीन निर्वाचित स्टेट बैंक का कोई निदेशक उपधारा (1) और उपधारा (2) की अपेक्षाओं को पूरी नहीं करता है, वहां, वह ऐसे निदेशक और स्टेट बैंक को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, आदेश द्वारा ऐसे निदेशक को हटा सकेगा ।
(4) उपधारा (3) के अधीन किसी निदेशक को हटाने पर, केन्द्रीय बोर्ड उपधारा (1) और उपधारा (2) की अपेक्षाओं को पूरा करने वाले किसी अन्य व्यक्ति को आगामी वार्षिक साधारण अधिवेशन में स्टेट बैंक के अंश धारकों (शेयर धारकों) द्वारा किसी निदेशक को सम्यक् रूप से निर्वाचित किए जाने तक, इस प्रकार हटाए गए व्यक्ति के स्थान पर, निदेशक के रूप में सहयोजित करेगा और इस प्रकार सहयोजित व्यक्ति निदेशक के रूप में स्टेट बैंक के अंश धारकों (शेयर धारकों) द्वारा सम्यक् रूप से निर्वाचित किया गया समझा जाएगा ।
19ख. अपर निदेशकों की नियुक्ति करने की रिजर्व बैंक की शक्ति-(1) यदि रिजर्व बैंक की यह राय है कि बैंककारी नीति के हित में या लोकहित में या स्टेट बैंक या उसके जमाकर्ताओं के हित में ऐसा करना आवश्यक है तो वह, समय-समय पर और लिखित आदेश द्वारा, एक या अधिक व्यक्तियों को ऐसी तारीख से, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, स्टेट बैंक के अपर निदेशकों के रूप में नियुक्त कर सकेगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अपर निदेशक के रूप में नियुक्त किया गया कोई व्यक्ति, -
(क) रिजर्व बैंक के प्रसादपर्यन्त और उसके अधीन रहते हुए, तीन वर्ष से अनधिक की अवधि या एक समय में तीन वर्ष से अनधिक की ऐसी और अवधियों के लिए, जो रिजर्व बैंक आदेश द्वारा विनिर्दिष्ट करे, पद धारण करेगा;
(ख) केवल उसके अपर निदेशक होने के कारण या अपने पद के कर्तव्यों के निष्पादन में या उसके संबंध में सद्भावपूर्वक की गई या करने से लोप की गई किसी बात के लिए कोई बाध्यता या दायित्व उपगत नहीं करेगा;
(ग) स्टेट बैंक में अर्हक अंश (शेयर) धारण करने के लिए अपेक्षित नहीं होगा ।
(3) स्टेट बैंक के निदेशकों की कुल संख्या के किसी अनुपात की गणना करने के प्रयोजन के लिए इस धारा के अधीन नियुक्त किए गए किसी अपर निदेशक को हिसाब में नहीं लिया जाएगा ।]
20. अध्यक्ष, प्रबन्ध निदेशक आदि की पदावधि-(1) [अध्यक्ष । । । और प्रत्येक प्रबंध निदेशक] पांच वर्ष से अधिक न होने वाली ऐसी अवधि के लिए पद धारण करेंगे जैसी केन्द्रीय सरकार उन्हें नियुक्त करते समय नियत करे और वे पुनःनियुक्ति के लिए पात्र होंगे ।
[(1क) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार को उपधारा (1) के अधीन नियत पदावधि के अवसान के पूर्व किसी भी समय, यथास्थिति, अध्यक्ष 2। । । या प्रबन्ध निदेशक को कम से कम तीन मास की लिखित सूचना देकर या ऐसी सूचना के बदले में तीन मास का वेतन और भत्ता देकर उसकी पदावधि समाप्त करने का अधिकार होगा और, यथास्थिति, अध्यक्ष 2। । । या प्रबन्ध निदेशक को भी कम से कम तीन मास की लिखित सूचना केन्द्रीय सरकार को देकर इस प्रकार नियत पदावधि के अवसान से पूर्व किसी भी समय अपना पद त्याग करने का अधिकार होगा ।]
। । । । । । ।
(3) धारा 19 में । । । अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन रहते हुए [उस धारा । । । के खंड (ग) के अधीन निर्वाचित निदेशक तीन वर्ष] के लिए । । । पद धारण करेगा और वह पुनः निर्वाचन । । । के लिए पात्र होगा:
[परन्तु कोई ऐसा निदेशक छह वर्ष से अधिक की अवधितक निरन्तर पद धारण नहीं करेगा ।]
[(3क) [उपधारा (4) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए] धारा 19 के खंड (गक) या खंड (गघ) के अधीन नियुक्त अथवा उस धारा के खंड (घ) के अधीन नामनिर्देशित 3[निदेशक] तीन वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि तक जो केन्द्रीय सरकार विनिर्दिष्ट । । । पद धारण करेगा और वह, [यथास्थिति, पुनःनियुक्ति या पुनः नामनिर्देशन का पात्र होगा:
[परन्तु ऐसा कोई निदेशक छह वर्ष से अधिक की अवधितक निरन्तर पद धारण नहीं करेगा ।]
[(4) [धारा 19 के खण्ड (गक) या खण्ड (गघ) के अधीन नियुक्त अथवा उस धारा के] (खण्ड) (घ) या खण्ड (ङ) या खण्ड (च) के अधीन नामनिर्देशित निदेशक, यथास्थिति, उसकी नियुक्ति या नामनिर्देशन करने वाले प्राधिकारी के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।]
। । । । । । ।
[21. स्थानीय बोर्ड-(1) ऐसे प्रत्येक स्थान पर, जहां स्टेट बैंक का स्थानीय प्रधान कार्यालय है, एक स्थानीय बोर्ड गठित किया जाएगा, जो निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगा, अर्थात्: -
[(क) अध्यक्ष, पदेन या अध्यक्ष द्वारा नामनिर्देशित प्रबंध निदेशक;]
[(ख) केन्द्रीय बोर्ड के लिए धारा 19 के खंड (ग) या खंड (घ) के अधीन निर्वाचित या नामनिर्देशित ऐसे सभी निदेशक, जो स्थानीय प्रधान कार्यालय की अधिकारिता के भीतर आने वाले क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी हैं;]
(ग) छह सदस्य, जो । । । केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएंगे;
। । । । । । ।
(ङ) स्टेट बैंक द्वारा नियुक्त स्थानीय प्रधान कार्यालय का [मुख्य महाप्रबंधक; पदेन ।]
[(2) जहां किसी ऐसे क्षेत्र के लिए, जो पहले से ही किसी दूसरे स्थानीय प्रधान कार्यालय की (जिसे इसमें इसके पश्चात् वर्तमान स्थानीय प्रधान कार्यालय कहा गया है) अधिकारिता के भीतर आता है, कोई स्थानीय प्रधान कार्यालय (जिसे इसमें इसके पश्चात् नया स्थानीय प्रधान कार्यालय कहा गया है) स्थापित किए जाने के परिणामस्वरूप नए स्थानीय प्रधान कार्यालय के लिए एक स्थानीय बोर्ड (जिसे इसमें इसके पश्चात् नया स्थानीय बोर्ड कहा गया है) गठित किया जाता है वहां ऐसा कोई व्यक्ति, जो ऐसे गठन के समय वर्तमान स्थानीय कार्यालय के लिए स्थानीय बोर्ड के (जिसे इसमें इसके पश्चात् वर्तमान बोर्ड कहा गया है) सदस्य के रूप में उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन पद धारण कर रहा है तथा उस क्षेत्र में मामूली तौर से निवासी है जो नए स्थानीय प्रधान कार्यालय की अधिकारिता के भीतर आता है, वर्तमान बोर्ड के सदस्य के रूप में पद धारण करने से परिविरत हो जाएगा तथा नए स्थानीय बोर्ड का सदस्य हो जाएगा तथा ऐसा सदस्य होने पर उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि वह नए स्थानीय बोर्ड के लिए नामनिर्देशित किया गया है तथा वह ऐसे सदस्य के रूप में अपनी उस पदावधि के अनवसित भाग के लिए पद धारण करेगा जो वर्तमान स्थानीय बोर्ड के सदस्य के नाते उसकी थी ।]
(3) वर्तमान स्थानीय बोर्ड में जो कोई रिक्तता इस बात के परिणामस्वरूप हो जाती है कि उसका कोई सदस्य उपधारा (2) के अधीन नए स्थानीय बोर्ड का सदस्य हो गया है उसकी बाबत यह समझा जाएगा कि वह आकस्मिक रिक्तता है और उसे धारा 25 के उपबन्धों के अनुसार भरा जाएगा ।
। । । । । । ।
[(5) [केन्द्रीय सरकार], अध्यक्ष के परामर्श से, -
(क) स्थानीय बोर्ड के किसी सदस्य को, जो उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन नामनिर्देशित किया गया है, उसका प्रधान होने के लिए नियुक्त करेगा; और
(ख) स्थानीय बोर्ड के ऐसे सदस्य को, जो उस उपधारा के खण्ड (ख) के अधीन पद धारण कर रहा है अथवा उस उपधारा के खण्ड (ग) के अधीन नामनिर्देशित किया गया है, उसका उपाध्यक्ष होने के लिए नियुक्त करेगा ।]
[21क. स्थानीय बोर्ड के सदस्यों की पदावधि- [(1) इस धारा और धारा 21 की उपधारा (2) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, किसी स्थानीय बोर्ड का ऐसा सदस्य जो धारा 21 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन नामनिर्देशित किया जाता है, तीन वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि तक जो केन्द्रीय सरकार इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे । । । पद धारण करेगा और वह पुनः नामनिर्देशन का पात्र होगा :
परन्तु ऐसा कोई निदेशक छह वर्ष से अधिक की अवधि तक निरंतर पद धारण नहीं करेगा ।]
। । । । । । ।
(3) केन्द्रीय सरकार का वह निदेशक, जो धारा 21 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) के उपबन्धों के आधार पर स्थानीय बोर्ड का सदस्य हो जाता है, ऐसे सदस्य के नाते अपना पद धारण करने से उस समय परिविरत हो जाएगा जब वह निदेशक नहीं रह जाता या उस सुसंगत क्षेत्र में सामान्यतः निवास नहीं करता है ।
(4) स्थानीय बोर्ड के अध्यक्ष और उपाध्यक्ष में से हर एक दो वर्ष के लिए अथवा स्थानीय बोर्ड के सदस्य के रूप में अपने पद की अवशिष्ट कालावधि के लिए, इनमें से जो भी लघुतर हो, पद धारण करेगा तथा जब तक वह स्थानीय बोर्ड का सदस्य रहता है, पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होगा ।
[(5) किसी स्थानीय बोर्ड का ऐसा सदस्य, जो धारा 21 की उपधारा (1) के खंड (ग) के अधीन नामनिर्देशित किया गया है, केन्द्रीय सरकार के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा ।]
[21ख. स्थानीय बोर्ड की शक्तियां-स्थानीय प्रधान कार्यालय की अधिकारिता के भीतर आने वाले ऐसे क्षेत्र के संबंध में, जिसके लिए स्थानीय बोर्ड का गठन किया गया है, स्थानीय बोर्ड, ऐसे साधारण या विशेष निर्देश के अधीन रहते हुए, जो समय-समय पर, केन्द्रीय बोर्ड दे, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों और कृत्यों का पालन करेगा, जो केन्द्रीय बोर्ड द्वारा उसे सौंपे या प्रत्यायोजित किए जाएं ।]
21ग. स्थानीय समितियां-(1) किसी क्षेत्र के लिए स्थानीय समिति केन्द्रीय बोर्ड द्वारा गठित की जा सकेगी तथा इतने सदस्यों से मिल कर बनेगी जितने विहित किए जाएं ।
[(2) अध्यक्ष या उसके द्वारा नामनिर्देशित प्रबंध निदेशक प्रत्येक ऐसी स्थानीय समिति का पदेन सदस्य होगा ।]
(3) स्थानीय समिति ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कृत्यों और कर्तव्यों का पालन करेगी जैसे केन्द्रीय बोर्ड उसे प्रदत्त या समनुदिष्ट करे ।]
22. केन्द्रीय बोर्ड का निदेशक होना या स्थानीय बोर्डों या समितियों की सदस्यता के लिए अनर्हताएं-(1) यदि कोई व्यक्ति-
(क) पहले से ही स्थापित या स्थापित होने के लिए विज्ञापित किसी बैंककारी कंपनी के निदेशक, अस्थायी निदेशक, संप्रवर्तक, अभिकर्ता या प्रबंधक का पद धारण करता है, या
(ख) वह सरकार का ऐसा वैज्ञानिक आफिसर (अधिकारी) है जो निदेशक या सदस्य होने के लिए केंद्रीय सरकार द्वारा विशेष रूप से प्राधिकृत नहीं है; या
(ग) सरकार की नौकरी से भ्रष्टाचार या रिश्वत के आरोप पर हटाया या पदच्युत कर दिया गया है; या
(घ) स्टेट बैंक के अधीन अध्यक्ष, । । । [प्रबंध निदेशक,] [ [मुख्य महाप्रबंधक] या विधिक या तकनीकी सलाहकारट से भिन्न कोई लाभ का पद धारण करता है, या
[(घक) धारा 19 । । । के खंड (गक) या खंड (गख) के अधीन नियुक्त निदेशक की दशा में, -
(I) स्टेट बैंक में सेवा नहीं कर रहा है या कम से कम पांच वर्ष की निरंतर अवधि के लिए उसमें सेवा नहीं करता रहा है, और
(II) ऐसी आयु का है कि इस बात की संभावना है कि निदेशक के रूप में अपनी पदावधि के दौरान अधिवर्षिता की आयु प्राप्त कर लेगा, या]
(ङ) दिवालिया न्यायनिर्णीत हुआ है या किसी समय हुआ था अथवा उसने अपने ऋणों को देना निलंबित कर दिया है या अपने लेनदारों के साथ प्रशमन करार कर लिया है, या
(च) पागल घोषित कर दिया गया है या विकृतचित का हो जाता है, या
(छ) नैतिक अधमता से किसी अपराध के लिए सिद्धदोष है या हो चुका है, या
[ (ज) किसी निर्वाचित निदेशक की दशा में, वह स्टेट बैंक में कम से कम पांच हजार रुपए के मूल्य के विल्लंगमरहित अंशों (शेयरों) के अपने अधिकार से धारक के रूप में, या तो एकमात्र धारक के रूप में, या जब संयुक्त रूप से धारित हो, प्रथम नामित धारक के रूप में, रजिस्ट्रीकृत नहीं है,]
तो वह केंद्रीय बोर्ड का निदेशक अथवा किसी स्थानीय बोर्ड या किसी स्थानीय समिति का सदस्य होने के लिए अर्हित नहीं होगा:
परन्तु धारा 19 के खण्ड (गक) या खण्ड (गख) के अधीन नियुक्त निदेशक की दशा में, खण्ड (घ) में उल्लिखित निरर्हता प्रवृत्त नहीं रहेगी ।]
(2) कोई दो व्यक्ति, जो एक ही फर्म के भागीदार हैं या एक ही प्राइवेट कंपनी के निदेशक हैं या जिनमें से एक-दूसरे का अभिकर्ता है या किसी ऐसे फर्म से, जिसका दूसरा व्यक्ति भागीदार है, मुख्तारनामा धारण करता है, एक ही समय पर केंद्रीय बोर्ड के निदेशक या एक ही स्थानीय बोर्ड अथवा स्थानीय समिति के सदस्य नहीं हो सकेंगे ।
(3) ऐसे किसी व्यक्ति की जो संसद् या किसी राज्य के विधान-मंडल का सदस्य है, किसी स्थानीय बोर्ड या किसी स्थानीय समिति के निदेशक या सदस्य के रूप में नियुक्ति, नामनिर्देशन या निर्वाचन तब तक शून्य होगा जब तक वह ऐसी नियुक्ति, नामनिर्देशन या निर्वाचन की तारीख से दो मास के अंदर संसद् या राज्य विधान-मंडल का सदस्य नहीं रह जाता है और यदि किसी स्थानीय बोर्ड का अथवा किसी स्थानीय समिति का कोई निदेशक या संसद् सदस्य या किसी राज्य विधान-मंडल के सदस्य के रूप में निर्वाचित या नामनिर्देशित हो जाता है तो वह, यथास्थिति, ऐसे निर्वाचन या नामनिर्देशन की तारीख से उस स्थानीय बोर्ड का निदेशक या सदस्य नहीं रह जाएगा ।
[(4) इस धारा में-
(क) बैंककारी कंपनी" का वही अर्थ है जो [बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10)] में उसका है;
(ख) प्रबंधक" से बैंककारी कंपनी का मुख्य कार्यपालक अधिकारी अभिप्रेत है, भले ही वह किसी नाम से ज्ञात क्यों न हो;
(ग) प्राइवेट कंपनी" का वही अर्थ है जो उसका कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में है ।]
23. निदेशकों, आदि के पद की रिकतता-यदि केंद्रीय बोर्ड का कोई निदेशक या किसी स्थानीय बोर्ड अथवा स्थानीय समिति का कोई सदस्य-
(क) धारा 22 में वर्णित अनर्हताओं में से किसी के अधीन हो जाता है, या
(ख) अपने हाथ से लिखित सूचना द्वारा, जो [अध्यक्ष । । । या प्रबंध निदेशक] की अवस्था में, केंद्रीय सरकार को तथा स्थानीय बोर्डों या समितियों के सदस्यों अथवा अन्य निदेशकों की अवस्था में, केंद्रीय बोर्ड को दी जाएगी, अपने पद से त्यागपत्र दे देता है और वह त्यागपत्र मंजूर कर लिया जाता है, या
(ग) केंद्रीय बोर्ड, उस स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति की, जिसका वह, यथास्थिति, निदेशक या सदस्य है, इजाजत के बिना उसके लगातार तीन अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है,
तो ऐसा होने पर उसका स्थान रिक्त हो जाएगा ।
। । । । । । ।
24. निदेशकों आदि का पद से हटाया जाना-(1) केंद्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् [अध्यक्ष । । । या प्रबंध निदेशक] को पद से हटा सकेगी ।
। । । । । । ।
(3) किसी निदेशक को, [जो धारा 19 । । । के खंड (गक) या खंड (गख) के अधीन नियुक्त या खंड (घ) के अधीन नामनिर्देशित है, [अथवा स्थानीय बोर्ड के किसी सदस्य को, जो धारा 21 की उपधारा (1)] के खंड (ग) के अधीन नामनिर्दिष्ट है,] केंद्रीय सरकार, 4। । । पद से हटा सकेगी और उस रिक्त पद को भरने के लिए उसके बदले में अन्य व्यक्ति को, [यथास्थिति, नियुक्त या नामनिर्देशित कर सकेगी] ।
(4) [केन्द्रीय सरकार] से भिन्न अंश (शेयर) धारी ऐसे किसी निदेशक को, जो धारा । । । के खण्ड (ग) के अधीन निर्वाचित है, ऐसे सब अंश (शेयर) धारियों द्वारा, धृत अंश (शेयर) पूंजी के कुल मिलाकर कम से कम आधी के बराबर पूंजी धारण करने वाले ऐसे अंश (शेयर) धारियों के बहुसंख्यक मत से पारित संकल्प द्वारा हटा सकेंगे और उस रिक्ता की पूर्ति के लिए उसके बदले में अन्य व्यक्ति को निर्वाचित कर सकेंगे ।
। । । । । । ।
(6) कोई व्यक्ति उपधारा (1) । । । या उपधारा (3) के अधीन तब तक अपने पद से नहीं हटाया जाएगा जब तक कि उसे अपने हटाए जाने के विरुद्ध कारण दर्शित करने का अवसर नहीं दिया गया हो ।
[24क. कतिपय दशाओं में बोर्ड का अधिक्रमण-(1) जहां केन्द्रीय सरकार का रिजर्व बैंक की सिफारिश पर यह समाधान हो जाता है कि लोकहित में या जमाकर्ताओं या स्टेट बैंक के हित के लिए हानिकर रीति में चलाए जा रहे स्टेट बैंक के कार्यकलापों को रोकने के लिए, या स्टेट बैंक का उचित प्रबंधन सुनिश्चित करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है तो केन्द्रीय सरकार, ऐसे कारणों से, जो लेखबद्ध किए जाएं, आदेश द्वारा, केन्द्रीय बोर्ड का छह मास से अनधिक ऐसी अवधि के लिए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, अधिक्रमण कर सकेगी :
परन्तु केंद्रीय बोर्ड की अधिक्रमण की अवधि समय-समय पर बढ़ाई जा सकेगी किन्तु इस प्रकार की कुल अवधि बारह मास से अधिक नहीं होगी ।
(2) केंद्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से, उपधारा (1) के अधीन केंद्रीय बोर्ड के अधिक्रमण पर, ऐसा प्रशासक (जो केंद्रीय सरकार या राज्य सरकार का अधिकारी नहीं है), जो विधि, वित्त, बैंकककारी, अर्थशास्त्र या लेखाकर्म में अनुभव रखता हो ऐसी अवधि के लिए नियुक्त कर सकेगी वह अवधारित करे ।
(3) केंद्रीय सरकार, प्रशासक को ऐसे निदेश जारी कर सकेगी, जो वह आवश्यक समझे और प्रशासक ऐसे निदेशों का पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(4) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, केंद्रीय बोर्ड के अधिक्रमण का आदेश किए जाने पर, -
(क) अध्यक्ष, प्रबंध निदेशक और अन्य निदेशक अधिक्रमण की तारीख से ही उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे;
(ख) सभी शक्तियां, कृत्य और कर्तव्य, जिनका केंद्रीय बोर्ड द्वारा या उसकी ओर से इस अधिनियम के या तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन या स्टेट बैंक के साधारण अधिवेशन में पारित संकल्प द्वारा प्रयोग और निर्वहन किया जाए, उपधारा (2) के अधीन नियुक्त प्रशासक द्वारा, केंद्रीय बोर्ड के पुनर्गठन तक, प्रयोग और निर्वहन किया जाएगा:
परन्तु प्रशासक द्वारा प्रयोग की गई शक्तियां इस बात के होते हुए भी विधिमान्य होंगी कि ऐसी शक्ति स्टेट बैंक के साधारण अधिवेशन में पारित संकल्प द्वारा भी प्रयोक्तव्य है ।
(5) केंद्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से, प्रशासक की उसके कर्तव्यों के निर्वहन में सहायता करने के लिए ऐसे तीन या अधिक व्यक्तियों की एक समिति गठित कर सकेगी, जिन्हें विधि, वित्त, बैंककारी, अर्थशास्त्र या लेखापद्धति का अनुभव हो ।
(6) समिति ऐसे समय तथा स्थानों पर अधिवेशन करेगी और प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगी, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(7) प्रशासक और समिति के सदस्यों के वेतन तथा भत्ते वे होंगे, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं और स्टेट बैंक द्वारा संदेय होंगे ।
(8) केंद्रीय बोर्ड के अधिक्रमण की अवधि के अवसान से पूर्व दो मास की समाप्ति पर और उससे पूर्व, स्टेट बैंक का प्रशासक नए निदेशकों को निर्वाचित करने और उक्त बोर्ड का पुनर्गठन करने के लिए स्टेट बैंक का साधरण अधिवेशन बुलाएगा ।
(9) तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि या किसी संविदा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई व्यक्ति केंद्रीय बोर्ड के अधिक्रमण पर अपने पद की हानि या समाप्ति के लिए किसी प्रतिकर का दावा करने का हकदार नहीं होगा ।
(10) उपधारा (2) के अधीन नियुक्त प्रशासक केंद्रीय बोर्ड के पुनर्गठन के ठीक पश्चात् पद रिक्त कर देगा ।]
25. आकस्मिक रिक्तताएं- [(1) यदि अध्यक्ष, । । । या प्रबंध निदेशक अंग शैथिल्य के कारण या अन्यथा अपने कृत्यों का निर्वहन करने के लिए असमर्थ हो जाता है, अथवा छुट्टी पर या अन्यथा, ऐसी परिस्थितियों में अनुपस्थित है जिनमें उसका पद रिक्त न हो तो केंद्रीय सरकार, रिजर्व बैंक से परामर्श करके, किसी अन्य व्यक्ति को, उस रिक्ति में स्थानापन्न रूप से, नियुक्त कर सकेगी ।]
[(2) जहां कोई रिक्तता, अध्यक्ष, 2। । । या प्रबन्ध निदेशक से भिन्न निदेशक की अथवा धारा 19 के खण्ड (गक) या खण्ड (गख) के अधीन नियुक्त निदेशक की अथवा मुख्य महाप्रबन्धक से भिन्न किसी स्थानीय बोर्ड के सदस्य की पदावधि की समाप्ति के पूर्व होती है वहां वह रिक्तता, -
(क) निर्वाचित निदेशक की दशा में, निर्वाचन द्वारा; और
(ख) ऐसे निदेशक की दशा में, जो धारा 19 के खण्ड (घ) के अधीन नामनिर्देशित किया गया है, अथवा किसी स्थानीय बोर्ड के ऐसे सदस्य की दशा में, जो धारा 21 की उपधारा (1) के खण्ड (ग) के अधीन नामनिर्देशित किया गया है, 2। । । नामनिर्देशन द्वारा भरी जाएगी:
परन्तु जहां किसी निर्वाचित निदेशक के पद में रिक्तता की अवधि छह मास से कम होनी संभाव्य है वहां वह रिक्तता, शेष निदेशकों द्वारा ऐसे व्यक्ति को, जो धारा 22 के अधीन अनर्हित नहीं है, सहयोजित करके भरी जा सकेगी ।]
(3) [उपधारा (2) के अधीन], यथास्थिति, निर्वाचित, नामनिर्देशित या सहयोजित व्यक्ति अपने पूर्वगामी की अवधि के असमाप्त प्रभाग तक पद धारण करेगा ।
[(4) जहां कोई रिक्तता धारा 19 । । । के खण्ड (गक) या खण्ड (गख) के अधीन नियुक्त निदेशक की पदावधि के अवसान से पूर्व होती है वहां ऐसी रिक्तता, यथास्थिति, उक्त खण्ड (गक) या खण्ड (गख) के अनुसार भरी जाएगी तथा इस प्रकार नियुक्त निदेशक धारा 20 की उपधारा (3क) के अधीन विनिर्दिष्ट अवधि के लिए पद धारणा करेगा ।]
26. निदेशकों का पारिश्रमिक-(1) धारा 27, 28 और 29 में अन्तर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना निदेशक को केंद्रीय बोर्ड के या उसकी किन्हीं समितियों के अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए और स्टेट बैंक का कोई काम करने के लिए ऐसी फीसें और भत्ते दिए जाएंगे जैसे विहित किए जाएं ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी किसी प्रबंध निदेशक या किसी अन्य निदेशक को, जो केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक का अधिकारी है, कोई फीस देय नहीं होगी ।
27. अध्यक्ष की शक्तियां और पारिश्रमिक-(1) अध्यक्ष केन्द्रीय बोर्ड के सब अधिवेशनों मे सभापतित्व करेगा और ऐसे साधारण या विशेष निदेशों के, जैसे केंद्रीय बोर्ड दे, अधीन रहते हुए ऐसी सब शक्तियों का प्रयोग करेगा तथा ऐसे सब कार्य और बातें करेगा जैसी स्टेट बैंक द्वारा प्रयुक्त की जा सकती हैं या किए जा सकते या की जा सकती है ।
(2) अध्यक्ष ऐसा वेतन, फीस, भत्ते और परिलब्धियां प्राप्त करेगा [जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अवधारित की जाए];
। । । । । । ।
। । । । । । ।
29. प्रबंध निदेशक की शक्तियां और पारिश्रमिक-(1) प्रबन्धक निदेशक-
(क) स्टेट बैंक का पूर्णकालिक अधिकारी होगा, । । ।
(ख) अध्यक्ष 3। । । के साधारण नियंत्रण के अधीन रहते हुए ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेगा जैसे उसे केंद्रीय सरकार द्वारा न्यस्त या प्रत्यायोजित किए जाएं; [और] ।
4[(ग) जब अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत किया जाता है तो वह उसकी अनुपस्थिति में केंद्रीय बोर्ड के अधिवेशनों का सभापतित्व करेगा ।]
(2) प्रबंध निदेशक ऐसा वेतन और भत्ते पाएगा [जो केंद्रीय सरकार द्वारा अवधारित किए जाएं]:
। । । । । । ।
30. केंद्रीय बोर्ड की कार्यपालिका और अन्य समितियां-केंद्रीय बोर्ड कार्यपालिका समिति सहित अपनी ऐसी और इतनी समितियां गठित कर सकेगा जैसी और जितनी वह ठीक समझता है, ये समितियां ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का पालन करने के लिए होंगी जैसी उन्हें ऐसी शर्तों के, यदि कुछ हों, अधीन रहते हुए, जैसी केंद्रीय बोर्ड अधिरोपित करे, केंद्रीय बोर्ड द्वारा प्रत्यायोजित की जाएं ।
31.केंद्रीय बोर्ड के अधिवेशन- [केंद्रीय बोर्ड ऐसे समय और स्थान पर अधिवेशन करेगा तथा अपने अधिवेशनों में कामकाज के संव्यवहार के संबंध में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा, जो विहित किए जाएं; और केन्द्रीय बोर्ड का अधिवेशन केन्द्रीय बोर्ड के निदेशकों की सहभागिता द्वारा, ऐसी वीडियो कान्फ्रेंसिंग या ऐसे अन्य इलैक्ट्रानिक साधनों के माध्यम् से, जो विहित किए जाएं, आयोजित किया जा सकेगा, जो निदेशकों की सहभागिता को अभिलिखित करने तथा अभिज्ञान करने योग्य हों और ऐसे अधिवेशनों की कार्यवाहियां अभिलिखित और भंडारित किए जाने योग्य हों :
परंतु केंद्रीय सरकार, रिजर्व बैंक के परामर्श से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे विषयों को विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिन पर वीडियो कान्फ्रेंसिंग या ऐसे अन्य इलैक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से आयोजित केन्द्रीय बोर्ड के किसी अधिवेशन में चर्चा नहीं की जाएगी ।
(2) अधिवेशन में सब प्रश्नों का विनिश्चय अधिवेशन में उपस्थित या वीडियो कान्फ्रेंसिंग या ऐसे अन्य इलैक्ट्रानिक साधनों के माध्यम से निदेशकों के मतों के बहुमत द्वारा किया जाएगा और समान मतों की दशा में अध्यक्ष या उसकी अनुपस्थिति में अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत प्रबंध निदेशक का द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।]
(3) जो कोई निदेशक स्टेट बैंक द्वारा या उसकी ओर से कृत या की जाने के लिए प्रस्थापित किसी संविदा, ऋण ठहराव या प्रस्तावना से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से सम्पृक्त या हितबद्ध है वह यथासंभव सर्वप्रथम अवसर पर अपने हित का, स्वरूप केन्द्रीय बोर्ड को बता देगा और जब कि ऐसे किसी संविदा, ऋण, ठहराव या प्रस्थापना पर विचार-विमर्श हो रहा हो तब जब तक कि अन्य निदेशकों ने जानकारी प्राप्त करने के लिए उसकी उपस्थिति की अपेक्षा न की हो, वह केंद्रीय बोर्ड के किसी अधिवेशन में उपस्थित न होगा तथा इस प्रकार उपस्थित होने के लिए अपेक्षित कोई निदेशक ऐसी किसी संविदा, ऋण, ठहराव या प्रस्थापना पर मत नहीं डालेगा :
[परन्तु इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात ऐसे निदेशक को केवल इस कारण ही लागू न होगी कि वह-
(I) (निदेशक से भिन्न) ऐसा अंश (शेयर) धारी है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित ऐसी किसी पब्लिक कंपनी में अथवा भारत के तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के द्वारा या अधीन स्थापित ऐसे किसी निगम में अथवा ऐसी किसी सहकारी सोसाइटी में समादत्त पूंजी के दो प्रतिशत से अधिक पूंजी को धारण नहीं किए हुए है, जिससे स्टेट बैंक कोई संविदा, ठहराव या प्रस्थापना कर चुका है या करने की प्रस्थापना करता है अथवा जिससे स्टेट बैंक उधार दे चुका है या उधारा देने की प्रस्थापना करता है, अथवा
(II) स्टेट बैंक का पदेन निदेशक है अथवा समनुषंगी बैंक का निदेशक है, [अथवा]
[(III) यदि वह धारा 19 । । । के खंड (गक) या खंड (गख) के अधीन नियुक्त निदेशक है तो स्टेट बैंक का अधिकारी या अन्य कर्मचारी है ।]
(4) यदि केंद्रीय बोर्ड के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने के लिए न तो अध्यक्ष और न [अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत प्रबन्ध निदेशक] ही समर्थ है, तो । । । कोई निदेशक, जो अध्यक्ष द्वारा इस निमित्त लिखित रूप से प्राधिकृत है, तथा ऐसे प्राधिकार के अभाव में, उपस्थित निदेशकों द्वारा अपने में से निर्वाचित [कोई निदेशक] उस अधिवेशन में सभापतित्व करेगा तथा समान मतों की अवस्था में उसका द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
[31क. केंद्रीय बोर्डों के अधिवेशन-(1) स्थानीय बोर्ड ऐसे समय और स्थान पर अधिविष्ठ होगा और अपने अधिवेशनों में काम-काज के करने विषयक प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन करेगा जो विहित किए जाएं ।
(2) अधिवेशनों में सब प्रश्नों पर विनिश्चय उपस्थित सदस्यों के मतों की बहुसंख्या द्वारा किया जाएगा और मतों की समानता की अवस्था में उस व्यक्ति का, जो अधिवेशन में सभापतित्व कर रहा है, द्वितीय या निर्णायक मत होगा ।
(3) ऐसा कोई सदस्य, जो ऐसी किसी संविदा, उधार, ठहराव या प्रस्थापना से सम्पृक्त या हितबद्ध है, जो स्टेट बैंक द्वारा या उसकी ओर से की गई है या किए जाने के लिए प्रस्थापित है, यथासंभव सर्वप्रथम अवसर पर स्थानीय बोर्ड में अपने हित के स्वरूप को प्रकट करेगा तथा जब किसी ऐसी संविदा, उधार, ठहराव या प्रस्थापना पर विचार किया जाता है तब स्थानीय बोर्ड के किसी अधिवेशन में वहां के सिवाय उपस्थित न रहेगा जहां कि अन्य सदस्य इस प्रयोजन से कि उससे जानकारी प्राप्त की जाए, उसके उपस्थित रहने की उससे अपेक्षा करते हैं, और जिस सदस्य से उपस्थित रहने की ऐसी अपेक्षा की गई है वहां किसी संविदा, उधार, ठहराव या प्रस्थापना के विषय में कोई मत न डालेगा :
परन्तु इस उपधारा में अंतर्विष्ट कोई बात ऐसे सदस्य को केवल इस कारण लागू न होगी कि वह-
(I) (निदेशक से भिन्न) ऐसा अंश (शेयर) धारी है जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में यथापरिभाषित ऐसी किसी पब्लिक कंपनी में अथवा भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के द्वारा या अधीन स्थापित ऐसे किसी निगम में अथवा ऐसी किसी सहकारी सोसाइटी में समादत्त पूंजी के दो प्रतिशत से अधिक पूंजी को धारण नहीं किए हुए है जिससे स्टेट बैंक कोई संविदा, उधार ठहराव या प्रस्थापना कर चुका है या करने की प्रस्थापना करता है अथवा जिसे स्टेट बैंक उधार दे चुका है या उधार देने की प्रस्थापना करता है;
(II) स्टेट बैंक का पदेन निदेशक है अथवा समनुषंगी बैंक का निदेशक है ।
(4) यदि किसी कारणवश न तो अध्यक्ष और न उपाध्यक्ष स्थानीय बोर्ड के अधिवेशन में उपस्थित होने में समर्थ है तो [मुख्य महाप्रबंधक से भिन्न] कोई सदस्य, जिसे उपस्थित सदस्यों ने अपने में से निर्वाचित किया है, अधिवेशन में सभापतित्व करेगा ।
(5) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी अध्यक्ष स्थानीय बोर्ड के ऐसे किसी अधिवेशन में, जिसमें वह उपस्थित है, सभापतित्व करेगा तथा अध्यक्ष की अनुपस्थिति की दशा में [अध्यक्ष द्वारा प्राधिकृत प्रबंध निदेशक], ऐसे अधिवेशन में तब सभापतित्व करेगा जब वह उपस्थित है ।]
अध्याय 6
स्टेट बैंक का कारोबार
32. स्टेट बैंक रिजर्व बैंक के अभिकर्ता के रूप में कार्य करेगा-(1) स्टेट बैंक, रिजर्व बैंक द्वारा अपने से ऐसी अपेक्षा किए जाने पर, भारत के ऐसे स्थानों में, जहां उसकी शाखा है [अथवा जहां समनुषंगी बैंक की शाखा है] तथा रिजर्व बैंक बैंककारी विभाग की कोई शाखा नहीं है-
(क) भारत में की किसी सरकार की ओर से धन, सोना, चांदी और प्रतिभूतियां देने, प्राप्त करने, संगृहीत और संप्रेषित करने के लिए, और
(ख) कोई अन्य कामकाज, जो उसे रिजर्व बैंक समय-समय पर सौंपे, लेने और संव्यवहृत करने के लिए,
रिजर्व बैंक के अभिकर्ता के रूप में कार्य करेगा ।
(2) जिन निबंधनों और शर्तों पर ऐसा कोई अभिकरण कारबार रिजर्व बैंक की ओर से स्टेट बैंक द्वारा किया जाएगा वे ऐसी होंगी जैसी करार पाई जाएं ।
(3) यदि उपधारा (2) में निर्देशित किसी विषय पर कोई करार नहीं हो पाता या अपने बीच हुए किसी करार के निर्वचन के बारे में स्टेट बैंक और रिजर्व बैंक के बीच कोई विवाद पैदा हो जाता है, तो वह मामला केंद्रीय सरकार को निर्देशित किया जाएगा तथा उस पर केंद्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(4) स्टेट बैंक अपने को उपधारा (1) के अधीन सौंपे गए किसी कामकाज का संव्यवहरण या कृत्य का पालन [या तो स्वयं ही या समनुषंगी बैंक के द्वारा] या रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित अभिकर्ता के माध्यम से कर सकेगा ।
[33. अन्य कारबार जिसे स्टेट बैंक कर सकेगा-इस अधिनियम में अंतर्विष्ट अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए स्टेट बैंक, बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 5 के खंड (ख) में यथापरिभाषित बैंककारी का कारबार चला सकेगा और कर सकेगा और उस अधिनियम की धारा 6 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अन्य प्रकार के कारबारों में से एक या अधिक कर सकेगा ।]
34. वह कारबार जिसका संव्यवहरण स्टेट बैंक नहीं कर सकेगा- । । । ।
(6) [इस अधिनियम] में अन्यथा उपबंधित अवस्था को छोड़कर, स्टेट बैंक ऐसे भवनों या अन्य आवासों के लिए उपबंध करने के, जिसमें स्टेट बैंक का कारबार चलाया जाएगा अथवा अपने अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के लिए निवास स्थान उपबंधित करने के प्रयोजन के सिवाय किसी स्थावर सम्पत्ति । । । का स्वामित्व अर्जित नहीं करेगा:
परन्तु यदि कोई ऐसा भवन या अन्य आवास स्टेट बैंक के प्रयोजनों में से किसी प्रयोजन के लिए तुरंत अपेक्षित नहीं है, तो स्टेट बैंक उसे पट्टे पर देकर या किसी अन्य रीति से उसका सर्वोत्तम लाभप्रद उपयोग कर सकेगा ।
35. स्टेट बैंक अन्य बैंकों के कारबार को अर्जित कर सकेगा-(1) स्टेट बैंक किसी बैंककारी संस्था की आस्तियों और दायित्वों सहित उसके कारबार का अर्जन करने के लिए केंद्रीय सरकार की मंजूरी से बातचीत कर सकेगा तथा यदि केंद्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करके वैसा निदेश दे तो ऐसी बातबीच करेगा ।
[(2) यदि ऐसे अर्जन से संबंधित निबंधन और शर्तें स्टेट बैंक के केन्द्रीय बोर्ड तथा संपृक्त बैंककारी संस्था के निदेशक बोर्ड या प्रबंध मंडल द्वारा करार पाई गई है और रिजर्व बैंक द्वारा अनुमोदित हैं, तो वे निबंधन और शर्तें केंद्रीय सरकार के समक्ष उसकी मंजूरी के लिए रखी जाएंगी तथा वह सरकार लिखित आदेश द्वारा (जिसे यहां के पश्चात् इस धारा में मंजूरी का आदेश कह कर निर्दिष्ट किया गया है) उसे मंजूर कर देगी ।
(3) इस अधिनियम या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि में संपृक्त बैंककारी संस्था के गठन को विनियमित करने वाली किसी लिखत में किसी बात के होते हुए भी वे निबंधन और शर्तें उस रूप में, जिसमें केंद्रीय सरकार द्वारा मंजूर की गई हैं, उस तारीख को प्रभावशील होंगे जो केंद्रीय सरकार ने मंजूरी के आदेश में इस निमित्त विनिर्दिष्ट की हों और स्टेट बैंक पर और संपृक्त बैंककारी संस्था पर तथा बैंककारी संस्था के अंश (शेयर) धारियों (अथवा यथास्थिति स्वत्वधारियों) पर तथा उस बैंककारी संस्था के लेनदारों पर आबद्धकर होगीट ।
(4) यदि वे निबंधन और शर्तें मंजूरी के आदेश में विनिर्दिष्ट तारीख को किसी कारणवश प्रवर्तन में नहीं आ पाती तो केंद्रीय सरकार उस प्रयोजन के लिए अन्य समुचित तारीख नियत कर सकेगी ।]
(5) उस तारीख को, जिसको पूर्वोक्त निबंधन और शर्त प्रवर्तन में आ जाती है, संपृक्त बैंककारी संस्था का वह कारबार और वे आस्तियां और दायित्व, जो अर्जन के अन्तर्गत आते हैं, मंजूरी के आदेश के आधार पर और उस आदेश के अनुसार स्टेट बैंक को अन्तरित हो जाएंगे और यथाक्रम स्टेट बैंक का कारबार, आस्तियां और दायित्व हो जाएंगे ।
(6) किसी बैंककारी संस्था के काराबार और उसकी आस्तियां और दायित्व का इस धारा के अधीन अर्जन करने के लिए प्रतिफल उस दशा में, जिसमें कि यह करार पाया गया हो, या तो नगदी में या स्टेट बैंक की पूंजी में अशों (शेयरों) के आबंटन द्वारा अथवा भागतः नकदी में और भागतः अंशों (शेयरों) के आबंटन द्वारा दिया जा सकेगा तथा स्टेट बैंक ऐसे किसी आबंटन या प्रयोजन से इस अधिनियम के उन अन्य उपबधों के अधीन रहते हुए, जो पूंजी में वृद्धि करने संबंधी है, स्टेट बैंक की पूंजी में वृद्धि इतने अंशों (शेयरों) के पुरोधरण द्वारा कर सकेगा जितने स्टेट बैंक द्वारा अवधारित किए जाएं ।
(7) ऐसा कोई कारबार, जो इस धारा के अधीन अर्जित किया गया है, स्टेट बैंक द्वारा इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किन्तु उनसे ऐसी छूट देकर या उनमें ऐसे उपांतर करके चलाया जाएगा जैसे केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक के परामर्श से शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त करे:
परन्तु ऐसी कोई छूट या उपांतर ऐसे न किया जाएगा कि वह अर्जन की तारीख से सात वर्ष से अधिक की कालावधि के लिए प्रभावशील रहे ।
(8) किसी बैंककारी संस्था के कारबार तथा आस्तियों और दायित्वों का अर्जन इस धारा के अधीन किए जाने पर उस बैंककारी संस्था के किसी भी अधिकारी या अन्य कर्मचारी औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में अथवा किसी अन्य विधि या किसी करार में, जो तत्समय प्रवृत्त है, किसी बात के होते हुए भी किसी उस प्रतिकर का हकदार न होगा जिसका हकदार वह उस अधिनियम या उस अन्य विधि या उस करार के अधीन हो तथा ऐसे प्रतिकर की बाबत कोई दावा किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी द्वारा उस दशा में ग्रहण न किया जाएगा जिसमें कि किसी स्टेट बैंक द्वारा उन निबंधनों और शर्तों पर, जो उस बैंक द्वारा प्रस्थापित की गई है, किए गए प्रस्ताव को लिखित रूप में उस द्वारा प्रतिगृहीत कर लिए जाने पर वह ऐसे निबंधन और शर्तों के अनुसार नियोजित कर लिया गया है ।
(9) यदि केंद्रीय सरकार ऐसी किसी बैंककारी संस्था की दशा में, जिसके संबंध में मंजूरी का आदेश इस धारा के अधीन कर दिया गया है यह बात आवश्यक या समीचीन समझती है, तो उस बैंककारी संस्था के कारबार तथा आस्तियों और दायित्वों के अर्जन से संबंधित निबन्धनों और शर्तों के प्रवर्तन में आने के पूर्व या पश्चात् किसी समुचित व्यक्ति को इसलिए नियुक्त कर सकेगी कि वह उस बैंककारी संस्था का प्रबंध, उसके कार्यकलाप का परिसमापन करने और उसकी आस्तियों का वितरण करने के प्रयोजन से अपने हाथ में ले ले तथा ऐसे प्रबंध के संबंध में किया गया व्यय (जिसके अन्तर्गत उस व्यक्ति को, जो ऐसे नियुक्त किया गया है तथा उसके कर्मचारिवृदं का, यदि कोई हो, पारिश्रमिक आता है), उस बैंककारी संस्था की आस्तियों में से अथवा स्टेट बैंक द्वारा, जैसा भी केन्द्रीय सरकार निर्दिष्ट करे, दिया जाएगा ।
(10) किसी बैंककारी संस्था का प्रबंध हाथ में ले लेने के लिए उपधारा (9) के अधीन समुचित व्यक्ति की नियुक्ति के साथ या उसके ठीक पश्चात् केंद्रीय सरकार ऐसे निदेश दे सकेगी जिनका उस व्यक्ति द्वारा अनुसरण पूर्वोक्त प्रयोजनों के लिए बैंककारी संस्था के प्रबंध में किया जाना है और वैसा होने पर-
(क) कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के या [बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10)] के या किसी अन्य तत्समय प्रवृत्त विधि के अथवा उस अधिनियम या विधि के आधार पर प्रभावशील होने वाले किसी लिखत के उपबंध, उस बैंककारी संस्था को या उसके संबंध में वहां तक लागू न रह जाएंगे जहां तक कि वे ऐसे निदेशों से असंगत हैं;
(ख) ऐसे निदेशों के निकाले जाने के ठीक पूर्व प्रबंध के भारसाधक सब व्यक्तियों की बाबत, जिसके अन्तर्गत ऐसा कोई व्यक्ति है जो ऐसे निदेशों के निकाले जाने के ठीक पूर्व बैंककारी संस्था के प्रबंधक या निदेशक के रूप में पद धारण किए हुए है, यह समझा जाएगा कि अपने उस रूप में उन्होंने अपने पद रिक्त कर दिए हैं; तथा
(ग) वह व्यक्ति, जो बैंककारी संस्था का प्रबंध अपने हाथ में लेने के लिए नियुक्त किया गया है उन निदेशों के अनुसार ऐसे सब कदम उठाएगा जैसे उसके कार्यकलाप का परिसमापन करने और उसकी आस्तियों का वितरण सुकर बनाने के लिए आवश्यक हों ।
(11) जबकि केंद्रीय सरकार का समाधान हो जाता है कि ऐसी किसी बैंककारी संस्था के कार्यकलाप का परिसमापन करने के लिए और कुछ करना शेष नहीं रहा है तब वह दूसरे लिखित आदेश द्वारा यह निदेश दे सकेगी कि ऐसी तारीख को और से, जैसी उसमें विनिर्दिष्ट की जाए, वह बैंककारी संस्था विघटित हो गई है और वैसा होने पर ऐसा कोई निदेश इस बात के होते हुए भी प्रभावशील होगा कि किसी अन्य विधि में इसके प्रतिकूल कोई बात है ।
(12) इस धारा के अधीन कोई कार्रवाई इस आधार पर ही प्रश्नगत न की जाएगी कि ऐसे उस बैंककारी संस्था के गठन में कोई त्रुटि है जिसके संबंध में ऐसी कार्रवाई की गई है अथवा उसके निदेशक बोर्ड के गठन में अथवा उन व्यक्तियों की नियुक्ति में, जिन्हें उसके कार्यकलाप का प्रबंध सौंपा गया है, कोई त्रुटि है ।
(13) इस धारा में बैंककारी संस्था के अन्तर्गत ऐसा कोई व्यष्टि या व्यष्टियों का संगम (भले ही वह निगमित हो या नहीं अथवा वह सरकारी विभाग हो या पृथक् संस्था हो) आता है जो बैंककारी का कारबार कर रहा है ।]
[35क. निदेशकों की नियुक्ति के संबंध में स्टेट बैंक के साथ किए गए ठहराव का अभिभावी होना-(1) जहां किसी कंपनी के साथ स्टेट बैंक द्वारा किए गए किसी ठहराव में स्टेट बैंक द्वारा ऐसी कंपनी के एक या अधिक निदेशकों की नियुक्ति के लिए उपबंध है वहां ऐसे उपबंध और उनके अनुसरण में की गई निदेशकों की कोई नियुक्ति कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या कंपनी से संबंधित संगम-ज्ञापन, संगम अनुच्छेद या किसी अन्य लिखत में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी विधिमान्य और प्रभावी होगी और शेयर-अर्हता, आयु-सीमा, निदेशकों की संख्या, निदेशकों के पद से हटाए जाने और पूर्वोक्त ऐसी किसी विधि या लिखत में अंतर्विष्ट वैसी ही शर्तों के संबंध में कोई उपबंध, पूर्वोक्त ठहराव के अनुसरण में स्टेट बैंक द्वारा नियुक्त किसी निदेशक को लागू नहीं होगा ।
(2) पूर्वोक्त रूप से नियुक्त कोई निदेशक-
(क) स्टेट बैंक के प्रसादपर्यन्त पद धारण करेगा और उसे स्टेट बैंक के लिखित आदेश द्वारा हटाया जा सकेगा या उसके स्थान पर किसी अन्य व्यक्ति को रखा जा सकेगा;
(ख) निदेशक होने के कारण ही अथवा ऐसी किसी बात के लिए जिसे निदेशक के रूप में अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सद्भावपूर्वक किया गया है या करने का लोप किया गया है अथवा उससे संबंधित किसी बात के लिए कोई बाध्यता या दायित्व उपगत नहीं करेगा;
(ग) चक्रानुक्रम से निवृत्ति के लिए दायी नहीं होगा और उसे ऐसी निवृत्ति के लिए दायी निदेशकों की संख्या की संगणना करने के लिए हिसाब में नहीं लिया जाएगा ।]
अध्याय 7
निधियां, लेखा और लेखा संपरीक्षा
36. एकीककरण और विकास निधि-(1) स्टेट बैंक एकीकरण और विकास निधि नामक विशेष निधि बनाए रखेगा जिसमें निम्नलिखित डाले जाएंगे, -
(क) वे लाभांश, जो [केन्द्रीय सरकार] द्वारा धृत स्टेट बैंक के उन अंशों (शेयरों) मद्दे देय हैं जो कुल पुरोधृत पूंजी के पचपन प्रतिशत से अधिक नहीं हैं, और
(ख) वे अभिदाय जिन्हें । । । केंद्रीय सरकार समय-समय पर करे:
[परंतु यदि एकीकरण और विकास निधि में उस तारीख को, स्टेट बैंक द्वारा किसी लाभांश की घोषणा की है, अतिशेष पांच करोड़ रुपए या उससे अधिक है तो उस निधि में कोई रकम खंड (क) के अधीन न डाली जाएगी तथा वह लाभांश, जो 1[केन्द्रीय सरकार] को देय है, 1[उस सरकार को दिया जाएगाट तथा यदि उस तारीख को वह अतिशेष पांच करोड़ रुपए से कम है तो तब देय लाभांशों में से केवल इतना ही, जितने से वह अतिशेष पांच करोड़ रुपए हो जाएगा, उस निधि में डाला जाएगा तथा उस लाभांश का अतिशेष 1[केन्द्रीय सरकार] को दे दिया जाएगा ।]
(2) उक्त निधि में जो रकम हो वह निम्नलिखित की पूर्ति के लिए अनन्यतः लगाई जाएगी-
(क) वे हानियां ऐसी वार्षिक राशि के आधिक्य में हैं जैसी 1[केन्द्रीय सरकार] और स्टेट बैंक के बीच करार पाई जाएं तथा धारा 16 की उपधारा (5) के अनुसरण में स्थापित शाखाओं के कारण हुई समझी । । । जा सकती हैं,
[(कक) वे सहाय्यिकियां जो 1[केन्द्रीय सरकार] के अनुमोदन से स्टेट बैंक को अनुदत्त की हों; तथा]
(ख) वे अन्य हानियां या व्यय जो केंद्रीय सरकार द्वारा रिजर्व बैंक से परामर्श करके अनुमोदित हों ।
(3) उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, उक्त निधि 1[केन्द्रीय सरकार] की सम्पत्ति होगी तथा किसी अंश (शेयर) धारी या स्टेट बैंक अथवा किसी अन्य व्यक्ति का कोई दावा उक्त निधि में धृत राशि पर न होगा ।
[(4) जो रकम उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट प्रयोजनों में से किसी के लिए उपयोजित की गई है उसकी बाबत आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के प्रयोजनों के लिए यह समझा जाएगा कि वह स्टेट बैंक की आय, लाभ या अधिलाभ हैं ।]
37. आरक्षित निधि-स्टेट बैंक एक आरक्षित निधि स्थापित करेगा जो निम्नलिखित से मिलकर गठित होगी-
(क) इम्पीरियल बैंक की आरक्षित निधि में धृत राशि, जो स्टेट बैंक को नियत दिन को अन्तरित की गई थी; और
(ख) ऐसी अतिरिक्त राशियां, जिन्हें स्टेट बैंक लाभांश की घोषणा करने से पूर्व अपने वार्षिक शुद्ध लाभ में से उसमें अन्तरित करे ।
38. लाभों का व्ययन-(1) डूबन्त और शंकापूर्ण ऋणों, आस्तियों में अवक्षयण, लाभाशों में समीकरण, कर्मचारिवृन्द और अधिवार्षिकी निधियों के अभिदाय के लिए तथा सब अन्य विषयों के लिए, जिनके लिए उपबंध इस अधिनियम के अधीन या द्वारा आवश्यक है या जिनके लिए प्रायः बैंककारी कंपनी उपबंध करते हैं, उपबंध करने के पश्चात् स्टेट बैंक अपने शुद्ध लाभों में से लाभांश की घोषणा कर सकेगा ।
(2) लाभांश की दर प्रथम अनुसूची के पैरा 6 के उपबंधों के अधीन रहते हुए केन्द्रीय बोर्ड द्वारा अवधारित की जाएगी ।
[38क. असंदत्त या अदावाकृत लाभाशों का अंतरण-(1) जहां भारतीय स्टेट बैंक (संशोधन) अधिनियम, 2010 के प्रारंभ के पश्चात्, स्टेट बैंक द्वारा कोई लाभांश घोषित किया गया है, किंतु जिसका घोषणा की तारीख से तीस दिन के भीतर किसी अंश धारक (शेयर धारक) को संदाय नहीं किया गया है अथवा उसके हकदार किसी अंश धारक (शेयर धारक) द्वारा उसका दावा नहीं किया गया है, वहां स्टेट बैंक, तीस दिन की उक्त अवधि की समाप्ति की तारीख से सात दिन के भीतर ऐसे लाभांश की, जो असंदत्त या अदावाकृत रह जाता है, कुल रकम को, उसके द्वारा रखे गए असंदत्त लाभांश लेखा" नामक विशेष लेखे में अंतरित करेगा ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में, ऐसे लाभांश की, जो असंदत्त रहता है" पद से कोई ऐसा लाभांश अभिप्रेत है, जिसकी बाबत वारंट (अधिपत्र) भुनाया नहीं गया है या जिसका अन्यथा संदाय या दावा नहीं किया गया है ।
(2) जहां भारतीय स्टेट बैंक (संशोधन) अधिनियम, 2010 के प्रारंभ से पूर्व स्टेट बैंक द्वारा घोषित कोई संपूर्ण लाभांश या उसका कोई भाग ऐसे प्रारंभ पर असंदत्त रहता है, वहां स्टेट बैंक ऐसे प्रारंभ से छह मास की अवधि के भीतर, उपधारा (1) में निर्दिष्ट लेखा में ऐसी असंदत्त रकम को अंतरित करेगा ।
(3) इस धारा के अनुसरण में स्टेट बैंक के असंदत्त लाभांश लेखा में अंतरित कोई धन, जो ऐसे अंतरण की तारीख से सात वर्ष की अवधि तक असंदत्त या अदावाकृत रहता है, स्टेट बैंक द्वारा, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 205ग की उपधारा (1) के अधीन स्थापित विनिधानकर्ता शिक्षा और संरक्षण निधि में उस प्रयोजन के लिए उपयोग किए जाने हेतु तथा उस धारा में विनिर्दिष्ट रीति में, अंतरित किया जाएगा ।]
39. बहियां प्रतिवर्ष संतुलित की जाएंगी-केन्द्रीय बोर्ड स्टेट बैंक की बहियों को, [ [प्रत्येक वर्ष 31 [मार्च] को या ऐसी अन्य तारीख को जो केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा विनिर्दिष्ट करे],] बन्द सन्तुलित काराएगा ।
[परंतु केन्द्रीय सरकार, इस धारा के अधीन, एक लेखा अवधि से दूसरी लेखा अवधि को संक्रमण को सुकर बनाने की दृष्टि से, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो वह संबंधित वर्षों की बाबत बहियों को बंद और संतुलित करने के लिए, या उससे संबंधित अन्य विषयों के लिए, आवश्यक या समीचीन समझती हैं ।]
40. विवरणियां-(1) स्टेट बैंक, [ [यथास्थिति, 31 [मार्च] या धारा 39 के अधीन विनिर्दिष्ट तारीख] से जिस तारीख को उसकी बहियां बन्द और संचालित की जाती हैं, तीन मास से भीतर] अपना तुलनपत्र उस कालावधि में, जितनी तक का लेखा है [लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट और स्टेट बैंक के कार्यकरण और क्रियाकलापों की बाबत केन्द्रीय बोर्ड की रिपोर्ट] तथा लाभ और हानि के लेखा सहित केन्द्रीय सरकार और रिजर्व बैंक को देगा :
[परंतु केन्द्रीय सरकार रिजर्व बैंक से परामर्श करने के पश्चात् तीन मास की उक्त कालावधि को तीन मास से अधिक होने वाली ऐसी अतिरिक्त कालावधि के लिए बढ़ा सकेगी जिसे वह ठीक समझे ।]
8[(2) तुलनपत्र तथा लाभ-हानि लेखा केंद्रीय बोर्ड के अध्यक्ष, प्रबंध निदेशकों तथा कम से कम तीन अन्य निदेशकों द्वारा हस्ताक्षरित किए जाएंगे ।]
(3) स्टेट बैंक उस तारीख से, जिसको उसका लेखा बन्द और सन्तुलित किया जाता है, दो मास के अन्दर केंद्रीय सरकार और रिजर्व बैंक को एक विवरण भी पारेषित करेगा जिसमें उक्त तारीख को स्टेट बैंक के प्रत्येक अंश (शेयर) धारी का, जहां तक मालूम हो सके, पता, उसकी उपजीविका और उसके द्वारा धृत अंशों (शेयरों) की संख्या होगी ।
[(4) केंद्रीय सरकार लेखा परीक्षकों की रिपोर्ट और स्टेट बैंक के कार्यकरण और क्रियाकलापों की बाबत केंद्रीय बोर्ड की रिपोर्ट प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी । । । ।]
41. संपरीक्षा-(1) स्टेट बैंक के कार्यकलाप की संपरीक्षा [कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 226 के अधीन] कंपनी के लेखापरीक्षक के रूप में कार्य करने के लिए सम्यक् रूप से अर्ह [दो या अधिक संपरीक्षकों द्वारा] की जाएगी जो [स्टेट बैंक द्वारा रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन से] नियुक्त किए जाएंगे ।
(2) संपरीक्षकों को ऐसा पारिश्रमिक मिलेगा जैसा रिजर्व बैंक केंद्रीय सरकार से परामर्श करके नियत करे ।
(3) संपरीक्षक अंश (शेयर) धारी हो सकता है किन्तु स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति का कोई निदेशक या सदस्य अथवा स्टेट बैंक का कोई अधिकारी ऐसे निदेशक, सदस्य या अधिकारी के रूप में बने रहने के दौरान संपरीक्षक होने के लिए पात्र नहीं होगा ।
(4) संपरीक्षक अपना पद छोड़ देने पर पुनर्नियुक्ति के लिए पात्र होगा ।
(5) संपरीक्षक, अपनी क्रमवार, नियुक्तियों के पश्चात् [वार्षिक] साधारण अधिवेशन तक पृथक्तः संपरीक्षक होंगे और उस रूप में निरंतर कार्य करते रहेंगे तथा यदि किसी संपरीक्षक की पदावधि की समाप्ति के पूर्व कोई रिक्तता होती है तो वह रिक्त पद 3[स्टेट बैंक द्वारा रिजर्व बैंक के पूर्व अनुमोदन से] भरा जा सकेगा ।
(6) प्रत्येक संपरीक्षक को वार्षिक तुलन-पत्र तथा लाभ और हानि लेखा की एक प्रति तथा स्टेट बैंक द्वारा रखी गई सब बहियों की एक सूची दी जाएगी और परीक्षक का कर्तव्य होगा कि वह तुलन-पत्र तथा लाभ और हानि लेखा की उनसे सम्बद्ध लेखाओं और वाउचरों के साथ जांच करे तथा अपने कर्तव्यों के पालन में संपरीक्षक-
(क) की पहुंच स्टेट बैंक की बहियों, लेखाओं और अन्य दस्तावेजों तक सभी युक्तियुक्त समयों पर होंगी,
(ख) ऐसे लेखाओं की जांच पड़ताल करने में अपनी सहायता के लिए स्टेट बैंक के व्यय पर, या यदि वह केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त है तो केन्द्रीय सरकार के व्यय पर लेखापालों या अन्य व्यक्तियों को नियोजित कर सकेगा, और
(ग) स्टेट बैंक के किसी निदेशक या किसी स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति के किसी सदस्य अथवा स्टेट बैंक के किसी अधिकारी की परीक्षा ऐसे लेखाओं के संबंध में कर सकेगा ।
(7) संपरीक्षक वार्षिक तुलन-पत्र और लेखाओं के बारे में केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट भेजेंगे और ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट में वे-
(क) यह कथित करेंगे कि क्या तुलन-पत्र की बाबत उनकी यह राय है कि वह ऐसा पूरा और साफ-साफ तुलन-पत्र है या नहीं जिसमें सब आवश्यक विशिष्टियां दी हुई हैं और जो ऐसे तैयार किया गया है कि उससे स्टेट बैंक के कारबार [का सही और, ऋजु चित्र,] प्रदर्शित होता है और उस सूरत में जिसमें कि उन्होंने कोई स्पष्टीकरण या जानकारी मांगी है यह भी कथित करेंगे कि क्या वह दी गई है या नहीं और क्या वह समाधानप्रद है या नहीं,
(ख) यह कथित करेंगे कि स्टेट बैंक के जो संव्यवहार उनकी दृष्टि में आए हैं क्या वे संव्यवहार स्टेट बैंक की शक्ति के अंदर वाले थे या नहीं,
(ग) यह कथित करेंगे कि क्या स्टेट बैंक के कार्यालयों और उसकी शाखाओं से प्राप्त विवरणियां उनकी संपरीक्षा के प्रयोजन के लिए पर्याप्त पाई गई हैं या नहीं,
(घ) यह कथित करेंगे कि क्या लाभ और हानि लेखा उस कालावधि के लिए [लाभ या हानि] का सच्चा संतुलन दर्शित करता है या नहीं, जिसके लिए वह लेखा है, और
(ङ) कोई अन्य बात कथित करेंगे कि जिसके बारे में वे यह समझते हैं कि उसे, यथास्थिति, अंश (शेयर) धारियों या केंद्रीय सरकार के ध्यान में लाना चाहिए ।
[स्पष्टीकरण 1-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, केवल इस तथ्य के कारण कि, यथास्थिति, तुलन-पत्र या लाभ और हानि लेखा कोई ऐसी बात प्रकट नहीं करता है जिनको प्रकट करने की अपेक्षा, इस अधिनियम के सुसंगत उपबन्धों के साथ पठित बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के उपबन्धों द्वारा नहीं की गई है-
(क) तुलन-पत्र को स्टेट बैंक के कार्यकलाप का सही और ऋजु चित्र प्रकट न करने वाला नहीं माना जाएगा, और
(ख) लाभ और हानि लेखा को ऐसे लेखे के अन्तर्गत आने वाली कालावधि के लिए लाभ या हानि का सही संतुलन दर्शित न करने वाला नहीं माना जाएगा ।
स्पष्टीकरण 2-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए स्टेट बैंक के लेखाओं के बारे में केवल इस आधार पर कि वे कुछ बातों को प्रकट नहीं करते हैं यह नहीं समझा जाएगा कि वे समुचित रूप से तैयार नहीं किए गए हैं, यदि-
(I) वे बातें ऐसी हैं जिनको स्टेट बैंक से, इस अधिनियम के सुसंगत उपबंधों के साथ पाठित बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) में अंतर्विष्ट किसी उपबंध के आधार पर, प्रकट करने की अपेक्षा नहीं की गई है; और
(II) खंड (I) में निर्दिष्ट उपबंध स्टेट बैंक के तुलन-पत्र तथा लाभ और हानि लेखा में या संपरीक्षक की रिपोर्ट में विनिर्दिष्ट किए जाते हैं ।]
(8) संपरीक्षक संपरीक्षा रिपोर्ट की एक प्रति स्टेट बैंक को भी भेजेंगे ।
(9) पूर्वगामी उपबंधों में अंतर्विष्ट किसी बात पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, केंद्रीय सरकार किसी समय ऐसे संपरीक्षक नियुक्त कर सकेगी जैसे वह स्टेट बैंक के लेखाओं की परीक्षा करने और उन पर रिपोर्ट देने के लिए ठीक समझती है ।
[42. स्टेट बैंक के तुलनपत्र, आदि पर साधारण अधिवेशन में चर्चा की जा सकेगी-(1) एक वार्षिक साधारण अधिवेशन, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में निगमित केंद्र पर या निगमित केंद्र से भिन्न मुंबई में ऐसे अन्य स्थान पर या भारत में ऐसे अन्य स्थान पर और ऐसे समय पर, जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किया जाए, आयोजित किया जाएगा और वार्षिक साधारण अधिवेशन से भिन्न साधारण अधिवेशन स्टेट बैंक द्वारा किसी भी अन्य समय पर तथा भारत में ऐसे स्थान पर, आयोजित किया जा सकेगा जो केंद्रीय बोर्ड द्वारा समय-समय पर विनिर्दिष्ट किया जाएगा :
परंतु ऐसा वार्षिक साधारण अधिवेशन ऐसी तारीख से, जिसको धारा 40 की उपधारा (1) के अधीन लाभ-हानि लेखा तथा संपरीक्षा रिपोर्ट के साथ तुलनपत्र केन्द्रीय सरकार या रिजर्व बैंक को अग्रेषित किया जाता है, इनमें से जो तारीख पूर्वतर हो, छह सप्ताह की समाप्ति से पूर्व आयोजित किया जाएगा ।
(2) वार्षिक साधारण अधिवेशन में उपस्थित अंश धारक (शेयर धारक), यथास्थिति, पूर्ववर्ती 31 मार्च या धारा 39 के अधीन विनिर्दिष्ट तारीख तक तैयार किए गए स्टेट बैंक के तुलनपत्र तथा लाभ-हानि लेखा, लेखाओं के अंतर्गत आने वाली अवधि के लिए स्टेट बैंक के कार्यकरण तथा क्रियाकलापों पर केंद्रीय बोर्ड की रिपोर्ट तथा तुलनपत्र और लेखाओं पर संपरीक्षकों की रिपोर्ट पर चर्चा करने तथा उसे अंगीकार करने के लिए हकदार होंगे ।]
अध्याय 8
प्रकीर्ण
43. स्टेट बैंक अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति कर सकेगा- [(1)] स्टेट बैंक इतने अधिकारी, सलाहकार और कर्मचारी नियुक्त कर सकेगा जितने वह अपने कृत्यों के कुशल निर्वहन के लिए आवश्यक या वांछनीय समझता है तथा वह उनकी नियुक्ति और सेवा के निबंधनों और शर्तों को अवधारित कर सकेगा ।
[(2) स्टेट बैंक के अधिकारी, सलाहकार और कर्मचारी व्यष्टिक रूप से या संयुक्त रूप से या किसी स्थानीय समिति के अन्य अधिकारियों, सलाहकारों तथा कर्मचारियों के साथ ऐसी शक्तियों का प्रयोग करेंगे और ऐसे कर्तव्यों का पालन करेंगे जो साधारण या विशेष आदेश द्वारा केंद्रीय बोर्ड या उसकी कार्यकारी समिति द्वारा उन्हें न्यस्त या प्रत्यायोजित किए जाएं ।]
[43क. बोनस-(1) स्टेट बैंक का कोई अधिकारी, सलाहकार या [बोनस संदाय अधिनियम, 1965 (1965 का 21) की धारा 2 के खंड (13) के अर्थ में किसी कर्मचारी से भिन्नट अन्य कर्मचारी किसी बोनस के संदाय का हकदार नहीं होगा ।
(2) स्टेट बैंक का कोई कर्मचारी, जो बोनस संदाय अधिनियम, 1965 (1965 का 21) की धारा 2 के खंड (13) के अर्थ में कोई कर्मचारी है, किसी बोनस के संदाय का उस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ही हकदार होगा, अन्यथा नहीं ।
(3) इस धारा के उपबंध, किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकरण के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के होते हुए भी और इस अधिनियम के किसी अन्य उपबंध में या औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में अथवा किसी चलन, प्रथा या रूढ़ि में अथवा किसी संविदा, करार, समझौता, अधिनिर्णय या अन्य लिखत में किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।]
44. विश्वसनीयता और गोपनीयता के बारे में बाध्यता-(1) विधि द्वारा अन्यथा अपेक्षित अवस्थाओं को छोड़कर स्टेट बैंक बैंककारों में रूढ़िगत प्रणालियों और प्रथाओं का पालन करेगा तथा विशेषतया वह अपने संघटकों से या उनके कार्यों से संबद्ध कोई जानकारी उन परिस्थितियों में से अन्यथा प्रकट नहीं करेगा जिनमें वैसी जानकारी प्रकट करना विधि या बैंककारों के बीच रूढ़िगत प्रणालियों और प्रथा के अनुसार स्टेट बैंक के लिए आवश्यक या समुचित है ।
(2) प्रत्येक निदेशक, किसी स्थानीय बोर्ड का या स्थानीय समिति का सदस्य, स्टेट बैंक का संपरीक्षक, सलाहकार अधिकारी या अन्य कर्मचारी, अपने कर्तव्य ग्रहण करने से पूर्व द्वितीय अनुसूची में दिए गए प्ररूप वाली विश्वसनीयता और गोपनीयता की घोषणा करेगा ।
[(3) इस धारा की कोई बात प्रत्यय विषयक जानकारी कंपनी (विनियमन) अधिनियम, 2005 (2005 का 30) के अधीन प्रकट की गई प्रत्यय विषयक जानकारी को लागू नहीं होगी ।]
45. स्टेट बैंक के परिसमापन का वर्जन-कंपनियों के परिसमापन से संबद्ध विधि के कोई उपबंध स्टेट बैंक को लागू नहीं होंगे और केंद्रीय सरकार के आदेश से और ऐसी रीति से किए जाने के सिवाय, जैसी वह निर्दिष्ट करे स्टेट बैंक का परिसमापन नहीं किया जाएगा ।
46. निदेशकों और स्थानीय बोर्डों तथा स्थानीय समितियों के सदस्यों आदि को क्षतिपूर्ति-(1) स्टेट बैंक, प्रत्येक निदेशक और किसी स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति के सदस्य की क्षतिपूर्ति उसके अपने द्वारा जानबूझकर किए गए कार्य या व्यतिक्रम से हुई हानियों या व्ययों से भिन्न ऐसी हानियों या व्ययों के लिए करेगा जैसी वैसे निदेशक या सदस्य ने अपने कर्तव्यों के निर्वहन में या उनके संबंध में उठाई है या किए हैं ।
(2) न तो कोई निदेशक और न किसी स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति का कोई सदस्य ही स्टेट बैंक को हुई किसी ऐसी हानि या व्यय के लिए उत्तरदायी होगा जो स्टेट बैंक की ओर से अर्जित या ली गई किसी संपत्ति या प्रतिभूति की अपर्याप्तता या मृत्यु में अथवा हक में कमी से या किसी व्यौहारी या ऋणी के दिवाले या दोषपूर्ण कार्य से या अपने पद के कर्तव्यों के निष्पादन में अथवा उसके संबंध में की गई किसी बात से या जानबूझकर किए गए अपने कार्य या व्यतिक्रम से होने से अन्यथा हुई है या उठाना पड़ा है ।
47. नियुक्ति या गठन में त्रुटियों से कार्य या कार्यवाहियां अविधिमान्य नहीं होंगी-(1) केंद्रीय बोर्ड या किसी स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति के कोई कार्य या कार्यवाही केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं की जाएगी कि, यथास्थिति, बोर्ड या समिति के गठन में कोई त्रुटि या रिक्तता है ।
(2) निदेशक या किसी स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति के सदस्य के रूप में सद्भावपूर्वक कार्य करने वाले किसी व्यक्ति द्वारा किए गए सब कार्य इस बात के होते हुए भी कि उसकी नियुक्ति अर्हताओं में कुछ कमी थी वैसे ही विधिमान्य होंगे जैसे यदि वह केंद्रीय बोर्ड का निदेशक अथवा, यथास्थिति, स्थानीय बोर्ड या स्थानीय समिति का सदस्य होता तो वे विधिमान्य होते ।
48. [कठिनाइयां दूर करने की शक्ति ।]-भारतीय स्टेट बैंक (संशोधन) अधिनियम, 1964 (1964 का अधिनियम सं० 35) की धारा 15 द्वारा (1-12-1964 से) निरसित ।
49. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार [ऐसी सभी बातों का उपबंध करने के लिए नियम जिनके लिए इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए उपबंध करना आवश्यक या समीचीन है,] रिजर्व बैंक से परामर्श करके शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्ट रूप में और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम-
(क) इस अधिनियम के अधीन प्रतिकर की अदायगी के लिए प्रक्रिया के लिए उपबंध कर सकेंगे;
(ख) उन व्यक्तियों के अवधारित करने के लिए उपबंध कर सकेंगे जिन्हें सब अवस्थाओं में, जिनके अंतर्गत वे अवस्थाएं हैं जिनमें इम्पीरियल बैंक के अंश (शेयर) एक से अधिक व्यक्तियों द्वारा धृत हैं या जहां कि वे नियत दिन से पूर्व अंतरित कर दिए गए हैं किंतु अंतरण रजिस्ट्रीकृत नहीं हुआ है अथवा जिनमें अंश (शेयर) धारी की मृत्यु हो गई है उक्त प्रतिकर दिया जाएगा;
[(ग) धारा 19 । । । के खंड (गक) या खंड (गख) के अधीन निदेशक की नियुक्ति की रीति और उससे संबंधित या उसके आनुषंगिक सभी अन्य विषयों के लिए उपबंध कर सकेंगे ।]
[(घ) धारा 24क की उपधारा (6) के अधीन समिति के अधिवेशन का समय तथा स्थान और उसके द्वारा पालन की जाने वाली प्रक्रिया के नियम;
(ङ) धारा 24क की उपधारा (7) के अधीन प्रशासक तथा समिति के सदस्यों के वेतन और भत्ते ।]
[(3) इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हों, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात्, वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
50. केंद्रीय बोर्ड की विनियम बनाने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावशील करने के प्रयोजन के वास्ते जिन विषयों के लिए उपबंध करना समीचीन है उन सब के लिए ऐसे विनियम केंद्रीय बोर्ड रिजर्व बैंक से परामर्श करके और केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,] बना सकेगा जो इस अधिनियम तथा तद्धीन बनाए गए नियमों से असंगत नहीं हों ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे विनियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे: -
(क) स्टेट बैंक के अंशों (शेयरों) का स्वरूप, वह रीति जिसमें, और वे शर्तें जिनके अधीन रहते हुए अंशों (शेयरों) का धारण और अंतरण किया जा सकेगा तथा साधारणतः अंश (शेयर) धारियों के अधिकारों और कर्तव्यों से संबद्ध सब विषय,
[(कक) धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन साधारण या अधिमानी अंशों (शेयरों) के निर्गमन द्वारा पुरोधृत पूंजी में वृद्धि करने के लिए प्रक्रिया और उपधारा (5) के अधीन पुरोधृत पूंजी के लिए धन स्वीकार करने, शेयरों के समपहरण तथा पुनः पुरोधरण की रीति,
(कख) धारा 10क की उपधारा (1) के अधीन किसी व्यष्टि को एक व्यष्टि द्वारा नामनिर्देशित करने की रीति, उपधारा (2) के अधीन किसी व्यष्टि को संयुक्त धारकों द्वारा नामनिर्देशित करने की रीति, उपधारा (3) के अधीन नामनिर्देशन में फेरफार करने या उसे रद्द करने की रीति और उपधारा (4) के अधीन अवयस्क को नामनिर्देशित करने की रीति,]
[(ख) अंश (शेयर) धारियों के रजिस्टर को रखना और ऐसे रजिस्टर में धारा 13 में विनिर्दिष्ट विशिष्टयों के अतिरिक्त प्रविष्ट की जाने वाली विशिष्टियां, [कम्प्यूटर फ्लापियों या डिस्केट्स या किसी अन्य इलैक्ट्रानिक रूप में] अंश (शेयर) धारियों के रजिस्टर को रखे जाने में पालन किए जाने वाले रक्षोपाय, अंश (शेयर) धारियों के रजिस्टर का निरीक्षण और उसका बन्द किया जाना तथा तत्संबंधी सभी अन्य विषय,
(ग) उन विभिन्न क्षेत्रों को, [जो हर एक स्थानीय प्रधान कार्यालय की अधिकारिता के भीतर आते हैं] निर्वाचित निदेशकों का आबंटन करने सहित इस अधिनियम के अधीन निर्वाचनों का करना और संचालन तथा निर्वाचन के लिए अभ्यर्थियों की अर्हताओं के बारे में अथवा निर्वाचनों की विधिमान्यता के बारे में शंकाओं या विवादों का अंतिम अवधारण,
[(घ) स्थानीय बोर्ड की शक्तियों, कृत्य और कर्तव्य तथा वे निबंधन, शर्तें या परिसीमाएं, यदि कोई हों, जिनके अधीन रहते हुए, उनका प्रयोग या पालन किया जा सकेगा, स्थानीय समितियों का (जिनके अंतर्गत किसी ऐसी समिति के सदस्यों की संख्या आती है) तथा स्थानीय बोर्डों की समितियों का बनाया जाना और गठन ऐसी समितियों की शक्तियां, कृत्य और कर्तव्य, स्थानीय समितियों के तथा स्थानीय बोर्डों की समितियों के अधिवेशनों का करना और उनमें कारबार का संचालन,]
(ङ) वे फीसें और भत्ते जो निदेशकों या स्थानीय बोर्डों अथवा स्थानीय समितियों के सदस्यों की यथास्थिति, केंद्रीय बोर्ड के या उसके समितियों के, या स्थानीय बोर्डों अथवा स्थानीय समितियों के किन्हीं अधिवेशनों में उपस्थित होने के लिए या स्टेट बैंक का कोई अन्य कार्य करने के लिए किए जा सकेंगे,
(च) वह रीति जिसमें केंद्रीय बोर्ड [या स्थानीय बोर्डों] का कामकाज संव्यवहृत किया जाएगा तथा उसके अधिवेशनों में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया;
(छ) केन्द्रीय बोर्ड की समितियों के निर्माण और ऐसी समितियों को केन्द्रीय बोर्ड की शक्तियों और कृत्यों का प्रत्यायोजन तथा ऐसी समितियों में कामकाज का चालन,
। । । । । । ।
(झ) वह रीति, जिसमें साधारण अधिवेशन बुलाए जाएंगे, उनमें अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया तथा वह रीति, जिससे मताधिकारों का प्रयोग किया जा सकेगा,
(ञ) । । । अंश (शेयर) धारियों के अधिवेशन कराना और उनमें किए जाने वाला कामकाज,
(ट) वह रीति, जिसमें स्टेट बैंक की ओर से सूचनाओं की तामील अंश (शेयर) धारियों या अन्य व्यक्तियों पर की जा सकेगी,
(ठ) स्टेट बैंक के लिए मुद्रा मुहय्या करना तथा उनके प्रयोग की रीति और प्रभाव,
(ड) वैध कार्यवाहियों का संचालन और प्रतिरक्षा तथा अभिवचनों पर हस्ताक्षर करने की रीति;
(ढ) स्टेट बैंक अधिकारियों, अन्य कर्मचारियों, सलाहकारों और अभिकर्ताओं के कर्तव्य और आचरण,
[(ण) स्टेट बैंक के कर्मचारियों या उनके आश्रितों के फायदे के लिए या स्टेट बैंक के प्रयोजनों के लिए अधिवार्षिकी पेंशन, भविष्य निधि, या अन्य निधियों को स्थापित करना और बनाए रखना तथा ऐसी किसी निधि में से देय अधिवार्षिकी भत्ते, वार्षिकियां और पेंशनें मंजूर करना,]
(त) वह प्ररूप और रीति, जिसमें स्टेट बैंक के लिए आबद्धकर संविदाओं का निष्पादन किया जा सकेगा,
[(थ) किसी प्रतिभूति, प्रयोजन, रकम, अवधि के प्रति निर्देश के सहित या बिना अथवा अन्यथा धन अग्रिम देने या उधार देने अथवा किसी परक्राम्य या अन्य लिखत का मितिकाटे पर भुगतान करने या क्रय करने के संबंध में स्टेट बैंक द्वारा अपने कारबार के संव्यवहार में निबंधन, शर्तें, अनुबंध, निर्बंधन और परिसीमाएं, यदि कोई हों,]
(द) वे शर्तें केवल जिनके रहते हुए निदेशकों, स्थानीय बोर्डों या स्थानीय समितियों के सदस्यों, या स्टेट बैंक के अधिकारियों अथवा ऐसे निदेशकों, सदस्यों या अधिकारियों के नातेदारों को या ऐसी कंपनियों, फर्मों अथवा व्यक्तियों को अग्रिम धन दिए जा सकेंगे जिनके साथ या जिनसे निदेशक सदस्य, अधिकारी या नातेदार, भागीदार, निदेशकों, प्रबंधक, सेवक, अंश (शेयर) धारियों के रूप में अथवा अन्यथा संसक्त है,
(ध) वे कथन, विवरणियां और प्ररूप, जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अपेक्षित है,
(न) लाभांश, जिनके अंतर्गत अंतरिम लाभांश, देना,
(प) साधारणतः स्टेट बैंक के कारबार का संचालन ।
[(2क) इस धारा के अधीन बनाए गए सभी विनियम ऐसी पूर्ववर्ती या पश्चात्वर्ती तारीख से प्रभावी होंगे जो विनियमों में विनिर्दिष्ट की जाए ।]
(3) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी प्रथम, विनियमों को रिजर्व बैंक केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से बनाएगा और, ऐसा होने पर उनकी बाबत यह समझा जाएगा कि वे केंद्रीय बोर्ड द्वारा इस धारा के अधीन बनाए गए विनियम हैं तथा जब तक वे संशोधित या निरसित नहीं कर दिए जाएं वे तदनुकूल प्रभावशील रहेंगे ।
[(4) इस अधिनियम के अधीन केंद्रीय बोर्ड द्वारा बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, केंद्रीय सरकार को भेजा जाएगा और वह सरकार उसकी प्रति संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखवाएगी यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आुनक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पचात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
[51. कुछ अवस्थाओं में विदेशी विधि की अपेक्षाओं की पूर्ति की जाएगी-यदि भारत के बाहर किसी देश की विधियों के अनुसार किसी आस्ति या दायित्व को, जो इम्पीरियल बैंक के उपक्रम का भाग है और जो उस देश में स्थित है, स्टेट बैंक को अंतरित और उसमें निहित करने के लिए इस अधिनियम के उपबंध स्वयं कार्यसाधक नहीं हैं तो इम्पीरियल बैंक ऐसे सब कदम उठाएगा जैसे ऐसे अंतरण और निधान को करने और पूर्ण करने के प्रयोजन के लिए उस देश की विधियों द्वारा अपेक्षित हैं और उस संबंध में इम्पीरियल बैंक किसी आस्ति को आप्त और किसी दायित्व को उन्मोचित कर सकेगा और उसके शुद्ध आगमों को स्टेट बैंक को अंतरित कर सकेगा ।]
52. [1934 के अधिनियम संख्यांक 2 का संशोधन-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
53. [1949 के अधिनियम संख्यांक 10 का संशोधन]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
[54. 1920 के अधिनियम संख्यांक 47 का संशोधन ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
55. नियत दिन के पश्चात् इम्पीरियल बैंक के विरुद्ध भारत में कोई कार्यवाही नहीं होगी-नियत दिन को और से किसी व्यक्ति द्वारा इम्पीरियल बैंक के खिलाफ या उसके निदेशक, अधिकारी या अन्य कर्मचारी की हैसियत में उसके किसी ऐसे निदेशक, अधिकारी या कर्मचारी के खिलाफ भारत में कोई दावा या मांग या कोई कार्यवाही वहां तक के सिवाय नहीं की जाएगी जहां तक कि वह इस अधिनियम के उपबंधों को प्रवर्तित करने के लिए आवश्यक है अथवा जहां तक कि वह किसी ऐसे निदेशक, अधिकारी या कर्मचारी द्वारा किए गए किसी अपराध से सम्बद्ध है ।
56. अन्य विधियों में इम्पीरियल बैंक ऑफ बंगाल आदि के प्रति निर्देश-नियत दिन को और से इस अधिनियम या इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया ऐक्ट, 1920 (1920 का 47) से भिन्न किसी विधि या किसी संविदा या अन्य लिखत में इंपीरियल बैंक के या बैंक ऑफ बंगाल के, बैंक ऑफ मद्रास के, या बैंक ऑफ बम्बई के प्रति कोई निर्देश, केंद्रीय सरकार द्वारा दिए गए किसी साधारण या विशेष आदेश में अन्यथा उपबंधित अवस्था को छोड़कर स्टेट बैंक के प्रति निर्देश समझा जाएगा ।
57. इम्पीरियल बैंक का विघटन, आदि-(1) ऐसे दिन को, जैसा केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, इम्पीरियल बैंक विघटित हो जाएगा और इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया ऐक्ट, 1920 (1920 का 47) निरसित हो जाएगा ।
(2) उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना में विनिर्दिष्ट दिन को स्टेट बैंक रिजर्व बैंक को दस लाख रुपए की राशि देगा ।
(3) यदि उपधारा (1) के अधीन अधिसूचना में विनिर्दिष्ट दिन को इम्पीरियल बैंक के कब्जे या अभिरक्षण में कोई ऐसी आस्तियां हैं जो नियत दिन को या उसके पश्चात् सृष्ट की गई थी ऐसी आस्तियों का व्ययन केंद्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त दिए गए निदेशों के अनुसार किया जाएगा ।]
प्रथम अनुसूची
(धारा 9 देखिए)
इम्पीरियल बैंक के अंशों (शेयरों) को रिजर्व बैंक को अंतरित करने के लिए प्रतिकर
1. इस अनुसूची में अंश (शेयर) धारी से ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो नियत दिन से तुरंत पूर्व इम्पीरियल बैंक के अंश (शेयर) के धारक के रूप में है, रजिस्ट्रीकृत है ।
2. इम्पीरियल बैंक की पूंजी के उन अंशों (शेयरों) के लिए, जो इस अधिनियम के फलस्वरूप रिजर्व बैंक को अंतरित और उसमें निहित हुए हैं, रिजर्व बैंक प्रत्येक अंश (शेयर) धारी को पूर्णतः समादत्त अंश (शेयर) की अवस्था में एक हजार सात सौ पैंसठ रुपए दस आने प्रति अंश (शेयर) तथा भागतः समादत्त अंश (शेयर) की अवस्था में चार सौ इकतीस रुपए बारह आने और चार पाई प्रति अंश (शेयर) की दर पर परिकल्पित रकम प्रतिकर के रूप में इसमें इसके पश्चात् बताई गई रीति से देगा ।
3. इम्पीरियल बैंक की पूंजी में के अंशों (शेयरों) का अंतरण रिजर्व बैंक को किए जाने पर भी ऐसा कोई अंश (शेयर) धारी, जो नियत दिन से पूर्व ठीक अपने द्वारा धृत इम्पीरियल बैंक के अंशों (शेयरों) पर लाभांश पाने का हकदार है, स्टेट बैंक से-
(क) नियत दिन से पूर्व समाप्त हुए किसी आधे वर्ष के संबंध में अपने अंशों (शेयरों) पर प्रोद्भूत होने वाले शोध्य और तब तक न दिए गए सब लाभांश;
(ख) नियत दिन से तुरंत पूर्व की ऐसी किसी कालावधि के संबंध में, जिसके लिए इम्पीरियल बैंक ने कोई लाभांश घोषित नहीं किया है, केंद्रीय सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाने वाली दर पर परिकल्पित लाभांश पाने का हकदार होगा ।
4. (1) इस अनुसूची में उपबंधित प्रतिकर केंद्रीय सरकार की प्रतिभूतियों के रूप में दिया जाएगा और ऐसी प्रतिभूतियों का प्ररूप तथा उनका मूल्य, उनके बाजार मूल्य के प्रति निर्देश से संगणित मूल्य ऐसा होगा जैसा केन्द्रीय सरकार शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त निर्दिष्ट करे:
परन्तु जहां कि ऐसे प्रतिकर की रकम इस प्रकार अधिसूचित सरकारी प्रतिभूति के मूल्य का पूर्ण गुणित नहीं है वहां ऐसे मूल्य के निकटतम निचले गुणित से अधिक की रकम रिजर्व बैंक पर लिखे गए चैक द्वारा दी जाएगी ।
(2) उपधारा (1) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, ऐसा कोई व्यक्ति जो 1954 के 19 दिसंबर को इंपीरियल बैंक में अंश (शेयर) के धारक के रूप में रजिस्ट्रीकृत है और नियत दिन तक निरंतर वैसा बना रहा है, यदि नियत दिन से तीन मास के अवसान के पूर्व रिजर्व बैंक को उस निमित्त लिख कर आवेदन करता है, तो वह अपने को शोध्य कोई प्रतिकर प्रथम दस हजार रुपए तक रिजर्व बैंक पर लिखे गए चैक द्वारा पाने का हकदार होगा ।
5. (1) कोई अंश (शेयर) धारी, जिसे इस अनुसूची के अधीन प्रतिकर देय है, नियत दिन से तीन मास के अवसान से पूर्व रिजर्व बैंक से आवेदन कर सकेगा कि ऐसे प्रतिकर के बदले में उसे स्टेट बैंक में के अंश (शेयर) अंतरित कर दिए जाएं तथा ऐसे अंतरण के प्रयोजनों के लिए स्टेट बैंक के अंश (शेयर) का मूल्य ऐसा होगा जैसा रिजर्व बैंक इस द्वारा निमित्त अवधारित किया जाए ।
(2) यदि उपपैरा (1) के अधीन आवेदन की प्राप्ति पर, रिजर्व बैंक, स्वविवेक में, कोई अंश (शेयर) आवेदक को अंतरित करने का विनिश्चय करता है तो वह स्टेट बैंक को विहित प्ररूप में अधिपत्र यह निदेश देते हुए भेजेगा कि धारा 5 की उपधारा (1) के अधीन उसे दिए हुए अंशों (शेयरों) में से इतने अंशों (शेयरों) जितने उस अधिपत्र में विनिर्दिष्ट हैं, उसमें विनिर्दिष्ट व्यक्ति के पक्ष में अंतरित कर दिए जाएं, तथा स्टेट बैंक ऐसे अधिपत्र का पालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(3) रिजर्व बैंक द्वारा इस पैरा के अधीन निकाला गया अधिपत्र भारतीय स्टाम्प अधिनियम, 1899 (1899 का 2) के अधीन शुल्क देने के दायित्वाधीन नहीं होगा ।
6. (1) यदि रजिर्व बैंक पैरा 5 के अनुसरण में दो लाख तिरपन हजार एक सौ पच्चीस अंशों (शेयरों) से अधिक अंतरित करने का विनिश्चय करता है तो वह स्टेट बैंक से अपने को इतने और अंश (शेयर) देने की अपेक्षा कर सकेगा जितने यह सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक हो उसके अपने पास स्टेट बैंक की पुरोधृत पूंजी का पचपन प्रतिशत से अन्यून हो जाए तथा स्टेट बैंक धारा 5 की उपधारा (3) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसी अपेक्षाओं की पूर्ति रिजर्व बैंक के प्रत्येक अंश (शेयर) के लिए एक सौ रुपए अभिदत्त किए जाने पर करेगा ।
(2) इस पैरा के अधीन रिजर्व बैंक को सममूल्य पर दिए गए किसी अंश (शेयर) पर प्रति वर्ष चार प्रतिशत से अधिक की दर का लाभांश नहीं होगा ।
द्वितीय अनुसूची
(धारा 44 देखिए)
विश्वसनीयता और गोपनीयता की घोषणा
मैं.................... एतद्द्वारा घोषणा करता हूं कि मैं स्टेट बैंक के यथास्थिति निदेशक (स्थानीय), बोर्ड के सदस्य, स्थानीय समिति के सदस्य, संपरीक्षक, सलाहकार, अधिकारी या अन्य कर्मचारी के रूप में मुझसे अपेक्षित और उक्त स्टेट बैंक में मेरे द्वारा धारण किए पद या ओहदे से उचित रूप से संबद्ध कर्तव्यों का निष्ठापूर्वक, सत्यनिष्ठा के साथ और अपनी पूर्ण कुशलता और योग्यता से निष्पादन और पालन करूंगा ।
मैं यह और घोषणा करता हूं कि मैं स्टेट बैंक के कार्यों या स्टेट बैंक से संव्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कार्यों से संबद्ध जानकारी उसके लिए किसी व्यक्ति को, जो उसका विधिक रूप से हकदार नहीं है संसूचित नहीं करूंगा और न संसूचित होने दूंगा और न किसी ऐसे व्यक्ति को स्टेट बैंक का या उसके कब्जे में की तथा स्टेट बैंक के कारबार या स्टेट बैंक से व्यवहार करने वाले किसी व्यक्ति के कारबार से संबद्ध किन्हीं बहियों या दस्तावेजों का निरीक्षण करने दूंगा और न उसकी उन तक पहुंच होने दूंगा ।
तृतीय अनुसूची- [भारतीय रिजर्व बैंक अधिनियम, 1934 के संशोधन ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
चतुर्थ अनुसूची- [बैंककारी कंपनी अधिनियम, 1949 के संशोधन ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
पंचम अनुसूची- [इंपीरियल बैंक ऑफ इंडिया ऐक्ट, 1920 के संशोधन ।]-निरसन और संशोधन अधिनियम, 1960 (1960 का 58) की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा निरसित ।
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