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विस्थापित व्यक्ति (ऋण समायोजन) अधिनियम, 1951 ( Displaced Persons (Debts Adjustment) Act, 1951 )


 

विस्थापित व्यक्ति (ऋण समायोजन) अधिनियम, 1951

(1951 का अधिनियम संख्यांक 70)

[7 नवम्बर, 1951]

विस्थापित व्यक्तियों द्वारा शोध्य ऋणों के समायोजन और परिनिर्धारण के लिए,

उनको देय कतिपय ऋणों की वसूली के लिए, और उससे

संबंधित या उससे आनुषंगिक विषयों के लिए

कतिपय उपबंध करने के लिए

अधिनियम

संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विस्थापित व्यक्ति (ऋण समायोजन) अधिनियम, 1951 है

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य को छोड़कर सम्पूर्ण भारत पर है

(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, और विभिन्न राज्यों या उनके विभिन्न भागों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित हो, -

(1) कम्पनी" से इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) में यथापरिभाषित कम्पनी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत वह कम्पनी भी है जो इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट उपबन्धों में से किसी के कारण उस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत की गई समझी जाएगी

(2) कम्पनी अधिनियम" से इण्डियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) अभिप्रेत है;

(3) प्रतिकर" से कोई प्रतिकर अभिप्रेत है जो चाहे नकद या वस्तु के रूप में हो और जो विस्थापित व्यक्ति के स्वामित्वाधीन पश्चिमी पाकिस्तान की किसी स्थावर सम्पत्ति के बारे में भारत सरकार और पाकिस्तान सरकार के बीच इस निमित्त परिनिर्धारित किया गया हो या भारत सरकार द्वारा विरचित किसी साधारण स्कीम के अधीन संदत्त किया गया हो;

(4) सहकारी समिति" से सहकारी समिति अधिनियम, 1912 (1912 का 2) के अधीन या सहकारी समितियों के रजिस्ट्रीकरण के लिए किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत सहकारी समिति अभिप्रेत है;

(5) सहकारी समिति अधिनियम" से सहकारी समिति अधिनियम, 1912 (1912 का 2) अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत सहकारी समितियों से संबंधित किसी राज्य में तत्समय प्रवृत्त कोई अन्य विधि भी है

(6) ऋण" से सिविल या राजस्व न्यायालय को डिक्री या आदेश के अधीन या अन्यथा कोई धन संबंधी दायित्व अभिप्रेत है, जो चाहे वर्तमान में संदेय हो या भविष्य में अथवा अभिनिश्चित हो या अभिनिश्चित किया जाना हो, जो-

() ऐसे विस्थापित व्यक्ति के संबंध में जिसने किसी ऐसे क्षेत्र से जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का भाग है, अपना निवास का स्थान छोड़ दिया है, या जिसे विस्थापित कर दिया गया है, उसके किसी ऐसे क्षेत्र में जो अब भारत का भाग है, निवास के लिए आने के पूर्व उपगत हो गया था;

() ऐसे विस्थापित व्यक्ति के संबंध में, जो अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन के पूर्व और पश्चात् किसी ऐसे क्षेत्र में जो अब भारत का भाग है निवास कर रहा है, ऐसे राज्य-क्षेत्रों में जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का भाग है स्थित किसी स्थावर सम्पत्ति की सुरक्षा पर उक्त तारीख से पूर्व उपगत हो गया था:

परन्तु यह कि जहां कोई ऐसा दायित्व जो भारत और पश्चिमी पाकिस्तान दोनों में स्थित स्थावर सम्पत्ति की प्रतिभूति पर उपगत हुआ था, उक्त सम्पत्तियों के बीच इस प्रकार प्रभाजित किया जाएगा कि दायित्व का उक्त सम्पत्तियों में से प्रत्येक के संबंध में ऋण की कुल रकम से अनुपात वही हो जो संव्यवहार की तारीख को सम्पत्तियों में से प्रत्येक के मूल्य का, प्रतिभूति के रूप में दी गई सम्पत्तियों के कुल मूल्य का है, और दायित्व इस खण्ड के प्रयोजनार्थ वही दायित्व होगा जो कि पश्चिमी पाकिस्तान में सम्पत्ति से संबंधित माना जा सकता है;

() किसी अन्य व्यक्ति से (चाहे वह विस्थापित व्यक्ति हो अथवा नहीं) जो उन राज्यक्षेत्रों में जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है, मामूली तौर से निवास कर रहा है विस्थापित व्यक्ति को देय है;

और जिनके अन्तर्गत-

किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा जो इस खंड में विनिर्दिष्ट है इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व उपगत किया गया कोई धन संबंधी दायित्व भी है, जो ऐसे किसी दायित्व पर आधारित है और एकमात्र उसके नवीकरण के रूप में है जो उपखंड () या उपखण्ड () या उपखण्ड () में विनिर्दिष्ट है:

परन्तु ऐसे उधार की दशा में, जो चाहे नकद हो या वस्तु के रूप में, मूल रूप से अग्रिम रकम को कि उस रकम को जिसके लिए दायित्व का नवीकरण किया गया है उस दायित्व का परिमाण समझा जाएगा;

किन्तु इसके अन्तर्गत पश्चिमी पाकिस्तान में स्थित किसी न्यायालय द्वारा अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन के पश्चात् पारित किसी डिक्री के अधीन देय कोई धन संबंधी दायित्व या कोई ऐसा धन संबंधी दायित्व नहीं है जिसका सबूत मौखिक करार पर ही निर्भर हो

(7) विस्थापित बैंक" से वह बैंककारी कंपनी अभिप्रेत है जो अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन के पूर्व चाहे पूर्णतः या भागतः किसी ऐसे क्षेत्र में जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का भाग है, बैंककारी कारबार करती थी और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा केन्द्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अर्थ में विस्थापित बैंक घोषित की गई है

(8) विस्थापित लेनदार" से ऐसा विस्थापित व्यक्ति अभिप्रेत है जिसको किसी अन्य व्यक्ति से चाहे वह विस्थापित व्यक्ति हो अथवा नहीं, ऋण शोध्य है;

(9) विस्थापित लेनदार" से ऐसा विस्थापित व्यक्ति अभिप्रेत है जिससे ऋण शोध्य है या ऋण का दावा किया जा रहा है;

(10) विस्थापित व्यक्ति" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसने भारत और पाकिस्तान डोमिनियन के बनने के कारण या किसी ऐसे क्षेत्र में जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का भाग है, सिविल उपद्रवों के कारण या ऐसे उपद्रवों के डर से 1947 के मार्च के प्रथम दिन के पश्चात्, ऐसे क्षेत्र से अपना निवास स्थान छोड़ दिया था या वहां से विस्थापित कर दिया गया था, और जो तत्पश्चात् भारत में निवास कर रहा है और इसके अन्तर्गत ऐसा व्यक्ति भी है जो किसी ऐसे स्थान का जो अब भारत का  है निवासी है और जो उस कारण पश्चिमी पाकिस्तान में उसके स्वामित्व की किसी स्थावर सम्पत्ति का प्रबंध, पर्यवेक्षण, या नियंत्रण करने में असमर्थ है या असमर्थ कर दिया गया है किन्तु इसके अन्तर्गत बैंककारी कंपनी नहीं है;

(11) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(12) अधिकरण" से धारा 4 के अधीन विनिर्दिष्ट कोई सिविल न्यायालय अभिप्रेत है जिसे इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने का प्राधिकार है;

(13) सत्यापित दावा" से डिस्प्लेस्ड पर्सन्स (क्लेम) ऐक्ट, 1950 (1950 का 44) के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई दावा अभिप्रेत है, जिसके बारे में उसके सत्यापन और मूल्यांकन से संबंधित अंतिम आदेश उस अधिनियम के अधीन पारित कर दिया गया है;

(14) पश्चिमी पाकिस्तान" से पूर्वी बंगाल के प्रांत को अपवर्जित करते हुए पाकिस्तान का राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है

3. अधिनियम, नियम और आदेश का अध्यारोही प्रभाव-इस अधिनियम में अभिव्यक्त रूप से अन्यथा उपबंधित के सिवाय इस अधिनियम के उपबंध और तद्धीन बनाए गए नियम और आदेश, तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में या न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश में या पक्षकारों के बीच किसी संविदा में, उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे

4. अधिकरण जो इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने को सक्षम है-राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किसी सिविल न्यायालय या सिविल न्यायालयों में वर्ग को ऐसे अधिकरण या अधिकरणों के रूप में विनिर्दिष्ट कर सकेगी जिन्हें इस अधिनियम के अधीन अधिकारिता का प्रयोग करने का प्राधिकार है और उन क्षेत्रों को जिसमें तथा वह परिमाण जिस तक ऐसी अधिकारिता का प्रयोग किया जा सकेगा, परिभाषित कर सकेगी

अध्याय 2

ऋण समायोजन कार्यवाही

5. ऋणों के समायोजन के लिए विस्थापित देनदारों द्वारा आवेदन-(1) उस तारीख के पश्चात् जब यह अधिनियम किसी स्थानीय क्षेत्र में प्रवृत्त होता है एक वर्ष के भीतर किसी समय विस्थापित देनदार अपने ऋणों के समायोजन के लिए उस अधिकरण को जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह वास्तविक रूप से और स्वेच्छा से निवास करता है, या व्यापार करता है या लाभ के लिए वैयक्तिक रूप से काम करता है आवेदन कर सकेगा

(2) विस्थापित देनदार द्वारा प्रत्येक आवेदन में निम्नलिखित विशिष्टियां होंगी, अर्थात्: -

                () स्थान जहां वह निवास करता है;

() व्यापार, आजीविका, वृत्ति, या अन्य नियोजन जिसमें कि वह अब लगा हुआ है और जिसमें वह विस्थापित व्यक्ति होने के पूर्व पश्चिमी पाकिस्तान में लगा हुआ था;

() आवेदन के ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्षों के दौरान भारत में उसकी औसत वार्षिक आय;

() आय-कर और अतिकर, यदि कोई हो, जो आवेदन के ठीक पूर्ववर्ती तीन वर्षों के लिए उस पर निर्धारित किया गया है;

() ऐसी अन्य विशिष्टियां जो विहित की जाएं,

और आवेदन के साथ निम्नलिखित अनुसूचियां दी जाएंगी, अर्थात्: -

(i) एक अनुसूची जिसमें कि उसके समस्त ऋणों की पूर्ण विशिष्टियां, चाहे वह संयुक्त या वैयक्तिक रूप से ऋणबद्ध हो, उसके लेनदारों और संयुक्त देनदारों, यदि कोई हों, के नाम और पतों सहित जहां तक वे ज्ञात हों या उसके द्वारा युक्तियुक्त सावधानी और तत्परता से अभिनिश्चित किए जा सकते हों;

(ii) एक अनुसूची जिसमें उसकी जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की समस्त सम्पत्ति भी (उसको शोध्य दावों सहित) है जिसकी इस अधिनियम की धारा 31 द्वारा यथासंशोधित सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन कुर्की नहीं की जा सकती हो, उसके मूल्यों और उन स्थानों का भी विनिर्देश होगा जहां वह प्राप्त की जा सकती है;

(iii) एक अनुसूची जिसमें उसकी जंगम और स्थावर दोनों प्रकार की सम्पत्ति (उसको शोध्य दावों सहित) है जो इस खंड के मद (ii) के अधीन अनुसूची में सम्मिमलित नहीं है; और

(iv) एक अनुसूची जिसमें उसकी समस्त सम्पत्तियों की जिनके बारे में डिस्प्लेस्ड पर्सन्स (क्लेम) ऐक्ट, 1950 (1950 का 44) के अधीन रजिस्ट्रीकर्ता अधिकारी को दावा प्रस्तुत कर दिया गया है और जहां उस अधिनियम के अधीन दावे के सत्यापन और मूल्यांकन के संबंध में कोई आदेश पारित कर दिया गया है उस आदेश की प्रमाणित प्रतिलिपि सहित

(3) समस्त व्यक्ति जिनके नाम अनुसूची में विस्थापित देनदार के विरुद्ध दावेदार के रूप में दिखाए गए हैं और ऐसे समस्त व्यक्ति जिनके नाम संयुक्त देनदारों के रूप में दिखाए गए हैं, आवेदन में प्रत्यर्थी समझे जाएंगे, और आवेदन के साथ या अधिकरण की अनुज्ञा से कार्यवाही के किसी पश्चात्वर्ती प्रक्रम पर आवेदन की उतनी प्रतियां और प्रत्यर्थियों को सम्यक् रूप से सम्बोधित विहित प्ररूप में इतने लिफाफे और नोटिस जितने कि प्रत्यर्थी हैं फाइल किए जाएंगे

6. कतिपय दशाओं में आवेदन का अस्वीकृत किया जाना-जहां धारा 5 के अधीन किया गया कोई आवेदन उस धारा की अपेक्षाओं में से किसी का अनुपालन नहीं करता, वहां अधिकरण या तो उसे अस्वीकार कर सकेगा या आवेदक को उतना अतिरिक्त समय प्रदान कर सकेगा जितना वह ऐसी अपेक्षाओं का अनुपालन करने के लिए ठीक समझता है

7. नोटिस का जारी किया जाना-यदि आवेदन धारा 6 के अधीन अस्वीकार नहीं किया जाता है, तो अधिकरण, धारा 5 में निर्दिष्ट नोटिसों में आवेदन की सुनवाई के लिए तारीख प्रविष्ट कराने के पश्चात् प्रत्यर्थियों पर उनकी तामील करवाएगा

8. प्रत्यर्थियों द्वारा आक्षेप-धारा 7 के अधीन नोटिस के प्रत्युत्तर में प्रत्यर्थी आवेदन के विरुद्ध लिखित विवरण जिसमें आवेदन के प्रति उसके आक्षेप अन्तर्विष्ट होंगे फाइल करके हेतुक दर्शित कर सकेगा:

परन्तु जहां वह स्वयं या प्राधिकृत अभिकर्ता के माध्यम से उपस्थित नहीं होता है, वहां अधिकरण को लिखित विवरण रसीदी रजिस्ट्रीकृत डाक द्वारा सिविल न्यायिक अधिकारी या मजिस्ट्रेट या किसी अन्य विहित अधिकारी की उपस्थिति में हस्ताक्षर करके और ऐसे अधिकारी या मजिस्ट्रेट द्वारा समयक् रूप से अनुप्रमाणित करके भेजा जा सकेगा

9. प्रत्यर्थियों पर नोटिस की तामील के पश्चात् कार्यवाही-(1) कोई आवेदक विस्थापित व्यक्ति है या नहीं, या किसी लेनदार को शोध्य ऋण की रकम या उसके अस्तित्व या किसी विस्थापित देनदार की आस्तियों के बारे में यदि कोई विवाद है, तो अधिकरण ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात् जो समस्त संबंधित पक्षकारों द्वारा दिए जाएं, मामले का विनिश्चय करेगा और उसके संबंध में ऐसी डिक्री पारित करेगा जो वह ठीक समझे

(2) यदि ऐसा कोई विवाद नहीं है, या प्रत्यर्थी उपस्थित नहीं होते, या आवेदन के मन्जूर किए जाने पर कोई आक्षेप नहीं करते, तो अधिकरण, उसके सामने दिए गए साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् उसके संबंध में ऐसी डिक्री पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे

10. विस्थापित देनदारों के विरुद्ध लेनदारों के दावे-विस्थापित देनदार के विरुद्ध दावा करने वाला कोई विस्थापित व्यक्ति ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, उसके अवधारण के लिए उस अधिकरण को जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर विस्थापित देनदार वास्तविक रूप से और स्वेच्छा से निवास करता है या व्यापार करता है या वैयक्तिक रूप से लाभ के लिए काम करता है, उसकी पूर्ण विशिष्टियां देते हुए लेनदार को शोध्य ऋणों के विवरण के साथ आवेदन दे सकेगा

11. लेनदारों के आवेदन पर प्रक्रिया-(1) जहां धारा 10 के अधीन आवेदन किया गया है, वहां अधिकरण विस्थापित देनदार पर आवेदन के विरुद्ध हेतुक, यदि कोई हो, दर्शित करने अथवा धारा 5 के अधीन उससे अपनी ओर से आवेदन करने की अपेक्षा करते हुए, नोटिस तामील करवाएगा

(2) यदि उपधारा (1) के अधीन नोटिस के उत्तर में, विस्थापित देनदार धारा 5 के उपबंधों के अनुसार आवेदन करता है, तो अधिकरण मामले में ऐसी अग्रिम कार्यवाही करेगा मानो वह विस्थापित देनदार द्वारा धारा 5 के अधीन आवेदन पर प्रारम्भ की गई थी और इस अधिनियम के अन्य समस्त उपबन्ध तद्नुसार लागू होंगे; किन्तु, यदि विस्थापित देनदार कोई ऐसा आवेदन देना नहीं चाहता तो अधिकरण, ऐसे साक्ष्य पर, यदि कोई हो, जो उसके सामने पेश किया जाए, विचार करने के पश्चात् दावे का अवधारण करेगा और उसके संबंध में ऐसी डिक्री पारित करेगा जो वह ठीक समझे   

(3) विस्थापित देनदार द्वारा आवेदन के बारे में धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट परिसीमा काल उपधारा (2) के अधीन किए गए आवेदन को लागू नहीं होगा

12. आस्तियों की अनुसूची पर लेनदारों द्वारा आक्षेप-(1) विस्थापित देनदार का कोई लेनदार अधिकरण को, यह कथन करते हुए आवेदन कर सकेगा कि विस्थापित देनदार ने जिसने धारा 5 या धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन आवेदन किया है, अपनी आस्तियों का कोई भाग छिपाया है, और अधिकरण, विस्थापित देनदार को उसका सम्यक् नोटिस देने के पश्चात् मामले का अवधारण करेगा

(2) यदि अधिकरण इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि विस्थापित देनदार ने जानबूझकर और कपटपूर्वक अपने आवेदन में ऐसी आस्तियों को सम्मिलित नहीं किया है, तो अधिकरण ऐसे आवेदन को खारिज कर सकेगा या विस्थापित देनदार को इस अधिनियम के अधीन अनुतोषों में से कोई जिसके लिए वह अन्यथा हकदार होता, देना नामन्जूर कर सकेगा या उसके संबंध में ऐसा अन्य आदेश पारित कर सकेगा जो वह ठीक समझे

13. विस्थापित लेनदारों द्वारा उन व्यक्तियों के विरुद्ध दावे जो विस्थापित देनदार नहीं हैं-उस तारीख के पश्चात् जब यह अधिनियम किसी स्थानीय क्षेत्र में प्रवृत्त होता है एक वर्ष के भीतर किसी समय किसी अन्य व्यक्ति से जो विस्थापित व्यक्ति नहीं है ऋण का दावा करने वाला कोई विस्थापित लेनदार, ऐसे प्ररूप में जो विहित किया जाए उस अधिकरण को जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर वह या प्रत्यर्थी अथवा यदि एक से अधिक प्रत्यर्थी हैं तो ऐसे प्रत्यर्थियों में से कोई वास्तविक रूप से और स्वेच्छा से निवास करता है या व्यापार करता है या लाभ के लिए वैयक्तिक रूप से काम करता है, उसे शोध्य ऋण के विवरण सहित उसकी पूर्ण विशिष्टियां देते हुए आवेदन कर सकेगा

14. विस्थापित लेनदार की अर्जी पर प्रक्रिया-(1) जहां धारा 13 के अधीन कोई आवेदन अधिकरण को किया गया है, वहां अधिकरण आवेदन के विरुद्ध कारण, यदि कोई हों, बताने की अपेक्षा करते हुए उसका नोटिस देनदार को दिलवाएगा

(2) आवेदक विस्थापित लेनदार है या नहीं या ऋण के अस्तित्व के बारे में या उसकी रकम के बारे में यदि कोई विवाद है तो अधिकरण मामले को ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात् जो उसके सामने पेश किया जाए विनिश्चित करेगा और उसके संबंध में ऐसी डिक्री पारित करेगा जो वह ठीक समझे

(3) यदि ऐसा कोई विवाद नहीं है अथवा यदि देनदार उपस्थित नहीं होता है या उसे बताने का कोई कारण नहीं है तो अधिकरण उसके सामने पेश किए गए साक्ष्य पर विचार करने के पश्चात् उसके संबंध में ऐसी डिक्री पारित करेगा जो वह ठीक समझे

15. विस्थापित देनदार के आवेदन का परिणाम-जहां विस्थापित देनदार ने धारा 5 के अधीन या धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन अधिकरण को आवेदन किया है वहां निम्नलिखित परिणामों का होना सुनिश्चित होगा, अर्थात्: -

() किसी ऐसे ऋण के बारे में, जिसके अध्यधीन विस्थापित देनदार है, किसी सिविल न्यायालय में उसके आवेदन की तारीख को लम्बित समस्त कार्यवाहियां (विस्थापित देनदार के विरुद्ध पारित की गई डिक्री या आदेशों के विरुद्ध अपील या पुनर्विलोकन या पुनरीक्षण के रूप में कार्यवाहियों को छोड़कर) रोक दी जाएंगी और यथा पूर्वोक्त अपील, पुनर्विलोकन या पुनरीक्षण को छोड़कर ऐसी समस्त कार्यवाहियों के अभिलेख अधिकरण को अन्तरित और समेकित किए जाएंगे;

() समस्त कुर्कियां, व्यादेश, रिसीवर नियुक्ति करने वाले आदेश या किसी ऐसे न्यायालय द्वारा जारी की गई और किसी ऐसे ऋण के बारे में उक्त आवेदन की तारीख को प्रवृत्त अन्य आदेशिकाएं प्रभावित रहेंगी और कोई आदेशिका, इसमें इसके पश्चात् अभिव्यक्त रूप से उपबंधित के सिवाय जारी नहीं की जाएगी:

परन्तु जहां रिसीवर नियुक्त करने वाला आदेश इस धारा के अधीन प्रभावी नहीं रहता है वहां रिसीवर, उस तारीख से जिससे उसकी नियुक्ति प्रभावी नहीं रहती चौदह दिन के भीतर या ऐसे अतिरिक्त समय के भीतर जो अधिकरण किसी दशा में अनुज्ञात करे, उस न्यायालय के बदले जिसने उसकी नियुक्ति की है अधिकरण को अपने बकाया लेखे प्रस्तुत करेगा और अधिकरण को ऐसे लेखों के संबंध में, रिसीवर के बारे में वही शक्तियां होंगी जो उस न्यायालय को थीं या हो सकती थीं जिसने उसको नियुक्त किया था;

() कोई नया वाद या अन्य कार्यवाही खण्ड () में निर्दिष्ट अपील पुनर्विलोकन या पुनरीक्षण से भिन्न विस्थापित देनदार के विरुद्ध उसके आवेदन से सुसंगत अनुसूची में उसके द्वारा उल्लिखित किसी ऋण के बारे में संस्थित नहीं की जाएगी;

() विस्थापित देनदार की कोई स्थावर सम्पत्ति जो कुर्की के लिए दायी है, अधिकरण के प्राधिकार के अधीन और ऐसी शर्तों पर ही जो वह ठीक समझे अन्तरित की जाएगी जब तक कि विस्थापित देनदार का आवेदन अंतिम रूप से निपटा दिया गया हो या उसके विरुद्ध पारित की गई किसी डिक्री की इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार तुष्टि कर दी गई हो

16. स्थावर सम्पत्ति पर प्रतिभूत ऋण-(1) जहां विस्थापित व्यक्ति द्वारा उपगत ऋण पश्चिमी पाकिस्तान में उसके स्वामित्व की स्थावर सम्पत्ति पर बंधक, प्रभार या धारणाधिकार के द्वारा प्रतिभूत किया गया है, वहां अधिकरण, इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही के प्रयोजनों के लिए, लेनदार से यह अपेक्षा कर सकेगा कि वह प्रतिभूति को रोके रहने या अप्रतिभूत लेनदार समझे जाने का निर्वाचन करे

(2) यदि लेनदार प्रतिभूति को रोके रहने का निर्वाचन करता है तो वह धारा 10 में यथा उपबंधित इस निमित्त अधिकारिता रखने वाले अधिकरण को, अपने ऋण के अधीन शोध्य रकम की घोषणा करने के लिए आवेदन कर सकेगा

(3) जहां किसी भी दशा में लेनदार अपनी प्रतिभूति रोके रहने का निर्वाचन करता है, वहां यदि विस्थापित देनदार किसी ऐसी सम्पत्ति के बारे में जो उपधारा (1) में निर्दिष्ट है कोई प्रतिकर प्राप्त करता है तो लेनदार-

                () जहां प्रतिकर नकद संदत्त किया गया है, उस पर प्रथम प्रभार का हकदार होगा:

परन्तु ऋण की रकम जिसके बारे में वह प्रथम प्रभार के लिए हकदार होगा वह रकम होगी जिसका कुल ऋण से वैसा ही अनुपात है जैसा सम्पत्ति के बारे में संदत्त किए गए प्रतिकर का इसके बारे में सत्यापित दावे के मूल्य से है, और इस परिमाण तक ऋण कम किया गया समझा जाएगा;

() जहां प्रतिकर संपत्ति के विनिमय के रूप में है वहां विनिमय के रूप में इस प्रकार प्राप्त की गई भारत में स्थित सम्पत्ति पर प्रथम प्रभार का हकदार होगा:

परन्तु ऋण की रकम जिसके बारे में वह प्रथम प्रभार के लिए हकदार होगा वह रकम होगी जिसका कुल ऋण से वैसा ही अनुपात है जैसा विनिमय के रूप में प्राप्त सम्पत्ति के मूल्य का उसके बारे में सत्यापित दावे के मूल्य से है, और उस परिमाण तक ऋण कम किया गया समझा जाएगा

(4) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, जहां ऋण पश्चिमी पाकिस्तान में विस्थापित व्यक्ति के स्वामित्व की कृषि भूमि के बंधक द्वारा प्रतिभूत है और बंधक कब्जे सहित था वहां बंधकदार, यदि उसे उस भूमि के बदले में जो पश्चिमी पाकिस्तान में उसके स्वामित्व में थी भारत में भूमि आबंटित की गई है तो आबंटित की गई भूमि के कब्जे में रखने का तब तक हकदार होगा जब तक कि ऋण की भूमि के भोग से तुष्टि नहीं हो जाती है या वह देनदार द्वारा मोचित नहीं कर दिया जाता:

परन्तु किसी भी दशा में ऋण की रकम केवल वही रकम होगी जिसका कुल ऋण से वैसा ही अनुपात है जैसा भारत में लेनदार को आबंटित भूमि के मूल्य का उसके द्वारा पश्चिमी पाकिस्तान में छोड़ी गई भूमि के मूल्य से है और उस परिमाण तक ऋण कम किया गया समझा जाएगा

(5) जहां लेनदार ऋण के संबंध में अप्रतिभूत लेनदार समझे जाने का निर्वाचन करता है, वहां इस अधिनियम के उपबंध तद्नुसार लागू होंगे

17. जंगम सम्पत्ति पर प्रतिभूत ऋण-(1) जहां विस्थापित व्यक्ति द्वारा उपगत और उसकी जंगम सम्पत्ति के गिरवी द्वारा प्रतिभूत ऋण के बारे में देनदार के विस्थापित व्यक्ति होने के पूर्व किसी समय ऐसी सम्पत्ति लेनदार के कब्जे में रखी गई थी, वहां निम्नलिखित नियम लेनदार और देनदार के अधिकारों और दायित्वों का विनियमन करेंगे, अर्थात्: -

() लेनदार, यदि अब भी उसके कब्जे में गिरवी रखी गई सम्पत्ति है तो वह उसे देय राशि को ऐसी सम्पत्ति के विक्रय द्वारा, देनदार को, विक्रय की युक्ति-युक्त सूचना देने के पश्चात् वसूल कर सकेगा;

() लेनदार किसी भी दशा में जहां गिरवी रखी गई सम्पत्ति अब उसके कब्जे में नहीं रही है या देनदार द्वारा मोचन के लिए उपलब्ध नहीं है तो देनदार से ऋण या उसका कोई भाग जिसके लिए गिरवी रखी गई सम्पत्ति प्रतिभूति थी वसूल करने का हकदार नहीं होगा;

() देनदार किसी गिरवी रखी गई सम्पत्ति के, लेनदार द्वारा विक्रय की दशा में, चाहे खण्ड () के अधीन हो या अन्यथा, जहां ऐसे विक्रय के आगम देय ऋण की रकम से कम है अतिशेष संदत्त करने का दायी नहीं होगा;

() लेनदार किसी भी दशा में जहां गिरवी रखी गई सम्पत्ति के विक्रय के आगम देय ऋण की रकम से अधिक है वहां देनदार को अधिशेष संदत्त करेगा

                स्पष्टीकरण 1-इस धारा के प्रयोजनों के लिए लेनदार के बारे में किसी भी दशा में यह समझा जाएगा कि गिरवी रखी सम्पत्ति उसके कब्जे में है जबकि गिरवी रखी गई सम्पत्ति यद्यपि उसको दी नहीं गई है अपितु उसके द्वारा प्राधिकृत व्यक्ति को दी गई थी या लेनदार की ओर से देनदार द्वारा धारित की जा रही थी और उसका स्वामित्व या कब्जा लेनदार की अभिव्यक्त सम्मति या अनुज्ञा के बिना तृतीय पक्षकार को अन्तरित नहीं किया जा सकता था

स्पष्टीकरण 2-जहां कोई मोटरयान या अन्य जंगम सम्पति ऐसे धन से क्रय की गई है, जिसका सम्पूर्ण या कोई भाग लेनदार से उधार लिया गया है, जिसके पास प्रतिभूति के रूप में उसका स्वामित्व है, किन्तु वह अपनी अनुज्ञा से देनदार को उसका उपयोग करने देता है वहां सम्पत्ति इस धारा के प्रयोजनों के लिए लेनदार के कब्जे में देनदार की गिरवी रखी गई सम्पत्ति समझी जाएगी

(2) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी लेनदार गिरवी रखी गई सम्पत्ति को हानि या विनाश से उद्भूत होने वाले किसी दावे के बारे में बीमा कम्पनी से इस अधिनियम के अधीन या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन शोध्य किसी राशि को प्राप्त करने के लिए और उसके बारे में विधिमान्य उन्मोचन करने के लिए हकदार होगा, किन्तु लेनदार उस दशा में जहां बीमा कम्पनी से प्राप्त राशि उसको शोध्य ऋण की रकम से अधिक है, वहां वह देनदार को अधिशेष संदत्त करेगा

18. बीमा कम्पनी के विरुद्ध दावे-(1) जहां विस्थापित व्यक्ति को पश्चिमी पाकिस्तान में की कोई सम्पत्ति अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन के पूर्व किसी बीमा कम्पनी के साथ आग या चोरी या बलवे या सिविल उपद्रव से होने वाली जोखिम के विरुद्ध बीमा की गई थी और उस समय जब बीमा संविदा प्रवृत्त थी ऐसी किसी जोखिम से ऐसी सम्पत्ति को हानि हो गई हो तो ऐसी कम्पनी उसके सम्बन्ध में किसी दावे के अधीन देय राशि को संदत्त करने से इंकार करने की हकदार इस कारण होगी कि-

                () करार पाए गए समय के भीतर पुलिस को कोई रिपोर्ट नहीं की गई थी, या

                () करार पाए गए समय के भीतर कम्पनी पर कोई दावा नहीं किया गया था, या

() पश्चिमी पाकिस्तान में हुए उपद्रव, बलवे या सिविल उपद्रव के स्वरूप में नहीं थे जब पालिसी, बलवे और सिविल उपद्रव से प्रोद्भूत किसी जोखिम के लिए है, या

() विस्थापित व्यक्ति ने संविदा की कोई अन्य ऐसी शर्त पूरी नहीं की है जो केन्द्रीय सरकार की राय में तकनीकी प्रकृति की है और जिसको केन्द्रीय सरकार ने राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस धारा के प्रयोजन के लिए संविदा की शर्त के रूप में विनिर्दिष्ट कर दिया है,

और कोई विपरीत संविदा उस सीमा तक जिस तक वह इस उपधारा के उपबन्धों के उल्लंघन में हैं प्रभावी नहीं समझी जाएगी

                (2) जहां उपधारा (1) में निर्दिष्ट परिस्थितियों में किसी संपत्ति के बारे में हानि उपगत हो गई है, वहां अधिकरण प्रत्येक कार्यवाही में जहां ऐसा करना आवश्यक हो, हानि की रकम, वह रकम जिसके लिए ऐसी हानि की तारीख को सम्पत्ति का बीमा किया गया था और बीमा कम्पनी द्वारा संदत्त रकम, यदि कोई हो, क्रमशः अवधारित करेगा और उसकी रिपोर्ट, ऐसे बोर्ड या अन्य प्राधिकारी को करेगा जो विहित किया जाए, और विहित बोर्ड या अन्य प्राधिकारी ऐसे मामलों को जो विहित किए जाए और उससे सुसंगत हों, ध्यान में रखते हुए और इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन रहते हुए, अधिकरण को उस रकम के लिए प्रस्थापना करेगा जिसके लिए बीमा कम्पनी के विरुद्ध दावा डिक्री की जाएगी और अधिकरण तद्नुसार डिक्री पारित करेगा

(3) उपधारा (2) के अधीन पारित किसी डिक्री के अधीन बीमा कम्पनी से वसूल की गई रकम, प्रथमतः विस्थापित व्यक्ति से शोध्य ऋण की तुष्टि के लिए उपयोजित की जाएगी और अतिशेष, यदि कोई हो, विस्थापित व्यक्ति को लौटाया जाएगा

(4) इस धारा के अधीन आवेदन या तो उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में बीमा कम्पनी के विरुद्ध दावा करने वाले विस्थापित व्यक्ति द्वारा या किसी समनुदेशिती या ऐसे किसी विस्थापित व्यक्ति के दावे में हित रखने वाले किसी अन्य व्यक्ति द्वारा उस अधिकरण को किया जाएगा जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर विस्थापित व्यक्ति वास्तविक रूप से और स्वेच्छा से निवास करता है या व्यापार करता है या लाभ के लिए वैयक्तिक रूप से काम करता है, या इस धारा के अधीन आवेदन करने वाले विस्थापित बैंक की दशा में, उपधारा (2) के उपबन्धों के अनुसार दावे के सम्बन्ध में शोध्य रकम के अवधारण के लिए उस अधिकरण को किया जा सकेगा जिसकी सीमाओं के भीतर बैंक कारबार करता है

(5) उपधारा (4) के अधीन प्रत्येक कार्यवाही में बीमा कम्पनी और दावे में हितबद्ध सभी व्यक्ति पक्षकार होंगे :

परन्तु अधिकरण, कार्यवाही के किसी प्रक्रम पर यह निदेश दे सकेगा कि किसी ऐसे व्यक्ति का नाम कार्यवाही में जोड़ा जाए जिसकी उपस्थिति अधिकरण के समक्ष सभी अन्तर्वलित प्रश्नों को प्रभावी रूप से तथा पूर्णतया न्यायनिर्णीत करने तथा तय करने के लिए अधिकरण को समर्थ बनाने के लिए आवश्यक हो

(6) इस धारा के अधीन कोई आवेदन किसी भी दशा में ग्रहण नहीं किया जाएगा जहां हानि की तारीख के पश्चात् एक वर्ष के भीतर बीमा कम्पनी को कोई दावा नहीं किया गया है

स्पष्टीकरण-कोई दावा इस उपधारा के अर्थों में किया गया समझा जाएगा यदि उसकी सूचना, इस बात के होते हुए भी कि सूचना में दावे की रकम विनिर्दिष्ट नहीं है, या बीमा की वह संविदा अपेक्षित प्ररूप में, यदि कोई हो, या किसी अन्य विनिर्दिष्ट प्ररूप में, नहीं है हानि की तारीख के पश्चात् एक वर्ष के भीतर बीमा कम्पनी को दे दी गई है

19. कम्पनियों में अंशों पर मांग-(1) जहां कम्पनी या सहकारी समिति ने विस्थापित व्यक्ति या विस्थापित बैंक पर अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन को, यथास्थिति, किसी कंपनी या सहकारी समिति में धृत किसी अंश पर असंदत्त रहने वाली किसी रकम के बारे में मांग की है और ऐसी मांग के बारे में देय किसी धन को संदत्त करने में अंशधारी असफल रहा है, तो कंपनी अधिनियम या ज्ञापन या संगम अनुच्छेद या सहकारी समिति अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी किसी ऐसे देय धन के बारे में कोई ब्याज संदेय नहीं होगा और, यथास्थिति, कंपनी या सहकारी समिति, अंश या उसके किसी भाग का समपहरण करने के लिए हकदार नहीं होगी और इस उपधारा में विनिर्दिष्ट परिस्थितियों में किसी अंश के बारे में इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किया गया कोई समपहरण प्रभावी नहीं समझा जाएगा और केवल ऐसे समपहरण के कारण ही किसी व्यक्ति के लिए यह नहीं समझा जाएगा कि वह कंपनी या सहकारी समिति का सदस्य नहीं रह गया है

(2) कंपनी अधिनियम या ज्ञापन या संगम अनुच्छेद या सहकारी समिति अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी विस्थापित व्यक्ति या विस्थापित बैंक के लिए विधिपूर्ण होगा कि, यथास्थिति, कंपनी या सहकारी समिति को अपने या उसके द्वारा कंपनी या समिति में धृत किसी अंशतः समादत्त अंश को पूर्ण समादत्त अंशों की ऐसी छोटी संख्या में संपरिवर्तित करने के लिए, जिनको समिति या कंपनी ने जारी कर दिया है और जिसके बारे में पहले से मांग की जा चुकी है, आवेदन करे

(3) जहां इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व समपहृत कोई अंश कंपनी द्वारा उसके संगम अनुच्छेद के अनुसार व्ययनित कर दिया गया है और कंपनी के लिए विस्थापित व्यक्ति को वह अनुतोष देना बिना पूंजी बढ़ाए हुए संभव नहीं है जिसके लिए वह इस धारा के अधीन हकदार है, तो कंपनी की पूंजी उस परिमाण तक बढ़ी हुई समझी जाएगी जिस तक कि वह अनुतोष देने के लिए आवश्यक हो

(4) यदि कंपनी या सहकारी समिति किसी ऐसे निवेदन का जो उपधारा (2) के अधीन आवेदन में अंतर्विष्ट है अनुपालन करने से इन्कार करती है, तो अधिकरण इस निमित्त उसे आवेदन किए जाने पर और यह समाधान हो जाने पर कि ऐसे इन्कार के लिए कोई कारण नहीं है, कंपनी या सहकारी समिति को तद्नुसार निदेश दे सकेगा, और कंपनी या समिति उसका अनुपालन करने के लिए बाध्य होंगी और प्रत्येक ऐसा निदेश उसकी तारीख से प्रभावी होगा

(5) इस धारा में अन्यथा उपबंधित के सिवाय इसमें अंतर्विष्ट कोई भी बात कंपनी अधिनियम में या ज्ञापन में या संगम अनुच्छेद के उपबंधों के अनुसरण में, कंपनी या उसके निदेशकों के बोर्ड द्वारा की गई किसी कार्यवाही की विधिमान्यता पर प्रभाव नहीं डालेगी

(6) इस धारा के उपबंध अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन से दस वर्ष की कालावधि के लिए प्रभावी रहेंगे और तत्पश्चात् उन बातों के सिवाय जो की गई थीं या जिनका लोप किया गया है प्रभावी नहीं रहेंगे

20. जब कंपनी या सहकारी समिति समापन में हो तो विस्थापित व्यक्ति या बैंक से मांग का नहीं किया जाना-(1) जहां कंपनी या सहकारी समिति का समापन हो रहा है, तो कोई विस्थापित व्यक्ति या विस्थापित बैंक कंपनी अधिनियम या ज्ञापन या संगम अनुच्छेद या सहकारी समिति अधिनियम में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी, अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन कंपनी या समिति में उसके द्वारा धृत किसी अंश के बारे में, यथास्थिति, कंपनी या सहकारी समिति की आस्तियों के अभिदाय के लिए अपेक्षित नहीं किया जाएगा

(2) इस धारा के उपबंध अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन से दस वर्ष की कालावधि के लिए प्रभावी होंगे और उस तारीख के पूर्व की गई किसी मांग के बारे में भी जिसकी तुष्टि नहीं की गई है लागू होंगे, और उन बातों के सिवाय जो की गई थी या जिनका लोप किया गया था उक्त कालावधि की समाप्ति के पश्चात् प्रभावी रहेंगे

21. कतिपय डिक्री और समझौतों का पुनरीक्षण करने की शक्ति-(1) जहां, इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व, किसी ऋण के बारे में विस्थापित देनदार के विरुद्ध सिविल न्यायालय द्वारा डिक्री पारित कर दी गई है या उसके द्वारा कोई समझौता किया गया है, वहां अधिकरण, उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अनुरूप बनाने के लिए, ऐसे देनदार के आवेदन पर उसका पुनरीक्षण करेगा

(2) ऐसी डिक्री या समझौते के अधीन शोध्य रकम के अवधारण के लिए, अधिकरण, यथास्थिति, न्यायालय के जिसने डिक्री पारित की थी निष्कर्ष या समझौते में अन्तर्विष्ट तथ्यों को उस विस्तार तक आबद्धकर स्वीकार करेगा जिस तक के निष्कर्ष या तथ्य इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत नहीं हैं:

परन्तु अधिकरण किसी ऐसी डिक्री के अधीन कोई दावा तब तक अवधारित नहीं करेगा जब तक कि इसके विरुद्ध की गई कोई अपील या पुनरीक्षण अंतिम रूप से विनिश्चित नहीं हो जाता है या उससे कोई अपील करने के लिए अनुज्ञात कालावधि समाप्त नहीं हो जाती और ऐसे समस्त मामलों में अधिकरण का निष्कर्ष अंतिम डिक्री पर आधारित होगा

(3) इस धारा में किसी बात के होते हुए भी, कोई अधिकरण किसी ऋण के बारे में बीमा कंपनी और विस्थापित व्यक्ति के बीच या बीमा कंपनी और विस्थापित बैंक के बीच जिसका बीमा कंपनी के विरुद्ध विस्थापित व्यक्ति के दावे में हित है और उस हित के आधार पर ऐसा समझौता किया गया है, इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व किए गए समझौते को पुनरीक्षित नहीं करेगा:

परन्तु यह तब जब कि ऐसे समझौते के अनुसरण में पूर्ण संदाय कर दिया गया हो

22. संयुक्त ऋणों का प्रभाजन-जहां कोई ऋण विस्थापित व्यक्ति तथा अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से शोध्य है; वहां अधिकरण इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, उनके बीच में दायित्व का प्रभाजन निम्नलिखित नियमों के अनुसार करेगा, अर्थात्: -

                () यदि प्रत्येक देनदार का दायित्व परिनिश्चित है तो प्रत्येक के परिनिश्चित अंश के अनुसार;

() यदि ऋण संयुक्त देनदारों के किसी व्यापार या कारबार के लिए लिया गया था, तो व्यापार के कारबार में संयुक्त देनदारों में से प्रत्येक के द्वारा धारित अंशों के अनुसार;

() यदि ऋण किन्हीं परिनिश्चित अंशों में, या किसी व्यापार या कारबार के लिए जिसमें भागीदारों का परिनिश्चित अंश हो; नहीं लिया गया था, तो ऋण उतने भागों में प्रभाजित किया जाएगा जितने संयुक्त देनदार हैं और प्रत्येक संयुक्त देनदार उसको प्रभाजित भाग के लिए ही उत्तरदायी होगा;

() यदि एक संयुक्त देनदार विस्थापित व्यक्ति है और दूसरे नहीं हैं, तो अविस्थापित व्यक्ति को प्रभाजित राशि, इस अधिनियम के अर्थों में ऋण नहीं समझी जाएगी और ऐसे ऋण के बारे में लेनदार सिविल न्यायालय में, या अन्यथा उसके लिए उपलब्ध कोई उपचार ढूंढ सकेगा;

() यदि ऋण संयुक्त हिन्दू कुटुम्ब द्वारा लिया गया था तो संयुक्त हिन्दू कुटुम्ब के सदस्य इस धारा के अर्थों में संयुक्त देनदार समझे जाएंगे और ऋण उसके सदस्यों के बीच उसी अनुपात में प्रभाजित किया जाएगा जिसमें विभाजन पर उन्हें अंश आबंटित किए जाएंगे:

परन्तु यह कि ऐसे संयुक्त कुटुम्ब के किसी सदस्य का अंश, जिसका उसकी उपरली पुरुष परम्परा में से कोई पुरुष पारम्परिक वंशज जीवित है और ऐसे सदस्य के साथ संयुक्त है, उपरली पुरुष परम्परा में उसके सबसे बड़े उत्तरजीवी वंशज के अंश में सम्मिलित समझा जाएगा और ऐसा सदस्य इस खंड के प्रयोजनार्थ संयुक्त देनदार नहीं माना जाएगा;

() यदि दायित्व जंगम तथा स्थावर संपत्तियों से बंधक द्वारा प्रतिभूत है, तो ऋण दो संपत्तियों के बीच उस अनुपात से प्रभाजित किया जाएगा जो प्रत्येक संपत्ति का संपत्तियों के कुल मूल्यों से है

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजनार्थ जंगम संपत्ति का मूल्य उसका वह मूल्य समझा जाएगा जो उस तारीख के ठीक पूर्व था जिसमें देनदार विस्थापित व्यक्ति हो गया था, और स्थावर संपत्ति का मूल्य उसके बारे में सत्यापित दावे का मूल्य समझा जाएगा

() जहां संयुक्त देनदारों के बीच प्रधान और प्रतिभू का संबंध है, वहां इस अधिनियम में अंतर्विष्ट कोई भी बात प्रतिभू के विरुद्ध दावे को संस्थित करने से निवारित नहीं करेगी, किन्तु डिक्री हुई रकम से या उस रकम से जो इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार प्रधान देनदार के विरुद्ध डिक्री की जा सकती हो, अधिक रकम के लिए ऐसे वाद में डिक्री पारित नहीं की जाएगी:

परन्तु वह कुल रकम जो प्रधान देनदार और प्रतिभू से वसूल की जा सकेगी, डिक्री की गई रकम या उस रकम से जो इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार प्रधान देनदार के विरुद्ध अधिकर द्वारा डिक्री की जा सकती हो, अधिक नहीं होगी

23. कतिपय मामलों में सरलीकृत प्रक्रिया-किसी व्यक्तिगत ऋण के जो पांच हजार रुपए से अधिक नहीं है, अवधारण में, -

() अधिकरण के लिए यह आवश्यक नहीं होगा कि वह साक्षियों का साक्ष्य पूरा लिखे, किन्तु अधिकरण, प्रत्येक साक्षी की जब परीक्षा होती है और जो कुछ वह अभिसाक्ष्य करता है उसके सार का, ज्ञापन बनाएगा और प्रत्येक ज्ञापन अधिकरण द्वारा लिखा और हस्ताक्षरित किया जाएगा और अभिलेख का भाग होगा;

() अधिकरण के विनिश्चय में, अवधारण के लिए बातें और उनके विनिश्चय के अतिरिक्त कुछ होना आवश्यक नहीं है

24. रजिस्ट्रीकृत दस्तावेजों के बारे में धारणा-जब तक कि प्रतिकूल साबित कर दिया जाए यह धारणा की जाएगी कि भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई दस्तावेज या उसकी प्रमाणीकृत प्रतिलिपि जो अधिकरण के समक्ष पेश की गई है साबित हो चुकी है

25. 1908 के अधिनियम संख्यांक 5 का लागू होना-इस अधिनियम में और तद्धीन बनाए गए किन्हीं नियमों में अन्यथा उपबंधित के सिवाय, इस अधिनियम के अधीन समस्त कार्यवाहियां सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 में अंतर्विष्ट उपबंधों के द्वारा विनियमित की जाएंगी

26. आवेदनों और लिखित कथनों पर हस्ताक्षर और सत्यापन-इस अधिनियम के अधीन किसी अनुतोष के लिए अधिकरण    के समक्ष पेश किया गया प्रत्येक आवेदन और उससे संलग्न अनुसूचियां, यदि कोई हों, और प्रत्येक लिखित कथन, अभिवचनों के हस्ताक्षरित किए जाने और सत्यापन के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) द्वारा विहित रीति से हस्ताक्षरित और सत्यापित किए जाएंगे

27. डिक्रियों की विषय-वस्तु-उन सब मामलों में जिनमें अधिकरण विस्थापित व्यक्ति के आवेदन पर डिक्री पारित करता है, वह लेनदारों और विस्थापित व्यक्ति की आस्तियों और दायित्वों की पूरी अनुसूची तैयार करेगा

28. डिक्रियों का निष्पादन-सिविल न्यायाल, जो इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए अधिकरण के रूप में विनिर्दिष्ट किया गया है, अधिकरण के रूप में उसके द्वारा पारित किसी डिक्री या आदेश का उसी रीति से निष्पादन करने के लिए सक्षम होगा जिस रीति में वह तब कर सकता जब वह सिविल न्यायालय के रूप में उसके द्वारा पारित डिक्री या आदेश होता

अध्याय 3

अनुतोष

29. ब्याज के प्रोद्भवन की समाप्ति-(1) अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन को और से विस्थापित व्यक्ति द्वारा शोध्य किसी ऋण के बारे में कोई ब्याज प्रोद्भूत नहीं होगा और प्रोद्भूत हुआ समझा जाएगा और कोई अधिकरण उसके द्वारा पारित किसी डिक्री या आदेश के बारे में कोई भविष्यवर्ती ब्याज अनुज्ञात करेगा:

परन्तु-

() जहां ऋण अंशों, स्टाकों, सरकारी प्रतिभूतियों या स्थानीय प्राधिकारी की प्रतिभूतियों द्वारा प्रतिभूत किया गया है, वहां अधिकरण अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन से प्रारम्भ होने वाली और इस अधिनियम के प्रारम्भ पर समाप्त होने वाली कालावधि के लिए, लेनदार को ब्याज आपस में करार की गई दर पर या उस दर पर जिस पर कि उसके बारे में कोई लाभांश या ब्याज संदत्त किया गया है या संदेय है, जो भी कम हो वही अनुज्ञात करेगा;

() किसी अन्य दशा में अधिकरण यदि वह ऐसा करना ठीक और उचित समझता है तो धारा 32 में यथा परिभाषित देनदार को संदाय की सामर्थ्य को ध्यान में रखते हुए, खंड () में उल्लिखित कालावधि के लिए साधारण ब्याज अनुज्ञात करेगा जिसकी दर चार प्रतिशत वार्षिक से अधिक नहीं होगी

(2) इस धारा में की कोई भी बात लेनदार द्वारा जिसके अन्तर्गत बीमा कम्पनी भी है विस्थापित देनदार की जीवन बीमा की पालिसी को चालू रखने के लिए पालिसी की प्रतिभूति पर उधार दिए गए किसी धन के बारे में संदेय ब्याज को लागू नहीं होगी

30. गिरफ्तारी से छूट-कोई भी विस्थापित व्यक्ति किसी ऋण की वसूली के लिए किसी डिक्री के निष्पादन में, चाहे इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् पारित हुई हो, गिरफ्तारी या कारावास के लिए उत्तरदायी नहीं होगा

31. सम्पत्ति की कुर्की के विषय में अतिरिक्त अनुतोष-सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 60, विस्थापित व्यक्ति के विरुद्ध ऋण के लिए किसी डिक्री के निष्पादन के सम्बन्ध में, (चाहे वह इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व या पश्चात् पारित की गई हो), इस प्रकार प्रभावी होगी, मानो-

(1) उपधारा (1) के परन्तुक के खंड () के स्थान पर, निम्नलिखित खंड प्रतिस्थापित किए गए हों, अर्थात्: -

() कृषक के गृह और अन्य भवन (उसकी सामग्री और स्थल और उससे ठीक अनुलग्न और उसके उपभोग के लिए आवश्यक भूमि सहित, जो डिक्रीदार द्वारा निर्णीत ऋणी के पिता, माता, पत्नी, पुत्र, पुत्री, पुत्र-वधु, भ्राता, बहन या अन्य आश्रित से अन्यथा किसी व्यक्ति को किराए पर या अन्यथा दी गई साबित नहीं किए गए हैं या जो एक वर्ष या अधिक की कालावधि के लिए खाली छोड़ दिए गए हैं;

(गग) कृषक के दुधारु पशु, चाहे दूध देते हों या ब्याने वाले हों, बछड़ा-बछड़ी, परिवहन या बोझा ढोने वाली गाड़ी के प्रयोजनों के लिए प्रयोग में लाए जाने वाले पशु और खुले स्थान या बाड़े जो आवश्यकता पड़ने पर पशु बांधने के लिए, गाड़ी खड़ी करने या चारा या खाद इकट्ठा करने के लिए अपेक्षित हो;

(गगग) कृषक से भिन्न निर्णीत ऋणी के स्वामित्व में का और उसके द्वारा अधिवसित एक मुख्य निवास गृह और उससे संलग्न अन्य भवन उसकी सामग्री और उसके स्थल और उससे ठीक अनुलग्न और उसके उपभोग के लिए आवश्यक भूमि सहित;"

                                (2) खंड () में सौ रुपए" शब्दों के स्थान पर दो सौ पचास रुपए" शब्द प्रतिस्थापित किए गए हों;

(3) खंड () के पश्चात् निम्नलिखित खंड अन्तःस्थापित किए गए हों, अर्थात्: -

                () निर्णीत ऋणी को कृषि उपज का दो-तिहाई;

() निर्णीत ऋणी को किसी अन्य सम्पत्ति का इतना जितना उसकी जीविका का साधन बनता हो और जिससे न्यायालय की राय में उसे दो सौ पचास रुपए प्रति मास से अनधिक की आय प्राप्त करने की सम्भावना हो;

() केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार को निधि में से या उसके द्वारा या उसकी ओर से अग्रिम दिया या अग्रिम देने के लिए करार पाया गया कोई उधार या किसी ऐसे उधार से सृजित कोई आस्ति"

स्पष्टीकरण-जहां कोई ऐसी आस्ति जो कि खंड () में निर्दिष्ट है और अंशतः ऐसे उधार से और अंशतः निर्णीत ऋणी की प्राइवेट निधि से सृजित की गई है, वहां आस्ति का वह भाग जो, प्राइवेट निधि से सृजित किया गया है, कुर्की या विक्रय के लिए दायी होगा यदि वह शेष भाग से अलग किया जा सकता है

32. ऋणों का कम करना-(1) जहां धारा 5 या धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन विस्थापित देनदार के आवेदन पर, अधिकरण ने इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार प्रत्येक ऋण के बारे में देय रकम को अवधारित कर दिया है तो वह देनदार का संदाय करने की सामर्थ्य को अवधारित करेगा

(2) यदि देनदार का संदाय सामर्थ्य इस प्रकार अवधारित ऋणों की (ऐसे ऋण को अपवर्जित करते हुए, जिसके बारे में लेनदार ने धारा 16 के उपबन्धों के अनुसार प्रतिभूति रखने का निर्वाचन किया है), कुल राशि के बराबर है या उससे अधिक है, तो अधिकरण प्रत्येक लेनदार को शोध्य रकम को, विनिर्दिष्ट करते हुए इस प्रकार अवधारित कुल राशि के बराबर है या उससे अधिक है, तो अधिकरण प्रत्येक लेनदार को शोध्य रकम को विनिर्दिष्ट करते हुए इस प्रकार अवधारित कुल राशि के लिए डिक्री पारित करेगा और उसकी अदायगी किस्तों में धारा 33 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अनुसार उस समय तक अनुज्ञात करेगा जब तक कि वह कारणों को लेखबद्ध करके अन्यथा निदेश नहीं देता

(3) यदि देनदार का संदाय सामर्थ्य उपधारा (2) में निर्दिष्ट कुल राशि से कम है, तो अधिकरण डिक्री को दो भागों में विभाजित करेगा और उसके प्रथम भाग में (जिसे इसमें इसके पश्चात् डिक्री के प्रथम भाग के रूप में निर्दिष्ट किया गया है) यह उपबन्धित करेगा कि संदाय के सामर्थ्य के बराबर राशि, धारा 33 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन भारत में देनदार की आस्तियों से वसूल की जाए और उसके द्वितीय भाग में (जिसे इसमें इसके पश्चात् डिक्री के द्वितीय भाग के रूप में निर्दिष्ट किया गया है) यह उपबन्धित करेगा कि उपधारा (6) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों के अधीन अतिशेष किसी प्रतिकर से जो देनदार प्राप्त करे वसूल किया जाए :

परन्तु यदि कोई ऐसा प्रतिकर प्राप्त नहीं होता, तो अतिशेष अवसूलीय होगा

(4) लेनदार को जिसने धारा 16 के अधीन अपनी प्रतिभूति रोके रखने का निर्वाचन किया है भारत में देनदार की आस्तियों से उसको देय किसी रकम को वसूल करने का अधिकार नहीं होगा, किन्तु इस उपधारा में की कोई भी बात धारा 16 द्वारा उसे दिए हुए अधिकारों में से किसी पर प्रभाव नहीं डालेगी

(5) लेनदार को देनदार द्वारा प्रतिकर की प्राप्ति के कम से कम छह मास पूर्व किसी भी समय यह आवेदन करने का हक होगा कि डिक्री के संपूर्ण प्रथम भाग या उसके अतिशेष को जहां तक उसका सम्बन्ध उसको शोध्य किसी ऋण से है, डिक्री के द्वितीय भाग में जोड़ा जाए, और तब उसे भारत में देनदार की आस्तियों से कोई रकम वसूल करने का कोई अधिकार नहीं होगा

(6) इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ डिक्री के द्वितीय भाग की तुष्टि के लिए प्रतिकर से संदेय कोई रकम वह रकम होगी जिसकी डिक्री के द्वितीय भाग में समस्त ऋणों का कुल रकम से वही अनुपात है [जिसके अन्तर्गत उपधारा (5) के अधीन उसमें जोड़ी गई कोई राशि और धारा 16 की उपधारा (3) के खंड () के परन्तुक में विनिर्दिष्ट रीति से प्रतिभूति लेनदार के पक्ष में अवधारित राशि भी हैट जो डिस्प्लेस्ड पर्सन्स (क्लेम्स) ऐक्ट, 1950 (1950 का 44) के अधीन देनदार की सम्पत्ति के बारे में उसको संदेय प्रतिकर का सत्यापित दावे से है और प्रतिकर का अतिशेष, यदि कोई हो, विस्थापित देनदार को वापस किया जाएगा

(7) डिक्री के प्रथम भाग के बारे में विस्थापित देनदार द्वारा संदत्त प्रत्येक किस्त और उपधारा (6) के अनुसार प्रतिकर से संदेय कोई राशि डिक्रीदारों में, आनुपातिक रूप से वितरित की जाएगी, यदि एक से अधिक व्यक्ति उसके लिए हकदार हैं:

परन्तु प्रतिभूत लेनदार जिसने धारा 16 के अधीन अप्रतिभूत लेनदार के रूप में माने जाने का निर्वाचन नहीं किया है, प्रतिकर से संदेय रकम पर पूर्व प्रभार के लिए हकदार होगा

(8) जहां विस्थापित व्यक्ति संपत्ति के विनिमय के रूप में प्रतिकर प्राप्त करता है वहां धारा 16 के अधीन लेनदार के पूर्व प्रभार के अधीन रहते हुए यदि कोई हो, डिक्री के द्वितीय भाग के बारे में संदेय कुल राशि विनिमय के रूप में प्राप्त संपत्ति पर द्वितीय प्रभार होगी, किन्तु द्वितीय प्रभार की रकम वह रकम होगी, जिसका कुल राशि से वही अनुपात है जो विनिमय के रूप में प्राप्त संपत्ति के मूल्य का डिस्प्लेस्ड पर्सन्स (क्लेम्स) ऐक्ट, 1950 (1950 का 44) के अधीन मूल्यांकित और सत्यापित मूल्य सम्पत्ति के मूल्य से है

(9) जहां डिक्री के प्रथम भाग के बारे में नियत किसी किस्त के संदाय में विस्थापित व्यक्ति व्यतिक्रम करता है या धारा 16 की उपधारा (4) या इस धारा की उपधारा (8) के अनुसार, अवधारित रकम, जिसके लिए प्रथम या द्वितीय प्रभार विनिमय के रूप में प्राप्त सम्पत्ति के ऊपर सृजित किया गया हो संदत्त नहीं करता है, वहां लेनदार निर्णीत ऋणी की कुर्की योग्य आस्तियों की कुर्की योगय और विक्रय द्वारा या विनिमय के रूप में अभिप्राप्त संपत्ति के, जिसके ऊपर प्रभार सृजित किया गया हो, विक्रय द्वारा डिक्री के निष्पादन के लिए आवेदन कर सकेगा, और इस प्रकार निष्पादन से वसूल की हुई रकम, डिक्रीदारों के बीच आनुपातिक रूप से वितरित की जाएगी

परन्तु इस उपधारा में की कोई भी बात प्रभार धारियों के अधिकारों पर कोई प्रभाव नहीं डालेगी

(10) इस अधिनियम के प्रयोजनार्थ, जहां प्रतिकर नकदी में संदत्त किया जाता है, वहां वह रकम जो डिक्री के द्वितीय भाग में ऋणों की तुष्टि के प्रयोजनों के लिए उपलब्ध होगी, ऐसे प्रतिकर की रकम के पचहत्तर प्रतिशत से किसी भी दशा में अधिक नहीं होगी और जहां यह सम्पत्ति के विनिमय के रूप में है, वहां सम्पत्ति का परिमाण जो उक्त प्रयोजनों के लिए उपलब्ध होगा, किसी भी दशा में ऐसी सम्पत्ति के मूल्य में पचहत्तर प्रतिशत से अधिक नहीं होगा

स्पष्टीकरण-इस धारा में संदाय की समर्थता" पद से अभिप्रेत है विस्थापित देनदार को भारत में समस्त कुर्की योग्य आस्तियों के बाजार मूल्य का योग धन, वह आय जिसका अगले तीन क्रमवर्ती वर्षों में उद्भूत होना संभाव्य है, और ऐसी आय को संगणना से दो सौ पचास रुपए प्रतिमास की दर से संगणित राशि अपवर्जित होगी   

33. वे बातें जिनको किस्तों में संदाय को निदेश देने में ध्यान में रखा जाना है-(1) डिक्री के प्रथम भाग के अधीन किन्हीं राशियों के किस्तों द्वारा संदाय का निदेश देने में अधिकरण, अन्य मामलों के साथ निम्नलिखित को भी ध्यान में रखेगा: -

() समस्त स्त्रोतों से विस्थापित व्यक्ति को वर्तमान आय और वह आय जिसका कि उसको भविष्य में प्रतिभूत होना संभाव्य है;

() जीवन की साधारण आवश्यकताओं के लिए उसके ऊपर आश्रित कुटुम्ब का आकार और व्यय जो विस्थापित व्यक्ति के बालकों को जो उसके ऊपर आश्रित हैं शिक्षा और विवाह के लिए उपगत होना सम्भाव्य है

(2) जहां विस्थापित लेनदार अवयस्क है, या विधवा है, या वह व्यक्ति है जो किसी शारीरिक निःशक्तता के कारण, अपनी जीविका उपार्जित करने के लिए स्थायी रूप से निःशक्त है, वहां अधिकरण यह निदेश दे सकेगा कि उसको संदेय कोई किस्त उससे जिसको संदाय करने के लिए अन्यथा निदेश दिया जा सकता था पच्चीस प्रतिशत अधिक होगी और जहां वह ऐसा करता है, वहां वह यह भी निदेश देगा कि अन्य डिक्रीदारों को किस्तें आनुपातिक रूप से कम कर दी जाएंगी

34. भरण-पोषण भत्तों में फेरफार-जहां न्यायालय की किसी डिक्री या आदेश के अधीन विस्थापित देनदार को किसी व्यक्ति के भरण-पोषण के लिए कालिक भत्ता संदत्त करने का आदेश दिया गया है, या ऐसा भत्ता वह किसी स्वेच्छा या किए गए करार के अधीन संदत्त करने के लिए उत्तरदायी है तो उस दर में जिस पर ऐसा भत्ता संदेय है, अधिकरण द्वारा उसको इस निमित्त आवेदन किए जाने पर फेरफार किया जा सकेगा, यदि विस्थापित देनदार की परिवर्तित परिस्थितियों की दृष्टि से अधिकरण का विचार है कि ऐसा फेरफार आवश्यक है और ऐसा फेरफार, किसी डिक्री, आदेश या करार में किसी प्रतिकूल बात के होते हुए भी ऐसी कालावधि के लिए प्रभावशील रहेगा जिसके लिए अधिकरण निदेश दे

35. विधि व्यवसायी की फीस का विनिर्धारण-अधिकरण अपने समक्ष किसी कार्यवाही में नियोजित किसी विधि व्यवसायियों की फीस के बारे में खर्च के रूप में किसी व्यक्ति द्वारा खर्चों के संदाय का निदेश देने में, साधारण सिविल न्यायालयों के समक्ष वैसी ही प्रकृति की कार्यवाहियों में ऐसे खर्चों का संदाय विनियमित करने के लिए तत्समय प्रवृत्त किन्हीं नियमों का पालन करेगा और उसकी राय में सिविल न्यायालय के समक्ष जो खर्चा होता है उसको आधे से अधिक अधिनिर्णीत नहीं करेगा

36. परिसीमा की कालावधि का बढ़ाया जाना-इंडियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 (1908 का 9) या किसी विशेष या स्थानीय विधि या किसी करार में किसी बात के होते हुए भी निम्नलिखित वाद इस अधिनियम के प्रारंभ से एक वर्ष के भीतर किसी भी समय संस्थित किया जा सकेगा, -

() कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही, जिसके बारे में डिस्प्लेस्ड पर्सन्स (इन्स्टीट्यूशन आफ सूट्स) ऐक्ट, 1948 की धारा 8 द्वारा परिसीमा की कालावधि को बढ़ाया गया था; और

() बीमा कंपनी के विरुद्ध दावे को प्रवर्तित कराने के लिए कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही जो खंड () के उपबंधों में नहीं आती है, जिसके बारे में वाद हेतुक, चाहे पूर्णतः या अंशतः उन राज्यक्षेत्रों में जो अब पश्चिमी पाकिस्तान में स्थित हैं, उत्पन्न हो गया था और वाद या अन्य विधिक कार्यवाही का संस्थित किया जाना संविदा में ऐसी शर्त के होने के कारण वर्जित हो गया था जो शर्त यदि होती तो वह खंड () में अन्तर्विष्ट उपबंधों द्वारा शासित होता

37. कतिपय डिक्रियों के निष्पादन के लिए परिसीमा की कालावधि की काट-छांट-सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 8 में या तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि में किसी बात के होते हुए भी, विस्थापित व्यक्ति के विरुद्ध ऋण के बारे में डिक्री के निष्पादन के लिए कोई आदेश, निम्नलिखित अवधि के अवसान के पश्चात् प्रस्तुत किए गए आवेदन पर नहीं किया जाएगा-

                                () इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व पारित की हुई डिक्रियों की दशा में ऐसे प्रारंभ से छह वर्ष;

                                () इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् पारित की हुई डिक्रियों की दशा में डिक्रियों की तारीख से छह वर्ष;

() विहित अन्तरालों या कतिपय तारीखों पर रकम का संदाय करने का निदेश देने वाली डिक्रियों की दशा में, संदाय जिसके बारे में डिक्रीदार डिक्री का निष्पादन करना चाहता है, करने में व्यतिक्रम की तारीख से छह वर्ष;

                परन्तु इस धारा में की किसी भी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व पारित डिक्री के निष्पादन के आवेदन के लिए उक्त संहिता की धारा 48 में यथाउपबंधित निष्पादन के समय की परिसीमा में वृद्धि करने के लिए है

38. निष्पादन में स्थावर सम्पत्ति का विक्रय-(1) जहां विस्थापित व्यक्ति के विरुद्ध ऋण की वसूली के लिए किसी डिक्री के निष्पादन में उसकी स्थावर सम्पत्ति का विक्रय चाहा जाता है, वहां डिक्री का निष्पादन करने वाला न्यायालय प्रथमतः सम्पत्ति का बाजार मूल्य अवधारित करेगा और यदि इस प्रकार अवधारित किया गया मूल्य डिक्री की रकम और किसी पूर्व विल्लंगम की आनुपातिक रकम के बराबर या कम है तो न्यायालय डिक्रीदार को सम्पत्ति अन्तरित करेगा

(2) यदि उपधारा (1) के अधीन अवधारित मूल्य डिक्री की रकम और किसी पूर्व विल्लंगम की आनुपातिक रकम से अधिक है, तो न्यायालय ऐसी सम्पत्ति के उस भाग का अवधारण करेगा, जिसका मूल्य डिक्री की रकम और ऐसी पूर्व विल्लंगम की रकम के बराबर है, और यदि ऐसा करना युक्तियुक्त और सुविधाजनक है तो वह भाग डिक्रीदार को अन्तरित कर सकेगा

(3) जहां ऐसी सम्पत्ति डिक्रीदार को इस धारा के अधीन अन्तरित कर दी गई है वहां डिक्री इस प्रकार अन्तरित सम्पत्ति के मूल्य की परिसीमा तक तुष्ट समझी जाएगी:

परन्तु यदि डिक्रीदार सम्पत्ति लेने की वांछा नहीं करता या न्यायालय की राय में उसे संपत्ति का अन्तरण करना युक्तियुक्त और सुविधाजनक नहीं है तो सम्पत्ति सार्वजनिक नीलाम द्वारा विक्रय की जा सकेगी, किन्तु सार्वजनिक नीलाम में प्राप्त कीमत को विचार में लाए बिना, इस धारा के अधीन यथाअवधारित सम्पत्ति का बाजार मूल्य कि सार्वजनिक नीलाम के विक्रय आगमों से डिक्रीदार को संदेय रकम वह रकम समझी जाएगी जो डिक्रीदार की डिक्री के बारे में संदत्त की जा चुकी है और उसकी तुष्टि तदनुसार प्रविष्ट की जाएगी

39. समझौतों को प्रोत्साहन-यदि विस्थापित देनदार और लेनदार या जहां एक से अधिक लेनदार हैं, उनकी ऐसी संख्या, जो दायित्वों के समायोजन के लिए करार में प्रविष्ट विस्थापित देनदार थे शोध्य ऋणों के दो-तिहाई से अधिक मूल्य की धारक है, तो अधिकरण यदि उसे इस निमित्त आवेदन किया जाता है, तो अन्य लेनदारों को सम्यक् नोटिस देने के पश्चात्, तदनुसार शेष ऋणों का समायोजन करेगा और यदि करार की शर्त ठीक और उचित है, तो तदनुसार डिक्री पारित करेगा

अध्याय 4

अपील

40. अपीलों से संबंधित साधारण उपबंध-धारा 41 में अन्यथा उपबंधित के सिवाय-

                () अधिकरण की किसी अंतिम डिक्री या आदेश से, या

() अधिकरण की किसी डिक्री या आदेश के निष्पादन के अनुक्रम में किए गए किसी आदेश से, जो यदि सिविल न्यायालय की डिक्री या आदेश के निष्पादन के अनुक्रम में पारित किया गया होता तो सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन अपीलनीय होता,

उसी उच्च न्यायालय को अपील की जा सकेगी जिसकी अधिकारिता की सीमाओं में अधिकरण स्थित है

41. कतिपय दशाओं में अपील के अधिकार पर निर्बन्धन-धारा 40 में किसी बात के होते हुए भी, जहां अपील की विषय-वस्तु ऋण की रकम से संबंधित है और ऐसी रकम अपील पर पांच हजार रुपए से कम है, तो कोई अपील नहीं की जाएगी

42. अपील के पक्षकार-इस अधिनियम के अधीन किसी अपील के प्रयोजनार्थ यह पर्याप्त होगा यदि केवल ऐसे व्यक्ति जो अपीलार्थी की राय में उनके बीच संविवाद में वास्तविक प्रश्नों को अवधारित करने के प्रयोजनार्थ अपील के आवश्यक पक्षकार हैं, अपील में प्रत्यर्थी के रूप में जोड़े जाएं:

परन्तु जहां सुनवाई पर उच्च न्यायालय को यह प्रतीत होता है कि कोई व्यक्ति जो अधिकरण के समक्ष उस कार्यवाही में पक्षकार था जिसकी डिक्री से अपील की गई है, किन्तु जो अपील में पक्षकार नहीं बनाया गया है, अपील के परिणाम से हितबद्ध है, तो न्यायालय भविष्यवर्ती तारीख के लिए, जो न्यायालय द्वारा नियत की जाएगी, सुनवाई स्थगित कर सकेगा और यह निदेश दे सकेगा कि ऐसा व्यक्ति प्रत्यर्थी बनाया जाए

अध्याय 5

प्रकीर्ण

43. भारतीय विधि के अधीन कतिपय सोसाइटियों और कम्पनियों का रजिस्ट्रीकरण-(1) जहां सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) या सहकारी समिति अधिनियम, 1912 (1912 का 2) या सहकारी समितियों के रजिस्ट्रीकरण के लिए किसी प्रान्त में अन्य विधि के अधीन या इंडियन कम्पनीज ऐक्ट 1913 (1913 का 7) के अधीन अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन के पूर्व रजिस्ट्रीकृत किसी सोसाइटी या कम्पनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय उस राज्यक्षेत्र में स्थित है, जो अब पश्चिमी पाकिस्तान का भाग है किन्तु उसके सदस्य बहु संख्या में तत्समय भारत में निवासी हैं या कम्पनी की दशा में उसके अंशों का मूल्य के अनुसार तैंतीस सही एक बटा तीन प्रतिशत से अधिक भारत में निवासी व्यक्तियों द्वारा धारित किए जा रहे हैं तो, यथास्थिति, सोसाइटी या कम्पनी इस अधिनियम के प्रारंभ से एक वर्ष के भीतर, यथास्थिति, सोसाइटियों, सहकारी समितियों या कम्पनियों के रजिस्ट्रार को जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर शासी निकाय के सदस्यों की बहुसंख्या निवास करती है या व्यापार करती है, भारत में ऐसी सोसाइटी या कम्पनी की मान्यता के लिए आवेदन कर सकेगी

(2) रजिस्ट्रार इस विषय में ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह ठीक समझे; ऐसी मान्यता दे सकेगा या ऐसा करने से इंकार कर सकेगा

(3) उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रार के आदेश से राज्य सरकार को अपील होगी और रजिस्ट्रार का या अपील में राज्य सरकार का कोई आदेश किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा

(4) जहां रजिस्ट्रार सोसाइटी सहकारी समिति या कम्पनी को मान्यता देता है, वहां वह अपने रजिस्ट में उसकी आवश्यक प्रविष्टियां करवाएगा और तब, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में या, यथास्थिति, समिति या कम्पनी की किसी लिखत में, किसी बात के होते हुए भी वह भारत में तत्समय प्रवृत्त किसी सुसंगत विधि के अधीन निर्मित और रजिस्ट्रीकृत समझी जाएगी और प्रत्येक ऐसी सोसाइटी या कमपनी दूसरे मामलों के साथ-साथ भारत में निवास करने वाले और व्यापार करने वाले किसी व्यक्ति से उसे देय किसी रकम को मांगने और प्राप्त करने का अधिकार रखेगी  

44. कतिपय मामलों में अतिरिक्त आवेदन का वर्जन-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट अन्य उपबंधों के अधीन, जहां धारा 5 के अधीन या धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन विस्थापित देनदार या धारा 13 के अधीन विस्थापित लेनदार द्वारा किए हुए आवेदन खारिज कर दिए गए हैं, वहां उस प्रयोजन के लिए अतिरिक्त आवेदन नहीं किया जाएगा

45. आवेदनों का संशोधन-किसी आवेदन या उससे उपाबद्ध किसी अनुसूची में लेखन या गणित सम्बन्धी भूलें जो आकस्मिक भूल या लोप से प्रोद्भूत होती हैं अधिकरण द्वारा किसी समय या तो स्वयं या पक्षकारों में से किसी के आवेदन पर ठीक की जा सकेंगी

46. सूचना की तामील-इस अधिनियम के अधीन जारी की गई प्रत्येक सूचना रसीदी रजिस्ट्री डाक द्वारा तामील की जाएगी जब तक कि अधिकरण लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 5 में विनिर्दिष्ट अन्य ढंगों में से किसी में तामील का निदेश दे

47. विस्थापित देनदार द्वारा कतिपय मामलों को प्रकट करने का प्रभाव-जहां विस्थापित देनदार ने अपने आवेदन की सुसंगत अनुसूची में अपने द्वारा देय कोई ऋण या अपने स्वामित्व की कोई जंगम या स्थावर सम्पत्ति का, चाहे ऐसी सम्पत्ति कुर्की के लिए दायी हो अथवा हो उल्लेख नहीं किया है, वहां इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई भी बात-

() ऋण की दशा में इस अधिनियम से अन्यथा तत्समय प्रवृत्त किसी विधि के अधीन उसकी वसूली के लिए कोई कार्यवाही संस्थित करने से लेनदार को निवारित नहीं करेगी, और

() सम्पत्ति की दशा में किसी ऐसी विधि के अधीन कुर्की किए जाने से या अन्यथा संव्यवहार किए जाने से, निवारित नहीं करेगी

48. देनदार की मृत्यु पर कार्यवाहियों का उपशमन होना-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, अधिकरण के समक्ष कोई कार्यवाही केवल किसी देनदार की मृत्यु के कारण, जो कार्यवाही में पक्षकार है, उपशमित नहीं समझी जाएगी, और मृत्यु के होते हुए भी डिक्री पारित की जा सकेगी और ऐसी डिक्री का वैसा ही बल और प्रभाव होगा मानो वह मृत्यु होने के पूर्व पारित की गई थी:

परन्तु अधिकरण, उस निमित्त आवेदन करने पर देनदार के विधिक प्रतिनिधि को कार्यवाही में पक्षकार बनवाएगा और इस प्रकार पक्षकार बनाया गया व्यक्ति मृतक देनदार के विधिक प्रतिनिधि के रूप में उसकी हैसियत के अनुरूप कोई समुचित बचाव कर सकेगा:

परन्तु यह और कि इसमें अन्तर्विष्ट कोई भी बात मृतक के विधिक प्रतिनिधि को, वहां तक के सिवाय जहां तक मृतक की देनदार आस्तियां उसको न्यागत हुई हों, डिक्री की तुष्टि के लिए दायी बनाने वाली नहीं समझी जाएंगी

49. पूर्व संव्यवहार का प्रभावी नहीं होना-(1) यदि इस अधिनियम के प्रारंभ के पूर्व विस्थापित देनदार ने किसी भी रीति से अपने दायित्वों में से किसी की तुष्टि कर दी है या उसका उन्मोचन कर दिया है तो ऐसे संव्यवहार इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात से प्रभावित नहीं होंगे

(2) जहां अधिकरण ने इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार किसी ऋण के बारे में देय कोई रकम अवधारित कर दी है, वहां ऐसे अवधारण से पूर्व के ऋणों के लिए विस्थापित देनदार द्वारा किए गए कोई संदाय (जिसके अन्तर्गत ब्याज में संदाय भी है) इस प्रकार अवधारित रकम में समायोजित किए जाएंगे:

परन्तु किसी भी लेनदार से उसको संदत्त किसी रकम को वापस करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी यदि यह माना जाता है कि वह उस अवधारित रकम से आधिक्य में है जो इस अधिनियम के अधीन उसको देय है

50. विस्थापित देनदार का दिवालिया नहीं समझा जाना-दिवाले संबंधी तत्समय प्रवृत्त किसी विधि में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, कोई विस्थापित देनदार केवल इस कारण कि उसने इस अधिनियम के अधीन अपने ऋणों के समायोजन के लिए आवेदन किया है, तत्समय प्रवृत्त दिवाले संबंधी किसी विधि के अर्थों में दिवालिया अथवा इस प्रकार अधिनिर्णीत दिवालिया नहीं समझा जाएगा, और दिवालिएपन के लिए कोई भी आवेदन विस्थापित देनदार के विरुद्ध अगस्त, 1947 के पन्द्रहवें दिन के पूर्व उसके द्वारा उपगत किसी ऋण के बारे में नहीं होगा

51. कतिपय दशाओं में बैंकों और उनके देनदारों के बीच में समझौतों या इन्तजामों को पुनर्जीवित करना-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, बैंक का विस्थापित देनदार द्वारा देय किसी ऋण के पुनःसंदाय, उन्मोचन या तुष्टि से संबंधित विस्थापित देनदार और बैंक के बीच किया गया कोई समझौता या इन्तजाम, चाहे इस अधिनियम के पूर्व हो या पश्चात् अधिकरण द्वारा पुनर्जीवित नहीं किया जाएगा और इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट कोई भी बात ऐसे समझौते और इन्तजाम पर प्रभाव नहीं डालेगी:

परन्तु बैंक के बारे में उसके और उसके स्वयं के लेनदारों या ऐसे लेनदारों के किसी वर्ग के बीच ऐसा समझौता या इन्तजाम प्रवृत्त हैं जो इंडियन कम्पनीज ऐक्ट, 1913 (1913 का 7) की धारा 153 के अधीन न्यायालय द्वारा सम्यक् रूप से मंजूर कर दिया गया है:

परन्तु यह और कि इस अधिनियम की धारा 31 द्वारा यथासंशोधित सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 60 की उपधारा (1) के परन्तुक के खण्ड (), (गग), (गगग), (), (), () और () में विनिर्दिष्ट विशिष्टियां विस्थापित देनदार के विरुद्ध किसी कार्यवाही में कुर्की और विक्रय के लिए दायी नहीं होंगी

52. डिक्री की विषय-वस्तु की विहित प्राधिकारी को संसूचना-(1) प्रत्येक अधिकरण विहित प्राधिकारी को, ऐसी रीति से जो विहित की जाए धारा 16 की उपधारा (3) के अधीन घोषित पूर्व प्रभार की रकम संसूचित करेगा और धारा 5 या धारा 11 की उपधारा (2) के अधीन विस्थापित देनदार के आवेदन पर पारित डिक्री की प्रति और धारा 32 की उपधारा (5) के अधीन पारित कोई आदेश भी जिसमें आदेश की तारीख पर उसमें उल्लिखित लेनदार को शोध्य रकम विनिर्दिष्ट हो, भेजेगा

(2) विहित प्राधिकारी धारा 3 की उपधारा (6) के अनुसार उसको, रिपोर्ट किए गए ऋणों को कम करेगा और इस निमित्त बनाए गए किन्हीं नियमों के अधीन प्रथमतः धारा 16 की उपधारा (2) के अनुसार प्रतिभूत लेनदार का पूर्व प्रभार चुकाएगा और तत्पश्चात् धारा 32 की उपधारा (10) के अर्थों में वितरण के लिए उपलब्ध प्रतिकर के अतिशेष को अन्य डिक्रीदारों के बीच जिनकी डिक्रियों की उसको रिपोर्ट की गई है, आनुपातिक रूप से वितरित करेगा:

परन्तु किसी ऐसे आनुपातिक वितरण में विहित प्राधिकारी धारा 33 की उपधारा (2) में अन्तर्विष्ट उपबन्धों का सम्यक् ध्यान रखेगा

(3) संदेय प्रतिकर की रकम का अतिशेष विस्थापित देनदार को वापस किया जाएगा

(4) इस धारा के उपबंधों के अधीन किसी डिक्रीदार को विहित प्राधिकारी द्वारा संदत्त कोई रकम उस परिमाण तक विस्थापित देनदार द्वारा शोध्य ऋणों का विधिमान्य उन्मोचन होगी

53. परिसीमा अधिनियम का लागू होना-इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट अन्य उपबन्धों के अधीन इंडियन लिमिटेशन ऐक्ट, 1908 (1908 का 9) किसी कार्यवाही के इस अधिनियम के अधीन संस्थित किए जाने को लागू होगा और उसके संबंध में उस अधिनियम द्वारा विहित परिसीमा की कालावधि की संगणना करने और अवधारण करने के प्रयोजनार्थ इस अधिनियम के अधीन किया गया प्रत्येक आवेदन, उस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए वाद समझा जाएगा

54. सिविल प्रक्रिया संहिता की प्रथम अनुसूची का, आदेश 38 का लागू नहीं होना-निर्णय के पूर्व गिरफ्तारी और कुर्की से संबंधित सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की प्रथम अनुसूची के आदेश 38 में अन्तर्विष्ट कोई भी बात इस अधिनियम के अधीन किसी कार्यवाही को लागू नहीं होगी

55. सद्भावपूर्वक की गई कार्यवाही के लिए संरक्षण-इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम या आदेश के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए सरकार या किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई वाद अभियोजन या विधिक कार्यवाही नहीं की जाएगी

56. शक्तियों का प्रत्यायोजन-केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस अधिनियम के अधीन उसके द्वारा प्रयोक्तव्य किसी शक्ति का केन्द्रीय सरकार के अधीनस्थ ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा अथवा राज्य सरकार या राज्य सरकार के अधीनस्थ किसी ऐसे अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा जो निदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं, प्रयोग किया जा सकेगा

57. केन्द्रीय सरकार की नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी

(2)  विशिष्टता तथा धारा 1 में अन्तर्विष्ट उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इस प्रकार बनाए गए नियम निम्नलिखित मामलों में सबके लिए या किसी के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-

                () अतिरिक्त विशिष्टियां, यदि कोई हों, जो धारा 5 के अधीन आवेदन में होनी चाहिएं;

() वह प्ररूप जिसमें इस अधिनियम के अधीन सूचनाएं जारी की जा सकेंगी;

() वह प्ररूप जिसमें धारा 10 या धारा 13 के अधीन आवेदन किए जा सकेंगे;

() वे रजिस्टर जो इस अधिनियम के अधीन रखे जाने चाहिएं;

() वे प्राधिकारी जो इस अधिनियम के अधीन विहित किए जाने के लिए अपेक्षित हैं;

() वह बोर्ड या अन्य प्राधिकारी जिसकी धारा 18 की उपधारा (2) के अधीन कोई रिपोर्ट की जाए और वे मामले जो ऐसे बोर्ड या अन्य प्राधिकारी को अपनी रिपोर्ट बनाने में ध्यान में रखने चाहिएं

58. राज्य सरकार की नियम बनाने की शक्ति-राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगी-

() राज्य के भीतर विहित अधिकरणों के बीच कारबार का वितरण;

() वह रीति जिसमें अधिकरण के समक्ष पेश की गई दस्तावेजों की प्रतियां प्रमाणित की जानी चाहिएं;

() अधिकरणों द्वारा भेजी जाने वाली विवरणियां और वे प्राधिकारी जिनको यह भेजी जाएंगी

 [58. नियमों का रखा जाना-(1) इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मण्डल के समक्ष रखा जाएगा

(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय  सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा यह अवधि एक सत्र में अथवा दा या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बादे के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]

59. निरसन-धारा 36 में अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, डिस्प्लेस्ड पर्सन्स (इंस्टीट्यूशन आफ सूट्स) एक्ट 1948 (1948 का 47) और डिस्प्लेस्ड पर्सन्स (लीगल प्रोसीडिंग्स) एक्ट, 1949 (1949 का 25) इस अधिनियम में यथापरिभाषित विस्थापित व्यक्तियों को लागू नहीं रहेंगे

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