भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1988
(1988 का अधिनियम संख्यांक 68)
[19 दिसंबर, 1988]
राष्ट्रीय राजमार्गों के विकास, अनुरक्षण और प्रबंध के
लिए एक प्राधिकरण का गठन करने तथा
उससे संबद्ध या उसके आनुषंगिक
विषयों के लिए उपबंध
करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के उनतालीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
अध्याय 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अधिनियम, 1988 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-
(क) प्राधिकरण" से धारा 3 के अधीन गठित भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण अभिप्रेत है ;
(ख) अध्यक्ष" से प्राधिकरण का अध्यक्ष अभिप्रेत है ;
(ग) कर्मचारी" से प्राधिकरण में पूर्णकालिक सेवारत व्यक्ति अभिप्रेत है ;
(घ) सदस्य" से प्राधिकरण का धारा 3 के अधीन नियुक्त सदस्य अभिप्रेत है और इसमें अध्यक्ष भी है ;
(ङ) राष्ट्रीय राजमार्ग" से राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 (1956 का 48) की धारा 2 के अधीन तत्समय राष्ट्रीय राजमार्ग के रूप में घोषित कोई राजमार्ग अभिप्रेत है ;
(च) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ;
(छ) विनियम" से प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ;
(ज) उन शब्दों और पदों के जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किंतु राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 (1956 का 48) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 2
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण
3. प्राधिकरण का गठन-(1) इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ऐसी तारीख से जो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, एक प्राधिकरण का गठन किया जाएगा जिसका नाम भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण होगा ।
(2) यह प्राधिकरण पूर्वोक्त नाम का, शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला, एक निगमित निकाय होगा जिसे इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए, जंगम और स्थावर, दोनों प्रकार की संपत्ति का अर्जन, धारण तथा व्ययन करने की और संविदा करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से यह वाद ला सकेगा और इस पर वाद लाया जा सकेगा ।
[(3) प्राधिकरण में निम्नलिखित होंगे, जिन्हें केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियुक्त करेगी :-
(i) अध्यक्ष ;
(ii) पूर्णकालिक सदस्य, जो छह से अधिक नहीं होंगे; और
(iii) अशंकालिक सदस्य, जो छह से अधिक नहीं होंगे :
परंतु केन्द्रीय सरकार, अंशकालिक सदस्यों को नियुक्त करते समय यह सुनिश्चित करेगी कि उनमें से कम से कम दो सदस्य ऐसे गैर सरकारी वृत्तिक हों, जिन्हें वित्तीय प्रबंध, परिवहन योजना या किसी अन्य सुसंगत विद्या शाखा में ज्ञान या अनुभव हो । ]
4. सदस्यों की पदावधि और सेवा की शर्तें-सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें ऐसी होंगी जो विहित की जाएं ।
5. सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए निरर्हताएं-कोई व्यक्ति सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए निरर्हित होगा यदि वह,-
(क) ऐेसे किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास से दंडादिष्ट किया गया है जिसमें, केंद्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्ग्रस्त है ; या
(ख) अननुमोचित दिवालिया है ; या
(ग) विकृत चित्त का है और सक्षम न्यायालय द्वारा ऐसा घोषित कर दिया गया है ; या
(घ) सरकार की या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगम की सेवा से हटा दिया गया है या पदच्युत कर दिया है ; या
(ङ) केंद्रीय सरकार की राय में, प्राधिकरण में ऐसा वित्तीय या अन्य हित रखता है जिसका उसके सदस्य के रूप में उसके द्वारा कृत्यों के निर्वहन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है ।
6. पुनर्नियुक्ति के लिए सदस्य की पात्रता-सेवा के ऐसे अन्य निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जैसी विहित की जाए कोई व्यक्ति, जो सदस्य नहीं रह गया है, ऐसे सदस्य के रूप में पुनर्नियुक्ति का पात्र होगा ।
7. अधिवेशन-(1) प्राधिकरण के अधिवेशन ऐसे समय और स्थान पर होंगे और उन अधिवेशनों में किए जाने वाले कार्य के बारे में, जिसके अंतर्गत ऐसे अधिवेशनों में गणपूर्ति भी है, प्रक्रिया के ऐसे नियमों का पालन किया जाएगा, जो विनियमों द्वारा उपबंधित किए जाएं ।
(2) यदि किसी कारण से अध्यक्ष प्राधिकरण के किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो, उस अधिवेशन में उपस्थित सदस्यों द्वारा चुना गया कोई अन्य सदस्य अधिवेशन का सभापतित्व करेगा ।
(3) ऐसे सभी प्रश्न जो प्राधिकरण के किसी अधिवेशन के समक्ष आएं उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत से विनिश्चित किए जाएंगे, और मतों के बराबर होने की दशा में अध्यक्ष का, अथवा उसकी अनुपस्थिति में पीठासीन व्यक्ति का, दूसरा या निर्णायक मत होगा और वह उसका प्रयोग करेगा ।
8. प्राधिकरण में रिक्ति से कार्यवाहियों का अविधिमान्य न होना-प्राधिकरण का कोई कार्य या कार्यवाही, केवल इस कारण अविधिमान्य नहीं होगी, कि-
(क) प्राधिकरण में कोई रिक्ति है या उसके गठन में कोई त्रुटि है ; या
(ख) प्राधिकरण के सदस्य के रूप में कार्य करने वाले किसी व्यक्ति की नियुक्ति में कोई त्रुटि है ; या
(ग) प्राधिकरण द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया में कोई ऐसी अनियमितता है, जो मामले के गुणागुण को प्रभावित नहीं करती है ।
9. प्राधिकरण के अधिकारियों, परामर्शदाताओं और अन्य कर्मचारियों की नियुक्ति-(1) प्राधिकरण अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने के प्रयोजनार्थ, उतने अधिकारी और अन्य कर्मचारी जो वह आवश्यक समझता है, और ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो विनियमों द्वारा अधिकथित किए जाएं, नियुक्त कर सकेगा ।
(2) प्राधिकरण, समय-समय पर, किसी व्यक्ति को सलाहकार या परामर्शदाता के रूप में, जैसा वह आवश्यक समझे, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो विनियमों द्वारा अधिकथित किए जाएं, नियुक्त कर सकेगा ।
10. प्राधिकरण का कारबार के सिद्धांतों पर चलना-इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन में प्राधिकरण, जहां तक हो सके, कारबार के सिद्धांतों पर चलेगा ।
अध्याय 3
संपत्ति और संविदा
11. प्राधिकरण में कोई भी राष्ट्रीय राजमार्ग निहित करने या उसे सौंपने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-केंद्रीय सरकार, समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसे राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग को, जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, प्राधिकरण में निहित कर सकेगी या उसे सौंप सकेगी ।
12. केंद्रीय सरकार की आस्तियों और दायित्वों का प्राधिकरण को अंतरण-(1) धारा 11 के अधीन अधिसूचना के प्रकाशन से ही-
(क) ऐसे दिन से ठीक पहले, उस धारा के अधीन प्राधिकरण में निहित या उसे सौंपे गए किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के प्रयोजनों के लिए या उसके संबंध में केंद्रीय सरकार द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत सभी ऋण, बाध्यताएं और दायित्व, की गई सभी संविदाएं और किए जाने के लिए वचनबद्ध सभी मामले और बातें उस प्राधिकरण के द्वारा, उसके साथ या उसके लिए उपगत की गई या किए जाने के लिए वचनबद्ध समझी जाएगी ।
(ख) प्राधिकरण में इस प्रकार निहित या उसे सौंपे गए किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के प्रयोजनों के लिए या उनके संबंध में केंद्रीय सरकार द्वारा या उसके लिए उस तारीख तक उपगत और पूंजीगत व्यय के रूप में घोषित सभी अनावर्ती व्यय ऐसे निबंधनों और शर्तों के अधीन रहते हुए जो केंद्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं, केंद्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण को उपलब्ध कराई गई पूंजी समझी जाएगी ;
(ग) प्राधिकरण में इस प्रकार निहित या उसे सौंपे गए किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके भाग के संबंध में उस तारीख से ठीक पहले केंद्रीय सरकार को देय सभी राशियां प्राधिकरण को देय समझी जाएंगी ;
(घ) ऐसे सभी वाद और अन्य विधिक कार्यवाहियां जो ऐसे राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के संबंध में किसी मामले की बाबत उस तारीख से ठीक पहले केंद्रीय सरकार के द्वारा या उसके विरुद्ध संस्थित की गई हो या संस्थित की जा सकती थीं, प्राधिकरण द्वारा या उसके विरुद्ध चालू रखी या संस्थित की जा सकेगी ।
(2) यदि कोई ऐसा विवाद उत्पन्न होता है कि केंद्रीय सरकार की आस्तियों, अधिकारों या दायित्वों में से कौन से प्राधिकरण को अंतरित कर दिए गए हैं, तो ऐसे विवाद का विनिश्चय केंद्रीय सरकार द्वारा किया जाएगा ।
[13. प्राधिकरण के लिए भूमि का अनिवार्य अर्जन-इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा अपने कृत्यों का निर्वहन करने के लिए अपेक्षित कोई भूमि, लोक प्रयोजन के लिए आवश्यक भूमि समझी जाएगी और प्राधिकरण के लिए ऐसी भूमि का अर्जन राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 (1956 का 48) के उपबंधों के अधीन किया जा सकेगा ।]
14. प्राधिकरण द्वारा संविदाएं-धारा 15 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, प्राधिकरण इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए आवश्यक कोई संविदा करने और उसे संपादित करने के लिए समक्ष होगा ।
15. प्राधिकरण की ओर से संविदाएं निष्पादित करने का ढंग-(1) प्राधिकरण की ओर से प्रत्येक संविदा प्राधिकरण के अध्यक्ष द्वारा या उसके ऐसे अन्य सदस्य द्वारा या ऐसे अधिकारी द्वारा की जाएगी जिसे प्राधिकरण इस निमित्त साधारणतया या विशिष्टतया सशक्त करे और ऐसी संविदाएं या ऐसे वर्ग को संविदाएं जैसी विनियमों में विनिर्दिष्ट की जाएं, प्राधिकरण की सामान्य मुद्रा से मुद्रांकित की जाएंगी :
परंतु इतने मूल्य या रकम से, जितनी केंद्रीय सरकार इस निमित्त विहित करे, अधिक की कोई संविदा तब तक नहीं की जाएगी जब तक उस सरकार द्वारा उसका पूर्वानुमोदन न कर दिया गया हो :
परंतु यह और कि स्थावर संपत्ति के अर्जन या विक्रय के लिए या ऐसी किसी संपत्ति के तीस वर्ष से अधिक की अवधि के पट्टे के लिए, कोई संविदा तथा इतने मूल्य या रकम से, जितनी केंद्रीय सरकार इस निमित्त विहित करे, अधिक की कोई अन्य संविदा तब तक नहीं की जाएगी जब तक केंद्रीय सरकार द्वारा उसका पूर्वानुमोदन न कर दिया गया हो ।
(2) उपधारा (1) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन की जाने वाली किसी संविदा का प्ररूप और रीति ऐसी होगी जैसी विनियमों द्वारा विहित की जाए ।
(3) कोई भी संविदा जो इस अधिनियम के उपबंधों और विनियमों के अनुसार नहीं है, प्राधिकरण पर आबद्धकर नहीं होगी ।
अध्याय 4
प्राधिकरण के कृत्य
16. प्राधिकरण के कृत्य-(1) इस निमित्त केंद्रीय सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए प्राधिकरण का कृत्य यह होगा कि वह राष्ट्रीय राजमार्गों तथा सरकार द्वारा उसमें निहित किए गए या उसे सौंपे गए अन्य किसी राजमार्ग का सन्निर्माण, अनुरक्षण और प्रबंध करे ।
(2) उपधारा (1) में अंतर्विष्ट उपबंधों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए,-
(क) उसमें निहित या उसे सौंपे गए राजमार्गों का सर्वेक्षण, विकास, अनुरक्षण और प्रबंध कर सकेगा ;
(ख) उसमें निहित या उसे सौंपे गए राजमार्गों पर या उनके निकट कार्यालय या कर्मशालाएं सन्निर्मित कर सकेगा और होटल, मोटल, उपाहारगृह और विश्रामकक्ष स्थापित कर सकेगा और उनका अनुरक्षण कर सकेगा ;
(ग) अपने कर्मचारियों के लिए निवास भवनों और नगरियों का सन्निर्माण कर सकेगा ;
(घ) राजमार्गों के उचित प्रबंध के लिए, उसमें निहित या उसे सौंपे गए राजमार्गों पर यानों के चलाए जाने को विनियमित और नियंत्रित कर सकेगा ;
(ङ) भारत और विदेश में परामर्शदात्री और निर्माण सेवाओं का विकास और व्यवस्था कर सकेगा और राजमार्गों के विकास, अनुरक्षण और प्रबंध के संबंध में या उन पर किन्हीं सुविधाओं के संबंध में अनुसंधान क्रियाकलाप चला सकेगा ;
(च) उसमें निहित या उसे सौंपे गए राजमार्गों के उपयोगकर्ताओं के लिए ऐसी सुविधाओं और प्रसुविधाओं की व्यवस्था कर सकेगा, जो प्राधिकरण की राय में ऐसे राजमार्गों पर यातायात के निर्बाध आवागमन के लिए आवश्यक हों ;
(छ) इस अधिनियम द्वारा उस पर अधिरोपित कृत्यों का अधिक दक्षतापूर्ण निर्वहन करने के लिए कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अधीन एक या अधिक कंपनियां बना सकेगा ;
[(ज) किसी व्यक्ति को अपने कृत्यों में से किसी कृत्य में ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो विहित की जाएं, लगा सकेगा या उसे सौंप सकेगा ;]
(झ) राजमार्गों से संबंधित विषयों के बारे में केंद्रीय सरकार को सलाह दे सकेगा ;
(ञ) राजमार्ग के विकास की स्कीम बनाने और उसे कार्यान्वित करने में किसी राज्य सरकार की ऐसे निबंधनों और शर्तों पर सहायता कर सकेगा, जिन पर पारस्परिक रूप में सहमति हो जाए ;
(ट) समय-समय पर यथासंशोधित राष्ट्रीय राजमार्ग अधिनियम, 1956 (1956 का 48) की धारा 7 के अधीन की गई सेवाओं या प्रदत्त फायदों के लिए केंद्रीय सरकार की ओर से फीस तथा राज्य सरकारों की ओर से ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जैसी उस राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट की जाएं, ऐसी अन्य फीस एकत्रित कर सकेगा ;
(ठ) ऐसे सभी कार्य कर सकेगा जो इस अधिनियम द्वारा प्राधिकरण की प्रदत्त किसी शक्ति के प्रयोग या उस पर अधिरोपित किसी कृत्य के निर्वहन के लिए आवश्यक या सुविधाजनक हो या उनके आनुषंगिक हों ।
(3) इस धारा में अंतर्विष्ट किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह,-
(क) प्राधिकरण द्वारा, तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की अवहेलना को प्राधिकृत करती है ; या
(ख) किसी व्यक्ति को किसी ऐसे कर्तव्य या दायित्व की बाबत, जिसके अधीन प्राधिकरण या उसके अधिकारी या अन्य कर्मचारी, इस अधिनियम के अधीन अन्यथा न हों, कोई कार्यवाही संस्थित करने के लिए प्राधिकृत करती है ।
अध्याय 5
वित्त, लेखा और लेखापरीक्षा
[17. केन्द्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण को अतिरिक्त पूंजी और अनुदान-केन्द्रीय सरकार, संसद् की विधि द्वारा इस निमित्त, किए गए सम्यक् विनियोग के पश्चात्,-
(क) किसी पूंजी का, जो प्राधिकरण द्वारा इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का निर्वहन करने के लिए या उससे संबंधित किसी प्रयोजन के लिए अपेक्षित हो, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो वह सरकार अवधारित करे, प्रबंध कर सकेगी ;
(ख) प्राधिकरण को, ऐसे निबंधनों और शर्तों पर जो केन्द्रीय सरकार अवधारित करे, उधार या अनुदानों के रूप में ऐसी धनराशि का संदाय कर सकेगी जो वह सरकार इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण द्वारा अपने कृत्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन के लिए आवश्यक समझे ।]
18. प्राधिकरण की निधि-(1) भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण निधि नामक एक निधि का गठन किया जाएगा और उसमें निम्नलिखित राशि जमा की जाएंगी, अर्थात् :-
(क) प्राधिकरण द्वारा प्राप्त कोई अनुदान या सहायता ;
(ख) प्राधिकरण द्वारा लिया गया कोई ऋण या उसके द्वारा लिया गया कोई उधार ;
(ग) प्राधिकरण द्वारा प्राप्त कोई अन्य राशि ।
(2) उक्त निधि का उपयोग निम्नलिखित को पूरा करने के लिए किया जाएगा, अर्थात् :-
(क) ऐसे अनुदानों, उधारों या ऋणों के प्रयोजनों को, जिनके लिए वे प्राप्त हुए हैं, ध्यान में रखते हुए, प्राधिकरण के कृत्यों के निर्वहन और उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक विषयों के लिए प्राधिकरण के लिए व्यय ;
(ख) प्राधिकरण के सदस्यों, अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों के लिए उपबंधित वेतन, भत्ते, अन्य पारिश्रमिक तथा सुविधाएं ;
(ग) इस अधिनियम द्वारा प्राधिकृत उद्देश्यों पर और प्रयोजनों के लिए व्यय ।
19. बजट-प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष में ऐसे समय पर और ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, आगामी वित्तीय वर्ष के लिए अपना बजट तैयार करेगा, जिसमें प्राधिकरण की प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दर्शित किए जाएंगे और इसे वह केंद्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा ।
20. निधियों का विनिधान-प्राधिकरण, अपनी निधियां (जिनके अंतर्गत कोई आरक्षित निधि है) का विनिधान, केंद्रीय सरकार की प्रतिभूतियों में अथवा ऐसी अन्य रीति से, जैसी विहित की जाए, कर सकेगा ।
21. प्राधिकरण की उधार लेने की शक्ति-(1) प्राधिकरण, इस अधिनियम के अधीन अपने सभी या किन्हीं कृत्यों के निर्वहन के लिए, केंद्रीय सरकार की सम्मति से या केंद्रीय सरकार द्वारा उसे दिए गए किसी साधारण या विशेष प्राधिकार के निबंधनों के अनुसार बंधपत्रों, डिबेंचरों या ऐसी ही अन्य लिखतों का, जैसी वह ठीक समझे, निर्गमन करके, किसी भी स्रोत से धन उधार ले सकेगा ।
(2) प्राधिकरण ऐसी सीमाओं के अधीन रहते हुए, जैसी केंद्रीय सरकार, समय-समय पर अधिकथित करे, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के निर्वहन के लिए अपेक्षित रकम, ओवर ड्राफ्ट के रूप में या अन्यथा अस्थायी रूप से उधार ले सकेगा ।
(3) केंद्रीय सरकार, प्राधिकरण द्वारा उपधारा (1) के अधीन लिए गए उधारों की बाबत, मूलधन के प्रतिसंदाय और उस पर ब्याज के संदाय को ऐसी रीति से, जैसी वह ठीक समझे, प्रत्याभूत कर सकेगी ।
22. वार्षिक रिपोर्ट-प्राधिकरण, प्रत्येक वित्तीय वर्ष के लिए ऐसे प्ररूप में और ऐसे समय पर, जो विहित किया जाए, अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा जिसमें वह पूर्ववर्ती वित्तीय वर्ष के दौरान अपने क्रियाकलाप का पूरा ब्यौरा देगा और ऐसी रिपोर्ट की एक प्रति केंद्रीय सरकार को प्रस्तुत करेगा ।
23. लेखा और लेखापरीक्षा-प्राधिकरण का लेखा, भारत के नियंत्रक महालेखापरीक्षक के परामर्श से, ऐसी रीति से रखा जाएगा और उसकी लेखापरीक्षा ऐसे की जाएगी जो विहित की जाए तथा प्राधिकरण ऐसे लेखाओं की एक लेखापरीक्षित प्रति, तत्संबंधी लेखापरीक्षक की रिपोर्ट के साथ, ऐसी तारीख से पूर्व, जो विहित की जाए, केंद्रीय सरकार को भेजेगा ।
24. वार्षिक रिपोर्ट और लेखापरीक्षक की रिपोर्ट का संसद् के समक्ष रखा जाना-केंद्रीय सरकार संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष वार्षिक रिपोर्ट और लेखापरीक्षकों की रिपोर्ट, उनके प्राप्त होने के पश्चात् यथाशीघ्र, रखवाएगी ।
अध्याय 6
प्रकीर्ण
25. शक्तियों का प्रत्यायोजन-प्राधिकरण साधारण या विशेष लिखित आदेश द्वारा प्राधिकरण के अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या किसी अधिकारी को ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के, यदि कोई हों, अधीन रहते हुए, जो आदेश में विनिर्दिष्ट की जाए, इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों और कृत्यों (धारा 36 के अधीन शक्तियों को छोड़कर) का प्रत्यायोजन, जिन्हें प्रत्यायोजित करना वह आवश्यक समझे, कर सकेगा ।
26. प्राधिकरण के आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणन-प्राधिकरण के सभी आदेश, विनिश्चय और अन्य लिखतें अध्यक्ष या किसी अन्य सदस्य या प्राधिकरण के किसी ऐसे अधिकारी के हस्ताक्षर से अधिप्रमाणित किए जाएंगे जो प्राधिकरण द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया गया हो ।
27. प्राधिकरण के कर्मचारियों का लोक सेवक होना-प्राधिकरण के सभी सदस्य, अधिकारी और कर्मचारी, जब वे इस अधिनियम के या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या विनियम के उपबंधों के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या उनका ऐसे कार्य करना तात्पर्यित हो, तब भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
28. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या विनियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या करने के लिए आशयित किसी बात के लिए, कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही प्राधिकरण के अथवा प्राधिकरण के किसी सदस्य के या अधिकारी के या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध न होगी ।
(2) इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम या विनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या किए जाने के लिए आशयित किसी बात से हुए या संभाव्य किसी नुकसान के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या कोई अन्य विधिक कार्यवाही प्राधिकरण के अथवा प्राधिकरण के किसी सदस्य के या किसी अधिकारी के या अन्य कर्मचारी के विरुद्ध नहीं होगी ।
29. कतिपय संकर्मों का भार ग्रहण करने की प्राधिकरण की शक्ति-प्राधिकरण, केंद्रीय या राज्य सरकार या किसी स्थानीय प्राधिकारी की ओर से किन्हीं संकर्मों या सेवाओं या संकर्मों या सेवाओं के किसी वर्ग को कार्यान्वित करने का भार ऐसे निबंधनों और शर्तों पर ग्रहण कर सकेगा जो प्राधिकरण और संबंधित सरकार या स्थानीय प्राधिकरण के बीच तय पाई जाएं ।
30. प्रवेश करने की शक्ति-इस निमित्त बनाए गए विनियमों के अधीन रहते हुए, प्राधिकरण द्वारा साधारण या विशेष रूप से इस निमित्त प्राधिकृत कोई व्यक्ति, जब कभी इस अधिनियम के प्रयोजनों में से किसी के लिए ऐसा करना आवश्यक हो, सभी युक्तियुक्त समयों पर किसी भूमि या परिसर में प्रवेश कर सकेगा, और :-
(क) निरीक्षण, सर्वेक्षण, माप, मूल्यांकन या जांच कर सकेगा;
(ख) तलमाप ले सकेगा ;
(ग) खोद सकेगा या अवमृदा के भीतर वेधन कर सकेगा ;
(घ) संकर्म की सीमाएं और आशयित रेखाएं लगा सकेगा ;
(ङ) चिह्न लगाकर और खाइयां खोदकर ऐसा तल, सीमा रेखाएं और रेखाएं चिह्नित कर सकेगा ; या
(च) ऐसे अन्य कार्य या बात कर सकेगा, जो विहित की जाए :
परंतु ऐसा कोई व्यक्ति किसी सीमा के भीतर या निवास गृह से संलग्न, किसी घिरे आंगन या बाग में प्रवेश करने के अपने आशय की कम से कम चौबीस घंटे की लिखित सूचना ऐसे अधिभोगी को पहले ही दिए बिना (ऐसा करने के लिए उसके अधिभोगी की सहमति के सिवाय) प्रवेश नहीं करेगा ।
31. किसी राष्ट्रीय राजमार्ग के प्रबंध से प्राधिकरण को अस्थायी रूप से वंचित करने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि किसी समय केंद्रीय सरकार की यह राय है कि लोक हित में ऐसा करना आवश्यक या समीचीन है तो वह, आदेश द्वारा, प्राधिकरण को निदेश दे सकेगी कि वह किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग का विकास, अनुरक्षण या प्रबंध उस तारीख से और ऐसी अवधि के लिए और ऐसे व्यक्ति को, जो आदेश में विनिर्दिष्ट किया जाए, सौंप दे और प्राधिकरण ऐसे निदेश का अनुपालन करने के लिए आबद्ध होगा ।
(2) जहां किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग का विकास, अनुरक्षण या प्रबंध उपधारा (1) के अधीन विनिर्दिष्ट किसी व्यक्ति को (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् प्राधिकृत व्यक्ति कहा गया है), सौंपा जाता है वहां प्राधिकरण ऐसे राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के संबंध में इस अधिनियम के अधीन अपनी किन्हीं भी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन नहीं करेगा और प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा ऐसी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन ऐसे अनुदेशों के, यदि कोई हों, अनुसार किया जाएगा, जो प्राधिकृत व्यक्ति को केंद्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर दिए जाएं :
परंतु प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा केंद्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी के बिना ऐसी किसी शक्ति का प्रयोग या कृत्य का निर्वहन नहीं किया जाएगा जिसे केंद्रीय सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, विनिर्दिष्ट करे ।
(3) केंद्रीय सरकार, उपधारा (1) में वर्णित अवधि को जैसा वह आवश्यक समझे घटा या बढ़ा सकेगी ।
(4) उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश के प्रवर्तन के दौरान, केंद्रीय सरकार इस बात के लिए सक्षम होगी कि वह प्राधिकरण को समय-समय पर ऐसे निदेश दे जो उस राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के संबंध में, जिसका प्रबंध प्राधिकृत व्यक्ति को सौंपा गया है, उस प्राधिकृत व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण की शक्तियों का प्रयोग करने और कृत्यों का निर्वहन करने में समर्थ बनाने के लिए और, विशिष्टतया राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के प्रबंध के लिए प्राधिकरण की निधि से कोई धनराशि उस प्राधिकृत व्यक्ति को अंतरित करने के लिए, आवश्यक हों और प्राधिकरण ऐसे प्रत्येक निदेश का अनुपालन करेगा ।
(5) किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के संबंध में उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश के प्रवर्तन की समाप्ति पर, प्राधिकृत व्यक्ति ऐसे राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के संबंध में इस अधिनियम के अधीन प्राधिकरण की शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन नहीं करेगा और प्राधिकरण इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार ऐसी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का निर्वहन करना जारी रखेगा ।
(6) किसी राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के संबंध में उपधारा (1) के अधीन किए गए किसी आदेश के प्रवर्तन की समाप्ति पर, प्राधिकृत व्यक्ति ऐसी कोई संपत्ति (जिसके अंतर्गत कोई धनराशि या अन्य आस्ति भी है) जो ऐसे राष्ट्रीय राजमार्ग या उसके किसी भाग के प्रबंध के संबंध में उसके पास शेष रही है, प्राधिकरण को सौंप देगा ।
32. प्राधिकरण को अतिष्ठित करने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-(1) यदि किसी समय, केंद्रीय सरकार की यह राय है कि-
(क) गंभीर आपात के कारण प्राधिकरण के उपबंधों द्वारा या इनके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों का निर्वहन करने में असमर्थ है ; या
(ख) प्राधिकरण ने केंद्रीय सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन जारी किए गए किसी निदेश के अनुपालन में या इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उसके अधीन उस पर अधिरोपित कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में बार-बार व्यतिक्रम किया है ; या
(ग) ऐसी परिस्थितियां विद्यमान हैं, जिनके कारण लोकहित में ऐसा करना आवश्यक है,
तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, अधिक से अधिक एक वर्ष की इतनी अवधि के लिए, जितनी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, प्राधिकरण को अतिष्ठित कर सकेगी :
परंतु खंड (ख) में वर्णित कारणों से इस उपधारा के अधीन कोई अधिसूचना जारी करने से पूर्व, केंद्रीय सरकार, प्राधिकरण को यह कारण दर्शित करने के लिए उचित अवसर देगी कि उसे क्यों न अतिष्ठित कर दिया जाए और वह प्राधिकरण के स्पष्टीकरण और आपत्तियों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन प्राधिकरण को अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर,-
(क) सभी सदस्य, अतिष्ठन की तारीख से, उस रूप में अपने पद रिक्त कर देंगे ;
(ख) उन सभी शक्तियों, कृत्यों और कर्तव्यों का, जिनका प्रयोग या निर्वहन इस अधिनियम के उपबंधों द्वारा या उनके अधीन प्राधिकरण द्वारा या उसकी ओर से किया जा सकता है प्रयोग या निर्वहन, जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता, तब तक ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों द्वारा जिन्हें केंद्रीय सरकार निदेश दे, किया जाएगा ;
(ग) जब तक उपधारा (3) के अधीन प्राधिकरण का पुनर्गठन नहीं कर दिया जाता, तब तक के लिए प्राधिकरण के स्वामित्व या नियंत्रण के अधीन सभी संपत्ति केंद्रीय सरकार में निहित होगी ।
(3) उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठन की अवधि की समाप्ति पर केंद्रीय सरकार-
(क) अतिष्ठन की अवधि को इतनी और अवधि के लिए, जो एक वर्ष से अधिक नहीं होगी, बढ़ा सकेगी जितनी वह आवश्यक समझे ; या
(ख) नई नियुक्ति द्वारा प्राधिकरण का पुनर्गठन कर सकेगी और ऐसी दशा में वे व्यक्ति जिन्होंने उपधारा (2) के खंड (क) के अधीन अपने पदों को रिक्त किया था, नियुक्ति के लिए निरर्हित नहीं समझे जाएंगे :
परंतु केंद्रीय सरकार उपधारा (1) या उपधारा (3) के अधीन मूलतः विनिर्दिष्ट अथवा इस उपधारा के अधीन बढ़ाई गई अतिष्ठन की अवधि की समाप्ति के पूर्व किसी समय इस उपधारा के खंड (ख) के अधीन कार्रवाई कर सकेगी ।
(4) केंद्रीय सरकार, उपधारा (1) के अधीन जारी की गई अधिसूचना को और इस धारा के अधीन की गई किसी कार्रवाई की तथा उन परिस्थितियों की, जिनके कारण ऐसी कार्रवाई की गई थी, पूरी रिपोर्ट यथाशक्य शीघ्र संसद् के दोनों सदनों के समक्ष रखवाएगी ।
33. निदेश जारी करने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-(1) इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों और कर्तव्यों के निर्वहन में नीति के प्रश्नों पर ऐसे निदेशों से आबद्ध होगा जैसे केंद्रीय सरकार लिखित रूप में समय-समय पर उसे दे ।
(2) इस बाबत कि कोई प्रश्न नीति के बारे में है या नहीं, केंद्रीय सरकार का विनिश्चय अंतिम होगा ।
34. विनियम बनाने की केंद्रीय सरकार की शक्ति-(1) केंद्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबंध कर सकेंगे :-
(क) सदस्यों की पदावधि और सेवा की अन्य शर्तें ;
(ख) अध्यक्ष और सदस्यों की शक्तियां और कर्तव्य ;
(ग) वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन रहते हुए राष्ट्रीय राजमार्ग के प्रयोजनों के लिए या उसके संबंध में केंद्रीय सरकार द्वारा या उसके लिए उपगत अनावर्ती व्यय, धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (ख) के अधीन केंद्रीय सरकार द्वारा प्राधिकरण के लिए उपबंधित पूंजी के रूप में माना जाएगा ;
(घ) धारा 15 की उपधारा (1) के अधीन विहित किए जाने के लिए अपेक्षित मूल्य या रकम ;
[(घघ) वे निबंधन और शर्तें जिनके अधीन प्राधिकरण के कृत्य धारा 16 की उपधारा (2) के खंड (ज) के अधीन किसी व्यक्ति को सोंपे जाएं ;]
(ङ) वह प्ररूप जिसमें और वह समय जिसके भीतर प्राधिकरण धारा 19 के अधीन अपना बजट और धारा 22 के अधीन अपनी वार्षिक रिपोर्ट तैयार करेगा ;
(च) वह रीति जिसमें प्राधिकरण धारा 20 के अधीन अपनी निधि को विनिहित कर सकेगा ;
(छ) वह रीति जिसमें प्राधिकरण के लेखे धारा 23 के अधीन रखे जाएंगे और उनकी लेखा परीक्षा करवाई जाएगी तथा वह तारीख जिसके पूर्व लेखाओं की संपरीक्षित प्रति तथा उस पर लेखा परीक्षक की रिपोर्ट, केंद्रीय सरकार को भेजी जाएगी ;
(ज) धारा 30 के अधीन प्रवेश करने की शक्ति के प्रयोग से संबंधित शर्तें और निर्बंधन और उस धारा के खंड (च) में निर्दिष्ट विषय ;
(झ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना अपेक्षित है या किया जाए ।
35. विनियम बनाने की प्राधिकरण की शक्ति-(1) प्राधिकरण, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और इसके अधीन बनाए गए नियमों से असंगत न हो ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किसी विषय के लिए उपबंध कर सकेंगे, अर्थात् :-
(क) प्राधिकरण के अधिवेशन के लिए समय और स्थान, और ऐसे अधिवेशनों में किए जाने वाले कारबार के संव्यवहार में अनुसरण की जाने वाली प्रक्रिया ;
(ख) प्राधिकरण द्वारा नियुक्त किए गए अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों की सेवा के निबंधन और शर्तें, भर्ती की पद्धति और पारिश्रमिक ;
(ग) वह प्ररूप जिसमें और वह रीति जिससे प्राधिकरण द्वारा कोई संविदा की जा सकेगी और वे संविदाएं या संविदाओं के वे वर्ग, जिन्हें प्राधिकरण की सामान्य मुद्रा से मुद्रांकित किया जाना है ;
(घ) राष्ट्रीय राजमार्ग के सामान्य कार्यकरण के लिए उसके ऊपर की बाधाओं को निवारित करने की रीति ;
(ङ) राष्ट्रीय राजमार्ग पर, प्राधिकरण द्वारा विनिर्दिष्ट स्थानों से भिन्न स्थानों पर, किसी यान या गाड़ी के ठहरने या प्रतीक्षा में रखने के प्रतिषेध की रीति ;
(च) राष्ट्रीय राजमार्ग के किसी भाग तक पहुंच को प्रतिषिद्ध या निर्बंधित करने की रीति ;
(छ) राष्ट्रीय राजमार्ग पर और उसके आसपास विज्ञापन के विनियमन या निर्बंधन की रीति; और
(ज) साधरणतः, राष्ट्रीय राजमार्गों का दक्ष और उचित प्रबंध और अनुरक्षण के लिए ।
36. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावशील करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केंद्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसा आदेश जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हों, कर सकेगी और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों :
परंतु ऐसा कोई भी आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) उस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
37. नियमों और विनियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम या विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह नियम या विनियम ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम या विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु उस नियम या विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
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