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सड़क परिवहन निगम अधिनियम, 1950 ( Road Transport Corporations Act, 1950 )


 

सड़क परिवहन निगम अधिनियम, 1950

(1950 का अधिनियम संख्यांक 64)

[4 दिसम्बर, 1950]

सड़क परिवहन निगमों के निगमन और विनियमन

का उपबन्ध करने के लिए

अधिनियम

संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

अध्याय 1

प्रारम्भिक

1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम सड़क परिवहन निगम अधिनियम, 1950 है ।

(2) इसका विस्तार  ***सम्पूर्ण भारत पर है ।

 [परन्तु दिल्ली सड़क परिवहन विधि (संशोधन) अधिनियम, 1971 के प्रारम्भ पर और से उक्त अधिनियम द्वारा यथा संशोधित इस अधिनियम का विस्तार दिल्ली संघ राज्यक्षेत्र पर हो जाएगा और यह वहां प्रवृत्त होगा ।]

 [परन्तु यह और कि सड़क परिवहन निगम (संशोधन) अधिनियम, 1982 के प्रारम्भ पर और से उक्त अधिनियम द्वारा तथा संशोधित इस अधिनियम का विस्तार मिजोरम संघ राज्यक्षेत्र पर हो जाएगा ।]

(3) यह किसी राज्य में ऐसी तारीख  को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा ऐसे राज्य के लिए इस निमित्त नियत करे और विभिन्न राज्यों के लिए विभिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

(क) “अनुषंगी सेवा" से किसी निगम की किसी सड़क परिवहन सेवा का उपयोग करने वाले व्यक्तियों को           सुख-सुविधाएं या सुविधाएं देने वाली कोई समनुषंगी सेवा अभिप्रेत है;

 [(कक) “बोर्ड" से निगम का निदेशक बोर्ड अभिप्रेत है;]

(ख) “निगम" से धारा 13 के अधीन स्थापित सड़क परिवहन निगम का निदेशक बोर्ड अभिप्रेत है;

1[(खख) “निदेशक" से बोर्ड का सदस्य अभिप्रेत है;]

(ग) “विस्तारित क्षेत्र" से ऐसा कोई क्षेत्र या रास्ता (प्रयाण मार्ग) अभिप्रेत है, जिस पर निगम की किसी सड़क परिवहन सेवा का प्रचालन धारा 20 में उपबंधित रीति से विस्तारित कर दिया गया है;

(घ)” विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ङ) “सड़क परिवहन सेवा" से, किराए या पारितोषिक के लिए यान में सड़क द्वारा यात्रियों या माल या दोनों को, ले जाने की सेवा अभिप्रेत है;

(च) “यान" से ऐसा यंत्र-नोदित यान अभिप्रेत है, जो सड़क परिवहन के प्रयोजन के लिए उपयोग किया जाता है या उपयोग किए जाने के योग्य है और इसके अन्तर्गत ट्राम-कार (ट्राम गाड़ी), ट्रालीयान (गाड़ी) और ट्रेलर हैं;

(छ) इस अधिनियम में जो शब्द और पद प्रयुक्त हैं किन्तु परिभाषित नहीं हैं और मोटर यान अधिनियम, 1939 (1939 का 4) में परिभाषित हैं उनके वही अर्थ हैं जो उन्हें उस अधिनियम में दिए गए हैं ।

 ।                                             ।                                              ।                                              ।                                              ।

अध्याय 2

सड़क परिवहन निगम

                3. राज्यों में सड़क परिवहन निगमों की स्थापना-राज्य सरकार-

                                (क) सड़क परिवहन के विकास द्वारा जनता, व्यापार और उद्योग को पहुंचाए जाने वाले फायदों;

                                (ख) किसी प्रकार के सड़क परिवहन को किसी अन्य प्रकार के परिवहन से समन्वयन की वांछनीयता; 

(ग) किसी क्षेत्र में सड़क परिवहन के लिए सुविधाओं को विस्तृत और उनमें सुधार करने तथा वहां पर दक्ष और मित्तव्ययी सड़क परिवहन प्रणाली की व्यवस्था करने की वांछनीयता,

को ध्यान में रखते हुए, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा राज्य के पूरे या किसी भाग के लिए ऐसे नाम का, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किया जाए, एक सड़क परिवहन निगम स्थापित कर सकेगी ।

4. निगमन-प्रत्येक निगम, धारा 3 के अधीन अधिसूचित नाम का एक निगमित निकाय होगा, जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और उस नाम से वह वाद ला सकेगा और उन पर वाद लाया जा सकेगा ।

 [5. निगम और निदेशक बोर्ड का प्रबंध-(1) निगम के कार्यकलाप और कामकाज का साधारण अधीक्षण, निदेशन और प्रबंध एक निदेशक बोर्ड में निहित होगा जो अपनी समितियों और प्रबंध निदेशक की सहायता से ऐसी सभी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे सभी कार्य और बातें कर सकेगा जिनका निगम द्वारा प्रयोग किया जा सकता है या जो निगम द्वारा की जा सकती है ।

(2) बोर्ड एक अध्यक्ष और पांच से अन्यून और सत्रह से अनधिक उतने अन्य निदेशकों से मिलकर बनेगा जितने राज्य सरकार नियुक्त करना ठीक समझे ।

(3) यदि राज्य सरकार ऐसा करना ठीक समझे तो वह अन्य निदेशकों में से एक को बोर्ड का उपाध्यक्ष नियुक्त कर सकेगी ।

(4) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम, बोर्ड में केन्द्रीय सरकार और सम्बन्धित राज्य सरकार दोनों का, ऐसे अनुपात में, जो दोनों सरकारों द्वारा तय पाया जाए, प्रतिनिधित्व किए जाने के लिए और उसमें हर एक सरकार द्वारा अपने-अपने प्रतिनिधियों की नियुक्ति की जाने के लिए उपबंध करेंगे, और जहां धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन अन्य पक्षकारों को शेयरों के निर्गमन द्वारा निगम की पूंजी समुत्थापित की जाती है वहां बोर्ड में ऐसे शेयरधारकों के प्रतिनिधित्व के लिए और उस रीति के लिए जिससे ऐसे शेयरधारकों द्वारा प्रतिनिधि निर्वाचित किए जाएंगे, उपबंध भी किया जाएगा ।

(5) निदेशकों की पदावधि और उनमें हुई आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति ऐसी होगी जैसी विहित की जाए ।]

6.  [निगम का निदेशक] होने या चुने जाने के लिए अनर्हता-1[(1)]  [निगम का निदेशक] होने या चुने जाने के लिए कोई व्यक्ति अनर्ह होगा,-

                (क) यदि वह पागल या विकृतचित्त व्यक्ति पाया जाता है; या

(ख) यदि उसे दिवालिया न्यायनिर्णीत कर दिया जाता है; या

(ग) यदि वह नैतिक अधमता वाले अपराध के लिए दोषसिद्ध ठहराया गया है; या

(घ) यदि उसने निगमित कम्पनी में (निदेशक से भिन्न) अंश (शेयर) धारक की हैसियत के सिवाय निगम से या उसके लिए कोई काम किए जाने के लिए संविदा की है, परन्तु जहां कि वह अंश (शेयर) धारक है वहां वह अपने द्वारा ऐसी कम्पनी में धृत अंशों (शेयरों) का स्वरूप और परिमाण राज्य सरकार पर प्रकट करेगा; या

(ङ) यदि वह किसी अन्य सड़क परिवहन उपक्रम में वित्तीय हित रखता है ।

 [(2) उपधारा (1) के खण्ड (घ) की कोई भी बात, निगम के  [प्रबन्ध निदेशक] को उसका एक  [निदेशक] होने या चुने जाने के लिए अनर्ह करने वाली नहीं समझी जाएगी ।]

 [(3) उपधारा (1) के खण्ड (ङ) की किसी बात की बाबत यह नहीं समझा जाएगा कि वह-

(क) सरकार के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को निगम का निदेशक चुने जाने या होने के लिए;

(ख) निगम के किसी अधिकारी या अन्य कर्मचारी को किसी अन्य निगम का निदेशक चुने जाने या होने के लिए,

निरर्हित करती है ।]

7. अध्यक्ष या  [निदेशक] द्वारा पद का त्याग-निगम का अध्यक्ष या कोई अन्य 4[निदेशक] राज्य सरकार को लिखित सूचना देकर अपने पद का त्याग कर सकेगा और उसके बारे में यह समझा जाएगा कि उस सरकार द्वारा ऐसे त्याग-पत्र की मंजूरी पर उसने अपना पद रिक्त कर दिया है ।

8. अध्यक्ष और  [निदेशकोंट का पद से हटाया जाना- [(1)] राज्य सरकार, निगम के ऐसे अध्यक्ष या किसी अन्य 8[निदेशक] का पद से हटा सकेगा जो-

                (क) धारा 6 में उल्लिखित किन्हीं निरर्हताओं से ग्रस्त है या हो जाता है; या

(ख) राज्य सरकार की राय में पर्याप्त प्रतिहेतु के बिना  [बोर्ड] की क्रमवर्ती चार से अधिक बैठकों से अनुपस्थित रहा है :

                परन्तु केन्द्रीय सरकार द्वारा  [नियुक्त] कोई भी 11[निदेशक] उस सरकार की सहमति के बिना अपने पद से हटाया              नहीं जाएगा ।

6[(2) राज्य सरकार किसी निदेशक की नियुक्ति, उसको ऐसी अवधि की सूचना देने के पश्चात् जो विहित की जाए किन्तु जो एक मास से कम की नहीं होगी), समाप्त कर सकेगी :

परन्तु केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए गए किसी निदेशक की नियुक्ति को, उस सरकार की सहमति के बिना, इस उपधारा के अधीन समाप्त नहीं किया जाएगा ।]

9. सदस्यों की रिक्तियां या गठन में कोई त्रुटि,  [निगम या उसके बोर्ड] के कार्यों या कार्यवाहियों को अविधिमान्य            नहीं करेगी-12[निगम या उसके बोर्ड] का कोई भी कार्य या कार्यवाही  [उसके बोर्ड में] कोई रिक्ति विद्यमान होने या उसके गठन में कोई त्रुटि होने के कारण ही अविधिमान्य नहीं होगी ।

10. विशेष प्रयोजनों के लिए व्यक्तियों का  [बोर्ड] के साथ अस्थायी रूप से सहयुक्त किया जाना-(1) 1[बोर्ड] किसी व्यक्ति को, जिसकी सहायता या सलाह की उसे वांछा है, किसी विशेष प्रयोजन के लिए, ऐसी रीति से जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं, अपने साथ सहयुक्त कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) के अधीन किसी प्रयोजन के लिए 1[बोर्ड] के साथ सहयुक्त किए गए व्यक्ति को, उस प्रयोजन से सम्बन्धित 1[बोर्ड] के विचार-विमर्श में भाग लेने का अधिकार होगा किन्तु उसे 1[बोर्ड] की बैठक में मत देने का अधिकार नहीं होगा ।

11. 1[बोर्ड] के अधिवेशन-(1) 1[बोर्ड] का अधिवेशन ऐसे समय और स्थानों पर होगा और उपधारा (2) और (3) के उपबंधों के अधीन रहते हुए, अपने अधिवेशनों के कामकाज के संव्यवहार में प्रक्रिया के ऐसे नियमों का अनुपालन करेगा, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा उपबन्धित किए जाएं :

परन्तु 1[बोर्ड] हर तीन मास में कम से कम एक बार अपना अधिवेशन करेगा ।

 (2) 1[बोर्ड] के अधिवेशनों में सभापतित्व उसका अध्यक्ष करेगा अथवा उसकी अनुपस्थिति में उसका उपाध्यक्ष, यदि कोई हो, करेगा अथवा यदि अध्यक्ष और उपाध्यक्ष दोनों अनुपस्थित हों तो  [ऐसा निदेशक करेगा जिसे उपस्थित निदेशकों ने] सभापतित्व करने के लिए अपने में से चुना हो ।

(3) 1[बोर्ड] की बैठक में सभी प्रश्न उपस्थित सदस्यों के बहुमत से विनिश्चित किए जाएंगे और मतों के बराबर होने की दशा में, अध्यक्ष का या उसकी अनुपस्थिति में सभापतित्व करने वाले किसी अन्य व्यक्ति का दूसरा या निर्णायक मत होगा ।

12. समितियां नियुक्त करने और कृत्यों के प्रत्यायोजित करने की शक्ति- [(1)]  [बोर्ड] समय-समय पर अपनी बैठक में पारित संकल्प द्वारा-

(क) ऐसे कृत्यों को करने के लिए, जो उस संकल्प में विनिर्दिष्ट किए जाएं,  [निदेशकों से गठित होने वाली समितियांट नियुक्त कर सकेगा;

(ख) ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जो उस सकंल्प में विनिर्दिष्ट की जाएं, किसी ऐसी समिति या अध्यक्ष या उपाध्यक्ष को अपनी ऐसी शक्तियां और कर्तव्य, जो वह उचित समझे, प्रत्यायोजित कर सकेगा;

(ग) अपने कारबार के प्रतिदिन के दक्ष प्रशासन के लिए, ऐसी शर्तों और परिसीमाओं के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जो उस संकल्प में विनिर्दिष्ट की जाएं,  [प्रबन्ध निदेशक]  [या निगम के किसी अन्य अधिकारी को] ऐसी शक्तियों के प्रयोग और ऐसे कर्तव्य करने के लिए, जैसा वह आवश्यक समझे, प्राधिकृत कर सकेगा ।

 [(2) अध्यक्ष, उपाध्यक्ष या प्रबन्ध निदेशक अपनी शक्तियों और कर्तव्यों में से जिनके अन्तर्गत उपधारा (1) के अधीन उसे प्रत्यायोजित शक्तियां और कर्तव्य भी हैं] कोई शक्तियां और कर्तव्य निगम के किसी भी अधिकारी को प्रत्यायोजित कर सकेगा, तथा वह अधिकारी जिसे ऐसी शक्तियां और कर्तव्य प्रत्यायोजित किए जाते हैं, ऐसी शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन, प्रबन्ध निदेशक के नियंत्रण और पर्यवेक्षण के अधीन करेगा ।]

 [13. आदेशों और अन्य लिखतों का अधिप्रमाणीकरण-बोर्ड के सभी आदेश और विनिश्चय निगम के सचिव के हस्ताक्षर द्वारा या उसके किसी अन्य ऐसे अधिकारी द्वारा, जो बोर्ड द्वारा इस निमित्त या धारा 45 के अधीन बनाए गए विनियमों के अधीन प्राधिकृत किया जाए, अधिप्रमाणित किए जाएंगे, तथा बोर्ड द्वारा जारी की गई अन्य सभी लिखतें प्रबन्ध निदेशक या निगम के इस निमित्त उसी रीति से प्राधिकृत किसी अन्य अधिकारी के हस्ताक्षर द्वारा अधिप्रमाणित की जाएंगी ।]

14. निगम के अधिकारी और सेवक- [(1) हर निगम का राज्य सरकार द्वारा नियुक्त एक प्रबन्ध निदेशक, एक मुख्य लेखा अधिकारी और एक वित्त सलाहकार होगा :]

परन्तु एक ही व्यक्ति को मुख्य लेखा अधिकारी और वित्त सलाहकार नियुक्त किया जा सकेगा ।]

(2) निगम अपने कृत्यों के दक्ष पालन के लिए  [एक सचिव और ऐसे अन्य अधिकारी और कर्मचारी] नियुक्त कर सकेगा जैसे वह आवश्यक समझे ।

 [(3) निगम के अधिकारियों और कर्मचारियों की नियुक्ति और सेवा की शर्तें और वेतनमान-

(क) यथास्थिति, प्रबन्ध निदेशक, मुख्य लेखा अधिकारी और वित्त सलाहकार या मुख्य लेखा अधिकारी-सह-वित्त सलाहकार के संबंध में ऐसे होंगे जो विहित किए जाएं, और

(ख) अन्य अधिकारियों और कर्मचारियों के संबंध में ऐसे होंगे जो धारा 34 के उपबंधों के अधीन रहते हुए, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा अवधारित किए जाएं ।]

 [15. प्रबन्ध निदेशक, मुख्य लेखा अधिकारी और वित्त सलाहकार-(1) प्रबन्ध निदेशक, निगम का कार्यपालक प्रधान होगा और निगम के सभी अन्य अधिकारी और कर्मचारी उसके अधीनस्थ होंगे ।

(2) प्रबन्ध निदेशक ऐसी हर प्रस्थापना पर, जिसमें निगम के राजस्व या उसकी निधि में से व्यय अन्तर्वलित है, यथास्थिति, मुख्य लेखा अधिकारी और वित्त सलाहकार अथवा मुख्य लेखा अधिकारी-सह-वित्त सलाहकार के विचार अभिप्राप्त करेगा तथा इसके पूर्व कि बोर्ड ऐसी प्रस्थापना पर विचार करे, ऐसे विचार बोर्ड के समक्ष रखवाएगा ।]

16. सभी अधिकारियों और सेवकों की साधारण अनर्हता-जो कोई व्यक्ति निगम के द्वारा या उसकी ओर से की गई संविदा में अथवा किसी अन्य सड़क परिवहन उपक्रम में कोई अंश (शेयर) या हित चाहे तो स्वयं, चाहे अपने भागीदार या अभिकर्ता के जरिए प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः रखता है, वह निगम का  [अधिकारी या अन्य कर्मचारी] न तो होगा और न बना रहेगा ।

17. सलाहकार परिषद की नियुक्ति-राज्य सरकार, निगम के विचार अभिनिश्चित करने के पश्चात् राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इतने व्यक्तियों से मिलकर बनने वाली एक या अधिक सलाहकार परिषदें, ऐसे निबन्धनों पर और निगम को ऐसे विषयों पर, जो उस अधिसूचना में विनिर्दिष्ट किए जाएं, सलाह देने के प्रयोजन से गठित कर सकेगी ।

[अध्याय 2

समनुषंगी निगम

17क. समनुषंगी निगमों की स्थापना-(1) जहां किसी निगम का (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् मूल निगम कहा गया है) यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों के अधिक दक्ष निर्वहन के लिए ऐसा करना समीचीन या आवश्यक है, वहां वह राज्य सरकार और केन्द्रीय सरकार की सहमति से, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी स्कीम या स्कीमें विरचित कर सकेगा जो एक या अधिक समनुषंगी निगमों की स्थापना का उपबन्ध करती है ।

(2) उपधारा (1) के अधीन विरचित स्कीम में उस या उन समनुषंगी निगम या निगमों का, जो उसके अधीन स्थापित हो जाएंगी, उस तारीख या उन तारीखों का जिससे या जिनसे वे ऐसे स्थापित की जाएंगी, मूल निगम की उन शक्तियों और कृत्यों का, जिनका ऐसा या ऐसे समनुषंगी निगम प्रयोग और निवर्हन कर सकेंगे, उन शर्तों और परिसीमाओं का जिनके अधीन रहते हुए ऐसी शक्तियों का प्रयोग किया जा सकेगा, ऐसे प्रत्येक समनुषंगी निगम के कार्यकलाप के निदेशक बोर्ड द्वारा प्रबन्धकरण का, ऐसे प्रत्येक समनुषंगी निगम की पूंजी का तथा उन विभिन्न विषयों के, जिनके लिए इस अधिनियम में मूल निगम की बाबत उपबन्ध किए गए हैं, तत्स्थानी ऐसे समनुषंगी निगमों से संबंधित सभी अन्य विषयों का विनिर्देश होगा :

परन्तु-

(क) कोई समनुषंगी निगम किसी नए रूट पर, मूल निगम के पूर्व अनुमोदन के बिना, प्रचालन आरम्भ नहीं करेगा;

(ख) किसी समनुषंगी निगम के निदेशक बोर्ड में केन्द्रीय सरकार के प्रतिनिधि, मूल निगम की पूंजी में उसके अभिदाय के अनुपात में होंगे;

(ग) समनुषंगी निगम की पूंजी में या मूल निगम में अभिदाय करने के केन्द्रीय सरकार के दायित्व में, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के बिना, वृद्धि नहीं की जाएगी;

(घ) समनुषंगी निगम में एक प्रबन्ध निदेशक, एक मुख्य लेखा अधिकारी और एक वित्त सलाहकार या एक मुख्य लेखा अधिकारी-सह-वित्त सलाहकार होंगे तथा ऐसे अधिकारी राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे;

(ङ) राज्य सरकार और मूल निगम को किसी विषय की बाबत किसी समनुषंगी निगम को निदेश देने की शक्ति होगी, जिनके अन्तर्गत समनुषंगी निगम के कर्मचारियों की भर्ती, सेवा की शर्तों और प्रशिक्षण से संबंधित निदेश, ऐसे कर्मचारियों को संदाय की जाने वाली मजदूरी और समनुषंगी निगम द्वारा रखी जाने वाली आरक्षित निधियां भी हैं,

(च) समनुषंगी निगम का पूंजी बजट, राजस्व बजट और वार्षिक विकास योजनाएं मूल निगम को अनुमोदन के लिए प्रस्तुत की जाएंगी और जहां ऐसे बजट या योजना में कोई कमी अन्तर्वलित हो, वहां, वे राज्य सरकार को भी अनुमोदन के लिए प्रस्तुत की जाएंगी ।

                (3) उपधारा (1) के अधीन विरचित स्कीम के अधीन स्थापित प्रत्येक समनुषंगी निगम, स्कीम में विनिर्दिष्ट नाम से निगमित निकाय होगा जिसका शाश्वत उत्तराधिकार और एक सामान्य मुद्रा होगी और वह उक्त नाम से वाद ला सकेगा और उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा ।]

अध्याय 3

निगम की शक्तियां और कर्तव्य

                18. निगम का साधारण कर्तव्य-निगम का यह साधारण कर्तव्य होगा कि वह अपनी शक्तियों का प्रयोग ऐसे प्रगतिशील रूप में (अधिकाधिक उत्तरोत्तर) करे कि जिस राज्य या राज्य के जिस भाग के लिए वह स्थापित किया गया है उसमें या किसी बढ़ाए गए क्षेत्र में दक्ष, पर्याप्त मितव्ययी और उचित तौर से समन्वित सड़क परिवहन सेवा प्रणाली का प्रबन्ध हो जाए या उसका प्रबन्ध सुनिश्चित या उसमें अभिवृद्धि हो जाए :

                परन्तु इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी न्यायालय या अधिकरण के समक्ष कार्यवाहियों द्वारा प्रवर्तनीय किसी प्रकार का ऐसा कोई कर्तव्य या दायित्व निगम पर प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः अधिरोपित करती है जिसके अधीन वह अन्यथा नहीं होता ।

19. निगम की शक्तियां-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए निगम को यह शक्ति होगी कि वह,-

                (क) राज्य में तथा किसी बढ़ाए गए क्षेत्र में सड़क परिवहन सेवा चलाए;

                (ख) किसी अनुषंगी सेवा के लिए व्यवस्था करे;

(ग) अपने कर्मचारियों के लिए सेवा की शर्तों के बारे में जिसके अन्तर्गत उचित मजदूरी, भविष्य-निधि की स्थापना, निवास सुविधा, विश्राम और आमोद-प्रमोद के लिए स्थान तथा अन्य सुख-सुविधाएं आती हैं, उपबन्ध करे;

 [(घ) अपने कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों को खर्च बिना या रियायती दर पर, और ऐसी शर्तों पर, जैसी अधिरोपित करना वह उचित समझे, पासों का दिया जाना प्राधिकृत करे;

(ङ) उपयोग में न लाई गई टिकटों और रियायती पासों के लिए प्रतिदाय किया जाना प्राधिकृत करे ।]

(2) इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, उपधारा (1) द्वारा प्रदत्त शक्तियों के अन्तर्गत निम्नलिखित शक्तियां आती हैं,-

(क) चलस्टाक, यानों, साधित्रों, संयंत्र, उपस्कर या अन्य किसी चीज का जो निगम के उपधारा (1) में निर्दिष्ट क्रियाकलाप के लिए अपेक्षित है, विनिर्माण, क्रय या उन्हें बनाए रखना या उनकी मरम्मत करना ।

स्पष्टीकरण-इस खंड में “विनिर्माण" पद के अन्तर्गत पूरे मोटर यान को प्रयोगात्मक या अनुसंधान के प्रयोजन से बनाने के सिवाय, उसका बनाना नहीं आता;

(ख) उक्त क्रियाकलाप के प्रयोजन के लिए स्थावर और जंगम दोनों प्रकार की सम्पत्ति का अर्जन और धारण करना, जैसा निगम आवश्यक समझे, तथा अपने द्वारा धृत किसी सम्पत्ति को पट्टे पर देना, बेचना या अन्यथा अन्तरित करना;

(ग) किसी अन्य व्यक्ति के सम्पूर्ण उपक्रम या उसके किसी भाग का, वहां तक कि जहां तक उसके क्रियाकलाप उस राज्य में या किसी विस्तारित क्षेत्र में सड़क परिवहन सेवा चलाने के रूप में हैं चाहे आत्यन्तिक रूप से या किसी अवधि के लिए अर्जन करने के लिए स्कीम तैयार करना तथा करार द्वारा या संबंधित राज्य में तत्समय प्रवृत्त अनिवार्यतः अर्जन करने के लिए विधि के और ऐसी प्रक्रिया के, जो विहित की जाए, अनुसार अर्जन करना;

(घ) किसी करार द्वारा किसी भूमि का क्रय करना या उसे पट्टे पर या अभिधृति के किसी रूप के अधीन लेना और उस पर ऐसा भवन बनाना जो उसके उपक्रम को चलाने के प्रयोजन के लिए आवश्यक हों;

(ङ) स्क्रेप गाड़ियों, पुराने टायरों, प्रयुक्त तेलों,  [स्क्रेप मूल्य के अन्य स्टोरों या ऐसे अन्य स्टोरों के जो विहित रीति से बेकार घोषित किए जाएं, व्ययन कोट प्राधिकृत करना;

(च) ऐसी सभी संविदाएं करना और उनका पालन करना जो इस अधिनियम के अधीन उसे अपने कर्तव्य के पालन के लिए और अपनी शक्तियों का प्रयोग करने के लिए आवश्यक हो;

(छ) इस प्रकार के यानों का क्रय करना जो निगम द्वारा सड़क परिवहन सेवा चलाने के वास्ते उपयोग में लाने के लिए उपयुक्त हों;

(ज) निगम द्वारा अपने उपक्रम के प्रयोजनों के लिए, किसी अन्य उपक्रम के स्वामी द्वारा धृत या कब्जे में के यानों, गेराजों, सायबानों, कार्यालय भवनों, डिपो, भूमि, कर्मशालाओं, उपस्करों, औजारों, यानों के लिए उपसाधन और फालते पुर्जों या अन्य वस्तुओं का अपने उपयोग के लिए क्रय करना या करार द्वारा अन्यथा प्राप्त करना;

(झ) निगम द्वारा नियोजित व्यक्तियों के कौशल में, या निगम के उपस्कर के उपयोग में, दक्षता की या उस उपस्कर के प्रचलन के ढंग में सुधार करने के प्रयोजन के लिए किसी भी कार्य का करना जिसके अन्तर्गत निगम द्वारा प्रशिक्षण, शिक्षा या अनुसंधान की सुविधाओं की व्यवस्था और निगम द्वारा दूसरों को उन व्यवस्थाओं में सहायता पहुंचाना आता है;

(ञ) यात्रियों या माल के वाहक के रूप में कारबार करने वाले किसी व्यक्ति के साथ, जो निगम की ओर से पारगामी यात्रा भाड़े या माल भाड़े पर यात्रियों या माल के वहन की व्यवस्था कर रहा है उस व्यक्ति के साथ करार करना और उसे कार्यान्वित करना;

(ट) माल के परेषण, भण्डारकरण और परिदान की सुविधाओं के लिए व्यवस्था करना;

(ठ) पर्चों और विज्ञापन फलकों (पट्टों) पर और निगम के यानों और परिसरों में तथा जनता को निगम द्वारा दी गई टिकटों और अन्य फार्मों पर प्रदर्शन करने के लिए संविदा करना;

(ड) राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से ऐसे अन्य सभी कार्य करना जिससे निगम को उचित रूप से कारबार चलाने में सुविधा हो ।

                (3) इस धारा में किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह निगम को यह प्राधिकार देती है कि राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना वह,-

(i) किसी ऐसी चीज का विनिर्माण करे या उसे बनाए जो निगम के उपक्रम के प्रयोजन के लिए प्रयत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उपयोग किए जाने के लिए अपेक्षित नहीं है अथवा किसी यान की, जो निगम का नहीं है, या जो प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उसके उपक्रम के लिए उपयोग में नहीं लाया जाता है, मरम्मत करना, उसका संग्रहण करना या तद्हेतु सेवा चलाने के लिए उपबन्ध करना;

(i) कोई यान, अन्य व्यक्ति को बेचने के प्रयोजन के लिए क्रय करे;

(iii) किसी व्यक्ति को यानों के लिए या उपसाधन के रूप में स्नहेक, फालतू पुर्जे या उपस्कर का विक्रय या             प्रदाय करे;

(iv) इस अधिनियम के अधीन या द्वारा अभिव्यक्त रूप से उपबन्धित के सिवाय यानों को यात्रियों या माल के वहन के लिए भाड़े पर देने ।

(4) इस अधिनियम द्वारा अन्यथा उपबन्धित के सिवाय, पूर्वगामी उपबन्धों की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह निगम को तत्समय प्रवृत्त किसी विधि की अवहेलना करने के लिए प्राधिकृत करती है ।

                (5) जहां कि निगम किसी अन्य व्यक्ति का सम्पूर्ण उपक्रम या उसका भाग अर्जन करता है वहां निगम अपने  [अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों] की नियुक्ति करते समय उस उपक्रम में नियोजित कर्मचारियों के हकों का भी ध्यान रखेगा ।

(6) इस धारा के उपबन्धों का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह इस अधिनियम के पश्चात्वर्ती किसी उपबन्ध के द्वारा या अधीन निगम को प्रदत्त किसी शक्ति को परिसीमित करती है ।

20. निगम की सड़क परिवहन सेवा के चलाने का किसी अन्य राज्य के क्षेत्र में विस्तार-(1) यदि निगम यह बात लोकहित में समीचीन समझता है कि अपनी किन्हीं सड़क परिवहन सेवाओं के चलाए जाने का किसी अन्य राज्य में स्थित किसी मार्ग या क्षेत्र           में विस्तार कर दिया जाए तो राज्य सरकार की अनुज्ञा से वह प्रस्थापित विस्तार के विषय में उस अन्य राज्य की सरकार से बातचीत कर सकेगा ।

(2) यदि उस अन्य राज्य की सरकार प्रस्थापित विस्तार का अनुमोदन कर देती है तो निगम इस प्रयोजन के लिए एक स्कीम तैयार करेगा और उस अन्य सरकार की सम्मति के लिए उसे भेजेगा और ऐसी सम्मति प्राप्त होने पर निगम उस राज्य सरकार की पूर्व अनुमति से उस स्कीम को मंजूर कर सकेगा ।

(3) स्कीम के इस प्रकार मंजूर हो जाने के पश्चात्, निगम ऐसे मार्ग या क्षेत्र में अपनी सड़क परिवहन सेवा के चलाए जाने का विस्तार करने के लिए सक्षम होगा और जबकि ऐसी सेवा का चलाया जाना विस्तारित कर दिया जाता है तब निगम उस मार्ग पर या उस क्षेत्र में, उस अन्य राज्य की, जिसमें ऐसा मार्ग या क्षेत्र स्थित है, प्रवृत्त विधि के उपबन्धों के अधीन रहते हुए उस सेवा को चलाएगा ।

(4) निगम उपधारा (2) के अधीन मंजूर की गई स्कीम को, इस धारा के पूर्वगामी उपबन्धों में उपबन्धित रीति से तैयार और मंजूर की गई अनुपूरक स्कीम द्वारा, समय-समय पर परिवर्तित या विस्तारित कर सकेगा ।

21. डाक का वहन-यदि केन्द्रीय सरकार ऐसा अपेक्षित करे तो, निगम ऐसी दर और शर्तों और निबंधनों पर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकार के परामर्श से इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाएं, डाक का वहन मोटरयान अधिनियम, 1939 (1939 का 4) में किसी बात के होते हुए भी करेगा ।

अध्याय 4

वित्त, लेखा और लेखापरीक्षा

22. निगम के वित्त के साधारण सिद्धांत-यह निगम का साधारण सिद्धांत होगा कि वह अपने उपक्रम को चलाने में, कारबारी सिद्धांतों पर चले ।

23. निगम की पूंजी-(1) राज्य सरकार द्वारा स्थापित निगम के लिए केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार ऐसे अनुपात में जो दोनों सरकारों द्वारा करार पाया जाए, ऐसी पूंजी की व्यवस्था, जो निगम द्वारा उस उपक्रम के चलाने के प्रयोजन के लिए या उससे सम्बन्धित प्रयोजनों के लिए अपेक्षित है इस अधिनियम के उपबन्धों से अनुसंगत ऐसी शर्तों और निबन्धनों पर, कर सकेंगी जो राज्य सरकार की पूर्व अनुमति से अवधारित करे ।

 [(2) निगम, चाहे उसके लिए उपधारा (1) के अधीन किसी पूंजी की व्यवस्था की गई हो या नहीं, शेयर निर्गमित करके ऐसी पूंजी (जिसे इस धारा में इसके पश्चात् प्राधिकृत शेयर पूंजी" कहा गया है), जो राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत की जाए, समुत्थापित कर सकेगा :

परन्तु जहां निगम के लिए उपधारा (1) के अधीन किसी पूंजी की व्यवस्था की जाती है, वहां इस उपधारा के अधीन किसी पूंजी का समुत्थान केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना नहीं किया जा सकेगा ।

(2क) केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन से उपधारा (2) के अधीन समुत्थापित कोई पूंजी-

                (क) उस पूंजी के अतिरिक्त हो सकेगी जिसकी कि निगम की उपधारा (1) के अधीन व्यवस्था की गई है;

(ख) यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा, उस सम्पूर्ण पूंजी या उसके किसी भाग को, जिसकी निगम के लिए व्यवस्था उपधारा (1) के अधीन उस सरकार द्वारा की गई है, [सड़क परिवहन निगम (संशोधन) अधिनियम, 1982 (1982 का 63) के प्रारम्भ के पहले या उसके पश्चात्ट संपरिवर्तित करके प्रतिश्रुत की जा सकेगी ।]

                (3) निगम की  [प्राधिकृत शेयर पूंजी], इतने अंशों (शेयरों) में विभाजित की जाएगी जितने राज्य सरकार अवधारित करे तथा जितने अंश (शेयर) राज्य सरकार, केन्द्रीय सरकार और (उन व्यक्तियों सहित जिनके उपक्रम निगम द्वारा अर्जित कर लिए गए हैं) अन्य पक्षकारों द्वारा प्रतिश्रुत किए जाएंगे, वह राज्य सरकार द्वारा केन्द्रीय सरकार के परामर्श से अवधारित किए जा सकेंगे ।  

(4) उपधारा (3) में उल्लिखित अन्य पक्षकारों को अंशों (शेयरों) का आबंटन निगम द्वारा ऐसी रीति से किया जाएगा, जो विहित की जाए ।

(5) निगम के अंश (शेयर), इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों के अनुसार अन्तरणीय होने के सिवाय, अन्तरणीय नहीं होंगे ।

(6) निगम किसी भी समय राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से उपधारा (4) के अधीन अन्य पक्षकारों को निर्गमित किए गए अंशों (शेयरों) का, ऐसी रीति से, जो विहित की जाए, मोचन करा सकेगा ।

24. निगम की अतिरिक्त पूंजी-यदि धारा 23 के अधीन अंश (शेयर) निर्गमित करने के पश्चात् निगम को अतिरिक्त पूंजी की आवश्यकता होती है तो निगम, राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से नए अंश (शेयर) निर्गमित करके ऐसी अतिरिक्त पूंजी की व्यवस्था कर सकेगा तथा उक्त धारा की उपधारा (2),  [(2क),] (3), (4), (5) और (6) के उपबन्ध ऐसे अंश (शेयर) के निर्गमन को लागू होंगे ।

25. राज्य सरकार द्वारा प्रत्याभूति-निगम के अंशों (शेयरों) के निर्गमन के समय राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना द्वारा राज्य सरकार द्वारा यथानियत न्यूनतम दर पर वार्षिक लाभांश की आदायगी तथा मूल की अदायगी करने विषयक प्रत्याभूति निगम के अंशों (शेयरों) के विषय में राज्य सरकार द्वारा की जाएगी ।

 [26. उधार लेने की शक्तियां-निगम, राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन से, अपनी कामकाज पूंजी को समुत्थापित करने या पूंजी स्वरूपी किसी व्यय को पूरा करने के प्रयोजन के लिए, खुले बाजार से या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन, या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन गठित किसी तत्स्थानी नए बैंक से, राज्य वित्तीय निगम अधिनियम, 1951 (1951 का 63) की धारा 3 के अधीन स्थापित किसी राज्य वित्त निगम से, औद्योगिक वित्त निगम अधिनियम, 1948 (1948 का 15) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक वित्त निगम से, भारतीय औद्योगिक विकास बैंक अधिनियम, 1964 (1964 का 18) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय औद्योगिक विकास बैंक से, जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम से या ऋण की व्यवस्था करने वाली किसी अन्य ऐसी वित्तीय संस्था से जो भारतीय रिज़र्व बैंक के नियंत्रण के अधीन है, धन उधार ले सकेगा ।]

27. निगम की निधि-(1) प्रत्येक निगम की अपनी निधि होगी और निगम की सभी प्राप्तियां उसमें जमा की जाएंगी और निगम द्वारा की गई अदायगियां उसमें से की जाएंगी ।

(2) राज्य सरकार द्वारा अन्यथा निदिष्ट के सिवाय, उस निधि की सब धनराशियां भारतीय रिजर्व बैंक में या भारतीय रिजर्व बैंक के ऐजेंटों के यहां  [या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) की धारा 3 के अधीन, या बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन और अन्तरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) की धारा 3 के अधीन, गठित तत्स्थानी नए बैंकों मेंट निक्षिप्त की जाएंगी या ऐसी प्रतिभूतियों में, जो राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित की गई हो, विनिहित की जाएंगी ।

28. ब्याज और लाभांश का दिया जाना-(1) जहां कि धारा 23 की उपधारा (1) के अधीन  [निगम की सम्पूर्ण पूंजी या  उसके किसी भागट की व्यवस्था केन्द्रीय सरकार और राज्य सरकार द्वारा की गई है वहां निगम ऐसी पूंजी पर ऐसी दर से, जो समय-समय पर केन्द्रीय सरकार के परामर्श से राज्य सरकार द्वारा नियत की जाए, ब्याज देगा और ऐसा ब्याज, निगम के व्यय का एक भाग समझा जाएगा ।

(2) जहां कि निगम ने अंशों (शेयरों) के निर्गमन द्वारा  [अपनी सम्पूर्ण पूंजी या उसका कोई भाग समुत्थापित किया हैट वहां वह ऐसे अंशों (शेयरों) पर ऐसी दर से उन पर लाभांश देगा जो ऐसी किन्हीं साधारण परिसीमाओं के अधीन रहते हुए जो राज्य सरकार द्वारा केन्द्रीय सरकार से परामर्श करके अधिरोपित की जाए, निगम द्वारा समय-समय पर नियत की जाएं तथा ऐसा लाभांश निगम के व्यय का एक भाग समझा जाएगा ।

29. अवक्षयण तथा आरक्षण और अन्य निधियों के लिए उपबंध-(1) निगम अवक्षयण के लिए तथा आरक्षण और अन्य निधियों के लिए ऐसा उपबन्ध करेगा जैसा राज्य सरकार समय-समय पर निदिष्ट करे ।

(2) उक्त निधियों के प्रबन्ध का, समय-समय पर उनमें जमा खाते में डाली जाने वाली राशियों का और उनमें समाविष्ट धनराशियों के उपयोजन का आधारण निगम द्वारा किया जाएगा :

परन्तु राज्य सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना किसी निधि का उपयोग, किसी ऐसे प्रयोजन से भिन्न उपयोजन के लिए नहीं किया जाएगा जिस के लिए उसका सृजप किया गया है ।

30. शुद्ध लाभ का व्ययन-धारा 28 के अधीन ब्याज और लाभांश के, और धारा 29 के अधीन अवक्षयण, आरक्षण और अन्य निधियों के दिए जाने के लिए उपबन्ध करने के पश्चात्, निगम अपने वार्षिक शुद्ध लाभ का इतना प्रतिशत, जितना इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किया जाए, सड़क परिवहन सेवा का उपयोग करने वाले यात्रियों की सुख-सुविधाओं का उपबन्ध करने के लिए निगम द्वारा नियोजन श्रमिकों के कल्याण के लिए और ऐसे अन्य प्रयोजनों के लिए जो केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से विहित किए जाएं, उपयोग कर सकेगा  [और अतिशेष में से इतनी रकम, जितनी राज्य सरकार और केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से निगम द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट की जाए, निगम के विस्तार कार्यक्रमों के वित्तपोषण के लिए उपयोग की जा सकेगी और यदि कुछ शेष बचे तो वह शेष रकम सड़क विकास के लिए राज्य सरकार को सौंप दी जाएगी ।]

31. व्यय करने की निगम की शक्ति-निगम को यह शक्ति प्राप्त होगी कि वह इतनी धनराशि जितनी वह ठीक समझता है उन उद्देश्यों पर व्यय करे जो इस अधिनियम के अधीन प्राधिकृत है और ऐसी धनराशि ऐसा व्यय समझा जाएगा जो निगम की निधियों में से देय है ।

32. बजट-(1) हर निगम, हर एक वर्ष की ऐसी तारीख तक, जो विहित की जाए, आगामी वित्तीय वर्ष के लिए उस वित्तीय वर्ष की प्राक्कलित प्राप्तियों और व्यय को ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, दिखाते हुए बजट तैयार करेगा और राज्य सरकार के अनुमोदन के लिए उसे उस सरकार के समक्ष पेश करेगा ।

(2) उपधारा (3) और (4) के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कोई भी धनराशि निगम द्वारा या उसकी ओर से तब तक व्यय नहीं की जाएगी जब तक कि उसका व्यय, राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित चालू बजट अनुमान के अन्तर्गत नहीं आ जाता है ।

(3)  [निगम, ऐसी शर्तों पर और ऐसे निबन्धनों के अधीन रहते हुए, जो इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा विनिर्दिष्ट किए जाएं,] एक शीर्ष (मद) के लिए अनुदत्त रकम को व्यय के एक शीर्ष से दूसरे शीर्ष में अथवा एक स्कीम के लिए उपबन्धित राशि को किसी दूसरी स्कीम के लिए पुनर्विनियोजित करने की 5[मंजूरी दे सकेगा] किन्तु इस शर्त पर ही ऐसा किया जा सकेगा कि कुल बजट अनुदत्त राशि से अधिक न हो ।

(4) निगम, ऐसी परिसीमाओं के अन्तर्गत और ऐसी शर्तों पर, जो विहित की जाएं, व्यय के किसी शीर्ष के अधीन या किसी विशेष स्कीम के सम्बन्ध में उस सीमा से अधिक व्यय उपगत कर सकेगा जो राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित बजट में उपबन्धित है ।

 [33. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) निगम, उस प्ररूप में जो भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक से परामर्श करके राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाए समुचित लेखा और अन्य अभिलेख रखेगा और वार्षिक लेखा विवरण जिसके अनतर्गत लाभ हानि लेखा वृत्तान्त और तुलनपत्र आता है, तैयार करेगा ।

(2) निगम के लेखा प्रतिवर्ष भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक या उसके नामनिर्देशिती द्वारा संपरीक्षित किए जाएंगे और उसके द्वारा ऐसी लेखापरीक्षा के सम्बन्ध में उपगत व्यय निगम द्वारा भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक को देय होगा ।

(3) भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक को तथा निगम के लेखा की लेखा परीक्षा के सम्बन्ध में उसके द्वारा नियुक्त किसी अन्य व्यक्ति को ऐसी लेखा परीक्षा के सम्बन्ध में वही अधिकार, विशेषाधिकार और प्राधिकार होंगे जो सरकारी लेखा की लेखा परीक्षा के सम्बन्ध में भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक के हैं तथा उसे विशेषतया बही, लेखा, सम्बन्धित वाउचर और अन्य दस्तावेज और कागज पेश करने की मांग करने और निगम के किसी कार्यालय का निरीक्षण करने का भी अधिकार होगा ।

(4) भारत के नियंत्रक और महालेखा परीक्षक या इस निमित्त उसके द्वारा नियुक्त व्यक्ति द्वारा यथा प्रमाणित लेखा और साथ-साथ उस पर की लेखापरीक्षा रिपोर्ट प्रतिवर्ष राज्य सरकार को भेजी जाएगी और वह सरकार उस राज्य के विधान-मंडल के समक्ष उसे रखवाएगी ।]

अध्याय 5

प्रकीर्ण

34. राज्य सरकार द्वारा निदेश-(1) राज्य सरकार, ऐसी सरकार द्वारा स्थापित निगम से परामर्श के पश्चात् निगम द्वारा अनुसरण किए जाने के लिए साधारण अनुदेश निगम को दे सकेगी और ऐसे अनुदेशों के अन्तर्गत भर्ती से, उसके कर्मचारियों की सेवा की शर्तों और प्रशिक्षण से, कर्मचारियों को दी जाने वाली मजदूरी से, उसके द्वारा बनाए रखी जाने वाली आरक्षितियों से और उसके लाभ या स्टाक के व्ययन से सम्बन्धित निदेश भी है ।

(2) इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग और कर्तव्यों का पालन करने में, निगम उपधारा (1) के अधीन दिए गए किन्हीं सामान्य अनुदेशों से राज्य सरकार की पूर्व अनुज्ञा के बिना नहीं हटेगा ।

35. विवरणियां तथा रिपोर्ट-(1) हर निगम राज्य सरकार को अपनी संपत्ति या क्रियाकलाप की बाबत या किसी प्रस्थापित स्कीम के बारे में ऐसी विवरणियां, आंकड़े, लेखा और अन्य जानकारी देगा, जैसी राज्य सरकार समय-समय पर अपेक्षित करे ।

(2) उपधारा (1) के उपबन्धों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना यथासम्भव शीघ्र हर वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् निगम, उस वर्ष में इस अधिनियम के अधीन अपनी शक्तियों और कर्तव्यों के प्रयोग और पालन के बारे में, तथा अपनी नीति और कार्यक्रम के बारे में रिपोर्ट केन्द्रीय और राज्य सरकार को देगा ।

 [(3) राज्य सरकार उपधारा (2) में निर्दिष्ट वार्षिक रिपोर्ट को उस राज्य के विधान-मंडल के समक्ष रखवाएगी ।]

36. जांच का आदेश देने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, इस दृष्टि से कि इस बाबत अपना समाधान कर ले कि उस सरकार द्वारा स्थापित निगम की शक्तियों और कर्तव्यों का उचित रूप से प्रयोग और पालन किया जा रहा है, किसी भी समय निगम के सभी या किन्हीं क्रियाकलापों की जांच करने के लिए और राज्य सरकार को ऐसी जांच की रिपोर्ट देने के लिए किसी व्यक्ति या किन्हीं व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी ।

(2) निगम, इस प्रकार नियुक्त व्यक्ति या व्यक्तियों को जांच का उचित संचालन करने के लिए सभी सुविधाएं देगा और निगम के कब्जे में की ऐसी कोई दस्तावेज, लेखा या जानकारी उस व्यक्ति या उन व्यक्तियों के समक्ष पेश करेगा या देगा जैसी वह व्यक्ति या वे व्यक्ति जांच के प्रयोजनों के लिए मांगे ।

37. किसी निगम के उपक्रम के भाग का नियंत्रण करने की शक्ति-(1) यदि राज्य सरकार का समाधान धारा 36 के अधीन या अन्यथा की गई जांच की रिपोर्ट मिलने पर हो जाता है कि ऐसा करना लोक हित में आवश्यक है, तो राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा किसी व्यक्ति को प्राधिकृत कर सकेगी कि वह व्यक्ति निगम से उसके उपक्रम के भाग का प्रबन्ध ग्रहण कर ले और तब तक जब तक वह अधिसूचना द्वारा प्रवृत्त रहे, निगम के उपक्रम के ऐसे भाग का, जो अधिसूचना में विहित किया जाए, ऐसे निदेशों के अनुसार जो समय-समय पर राज्य सरकार द्वारा दिए जाएं, प्रशासन करे और इस प्रकार प्राधिकृत व्यक्ति उपक्रम के उक्त भाग के प्रशासन के प्रयोजन के लिए इस अधिनियम के अधीन निगम की या निगम के किसी अधिकारी की सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा, और वह निगम के  [अधिकारियों या अन्य कर्मचारियों] को ऐसे निदेश दे सकेगा, जैसे वह ठीक समझे तथा किसी बाहरी अधिकरण को नियोजित कर सकेगा । 

(2) राज्य सरकार ऐसी अधिसूचना द्वारा निदेश दे सकेगी कि इस प्रकार प्राधिकृत व्यक्ति द्वारा उपगत सभी प्रभार और व्यय और साथ-साथ ऐसा पारिश्रमिक, जो राज्य सरकार समय-समय पर उस व्यक्ति को अनुज्ञात करे, निगम की निधि में से, ऐसे समय के भीतर, जो राज्य सरकार नियत करे, दिए जाएं और यदि व्यय इस प्रकार नहीं दे दिया जाता तो राज्य सरकार उस निधि की अभिरक्षा करने वाले व्यक्ति को यह निदेश देते हुए आदेश कर सकेगी कि ऐसी निधि पर के किसी अन्य भार को पूर्विकता में, ऐसे व्यय इस प्रकार प्राधिकृत व्यक्ति को दे और जहां तक उन निधियों का, जो निगम के जमा खाते में है, यह करना संभव हो वहां तक राज्य सरकार उस आदेश का अनुपालन करेगी ।

 [(3) इस धारा के अधीन निकाली गई हर अधिसूचना और साथ-साथ उन परिस्थितियों को, जिनके कारण वह निकाली गई थी, रिपोर्ट राज्य के विधान-मंडल के समक्ष उनके निकाले जाने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र रखी जाएगी ।]

38. निगम को अतिष्ठित करने की शक्ति-(1) जहां कि राज्य सरकार की यह राय है कि उस सरकार द्वारा स्थापित निगम इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन या द्वारा उस पर अधिरोपित कर्तव्यों का पालन करने में असमर्थ है या कर्तव्यों के पालन में       बार-बार व्यतिक्रम करता रहा है या उसने अपनी शक्तियों का अतिक्रमण या दुरुपयोग किया है वहां केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति  से राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा निगम को इतनी अवधि के लिए, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, अतिष्ठित             कर सकेगी :

परन्तु इस उपधारा के अधीन अधिसूचना निकालने के पूर्व राज्य सरकार निगम को यह हेतुक दर्शित करने के लिए कि उसे क्यों न अतिष्ठित कर दिया जाए युक्तियुक्त समय देगी और निगम के स्पष्टीकरणों और आक्षेपों पर, यदि कोई हों, विचार करेगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन निगम के अतिष्ठित करने वाली अधिसूचना के प्रकाशन पर-

(क) निगम के सभी  [निदेशक] अतिष्ठित होने की तारीख से अपने पदों को ऐसे 2[निदेशकों] की हैसियत में रिक्त कर देंगे;

(ख) इस अधिनियम के उपबन्धों या अन्य विधि के अधीन या द्वारा वे सभी शक्तियां या कर्तव्य जिनका प्रयोग या पालन निगम द्वारा या उसकी ओर से किया जाना है, किए जाने की अवधि में, ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों के द्वारा, जैसा राज्य सरकार निदेश दे, प्रयोग या पालन किया जाएगा;

(ग) निगम में निहित सभी सम्पत्ति अतिष्ठित किए जाने की अवधि में राज्य सरकार में निहित रहेगी ।

                (3) उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना में विनिर्दिष्ट अतिष्ठित अवधि की सम्पत्ति पर, राज्य सरकार-

                                (क) अतिष्ठित काल को ऐसी अतिरिक्त अवधि के लिए, जैसा वह आवश्यक समझे, बढ़ा सकेगी;

                                (ख) निगम का पुनर्गठन, धारा 5 में उपबन्धित रीति से कर सकेगी ।

                39. निगम का समापन-(1) कम्पनियों और निगमों के परिसमापन से सम्बन्धित किसी भी विधि के उपाबन्ध, निगम को लागू नहीं होंगे और सम्बन्धित राज्य सरकार के आदेश के बिना और ऐसी रीति के सिवाय, जो उस सरकार द्वारा निदिष्ट की जाए, किसी भी निगम का समापन नहीं किया जाएगा :

                परन्तु राज्य सरकार द्वारा ऐसा कोई भी आदेश केन्द्रीय सरकार की पूर्व अनुमति से दिए जाने के सिवाय नहीं किया जाएगा ।

                (2) निगम के समापन की दशा में निगम की आस्तियां, ऐसे दायित्वों के, यदि कोई हों, पूरा करने के पश्चात् केन्द्रीय और राज्य सरकार और ऐसे अन्य पक्षकारों में, यदि कोई हों, जिन्होंने पूंजी के लिए प्रतिश्रुति दी हो, निगम की कुल पूंजी और उनमें से प्रत्येक के द्वारा अभिदाय के अनुपात में बांट दी जाएंगी ।

                40. सड़क परिवहन उपक्रम अर्जित करने के लिए प्रतिकर-जब कभी निगम पूरे उपक्रम को या उसके किसी भाग को इस अधिनियम के अधीन अर्जित कर लेता है तब निगम द्वारा प्रतिकर दिया जाएगा जिसकी रकम इसके पश्चात् इसमें उपवर्णित प्रक्रिया के अनुसार और रीति से अवधारित की जाएगी, अर्थात् :-

                                (क) जहां कि प्रतिकर की रकम करार द्वारा नियत की जा सकती है वहां वह ऐसे करार के अनुसार दी जाएगी;

(ख) जहां कि ऐसे करार नहीं हो पाता वहां वह रकम ऐसे मध्यस्थ अधिकरण द्वारा अवधारित की जाएगी जो निगम के एक नामनिर्देशिती, उस व्यक्ति के, जिसे प्रतिकर दिया जाना है एक नामनिर्देशिती, और संबद्ध राज्य के सम्बन्ध में अधिकारिता का प्रयोग करने वाले उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधिपति द्वारा नामनिर्दिष्ट एक अध्यक्ष से मिलकर बनेगा ;

(ग) उस अधिकरण के विनिश्चय की अपील उच्च न्यायालय में होगी और ऐसी अपील पर उच्च न्यायालय का आदेश अन्तिम होगा ।

41. [निगम का स्थानीय अधिकरण समझा जाना और अन्य व्यक्ति जोखिम के बारे में उपबन्ध-सड़क परिवहन निगम (संशोधन) अधिनियम, 1959 (1959 का 28) की धारा 11 द्वारा निरसित ।]

42. प्रवेश करने की शक्ति-जब कभी निगम के लिए यह आवश्यक हो कि वह अपने कोई संकर्म क्रियान्वित करे या कोई सर्वेक्षण, परीक्षा या अन्वेषण करे, जो इस अधिनियम के अधीन शक्तियों का प्रयोग या कर्तव्यों का पालन करने के बारे में प्रारम्भिक स्वरूप का है या उनसे आनुषंगिक है, तब निगम का ऐसा कोई  [अधिकारी या अन्य कर्मचारी], जिसे निगम द्वारा चाहे तो साधारणतः चाहे विशेषतः सशक्त किया है जिला मजिस्ट्रेट की पूर्व अनुज्ञा से किसी भूमि या परिसर में सूर्योदय और सूर्यास्त के बीच प्रवेश उस भूमि या परिसर के स्वामी या अधिभोगी की लिखित सम्मति से इस प्रयोजन से कर सकेगा कि वहां ऐसे संकर्म किए जाएं या ऐसा सर्वेक्षण, परीक्षा या अन्वेषण किया जाए ।

43. निगम के सदस्यों, अधिकारियों और सेवकों का लोक सेवक होना-निगम के सभी  [निदेशक] और निगम के सभी  [अधिकारी और अन्य कर्मचारियों] की बाबत चाहे वे राज्य सरकार द्वारा चाहे निगम द्वारा नियुक्त किए गए हों, उस समय जब वे इस अधिनियम के या किसी अन्य विधि के उपबन्धों के अनुसरण में कार्य कर रहे हैं या उनके द्वारा कार्य किया जाना तात्पर्यित है, यह समझा जाएगा कि वे भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक हैं ।

44. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार इस अधिनियम के उपबन्धों को कार्यान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

 [(क) निगम के निदेशकों की नियुक्ति की शर्तें और रीति, बोर्ड में केंद्रीय सरकार और राज्य सरकार का, और जहां कि धारा 23 की उपधारा (3) के अधीन अन्य पक्षकारों को शेयर निर्गमित किए गए हैं वहां ऐसे शेयर धारकों का प्रतिनिधित्व, और साधारणतया बोर्ड के गठन से सम्बन्धित सभी विषय;]

 [(ख) धारा 10 के अधीन निगम के निदेशकों को अथवा बोर्ड से सहबद्ध अन्य व्यक्तियों को दिया जाने वाला पारिश्रमिक, भत्ते या फीसें;]

(ग) निगम के 2[निदेशकों] की पदावधि और उनमें आकस्मिक रिक्तियों के भरने की रीति;

(घ)  [बोर्ड] की बैठक में गणपूर्ति गठित करने के लिए 2[निदेशकों] की आवश्यक संख्या;

(ङ) निगम के  [यथास्थिति प्रबन्ध निदेशक, मुख्य लेखा अधिकारी, वित्त सलाहकार या मुख्य लेखा                     अधिकारी-सह-वित्त सलाहकारट की नियुक्ति और सेवा की शर्तें और उनके वेतनमान;

(च) सलाहकार परिषद् के सदस्यों की संख्या और पदावधि, उन्हें दिए जाने वाले भत्ते, उनकी आकस्मिक रिक्तियों को भरने की रीति और उनके द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;

 [(चच) वह प्रक्रिया जिसके अनुसार कोई स्टोर धारा 19 की उपधारा (2) के अधीन बेकार घोषित किए जा सकेंगे;]

(छ) वह रीति जिसमें निगम के अंशों (शेयरों) का आबंटन, अन्तरण या मोचन किया जाएगा;

(ज) वह रीति जिसमें निगम के शुद्ध लाभों का उपयोग किया जाएगा;

(झ) वह तारीख जिस तक और वह प्ररूप जिसमें धारा 32 की उपधारा (1) के अधीन हर एक वर्ष में बजट तैयार किया जाएगा और निगम के समक्ष रखा जाएगा;

 [(ञ) वह प्ररूप जिसमें लेखाओं का वार्षिक विवरण तैयार किया जाएगा;]

।                                           ।                                          ।                                            ।                                        ।

(ठ) वह प्ररूप जिसमें धारा 35 के अधीन विवरणियां, आंकड़े या रिपोर्टें दी जाएंगी;

(ड) धारा 40 के अधीन माध्यस्थम् अधिकरण द्वारा अपनाई जाने वाली प्रक्रिया;

(ढ) कोई अन्य विषय जो विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।

                45. विनियम बनाने की शक्ति-(1) निगम, अपना कार्यकलाप चलाने के लिए  [राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से और राजपत्र में अधिसूचना द्वारा] ऐसे विनियम बना सकेगा जो इस अधिनियम और तद्धीन बने नियमों से असंगत न हों ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियम निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबन्ध कर सकेंगे, अर्थात् :-

(क) वह रीति जिसमें और वे प्रयोजन जिनके लिए धारा 10 के अधीन व्यक्तियों  [बोर्ड] के साथ सहयुक्त किया         जा सकेगा :

(ख) 2[बोर्ड] की बैठकों का समय और ध्यान और ऐसी बैठकों की कार्यवाही के संचालन में अपनाई जाने           वाली प्रक्रिया;

(ग)  [यथास्थिति, प्रबन्धक निदेशक, मुख्य लेखा अधिकारी और वित्त सलाहकार या मुख्य लेखा                   अधिकारी-सह-वित्त सलाहकार से भिन्न निगम के अधिकारियों और अन्य कर्मचारियों कीट नियुक्ति और सेवा की शर्तें और उनके वेतनमान;

 [(घ) धारा 19 के अधीन निगम के कर्मचारियों और अन्य व्यक्तियों को पास देना;

(ङ) धारा 19 के अधीन अप्रयुक्त टिकटों और रियायती पासों के सम्बन्ध में प्रतिदाय मंजूर करना ।]

                 [45क. प्रत्येक नियम और विनियम का राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम और प्रत्येक विनियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।]

                46. नियमों के भंग के लिए शास्ति-राज्य सरकार, नियम द्वारा यह उपबन्ध कर सकेगी कि उसके द्वारा धारा 44 के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों का भंग जुर्माने से दण्डनीय होगा जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा और चालू रहने वाले भंग की दशा में प्रथम दोषसिद्धि की तारीख के पश्चात् उस हर दिन के लिए, जिसमें अपराधी अपराध करता रहा है, बीस रुपए से अनधिक होगा ।

47. मुम्बई से संबंधित विशेष उपबन्ध-(1) उस निकाय की जो मुम्बई राज्य सड़क परिवहन निगम के नाम से ज्ञात है और उसके बोर्ड की, जिसके प्रति निर्देश सं०1780/5 वाली और तारीख 16 नवम्बर, 1949 वाली मुम्बई सरकार की अधिसूचना में किया गया है, (जिसे इसमें इसके पश्चात् क्रमशः विद्यमान निगम और बोर्ड कह कर निर्दिष्ट किया गया है) बाबत यह बात कि सब विधिसम्मत प्रयोजनों के लिए वह विधिमान्यतः गठित किया गया है, उस अधिनियमिति में किसी त्रुटि या अविधिमान्यता के होते हुए भी, जिसके द्वारा वह गठित किया गया था ऐसे समझी जाएगी मानो उक्त अधिसूचना के सब उपबन्ध इस धारा में सम्मिलित और अधिनियमित कर दिए गए थे और यह धारा उक्त तारीख को और तदुपरान्त निरंतर प्रवृत्त बनी रही और तदनुसार-

(क) विद्यमान निगम या बोर्ड के द्वारा की गई सभी कार्यवाही और उसके साथ किए गए ऐसे सभी संव्यवहार की बाबत जिसके अन्तर्गत ऐसी कोई कार्यवाही या ऐसा संव्यवहार है जिससे चाहे संविदा द्वारा या अन्यथा कोई सम्पत्ति, आस्ति या अधिकार अर्जित किया गया था अथवा कोई दायित्व या बाध्यता उपगत हुई थी, यह समझा जाएगा कि वह विधिमान्यतः और विधिपूर्वक ली गई थी या किया गया था; और

(ख) मुम्बई सरकार के या बोर्ड के किसी सदस्य के अथवा विद्यमान निगम के किसी अधिकारी या सेवक के विरुद्ध कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही तब विद्यमान निगम या बोर्ड द्वारा की गई या उसकी स्थापना के सम्बन्ध में हुई किसी कार्यवाही की बाबत केवल इस आधार पर न होगी कि उस अधिनियमिति या आदेश में, जिसके अधीन विद्यमान निगम या बोर्ड गठित हुआ था, कोई त्रुटि थी या वह अधिनियमिति अविधिमान्य थी ।

(2) धारा 3 के अधीन मुम्बई राज्य में निगम की, जो इसमें इसके पश्चात् नए निगम" के नाम से निर्दिष्ट है, स्थापना पर-

                (क) विद्यमान निगम और बोर्ड विघटित समझे जाएंगे और अपने कृत्य करने से परिविरत हो जाएंगे;

                (ख) विद्यमान निगम में निहित सभी सम्पत्ति और आस्तियां नए निगम में निहित हो जाएंगी;

(ग) विद्यमान निगम के सभी अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं, चाहे वे किसी संविदा द्वारा या अन्यथा उद्भूत हुई हों, क्रमशः नए निगम के अधिकार, दायित्व और बाध्यताएं हो जाएंगी; और

(घ) विद्यमान निगम या बोर्ड को अनुदत्त सभी अनुज्ञप्तियों और अनुज्ञापत्रों के उसके साथ की गई सभी संविदाओं और उसकी ओर से निष्पादित सभी लिखतों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे नए निगम को अनुदत्त, उसके साथ की गई या उसकी ओर से निष्पादित हैं और वे तदनुसार प्रभावी होंगे ।

 [47क. कुछ निगमों के पुनर्गठन या विघटन के लिए विशेष उपबन्ध-जहां कि राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956            (1950 का 37)के अधीन  [या राज्यों के पुनर्गठन से सम्बन्धित किसी अन्य अधिनियमिति के अधीन राज्यों के पुनर्गठन के कारण, कोई राज्य या उसका कोई भाग, जिसकी बाबत पुनर्गठन होने के दिन के ठीक पूर्व निगम] क्रियाशील या प्रवर्तनशील था, किसी अन्य राज्य को उस दिन अन्तरित कर दिया जाता है और ऐसे अन्तरण के कारण राज्य सरकार को यह आवश्यक या समुचित प्रतीत होता है कि निगम चाहे वह किसी भी प्रकार का हो, पुनर्संगठित या पुनर्गठित किया जाना चाहिए या उसे विघटित कर दिया जाना चाहिए, वहां राज्य सरकार उस निगम के पुनर्संगठन, पुनर्गठन या विघटन के लिए स्कीम बना सकेगी, जिसके अन्तर्गत नए निगम के बनाए जाने का उस निगम का किसी अन्य राज्य सरकार के निगम, निगम निकाय या वाणिज्यिक उपक्रम के साथ समामेलन का, अथवा उस निगम की सम्पूर्ण आस्तियों, अधिकारों और दायित्वों का या उसका कोई भाग किसी अन्य राज्य सरकार के निगम, निगम निकाय या वाणिज्यिक उपक्रम को अन्तरित करने का तथा उस निगम के किसी कर्मकार का अन्तरण या पुनर्नियोजन करने का प्रस्ताव है, और राज्य सरकार उस स्कीम को अनुमोदन के लिए केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित कर सकेगी ।

                स्पष्टीकरण-इस उपधारा के अधीन किसी स्कीम की तैयारी के प्रयोजन के लिए “राज्य सरकार" से-

 [(i) मुम्बई राज्य सड़क परिवहन निगम के सम्बन्ध में, मुम्बई पुनर्गठन अधिनियम, 1960 (1960 का 11) के अधीन यथागठित महाराष्ट्र या गुजरात राज्य की सरकार अभिप्रेत होगी;]

(ii) पेप्सु सड़क परिवहन निगम के सम्बन्ध में, राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) के उपबन्धों के अधीन यथागठित पंजाब राज्य की सरकार अभिप्रेत होगी;

 [(iii) असम राज्य सड़क परिवहन निगम के सम्बन्ध में, पूर्वोत्तर क्षेत्र पुनर्गठन अधिनियम, 1971 (1971 का 81) के अधीन यथागठित असम या मेघालय राज्य की सरकार अभिप्रेत होगी ।]

(2) ऐसी किसी सकीम की प्राप्ति पर, केन्द्रीय सरकार सम्बन्धित राज्य सरकार से परामर्श के पश्चात् स्कीम को उपान्तरों सहित या उनके बिना अनुमोदित कर सकेगी और अनुमोदित स्कीम को कार्यान्वित करने के प्रयोजन के लिए केन्द्रीय सरकार समय-समय पर उसके सम्बन्ध में ऐसे आदेश कर सकेगी, जैसे वह ठीक समझे, और इस प्रकार किया गया हर आदेश इस अधिनियम में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, प्रभावी होगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन किया गया कोई आदेश निम्नलिखित सभी या किन्हीं बातों के लिए उपबन्ध कर                         सकेगा, अर्थात् :-

                (क) धारा 39 में किसी बात के अन्तर्विष्ट होते हुए भी, निगम का विघटन;

(ख) निगम का, जिसके अन्तर्गत उसका स्थापन है, और जहां आवश्यक हो किसी राज्य में एक निगम से अधिक का, चाहे किसी भी रीति से पुनर्संगठन या पुनर्गठन;

(ग) दो या अधिक निगमों का, अथवा किसी एक निगम का किसी अन्य राज्य सरकार के किसी अन्य निगम निकाय या वाणिज्यिक उपक्रम से समामेलन;

(घ) किसी निगम के क्षेत्र को, जिसके लिए वह स्थापित किया गया है, विस्तारित करना या उससे किसी क्षेत्र का निकाल लेना;

(ङ) निगम की पूरी आस्तियों, अधिकारों और दायित्वों का या उनके भाग का, जिसके अन्तर्गत उस निगम को अनुदत्त अनुज्ञप्तियां या अनुज्ञापत्र हैं, किसी अन्य राज्य सरकार का किसी अन्य निगम, निगम निकाय या वाणिज्यिक उपक्रम को अन्तरण, तथा ऐसे अन्तरण के निबन्धन और शर्तें;

(च) निगम के किन्हीं कर्मकारों का किसी ऐसे अन्तरिती को या उसके द्वारा अन्तरण या पुनर्नियोजन और राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) की धारा 111 के उपबन्धों  [या राज्यों के पुनर्गठन से सम्बन्धित किसी अन्य अधिनियमितिट के अधीन ऐसे अन्तरण या पुनर्नियोजन के पश्चात् ऐसे कर्मकारों को लागू होने वाली सेवा के निबन्धन            और शर्तें;

(छ) ऐसे आनुषंगिक, पारिणामिक और अनुपूरक विषय जो अनुमोदित स्कीम को कार्यान्वित करने के लिए  आवश्यक हों ।

(4) जहां इस धारा के अधीन निगम की आस्तियों, अधिकारों और दायित्वों को अन्तरित करने के लिए आदेश किया जाता है वहां वे आस्तियां, अधिकार और दायित्व अन्तरिती में निहित होंगे और उसकी आस्तियां, अधिकार और दायित्व हो जाएंगे ।]

 [48. मुम्बई राज्य सड़क परिवहन निगम से सम्बन्धित संक्रमणकालीन उपबन्ध-धारा 47क में किसी बात के होते हुए भी मुम्बई राज्य सरकार के लिए यह विधिपूर्ण होगा कि उसकी उपधारा (1) के अधीन वह स्कीम तैयार करे और उसे 1960 के मई के प्रथम दिन के पूर्व केन्द्रीय सरकार को अग्रेषित कर दे, और ऐसी दशा में, उसकी उपधारा (2) के अधीन, आदेश करने की जो शक्ति केन्द्रीय सरकार को प्रदत्त है, उसका उस दिन के पूर्व, प्रयोग किया जा सकेगा किन्तु इस प्रकार किया गया कोई भी आदेश उस दिन तक प्रभावी नहीं होगा ।]

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