गोवा, दमण और दीव (आमेलित कर्मचारी) अधिनियम, 1965
(1965 का अधिनियम संख्यांक 50)
[22 दिसम्बर, 1965]
गोवा, दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संसंग में
सेवा के लिए आमेलित व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के
विनियमन और उससे संसक्त बातों के लिए
उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के सोलहवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
1. संक्षिप्त नाम-यह अधिनियम गोवा, दमण और दीव (आमेलित कर्मचारी) अधिनियम, 1965 कहा जा सकेगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) आमेलित कर्मचारी" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो दिसम्बर, 1961 के 20वें दिन से अव्यवहित पूर्व कोई आमेलित पद धारण किए हुए था और जो उस तारीख को और उसके पश्चात् या तो गोवा, दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संसंग में उस या किसी अन्य पद पर या केन्द्रीय सरकार के विभागों में से किसी में सेवा करता था या करता आ रहा है;
(ख) आमेलित पद" से ऐसी सिविल सेवा या ऐसा पद अभिप्रेत है जो गोवा, दमण और दीव में पूर्ववर्ती पुर्तगाली प्रशासन के अधीन दिसम्बर, 1961 के 20वें दिन से अव्यवहित पूर्व अस्तित्व में था ।
3. आमेलित कर्मचारियों की और कतिपय निगमों के कर्मचारियों की भर्ती और सेवा की शर्तों को विनियमित करने के लिए नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित के लिए नियम बना सकेगी-
(क) आमेलित पदों पर भर्ती और आमेलित कर्मचारियों की सेवा की शर्तों का विनियमन;
(ख) उन व्यक्तियों की सेवा की शर्तों का विनियमन जो दिसम्बर, 1961 के 20वें दिन से अव्यवहित पूर्व किसी निगम की (चाहे वह जुन्टा के नाम से ज्ञात हो या अन्यथा) सेवा में थे और उस तारीख पर या उसके पश्चात् या तो गोवा, दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संसंग में या केन्द्रीय सरकार के विभागों में से किसी में सेवा करते थे या करते आ रहे हैं ।
(2) ऐसा कोई भी नियम ऐसे बनाया जा सकेगा कि वह किसी भी तारीख से भूतलक्षी हो जो दिसम्बर, 1961 के 20वें दिन से पहले की न हो:
परन्तु कोई भी व्यक्ति ऐसे भूतलक्षी प्रभाव के आधार पर किसी भी ऐसी रकम का प्रतिदाय करने का दायी न होगा जो उसे ऐसा कोई नियम बनाने से पहले सम्बलम् या भत्तों या पेंशन के रूप में दी गई थी ।
(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया हर नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, संसद् के हर एक सदन के समक्ष, उस समय जब वह सत्र में हो, कुल मिलाकर तीस दिन की कालावधि के लिए, जो एक सत्र में या दो क्रमवर्ती सत्रों में समाविष्ट हो सकेगी, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के, जिसमें वह ऐसे रखा गया हो, या अव्यवहित पश्चात्वर्ती सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई उपान्तर करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात्, यथास्थिति, वह नियम, ऐसे उपान्तरित रूप में ही प्रभावशील होगा या उसका कोई भी प्रभाव न होगा, किन्तु ऐसे कि ऐसा कोई उपान्तर या बातिलकरण उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना होगा ।
4. निरसन-(1) धारा 3 के अधीन किसी भी नियम के बनाए जाने पर, किसी भी ऐसे विषय के बारे में जिसके लिए से नियम में उपबन्ध किया गया हो, तत्स्थानी विधि, यदि कोई हो, उस नियम के प्रवर्तन में आने की तारीख से निरसित हो जाएगी ।
(2) साधारण खण्ड अधिनियम, 1897 (1897 का 10) की धाराओं 6 और 24 के उपबन्ध ऐसे निरसन को ऐसे लागू होंगे, मानो उपधारा (1) में निर्दिष्ट नियम और तत्स्थानीय विधि केन्द्रीय अधिनियम हों ।
5. कठिनाइयों का निराकरण करने की शक्ति-यदि इस अधिनियम के, या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के उपबन्धों को किसी आमेलित कर्मचारी के या धारा 3 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के बारे में प्रभावशील करने में कोई कठिनाई उद्भूत हो, तो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, ऐसा उपबन्ध बना सकेगी जैसा उसको उस कठिनाई के निराकरण के लिए आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो :
परन्तु इस धारा के अधीन की शक्ति इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष की कालावधि के अवसान के पश्चात् प्रयोक्तव्य न होगी ।
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