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नैदानिक स्थापन (रजिस्ट्रीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 ( Clinical Establishments (Registration and Regulation) Act, 2010 )


 

नैदानिक स्थापन (रजिस्ट्रीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010

(2010 का अधिनियम संख्यांक 23)

[18 अगस्त, 2010]

देश में नैदानिक स्थापनों के रजिस्ट्रीकरण और विनियमन तथा

उनसे संबंधित या उनके आनुषंगिक विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

नैदानिक स्थापनों के, उनके द्वारा उपलब्ध कराए जाने वाली सुविधाओं और सेवाओं के न्यूनतम मानक विहित करने की दृष्टि से, रजिस्ट्रीकरण और विनियमन का उपबंध करना समीचीन समझा गया है, जिससे कि लोक स्वास्थ्य के सुधार के लिए संविधान के अनुच्छेद 47 के आदेश का पालन किया जा सके;

और, संसद् को, संविधान के अनुच्छेद 249 और अनुच्छेद 250 में यथा उपबंधित के सिवाय, पूर्वोक्त में से किसी विषय के संबंध में राज्यों के लिए विधियां बनाने की शक्ति नहीं है;

और संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अनुसरण में, अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और सिक्किम राज्यों के विधान-मंडलों के सभी सदनों द्वारा इस आशय के संकल्प पारित कर दिए गए हैं कि उन राज्यों में पूर्वोक्त विषयों को संसद् द्वारा, विधि द्वारा विनियमित किया जाना चाहिए;

भारत गणराज्य के इकसठवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-

अध्याय 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम, लागू होना और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम नैदानिक स्थापन (रजिस्ट्रीकरण और विनियमन) अधिनियम, 2010 है ।

(2) यह, प्रथमतः संपूर्ण अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और सिक्किम राज्यों तथा संघ राज्यक्षेत्रों को लागू होगा; और यह ऐसे अन्य राज्य को लागू होगा, जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अधीन इस निमित्त पारित संकल्प द्वारा इस अधिनियम को अंगीकार करता है । 

(3) यह अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मिजोरम और सिक्किम राज्यों में तुरंत प्रवृत्त होगा और संघ राज्यक्षेत्रों में उस तारीख को प्रवृत्त होगा, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियत करे, और किसी ऐसे अन्य राज्य में, जो संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1)  के अधीन इस अधिनियम को अंगीकार करे, उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिस तारीख को यह अंगीकार किया जाता है और किसी राज्य या संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में इस अधिनियम में, इस अधिनियम के प्रारंभ के प्रति किसी निर्देश से वह तारीख अभिप्रेत है, जिसको ऐसे राज्य या संघ राज्यक्षेत्र में यह अधिनियम प्रवृत्त होता है :

परंतु नैदानिक स्थापनों के भिन्न-भिन्न प्रवर्गों और भिन्न-भिन्न मान्यताप्राप्त चिकित्सा पद्धतियों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें नियत की जा सकेंगी ।   

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -

(क) प्राधिकारी" से धारा 10 के अधीन स्थापित जिला रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी अभिप्रेत है;

(ख) प्रमाणपत्र" से धारा 30 के अधीन जारी किया गया रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अभिप्रेत है;

(ग) नैदानिक स्थापन" से निम्नलिखित अभिप्रेत है, -

(i) किसी व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय द्वारा, चाहे निगमित हो या नहीं, स्थापित और प्रशासित या अनुरक्षित ऐसा कोई अस्पताल, प्रसूति गृह, परिचर्या गृह, औषधालय, क्लीनिक, सेनिटोरियम या कोई संस्था, चाहे किसी भी नाम से ज्ञात हो, जो किसी मान्यताप्राप्त चिकित्सा पद्धति में रुग्णता क्षति, विरूपता, अप्रसामान्यता या गर्भावस्था के लिए अपेक्षित निदान, उपचार या देखरेख की सेवाएं, सुविधाएं प्रदान करते हैं;

(ii) रोगों के निदान या उपचार के संबंध में उपखंड (i) में निर्दिष्ट किसी स्थापन की स्वंतत्र इकाई या उसके भाग के रूप में स्थापित कोई स्थान, जहां किसी व्यक्ति या व्यक्ति-निकाय द्वारा, चाहे निगमित हो या नहीं, सामान्यतया प्रयोगशाला या अन्य चिकित्सीय उपस्करों की सहायता से विकृतिजन्य, जीवाणु विज्ञान संबंधी, आनुवंशिकी, विकिरण चिकित्सा संबंधी, रासायनिक, जैविक अन्वेषण या अन्य निदान संबंधी अथवा अन्वेषण संबंधी सेवाएं चलाई जाती हैं, स्थापित और प्रशासित की जाती हैं या अनुरक्षित रखी जाती हैं,

और इसके अंतर्गत ऐसा नैदानिक स्थापन भी है, जो, -

(क) सरकार या सरकार के किसी विभाग;

(ख) किसी न्यास, चाहे लोक या निजी हो;

(ग) किसी केन्द्रीय, प्रांतीय या राज्य अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकृत किसी निगम (जिसके अंतर्गत सोसाइटी भी है), चाहे सरकार के स्वामित्वाधीन हो या नहीं;

(घ) किसी स्थानीय प्राधिकारी; और

(ङ) किसी एक डॉक्टर, के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या प्रबंधनाधीन है, किन्तु इसके अन्तर्गत सशस्त्र बलों के स्वामित्वाधीन, नियंत्रणाधीन या प्रबंधनाधीन नैदानिक स्थापना नहीं है ।

स्पष्टीकरण-इस खंड के प्रयोजन के लिए, सशस्त्र बलों" से सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46), वायुसेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45) और नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का 62) के अधीन गठित बल अभिप्रेत हैं;

() आपात चिकित्सा दशा" से ऐसी चिकित्सा दशा अभिप्रेत है, जिसमें ऐसी प्रकृति की पर्याप्त गंभीरता (जिसके अंतर्गत तीव्र दर्द भी है) के तीव्र लक्षणों से ही यह प्रकट होता है कि तुरंत चिकित्सा देखभाल के अभाव के परिणामस्वरूप, -

(i) व्यष्टि के स्वास्थ्य या किसी गर्भवती स्त्री या अजन्मे बालक के स्वास्थ्य को गंभीर खतरा होने; या

(ii) शारीरिक सक्रियता को गंभीर क्षति होने; या

(iii) शरीर के किसी अंग या भाग में गंभीर दुष्क्रियता होने, की युक्तियुक्त रूप से संभावना हो सकती है;

(ङ) राष्ट्रीय परिषद्" से धारा 3 के अधीन स्थापित राष्ट्रीय नैदानिक स्थापन परिषद् अभिप्रेत है;

(च) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;

(छ) विहित" से, यथास्थिति, केन्द्रीय सरकार या राज्य सरकार द्वारा इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;

(ज) मान्यताप्राप्त आयुर्विज्ञान पद्धति" से, ऐलोपैथी, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, आयुर्वेद, होम्योपैथी, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा पद्धति या कोई ऐसी अन्य आयुर्विज्ञान पद्धति अभिप्रेत है, जिसे केन्द्रीय सरकार द्वारा मान्यता प्रदान की जाए;

(झ) रजिस्टर" से इस अधिनियम की क्रमशः धारा 37, धारा 38 और धारा 39 के अधीन प्राधिकारी, राज्य सरकार तथा केन्द्रीय सरकार द्वारा रखा गया ऐसा रजिस्टर अभिप्रेत है, जिसमें रजिस्ट्रीकृत नैदानिक स्थापनों की संख्या अंतर्विष्ट है;

(ञ) रजिस्ट्रीकरण" से धारा 11 के अधीन रजिस्ट्रीकृत करना अभिप्रेत है और रजिस्ट्रीकरण या रजिस्ट्रीकृत पदों का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा;

(ट) नियम" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियम अभिप्रेत हैं;

(ठ) अनुसूची" से इस अधिनियम से संलग्न अनुसूची अभिप्रेत है;

(ड) मानकों" से वे शर्तें अभिप्रेत हैं, जिन्हें केन्द्रीय सरकार धारा 12 के अधीन नैदानिक स्थापनों के रजिस्ट्रीकरण के लिए विहित करे;

(ढ) किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, राज्य सरकार" से संविधान के अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त उसका प्रशासक अभिप्रेत है; और

(ण) खंड (घ) में विनिर्दिष्ट आपात चिकित्सा दशा के संबंध में, स्थिर करना (उसके व्याकरणीय रूपभेदों और सजातीय पदों सहित)" से उस दशा का ऐसा चिकित्सीय उपचार उपलब्ध कराना अभिप्रेत है, जो युक्तियुक्त चिकित्सा संभाव्यताओं के भीतर यह सुनिश्चित करने के लिए अनिवार्य हो कि किसी नैदानिक स्थापन से व्यष्टि के स्थानांतरण के परिणामरूवरूप या उसके दौरान दशा में कोई तात्त्विक ह्रास होने की संभावना नहीं है ।

अध्याय 2

राष्ट्रीय नैदानिक स्थापन परिषद्

3. राष्ट्रीय परिषद् की स्थापना-(1) उस तारीख से, जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए, राष्ट्रीय नैदानिक स्थापन परिषद् नामक एक परिषद् की स्थापना की जाएगी

(2) राष्ट्रीय परिषद् निम्नलिखित से मिलकर बनेगीः-

(क) महानिदेशक, स्वास्थ्य सेवा, स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय, पदेन, जो अध्यक्ष होगा;

(ख) चार प्रतिनिधि, जिनमें से एक-एक प्रतिनिधि निम्नलिखित द्वारा निर्वाचित किया जाएगा, -

(i) दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 (1948 का 16) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय दंत चिकित्सा परिषद्;

(ii) भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद्;

(iii) भारतीय नर्स परिषद् अधिनियम, 1947 (1947 का 48) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय नर्स परिषद्;

(iii) भेषजी अधिनियम, 1948 (1948 का 8) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय भेषजी परिषद्;

(ग) भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् अधिनियम, 1970 (1970 का 48) की धारा 3 के अधीन गठित आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी चिकित्सा पद्धति का प्रतिनिधित्व करने वाली भारतीय चिकित्सा केन्द्रीय परिषद् द्वारा निर्वाचित किए जाने वाले तीन प्रतिनिधि;

(घ) केन्द्रीय होम्योपैथी परिषद् अधिनियम, 1973 (1973 का 59) की धारा 3 के अधीन गठित केन्द्रीय परिषद् द्वारा निर्वाचित किया जाने वाला एक प्रतिनिधि;

(ङ) भारतीय चिकित्सा संगम केन्द्रीय परिषद् द्वारा निर्वाचित किया जाने वाला एक प्रतिनिधि;

(च) भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम, 1986 (1986 का 63) की धारा 3 के अधीन गठित भारतीय मानक ब्यूरो का एक प्रतिनिधि;

(छ) राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) की धारा 15 के अधीन क्षेत्रीय परिषदों से दो प्रतिनिधि;

(ज) पूर्वोतर परिषद् अधिनियम, 1971 (1971 का 84) की धारा 3 के अधीन गठित पूर्वोत्तर परिषद् से दो प्रतिनिधि;

(झ) उन पद्धतियों को छोड़कर, जिन्हें खंड (ख) के अधीन प्रतिनिधित्व दिया गया है परा-चिकित्सा पद्धतियों की पंक्ति के एक प्रतिनिधि;

(ञ) राष्ट्रीय स्तर के उपभोक्ता समूह के दो प्रतिनिधि, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किए जाएं;

(ट) आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी से संबंधित भारतीय आयुर्विज्ञान पद्धति संगम से एक प्रतिनिधि जो केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाए;

(ठ) भारतीय कवालिटी परिषद् का महासचिव, पदेन ।

(3) राष्ट्रीय परिषद् के नामनिर्दिष्ट सदस्य, तीन वर्ष के लिए पद धारण करेंगे, किंतु वे अधिकतम तीन वर्ष की एक और अवधि के लिए पुनःनामनिर्देशन के लिए पात्र होंगे ।

(4) राष्ट्रीय परिषद् के निर्वाचित सदस्य, तीन वर्ष के लिए पद धारण करेंगे, किंतु वे पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र होंगे:

परंतु, यथास्थिति, नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्ति, उस अवधि के लिए पद धारण करेगा, जब तक वह उस पद को धारण करता है, जिसके आधार पर वह केन्द्रीय परिषद् में नामनिर्देशित या निर्वाचित हुआ था ।

(5) राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य ऐसे भत्तों के लिए हकदार होंगे, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(6) राष्ट्रीय परिषद्, केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के अधीन रहते हुए, गणपूर्ति नियत करने और अपनी स्वयं की प्रक्रिया को विनियमित करने तथा उसके द्वारा संव्यवहार किए जाने वाली सभी कारबार के संचालन के लिए उपविधियां बना सकेगी ।

(7) राष्ट्रीय परिषद्, तीन मास में कम से कम एक बार बैठक करेगी ।

(8) राष्ट्रीय परिषद्, विशिष्ट विषयों पर विचार करने के लिए, उपसमितियों का गठन कर सकेगी और ऐसी उपसमितियों में, जो वह ठीक समझे, ऐसे व्यक्तियों को, जो परिषद् के सदस्य नहीं हैं, दो वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए नियुक्त कर सकेगी ।

(9) राष्ट्रीय परिषद् के कृत्यों का, उसमें किसी रिक्ति के होते हुए भी, निर्वहन किया जा सकेगा ।

(10) केन्द्रीय सरकार, ऐसे व्यक्ति को राष्ट्रीय परिषद् के सचिव के रूप में नियुक्त करेगी, जो केन्द्रीय सरकार विहित करे और राष्ट्रीय परिषद् को ऐसे अन्य सचिवीय और अन्य कर्मचारिवृंद उपलब्ध करा सकेगी, जो केन्द्रीय सरकार आवश्यक समझे ।

4. सदस्य के रूप में नियुक्ति के लिए निरर्हताएं-कोई व्यक्ति, राष्ट्रीय परिषद् के सदस्य के रूप में नियुक्त किए जाने के लिए निरर्हित होगा, यदि, -

(क) उसे किसी ऐसे अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है और कारावास से दंडित किया गया है, जिसमें केन्द्रीय सरकार की राय में, नैतिक अधमता अंतर्वलित है; या

(ख) वह अनुन्मोचित दिवालिया है; या

(ग) वह विकृतचित्त का है और उसे किसी सक्षम न्यायालय द्वारा उस रूप में घोषित किया गया है; या

(घ) उसे सरकार की या सरकार के स्वामित्वाधीन या नियंत्रणाधीन किसी निगम की सेवा से हटाया या पदच्युत किया गया है; या

(ङ) केन्द्रीय सरकार की राय में, उसका परिषद् में ऐसा वित्तीय या अन्य हित है, जिससे सदस्य के रूप में उसके द्वारा अपने कृत्यों के निर्वहन में प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की संभावना है ।

5. राष्ट्रीय परिषद् के कृत्य-राष्ट्रीय परिषद्-

(क) इस अधिनियम के प्रारंभ की तारीख से दो वर्ष के भीतर नैदानिक स्थापनों का एक रजिस्टर संकलित और प्रकाशित करेगी;

(ख) नैदानिक स्थापनों को विभिन्न प्रवर्गों में वर्गीकृत करेगी;  

(ग) न्यूनतम मानक और उनका आवधिक पुनर्विलोकन विकसित करेगी;

(घ) अपनी स्थापना से दो वर्ष की अवधि के भीतर, नैदानिक स्थापनों द्वारा उचित स्वास्थ्य देखरेख सुनिश्चित करने वाले मानकों के प्रथम सेट का अवधारण करेगी;

(ङ) नैदानिक स्थापनों के संबंध में आंकड़ों का संग्रहण करेगी;

(च) केन्द्रीय सरकार द्वारा, समय-समय पर, अवधारित किसी अन्य कृत्य का पालन करेगी ।

6. सलाह या सहायता लेने की शक्ति-राष्ट्रीय परिषद्, किसी ऐसे व्यक्ति या निकाय को अपने साथ सहयुक्त कर सकेगी, जिसकी सहायता या सलाह की, इस अधिनियम के किन्हीं उपबंधों के क्रियान्वयन में, वह वांछा करे ।

7. राष्ट्रीय परिषद् द्वारा परामर्शी प्रक्रिया का पालन किया जाना-राष्ट्रीय परिषद्, मानकों का अवधारण करने और नैदानिक स्थापनों के वर्गीकरण के लिए, ऐसी प्रक्रिया के अनुसार, जो विहित की जाए, परामर्शी प्रक्रिया का पालन करेगी ।

अध्याय 3

नैदानिक स्थापनों का रजिस्ट्रीकरण और उसके लिए मानक

8. राज्य नैदानिक स्थापन परिषद्-(1) प्रत्येक राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, यथास्थिति, राज्य नैदानिक स्थापन परिषद् या संघ राज्यक्षेत्र नैदानिक स्थापन परिषद् का गठन करेगी ।

(2) यथास्थिति, राज्य परिषद् या संघ राज्यक्षेत्र परिषद्, निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्ः-

(क) सचिव, स्वास्थ्य-पदेन, जो अध्यक्ष होगा;

(ख) स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक-पदेन, सदस्य-सचिव;

(ग) भारतीय आयुर्विज्ञान पद्धतियों की विभिन्न शाखाओं के निदेशक-पदेन, सदस्य;

(घ) निम्नलिखित की कार्यकारी समिति द्वारा निर्वाचित किए जाने वाला प्रत्येक का एक प्रतिनिधि-

(i) भारतीय राज्य चिकित्सा परिषद्;

(ii) भारतीय राज्य दन्त चिकित्सा परिषद्;

(iii) भारतीय राज्य नर्स परिषद्;

(iv) भारतीय राज्य भेषजी परिषद्;

(ङ) यथास्थिति, राज्य परिषद् या संघ राज्यक्षेत्र परिषद् द्वारा निर्वाचित किए जाने वाले आयुर्विज्ञान की आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी पद्धतियों का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन प्रतिनिधि;

(च) भारतीय चिकित्सा संगम की राज्य परिषद् द्वारा निर्वाचित किया जाने वाला एक प्रतिनिधि;

(छ) परा-चिकित्सा पद्धतियों से एक प्रतिनिधि;

() स्वास्थ्य के क्षेत्र में कार्य कर रहे राज्य स्तरीय उपभोक्ता समूहों या ख्यातिप्राप्त गैर-सरकारी संगठनों से दो प्रतिनिधि

(3) यथास्थिति, राज्य परिषद् या संघ राज्यक्षेत्र परिषद् का नामनिर्देशित सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेगा, किंतु वह अधिकतम तीन वर्ष की एक और अवधि के लिए पुनः नामनिर्देशन के लिए पात्र होगा ।

(4) यथास्थिति, राज्य परिषद् या संघ राज्यक्षेत्र परिषद् के निर्वाचित सदस्य तीन वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करेंगे, किंतु वे पुनर्निर्वाचन के लिए पात्र होंगे:

परंतु, यथास्थिति, नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्ति तब तक पद धारण करेगा, जब तक वह उस पद की नियुक्ति धारण करता है, जिसके आधार पर उसे, यथास्थिति, राज्य परिषद् या संघ राज्यक्षेत्र परिषद् के लिए नामनिर्देशित या निर्वाचित किया गया था ।

(5) राज्य परिषद् या संघ राज्यक्षेत्र परिषद् निम्नलिखित कृत्यों का पालन करेगी, अर्थात्ः-

(क) राज्य नैदानिक स्थापन रजिस्टरों को संकलित और अद्यतन करना;

(ख) राष्ट्रीय रजिस्टर को अद्यतन करने के लिए मासिक विवरणियां भेजना;

(ग) राष्ट्रीय परिषद् में राज्य का प्रतिनिधित्व करना;

(घ) प्राधिकरण के आदेशों के विरुद्ध अपीलों की सुनवाई करना;

(ङ) अपने संबंधित राज्यों के भीतर मानकों को कार्यान्वित करने की स्थिति के संबंध में वार्षिक आधार पर रिपोर्ट प्रकाशित करना ।

9. राष्ट्रीय परिषद् को सूचना उपलब्ध कराना-राज्य नैदानिक स्थापन परिषद् का यह उत्तरदायित्व होगा कि वह नैदानिक स्थापनों के राज्य रजिस्टर को संकलित और अद्यतन करे और इसके अतिरिक्त, राष्ट्रीय रजिस्टर को अद्यतन करने के लिए अंकीय प्ररूप में मासिक विवरणियां भेजे ।

10. रजिस्ट्रीकरण प्राधिकरण-(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, नैदानिक स्थापनों के रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रत्येक जिले के लिए जिला रजिस्ट्रीकरण प्राधिकरण के नाम से ज्ञात निम्नलिखित सदस्यों वाले एक प्राधिकरण की स्थापना करेगी, अर्थात्ः-

(क) जिला कलक्टर-अध्यक्ष;

(ख) जिला स्वास्थ्य अधिकारी-संयोजक;

() ऐसी अर्हताओं वाले और ऐसे निबंधनों और शर्तों पर, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं, तीन सदस्य

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, धारा 14 के अधीन नैदानिक स्थापनों के अनंतिम रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजनों के लिए जिला स्वास्थ्य अधिकारी या मुख्य चिकित्सा अधिकारी (चाहे जो भी नाम हो) उस प्रक्रिया के अनुसार, जो विहित की जाए, प्राधिकरण की शक्तियों का प्रयोग करेगा ।

11. नैदानिक स्थापनों का रजिस्ट्रीकरण-कोई व्यक्ति, किसी नैदानिक स्थापन को तभी चलाएगा, जब उसे इस अधिनियम के उपबंधों के अनुसार सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत किया गया है ।

12. रजिस्ट्रीकरण के लिए शर्त-(1) प्रत्येक नैदानिक स्थापन, रजिस्ट्रीकरण और बने रहने के लिए निम्नलिखित शर्तों को पूरा करेगा, अर्थात्ः-

(i) सुविधाओं और सेवाओं के ऐसे न्यूनतम मानक, जो विहित किए जाएं;

(ii) कार्मिकों की न्यूनतम अपेक्षाएं, जो विहित की जाएं;

(iii) अभिलेखों को रखने और रिपोर्ट करने के लिए उपबंध, जो विहित किए जाएं;

(iv) ऐसी अन्य शर्तें, जो विहित की जाएं ।

(2) नैदानिक स्थापन उपलब्ध कर्मचारिवृंद और सुविधाओं के भीतर ऐसी चिकित्सीय परीक्षा और उपचार उपलब्ध करवाने का उत्तरदायित्व लेगा, जो ऐसे व्यष्टि की जो उस नैदानिक स्थापन में आता है या लाया जाता है, आपात चिकित्सीय दशा को स्थिर करने के लिए अपेक्षित हों ।

13. नैदानिक स्थापनों का वर्गीकरण-(1) भिन्न-भिन्न पद्धतियों के नैदानिक स्थापनों को उन प्रवर्गों में वगीकृत किया जाएगा, जो समय-समय पर, केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित किए जाएं ।

(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट भिन्न-भिन्न प्रवर्गों के वर्गीकरण के लिए भिन्न-भिन्न मानक विहित किए जा सकेंगे:

परंतु केन्द्रीय सरकार, नैदानिक स्थापनों के लिए मानक विहित करने में स्थानीय दशाओं का ध्यान रखेगी ।

अध्याय 4

रजिस्ट्रीकरण के लिए प्रक्रिया

14. अनंतिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के लिए आवेदन-(1) धारा 10 के अधीन नैदानिक स्थापन के रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजनों के लिए, विहित प्ररूप में कोई आवेदन, विहित फीस से साथ, प्राधिकारी को किया जाएगा ।

(2) आवेदन व्यक्तिगत रूप में या डाक द्वारा या ऑन लाइन फाइल किया जाएगा ।

(3) आवेदन ऐसे प्ररूप में किया जाएगा और उसके साथ ऐसे ब्यौरे दिए जाएंगे, जो इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन विहित किए जाएं ।

(4) यदि कोई नैदानिक स्थापन इस अधिनियम के प्रारंभ के समय विद्यमान है तो उसके रजिस्ट्रीकरण के लिए कोई आवेदन, इस अधिनियम के प्रांरभ की तारीख से एक वर्ष के भीतर किया जा सकेगा और कोई ऐसा नैदानिक स्थापन, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् अस्तित्व में आया है, अपने स्थापन की तारीख से छह मास की अवधि के भीतर स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए    आवेदन करेगा ।

(5) यदि कोई नैदानिक स्थापन, ऐसे स्थापनों के रजिस्ट्रीकरण की अपेक्षा करने वाली किसी विद्यमान विधि के अधीन पहले से ही रजिस्ट्रीकृत है, फिर भी वह उपधारा (1) में यथानिर्दिष्ट रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करेगा

15. अनंतिम प्रमाणपत्र-प्राधिकारी, ऐसे आवेदन की प्राप्ति की तारीख से दस दिन की अवधि के भीतर, आवेदक को, ऐसे प्ररूप में और ऐसी विशिष्टियां तथा ऐसी सूचना अंतर्विष्ट करते हुए, जो विहित की जाएं, अनंतिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त करेगा ।

16. अनंतिम रजिस्ट्रीकरण से पूर्व जांच का किया जाना-(1) प्राधिकारी, अनंतिम रजिस्ट्रीकरण अनुदत्त किए जाने से पूर्व कोई जांच नहीं करेगा ।

(2) अनंतिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र के अनुदत्त होते हुए भी, प्राधिकारी अनंतिम रजिस्ट्रीकरण अनुदत्त किए जाने की तारीख से पैंतालीस दिन की अवधि के भीतर इस प्रकार अनंतिम रूप से रजिस्ट्रीकृत नैदानिक स्थापन की सभी विशिष्टियों को, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, प्रकाशित करवाएगा ।

17. अनंतिम रजिस्ट्रीकरण की विधिमान्यता-धारा 23 के उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रत्येक अनंतिम रजिस्ट्रीकरण, रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी किए जाने की तारीख से बारहवें मास के अंतिम दिन तक विधिमान्य होगा और ऐसा रजिस्ट्रीकरण नवीकरणीय होगा ।

18. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का संप्रदर्शन-प्रमाणपत्र को नैदानिक स्थापन में किसी सहजदृश्य स्थान पर, ऐसी रीति में चिपकाया जाएगा, जिससे वह उस स्थापन में आने वाले प्रत्येक व्यक्ति के लिए दृश्यमान हो ।

19. प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति-प्रमाणपत्र के खो जाने, नष्ट, विकृत या उसकी क्षति होने की दशा में, प्राधिकारी नैदानिक स्थापन के अनुरोध पर और ऐसी फीस का संदाय करने पर, जो विहित की जाए, प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति जारी करेगा ।

20. प्रमाणपत्र का अहस्तांतरणीय होना-(1) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अहस्तांतरणीय होगा ।

(2) स्वामित्व या प्रबंधन के परिवर्तन की दशा में, नैदानिक स्थापन ऐसे परिवर्तन की, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, प्राधिकारी को सूचना देगा ।

(3) प्रवर्ग या अवस्थान के परिवर्तन की दशा में या नैदानिक स्थापन के रूप में कार्य न करने पर, ऐसे नैदानिक स्थापन के संबंध में रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र प्राधिकारी को अभ्यर्पित कर दिया जाएगा और नैदानिक स्थापन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र अनुदत्त किए जाने के लिए नए सिरे से आवेदन करेगा ।

21. रजिस्ट्रीकरण की समाप्ति का प्रकाशन-प्राधिकारी, ऐसी अवधि के भीतर और ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, ऐसे नैदानिक स्थापनों के नाम जिनका रजिस्ट्रीकरण समाप्त हो गया है, प्रकाशित करवाएगा ।

22. रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण-रजिस्ट्रीकरण के नवीकरण के लिए आवेदन, अनंतिम रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की विधिमान्यता की समाप्ति से तीस दिन पूर्व किया जाएगा और अनंतिम रजिस्ट्रीकरण की समाप्ति के पश्चात्, नवीकरण के लिए आवेदन किए जाने की दशा में, प्राधिकारी, ऐसी वर्धित फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण अनुज्ञात करेगा ।

23. अनंतिम रजिस्ट्रीकरण के लिए समय-सीमा-ऐसे नैदानिक स्थापन को, जिसके संबंध में केन्द्रीय सरकार द्वारा मानकों को अधिसूचित किया गया है, निम्नलिखित अवधि से परे अनंतिम प्रमाणपत्र अनुदत्त या नवीकृत नहीं किया जाएगा: -

(i) ऐसे नैदानिक स्थापनों की दशा में, जो इस अधिनियम के प्रारंभ से पूर्व अस्तित्व में आए हैं, मानकों की अधिसूचना की तारीख से दो वर्ष की अवधि;

(ii) ऐसे नैदानिक स्थापनों के लिए, मानकों की अधिसूचना से दो वर्ष की अवधि, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् और मानकों की अधिसूचना के पूर्व अस्तित्व में आए हैं; और

(iii) ऐसे नैदानिक स्थापनों के लिए, जो मानकों के अधिसूचित किए जाने के पश्चात् अस्तित्व में आए हों, मानकों की अधिसूचना की तारीख से छह मास की अवधि ।

24. स्थायी रजिस्ट्रीकरण लिए आवेदन-किसी नैदानिक स्थापन द्वारा स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन, प्राधिकारी को ऐसे प्ररूप में किया जाएगा और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए ।

25. आवेदन का सत्यापन-नैदानिक स्थापन, विहित न्यूनतम मानकों का, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, अनुपालन किए जाने के बारे में साक्ष्य प्रस्तुत करेगा ।

26. आक्षेप फाइल करने के लिए सूचना का संप्रदर्शन-नैदानिक स्थापन द्वारा, इस बात का अपेक्षित साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने पर कि विहित न्यूनतम मानकों का अनुपालन किया गया है, यथाशीघ्र, प्राधिकारी, विहित न्यूनतम मानकों का अनुपालन किए जाने के बारे में उस नैदानिक स्थापन द्वारा प्रस्तुत किए गए सभी साक्ष्यों को, स्थायी रजिस्ट्रीकरण अनुदत्त करने के लिए कार्रवाई करने से पूर्व तीस दिन की अवधि के लिए, जनसाधरण की जानकारी के लिए और आक्षेप, यदि कोई हों, फाइल करने के लिए, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, संप्रदर्शित कराएगा ।

27. आक्षेपों की संसूचना-पूर्ववर्ती धारा में निर्दिष्ट अवधि के भीतर आक्षेप प्राप्त होने की दशा में, ऐसे आक्षेपों को, ऐसी अवधि के भीतर, जो विहित की जाए, प्रत्युत्तर के लिए नैदानिक स्थापन को संसूचित किया जाएगा ।

28. स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए मानक-स्थायी रजिस्ट्रीकरण केवल तभी अनुदत्त किया जाएगा, जब कोई नैदानिक स्थापन केन्द्रीय सरकार द्वारा रजिस्ट्रीकरण के लिए विहित मानकों को पूरा करेगा ।

29. रजिस्ट्रीकरण का मंजूर या नामंजूर किया जाना-प्राधिकारी, विहित अवधि की समाप्ति के ठीक पश्चात् आगामी तीस दिन के भीतर, -

(क) स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन को मंजूर करने; या

(ख) आवेदन को नामंजूर करने, का आदेश पारित करेगा:

परंतु प्राधिकारी, यदि स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए किसी आवेदन को नामंजूर करता है तो वह उसके कारण अभिलिखित करेगा ।

30. स्थायी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र-(1) प्राधिकारी यदि नैदानिक स्थापन का आवेदन मंजूर करता है तो वह, ऐसे प्ररूप में और ऐसी विशिष्टियों वाला, जो विहित की जाएं, स्थायी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा ।

(2) प्रमाणपत्र, जारी किए जाने की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए विधिमान्य होगा ।

(3) उपधारा (1) के प्रयोजनों के लिए, धारा 18, धारा 19, धारा 20 और धारा 21 के उपबंध भी लागू होंगे ।

(4) स्थायी रजिस्ट्रीकरण के नवीनकरण के लिए आवेदन, स्थायी रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की विधिमान्यता की समाप्ति से पूर्व छह मास की अवधि के भीतर किया जाएगा और यदि नवीकरण का आवेदन अनुबंधित अवधि के भीतर प्रस्तुत नहीं किया जाता है तो प्राधिकरण ऐसी वर्धित फीस और शास्तियों के संदाय पर, जो विहित की जाएं, रजिस्ट्रीकरण का नवीकरण अनुज्ञात कर सकेगा ।

31. स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए नया आवेदन-स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन का नामंजूर किया जाना, नैदानिक स्थापन को, धारा 24 के अधीन और उन कमियों का सुधार किए जाने, जिनके आधार पर पूर्ववर्ती आवेदन नामंजूर किया गया था, के बारे में ऐसा साक्ष्य उपलब्ध कराने के पश्चात्, जो अपेक्षित हो, स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए नए सिरे से आवेदन करने से वर्जित नहीं करेगा ।

32. रजिस्ट्रीकरण का रद्द किया जाना-(1) यदि किसी नैदानिक स्थापन को रजिस्ट्रीकृत किए जाने के पश्चात्, किसी समय, प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि, -

(क) रजिस्ट्रीकरण की शर्तों का अनुपालन नहीं किया जा रहा है; या

(ख) नैदानिक स्थापन के प्रबंध से न्यस्त व्यक्ति को इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध के लिए सिद्धदोष ठहराया गया है, तो वह नैदानिक स्थापन को यह हेतुक दर्शित करने के लिए सूचना जारी कर सकेगा कि इस अधिनियम के अधीन उसका रजिस्ट्रीकरण, सूचना में उल्लिखित किए जाने वाले कारणों से क्यों न रद्द कर दिया जाए ।

(2) यदि नैदानिक स्थापन को युक्तियुक्त अवसर देने के पश्चात्, प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि इस अधिनियम के उपबंधों में से किसी उपबंध का या उसके अधीन बनाए गए नियमों का भंग हुआ है तो वह, आदेश द्वारा ऐसी किसी अन्य कार्रवाई पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, जो वह उस नैदानिक स्थापन के विरुद्ध कर सकता है, उसका रजिस्ट्रीकरण रद्द कर सकेगा ।

(3) उपधारा (2) के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, -

(क) जहां ऐसे आदेश के विरुद्ध कोई अपील नहीं की गई है, वहां ऐसी अपील के लिए विहित अवधि की ठीक समाप्ति पर; और

() जहां ऐसी अपील की गई है और खारिज कर दी गई है, वहां ऐसे खारिज किए जाने के आदेश की तारीख से, प्रभावी होगाः

परन्तु यदि रोगियों के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर आसन्न संकट है तो, प्राधिकारी, रजिस्ट्रीकरण के रद्द किए जाने के पश्चात्, लेखबद्ध किए जाने वाले कारणों से, नैदानिक स्थापन को कार्य करने से तुरन्त अवरुद्ध कर सकेगा ।

33. रजिस्ट्रीकृत नैदानिक स्थापनों का निरीक्षण-(1) प्राधिकारी या उसके द्वारा प्राधिकृत अधिकारी को, किसी रजिस्ट्रीकृत नैदानिक स्थापन, उसके भवन, प्रयोगशालाओं और उपस्कर के संबंध में तथा नैदानिक स्थापन द्वारा संचालित या किए गए कार्य का भी, ऐसे बहु-सदस्यीय दल द्वारा, जैसा वह निदेश करे, निरीक्षण या जांच कराने और नैदानिक स्थापन से संबद्ध किसी अन्य विषय के संबंध में जांच कराने का अधिकार होगा और वहां स्थापन प्रतिनिधित्व करने का हकदार होगा ।

(2) प्राधिकरण ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणामों के संबंध में उस प्राधिकारी के विचार नैदानिक स्थापन को संसूचित करेगा और उस पर नैदानिक स्थापन की राय अभिप्राप्त करने के पश्चात् की जाने वाली कार्रवाई के बारे में उस स्थापन को सलाह दे सकेगा ।

(3) नैदानिक स्थापन, प्राधिकारी को ऐसी कार्रवाई की, यदि कोई हो, रिपोर्ट देगा, जो ऐसे निरीक्षण या जांच के परिणामों के बारे में किए जाने के लिए प्रस्थापित है या की गई है, और ऐसी रिपोर्ट, ऐसे समय के भीतर प्रस्तुत की जाएगी, जो प्राधिकारी निदेश दे ।

(4) जहां नैदानिक स्थापन, युक्तियुक्त समय के भीतर, प्राधिकारी के समाधानप्रद रूप में कार्रवाई नहीं करता है वहां वह नैदानिक स्थापन द्वारा किए गए किसी स्पष्टीकरण या किए गए अभ्यावेदन पर विचार के पश्चात्, ऐसे समय के भीतर जो निदेश में उपदर्शित हो ऐसे निदेश जारी कर सकेगा, जो प्राधिकारी ठीक समझे और नैदानिक स्थापन ऐसे निदेशों का पालन करेगा ।

34. प्रवेश करने की शक्ति-प्राधिकारी या उसके द्वारा प्राधिकृत कोई अधिकारी, यदि यह संदेह करने का कारण है कि कोई व्यक्ति रजिस्ट्रीकरण के बिना नैदानिक स्थापन चला रहा है, किसी युक्तियुक्त समय पर, विहित रीति में, वहां प्रवेश कर सकेगा और तलाशी ले सकेगा और नैदानिक स्थापन निरीक्षण या जांच के लिए युक्तियुक्त सुविधाएं प्रदान करेगा और वहां प्रतिनिधित्व करने का हकदार होगाः

परन्तु ऐसा कोई व्यक्ति, ऐसा करने के अपने आशय की सूचना दिए बिना नैदानिक स्थापन में प्रवेश नहीं करेगा

35. राज्य सरकार द्वारा फीस का उद्ग्रहरण-राज्य सरकार, भिन्न-भिन्न प्रवर्गों के नैदानिक स्थापनों के लिए ऐसी फीस प्रभारित कर सकेगी, जो विहित जी जाए ।

36. अपील-(1) रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी के रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र को अनुदत्त या नवीकृत करने से इंकार करने या रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्रतिसंहरण करने वाले आदेश से व्यथित कोई व्यक्ति, ऐसी रीति में और ऐसी अवधि के भीतर, जो विहित की जाए, राज्य परिषद् को अपील कर सकेगा:

परन्तु राज्य परिषद्, विहित अवधि की समाप्ति के पश्चात् की गई किसी अपील को ग्रहण कर सकेगी, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी पर्याप्त कारणों से समय पर अपील फाइल करने से निवारित हुआ था

(2) उपधारा (1) के अधीन प्रत्येक अपील ऐसे प्ररूप में की जाएगी और उसके साथ ऐसी फीस होगी, जो विहित की जाए

अध्याय 5

नैदानिक स्थापनों का रजिस्टर

37. नैदानिक स्थापनों का रजिस्टर-प्राधिकरण, उसके द्वारा रजिस्ट्रीकृत नैदानिक स्थापनों का, उसकी स्थापना से दो वर्ष की अवधि के भीतर संकलन, प्रकाशन और अंकीय प्ररूप में एक रजिस्टर रखेगा और वह इस प्रकार जारी किए गए प्रमाणपत्र की विशिष्टियां, ऐसे प्ररूप और रीति में, जो राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, रखे जाने वाले रजिस्टर में दर्ज करेगा ।

(2) प्रत्येक प्राधिकारी, जिसके अंतर्गत तत्समय प्रवृत्त किसी अन्य विधि के अधीन नैदानिक स्थापनों के रजिस्ट्रीकरण के लिए गठित कोई अन्य प्राधिकरण भी है, ऐसी रीति में, जो विहित की जाए, नैदानिक स्थापनों के रजिस्टर में की गई प्रत्येक प्रविष्टि की अंकीय प्ररूप में एक प्रति राज्य नैदानिक स्थापन परिषद् को भेजेगा, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि राज्य रजिस्टर को, राज्य में रजिस्ट्रीकरण प्राधिकारी द्वारा रखे गए रजिस्टरों से सतत् रूप से अद्यतन किया जाता है ।

38. राज्य नैदानिक स्थापन रजिस्टर का रखा जाना-(1) प्रत्येक राज्य सरकार, उस राज्य में नैदानिक स्थापनों के संबंध में, अंकीय और ऐसे प्ररूप में तथा ऐसी विशिष्टियों को अन्तर्विष्ट करते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा विहित की जाएं, राज्य नैदानिक स्थापन रजिस्टर नामक एक रजिस्टर रखेगा ।

(2) प्रत्येक राज्य सरकार, नैदानिक स्थापनों के राज्य रजिस्टर की अंकीय प्ररूप में एक प्रति केन्द्रीय सरकार को भेजेगी और ऐसे रजिस्टर में किए गए सभी परिवर्धनों और अन्य संशोधनों की सूचना किसी विशिष्ट मास के लिए आगामी मास की पंद्रह तारीख तक केन्द्रीय सरकार को देगी ।

39. राष्ट्रीय नैदानिक स्थापन रजिस्टर का रखा जाना-केन्द्रीय सरकार, अंकीय प्ररूप में राष्ट्रीय नैदानिक स्थापन रजिस्टर नामक एक अखिल भारतीय रजिस्टर रखेगी, जो राज्य सरकारों द्वारा रखे गए नैदानिक स्थापनों के राज्य रजिस्टर का समामेलन होगा और उसे अंकीय प्ररूप में प्रकाशित करवाएगी ।

अध्याय 6

शास्तियां

40. शास्ित-जो कोई इस अधिनियम के किसी उपबंध का उल्लंघन करेगा, यदि कहीं और किसी दंड का उपबंध नहीं किया गया है तो प्रथम अपराध के लिए ऐसी धनीय शास्ित से, जो दस हजार रुपए तक की हो सकेगी, किसी दूसरे अपराध के लिए ऐसी धनीय शास्ति से, जो पचास हजार रुपए तक की हो सकेगी और किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए, ऐसी धनीय शास्ित से, जो पांच लाख रुपए तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा ।

41. अरजिस्ट्रीकरण के लिए धनीय शास्ित-(1) जो कोई रजिस्ट्रीकरण के बिना कोई नैदानिक स्थापन चलाएगा, दोषसिद्धि पर, प्रथम अपराध के लिए पचास हजार रुपए तक की धनीय शास्ित से, दूसरे अपराध के लिए ऐसी धनीय शास्ति से, जो दो लाख रुपए तक की हो सकेगी और किसी पश्चात्वर्ती अपराध के लिए, ऐसी धनीय शास्ित से, जो पांच लाख रुपए तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा ।

(2) जो कोई जानबूझकर ऐसे किसी नैदानिक स्थापन में सेवा करेगा, जो इस अधिनियम के अधीन सम्यक् रूप से रजिस्ट्रीकृत नहीं है, ऐसी धनीय शास्ति से, जो पच्चीस हजार रुपए तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजन के लिए, प्राधिकरण, कोई धनीय शास्ित अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए संबंधित किसी व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान करने के पश्चात् विहित रीति में जांच करेगा ।

(4) प्राधिकरण को, जांच करते समय, मामले के तथ्यों और परिस्थितियों से सुभिज्ञ किसी व्यक्ति को ऐसा साक्ष्य देने या कोई दस्तावेज पेश करने के लिए, जो प्राधिकरण की राय में जांच के लिए उपयोगी हो या उसकी विषय-वस्तु से सुसंगत हो, समन करने और उपस्थित कराने की शक्ति होगी और यदि ऐसी जांच पर, उसका यह समाधान हो जाता है कि वह व्यक्ति धारा 42 की उपधारा (1) और उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहा है तो वह आदेश द्वारा, आदेश किए जाने के तीस दिन के भीतर धारा 42 की उपधारा (8) में निर्दिष्ट खाते में जमा की जाने वाली उन उपधाराओं में विनिर्दिष्ट शास्ित अधिरोपित कर सकेगा

(5) धनीय शास्ति की मात्रा का अवधारण करते समय प्राधिकरण नैदानिक स्थापन के प्रवर्ग, विस्तार और स्वरूप तथा उस क्षेत्र की स्थानीय दशाओं को ध्यान में रखेगा, जिसमें स्थापन स्थित है ।

(6) प्राधिकरण के विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति, उक्त विनिश्चय की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर राज्य परिषद् को अपील कर सकेगा ।

(7) उपधारा (6) में निर्दिष्ट अपील फाइल करने की रीति वह होगी, जो विहित की जाए ।

42. निदेश की अवहेलना करना, बाधा पहुंचना और सूचना देने से इंकार-(1) जो कोई, ऐसे किसी व्यक्ति या प्राधिकारी द्वारा विधिपूर्वक दिए गए किसी निदेश की, जिसे इस अधिनियम के अधीन ऐसा निदेश देने के लिए सशक्त किया गया है, जानबूझकर अवहेलना करेगा या किसी व्यक्ति या प्राधिकारी को, ऐसे किसी कृत्य के निर्वहन में बाधा पहुंचाएगा, जिसका निर्वहन करने के लिए ऐसा व्यक्ति या प्राधिकारी इस धारा के अधीन अपेक्षित है या सशक्त किया गया है, धनीय शास्ित से, जो पांच लाख रुपए तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा ।

(2) जो कोई, इस अधिनियम द्वारा या उसके अधीन कोई सूचना देने के लिए अपेक्षित होते हुए भी, जानबूझकर ऐसी सूचना को रोकेगा या ऐसी सूचना देगा, जिसके बारे में वह जानता है कि वह मिथ्या है या जिसके बारे में उसे यह विश्वास है कि वह सही नहीं है, धनीय शास्ति से, जो पांच लाख रुपए तक की हो सकेगी, दंडनीय होगा ।

(3) उपधारा (1) और उपधारा (2) के अधीन न्यायनिर्णयन के प्रयोजन के लिए, प्राधिकरण, कोई धनीय शास्ित अधिरोपित करने के प्रयोजन के लिए संबंधित किसी व्यक्ति को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर प्रदान करने के पश्चात् विहित रीति में जांच करेगा ।

(4) प्राधिकरण को, जांच करते समय, मामले के तथ्यों और परिस्िथतियों से सुभिज्ञ किसी व्यक्ति को ऐसा साक्ष्य देने या कोई दस्तावेज पेश करने के लिए, जो प्राधिकरण की राय में जांच के लिए उपयोगी हो या उसकी विषय-वस्तु से सुसंगत हो, समन करने और उपस्थित कराने की शक्ति होगी और यदि ऐसी जांच पर, उसका यह समाधन हो जाता है कि वह व्यक्ति उपधारा (1) और उपधारा (2) में विनिर्दिष्ट उपबंधों का अनुपालन करने में असफल रहा है तो वह आदेश द्वारा, आदेश किए जाने के तीस दिन के भीतर उपधारा (8) में निर्दिष्ट खाते में जमा की जाने वाली उन उपधाराओं में विनिर्दिष्ट शास्ित अधिरोपित कर सकेगा ।

(5) धनीय शास्ित की मात्रा का अवधारण करते समय, प्राधिकरण, नैदानिक स्थापन के प्रवर्ग, आकार और किस्म तथा उस क्षेत्र की स्थानीय दशाओं को ध्यान में रखेगा, जिसमें स्थापन स्थित है ।

(6) प्राधिकरण के विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति, उक्त विनिश्चय की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर राज्य परिषद् को अपील कर सकेगा ।

(7) उपधारा (6) में निर्दिष्ट अपील फाइल करने की रीति वह होगी, जो विहित की जाए ।

(8) धारा 41 और धारा 42 के अधीन उद्गृहीत धनीय शास्ित उस खाते में जमा की जाएगी जो राज्य सरकार आदेश द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।

43. गौण-त्रुटियों के लिए शास्ति-जो कोई, इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन करेगा, जिसके परिणामस्वरूप ऐसी त्रुटियां होती हैं, जिससे किसी रोगी के स्वास्थ्य और सुरक्षा पर कोई आसन्न संकट नहीं पड़ता है और जिन्हें युक्तियुक्त समय के भीतर सुधारा जा सकता है, जुर्माने से, जो दस हजार रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।

44. कंपनियों द्वारा उल्लंघन-(1) जहां इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बानाए गए नियमों का उल्लंघन करने वाला व्यक्ति कंपनी है, वहां ऐसा प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय, उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था, और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे उल्लंघन के दोषी समझे जाएंगे और जुर्माने के लिए भागी होंगे:

परन्तु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि उल्लंघन उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे उल्लंघन के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के किसी उपबंध या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन किसी कंपनी द्वारा किया गया है और साबित हो जाता है कि वह उल्लंघन, कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस उल्लंघन का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस उल्लंघन के दोषी समझे जाएंगे और जुर्माने के लिए भागी  होंगे ।

स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -

(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या अन्य व्यष्टि-संगम भी है; और

(ख) फर्म के संबंध में, निदेशक" से, उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।

45. सरकारी विभागों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध सरकार के किसी विभाग द्वारा किया गया है, वहां विभागाध्यक्ष उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के लिए भागी होगा:

परन्तु इस धारा की कोई बात ऐसे विभागाध्यक्ष को किसी दंड का भागी नहीं बनाएगी, यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध के किए जाने का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध सरकार के किसी विभाग द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध विभागाध्यक्ष से भिन्न किसी अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण माना जा सकता है, वहां ऐसा अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के लिए भागी होगा ।

46. जुर्माने की वसूली-जो कोई जुर्माने का संदाय करने में असफल रहेगा, राज्य नैदानिक स्थापन परिषद्, ऐसे व्यक्ति से शोध्य जुर्माने को विनिर्दिष्ट करते हुए, उसके द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी द्वारा हस्ताक्षरित एक प्रमाणपत्र तैयार कर सकेगी और उस जिले के, जिसमें ऐसे व्यक्ति के स्वामित्वाधीन कोई संपत्ति है या वह निवास करता है या अपना कारबार चलाता है, कलक्टर को भेज सकेगी और उक्त कलक्टर, ऐसे प्रमाणपत्र को प्राप्त करने पर, उसमें विनिर्दिष्ट रकम की उस व्यक्ति से इस प्रकार वसूली करने की कार्यवाही करेगा, मानो वह भू-राजस्व की बकाया हो ।

अध्याय 7

प्रकीर्ण

47. सद्भावपूर्वक की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) इस अधिनियम के उपबंधों या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के संबंध में कोई वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही राष्ट्रीय परिषद् या राज्य परिषद् के किसी प्राधिकारी या किसी सदस्य या इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी के विरुद्ध नहीं होगी ।

(2) इस अधिनियम के उपबंधों या उसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अनुसरण में सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के कारण हुई या होने के लिए संभावित किसी हानि या नुकसानी के संबंध में कोई वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी राज्य सरकार या केन्द्रीय सरकार के विरुद्ध नहीं होगी ।

48. विवरणियों, आदि का दिया जाना-प्रत्येक नैदानिक स्थापन, ऐसे समय के भीतर या ऐसे विस्तारित समय के भीतर, जो उस निमित्त विहित किया जाए, प्राधिकारी या राज्य परिषद् या राष्ट्रीय परिषद् को ऐसी विवरणियां या आंकड़े और अन्य जानकारी, ऐसी रीति में, जो समय-समय पर, राज्य सरकार द्वारा विहित की जाए, देगा ।

49. निदेश देने की शक्ति-इस अधिनियम के पूर्वगामी उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, प्राधिकरण को ऐसे निदेश, जिसके अंतर्गत नैदानिक स्थापनों के सम्यक्, कार्यकरण के लिए विवरणियां, आंकड़े और अन्य जानकारी प्रस्तुत करना भी है, जारी करने की शक्ति होगी और ऐसे निदेश आबद्धकर होंगे ।

50. प्राधिकरण के कर्मचारियों, आदि का लोक सेवक होना-प्राधिकरण और राष्ट्रीय परिषद् और राज्य परिषद् के प्रत्येक कर्मचारी के बारे में, जब वे इस अधिनियम के किसी उपबंध के अनुसरण में कोई कार्य कर रहे हैं या उनका कार्य करना तात्पर्यित है, यह समझा जाएगा कि वे भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के भीतर लोक सेवक हैं ।

51. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में प्रकाशित आदेश द्वारा, ऐसे उपबंध कर सकेगी, जो इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों:

परंतु ऐसा कोई आदेश इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

52. नियम बनाने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के सभी या किसी उपबंध को क्रियान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित सभी या किसी विषय के संबंध में उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) धारा 3 की उपधारा (5) के अधीन राष्ट्रीय परिषद् के सदस्यों के भत्ते;

(ख) धारा 3 की उपधारा (10) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य समिति के सचिव के रूप में ऐसे व्यक्ति की नियुक्ति;

(ग) धारा 7 के अधीन नैदानिक स्थापनों के वर्गीकरण के लिए मानकों का अवधारण;

() धारा 10 की उपधारा (1) के खंड () के अधीन प्राधिकरण के सदस्यों की अर्हताएं और सेवा के निबंधन और शर्तें;

(ङ) धारा 10 की उपधारा (2) के अधीन वह प्रक्रिया, जिसके अधीन नैदानिक स्थापन के अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण के प्रयोजन के लिए जिला स्वास्थ्य अधिकारी या मुख्य चिकित्सा अधिकारी द्वारा प्राधिकरण की शक्तियों का प्रयोग किया जा सकेगा;

(च) धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (i) के अधीन सुविधाओं और सेवाओं के न्यूनतम मानक;

(छ) धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (ii) के अधीन कार्मिकों की न्यूनतम संख्या;

() धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (iii) के अधीन नैदानिक स्थापन द्वारा अभिलेखों का रखा जाना और रिपोर्ट करना;

() धारा 12 की उपधारा (1) के खंड (iv) के अधीन नैदानिक स्थापन के रजिस्ट्रीकरण और बने रहने के लिए अन्य शर्तें;

(ञ) धारा 13 की उपधारा (1) के अधीन नैदानिक स्थापनों का वर्गीकरण;

(ट) धारा 13 की उपधारा (2) के अधीन नैदानिक स्थापनों के वर्गीकरण के लिए विभिन्न मानक;

(ठ) धारा 28 के अधीन स्थायी रजिस्ट्रीकरण के लिए न्यूनतम मानक;

(ड) धारा 38 के अधीन रखे जाने वाले रजिस्टर का प्ररूप और उसमें अंतर्विष्ट की जाने वाली विशिष्टियां ।

53. नियमों का रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह ऐसी कुल तीस दिन की अवधि के लिए सत्र में हो, जो एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी, रखा जाएगा और यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्र के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं या दोनों सदन इस बात से सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो ऐसा नियम, यथास्थिति, तत्पश्चात् ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा या उसका कोई प्रभाव नहीं होगा, परन्तु उस नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

54. नियम बनाने की राज्य सरकार की शक्ति-(1) राज्य सरकार, अधिसूचना द्वारा, उन विषयों के संबंध में, जो धारा 52 की परिधि के अंतर्गत नहीं आते हैं, क्रियान्वित किए जाने के लिए नियम बना सकेगी ।

(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्तियों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित या सभी विषयों के संबंध में उपबंध कर सकेंगे, अर्थात्ः-

(क) धारा 14 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण का प्ररूप और उसके लिए संदत्त की जाने वाली फीस;

(ख) धारा 14 की उपधारा (3) के अधीन आवेदन का प्ररूप और ब्यौरे;

(ग) धारा 15 के अधीन अनन्तिम रजिस्ट्रीकृत प्रमाणपत्र में अंतर्विष्ट विशिष्टियां और सूचना;

(घ) धारा 16 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए प्रस्तावित नैदानिक स्थापन की सभी विशिष्टियों के प्रकाशन की रीति;

(ङ) धारा 19 के अधीन प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति जारी करने के लिए संदत्त की जाने वाली फीस;

(च) धारा 20 की उपधारा (2) के अधीन नैदानिक स्थापन द्वारा स्वामित्व या प्रबंध के परिवर्तन के बारे में प्राधिकरण को सूचित किया जाना;

(छ) धारा 21 के अधीन वह रीति, जिसमें प्राधिकरण उन नैदानिक स्थापनों के नाम प्रकाशित करेगा, जिनका रजिस्ट्रीकरण समाप्त हो जाएगा;

(ज) धारा 22 के अधीन अनन्तिम रजिस्ट्रीकरण की समाप्ति के पश्चात् नवीकरण के लिए प्रभारित की जाने वाली वर्धित फीस;

(झ) धारा 24 के अधीन आवेदन का प्ररूप और राज्य सरकार द्वारा प्रभावित की जाने वाली फीस;

(ञ) धारा 25 के अधीन नैदानिक स्थापनों द्वारा न्यूनतम मानकों का अनुपालन किए जाने के बारे में साक्ष्य प्रस्तुत किए जाने की रीति;

(ट) धारा 26 के अधीन आक्षेप फाइल करने के लिए, नैदानिक स्थापनों द्वारा न्यूनतम मानकों का अनुपालन किए जाने के बारे में सूचना संप्रदर्शित करने की रीति;

(ठ) धारा 29 में विनिर्दिष्ट अवधि की समाप्ति;

(ड) धारा 30 के अधीन रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र का प्ररूप और विशिष्टियां;

(ढ) यह अवधि जिसके भीतर धारा 32 की उपधारा (3) के खंड (क) के अधीन अपील की जाएगी;

(ण) धारा 34 के अधीन नैदानिक स्थापन में प्रवेश करने और तलाशी लेने की रीति;

() धारा 35 के अधीन नैदानिक स्थापनों के भिन्न-भिन्न प्रवर्गों के लिए राज्य सरकार द्वारा प्रभारित की जाने वाली फीस;

(थ) धारा 36 की उपधारा (1) के अधीन वह रीति, जिसमें और वह अवधि, जिसके भीतर, कोई अपील राज्य परिषद् को की जा सकेगी;

(द) धारा 36 की उपधारा (2) के अधीन अपील का प्ररूप और उसके लिए संदत्त की जाने वाले फीस;

(ध) धारा 37 की उपधारा (1) के अधीन वह प्ररूप और रीति, जिसमें रजिस्टर रखा जाएगा;

() धारा 37 की उपधारा (2) के अधीन नैदानिक स्थापनों के रजिस्टर में की गई प्रविष्टि को अंकीय प्ररूप में राज्य परिषद् को प्रदाय करने की रीति;

() धारा 41 की उपधारा (3) और धारा 42 के अधीन प्राधिकरण द्वारा जांच करने की रीति;

() धारा 41 की उपधारा (7) और धारा 42 के अधीन अपील फाइल करने की रीति;

() धारा 48 के अधीन वह रीति, जिसमें और वह समय, जिसके भीतर सूचना, यथास्थिति, प्राधिकरण या राज्य परिषद् या राष्ट्रीय परिषद् को दी जानी है;

() ऐसा कोई अन्य विषय, जो राज्य सरकार द्वारा विहित किया जाना अपेक्षित है या विहित किया जाए

55. नियमों का रखा जाना-इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के, जहां उसके दो सदन हैं, प्रत्येक सदन के या जहां उस विधान-मंडल का एक सदन है, वहां उस सदन के समक्ष रखा जाएगा

56. व्यावृत्ति-(1) इस अधिनियम के उपबंध उन राज्यों को लागू नहीं होंगे; जिनमें अनुसूची में विनिर्दिष्ट अधिनियमितियां लागू होती हैंः

परंतु उन राज्यों में, जिनमें उपधारा (1) में निर्दिष्ट अधिनियमितियां लागू होती हैं और ऐसे राज्यों में, जो इस अधिनियम के प्रारंभ के पश्चात् संविधान के अनुच्छेद 252 के खंड (1) के अधीन इस अधिनियम को अंगीकार करते हैं, इस अधिनियम के उपबंध इस प्रकार अंगीकार किए जाने के पश्चात् उस राज्य में लागू होंगे

(2) केंद्रीय सरकार, जब कभी आवश्यक समझे, अधिसूचना द्वारा, अनुसूची का संशोधन कर सकेगी  

अनुसूची

(धारा 56 देखिए)

1. आंध्र प्रदेश प्राइवेट मेडिकल केयर एस्टेबलिशमेन्ट्स (रजिस्ट्रेशन एंड रेगुलेशन) ऐक्ट, 2002

2. बोम्बे नर्सिंग होम्स रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1949

3. दिल्ली नर्सिंग होम रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1953

4. मध्य प्रदेश उपचर्या गृह तथा रुजोपचार संबंधी स्थापना (रजिस्ट्रीकरण तथा अनुज्ञापन) अधिनियम, 1973

5. मणिपुर होम्स एंड क्लीनिक्स रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1992

6. नागालैंड हेल्थ केयर एस्टेबलिशमेन्ट्स ऐक्ट, 1997

7. उड़ीसा क्लीनिकल एस्टेबलिशमेन्ट्स (कंट्रोल एंड रेगुलेशन) ऐक्ट, 1990

8. पंजाब स्टेट नर्सिंग होम रजिस्ट्रेशन ऐक्ट, 1991

9. वेस्ट बंगाल क्लीनिकल एस्टेबलिशमेन्ट्स ऐक्ट, 1950

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