भेषजी अधिनियम, 1948
(1948 का अधिनियम संख्यांक 8)
[4 मार्च, 1948]
भेषजी वृत्ति का विनियमन
करने के लिए
अधिनियम
यह समीचीन है कि भेषजी वृत्ति और व्यवसाय का विनियमन करने के लिए अच्छे उपबंध किए जाएं और उस प्रयोजन के लिए भेषजी परिषदों का गठन किया जाए;
अतः इसके द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियम किया जाता है:
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम भेषजी अधिनियम, 1948 है ।
[(2) इसका विस्तार, जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय, सम्पूर्ण भारत पर है ।]
(3) यह तुरन्त प्रवृत्त होगा किन्तु अध्याय 3, 4 और 5 किसी राज्य विशेष में ऐसी तारीख से ॥। प्रभावी होंगे, जिसे राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त नियत करे:
[परन्तु जहां 1 नवम्बर, 1956 को राज्यों के पुनर्गठन से हुए राज्यक्षेत्रीय परिवर्तनों के कारण अध्याय 3, 4 और 5 किसी राज्य के केवल एक ही भाग में प्रभावी होते हों वहां उक्त अध्याय उस राज्य के शेष भाग में उस तारीख से प्रभावी होंगे जिसे राज्य सरकार उसी रीति से नियत करे ।]
2. निर्वचन-इस अधिनियम में, जब तक कि कोई बात, विषय या संदर्भ में विरुद्ध न हो,
(क) करार" से धारा 20 के अधीन किया गया करार अभिप्रेत है;
(ख) अनुमोदित" से धारा 12 या धारा 14 के अधीन केन्द्रीय परिषद् द्वारा अनुमोदित अभिप्रेत है;
[(ग) केन्द्रीय परिषद्" से धारा 3 के अधीन गठित भारतीय भेषजी परिषद् अभिप्रेत है;
(घ) केन्द्रीय रजिस्टर" से धारा 15क के अधीन केन्द्रीय परिषद् द्वारा रखा गया भेषजज्ञों का रजिस्टर अभिप्रेत है;
(घक) कार्यकारिणी" से, संदर्भ द्वारा अपेक्षित केन्द्रीय परिषद् या राज्य परिषद् की कार्यकारिणी समिति अभिप्रेत है;
(ङ) भारतीय विश्वविद्यालय" से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 3 के अर्थ में विश्वविद्यालय अभिप्रेत हैं और इसके अन्तर्गत किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा, या उसके अधीन स्थापित ऐसी अन्य संस्थाएं भी है जिन्हें केन्द्रीय सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे;]
[(च) चिकित्सा व्यवसायी" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है,
(i) जिसके पास भारतीय चिकित्सा उपाधि अधिनियम, 1916 (1916 का 7) की धारा 3 के अधीन विनिर्दिष्ट या अधिसूचित अथवा भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् अधिनियम, 1956 (1956 का 102) की अनुसूचियों में विनिर्दिष्ट किसी प्राधिकरण द्वारा प्रदत्त कोई अर्हता है; अथवा
(ii) जो राज्य के किसी ऐसे चिकित्सक रजिस्टर में, जो आधुनिक वैज्ञानिक आयुर्विज्ञान पद्धति में चिकित्सा का व्यवसाय करने वाले व्यक्तियों के रजिस्ट्रीकरण के लिए है, रजिस्ट्रीकृत है या रजिस्ट्रीकरण के लिए पात्र है; अथवा
(iii) जो किसी राज्य के चिकित्सक रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत है, और जिसे, यद्यपि वह उपखंड (i) या उपखंड (ii) के अंतर्गत नहीं आता है, राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त किए गए किसी साधारण या विशेष आदेश द्वारा इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए आधुनिक वैज्ञानिक आयुर्विज्ञान पद्धति में चिकित्सा व्यवसाय करने वाला व्यक्ति घोषित किया गया है; अथवा
(iv) जो दंत चिकित्सक अधिनियम, 1948 (1948 का 16) के अधीन किसी राज्य के लिए दंत चिकित्सकों के रजिस्टर में रजिस्ट्रीकृत है या रजिस्ट्रीकरण के लिए पात्र है;
(ध्) जो पशु चिकित्सा का व्यवसाय कर रहा है और जिसके पास राज्य सरकार द्वारा अनुमोदित अर्हताएं है;
(छ) विहित" से, अध्याय 2 में, धारा 18 के अधीन बनाए गए विनियमों द्वारा विहित और अन्यत्र धारा 46 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित, अभिप्रेत है ;
[(ज) रजिस्टर" से अध्याय 4 के अधीन तैयार किया गया और रखा गया भेषजज्ञों का रजिस्टर अभिप्रेत है;
(झ) रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जिसका नाम उस राज्य के रजिस्टर में उस समय दर्ज है जिसमें वह उस समय निवास कर रहा है या भेषजी की अपनी वृत्ति या उसका कारबार कर रहा है;
(ञ) राज्य परिषद्" से धारा 19 के अधीन गठित राज्य भेषजी परिषद् अभिप्रेत है और उसके अन्तर्गत धारा 20 के अधीन करार के अनुसार गठित संयुक्त राज्य भेषजी परिषद् भी है;
(ट) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग" से विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अधिनियम, 1956 (1956 का 3) की धारा 4 के अधीन स्थापित विश्वविद्यालय अनुदान आयोग अभिप्रेत है ।]
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अध्याय 2
भारतीय भेषजी परिषद्
3. केन्द्रीय परिषद् का गठन और उसकी संरचना-केन्द्रीय सरकार एक केन्द्रीय परिषद् का यथाशक्यशीघ्र गठन करेगी, जो निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात् :
(क) [विश्वविद्यालय अनुदान आयोग,] किसी भारतीय विश्वविद्यालय या उससे सहबद्ध किसी महाविद्यालय के, जो भेषजी में उपाधि या डिप्लोमा प्रदान करता है, अध्यापन कर्मचारिवृन्द में से निर्वाचित, छह सदस्य, जिसमें से भेषजिक रसायन, भेषजी, भेषजगुण विज्ञान और भेषज अभिज्ञान विषयों में से प्रत्येक विषय का कम से कम एक अध्यापक होगा ;
(ख) केन्द्रीय सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट छह सदस्य, जिनमें से कम से कम [चार] ऐसे व्यक्ति होंगे, जिनके पास भेषजी या भेषजिक रसायन में कोई उपाधि या डिप्लोमा है और जो भेषजी या भेषजिक रसायन में व्यवसाय कर रहे हैं ;
(ग) भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् के सदस्यों द्वारा, अपने में से, निर्वाचित एक सदस्य ;
(घ) स्वास्थ्य सेवा महानिदेशक, पदेन, अथवा यदि वह किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है, तो ऐसा व्यक्ति जिसे उसने उपस्थित होने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत किया है ;
[(घघ) भारत का ओषधि नियंत्रक, पदेन, अथवा यदि वह किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है, तो ऐसा व्यक्ति, जिसे उसने उपस्थित होने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत किया है ;]
(ङ) केन्द्रीय ओषधि प्रयोगशाला का निदेशक, पदेन ;
[(च) विश्वविद्यालय अनुदान आयोग का एक प्रतिनिधि और अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद् का एक प्रतिनिधि ;]
(छ) प्रत्येक ॥। राज्य का प्रतिनिधित्व करने वाला एक सदस्य, जो रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ होगा और [(जो)] प्रत्येक राज्य परिषद् के सदस्यों द्वारा 3[अपने में से] निर्वाचित होगा ;
(ज) प्रत्येक 2॥। राज्य का प्रतिनिधित्व करने के लिए एक सदस्य, जो ॥। रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ होगा और [राज्य सरकार] द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा :
[परन्तु भेषजी (संशोधन) अधिनियम, 1976 के प्रवृत्त होने की तारीख से पांच वर्ष तक के लिए प्रत्येक संघ राज्यक्षेत्र की सरकार एक सदस्य को, जो धारा 31 के अधीन रजिस्ट्रीकृत किए जाने के लिए पात्र होगा, उस राज्यक्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने के लिए, खण्ड (छ) के अधीन निर्वाचित करने के बजाए, नामनिर्दिष्ट करेगी ।]
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4. केन्द्रीय परिषद् का निगमन-धारा 3 के अधीन गठित परिषद् शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाली भारतीय भेषजी परिषद् नामक एक निगमित निकाय होगी जिसे जंगम और स्थावर दोनों ही प्रकार की सम्पत्ति का अर्जन और धारण करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद लाएगी और उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा ।
5. केन्द्रीय परिषद् का सभापति और उपसभापति-(1) केन्द्रीय परिषद् का सभापति और उपसभापति उक्त परिषद् के सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे ।
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(2) [सभापति] या उपसभापति, इस रूप में अपना पद पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए जो केन्द्रीय परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी अवधि की समाप्ति के बाद तक नहीं रहेगी, धारण करेगा, किन्तु केन्द्रीय परिषद् का सदस्य रहने पर वह पुनः निर्वाचन का पात्र होगा :
[परन्तु यदि केन्द्रीय परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी पदावधि की समाप्ति उस पूर्ण पदावधि की समाप्ति से पूर्व हो जाती है, जिसके लिए वह सभापति या उपसभापति के रूप में निर्वाचित हुआ है, तो वह केन्द्रीय परिषद् के सदस्य के रूप में पुनः निर्वाचित या पुनः नामनिर्दिष्ट हो जाने की दशा में उस पद को उस पूर्ण पदावधि के लिए धारण करता रहेगा, जिसके लिए वह निर्वाचित हुआ है ।]
6. निर्वाचन का ढंग-इस अध्याय के अधीन निर्वाचन विहित रीति से किए जाएंगे और यदि ऐसे किसी निर्वाचन के बारे में कोई विवाद उठता है तो उसे केन्द्रीय सरकार को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
7. पदावधि और आकस्मिक रिक्तियां-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, ॥। कोई नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य, अपने नामनिर्देशन या निर्वाचन की तारीख से पांच वर्ष की अवधि के लिए या उस अवधि तक के लिए जब तक उसका उत्तरवर्ती सम्यक् रूप से नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित नहीं कर लिया जाता है, इन दोनों में से, जो अवधि अधिक लम्बी हो, पद धारण किए रहेगा ।
(2) नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य सभापति को सम्बोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा, किसी भी समय अपनी सदस्यता से त्यागपत्र दे सकता है, और तब ऐसे सदस्य का स्थान रिक्त हो जाएगा ।
(3) यदि कोई नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य केन्द्रीय परिषद् की राय में पर्याप्त कारण के बिना उसके क्रमवर्ती तीन अधिवेशनों से अनुपस्थित रहता है या यदि वह धारा 3 के खण्ड (क) , (ग) और (छ) के अधीन निर्वाचित है और, यथास्थिति, अध्यापन कर्मचारिवृन्द का या भारतीय आयुर्विज्ञान परिषद् का सदस्य या रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ नहीं रह जाता है तो यह समझा जाएगा कि उसने अपना स्थान रिक्त कर दिया है ।
(4) केन्द्रीय परिषद् में आकस्मिक रिक्ति, यथास्थिति, नए नामनिर्देशन या निर्वाचन द्वारा भरी जाएगी, और उस रिक्ति को भरने के लिए नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्ति उस अवधि के शेष भाग के लिए ही पद पर रहेगा जिसके लिए वह व्यक्ति, जिसका स्थान वह ग्रहण करता है, नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित किया गया था ।
(5) केन्द्रीय परिषद् द्वारा किया गया कोई कार्य केवल इसी आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि केन्द्रीय परिषद् में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि थी ।
(6) केन्द्रीय परिषद् के सदस्य पुनः नामनिर्देशन या पुनर्निर्वाचन के पात्र होंगे ।
[8. कर्मचारिवृन्द, पारिश्रमिक तथा भत्ते-केन्द्रीय परिषद्
(क) एक रजिस्ट्रार नियुक्त करेगी जो उस परिषद् के सचिव के रूप में कार्य करेगा और वह, यदि परिषद् समीचीन समझती है, तो उसके कोषपाल के रूप में भी कार्य कर सकेगा ;
(ख) ऐसे अन्य अधिकारियों और सेवकों को नियुक्त करेगी जिन्हें परिषद् इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए अपने को समर्थ बनाने में आवश्यक समझे ;
(ग) रजिस्ट्रार या किसी अन्य अधिकारी या सेवक से उसके कर्तव्यों के सम्यक् पालन के लिए इतनी प्रतिभूति की अपेक्षा कर सकेगी और ग्रहण करेगी जिसे परिषद् आवश्यक समझे ; और
(घ) केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से
(i) उस परिषद् के सभापति, उपसभापति और अन्य सदस्यों को संदेय पारिश्रमिक तथा भत्ते,
(ii) उस परिषद् के अधिकारियों और सेवकों के वेतन तथा भत्ते और सेवा की अन्य शर्तें,
नियत करेगी ।]
9. कार्यकारिणी समिति-(1) केन्द्रीय परिषद्, यथाशक्य शीघ्र, एक कार्यकारिणी समिति का गठन करेगी ; इसमें सभापति (जो कार्यकारिणी समिति का अध्यक्ष होगा) और उपसभापति, पदेन होंगे तथा केन्द्रीय परिषद् के सदस्यों द्वारा, अपने में से, निर्वाचित पांच अन्य सदस्य होंगे ।
(2) कार्यकारिणी समिति का सदस्य इस रूप में अपने पद पर तब तक बना रहेगा जब तक केन्द्रीय परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी पदावधि समाप्त नहीं हो जाती, किन्तु केन्द्रीय परिषद् का सदस्य रहने पर वह पुनर्निर्वाचन का पात्र होगा ।
(3) इस अधिनियम द्वारा अपने को प्रदत्त शक्तियों और अधिरोपित कर्तव्यों के अतिरिक्त कार्यकारिणी समिति ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगी जो विहित किए जाएं ।
[9क. अन्य समितियां-(1) केन्द्रीय परिषद् अपने सदस्यों में से अन्य समितियां ऐसे साधारण या विशेष प्रयोजनों के लिए, जो परिषद् आवश्यक समझे, और पांच वर्ष से अनधिक ऐसी अवधि के लिए, जो वह विनिर्दिष्ट करे, गठित कर सकेगी और ऐसे व्यक्तियों को, जो केन्द्रीय परिषद् के सदस्य नहीं हैं, ऐसी समितियों के सदस्य के रूप में तत्समान अवधि के लिए सहयोजित कर सकेगी ।
(2) ऐसी समितियों के सदस्यों को संदेय पारिश्रमिक और भत्ते केन्द्रीय परिषद् द्वारा केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से नियत किए जाएंगे ।
(3) ऐसी समितियों के समक्ष कामकाज का संचालन ऐसे विनियमों के अनुसार किया जाएगा जो इस अधिनियम के अधीन बनाए जाएं ।]
10. शिक्षा विनियम-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, केन्द्रीय परिषद् भेषजज्ञ की अर्हता के लिए अपेक्षित शिक्षा का न्यूनतम नामक विहित करने वाले विनियम, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन के अधीन रहते हुए, बना सकेगी और ये विनियम शिक्षा विनियम कहे जाएंगे ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, शिक्षा विनियम में निम्नलिखित विहित किया जा सकेगा,
(क) किसी परीक्षा में प्रवेश से पूर्व किए जाने वाले अध्ययन और लिए जाने वाले व्यावहारिक प्रशिक्षण की प्रकृति तथा अवधि ;
(ख) ऐसा साज-सामान और ऐसी सुविधाएं, जो अनुमोदित पाठ्यक्रम के अनुसार अध्ययन करने वाले विद्यार्थियों को दी जानी हैं ;
(ग) परीक्षा के विषय और वे मानक जो इनसे प्राप्त किए जाने हैं ;
(घ) परीक्षाओं में प्रवेश की कोई अन्य शर्तें ।
(3) शिक्षा विनियमों और उसके समस्त पश्चात्वर्ती संशोधनों के प्रारूप की प्रतियां, केन्द्रीय परिषद् द्वारा सभी राज्य सरकारों को दी जाएंगी, और केन्द्रीय परिषद्, उपधारा (1) के अधीन अनुमोदन के लिए केन्द्रीय सरकार को, यथास्थिति, शिक्षा विनियम या उनका कोई संशोधन प्रस्तुत करने से पूर्व, राज्य सरकार को उन सभी टिप्पणियों पर विचार करेगी जो यथापूर्वोक्त प्रतियां देने के तीन मास के भीतर उसे प्राप्त हुई हैं ।
(4) शिक्षा विनियम राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और ऐसी अन्य रीति से प्रकाशित किए जाएंगे जैसी केन्द्रीय परिषद् निदेश दे ।
(5) कार्यकारिणी समिति शिक्षा विनियमों की प्रभावकारिता के सम्बन्ध में केन्द्रीय परिषद् को समय-समय पर रिपोर्ट देगी और केन्द्रीय परिषद् से उसमें ऐसे संशोधन करने की सिफारिश कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे ।
11. शिक्षा विनियमों का राज्यों को लागू किया जाना-अध्याय 3 के अधीन राज्य परिषद् के गठन के पश्चात् किसी भी समय, और राज्य परिषद् से परामर्श करने के पश्चात्, राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह घोषित कर सकेगी कि शिक्षा विनियम उस राज्य में प्रभावी होंगे :
परन्तु जहां ऐसी कोई घोषणा नहीं की गई है वहां वह विनियम, राज्य परिषद् के गठन की तारीख से तीन वर्ष की समाप्ति पर, उस राज्य में प्रभावी हो जाएंगे ।
12. अनुमोदित पाठ्यक्रम और परीक्षाएं-(1) ॥। किसी राज्य में कोई प्राधिकरण जो भेषजज्ञों के लिए किसी पाठ्यक्रम का संचालन करता है, उस पाठ्यक्रम के अनुमोदन के लिए केन्द्रीय परिषद् को आवेदन कर सकेगा, और यदि केन्द्रीय परिषद् का, ऐसी जांच के पश्चात्, जिसे करना वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि उक्त पाठयक्रम शिक्षा विनियमों के अनुरूप है तो वह भेषजज्ञों के लिए किसी अनुमोदित परीक्षा में प्रवेश पाने के प्रयोजन के लिए उक्त पाठ्यक्रम को अनुमोदित पाठ्यक्रम घोषित करेगी ।
(2) 1॥। किसी राज्य में कोई प्राधिकरण जो भेषजी में परीक्षा का आयोजन करता है, उस परीक्षा में अनुमोदन के लिए केन्द्रीय परिषद् को आवेदन कर सकेगा, और यदि केन्द्रीय परिषद् का, ऐसी जांच के पश्चात्, जिसे करना वह ठीक समझे, यह समाधान हो जाता है कि उक्त परीक्षा शिक्षा विनियमों के अनुरूप है तो वह इस अधिनियम के अधीन भेषजज्ञ के रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित होनेके प्रयोजनार्थ उक्त परीक्षा को अनुमोदित परीक्षा घोषित करेगी ।
(3) 1॥। राज्यों का प्रत्येक प्राधिकरण जो अनुमोदित पाठ्यक्रम का संचालन करता है, या किसी अनुमोदित परीक्षा का आयोजन करता है, पाठ्यक्रमों के बारे में तथा दिए जाने वाले प्रशिक्षण और ली जाने वाली परीक्षा के बारे में, उस आयु के बारे में जिसमें उक्त पाठ्यक्रम पूरे किए जाने हैं और परीक्षा दी जानी है, और साधारणतया ऐसे पाठ्यक्रम और परीक्षा की अध्यपेक्षाओं के बारे में, ऐसी जानकारी देगा जिसकी केन्द्रीय परिषद् समय-समय पर अपेक्षा करे ।
13. अनुमोदन का वापस लिया जाना-(1) जहां कार्यकारिणी समिति केन्द्रीय परिषद् को यह रिपोर्ट देती है कि कोई अनुमोदित पाठ्यक्रम या अनुमोदित परीक्षा शिक्षा विनियमों के अनुरूप नहीं रह गई है वहां केन्द्रीय परिषद् सम्बद्ध प्राधिकरण को अपने इस आशय की सूचना देगी कि वह, यथास्थिति, पाठ्यक्रम या परीक्षा के लिए दिए गए अनुमोदन घोषणा वापस लेने के प्रश्न पर विचार करे, और उक्त प्राधिकरण, उक्त सूचना की प्राप्ति से तीन मास के भीतर, राज्य की मार्फत केन्द्रीय परिषद् को उस मामले में ऐसा अभ्यावेदन भेजेगा जैसा वह देना चाहे ।
(2) ऐसे किसी अभ्यावेदन पर, जो सम्बद्ध प्राधिकरण से प्राप्त हो, और उस पर ऐसे संप्रेक्षणों पर, जिन्हें राज्य सरकार करना ठीक समझे, विचार करने के पश्चात्, परिषद् यह घोषित कर सकेगी कि वह पाठ्यक्रम या परीक्षा तभी अनुमोदित समझी जाएगी जब किसी विनिर्दिष्ट तारीख से पूर्व, यथास्थिति, वह पाठ्यक्रम पूरा कर लिया जाए या परीक्षा पास कर ली जाए ।
14. जिन राज्यक्षेत्रों पर इस अधिनियम का विस्तार है उनसे बाहर प्रदत्त अर्हताएं-यदि केन्द्रीय परिषद् का यह समाधान हो जाता है कि [ऐसे राज्यक्षेत्रों के] बाहर के किसी प्राधिकारी द्वारा 2[जिन पर इस अधिनियम का विस्तार है,] भेषजी में प्रदत्त कोई अर्हता अपेक्षित कौशल और ज्ञान की पर्याप्त गारंटी देती है तो वह इस अधिनियम के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित होने के प्रयोजन से उस अर्हता को अनुमोदित अर्हता घोषित कर सकेगी, और ऐसे कारणों से, जो उसे पर्याप्त प्रतीत हों, किसी भी समय यह घोषित कर सकेगी कि ऐसी अर्हता [ऐसी अतिरिक्त शर्तों के अधीन रहते हुए, यदि कोई हों, जिसे केन्द्रीय परिषद् विनिर्दिष्ट करे,] तब अनुमोदित समझी जाएगी जब वह किसी विनिर्दिष्ट तारीख से पूर्व उसके पश्चात् प्रदत्त की जाए :
परन्तु [भारत के नागरिक] से भिन्न कोई व्यक्ति, जिसके पास ऐसी अर्हता हो, रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित नहीं समझा जाएगा जब तक भारतीय उद्भव के ऐसे व्यक्तियों को, जिनके पास ऐसी अर्हता हों, उस राज्य या देश की जिसमें वह अर्हता प्रदत्त की गई है, विधि और व्यवहार द्वारा भेषजी की वृत्ति में प्रवेश पाने और उसका व्यवसाय करने के लिए अनुज्ञात न किया गया हो ।
15. घोषणाओं का ढंग-धारा 12, धारा 13 या धारा 14 के अधीन सभी घोषणाएं केन्द्रीय परिषद् के किसी अधिवेशन में पारित संकल्प द्वारा की जाएंगी और राजपत्र में प्रकाशित होते ही प्रभावी हो जाएंगी ।
[15क. केन्द्रीय रजिस्टर-(1) केन्द्रीय परिषद् भेषजज्ञों का एक रजिस्टर विहित रीति से रखवाएगी, जिसे केन्द्रीय रजिस्टर कहा जाएगा । इसमें ऐसे सभी व्यक्तियों के नाम होंगे जो राज्य के रजिस्टर में उस समय दर्ज हैं ।
(2) प्रत्येक राज्य परिषद् केन्द्रीय परिषद् को, राज्य के रजिस्टर की पांच प्रतियां प्रत्येक वर्ष अप्रैल के प्रथम दिन के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र देगी और प्रत्येक राज्य परिषद् का रजिस्ट्रार केन्द्रीय परिषद् को राज्य के रजिस्टर में समय-समय पर दिए गए सभी परिवर्धनों और अन्य संशोधनों की इत्तिला अविलम्ब देगा ।
(3) केन्द्रीय परिषद् के रजिस्ट्रार का यह कर्तव्य होगा कि वह केन्द्रीय रजिस्टर को केन्द्रीय परिषद् द्वारा किए गए आदेशों के अनुसार रखे और समय-समय पर केन्द्रीय रजिस्टर का पुनरीक्षण करे और उसे भारत के राजपत्र में प्रकाशित करे ।
(4) केन्द्रीय रजिस्टर को, भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 (1872 का 1) के अर्थ में लोक दस्तावेज समझा जाएगा और भारत के राजपत्र में प्रकाशित उक्त रजिस्टर की प्रतिलिपि पेश करके साबित किया जा सकेगा ।
15ख. केन्द्रीय रजिस्टर में रजिस्ट्रीकरण-केन्द्रीय परिषद् का रजिस्ट्रार, राज्य के रजिस्टर में किसी व्यक्ति के रजिस्ट्रीकरण की रिपोर्ट की प्राप्ति पर, उसका नाम केन्द्रीय रजिस्टर में दर्ज करेगी ।]
16. निरीक्षण-(1) कार्यकारिणी समिति उतने निरीक्षकों की नियुक्ति कर सकेगी जितने वह इस अध्याय के प्रयोजनों के लिए आवश्यक समझे ।
(2) निरीक्षक,
(क) किसी ऐसी संस्था का निरीक्षण कर सकेगा जो अनुमोदित पाठ्यक्रम की व्यवस्था करती है ;
(ख) किसी भी अनुमोदित परीक्षा में उपस्थित हो सकेगा ;
(ग) ऐसी किसी संस्था का निरीक्षण कर सकेगा जिसके प्राधिकारियों ने इस अध्याय के अधीन अपने पाठ्यक्रम या परीक्षा के अनुमोदन के लिए आवेदन किया है और ऐसी संस्था की किसी परीक्षा में उपस्थित हो सकेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन किसी परीक्षा में उपस्थित होने वाला निरीक्षक परीक्षा के संचालन में हस्तक्षेप नहीं करेगा, किन्तु वह ऐसी प्रत्येक परीक्षा की, जिसमें वह उपस्थित होता है पर्याप्तता के बारे में तथा ऐसे अन्य किसी मामले में, जिसके बारे में कार्यकारिणी समिति उससे रिपोर्ट देने की अपेक्षा करे, कार्यकारिणी समिति को रिपोर्ट देगा ।
(4) कार्यकारिणी समिति ऐसी प्रत्येक रिपोर्ट की एक प्रति सम्बद्ध प्राधिकरण या संस्था को भेजेगी, और एक प्रति, ऐसी टिप्पणियों सहित जो उक्त प्राधिकरण या संस्था ने उस पर की है, केन्द्रीय सरकार को और उस राज्य की सरकार को भी भेजेगी जिसमें वह प्राधिकरण या संस्था स्थित है ।
17. जानकारी का दिया जाना-(1) केन्द्रीय परिषद् अपने कार्यवृत्त तथा कार्यकारिणी समिति के कार्यवृत्त की प्रतियां और अपने क्रियाकलाप की वार्षिक रिपोर्ट ॥। केन्द्रीय सरकार को भेजेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार इस धारा या धारा 16 के अधीन उसे दी गई किसी रिपोर्ट, [या प्रति] को ऐसी रीति से प्रकाशित कर सकेगी, जैसी वह ठीक समझे ।
[17क. लेखा और लेखापरीक्षा-(1) केन्द्रीय परिषद्, भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक के परामर्श से, केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए साधारण निदेशों के अनुसार और विनिर्दिष्ट किए गए प्ररूप में उचित लेखे और अन्य सुसंगत अभिलेख रखेगी और लेखाओं का एक वार्षिक विवरण तैयार करेगी ।
(2) केन्द्रीय परिषद् की लेखाओं की परीक्षा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा प्रतिवर्ष की जाएगी और उसके द्वारा या ऐसी लेखापरीक्षा के सम्बन्ध में इस प्रकार प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा उपगत कोई भी व्यय केन्द्रीय परिषद् द्वारा भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक को संदेय होगा ।
(3) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक और केन्द्रीय परिषद् की लेखाओं की लेखा परीक्षा के सम्बन्ध में उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति को वे ही अधिकार और विशेषाधिकार तथा प्राधिकार होंगे जो भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की सरकारी लेखाओं की लेखापरीक्षा के सम्बन्ध में प्राप्त हैं और विशिष्टतया उसे लेखा-बहियों, सम्बन्धित वाउचर और अन्य दस्तावेजों तथा कागजपत्र पेश किए जाने की मांग करने का अधिकार होगा ।
(4) भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक द्वारा या इस निमित्त उसके द्वारा प्राधिकृत किसी व्यक्ति द्वारा यथाप्रमाणित केन्द्रीय परिषद् के लेखे, उनकी लेखापरीक्षा रिपोर्ट के साथ, केन्द्रीय परिषद् को प्रतिवर्ष भेजे जाएंगे जो उन्हें अपनी टिप्पणियों सहित केन्द्रीय सरकार को भेजेगी ।
18. विनियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय परिषद्, इस अध्याय के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए इस अधिनियम से सुसंगत विनियम केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से [राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,] बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे विनियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा,
[(क) केन्द्रीय परिषद् की सम्पत्ति का प्रबन्ध;]
(ख) वह रीति जिसमें इस अध्याय के अधीन निर्वाचन किए जाएंगे;
(ग) केन्द्रीय परिषद् के अधिवेशनों का बुलाया जाना और उनका आयोजन, वह समय और जहां ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे, उनमें कार्यसंचालन और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य-संख्या;
(घ) कार्यकारिणी के कृत्य, उसके अधिवेशनों का बुलाया जाना और उनका आयोजन, वह समय और स्थान जहां ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य-संख्या;
(ङ) सभापति और उपसभापति की शक्तियां और उनके कर्तव्य;
(च) केन्द्रीय परिषद् के [रजिस्ट्रार, सचिव,] निरीक्षक तथा अन्य अधिकारियों और सेवकों की अर्हताएं, पदावधि और शक्तियां तथा कर्तव्य, जिनके अन्तर्गत [रजिस्ट्रार, या अन्य अधिकारी या सेवक] द्वारा दी जाने वाली प्रतिभूति की रकम और प्रकार भी है ;
[(छ) वह रीति जिसमें केन्द्रीय रजिस्टर बनाए रखा जाएगा और उसका प्रचार किया जाएगा;
(ज) कार्यकारिणी समितियों से भिन्न समितियों का गठन और उनके कृत्य, उनके अधिवेशनों का बुलाया जाना, और किया जाना, ऐसे समय और स्थान जब और जहां ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे, और उन सदस्यों की संख्या जो गणपूर्ति के लिए आवश्यक हों ।]
(3) जब तक इस धारा के अधीन केन्द्रीय परिषद् द्वारा विनियम नहीं बनाए जाते, सभापति, केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, इस धारा के अधीन ऐसे विनियम बना सकेगा, जिनके अन्तर्गत उस रीति की, जिससे केन्द्रीय परिषद् के प्रथम निर्वाचन किए जाएंगे, व्यवस्था करने वाले ऐसे विनियम भी हैं, जो इस अध्याय के उपबन्धों को प्रभावी बनाने के लिए आवश्यक हों, और इस प्रकार बनाए गए किन्हीं विनियमों में केन्द्रीय सरकार द्वारा, इस धारा के अधीन अपनी शक्तियों का प्रयोग करते हुए, परिवर्तन किया जा सकता है या उन्हें विखण्डित किया जा सकता है ।
[(4) इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक विनियम, बनाए के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस विनियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह विनियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किंतु विनियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
अध्याय 3
राज्य भेषजी परिषदें
19. राज्य परिषदों का गठन और संरचना-उस दशा के सिवाय जब संयुक्त राज्य परिषद् का धारा 20 के अधीन किए गए किसी करार के अनुसार गठन किया जाए, राज्य सरकार राज्य परिषद् का गठन करेगी जो निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्:
(क) छह सदस्यों जिनका निर्वाचन राज्य के रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञों द्वारा, अपने में से किया जाएगा;
(ख) राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट पांच सदस्य, जिनमें से कम से कम [तीन] ऐसे व्यक्ति होंगे जिनके पास भेषजी या भेषजिक रसायन में विहित उपाधि या डिप्लोमा है या जो [रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ हैं];
(ग) यथास्थिति, राज्य की प्रत्येक आयुर्विज्ञान परिषद् या चिकित्सक रजिस्ट्रीकरण परिषद् के सदस्यों द्वारा अपने में से, निर्वाचित एक सदस्य;
(घ) राज्य का मुख्य प्रशासनिक चिकित्सक अधिकारी, पदेन, या यदि वह किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो ऐसा व्यक्ति, जिसे उसने इस प्रकार उपस्थित होने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत किया है;
[(घघ) [ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23)] के अधीन राज्य के ओषधि नियंत्रण संगठन का भारसाधक अधिकारी, पदेन, या यदि वह किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो ऐसा व्यक्ति, जिसे उसने ऐसे उपस्थित होने के लिए लिखित रूप से प्राधिकृत किया है;]
(ङ) 4[औषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23)] के अधीन सरकारी विश्लेषक, पदेन, या यदि ऐसे विश्लेषकों की संख्या एक से अधिक है, तो ऐसा विश्लेषक, जिसे केन्द्रीय सरकार इस निमित्त नियुक्त करे:
परन्तु जहां धारा 20 की उपधारा (1) के खण्ड (ख) के अधीन कोई करार किया जाता है वहां उस करार में यह उपबन्ध किया जा सकता है कि अन्य भाग लेने वाले राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए राज्य परिषद् में ऐसे दो से अधिक सदस्य और बढ़ाए जाएंगे, जिनमें से कम से कम एक हर समय ऐसा व्यक्ति होगा जिसके पास भेषजी या भेषजिक रसायन में कोई विहित उपाधि या डिप्लोमा है या जो 2[रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ है,] और उन्हें उक्त अन्य भाग लेने वाले राज्यों में से ऐसे प्रत्येक राज्य की सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट किया जाएगा, और जहां करार में इस प्रकार का कोई उपबन्ध किया गया है वहां राज्य परिषद् की संरचना इस प्रकार बढ़ाई गई समझी जाएगी ।
20. अन्तरराज्जीय करार-(1) दो या अधिक राज्य सरकारें ऐसा करार कर सकेंगी जो उतनी अवधि के लिए प्रवृत्त रह सकेगा और जिसका नवीकरण ऐसी अतिरिक्त अवधियों के लिए, यदि कोई हों, किया जा सकेगा जो करार में विनिर्दिष्ट की जाए और उस करार में,
(क) सभी भाग लेने वाले राज्यों के लिए एक संयुक्त राज्य परिषद् के गठन का उपबन्ध किया जा सकता है ; अथवा
(ख) यह उपबन्ध किया जा सकता है कि एक राज्य की राज्य परिषद् अन्य भाग लेने वाले राज्यों की आवश्यकताओं को पूरा करेगी ।
(2) ऐसे मामलों के अतिरिक्त, जो इस अधिनियम में विनिर्दिष्ट हैं, इस धारा के अधीन किए गए करार में,
(क) राज्य परिषद् या संयुक्त राज्य परिषद् के सम्बन्ध में हुए व्ययों का भाग लेने वाले राज्यों के बीच प्रभाजन के लिए उपबन्ध किया जा सकता है ;
(ख) यह अवधारित किया जा सकता है कि भाग लेने वाली राज्य सरकारों में से कौन-कौन सी सरकार इस अधिनियम के अधीन राज्य सरकार के विभिन्न कृत्यों का निर्वहन करेगी और इस अधिनियम में राज्य सरकार के प्रति निर्देशों का तद्नुसार अर्थ लगाया जाएगा ;
(ग) भाग लेने वाले राज्यो के बीच या तो साधारणतया या इस अधिनियम के अधीन उठने वाले किन्हीं विशिष्ट मामलों के बारे में परामर्श करने के लिए उपबन्ध किया जा सकता है ;
(घ) ऐसे आनुषंगिक और समनुषंगी उपबन्ध करना जो इस अधिनियम से असंगत न हों और जो करार को प्रभावी करने के लिए आवश्यक या समीचीन समझे जाएं ।
(3) इस धारा के अधीन किया गया करार भाग लेने वाले राज्यों के राजपत्रों में प्रकाशित किया जाएगा ।
21. संयुक्त राज्य परिषदों की संरचना-(1) संयुक्त राज्य परिषद् निम्नलिखित सदस्यों से मिलकर बनेगी, अर्थात्,
(क) प्रत्येक भाग लेने वाले राज्य के रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञों द्वारा अपने में से चुने गए तीन से अन्यून और पांच से अनधिक उतने सदस्य जितनों का उपबन्ध करार में किया जाएगा ;
(ख) प्रत्येक भाग लेने वाले राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट दो से अन्यून और चार से अनधिक उतने सदस्स जितनों का उपबन्ध करार में किया जाएगा ;
(ग) प्रत्येक भाग लेने वाले राज्य की, यथास्थिति, आयुर्विज्ञान परिषद् या चिकित्सक रजिस्ट्रीकरण परिषद् के सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित एक सदस्य, पदेन ;
(घ) प्रत्येक भाग लेने वाले राज्य का मुख्य प्रशासनिक चिकित्सक अधिकारी, पदेन, अथवा यदि वह किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो ऐसा व्यक्ति, जिसे उसने ऐसे उपस्थित होने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत किया है ;
[(घघ) [ओषधि और प्रसाधन, 1940 (1940 का 23)]के अधीन प्रत्येक भाग लेने वाले राज्य के ओषधि नियंत्रण संगठन का भारसाधक अधिकारी, पदेन, अथवा यदि वह किसी अधिवेशन में उपस्थित होने में असमर्थ है तो ऐसा व्यक्ति जिसे उसने ऐसे उपस्थित होने के लिए लिखित रूप में प्राधिकृत किया है ;
(ङ) 2[ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23)]के अधीन प्रत्येक भाग लेने वाले राज्य का सरकारी विश्लेषण, पदेन, अथवा जहां किसी राज्य में उनकी संख्या एक से अधिक है वहां ऐसा विश्लेषक, जिसे राज्य सरकार इस निमित्त नियुक्त करे ।
(2) करार में यह उपबन्ध किया जा सकता है कि उपधारा (1) के खण्ड (क) और खण्ड (ख) के अधीन निर्वाचित या नामनिर्दिष्ट किए जाने वाले सदस्यों की संख्या उन खण्डों में विनिर्दिष्ट परिसीमाओं के भीतर प्रत्येक भाग लेने वाले राज्य के लिए समान हो सकती है या समान नहीं भी हो सकती है ।
(3) उपधारा (1) के खण्ड (क) के अधीन प्रत्येक राज्य सरकार द्वारा नामनिर्दिष्ट सदस्यों में से [आधे से अधिक] सदस्य ऐसे व्यक्ति होंगे जिनके पास भेषजी या भेषजिक रसायन में कोई विहित उपाधि या डिप्लोमा हो या जो [रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ हों] ।
22. राज्य परिषदों का निगमन-प्रत्येक राज्य परिषद् शाश्वत उत्तराधिकार तथा सामान्य मुद्रा वाली ऐसे नाम से एक निगमित निकाय होगी जो राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचित करे या जो, संयुक्त राज्य परिषद् की दशा में, करार में अवधारित किया जाए, और जिसे जंगम और स्थावर, दोनों ही प्रकार की संपत्ति का अर्जन या धारण करने की शक्ति होगी और उक्त नाम से वह वाद ला सकेगी और उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा ।
23. राज्य परिषद का सभापति और उपसभापति-(1) प्रत्येक राज्य परिषद् के सभापति और उपसभापति, राज्य परिषद् के सदस्यों द्वारा अपने में से निर्वाचित किए जाएंगे:
परन्तु राज्य परिषद् के प्रथम गठन से पांच वर्ष तक के लिए सभापति राज्य सरकार द्वारा नामानिर्दिष्ट व्यक्ति होगा जो राज्य सरकार के प्रसादपर्यन्त अपने पद पर रहेगा और यदि वह पहले से ही सदस्य नहीं है तो, यथास्थिति, धारा 19 या धारा 21 में निर्दिष्ट सदस्यों के अतिरिक्त राज्य परिषद् का सदस्य होगा ।
(2) [सभापति] या उपसभापति इस रूप में अपना पद पांच वर्ष से अनधिक की अवधि के लिए, जो राज्य परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी अवधि की समाप्ति के बाद तक नहीं रहेगी, धारण करेगा, किन्तु राज्य परिषद् का सदस्य बने रहने पर वह पुननिर्वाचन का पात्र होगा:
[परन्तु यदि राज्य परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी पदावधि की समाप्ति उस पूर्ण पदावधि की समाप्त से पूर्व हो जाती है, जिसके लिए वह सभापति या उपसभापति के रूप में निर्वाचित हुआ है, तो वह राज्य परिषद् के सदस्य के रूप में पुनः निर्वाचित या पुनः नामनिर्दिष्ट हो जाने की दशा में, उस पद को उस पूर्ण पदावधि के लिए धारण किए रहेगा, जिसके लिए वह सभापति या उपसभापति के रूप में निर्वाचित हुआ है ।]
24. निर्वाचन का ढंग-इस अध्याय के अधीन निर्वाचन विहित रीति से किए जाएंगे और यदि ऐसे किसी निर्वाचन के बारे में कोई विवाद उठता है तो वह राज्य सरकार को विनिर्दिष्ट किया जाएगा जिसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
25. पदावधि और आकस्मिक रिक्तियां-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, नामनिर्दिष्ट सभापति से भिन्न कोई नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य अपने नामनिर्देशन या निर्वाचन की तारीख के पांच वर्ष की अवधि के लिए या उस अवधि तक के लिए, जब तक उसका उत्तरवर्ती सम्यक् रूप से नामनिर्दिष्ट नहीं कर लिया जाता, इन दोनों में से जो अवधि अधिक लम्बी हो, पद धारण किए रहेगा ।
(2) नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य सभापति को सम्बोधित स्वहस्ताक्षरित लेख द्वारा किसी भी समय अपनी सदस्यता से तयागपत्र दे सकता है, और तब ऐसे सदस्य का स्थान रिक्त हो जाएगा ।
(3) यदि कोई नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित सदस्य राज्य परिषद् की राय में पर्याप्त कारण के बिना उसके क्रमवर्ती तीन अधिवेशनों में अनुपस्थित रहता है या, यदि वह धारा 19 के खण्ड (क) या खण्ड (ग) या धारा 21 के अधीन निर्वाचित है तो, यथास्थिति, जब वह रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ नहीं रह जाता है या, राज्य की आयुर्विज्ञान परिषद् या चिकित्सक रजिस्ट्रीकरण परिषद् का सदस्य नहीं रह जाता है, तो यह समझा जाएगा कि अपना स्थान रिक्त कर दिया है ।
(4) राज्य परिषद् में आकस्मिक रिक्ति, यथास्थति, नए नामनिर्देशन या निर्वाचन द्वारा भरी जाएगी, और उस रिक्ति को भरने के लिए, नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित व्यक्ति उस अवधि के शेष भाग के लिए ही पद पर रहेगा जिसके लिए वह व्यक्ति, जिसका स्थान वह ग्रहण करता है, नामनिर्दिष्ट या निर्वाचित किया गया था ।
(5) राज्य परिषद् द्वारा किया गया कोई कार्य केवल इस आधार पर प्रश्नगत नहीं किया जाएगा कि राज्य परिषद् में कोई रिक्ति थी या उसके गठन में कोई त्रुटि थी ।
(6) राज्य परिषद् के सदस्य पुनः नामनिर्देशन या पुनः निर्वाचन के पात्र होंगे ।
26. कर्मचारिवृन्द, पारिश्रमिक और भत्ते-राज्य परिषद् राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से,
(क) एक रजिस्ट्रार नियुक्त कर सकेगी जो राज्य परिषद् के सचिव के रूप में कार्य करेगा और यदि राज्य परिषद् ऐसा विनिश्चय करे तो वह कोषपाल के रूप में भी कार्य करेगा:
(ख) ऐसे अन्य अधिकारियों और सेवकों को नियुक्त कर सकेगी, जिन्हें इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए राज्य परिषद् अपने को समर्थ बनाने के लिए अपेक्षा करे;
(ग) राज्य परिषद् के सचिव तथा अन्य अधिकारियों और सेवकों के वेतन और भत्ते तथा सेवा की अन्य शर्तें नियत कर सकेगी;
(घ) राज्य परिषद् के सदस्यों को संदेय भत्ते की दरें नियत कर सकेगी:
परन्तु राज्य परिषद् के प्रथम गठन से पहले चार वर्ष तक के लिए रजिस्ट्रार राज्य सरकार द्वारा नियुक्त किया गया व्यक्ति होगा जो राज्य सरकार के प्रसाद प्रर्यन्त पद धारण करेगा ।
[26क. निरीक्षण-(1) राज्य परिषद् राज्य सरकार की पूर्व मंजूरी से ऐसे व्यक्तियों को निरीक्षक नियुक्त कर सकेगी जिनके पास इस अधिनियम के अध्याय 3, 4 और 5 के प्रयोजनों के लिए विहित अर्हताएं हों ।
(2) कोई निरीक्षक
(क) किसी ऐसे परिसर का निरीक्षण कर सकेगा जहां ओषधि-मिश्रण या ओषधि-योजन किया जाता है और रजिस्ट्रार को लिखित रिपोर्ट दे सकेगा;
(ख) इस बात की जांच कर सकेगा कि क्या ऐसा व्यक्ति, जो ओषधि-मिश्रण करने या ओषधि-योजन में लगा हुआ है, रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ है;
(ग) इस अधिनियम के किसी उल्लंघन की बाबत, लिखित रूप में किए गए किसी परिवाद का अन्वेषण कर सकेगा और रजिस्ट्रार को रिपोर्ट कर सकेगा;
(घ) राज्य परिषद् की कार्यकारिणी समिति के आदेश से अभियोजन संस्थित कर सकेगा;
(ङ) ऐसी अन्य शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा जो इस अधिनियम के अध्याय 3, 4 और 5 या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए आवश्यक हों ।
(3) कोई व्यक्ति, जो निरीक्षक को इस अधिनियम या उसके अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों द्वारा या उसके अधीन प्रदत्त अधिकारों का उसके द्वारा प्रयोग किए जाने में जानबूझकर बाधा डालेगा, कारावास से, जो छह मास तक का हो सकेगा या जुर्माने से, जो एक हजार रुपए तक का होगा, या दोनों से दण्डनीय होगा ।
(4) प्रत्येक निरीक्षक, भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझा जाएगा ।
27. कार्यकारिणी समिति-(1) राज्य परिषद् यथाशक्य शीघ्र, एक कार्यकारिणी समिति का गठन करेगी इसमें सभापति (जो कार्यकारिणी समिति का अध्यक्ष होगा) और उपसभापति, पदेन होंगे तथा राज्य परिषद् द्वारा अपने में से निर्वाचित उतने अन्य सदस्य होंगे, जितने विहित किए जाएं ।
(2) कार्यकारिणी समिति का सदस्य इस रूप में अपने पद पर तब तक बना रहेगा जब तक राज्य परिषद् के सदस्य के रूप में उसकी पदावधि समाप्त नहीं हो जाती, किन्तु राज्य परिषद् का सदस्य बने रहने पर वह पुनर्निर्वाचन का पात्र होगा ।
(3) इस अधिनियम द्वारा अपने को प्रदत्त शक्तियों तथा अधिरोपित कर्तव्यों के अतिरिक्त कार्यकारिणी समिति ऐसी शक्तियों का प्रयोग और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन करेगी जो विहित किए जाएं ।
28. जानकारी का दिया जाना-(1) राज्य परिषद् ऐसी रिपोर्ट, अपने कार्यवृत्त की प्रतियां तथा कार्यकारिणी समिति के कार्यवृत्त तथा अपने लेखाओं की संक्षिप्ति, जिनकी राज्य सरकार समय-समय पर अपेक्षा करे, राज्य सरकार को देगी और उनकी प्रतियां केन्द्रीय परिषद् को भेजेगी ।
(2) राज्य सरकार इस धारा के अधीन उसे दी गई कोई रिपोर्ट प्रति, संक्षिप्ति या अन्य जानकारी ऐसी रीति से प्रकाशित कर सकेगी जैसी वह ठीक समझे ।
अध्याय 4
भेषजज्ञों का रजिस्ट्रीकरण
29. रजिस्टर का तैयार किया जाना और रखा जाना-(1) किसी राज्य में इस अध्याय के प्रभावी होने के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र राज्य सरकार राज्य के लिए भेषजज्ञों का एक रजिस्टर, इसमें इसके पश्चात् उपबन्धित रीति से, तैयार करवाएगी ।
(2) राज्य परिषद् अपने गठन के पश्चात् यथासंभव शीघ्र, इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार रजिस्टर रखवाने की जिम्मेदारी लेगी ।
(3) रजिस्टर में निम्नलिखित विवरण होंगे, अर्थात्:
(क) रजिस्ट्रीकृत व्यक्ति का पूरा नाम और निवास का पता;
(ख) रजिस्टर में उसके प्रथम प्रवेश की तारीख;
(ग) रजिस्ट्रीकरण के लिए उसकी अर्हताएं;
(घ) उसका वृत्तिक पता, और यदि वह किसी व्यक्ति द्वारा नियोजित किया गया है तो उस व्यक्ति का नाम;
(ङ) ऐसे अन्य विवरण जो विहित किए जाएं ।
30. प्रथम रजिस्टर का तैयार किया जाना-(1) प्रथम रजिस्टर तैयार करने के प्रयोजन के लिए, राज्य सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, एक रजिस्ट्रीकरण अधिकरण का गठन करेगी, जो तीन व्यक्तियों से मिलकर बनेगा, और एक रजिस्ट्रार को भी नियुक्त करेगी, जो रजिस्ट्रीकरण अधिकरण के सचिव के रूप में कार्य करेगा ।
(2) राज्य सरकार, उसी या उसी प्रकार की किसी अधिसूचना द्वारा, ऐसी तारीख नियत करेगी जिसको या उसके पूर्व रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन, विहित फीस सहित, रजिस्ट्रीकरण अधिकरण को किए जाएंगे ।
(3) रजिस्ट्रीकरण अधिकरण नियत तारीख को या उसके पूर्व प्राप्त सभी आवेदनों की परीक्षा करेगा और यदि उसका समाधान हो जाता है कि आवेदक धारा 31 के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हित है तो वह निदेश देगा कि आवेदक का नाम रजिस्टर में दर्ज कर लिया जाए ।
(4) इस प्रकार तैयार किया गया प्रथम रजिस्टर तत्पश्चात् ऐसी रीति से प्रकाशित किया जाएगा, जैसी राज्य सरकार निदेश दे, और इस प्रकार प्रकाशित रजिस्टर रजिस्ट्रीकरण अधिकरण के किसी अभिव्यक्त या विवक्षित विनिश्चय से व्यथित कोई व्यक्ति, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा इस निमित्त राज्य सरकार द्वारा नियुक्त प्राधिकारी को, ऐसे प्रकाशन की तारीख से साठ दिन के भीतर, अपील कर सकेगा ।
(5) रजिस्ट्रार उपधारा (4) के अधीन नियुक्त प्राधिकारी के विनिश्चयों के अनुसार रजिस्टर में संशोधन करेगा और तब ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को, जिसका नाम उस रजिस्टर में दर्ज है, विहित प्ररूप में एक रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र जारी करेगा ।
(6) राज्य परिषद् के गठन हो जाने पर, रजिस्टर उसकी अभिरक्षा में दे दिया जाएगा और राज्य सरकार यह निदेश दे सकेगी कि प्रथम रजिस्टर में रजिस्ट्रीकरण के लिए प्राप्त समस्त आवेदन-फीस या उसका कोई विनिर्दिष्ट भाग राज्य परिषद् के नाम जमा किया जाएगा ।
31. प्रथम रजिस्टर में दर्ज होने के लिए अर्हताएं- [ऐसा कोई व्यक्ति जिसने अठारह वर्ष की आयू पूरी कर ली है,] विहित फीस देने पर, अपना नाम प्रथम रजिस्टर में दर्ज कराने का हकदार होगा, यदि वह उस राज्य में निवास करता हो या भेषजी का कारबार या वृत्ति करता हो और यदि,
(क) उसके पास भेषजी या भेषजिक रसायन में कोई उपाधि या डिप्लोमा है या, यथास्थिति, किसी भारतीय विश्वविद्यालय या राज्य सरकार का कोई रसायनज्ञ और ओषधि विक्रेता का डिप्लोमा है, या भारत ॥। से बाहर के किसी प्राधिकरण द्वारा प्रदत्त कोई विहित अर्हता है, अथवा
(ख) उसके पास किसी भारतीय विश्वविद्यालय की कोई ऐसी उपाधि है जो भेषजी या भेषजिक रसायन की उपाधि से भिन्न है, और वह किसी अस्पताल या औषद्यालय में या ऐसे स्थान पर, जहां चिकित्सा व्यवसायिकों के नुस्खों पर नियमित रूप से ओषधि-योजन किया जाता है, कम से कम तीन वर्ष की कुल अवधि तक, ओषधि-मिश्रण में लगा रहा है, अथवा
(ग) उसने कोई ऐसी परीक्षा पास कर ली है, जिसे राज्य सरकार द्वारा कम्पाउन्डरों और ओषधि-नियोजकों के लिए पर्याप्त माना गया है; अथवा
(घ) वह किसी अस्पताल या औषद्यालय में या अन्य ऐसे स्थान पर, जहां चिकित्सा व्यवसायियों के नुस्खों पर नियमित रूप से ओषधि-योजन किया जाता है, धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन अधिसूचित तारीख से पूर्व कम से कम पांच वर्ष की कुल अवधि तक ओषधि-मिश्रण के काम में लगा रहा है ।
32. पश्चात्वर्ती रजिस्ट्रीकरण के लिए अर्हताएं-(1) धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख के पश्चात् और राज्य में धारा 11 द्वारा या उसके अधीन शिक्षा विनियमों के प्रभावी हो जाने से पूर्व [ऐसा व्यक्ति जिसने अठारह वर्ष की आयु पूरी कर ली है, विहित फीस देने परट रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने का हकदार होगा यदि वह उस राज्य में निवास करता है या भेषजी का कारबार या वृत्ति करता है और यदि,
(क) वह केन्द्रीय परिषद् के पूर्व-अनुमोदन से विहित शर्तें, और यदि कोई शर्तें विहित नहीं की गई है तो धारा 31 में दी गई वे शर्तें, जो किसी व्यक्ति को प्रथम रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने का हकदार बनाती हैं, पूरी करता है, अथवा
(ख) वह किसी अन्य राज्य में कोई रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ हो, अथवा
(ग) उसके पास धारा 14 के अधीन अनुमोदित कोई अर्हता हो:
परन्तु रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने के लिए कोई व्यक्ति [खंड (क) या खंड (ग)] के अधीन तब तक हकदार नहीं होगा जब तक कि उसने मैट्रिकुलेशन परीक्षा या ऐसी कोई परीक्षा जो मैट्रिकुलेशन परीक्षा के समतुल्य विहित की गई हो, पास कर ली हो ।
(2) किसी राज्य में धारा 11 द्वारा उसके अधीन शिक्षा विनियमों के प्रभावी हो जाने के पश्चात् कोई व्यक्ति विहित फीस देने पर, रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने का हकदार होगा, यदि उसने [अठारह वर्ष] की आयु प्राप्त कर ली है और वह उस राज्य में निवास करता है या भेषजी का कारबार या वृत्ति करता है, और यदि उसने कोई अनुमोदित परीक्षा पास कर ली है या उसके पास धारा 14 के अधीन अनुमोदित कोई अर्हता है [या वह किसी अन्य राज्य में रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ है] ।
[32क. कुछ व्यक्तियों के रजिस्ट्रीकरण के लिए विशेष उपबंध- (1) धारा 32 में किसी बात के होते हुए भी, राज्य परिषद् रजिस्टर में निम्नलिखित को दर्ज किए जाने की अनुज्ञा भी दे सकती है:
(क) ऐसे विस्थापित व्यक्तियों का नाम, जो 4 मार्च, 1948 से पहले की किसी तारीख से भेषजी का कारबार या वृत्ति, अपनी जीविका के प्रधान साधन के रूप में, करते रहे हैं, जो धारा 31 में दी गई रजिस्ट्रीकरण की शर्तें पूरी करते हैं;
(ख) भारत के उन नागरिकों के नाम, जो भारत से बाहर के किसी देश में भेषजी का कारबार या वृत्ति करते रहे हैं और जो धारा 31 में दी गई रजिस्ट्रीकरण की शर्तें पूरी करते हैं;
(ग) उन व्यक्तियों के नाम, जो ऐसे क्षेत्र में निवास करते थे, जो बाद में भारत का राज्यक्षेत्र हो गया है और जो धारा 31 में दी गई रजिस्ट्रीकरण की शर्तें पूरी करते हैं;
(घ) उन व्यक्तियों के नाम, जो राज्य में भेषजी का कारबार या वृत्ति करते हैं; और
(i) जो धारा 31 में दी गई रजिस्ट्रीकरण की शर्तें, धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख को पूरी कर लेते यदि वे उस तारीख को या उससे पूर्व रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन करते, अथवा
(ii) किसी अस्पताल या औषद्यालय में या अन्य ऐसे स्थान पर, जहां धारा 2 के खंड (च) के उपखंड (iii) में परिभाषित चिकित्सा व्यवसायियों के नुस्खों पर नियमित रूप से ओषधि-योजन किया जाता है, धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख से पहले कम से कम पांच वर्ष की कुल अवधि तक ओषधि-मिश्रण के काम में लगे रहे हैं;
(ङ) ऐसे व्यक्तियों के नाम, जो किसी राज्य के, जैसा कि वह 1 नवम्बर, 1956 से ठीक पूर्व विद्यमान था, रजिस्टर में दर्ज होने के लिए अर्हित थे, किन्तु इस कारण कि जिस क्षेत्र में निवास करते थे या भेषजी का अपना कारबार या वृत्ति करते थे वह क्षेत्र उस तारीख को यथानिर्मित राज्य का एक भाग बन गया था, पश्चात्कथित राज्य के रजिस्टर में दर्ज किए जाने के लिए केवल इसी कारण अर्हित नहीं रहे हैं कि उन्होंने मैट्रिकुलेशन परीक्षा या मैट्रिकुलेशन परीक्षा के समतुल्य विहित कोई अन्य परीक्षा या कोई अनुमोदित परीक्षा पास नहीं की है या उनके पास धारा 14 के अधीन अनुमोदित अर्हता नहीं है ;
(च) ऐसे व्यक्ति के नाम,
(i) जो किसी राज्य के, जैसा कि वह 1 नवम्बर, 1956 से ठीक पूर्व विद्यमान था, रजिस्टर में दर्ज थे ; और
(ii) जो इस कारण कि जिस क्षेत्र में वे निवास करते थे, या भेषजी का अपना कारबार या वृत्ति करते थे वह उस तारीख को यथानिर्मित राज्य का एक भाग बन गया था ; पश्चात्कथित राज्य में निवास करते हैं या ऐसा कारबार या वृत्ति करते हैं ;
(छ) ऐसे व्यक्तियों के नाम, जो ऐसे क्षेत्र में, जिसमें यह अध्याय भेषजी (संशोधन) अधिनियम, 1959 (1959 का 24) के प्रारम्भ के पश्चात् प्रभावी होता है, निवास करते हैं, या भेषजी का अपना कारबार या वृत्ति करते हैं, और जो धारा 31 में दी गई रजिस्ट्रीकरण की शर्तें पूरी करते हैं ।
(2) कोई व्यक्ति, जो उपधारा (1) के अनुसरण में अपना नाम रजिस्टर में दर्ज कराना चाहता है, उस निमित्त राज्य परिषद् को आवेदन करेगा और ऐसे आवेदन के साथ विहित फीस दी जाएगी ।
(3) इस धारा के उपबन्ध भेषजी (संशोधन) अधिनियम, 1959 (1959 का 24) के प्रारम्भ से दो वर्ष की अवधि तक प्रवृत्त रहेंगे :
परन्तु राज्य सरकार, उपधारा (1) के खण्ड (क), खंड (ख) या खंड (ग) की प्रवर्तन अवधि को, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, ऐसी अतिरिक्त अवधि या अवधियों के लिए बढ़ा सकेगी, जो कुल मिलाकर दो वर्ष से अधिक की नहीं होगी, जैसी अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए ।
स्पष्टीकरण 1-उपधारा (1) के खंड (क) के प्रयोजनों के लिए, विस्थापित व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो भारत और पाकिस्तान के डेमिनियमों की स्थापना के कारण, या ऐसे किसी क्षेत्र में, जो अब पाकिस्तान का भाग है, सिविल उपद्रवों या ऐसे उपद्रवों के भय के कारण, 1 मार्च, 1947 को या उसके पश्चात् उस क्षेत्र में को छोड़ चुका है या उस क्षेत्र में अपने निवास स्थान से विस्थापित हो गया है और जो उस समय से भारत में निवास करने लगा है ।
स्पष्टीकरण 2-उपधारा (1) के खंड (ख), (ग) और (छ) के प्रयोजनों के लिए, धारा 31 के खंड (घ) में निर्दिष्ट अवधि की संगणना आवेदन की तारीख के प्रति निर्देश से की जाएगी ।]
[32ख. विस्थापित व्यक्तियों, स्वदेश वापस आए और अन्य व्यक्तियों के रजिस्ट्रीकरण के लिए विशेष उपबन्ध-(1) धारा 32 या धारा 32क में किसी बात के होते हुए भी राज्य परिषद्, रजिस्टर में निम्नलिखित व्यक्तियों के नाम दर्ज करने की अनुमति दे सकेगी
(क) ऐसे व्यक्तियों के नाम, जो धारा 31 के खण्ड (क) या खण्ड (ग) में विनिर्दिष्ट अर्हताएं रखते हैं और जो प्रथम रजिस्टर के बन्द किए जाने और शैक्षिक विनियमों के प्रवृत्त होने की तारीख के बीच रजिस्ट्रीकरण के पात्र थे;
(ख) ऐसे व्यक्तियों के नाम, जो ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23) के और उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन ओषधि-मिश्रण या ओषधि-योजन के लिए 21 दिसम्बर, 1969 से पूर्व अर्ह व्यक्ति" के रूप में अनुमोदित हैं;
(ग) ऐसे विस्थापित व्यक्तियों या स्वदेश वापस आए व्यक्तियों के नाम, जो भारत के बाहर किसी देश में भेषजी कारबार या वृत्ति को अपनी जीविका के मुख्य साधन के रूप में रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन की तारीख से पूर्व कुल पांच वर्षों से अनधिक अवधि के लिए चला रहे थे ।
स्पष्टीकरण-इस उपधारा में
(i) विस्थापित व्यक्ति" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी ऐसे क्षेत्र में, जो अब बंगला देश का भाग बन गया है, 1957 की अप्रैल के चौदहवें दिन के पश्चात् किन्तु, 1971 की मार्च के पच्चीसवें दिन के पूर्व सिविल उपद्रवों के कारण या ऐसे उपद्रवों के भय के कारण ऐसे क्षेत्र में अपने निवास-स्थान से विस्थापित हो गया है या वहां से विस्थापित कर दिया गया है और जो तब से भारत में निवास कर रहा है;
(ii) संप्रत्यावर्तित" से भारतीय उद्भव का ऐसा कोई व्यक्ति अभिप्रेत है जो किसी ऐसे क्षेत्र में, जो अब बर्मा, श्रीलंका या उगांडा या किसी अन्य देश का भाग बन गया है, सिविल उपद्रवों के कारण या ऐसे उपद्रव के भय के कारण 1957 को अप्रैल के चौदहवें दिन के पश्चात् ऐसे क्षेत्र में अपना निवास स्थान छोड़ चुका है या वहां से विस्थापित कर दिया गया है और तब से भारत में निवास करता है ।
(2) उपधारा (1) के खण्ड (क) और खण्ड (ख) के उपबन्ध भेषजी (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 70) के प्रारम्भ से दो वर्ष की अवधि के लिए प्रवृत्त रहेंगे ।]
33. रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदनों की संवीक्षा-(1) धारा 30 की उपधारा (2) के अधीन नियत तारीख के पश्चात् रजिस्ट्रीकरण के आवेदन राज्य परिषद् के रजिस्ट्रार को सम्बोधित किए जाएंगे और उनके साथ विहित फीस दी जाएगी ।
(2) यदि ऐसा आवेदन प्राप्त होने पर रजिस्ट्रार की यह राय है कि आवेदक इस अधिनियम के उस समय लागू उपबन्धों के अधीन रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने का हकदार है तो वह उस आवेदक का नाम रजिस्टर में दर्ज कर लेगा:
परन्तु कोई व्यक्ति जिसका नाम किसी राज्य के रजिस्टर में से इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन हटा दिया गया है, राज्य परिषद् के अधिवेशन में अभिलिखित अनुमोदन के बिना रजिस्टर में अपना नाम दर्ज कराने का हकदार नहीं होगा ।
(3) कोई व्यक्ति जिसके रजिस्ट्रीकरण का आवेदन रजिस्ट्रार द्वारा अस्वीकृत कर दिया जाता है, ऐसी अस्वीकृति की तारीख से तीन मास के भीतर, राज्य परिषद् को अपील कर सकता है, और उस पर राज्य परिषद् का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(4) इस धारा के अधीन रजिस्टर में किसी नाम के दर्ज हो जाने पर, रजिस्ट्रार विहित प्ररूप में रजिस्ट्रीकरण का प्रमाणपत्र जारी करेगा ।
34. नवीकरण फीस-(1) राज्य सरकार राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि उस वर्ष के, जिसमें रजिस्टर में नाम प्रथम बार दर्ज किया गया है, ठीक बाद के वर्ष की 31 दिसम्बर के पश्चात् उस रजिस्टर में नाम बनाए रखने के लिए राज्य परिषद् को प्रति वर्ष उतनी नवीकरण फीस दी जाएगी जितनी विहित की जाए, और जहां ऐसा निदेश किया जाता है वहां ऐसी नवीकरण फीस तत्संबंधी वर्ष के प्रथम अप्रैल से पहले संदाय करने के लिए शोध्य हो जाएगी ।
(2) जहां नियत तारीख तक नवीकरण फीस नहीं दे दी जाती है, वहां रजिस्ट्रार व्यतिक्रमी का नाम रजिस्टर से हटा देगा:
परन्तु इस प्रकार हटाया गया नाम ऐसी शर्तों पर, जो विहित की जाएं, रजिस्टर में फिर से दर्ज किया जा सकेगा ।
(3) नवीकरण फीस के संदाय कर देने पर, रजिस्ट्रार [उसके लिए एक रसीद देगा और ऐसी रसीद रजिस्ट्रीकरण के नवीकरण का सबूत होगी] ।
35. अतिरिक्त अर्हताओं का दर्ज किया जाना-कोई रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ, विहित फीस के संदाय कर देने पर, भेषजी या भेषजिक रसायन में ऐसी कोई अतिरिक्त उपाधियां या डिप्लोमें, जिन्हें वह प्राप्त करे, रजिस्टर में दर्ज कराने का हकदार होगा ।
36. रजिस्टर से हटाया जाना-(1) इस धारा के उपबन्धों के अधीन रहते हुए, कार्यकारिणी समिति यह आदेश दे सकेगी कि किसी रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ का नाम रजिस्टर में से हटा दिया जाए, यदि, उसे सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दे दिए जाने के पश्चात् और ऐसी अतिरिक्त जांच, यदि कोई हो, जिसे वह करना ठीक समझे, करने के पश्चात् उसका यह समाधान हो जाता है,
(i) कि उसका नाम गलती से या दुर्व्यपदेशन के कारण या किसी तात्त्विक तथ्य को छिपाने के कारण रजिस्टर में दर्ज किया गया है, अथवा
(ii) कि वह किसी अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, अथवा वृत्ति संबंधी किसी ऐसे कुत्सित आचरण का दोषी है, जो कार्यकारिणी समिति की राय में उसे रजिस्टर में बनाए रखने के अयोगय ठहराता हे, अथवा
(iii) कि भेषजी के अपने कारबार के प्रयोजनों के लिए उसके द्वारा नियोजित [या भेषजी के किसी कारबार के सम्बन्ध में उसके अधीन काम करने के लिए नियोजित] कोई व्यक्ति किसी ऐसे अपराध के लिए दोषसिद्ध किया गया है, या किसी ऐसे कुत्सित आचरण का दोषी रहा है, जिसके कारण, यदि वह व्यक्ति रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ होता तो खंड (ii) के अधीन उसका नाम रजिस्टर में से हटाया जा सकता था:
परन्तु खण्ड (iii) के अधीन तब तक ऐसा कोई आदेश नहीं किया जाएगा जब तक कार्यकारिणी समिति का यह समाधान नहीं हो जाता है कि,
(क) ऐसा अपराध या कुत्सित आचरण रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ द्वारा उकसाया गया था या उसमें उसकी मौनानुकूलता थी, अथवा
(ख) उस तारीख से, जिसको ऐसा अपराध या कुत्सित आचरण हुआ था, ठीक पहले के बारह मास की अवधि के दौरान किसी भी समय, उस रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ ने वैसा ही कोई अपराध किया था या उसी प्रकार के कुत्सित आचरण का दोषी रहा था, अथवा
(ग) भेषजी के अपने कारबार के प्रयोजनों के लिए किसी रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ द्वारा नियोजित [या भेषजी के किसी कारबार के संबंध में अपने अधीन काम करने के लिए नियोजित] किसी व्यक्ति ने उस तारीख को, जिसको ऐसा अपराध या कुत्सित आचरण हुआ था, ठीक पहले के बारह मास की अवधि के दौरान वैसा ही कोई अपराध किया था या वैसे ही किसी कुत्सित आचरण का दोषी रहा था और यह कि उस रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ को ऐसे पूर्वतन अपराध या कुत्सित आचरण का ज्ञान था या युक्तियुक्त रूप से होना चाहिए था, अथवा
(घ) जहां ऐसा अपराध या कुत्सित आचरण किसी अवधि तक बना रहा है वहां, रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ को उस चालू रहने वाले अपराध या कुत्सित आचरण का ज्ञान था या युक्तियुक्त रूप में होना चाहिए था, अथवा
(ङ) जहां ऐसा अपराध [ओषधि और प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 (1940 का 23)]के अधीन कोई अपराध है वहां रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ ने कारबार के अपने स्थान में और अपने द्वारा नियोजित व्यक्तियों द्वारा 1[या अपने नियंत्रण के अधीन व्यक्तियों द्वाराट उस अधिनियम के उपबंधों का अनुपालन कराने में सम्यक् तत्परता नहीं बरती थी ।
(2) उपधारा (1) के अधीन दिए गए आदेश में यह निदेश किया जा सकेगा कि जिस व्यक्ति का नाम रजिस्टर में से हटाए जाने का आदेश हुआ है वह या तो स्थायी रूप से या ऐसी अवधि के लिए, जो विनिर्दिष्ट की जाए, इस अधिनियम के अधीन उस राज्य के रजिस्ट्रीकरण के लिए पात्र नहीं होगा ।
(3) राज्य परिषद् उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश की पुष्टि कर सकेगी और ऐसा आदेश ऐसे पुष्टिकरण की तारीख से तीन मास की समाप्ति हो जाने पर ही प्रभावी होगा ।
(4) उपधारा (1) के अधीन किए गए आदेश से, जो राज्य परिषद् द्वारा पुष्ट किया जा चुका है, व्यथित कोई व्यक्ति उस पुष्टिकरण की संसूचना पाने के तीस दिन के भीतर, राज्य सरकार को अपील कर सकेगा, और उस अपील पर राज्य सरकार का आदेश अन्तिम होगा ।
(5) ऐसा व्यक्ति जिसका नाम इस धारा या धारा 34 की उपधारा (2) के अधीन रजिस्टर में से हटा दिया गया है, अपना रजिस्ट्रीकरण-प्रमाणपत्र तत्काल रजिस्ट्रार को वापस करेगा और इस प्रकार हटाया गया नाम राजपत्र में प्रकाशित किया जाएगा ।
37. रजिस्टर में प्रत्यावर्तन-राज्य परिषद् ऐसे कारणों से, जो उसे पर्याप्त प्रतीत हों, किसी भी समय यह आदेश दे सकेगी कि जिस व्यक्ति का नाम रजिस्टर में से हटा दिया गया है उसका नाम विहित फीस दे देने पर उसमें प्रत्यावर्तित कर लिया जाए:
परन्तु जहां ऐसे हटाए जाने के विरुद्ध कोई अपील राज्य सरकार द्वारा अस्वीकृत कर दी गई है वहां इस धारा के अधीन किया गया आदेश तब तक प्रभावी नहीं होगा जब तक राज्य सरकार द्वारा उसे पुष्ट नहीं कर दिया जाता ।
38. अन्य अधिकारिता का वर्जन-रजिस्टर में कोई नाम दर्ज करने से इंकार करने, या रजिस्टर में से नाम हटा देने, का कोई आदेश किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।
39. रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति का जारी किया जाना-जहां रजिस्ट्रार के समाधानप्रद रूप में यह दिखा दिया गया है कि रजिस्ट्रीकरण का कोई प्रमाणपत्र खो गया है या नष्ट हो गया है वहां रजिस्ट्रार विहित फीस के संदाय किए जाने पर, विहित प्ररूप में प्रमाणपत्र की दूसरी प्रति दे सकेगा ।
[40. रजिस्टर का मुद्रण और उसकी प्रविष्टियों का साक्ष्यिक मूल्य-(1) भेषजी (संशोधन) अधिनियम, 1959 (1959 का 24) के प्रारम्भ के पश्चात् 1 अप्रैल के बाद यथाशक्य शीघ्र रजिस्ट्रार, रजिस्टर की प्रतियां, उस रूप में जिसमें वह उक्त तारीख को था, मुद्रित कराएगा ।
(2) तत्पश्चात् रजिस्ट्रार प्रति वर्ष पहली अप्रैल के पश्चात् यथाशक्य शीघ्र उपधारा (1) में निर्दिष्ट रजिस्टर के वार्षिक परिशिष्ट की प्रतियां मुद्रित कराएगा जिसमें उक्त रजिस्टर में किए गए सभी परिवर्तन तथा अन्य संशोधन दिखाए जाएंगे ।
(3) (क) राज्य परिषद् के सामान्य निर्वाचन से तीन मास पूर्व रजिस्टर अद्यतन किया जाएगा और इस रजिस्टर की प्रतियां मुद्रित कराई जाएंगी ।
(ख) इस प्रकार मुद्रित रजिस्टर की उपधारा (2) के उपबंध वैसे ही लागू होंगे जैसे वे उपधारा (1) में निर्दिष्ट रजिस्टर को लागू होते हैं ।
(4) उपधारा (1) या उपधारा (2) या उपधारा (3) में निर्दिष्ट प्रतियां, उनके लिए आवेदन करने वाले व्यक्तियों को, विहित प्रभार संदाय करने पर, दी जाएंगी, और वे इस बात का साक्ष्य होंगी कि, यथास्थति, रजिस्टर या वार्षिक परिशिष्ट में निर्दिष्ट तारीख को वे व्यक्ति जिनके नाम उसमें दर्ज हैं, रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ थे ।]
अध्याय 5
प्रकीर्ण
41. रजिस्ट्रीकृत होने का मिथ्या दावा करने के लिए शास्ति-(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम राज्य के रजिस्टर में उस समय दर्ज नहीं है, मिथ्या रूप से यह दावा करेगा कि उसका नाम इस प्रकार दर्ज है या अपने नाम या पदनाम के सम्बन्ध में ऐसे शब्दों या अक्षरों का प्रयोग करेगा जो युक्तियुक्त रूप से यह दिखाने के लिए प्रकल्पित है कि उसका नाम इस प्रकार दर्ज है तो वह प्रथम दोषसिद्धि पर जुर्माने से, जो पांच सौ रुपए तक का हो सकेगा और किसी पश्चात्वर्ती दोषसिद्धि पर कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या एक हजार रुपए से अनधिक के जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा :
परन्तु यह दिखाना प्रतिवाद होगा कि अभियुक्त का नाम किसी अन्य राज्य के रजिस्टर में दर्ज है और यह कि इस धारा के अधीन अभिकथित अपराध के समय राज्य में रजिस्ट्रीकरण के लिए आवेदन कर दिया गया था ।
(2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए
(क) यह तत्त्वहीन होगा कि किसी व्यक्ति को यथापूर्वोक्त मिथ्या कथन या प्रयोग से धोखा हुआ था या नहीं;
(ख) भेषजज्ञ", रसायनज्ञ", ओषध-विक्रेता", ओषध निर्माण विज्ञानी", ओषधि-वितरक", ओषधि-योजन रसायनज्ञों" शब्दों अथवा ऐसे शब्दों के किसी संयोजन के [अथवा किसी अन्य शब्द के साथ किसी शब्द के संयोजन के] प्रयोजन के बारे में यह समझा जाएगा कि उसे युक्तियुक्त रूप से यह दिखाने के लिए प्रकल्पित है कि उन शब्दों का प्रयोग करने वाला व्यक्ति ऐसा व्यक्ति है जिसका नाम राज्य के रजिस्टर में उस समय दर्ज है;
(ग) यह साबित करने का भार कि किसी व्यक्ति का नाम राज्य के रजिस्टर में उस समय दर्ज है, उस व्यक्ति पर होगा जो ऐसा प्राख्यान करता है ।
(3) इस धारा के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, राज्य सरकार के 1[अथवा राज्य सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी के] आदेश से, या राज्य परिषद् की कार्यकारिणी समिति के आदेश से किए गए परिवाद पर ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
42. अरजिस्ट्रीकृत व्यक्तियों द्वारा ओषधि-योजन-(1) ऐसी तारीख को या उसके पश्चात्, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, रजिस्ट्रीकृत भेषजज्ञ से भिन्न कोई व्यक्ति ॥। किसी चिकित्सा व्यवसायी के नुस्खे पर किसी ओषधि का सम्मिश्रण नहीं बनाएगा, ओषधि तैयार नहीं करेगा, उसका मिश्रण नहीं करेगा, और न ही उसका औषधि-योजन करेगा:
परन्तु यह उपधारा किसी चिकित्सा व्यवसायी द्वारा अपने रोगियों के लिए या राज्य सरकार की साधारण या विशेष मंजूरी से किसी अन्य चिकित्सा व्यवसायी के रोगियों के लिए ओषधि-योजन को लागू नहीं होगी:
[परन्तु यह और कि जहां राज्य सरकार द्वारा ऐसी कोई तारीख नियत नहीं की गई है वहां यह उपधारा भेषजी (संशोधन) अधिनियम, 1976 (1976 का 70) के प्रारम्भ से [आठ वर्ष] की अवधि की समाप्ति पर उस राज्य में प्रभावी होगी ।]
(2) जो कोई उपधारा (1) के उपबंधों का उल्लंघन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास तक की हो सकेगी, या एक हजार रुपए से अनधिक के जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
(3) इस धारा के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान [राज्य सरकार के अथवा राज्य सरकार द्वारा निमित्त प्राधिकृत किसी अधिकारी के आदेश से या राज्य परिषद् की कार्यकारिणी समिति के आदेश से किए गए परिवाद पर ही किया जाएगा,] अन्यथा नहीं ।
43. रजिस्ट्रीकरण-प्रमाणपत्र वापस करने में चूक-(1) यदि कोई व्यक्ति, जिसका नाम रजिस्टर में से हटा दिया गया है, पर्याप्त कारण के बिना अपना रजिस्ट्रीकरण-प्रमाणपत्र तत्काल वापस करने में चूक करेगा तो जुर्माने से, जो पचास रुपए तक का हो सकेगा, दंडनीय होगा ।
(2) इस धारा के अधीन दंडनीय अपराध का संज्ञान, कार्यकारिणी समिति के आदेश से किए गए परिवाद पर ही किया जाएगा, अन्यथा नहीं ।
44. केन्द्रीय परिषद् को फीस के एक अंश का संदाय-राज्य परिषद् प्रत्येक वर्ष के मार्च के 31वें दिन को समाप्त होने वाली बारह मास की अवधि के दौरान अपने द्वारा वसूल की गई कुल फीस की चतुर्थांश रकम, उस वर्ष के जून की समाप्ति से पूर्व केन्द्रीय परिषद् को देगी ।
45. जांच आयोग की नियुक्ति-(1) जब कभी केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि केन्द्रीय परिषद् इस अधिनियम के उपबन्धों का अनुपालन नहीं कर रही है तब केन्द्रीय सरकार एक जांच आयोग की नियुक्ति कर सकेगी, जिसमें तीन व्यक्ति होंगे इनमें से दो केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे और उन दो में से एक उच्च न्यायालय का न्यायाधीश होगा और एक व्यक्ति परिषद् द्वारा नियुक्त किया जाएगा; और केन्द्रीय सरकार आयोग को ऐसे मामले निर्दिष्ट करेगी जिन पर जांच जानी है ।
(2) आयोग ऐसी रीति से जिसे वह ठीक समझे, जांच आरंभ करेगा और अपने को निर्दिष्ट मामलों पर, ऐसे उपचारों सहित, यदि कोई हों, जिनकी आयोग सिफारिश करना चाहे, केन्द्रीय सरकार को रिपोर्ट देगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार उस रिपोर्ट को स्वीकार कर सकेगी अथवा उसे उपान्तरण या पुनर्विचार के लिए आयोग को लौटा सकेगी ।
(4) रिपोर्ट के अन्तिम रूप से स्वीकृत हो जाने के पश्चात् केन्द्रीय सरकार केन्द्रीय परिषद् को यह आदेश दे सकेगी कि वह उन उपचारों को, जिनकी इस प्रकार सिफारिश की गई है, आदेश में विनिर्दिष्ट समय के भीतर अंगीकार कर ले और यदि परिषद् इस प्रकार विनिर्दिष्ट समय के भीतर उक्त आदेश का अनुपालन नहीं करती है तो केन्द्रीय सरकार आयोग की सिफारिशों को प्रभावी करने के लिए ऐसा आदेश दे सकेगी या ऐसी कार्रवाई कर सकेगी जो आवश्यक हो ।
(5) जब कभी राज्य सरकार को यह प्रतीत होता है कि राज्य परिषद् इस अधिनियम के किन्हीं उपबन्धों का अनुपालन नहीं कर रही है तब, राज्य सरकार एक वैसा ही जांच आयोग उसी प्रकार नियुक्त कर सकेगी और उपधारा (3) और उपधारा (4) में विनिर्दिष्ट आदेश पारित कर सकेगी या कार्रवाई कर सकेगी ।
46. नियम बनाने की शक्ति-(1) राज्य सरकार, अध्याय 3, 4 और 5 के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, इन नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध किया जा सकेगा :
(क) राज्य परिषद् की सम्पत्ति का प्रबन्ध और उसके लेखाओं का रखा जाना और लेखा परीक्षा;
(ख) वह रीति जिससे अध्याय 3 के अधीन निर्वाचन किए जाएंगे;
(ग) राज्य परिषद् के अधिवेशनों को बुलाना और आयोजित करना, वे समय और स्थान, जहां ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे, उनके कार्य संचालन और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य संख्या;
(घ) राज्य परिषद् के सभापति और उपसभापति की शक्तियां और कर्तव्य;
(ङ) कार्यकारिणी समिति का गठन और उसके कृत्य, उसके अधिवेशन बुलाना और आयोजित करना, वे समय और स्थान जहां ऐसे अधिवेशन किए जाएंगे और गणपूर्ति के लिए आवश्यक सदस्य संख्या;
(च) राज्य परिषद् के रजिस्ट्रार तथा अन्य अधिकारियों और सेवकों की अर्हताएं, पदावधि, शक्तियां और कर्तव्य, जिनके अंतर्गत कोषपाल द्वारा दी जाने वाली प्रतिभूति की रकम और प्रकार भी है;
[(चच) निरीक्षक की अर्हताएं, शक्तियां और कर्तव्य;]
(छ) अध्याय 4 के अधीन रजिस्ट्रीकरण आवेदनों में दिए जाने वाले विवरण और अर्हताओं के लिए दिए जाने वाले सबूत;
(ज) धारा 32 की उपधारा (1) के अधीन रजिस्ट्रीकरण के लिए शर्तें;
(झ) अध्याय 4 के अधीन संदेय फीस और रजिस्टर की प्रतियां देने के लिए प्रभार;
(ञ) रजिस्ट्रीकरण प्रमाणपत्रों का प्ररूप ॥।
(ट) रजिस्टर का रखा जाना;
[(टट) भेषजज्ञों का आचरण, और चिकित्सा व्यवसायियों, जनता तथा भेषजी वृत्ति के सम्बन्ध में उनके कर्तव्य;]
(ठ) कोई अन्य विषय जो धारा 45 की उपधारा (1), उपधारा (2), उपधारा (3) और उपधारा (4) के सिवाय, अध्याय 3, 4 और 5 के अधीन विहित किया जाना है या विहित किया जाए ।
[(3) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, राज्य विधान-मण्डल के समक्ष रखा जाएगा ।]
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