ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड (शेयरों का अर्जन) अधिनियम, 1981
(1981 का अधिनियम संख्यांक 29)
[11 सितम्बर, 1981]
ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड के कामकाज का उचित प्रबंध और देश
की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण माल के उत्पादन को चालू
रखना और उसका विकास सुनिश्चित करने की दृष्टि
से कंपनी के शेयरों के अर्जन का और उससे
सम्बन्धित या उसके आनुषंगिक विषयों
का उपबन्ध करने के लिए
अधिनियम
मैसर्स ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड, कानपुर, शुद्ध और संमिश्र ऊनी फैब्रिक के विनिर्माण और उत्पादन में लगा हुआ है जो जनसाधारण की आवश्यकताओं के लिए महत्वपूर्ण है;
और उद्योग (विकास और विनियमन) अधिनियम, 1951 (1951 का 65) की धारा 15 के अधीन किए गए अन्वेषण के परिणामस्वरूप उस अधिनियम की धारा 16 के अधीन कंपनी को कुछ निदेश जारी किए गए थे जिनके अन्तर्गत अन्य बातों के साथ कंपनी के उपक्रमों के संयंत्र और मशीनरी का आधुनिकीकरण था;
और उक्त निदेशों को क्रियान्वित करने के प्रयोजन के लिए लोक वित्तीय संस्थाओं ने कंपनी को भारी धनराशि का अग्रिम दिया था;
और केन्द्रीय सरकार और कुछ लोक वित्तीय संस्थाओं ने भी कंपनी की शेयर पूंजी में पर्याप्त निधि का विनिधान किया है;
और भारतीय स्टेट बैंक ने कंपनी को पर्याप्त का धनराशि का अग्रिम दिया है और उसके एक भाग की केन्द्रीय सरकार ने प्रत्याभूति दी है;
और कंपनी के उपक्रमों के उत्पादन को बनाए रखने और उसके विकास के लिए और कंपनी के कामकाज के उचित प्रबंध को सुनिश्चित करने के लिए और अधिक धनराशि का विनिधान आवश्यक है;
और पूर्वोक्त विनिधान करने में केन्द्रीय सरकार को समर्थ बनाने के लिए यह आवश्यक है कि केन्द्रीय सरकार का कंपनी के कामकाज पर प्रभावी नियंत्रण हो;
भारत गणराज्य के बत्तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो: -
अध्याय 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम और प्रारंभ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड (शेयरों का अर्जन) अधिनियम, 1981 है ।
(2) यह 11 जून, 1981 को प्रवृत्त हुआ समझा जाएगा ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) नियत दिन" से 11 जून, 1981 अभिप्रेत है;
(ख) बैंक" से बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) के अर्थ में बैंककारी कंपनी अभिप्रेत है;
(ग) आयुक्त" से धारा 6 के अधीन नियुक्त संदाय आयुक्त अभिप्रेत है;
(घ) कंपनी" से ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन लिमिटेड अभिप्रेत है, जो कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) के अर्थ में एक कंपनी है और जिसका रजिस्ट्रीकृत कार्यालय उत्तर प्रदेश राज्य के सदर लैंड हाउस, कानपुर में है;
(ङ) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है;
(च) शेयर" से कंपनी की पूंजी में शेयर, चाहे वह साधारण हो या अधिमानी, अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत शेयर धारक द्वारा किसी बैंक या अन्य लेनदार के पास गिरवी रखा गया शेयर है किन्तु इसके अंतर्गत कंपनी की पूंजी में निम्नलिखित द्वारा धारित कोई शेयर नहीं हैं: -
(i) केन्द्रीय सरकार;
(ii) कोई राज्य सरकार;
(iii) भारतीय स्टेट बैंक अधिनियम, 1956 (1956 का 23) के अधीन स्थापित भारतीय स्टेट बैंक और उसके समनुषंगी बैंक;
(iv) जीवन बीमा निगम अधिनियम, 1956 (1956 का 31) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय जीवन बीमा निगम;
(v) भारतीय यूनिट ट्रस्ट अधिनियम, 1963 (1963 का 52) की धारा 3 के अधीन स्थापित भारतीय यूनिट ट्रस्ट;
(vi) बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) के अर्थ के अन्तर्गत कोई तत्स्थानी नया बैंक;
(vii) बैंककारी कंपनी (उपक्रमों का अर्जन और अंतरण) अधिनियम, 1980 (1980 का 40) के अर्थ के अन्तर्गत कोई तत्स्थानी नया बैंक;
(viii) साधारण बीमा कारबार (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1972 (1972 का 57) द्वारा राष्ट्रीयकृत कोई साधारण बीमा कंपनी;
(छ) शेयर धारक" से ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है-
(i) जो नियत दिन के ठीक पूर्व कंपनी द्वारा किसी शेयर के धारक के रूप में रजिस्ट्रीकृत था और इसके अंतर्गत उसका विधिक प्रतिनिधि है; या
(ii) जिसने, नियत दिन के ठीक पूर्व, कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 108 के अधीन विहित प्ररूप में किसी शेयर के अंतरण की उचित लिखत को कंपनी में दाखिल कर दिया है और उस धारा के उपबंधों के अनुसार निष्पादित कर दिया है; या
(iii) जो कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 108 के अधीन विहित प्ररूप में किसी शेयर के अंतरण की उचित लिखत के अधीन दावा करता है और ऐसी तारीख को या उसके पूर्व, जो केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे, सम्यक् रूप से निष्पादित ऐसी लिखत को आयुक्त को परिदत्त करता है;
(ज) विनिर्दिष्ट तारीख" से ऐसी तारीख अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के किसी उपबंध के लिए, अधिसूचना द्वारा, विनिर्दिष्ट करे और इस अधिनियम के भिन्न-भिन्न उपबंधों के लिए भिन्न-भिन्न तारीखें विनिर्दिष्ट की जा सकेंगी;
(झ) उन शब्दों और पदों के, जो इसमें प्रयुक्त हैं और परिभाषित नहीं हैं किन्तु कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में परिभाषित हैं, वही अर्थ होंगे जो उनके उस अधिनियम में हैं ।
अध्याय 2
कंपनी के शेयरों का अर्जन
3. कंपनी के शेयरों का केन्द्रीय सरकार को अंतरण और उसमें निहित होना-(1) नियत दिन को कंपनी के सभी शेयर इस अधिनियम के आधार पर केन्द्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित हो जाएंगे ।
(2) केन्द्रीय सरकार के बारे में नियत दिन से ही यह माना जाएगा कि वह कंपनी के सदस्यों के रजिस्टर में ऐसे प्रत्येक शेयर के धारक के रूप में दर्ज कर ली गई है जो उपधारा (1) के उपबंधों के आधार पर उसको अंतरित और उसमें निहित हो गए हैं ।
(3) उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार में निहित सभी शेयर, ऐसे निहित होने के बल पर, सभी न्यासों, दायित्वों, बाध्यताओं, बंधकों, भारों, धारणाधिकारों, और उन्हें प्रभावित करने वाले अन्य विल्लंगमों से मुक्त और उन्मोचित हो जाएंगे और किसी न्यायालय, अधिकरण या अन्य प्राधिकारी की कोई कुर्की, व्यादेश या कोई डिक्री या आदेश जो ऐसे शेयरों के उपयोग को किसी प्रकार प्रभावित करता है, वापस ले लिया गया समझा जाएगा ।
(4) शंकाओं को दूर करने के लिए यह घोषित किया जाता है कि उपधारा (1) और उपधारा (2) के उपबंध-
(क) कंपनी के ऐसे किसी अधिकार को, जो किसी शेयर धारक से इस आधार पर कि शेयर धारक ने उसके द्वारा धारित शेयरों का संपूर्ण मूल्य या उसका कोई भाग कम्पनी को संदत्त नहीं किया है या किसी कंपनी के नाम में जमा नहीं किया है या किसी अन्य आधार पर कोई धन वसूल करने के लिए ऐसे शेयर धारक के विरुद्ध, नियत दिन के ठीक पूर्व, विद्यमान है;
(ख) शेयर धारक के ऐसे किसी अधिकार को, जो कंपनी से शोध्य कोई लाभांश या अन्य संदाय प्राप्त करने के लिए कंपनी के विरुद्ध नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान है,
प्रभावित करने वाले नहीं समझे जाएंगे ।
4. कंपनी का प्रबंध-केन्द्रीय सरकार कंपनी को सरकारी कंपनी के रूप में कार्य करने में समर्थ बनाने के प्रयोजन के लिए, अधिसूचना द्वारा ऐसे उपबंध (जिसमें निदेशक बोर्ड और कंपनी के ज्ञापन और संगम अनुच्छेदों में परिवर्तन सम्मिलित हैं), जो वह आवश्यक समझे, कर सकेगी और इस प्रकार किए गए उपबंध कंपनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) में अंतर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।
5. रकमों का संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, कंपनी के शेयरों को धारा 3 के अधीन केन्द्रीय सरकार को अंतरित और उसमें निहित किए जाने के लिए, कंपनी के शेयर धारकों को बाईस लाख साठ हजार रुपए की रकम नकद और ऐसी रीति से देगी जो धारा 7 में विनिर्दिष्ट है ।
(2) उपधारा (1) में निर्दिष्ट रकम पर, नियत दिन को प्रारम्भ होकर और उस तारीख को, जिसको ऐसी रकम का संदाय केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को किया जाता है, समाप्त होने वाली अवधि के लिए प्रतिवर्ष चार प्रतिशत की दर से साधारण ब्याज लगेगा ।
6. संदाय आयुक्त की नियुक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार धारा 5 के अधीन कंपनी को संदेय रकमों के संवितरण के प्रयोजन के लिए, अधिसूचना द्वारा, एक संदाय आयुक्त नियुक्त करेगी ।
(2) केन्द्रीय सरकार आयुक्त की सहायता के लिए ऐसे अन्य व्यक्तियों को नियुक्त कर सकेगी जिन्हें वह ठीक समझे और तब आयुक्त इस अधिनियम के अधीन अपने द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए एक या अधिक व्यक्तियों को भी प्राधिकृत कर सकेगा और भिन्न-भिन्न व्यक्तियों को भिन्न-भिन्न शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत किया जा सकेगा ।
(3) आयुक्त द्वारा प्रयोग की जा सकने वाली किन्हीं शक्तियों का प्रयोग करने के लिए आयुक्त द्वारा प्राधिकृत कोई व्यक्ति, उन शक्तियों का प्रयोग उसी रीति से कर सकेगा और उनका वही प्रभाव होगा मानो वे शक्तियां उस व्यक्ति को इस अधिनियम द्वारा प्रत्यक्षतः प्रदान की गई थी, न कि प्राधिकार के रूप में ।
(4) इस धारा के अधीन नियुक्त आयुक्त और अन्य व्यक्तियों के वेतन और भत्ते भारत की संचित निधि में से चुकाए जाएंगे ।
7. केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदाय-(1) केन्द्रीय सरकार, कंपनी के शेयर धारकों को संदाय करने के लिए आयुक्त को, विनिर्दिष्ट तारीख से तीस दिन के अंदर, उतनी रकम नकद देगी जो, -
(क) धारा 5 की उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट रकम के बराबर रकम है, और
(ख) धारा 5 की उपधारा (2) के अधीन अवधारित रकम के बराबर रकम है ।
(2) केन्द्रीय सरकार भारत के लोक खाते में आयुक्त के नाम एक निक्षेप खाता खोलेगी और आयुक्त इस अधिनियम के अधीन उसे संदत्त प्रत्येक रकम उक्त निक्षेप खाते में जमा करेगा और उक्त निक्षेप खाते को चलाएगा ।
(3) उपधारा (2) में निर्दिष्ट निक्षेप खाते में जमा रकमों पर प्रोद्भूत होने वाला ब्याज कंपनी के शेयर धारकों के फायदे के लिए काम आएगा ।
8. आयुक्त के समक्ष दावों का किया जाना-(1) प्रत्येक शेयर धारक, जिसका इस अधिनियम के अधीन अर्जित किसी शेयर के संबंध में कोई दावा है, ऐसा दावा नियत तारीख से तीस दिन के अन्दर आयुक्त के समक्ष करेगा:
परन्तु यदि आयुक्त का समाधान हो जाता है कि दावेदार पर्याप्त कारण से तीस दिन की उक्त अवधि के अंदर दावा करने से निवारित रहा था तो वह तीस दिन की अतिरिक्त अवधि के अंदर दावा ग्रहण कर सकेगा किन्तु इसके पश्चात् नहीं ।
(2) किसी अधिमानी शेयर के प्रत्येक शेयर धारक का, केन्द्रीय सरकार द्वारा आयुक्त को संदत्त रकम के संबंध में, अधिमानी दावा होगा ।
9. दावों की परीक्षा-धारा 8 के अधीन दावों की प्राप्ति पर आयुक्त, अधिमानी शेयरों और साधारण शेयरों के संबंध में दावों को पृथक्-पृथक् क्रमबद्ध करेगा और प्रत्येक ऐसे शेयर के संबंध में दावों की परीक्षा करेगा ।
10. दावों का स्वीकार या अस्वीकार किया जाना-(1) दावों की परीक्षा करने के पश्चात्, आयुक्त कोई निश्चित तारीख नियत करेगा जिसको या जिससे पूर्व प्रत्येक दावेदार अपने दावे का सबूत फाइल करेगा या आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरण के फायदे से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(2) इस प्रकार नियत तारीख की कम से कम चौदह दिन की सूचना अंग्रेजी भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में, और प्रादेशिक भाषा के ऐसे दैनिक समाचारपत्र के एक अंक में, जो आयुक्त उपयुक्त समझे, विज्ञापन द्वारा दी जाएगी, और ऐसी प्रत्येक सूचना में दावेदार से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अपने दावे का सबूत आयुक्त के समक्ष विज्ञापन में विनिर्दिष्ट समय के अन्दर फाइल करे ।
(3) प्रत्येक दावेदार, जो आयुक्त द्वारा विनिर्दिष्ट समय के अन्दर अपने दावे का सबूत फाइल करने में असफल रहता है, आयुक्त द्वारा किए जाने वाले संवितरणों से अपवर्जित कर दिया जाएगा ।
(4) आयुक्त ऐसा अन्वेषण करने के पश्चात्, जो उसकी राय में आवश्यक हो, और कम्पनी को दावे का खंडन करने का अवसर देने के पश्चात् और दावेदारों को सुनवाई का उचित अवसर देने के पश्चात्, लिखित रूप में, दावे को पूर्णतः या भागतः स्वीकार या अस्वीकार करेगा ।
(5) आयुक्त को अपने कृत्यों के निर्वहन से उत्पन्न होने वाले सभी मामलों में, जिनके अन्तर्गत वह या वे स्थान भी हैं, जहां वह अपनी बैठकें कर सकेगा, अपनी प्रक्रिया को विनियमित करने की शक्ति होगी और इस अधिनियम के अधीन कोई अन्वेषण करने के प्रयोजन के लिए उसे वही शक्तियां प्राप्त होंगी जो निम्नलिखित विषयों की बाबत वाद का विचारण करते समय सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) अधीन, सिविल न्यायालय में निहित होती हैं, अर्थात्: -
(क) किसी साक्षी को समन करना और हाजिर कराना और शपथ पर उसकी परीक्षा करना;
(ख) किसी दस्तावेज या अन्य तात्त्विक पदार्थ का, जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य हो, प्रकटीकरण और पेश किया जाना;
(ग) शपथ पत्रों पर साक्ष्य ग्रहण करना;
(घ) साक्षियों की परीक्षा के लिए कमीशन निकालना ।
(6) आयुक्त के समक्ष कोई अन्वेषण भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 193 और धारा 228 के अर्थ के अन्तर्गत न्यायिक कार्यवाही समझी जाएगी और आयुक्त को दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1973 (1974 का 2) की धारा 345 और अध्याय 26 के प्रयोजनों के लिए सिविल न्यायालय समझा जाएगा ।
(7) कोई दावेदार, जो आयुक्त के विनिश्चय से असंतुष्ट है, उस विनिश्चय के विरुद्ध अपील आंरभिक अधिकारिता वाले उस प्रधान सिविल न्यायालय में कर सकता है जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है ।
11. आयुक्त द्वारा दावेदारों को धन का संवितरण-(1) इस अधिनियम के अधीन दावा स्वीकार करने के पश्चात्, आयुक्त इस अधिनियम के आधार पर अर्जित प्रत्येक शेयर की बाबत शोध्य रकम ऐसे व्यक्ति या व्यक्तियों को, जिसे या जिन्हें ऐसी धनराशियां शोध्य हैं, प्रति अधिमानी शेयर दस रुपए की दर से और प्रति साधारण शेयर पचास पैसे की दर से संदत्त करेगा और ऐसा संदाय किए जाने पर ऐसे अर्जित शेयर के संबंध में केन्द्रीय सरकार के दायित्व का उन्मोचन हो जाएगा ।
(2) आयुक्त, धारा 7 की उपधारा (3) के अधीन ब्याज के रूप में उसे संदत्त रकम भी शेयर धारकों के बीच प्रभाजित करेगा और ऐसा प्रभाजन प्रत्येक शेयर धारक को शोध्य रकम के आधार पर किया जाएगा ।
12. असंवितरित या दावा न की गई रकम का साधारण राजस्व खाते में जमा किया जाना-आयुक्त को संदत्त कोई धन, जो उस तारीख से ठीक पूर्ववर्ती तारीख को, जिसको आयुक्त के कार्यालय का अंतिम रूप से परिसमापन होता है, असंवितरित रहता है या जिसके बारे में उस तारीख को कोई दावा नहीं किया गया है, उसको कार्यालय के अंतिम रूप से परिसमापन से पूर्व केन्द्रीय सरकार के साधारण राजस्व खाते को अंतरित किया जाएगा किन्तु इस प्रकार अंतरित किसी धन के लिए कोई दावा ऐसे संदाय के हकदार व्यक्ति द्वारा केन्द्रीय सरकार को किया जा सकता है और उसके संबंध में कार्यवाही इस प्रकार की जाएगी मानो ऐसा अंतरण किया ही नहीं गया था और दावे के संदाय के लिए आदेश, यदि कोई हो, राजस्व के प्रतिदाय के लिए आदेश माना जाएगा ।
13. निरीक्षण करने की शक्ति-इस बात को अभिनिश्चित करने के प्रयोजन के लिए कि इस अधिनियम के अधीन संदाय के लिए दावा करने वाला व्यक्ति शेयर धारक है या नहीं, आयुक्त को अधिकार होगा कि वह-
(क) किसी व्यक्ति से, जिसके कब्जे, अभिरक्षा या नियंत्रण में कंपनी का कोई रजिस्टर या अभिलेख है, ऐसे रजिस्टर या अभिलेख को आयुक्त के समक्ष प्रस्तुत करने के लिए अपेक्षा करे,
(ख) किसी व्यक्ति से यह अपेक्षा करे कि वह ऐसा कोई कथन करे या ऐसी कोई जानकारी प्रस्तुत करे जो आयुक्त द्वारा अपेक्षित हो ।
14. रकम के बारे में विवादों की जांच करने की आयुक्त की शक्ति-जहां इस अधिनियम के अधीन संदेय किसी रकम के लिए हकदार व्यक्ति या व्यक्तियों के बारे में कोई विवाद है (इसके अन्तर्गत ऐसा कोई विवाद भी है कि रकम के बारे में किसी मृत दावेदार के विधिक प्रतिनिधि कौन हैं), वहां आयुक्त ऐसी जांच करने के पश्चात् जैसी वह उचित समझे ऐसे व्यक्ति को रकम का संदाय कर सकेगा जो उस रकम को प्राप्त करने के लिए उसे सर्वोत्तम हकदार प्रतीत होता है:
परन्तु यदि आयुक्त यह अवधारण करने में असमर्थ है कि रकम के लिए हकदार व्यक्ति कौन है और यह समझता है कि यह मामला उस आरंभिक अधिकारिता वाले प्रधान सिविल न्यायालय द्वारा समुचित रूप से निपटाया जा सकता है जिसकी स्थानीय सीमा के भीतर कंपनी का रजिस्ट्रीकृत कार्यालय स्थित है, तो वह ऐसे विवाद को उक्त न्यायालय को निर्दिष्ट कर सकेगा जिसका विनिश्चय उस पर अंतिम होगा:
परंतु यह और कि इसमें अंतर्विष्ट किसी बात का प्रभाव ऐसे किसी व्यक्ति के, जो इस अधिनियम के अधीन अनुज्ञात सम्पूर्ण रकम या उसका कोई भाग प्राप्त करे, उसके लिए विधिपूर्ण रूप से हकदार व्यक्ति को उसका संदाय करने के दायित्व पर नहीं होगा ।
15. न्यायालय में रकम का निक्षेप किया जाना-जहां कोई विवाद आयुक्त द्वारा धारा 14 के अधीन उसमें निर्दिष्ट सिविल न्यायालय को निर्दिष्ट किया गया है, वहां वह रकम का निक्षेप उस न्यायालय में करेगा ।
अध्याय 3
प्रकीर्ण
16. अधिनियम का अध्यारोही प्रभाव होना-इस अधिनियम के उपबंध इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि में, या इस अधिनियम से भिन्न किसी विधि के आधार पर प्रभावी किसी लिखत में उससे असंगत किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
17. शास्तियां-जो कोई व्यक्ति, -
(क) इस अधिनियम के अधीन ऐसा दावा करेगा जिसके बारे में वह यह जानता है या उसके पास यह विश्वास करने का कारण है कि वह मिथ्या है या उसका कोई आधार नहीं है, या
(ख) इस अधिनियम के अधीन ऐसा करने की अपेक्षा किए जाने पर, -
(i) कंपनी का कोई रजिस्टर या अभिलेख पेश नहीं करेगा या पेश करने में असफल रहेगा; या
(ii) कोई ऐसा कथन करेगा या कोई ऐसी सूचना देगा जिसकी कोई महत्वपूर्ण विशिष्टि मिथ्या है और जिसका मिथ्या होना वह जानता है या जिसके मिथ्या होने का वह विश्वास करता है या जिसके सही होने का वह विश्वास नहीं करता है; या
(ग) किसी पुस्तक, लेखा, अभिलेख, रजिस्टर, विवरणी या अन्य दस्तावेज में यथा पूर्वोक्त कोई कथन करेगा,
वह कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, जो दो हजार रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
18. कंपनियों द्वारा अपराध-(1) जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कंपनी द्वारा किया गया है वहां प्रत्येक व्यक्ति, जो उस अपराध के किए जाने के समय उस कंपनी के कारबार के संचालन के लिए उस कंपनी का भारसाधक और उसके प्रति उत्तरदायी था और साथ ही वह कंपनी भी, ऐसे अपराध के दोषी समझे जाएंगे और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने के भागी होंगे:
परंतु इस उपधारा की कोई बात ऐसे किसी व्यक्ति को दंड का भागी नहीं बनाएगी यदि वह यह साबित कर देता है कि अपराध उसकी जानकारी के बिना किया गया था या उसने ऐसे अपराध का निवारण करने के लिए सब सम्यक् तत्परता बरती थी ।
(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, जहां इस अधिनियम के अधीन कोई अपराध किसी कम्पनी द्वारा किया गया है और यह साबित हो जाता है कि वह अपराध कंपनी के किसी निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी की सहमति या मौनानुकूलता से किया गया है या उस अपराध का किया जाना उसकी किसी उपेक्षा के कारण हुआ माना जा सकता है, वहां ऐसा निदेशक, प्रबंधक, सचिव या अन्य अधिकारी भी उस अपराध का दोषी समझा जाएगा और तद्नुसार अपने विरुद्ध कार्यवाही किए जाने और दंडित किए जाने का भागी होगा ।
स्पष्टीकरण-इस धारा के प्रयोजनों के लिए, -
(क) कंपनी" से कोई निगमित निकाय अभिप्रेत है और इसके अंतर्गत फर्म या व्यष्टियों का अन्य संगम भी है, तथा
(ख) फर्म के संबंध में निदेशक" से उस फर्म का भागीदार अभिप्रेत है ।
19. अपराधों के संज्ञान की परिसीमा-कोई न्यायालय इस अधिनियम के अधीन दंडनीय किसी अपराध का संज्ञान, केन्द्रीय सरकार या इस निमित्त उस सरकार द्वारा प्राधिकृत किसी अधिकारी की पूर्व मंजूरी के सिवाय नहीं करेगा ।
20. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को कार्यान्वित करने के लिए नियम अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
21. निरसन और व्यावृत्ति-(1) ब्रिटिश इंडिया कारपोरेशन (शेयरों का अर्जन) अध्यादेश, 1981 (1981 का 5) इसके द्वारा निरसित किया जाता है ।
(2) ऐसे निरसन के होते हुए भी, इस प्रकार निरसित अध्यादेश के अधीन की गई कोई बात या कार्रवाई, इस अधिनियम के तत्स्थानी उपबंधों के अधीन की गई समझी जाएगी ।
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