कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) संशोधन और विधिमान्यकरण अधिनियम, 1971
(1971 का अधिनियम संख्यांक 54)
[11 दिसम्बर 1971]
कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) अधिनियम, 1957 का और
संशोधन करने और भू्मि के या भूमि में या उस पर के अधिकारों
के कतिपय अर्जनों के उक्त अधिनियम के अधीन
विधिमान्यकरण के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के बाईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-
1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम कोयला धारक क्षेत्र (अर्जन और विकास) संशोधन और विधिमान्यकरण अधिनियम, 1971 है ।
। । । । ।
8. कतिपय अर्जनों का विधिमान्यकरण-(1) किसी न्यायालय के किसी निर्णय, डिक्री या आदेश के प्रतिकूल होने पर भी-
(क) इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व मूल अधिनियम के अधीन किया गया या किए जाने के लिए तात्पर्यित कोई भी भूमि का या भूमि में या उस पर के अधिकारों का अर्जन और ऐसे अर्जन के सम्बन्ध में की गई कोई कार्रवाई या कोई बात (जिसके अन्तर्गत किया गया कोई आदेश, किया गया कोई करार या प्रकाशित की गई कोई अधिसूचना भी है) मात्र इस कारण अविधिमान्य या किसी भी समय अविधिमान्य हुई नहीं समझी जाएगी कि-
(i) एक या अधिक सक्षम प्राधिकारियों ने मूल अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन एक ही अधिसूचना के अन्तर्गत आने वाली भूमि की बाबत मूल अधिनियम के अधीन सक्षम प्राधिकारी के कृत्यों का पालन किया है;
(ii) मूल अधिनियम की धारा 8 की उपधारा (2) के अधीन, चाहे मूल अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन एक ही अधिसूचना के अन्तर्गत आने वाली सभी भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों की बाबत या ऐसी भूमि के विभिन्न टुकड़ों या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों की बाबत, एक या अधिक रिपोर्ट की गई है;
(iii) मूल अधिनियम की धारा 9 के अन्तर्गत मूल अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन एक ही अधिसूचना के अन्तर्गत आने वाली भूमि के विभिन्न टुकड़ों या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों की बाबत एक या अधिक घोषणाएं की गई हैं;
(ख) इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व मूल अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन निकाली गई अधिसूचना के अनुसरण में कोई अर्जन ऐसे प्रारम्भ के पश्चात् किया जा सकेगा और इस अधिनियम के प्रारम्भ के चाहे पूर्व या पश्चात् ऐसे अर्जन के सम्बन्ध में की गई कोई कार्रवाई या कोई बात (जिसके अन्तर्गत किया गया कोई आदेश, किया गया कोई करार या प्रकाशित की गई कोई अधिसूचना भी है) मात्र इस कारण अविधिमान्य या किसी भी समय अविधिमान्य हुई नहीं समझी जाएगी ।
(2) उपधारा (1) के खण्ड (ख) में अन्तर्विष्ट किसी बात के होते हुए भी, किसी भूमि या ऐसी भूमि में या उस पर के अधिकारों के सम्बन्ध में जो मूल अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व अधिसूचित की गई है मूल अधिनियम की धारा 9 के अधीन कोई घोषणा इस अधिनियम के प्रारम्भ से दो वर्ष के अवसान के पश्चात् नहीं की जाएगी ।
(3) जहां मूल अधिनियम की धारा 7 की उपधारा (1) के अधीन इस अधिनियम के प्रारम्भ के पूर्व निकाली गई अधिसूचना के अन्तर्गत आने वाली किसी विशेष भूमि का अर्जन (जो ऐसी भूमि में उस पर के अधिकारों का अर्जन नहीं है) मूल अधिनियम की धारा 9 के अधीन किसी घोषणा के अनुसरण में किया गया है या किया जा रहा है, जो ऐसे प्रारम्भ से चाहे पूर्व या पश्चात् की गई है और ऐसी घोषणा ऐसी अधिसूचना के निकाले जाने की तारीख से तीन वर्ष के अवसान के पूर्व या पश्चात् की गई हो या की जा चुकी हो वहां मूल अधिनियम की धारा 13 की उपधारा (5) के अधीन यथा अवधारित ऐसी भूमि के बाजार मूल्य पर छह प्रतिशत प्रतिवर्ष की दर से संगणित सादा ब्याज तीन वर्षों की उक्त अवधि के अवसान की तारीख से ऐसी भूमि के अर्जन के लिए संदेय प्रतिकर के संदाय किए जाने की तारीख तक संदत्त किया जाएगा :
परन्तु किसी अवधि के लिए जिसके दौरान किसी भूमि के अर्जन की कार्यवाहियां न्यायालय के आदेश द्वारा मुल्तवी या व्यादेश के कारण स्थगित रही हैं कोई ऐसा ब्याज संदेय नहीं होगा:
परन्तु यह और कि इस उपधारा की कोई बात किसी भूमि के अर्जन को लागू नहीं होगी जबकि प्रतिकर की रकम इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व हितबद्ध व्यक्तियों को संदत्त की गई हो ।
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