आप्रवास (वाहक-दायित्व) अधिनियम, 2000
(2000 का अधिनियम संख्यांक 52)
[11 दिसम्बर, 2000]
पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 और
उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के
उल्लंघन में वाहकों द्वारा भारत में लाए गए
यात्रियों की बाबत उन्हें दायी बनाने और
उससे संबंधित विषयों के लिए
अधिनियम
भारत गणराज्य के इक्यावनवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित होः-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम आप्रवास (वाहक-दायित्व) अधिनियम, 2000 है ।
(2) इसका विस्तार संपूर्ण भारत पर है ।
2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो, -
(क) वाहक" से कोई ऐसा व्यक्ति अभिप्रेत है जो यात्रियों को जल मार्ग या वायु मार्ग द्वारा परिवहन करने के कारबार में लगा हुआ है और इसके अंतर्गत व्यक्तियों का ऐसा कोई संगम भी है; चाहे वह निगमित हो या नहीं, जो वायुयान या पोत पर स्वामित्व रखता है या जिसके द्वारा वायुयान या पोत किराए पर लिया जाता है;
(ख) सक्षम प्राधिकारी" से विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) के अधीन बनाए गए विदेशियों विषयक आदेश, 1948 के पैरा 2 के उप-पैरा (2) के अधीन नियुक्त सिविल प्राधिकारी या केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त अधिसूचित कोई अन्य अधिकारी अभिप्रेत है;
(ग) विहित" से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है ।
(2) उन शब्दों और पदों का, जो इस अधिनियम में परिभाषित नहीं है किंतु विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 (1946 का 31) या पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 (1920 का 34) में परिभाषित है, वही अर्थ हैं जो उन अधिनियमों में हैं ।
3. भारत में लाए गए यात्रियों के लिए वाहकों का दायित्व-जहां सक्षम प्राधिकारी की यह राय है कि कोई वाहक पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 (1920 का 34) और उसके अधीन बनाए गए नियमों के उपबंधों के उल्लंघन में किसी व्यक्ति को भारत में लाया है, वहां वह, आदेश द्वारा, ऐसे वाहक पर एक लाख रुपए की शास्ति अधिरोपित कर सकेगा:
परन्तु वाहक को इस विषय में, सुनवाई का अवसर दिए बिना कोई आदेश पारित नहीं किया जाएगा ।
4. अपील-(1) इस अधिनियम की धारा 3 के अधीन किए गए आदेश के विरुद्ध अपील गृह मंत्रालय में भारत सरकार के उस संयुक्त सचिव को होगी जो उस सरकार द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया जाए ।
(2) प्रत्येक ऐसी अपील, उस आदेश की तारीख से, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, तीस दिन के भीतर की जाएगी:
परन्तु यदि अपील प्राधिकारी का यह समाधान हो जाता है कि अपीलार्थी उक्त तीस दिन की अवधि के भीतर अपील करने से पर्याप्त कारण से निवारित किया गया था तो वह अपीलार्थी को तीस दिन की और अवधि के भीतर अपील करने के लिए अनुज्ञा दे सकेगा ।
(3) ऐसी किसी अपील की प्राप्ति पर, अपील प्राधिकारी, पक्षकारों को सुने जाने का उचित अवसर देने के पश्चात् और ऐसी जांच करने के पश्चात् जो वह उचित समझे, उस आदेश की, जिसके विरुद्ध अपील की गई है, पुष्टि करने वाला, उसे उपांतरित करने वाला या उलटने वाला, आदेश कर सकेगा, जो वह ठीक समझे ।
(4) प्रत्येक अपील, ऐसी फीस के संदाय पर, जो विहित की जाए, की जाएगी ।
5. सरकार को शोध्य शास्ति की वसूली-जहां इस अधिनियम के अधीन अधिरोपित किसी शास्ति का संदाय नहीं किया जाता है वहां सक्षम प्राधिकारी इस प्रकार संदेय शास्ति की वसूली,-
(क) वायुयान या पोत के; या
(ख) वाहक पोत या वायुयान पर के किसी माल का, अधिग्रहण करके, उसे प्रतिधृत करके या उसका विक्रय करके कर सकेगा ।
6. विधिक कार्यवाहियों का वर्जन-इस अधिनियम या इसके अधीन बनाए गए किसी नियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई या की जाने के लिए आशयित किसी बात के लिए कोई भी वाद, अभियोजन या अन्य विधिक कार्यवाही केन्द्रीय सरकार या सक्षम प्राधिकारी या केन्द्रीय सरकार के किसी अधिकारी या किसी ऐसे अन्य व्यक्ति के विरुद्ध नहीं होगी जो इस अधिनियम के अधीन किन्हीं शक्तियों का प्रयोग कर रहा है या किन्हीं कृत्यों का निर्वहन कर रहा है या किसी कर्तव्य का पालन कर रहा है ।
7. 1939 के अधिनियम 16, 1920 के अधिनियम 34 और 1946 के अधिनियम 31 लागू होना वर्जित न होना-इस अधिनियम और तद्धीन बनाए गए नियमों के उपबंध विदेशियों का रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1939, पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920 और विदेशियों विषयक अधिनियम, 1946 या उनके अधीन बनाए गए नियमों या किए गए आदेशों के अतिरिक्त होंगे न कि उनके अल्पीकरण में ।
8. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस अधिनियम के प्रयोजनों को कार्यान्वित करने के लिए नियम बना सकेगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियमों में निम्नलिखित के लिए उपबंध किया जा सकेगा-
(क) ऐसी फीस जिसका धारा 4 की उपधारा (4) के अधीन अपील के लिए संदाय किया जाएगा;
(ख) कोई अन्य विषय जिसका विहित किया जाना अपेक्षित है या जो विहित किया जाए ।
9. नियमों का संसद् के समक्ष रखा जाना-इस अधिनियम के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
10. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो केन्दीय सरकार, आदेश द्वारा, कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए कोई ऐसी बात कर सकेगी, जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हो :
परन्तु ऐसा कोई आदेश, इस अधिनियम के प्रारंभ से दो वर्ष की अवधि की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।
(2) इस धारा के अधीन प्रत्येक आदेश, किए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।
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