अभ्रक खान श्रम कल्याण निधि अधिनियम, 1946
(1946 का अधिनियम संख्यांक 22)
[23 अप्रैल, 1946]
अभ्रक खनन उद्योग में नियोजित श्रमिकों के कल्याण की
अभिवृद्धि करने के क्रियाकलापों के वित्तपोषणार्थ
एक निधि गठित करने के लिए
अधिनियम
यतः अभ्रक खनन उद्योग में नियोजित श्रमिकों के कल्याण की अभिवृद्धि करने के क्रियाकलापों के वित्तपोषणार्थ एक निधि गठित करना समीचीन है;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :-
1. संक्षिप्त नाम और विस्तार-(1) यह अधिनियम अभ्रक खान श्रम कल्याण निधि अधिनियम, 1946 कहा जा सकेगा ।
(2) इसका विस्तार [जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय] सम्पूर्ण भारत पर है ।
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3. अभ्रक खान श्रम कल्याण निधि-(1) निधि का उपयोजन केन्द्रीय सरकार द्वारा ऐसे उपायों के सम्बन्ध में उपगत व्ययों को पूरा करने के लिए किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार की राय में अभ्रक खनन उद्योग में नियोजित श्रमिकों के कल्याण की अभिवृद्धि करने के लिए आवश्यक या समीचीन हों ।
(2) उपधारा (1) की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, निधि का उपयोजन निम्नलिखित को चुकाने में किया जा सकेगा,-
(क) अभ्रक खनन उद्योग में नियोजित श्रमिकों के फायदे के लिए उन उपायों का खर्च जो निम्नलिखित के लिए उद्दिष्ट हों,-
(i) लोक स्वास्थ्य और स्वच्छता का सुधार, रोग का निवारण और चिकित्सीय सुविधाओं का उपबन्ध और सुधार;
(ii) जल प्रदाय तथा नहाने-धोने की सुविधाओं का उपबन्ध और सुधार;
(iii) शैक्षिक सुविधाओं का उपबन्ध और सुधार;
(iv) जीवन-स्तरों का, जिनके अन्तर्गत आवासन और पोषण आते हैं, सुधार, सामजिक दशाओं की बेहतरी ओर आमोद-प्रमोद की सुविधाओं का उपबन्ध;
(v) काम पर जाने या वहां से आने के लिए परिवहन का उपबन्ध;
[(vi) परिवार कल्याण का उपबंध, जिसके अंतर्गत परिवार नियोजन, शिक्षा और सेवाएं भी हैं;]
(ख) किसी ऐसे प्रयोजन के लिए, जिसके लिए निधि का उपयोग किया जा सकता हो, केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित किसी स्कीम की सहायता के लिए किसी राज्य सरकार, स्थानीय प्राधिकारी या अभ्रक खान के स्वामी, अभिकर्ता या प्रबन्धक को धन का अनुदान;
(ग) निधि के प्रशासन का खर्च, जिसके अन्तर्गत धारा 4 के अधीन गठित सलाहकार समितियों के सदस्यों के भत्ते, यदि कोई हों, और धारा 5 के अधीन नियुक्त किए गए आफिसरों के सम्बलम् और भत्ते, यदि कोई हों, आते हैं;
(घ) कोई अन्य व्यय जिसका कि केन्द्रीय सरकार निधि से चुकाया जाना निर्दिष्ट करे ।
(3) केन्द्रीय सरकार को यह विनिश्चित करने की शक्ति होगी कि कोई विशिष्ट व्यय निधि में से विकलित किए जाने योग्य है या नहीं और उसका विनिश्चय अन्तिम होगा ।
(4) केन्द्रीय सरकार निधि से वित्तपोषित क्रियाकलापों की रिपोर्ट, निधि की प्राप्तियों और व्यय के प्राक्कलन तथा एक लेखा विवरण सहित प्रति वर्ष शासकीय राजपत्र में प्रकाशित करेगी ।
4. सलाहकार समितियां-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के या निधि के प्रशासन से उद्भूत होने वाले किन्हीं मामलों पर केन्द्रीय सरकार को सलाह देने के लिए [उतनी सलाहकार समितियां गठित करेगी जितनी वह ठीक समझे, किन्तु हर एक राज्य के लिए एक से अधिक सलाहकार समितियां गठित नहीं करेगी] ।
(2) सलाहकार समितियों के सदस्य केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए जाएंगे और उनकी संख्या उतनी होगी और वह ऐसी रीति से चुने जाएंगे, जो इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित की जाएं :
परन्तु यह कि हर एक समिति में अभ्रक खान स्वामियों और अभ्रक खनन उद्योग में नियोजित कर्मकारों का प्रतिनिधित्व करने वाले सदस्यों की संख्या बराबर होगी और यह कि हर एक समिति में कम से कम एक महिला सदस्य होगी और हर एक समिति का कम से कम एक सदस्य सम्पृक्त राज्य के विधान-मण्डल का सदस्य होगा ।
(3) हर एक सलाहकार समिति का अध्यक्ष केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किया जाएगा ।
(4) केन्द्रीय सरकार सलाहकार समितियों के सब सदस्यों के नाम शासकीय राजपत्र में प्रकाशित करेगी ।
5. आफिसरों की नियुक्ति और शक्तियां-(1) केन्द्रीय सरकार, निरीक्षक, कल्याण प्रशासक और अन्य ऐसे आफिसर नियुक्त कर सकेगी जैसे वह निधि का प्रशासन करने के लिए या निधि से वित्तपोषित क्रियाकलापों के पर्यवेक्षण या चलाए जाने के लिए आवश्यक समझे ।
(2) इस प्रकार नियुक्त किया गया हर आफिसर भारतीय दण्ड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ के अंदर लोक सेवक समझा जाएगा ।
(3) निरीक्षक या कल्याण प्रशासक,-
(क) ऐसी सहायता के साथ, यदि कोई हो, जैसी वह ठीक समझे, युक्तियुक्त समय पर ऐसे स्थान में प्रवेश कर सकेगा जहां वह निधि से वित्तषोषित क्रियाकलापों के पर्यवेक्षण या चलाए जाने के प्रयोजनार्थ प्रवेश करना आवश्यक समझे; और
(ख) ऐसे स्थान के अन्दर कोई ऐसी बात कर सकेगा जो उसके कर्तव्यों के उचित निर्वहन के लिए आवश्यक हो ।
6. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार इस अधिनियम के प्रयोजनों को क्रियान्वित करने के लिए नियम शासकीय राजपत्र में अधिसूचना द्वारा बना सकेगी ।
(2) पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे-
(क) धारा 2 की उपधारा (1) द्वारा अधिरोपित सीमाशुल्क का प्रतिदाय, परिहार और वसूली करना;
(ख) धारा 4 के अधीन गठित सहलाहकार समितियों की संरचना, वह रीति जिससे उनके सदस्य चुने जाएंगे, ऐसे सदस्यों की पदावधि, उनको संदेय भत्ते, यदि कोई हों, और वह रीति जिससे सलाहकार समितियां अपना कारबार संचालित करेंगी;
(ग) वे शर्तें जो निधि में से धारा 3 की उपधारा (2) के खण्ड (ख) के अधीन धन के अनुदान को शासित करें;
(घ) उस प्राक्कलन और विवरण का प्ररूप जो धारा 3 की उपधारा (4) में निर्दिष्ट है;
(ङ) धारा 5 के अधीन नियुक्त सब आफिसरों की सेवा की शर्तें और कर्तव्य;
(च) अभ्रक खानों के स्वामियों या अभिकर्ताओं या प्रबंधकों द्वारा आंकड़ों की या अन्य जानकारी का दिया जाना, और इस खण्ड के अधीन बनाए गए किसी नियम की अपेक्षाओं का अनुपालन करने में असफलता का जुर्माने से दण्डित किया जाना ।
[(3) इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उस नियम के अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।]
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