संसद् के अधिनियम
शासकीय न्यासी अधिनियम, 1913
(1913 का अधिनियम संख्यांक 2)
[27 फरवरी, 1913]
शासकीय न्यासी के पद से संबंधित
विधि के समेकन और
संशोधन के लिए
अधिनियम
॥। इसके द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है:
भाग 1
प्रारंभिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारंभ - (1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम शासकीय न्यासी अधिनियम, 1913 है ।
3[(2) इसका विस्तार ॥। संपूर्ण भारत पर है ।]
- उद्देश्यों और कारणों के कथन के लिए देखिए भारत का राजपत्र, 1912, भाग 5, पृष्ठ 202, प्रवर समिति की रिपोर्ट के लिए देखिए भारत का राजपत्र, 1913, भाग 5, पृष्ठ 19 और काउन्सिल में कार्यवाहियों के लिए देखिए भारत का राजपत्र, 1912, भाग 6, पृष्ठ 699 और भारत का राजपत्र, 1813, भाग 6, पृष्ठ 15 और 28 ।
इस अधिनियम में कुछ भी न्यास संपत्तियों के प्रबंध और वितरण को, या बाम्बे बेरोनेटी ऐक्ट, 1959 (1960 का 9) के अधीन शासकीय न्यासी के कर्तव्यों को लागू नहीं होगा ।
इस अधिनियम को, भूतपूर्व बंगाल प्रांत में उसे लागू करने के लिए, आफिशियल ट्रस्टीज (बंगाल अमेंडमेंट) ऐक्ट, 1940 (1940 का बंगाल अधिनियम 12) तथा आफिशियल ट्रस्टीज (बंगाल अमेंडमेंट) ऐक्ट, 1941 (1941 का बंगाल अधिनियम 1) और 1960 के मुम्बई अधिनियम 9 द्वारा बरार द्वारा संशोधित किया गया है ।
इसका विस्तार बरार विधि अधिनियम, 1941 (1941 का 4) द्वारा बरार पर तथा 1963 के विनियम 6 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा दादरा और नागर हवेली पर किया गया है ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 2 द्वारा उद्देशिका का लोप किया गया ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा पूर्ववर्ती उपधारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1968 के अधिनियम सं. 25 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय शब्दों का (15-8-1968 से) लोप किया गया ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे 2 केंद्रीय सरकार 3 राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, निर्दिष्ट करे ।
४ [2. निर्वचन खंड - इस अधिनियम में, जब तक कि विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,
(1) सरकार से, किसी राज्य के संबंध में, राज्य सरकार, तथा किसी संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में, केन्द्रीय सरकार, अभिप्रेत है ।
5। । ।
(3) विहित से इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है । ]
६ [3. उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार - उच्च न्यायालय, इस अधिनियम या भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 के अधीन शासकीय न्यासी द्वारा, या उसके विरुद्ध, संस्थित कार्यवाहियों के बारे में, उन राज्यक्षेत्रों में सर्वत्र सक्षम न्यायालय होगा जिनके संबंध में वह न्यायालय सिविल अपीली अधिकारिता का प्रयोग करता है:
परन्तु इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह किसी जिला न्यायालय की अधिकारिता को प्रभावित करती है ।]
भाग 2
शासकीय न्यासी का पद
- शासकीय न्यासी - 7(1) ८सरकार प्रत्येक राज्य के लिए एक शासकीय न्यासी नियुक्त करेगी:
- अप्रैल, 1914, देखिए अधिसूचना सं. 1801-सी, तारीख 13 मार्च, 1914 भारत का राजपत्र (अंग्रेजी), 1914, भाग 1, पृष्ठ 365 ।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा सपरिषद् गवर्नर जनरल के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1937 द्वारा भारत का राजपत्र के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं. 2) आदेश, 1956 द्वारा पूर्ववर्ती धारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 3 द्वारा खंड (2) का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 4 द्वारा अंतःस्थापित, विधि अनुकूलन (सं. 2) आदेश, 1956 द्वारा पूर्ववर्ती धारा 3 निरसित की गई ।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा मूल उपधारा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं. 2) आदेश, 1956 द्वारा प्रथम पैरा के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
परन्तु इसमें अंतर्विष्ट कोई भी बात, दो या अधिक १राज्यों के लिए शासकीय न्यासी के रूप में एक ही व्यक्ति की नियुक्ति का वर्जन करने वाली नहीं समझी जाएगी ।
2(2) कोई व्यक्ति शासकीय न्यासी के पद पर नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह कम से कम
- सात वर्ष तक, अधिवक्ता ; अथवा
- सात वर्ष तक, किसी उच्च न्यायालय का अटर्नी ; अथवा
- दस वर्ष तक, किसी राज्य की न्यायिक सेवा का सदस्य; अथवा
- पांच वर्ष तक, कोई उप शासकीय न्यासी,
न रहा हो ।
3। । ।
- उप शासकीय न्यासी की नियुक्ति और शक्तियां - 4(1) सरकार शासकीय न्यासी की सहायता के लिए किसी उप शासकीय न्यासी या न्यासियों की नियुक्ति कर सकेगी; तथा इस प्रकार नियुक्त उप शासकीय न्यासी ; सरकार के नियंत्रण और शासकीय न्यासी के साधारण या विशेष आदेशों की नियुक्ति के अधीन रहते हुए, शासकीय न्यासी के किन्हीं कर्तव्यों के निर्वहन और किन्हीं शक्तियों के प्रयोग के लिए सक्षम होगा, और ऐसे कर्तव्यों का निर्वहन या ऐसी शक्तियों का प्रयोग करते समय उसे वही विशेषाधिकार होंगे और वह उन्हीं दायित्वों के अधीन होगा जो विशेषाधिकार शासकीय न्यासी के होते हैं या जिन दायित्वों के अधीन शासकीय न्यासी रहता है ।
5(2) कोई व्यक्ति उप शासकीय न्यासी तब तक नियुक्त नहीं किया जाएगा, जब तक कि वह कम से कम तीन वर्ष तक
- अधिवक्ता; अथवा
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा डिवीजनों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 5 द्वारा उपधारा (2) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा उपधारा (3) का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 6 द्वारा धारा 5 उस धारा की उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित की गई ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 6 द्वारा अंतःस्थापित ।
- किसी उच्च न्यायालय का अटर्नी ; अथवा
- किसी राज्य सरकार की न्यायिक सेवा का सदस्य, न रहा हो ।
- शासकीय न्यासी का एकल निगम होना, उसका शाश्वत उत्तराधिकार और उसकी शासकीय मुद्रा का होना, तथा उसका अपने निगमित नाम से वाद लाना और उसके विरुद्ध वाद लाया जाना - शासकीय न्यासी उस १राज्यो के, जिसके लिए उसे नियुक्त किया गया है, शासकीय न्यासी के नाम से एक एकल निगम होगा और ऐसे शासकीय न्यासी के रूप में उसे शाश्वत उत्तराधिकार होगा और उसकी शासकीय मुद्रा होगी और वह अपने निगमित नाम से वाद ला सकेगा और उसके विरुद्ध वाद लाया जा सकेगा ।
भाग 3
शासकीय न्यासी के अधिकार, शक्तियां, कर्तव्य और दायित्व
- शासकीय न्यासी की साधारण शक्तियां और कर्तव्य - (1) इस अधिनियम तथा उसके अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, और उनके अनुसार, शासकीय न्यासी, यदि वह ठीक समझे तो,
- साधारण न्यासी के रूप में कार्य कर सकेगा;
- सक्षम अधिकारिता वाले न्यायालय द्वारा न्यासी नियुक्त किया जा सकेगा ।
(2) जैसा इसमें इसके पश्चात् अभिव्यक्त रूप से उपबंधित है उसके सिवाय, शासकीय न्यासी की शक्तियां, कर्तव्य और दायित्व वही होंगे और वह उन्हीं अधिकारों और विशेषाधिकारों का हकदार होगा तथा न्यायालय के वैसे ही नियंत्रण और आदेशों के अधीन होगा जैसे कि उसी हैसियत में कार्य करने वाला कोई अन्य न्यासी होता है ।
(3) शासकीय न्यासी किसी न्यास को या तो बिल्कुल ही या ऐसी शर्तों के बिना स्वीकार करने से इनकार कर सकेगा जिन्हें वह अधिरोपित करे ।
(4) शासकीय न्यासी न तो लेनदारों के फायदे के लिए किसी समझौते या ठहराव की स्कीम के अधीन किसी न्यास को स्वीकार करेगा और न किसी ऐसी सम्पदा का न्यास स्वीकार करेगा, जिसका दिवालिया होना वह जानता है या जिसके दिवालिया होने का उसे विश्वास है ।
-
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा डिवीजन के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(5) शासकीय न्यासी, इस अधिनियम के अधीन बनाए गए नियमों में जैसा उपबंधित है उसके सिवाय, किसी धार्मिक प्रयोजन के लिए किसी न्यास को या किसी ऐसे न्यास को स्वीकार नहीं करेगा जिसमें किसी कारबार का प्रबंध या चलाया जाना अंतर्वलित है ।
(6) शासकीय न्यासी किसी मृत व्यक्ति की संपदा का प्रबंध तब तक नहीं करेगा, जब तक कि वह अभिव्यक्त रूप से उस व्यक्ति के विल का एकमात्र निष्पादक और उस विल के अधीन एकमात्र न्यासी नियुक्त न किया गया हो ।
(7) शासकीय न्यासी सदैव एकमात्र न्यासी होगा तथा शासकीय न्यासी को किसी अन्य व्यक्ति के साथ न्यासी नियुक्त करना विधिपूर्ण नहीं होगा ।
- शासकीय न्यासी को, सहमति से, अनुदानकर्ता द्वारा व्यवस्थापन का न्यासी नियुक्त किया जा सकेगा - (1) कोई व्यक्ति, जो किसी ऐसे न्यास से, भिन्न कोई न्यास सृजित करने का आशय रखता है, जिसे शासकीय न्यासी इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध है, न्यास सृजन करने वाली लिखत द्वारा और शासकीय न्यासी की सहमति से, उसे उस नाम से या किसी अन्य पर्याप्त वर्णन से उस सम्पत्ति का न्यासी नियुक्त कर सकेगा, जो ऐसे न्यास के अधीन आती हो:
परन्तु उस लिखत में शासकीय न्यासी की सहमति का उल्लेख किया जाएगा और वह लिखत शासकीय न्यासी द्वारा सम्यक् रूप से निष्पादित की जाएगी ।
(2) ऐसी नियुक्ति हो जाने पर, न्यास के अंतर्गत आने वाली सम्पत्ति ऐसे शासकीय न्यासी में निहित होगी और वह न्यासी उस सम्पत्ति को ऐसी लिखत में घोषित न्यासों के आधार पर धारण करेगा ।
- शासकीय न्यासी की विल द्वारा न्यासी के रूप में नियुक्ति - जब शासकीय न्यासी को, उस नाम से या किसी अन्य पर्याप्त वर्णन से, किसी विल के अधीन न्यासी नियुक्त किया गया है
तब १ वसीयतकर्ता के विल का निष्पादक या उसकी सम्पत्ति का प्रशासक, प्रोबेट या प्रशासनपत्र प्राप्त करने के पश्चात् ऐसे विल की विषयवस्तु ऐसे शासकीय न्यासी को विहित रूप में अधिसूचित करेगा ; और, यदि ऐसा शासकीय न्यासी न्यास को स्वीकार करने की सहमति दे देता है तो, न्यास के अधीन सम्पत्ति शासकीय न्यासी को अंतरित करने वाली लिखत, ऐसे निष्पादक या प्रशासक द्वारा लिखित रूप में निष्पादित कर देने पर, वह सम्पत्ति उस शासकीय न्यासी में निहित हो जाएगी, और वह न्यासी उक्त विल में अभिव्यक्त न्यासों के आधार पर उसे धारण करेगा :
परन्तु उस लिखत में शासकीय न्यासी की सहमति का उल्लेख किया जाएगा और वह लिखत शासकीय न्यासी द्वारा सम्यक् रूप से निष्पादित की जाएगी ।
- शासकीय न्यासी को सम्पत्ति का न्यासी नियुक्त करने की उच्च न्यायालय की शक्ति (1) यदि कोई सम्पत्ति, ऐसे न्यास से भिन्न न्यास के अधीन आती है, जिसे शासकीय न्यासी इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध है, और उच्च न्यायालय की मामूली या गैर मामूली आरम्भिक सिविल अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के अन्दर कोई न्यासी, न्यास में कार्य करने का इच्छुक नहीं है या उसके लिए समर्थ नहीं है तो उच्च न्यायालय, आवेदन किए जाने पर, शासकीय न्यासी की, उस नाम से और उसकी सहमति से, सम्पत्ति के न्यासी के रूप में नियुक्ति का आदेश कर सकेगा ।
(2) ऐसे आदेश पर वह सम्पत्ति शासकीय न्यासी में निहित हो जाएगी, और वह उन्हीं न्यासों के आधार पर उसे धारण करेगा जिन पर वह उस आदेश के पहले धृत थी, तथा पूर्ववर्ती न्यासी या न्यासियों (यदि कोई हो) को ऐसी सम्पत्ति को न्यासियों के रूप में उसके या उनके दायित्व से, सिवाय उन कार्यों की बाबत उनके दायित्व जो उस आदेश की तारीख से पहले लिए गए थे, छूट प्राप्त होगी ।
(3) इस धारा की किसी भी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह 1॥। भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) के उपबंधों पर प्रभाव डालती है ।
1 1919 के अधिनियम सं. 18 की धारा 2 और अनुसूची 1 द्वारा ऐसे वसीयतकर्ता के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- शासकीय न्यासियों को सम्पत्ति का न्यासी नियुक्त करने की प्राइवेट न्यासियों की शक्ति - (1) यदि कोई सम्पत्ति, ऐसे न्यास से भिन्न किसी न्यास के अधीन आती है, जिसे शासकीय न्यासी इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन स्वीकार करने से प्रतिषिद्ध है, और सभी न्यासी, अथवा उत्तरजीवी, या बने रहे न्यासी, तथा वे सभी व्यक्ति, जो फायदा प्राप्त करने के लिए न्यास में हितबद्ध हैं, यह चाहते हैं कि शासकीय न्यासी को ऐसे न्यासी या न्यासियों के स्थान पर नियुक्त किया जाए तो ऐसे न्यासी या न्यासियों के लिए शासकीय न्यासी को, उस नाम से या किसी अन्य पर्याप्त वर्णन से, उसकी सहमति से, लिखत द्वारा उस सम्पत्ति का न्यासी नियुक्त करना विधिपूर्ण होगा :
परन्तु उस लिखत में शासकीय न्यासी की सहमति का उल्लेख किया जाएगा और वह लिखत शासकीय न्यासी द्वारा सम्यक् रूप से निष्पादित की जाएगी ।
(2) ऐसी नियुक्ति पर वह सम्पत्ति शासकीय न्यासी में निहित हो जाएगी और वह उसे उन्हीं न्यासों के आधार पर धारण करेगा जिन पर वह उस आदेश के पहले धृत थी, तथा पूर्ववर्ती न्यासी या न्यासियों को उस सम्पत्ति के न्यासियों के रूप में उसके या उनके दायित्व से, सिवाय उन कार्यों की बाबत उनके दायित्व से जो उस आदेश की तारीख से पहले किए गए थे, छूट प्राप्त होगी ।
- निष्पादक या प्रशासक, शासकीय न्यासी को अवयस्क या पागल की वसीयत-संपदा, अंश, आदि का संदाय कर सकेगा - (1) यदि कोई २ वयस्क या पागल किसी मृत व्यक्ति की आस्तियों के किसी दान, वसीयत-संपदा, या अंश का हकदार है तो उस व्यक्ति के लिए, जिसके द्वारा ऐसा दान किया गया है, अथवा निष्पादक या प्रशासक के लिए, जिसके द्वारा ऐसी वसीयत संपदा, या अंश संदेय या अंतरणीय है, या ऐसे दान, वसीयत-संपदा, या अंश के किसी न्यासी के लिए, उसे लिखत द्वारा शासकीय न्यासी को, उस नाम से या किसी अन्य पर्याप्त वर्णन से, उसकी सहमति से, अंतरित करना विधिपूर्ण होगा :
-
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 7 द्वारा दि ट्रस्टीज एण्ड मार्टगेजीज़ पावर्स ऐक्ट, 1866 या शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 8 द्वारा शिशु के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
परन्तु उस लिखत में शासकीय न्यासी की सहमति का उल्लेख किया जाएगा और वह लिखत शासकीय न्यासी द्वारा सम्यक् रूप से निष्पादित की जाएगी ।
(2) इस धारा के अधीन शासकीय न्यासी को अन्तरित कोई धन या सम्पत्ति उसमें निहित होगी और उन्हीं उपबन्धों के अधीन होगी जो ऐसे शासकीय न्यासी में निहित अन्य सम्पत्ति के बारे में इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट है ।
- शासकीय न्यासी से बन्धपत्र या प्रतिभूति देने की अपेक्षा नहीं की जाएगी - (1) किसी शासकीय न्यासी से, किसी न्यायालय द्वारा यह अपेक्षा नहीं की जाएगी कि वह अपनी नियुक्ति पर इस अधिनियम के अधीन किसी भी हैसियत में कोई बन्धपत्र या कोई प्रतिभूति दे ।
(2) किसी शासकीय न्यासी 1॥। से इस अधिनियम के उपबंधों के अधीन उसके द्वारा प्रस्तुत किसी याचिका को, अपने हस्ताक्षर के अतिरिक्त किसी अन्य रूप में सत्यापित करने की अपेक्षा नहीं की जाएगी, और यदि उसे ऐसी याचिका में दिए गए तथ्यों की २ निजी जानकारी नहीं है तो याचिका किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा सत्यापित और हस्ताक्षरित की जा सकेगी जो सत्यापन करने के लिए सक्षम है ।
- शासकीय न्यासी की प्रविष्टि का न्यास की सूचना न समझा जाना - किसी कम्पनी की पुस्तकों में शासकीय न्यासी की उस नाम से प्रविष्टि, न्यास की सूचना नहीं समझी जाएगी ; तथा कोई कम्पनी अपने रजिस्टर में शासकीय न्यासी का नाम दर्ज करने के संबंध में आक्षेप करने के लिए केवल इसी कारण हकदार नहीं होगी कि शासकीय न्यासी एक निगम है ; तथा सम्पत्ति के सम्बन्ध में कार्यवाही करने में, यह तथ्य, कि जिस व्यक्ति के सम्बन्ध में कार्यवाही की गई है वह शासकीय न्यासी है, अपने आप में न्यास की सूचना नहीं समझी जाएगी ।
-
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 9 द्वारा अथवा उप शासकीय न्यासी शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 9 द्वारा शासकीय न्यासी को वैयक्तिक ज्ञान के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- सरकार का दायित्व - (1) 1॥। सरकार 2॥। उन सभी धनराशियों को पूरा करने के लिए दायी होगी जो किसी ऐसे दायित्व का उन्मोचन करने के लिए अपेक्षित है, जिन्हें शासकीय न्यासी यदि वह प्राइवेट न्यासी होता तो, उन्मोचित करने के लिए व्यक्तिगत रूप से दायी होता । किन्तु जब दायित्व ऐसा है जिसके लिए न तो शासकीय न्यासी ने और न उसके अधिकारियों में से किसी ने, किसी प्रकार योगदान किया है, या जिसे न तो वह और न उसके अधिकारियों में से ही कोई युक्तियुक्त तत्परता का प्रयोग करके बचा सकता था, तब न तो शासकीय न्यासी और न ३ सरकार किसी दायित्व के अधीन होगी ।
(2) उपधारा (1) की कोई बात ३ सरकार या इस अधिनियम के अधीन नियुक्त किए गए किसी शासकीय न्यासी को, किसी ऐसी बात के लिए दायित्वाधीन करने वाली नहीं समझी जाएगी जो इस अधिनियम के प्रारम्भ से पूर्व, किसी शासकीय न्यासी के प्राधिकार से या उसके अधीन की गई है ।
- कुछ दशाओं में वाद की सूचना का अपेक्षित न होना - सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) की धारा 80 की कोई बात, शासकीय न्यासी के विरुद्ध किसी ऐसे वाद को लागू न होगी जिसमें उसके विरुद्ध वैयक्तिक रूप से किसी अनुतोष का दावा नहीं किया गया है ।
भाग 4
फीस
- फीस - (1) शासकीय न्यासी के कर्तव्यों की बाबत, प्रतिशत के रूप में या अन्यथा, ऐसी फीस प्रभारित की जाएगी जो सरकार विहित करे ।
4। । । ।
(2) इस धारा के अधीन विभिन्न सम्पत्तियों या विभिन्न वर्गों की सम्पत्तियों के लिए, या विभिन्न कर्तव्यों के लिए फीस भिन्न-भिन्न दरों के अनुसार हो सकेगी,
- 1922 के अधिनियम सं. 21 की धारा 3 द्वारा भारत शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 10 द्वारा के राजस्व शब्दों का लोप किया गया ।
- भारत सरकार के राजस्व शब्द 1922 के अधिनियम सं. 21 की धारा 3 और तत्पश्चात् भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 और 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 10 द्वारा प्रतिस्थापित होकर उपरोक्त रूप में आए ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 11 द्वारा परन्तुक का लोप किया गया ।
तथा यथाशक्य उसकी व्यवस्था इस प्रकार की जाएगी कि उससे वेतन और इस अधिनियम के कार्यकरण से आनुषंगिक अन्य सभी व्यय करने के लिए पर्याप्त रकम आ जाए (इस व्यय के अन्तर्गत ऐसी धनराशि भी है जिसे सरकार इस अधिनियम के अधीन हानि के लिए 1॥। सरकार 2॥। का बीमा कराने के लिए अवधारित करे) ।
- फीस का व्ययन - (1) यदि शासकीय न्यासी प्राइवेट न्यासी है तो, वे सभी व्यय, जो न्यास विधि में से रोक रखे या संदाय किए जा सकते हैं, इस प्रकार रोके रखे जाएंगे या संदाय किए जाएंगे, और इस अधिनियम के अधीन उद्ग्रहणीय कोई भी फीस, ऐसे व्ययों के रूप में और ऐसे व्ययों के अतिरिक्त उसी प्रकार से रोके रखी जाएगी या संदाय की जाएगी ।
(2) शासकीय न्यासी वह समस्त फीस, जो उसे इस अधिनियम के अधीन प्राप्त हुई है, ऐसे प्राधिकारी को, ऐसी रीति से तथा ऐसे समय पर, जो सरकार विहित करे, अन्तरित करेगा और संदाय करेगा और वह फीस 2 ॥। सरकार के लेखे तथा जमा खाते डाली जाएगी ।
भाग 5
लेखापरीक्षा
- शासकीय न्यासी के लेखाओं आदि की परीक्षा करने और सरकार को रिपोर्ट देने के लिए लेखापरीक्षकों का नियुक्त किया जाना - (1) शासकीय न्यासी के लेखाओं की परीक्षा प्रतिवर्ष कम से कम एक बार तथा किसी अन्य समय पर, यदि सरकार वैसा निर्देश दे तो, विहित व्यक्ति द्वारा और विहित रीति से की जाएगी ।
(2) लेखापरीक्षक ऐसे लेखाओं की परीक्षा करेगा, और उसका विहित प्ररूप में विवरण, उसके बारे में रिपोर्ट और अपने द्वारा हस्ताक्षरित एक ऐसा प्रमाणपत्र सरकार को भेजेगा, जिसमें यह उल्लिखित होगा कि,
- क्या लेखाओं की परीक्षा विहित रीति से की गई है और क्या, जहां तक ऐसी लेखापरीक्षा से अभिनिश्चित किया जा सकता है, लेखाओं में ऐसी प्रत्येक बात का, जो उसमें होनी चाहिए, पूरा और सही वृत्तांत है;
- 1922 के अधिनियम सं. 21 की धारा 4 द्वारा भारत की शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 11 द्वारा राजस्व की आय शब्दों का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 12 द्वारा खंड (क) के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- क्या वे बहियां, जिनके बारे में इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किन्हीं नियमों में यह निदेश है कि वे शासकीय न्यासी द्वारा रखी जाएं, सम्यक् रूप से और नियमित रूप से रखी गई है; तथा
- क्या इस अधिनियम या तद््धीन बनाए गए किन्हीं नियमों द्वारा विहित रीति से न्यास-निधियां और प्रतिभूतियां सम्यक् रूप से रखी गई हैं और विनिहित और जमा की गई हैं,
या उन बातों के सम्बन्ध में, जो उस प्रमाणपत्र में विनिर्दिष्ट की जाएं (यथास्थिति), उन लेखाओं में कोई कमी है, या शासकीय न्यासी इस अधिनियम या तद््धीन बनाए गए नियमों का अनुपालन करने में असफल रहा है ।
- साक्षियों को समन करने और दस्तावेजों को मंगवाने की लेखापरीक्षक की शक्ति - (1) प्रत्येक लेखापरीक्षक की,
- किसी ऐसे व्यक्ति को समन करने की, जिसकी उपस्थिति वह समय-समय पर अपने समक्ष उपस्थित होने के लिए आवश्यक समझे, तथा
- अपने द्वारा दिलाई गई शपथ पर किसी व्यक्ति की परीक्षा करने की, तथा
- किसी व्यक्ति की परिप्रश्नों पर या अन्यथा, परीक्षा करने के लिए कमीशन निकालने की, तथा
- किसी व्यक्ति को कोई ऐसी दस्तावेज या वस्तु पेश करने के लिए समन करने की, जिसका पेश किया जाना ऐसी लेखापरीक्षा या परीक्षा के प्रयोजनों के लिए आवश्यक प्रतीत होता है,
सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन की सिविल न्यायालय की शक्तियां होंगी ।
(2) कोई व्यक्ति, जो समन किए जाने पर, हाजिर होने से या कोई दस्तावेज या वस्तु पेश करने से इनकार करता है या उचित कारण के बिना उसकी उपेक्षा करता है, अथवा उपस्थित तो होता है किन्तु शपथ लेने से, अथवा परीक्षा कराने से इनकार करता है, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 188 के अर्थ में, और उसके अधीन दंडनीय अपराध करने वाला समझा जाएगा और लेखापरीक्षक ऐसे इनकार या उपेक्षा के प्रत्येक मामले की रिपोर्ट सरकार को देगा ।
- लेखापरीक्षक के खर्चों, आदि का संदाय कैसे किया जाएगा - प्रत्येक ऐसी लेखापरीक्षा और परीक्षा का, और उससे आनुषंगिक, खर्च सरकार द्वारा बनाए गए नियमों के अनुसार, अवधारित किया जाएगा और उसे विहित रीति से चुकाया जाएगा ।
- लेखाओं का निरीक्षण करने और उनकी प्रतियां प्राप्त करने का हिताधिकारी का अधिकार - ऐसे न्यास के अधीन, जो शासकीय न्यासी द्वारा प्रशासित किया जा रहा है, प्रत्येक हिताधिकारी, ऐसी शर्तों और निर्बन्धनों के अधीन रहते हुए, जो विहित की जाएं, सभी उचित समयों पर, ऐसे न्यास के लेखाओं का और लेखापरीक्षक की रिपोर्ट तथा प्रमाणपत्र का निरीक्षण करने, तथा विहित फीस देने पर उनकी प्रतियां या उनमें से उद्धरण प्राप्त करने का हकदार होगा, तथा भारतीय न्यास अधिनियम, 1882 (1882 का 2) की कोई बात इस धारा के उपबंधों को प्रभावित नहीं करेगी ।
भाग 6
प्रकीर्ण
- शासकीय न्यासी के पास एकत्र धन का सरकार को अन्तरण - जब किसी न्यास के अधीन किसी हिताधिकारी को संदेय कोई धन, इस अधिनियम के प्रारम्भ के पहले की या बाद की बारह वर्ष या उससे अधिक की अवधि तक शासकीय न्यासी के पास इस कारण चला आ रहा हो कि शासकीय न्यासी उस धन को प्राप्त करने के हकदार व्यक्ति का पता लगाने में असमर्थ रहा है तथा वह धन 1॥। सरकार के लेखे और जमा खाते में विहित रीति से अन्तरित कर दिया जाएगा:
परन्तु यदि किसी न्यायालय में ऐसे धन के बारे में कोई वाद या कार्यवाही लम्बित है तो वह धन इस प्रकार अन्तरित नहीं किया जाएगा ।
- ऐसे अन्तरित धन को वसूल करने के लिए दावेदार द्वारा कार्यवाही करने का ढंग - (1) यदि इस प्रकार अन्तरित किसी धन की बाबत कोई दावा किया जाता है और ऐसा दावा विहित प्राधिकारी को समाधानप्रद रूप में सिद्ध कर दिया जाता है, तो 1॥। सरकार दावेदार को उस रकम का संदाय करेगी जिसके बारे में दावा सिद्ध कर दिया गया है ।
-
- 1922 के अधिनियम सं. 21 की धारा 4 द्वारा भारत शब्द का लोप किया गया ।
(2) यदि ऐसा दावा विहित प्राधिकारी को समाधानप्रद रूप में सिद्ध नहीं किया गया है तो दावेदार ऐसे धन की वसूली के लिए कोई अन्य कार्यवाहियां करने के अपने अधिकार पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उच्च न्यायालय से सरकार के विरुद्ध, याचिका देकर आवेदन कर सकेगा तथा ऐसा साक्ष्य लेने के पश्चात् जिसे वह ठीक समझे, वह न्यायालय याचिका पर ऐसे धन के संदाय के बारे में ऐसे आदेश पारित करेगा, जो वह ठीक समझे और ऐसा आदेश कार्यवाहियों के सभी पक्षकारों पर आबद्धकर होगा ।
। । । ।
(3) न्यायालय यह निदेश भी दे सकेगा कि ऐसी कार्यवाहियों के सभी खर्च या उसके किसी भाग का संदाय कौन करेगा ।
- शासकीय न्यासी में निहित सम्पत्ति की बाबत आदेश देने की उच्च न्यायालय की शक्ति - उच्च न्यायालय शासकीय न्यासी में निहित किसी न्यास सम्पत्ति या उसकी आय या उपज के बारे में ऐसे आदेश दे सकेगा जो वह ठीक समझे ।
- अधिनियम के अधीन आदेश के लिए कौन आवेदन कर सकेगा - इस अधिनियम के अधीन कोई आदेश, किसी न्यास संपत्ति में हिताधिकारी के रूप में हितबद्ध किसी व्यक्ति अथवा उस सम्पत्ति के किसी न्यासी के आवेदन पर किया जा सकेगा ।
- न्यायालय के आदेश का डिक्री के रूप में प्रभावी होना - उच्च न्यायालय द्वारा इस अधिनियम के अधीन दिए गए किसी आदेश का वही प्रभाव होगा जो किसी डिक्री का होता है ।
- प्रशासन की साधारण शक्ति - शासकीय न्यासी, व्यय करने की अपने द्वारा विधिपूर्णतया प्रयोग की जा सकने वाली किन्हीं अन्य शक्तियों के अतिरिक्त, न कि उनके अल्पीकरण में
(क) ऐसे कार्यों पर, जो उसके द्वारा प्रशासित किसी न्यास की किसी सम्पत्ति की उचित देख-रेख और प्रबंध के लिए आवश्यक हों, और
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा सेक्रेटरी आफ स्टेट फार इंडिया इन कौंसिल शब्दों के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा परन्तुक का लोप किया गया ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 13 द्वारा उसके हित के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(ख) ऐसे धार्मिक, पूर्व या अन्य उद्देश्यों और ऐसे सुधारों पर, जो ऐसी सम्पत्ति की दशा में युक्तियुक्त और उचित हों, उच्च न्यायालय की मंजूरी से,
व्यय उपगत कर सकेगा ।
- शासकीय न्यासी द्वारा न्यास सम्पत्ति का, मूल न्यासी या किसी अन्य न्यासी को अंतरण - (1) इस अधिनियम की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह शासकीय न्यासी में निहित किसी सम्पत्ति का उसके द्वारा
(क) मूल न्यासी को (यदि कोई हो); अथवा
(ख) वैध रूप से नियुक्त किसी अन्य न्यासी को; अथवा
(ग) किसी अन्य व्यक्ति को, यदि न्यायालय वैसा निदेश करे तो,
अंतरण रोकती है ।
(2) ऐसे अंतरण पर, वह सम्पत्ति उस न्यासी में निहित होगी और उसके द्वारा उन्हीं न्यासों पर धारण की जाएगी जिन पर वह ऐसे अंतरण के पहले धारण की गई थी, और शासकीय न्यासी को, ऐसे अंतरण से पहले किए गए कार्यों के बारे में दायित्वों के सिवाय, उस सम्पत्ति के न्यासी के रूप में सभी दायित्वों से छूट प्राप्त होगी:
परन्तु इस धारा के अधीन किसी अन्तरण की दशा में, शासकीय न्यासी की उस सम्पत्ति में से इस अधिनियम के उपबन्धों के अनुसार उद्ग्रहणीय फीस रोक रखने का हक होगा ।
- नियम - (1) सरकार, इस अधिनियम के उद्देश्यों को कार्यान्वित करने के लिए और शासकीय न्यासी के कर्तव्यों के निर्वहन में उसकी कार्यवाहियों को विनियमित करने के लिए नियम बनाएगी ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, ऐसे नियम निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेंगे
- शासकीय न्यासी द्वारा रखे जाने वाला लेखा और उसकी लेखापरीक्षा और निरीक्षण;
- जो निधियां और प्रतिभूतियां शासकीय न्यासी के हाथ में आती हैं उनकी निरापद अभिरक्षा और उनका जमा किया जाना;
- जिन दशाओं में शासकीय न्यासी के पास की धनराशियों का प्रेषण अपेक्षित है उनमें उन धनराशियों का प्रेषण;
- शासकीय न्यासी द्वारा सरकार को या किसी अन्य प्राधिकारी को प्रस्तुत किए जाने वाले विवरण, अनुसूचियां तथा अन्य दस्तावेजों और ऐसे विवरणों, अनुसूचियों या अन्य दस्तावेजों का प्रकाशन;
- ऐसे किन्हीं विवरणों, अनुसूचियों या दस्तावेजों के तैयार करने में हुए खर्चे की वसूली;
1। । । ।
- इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन रहते हुए ऐसी फीस जो उसके अधीन दी जानी है, और ऐसे नियत की गई फीस का संग्रहण और लेखा देना;
- वह रीति, जिससे और वह व्यक्ति, जिसके द्वारा इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन किसी लेखापरीक्षा के, और उससे आनुषंगिक खर्चे अवधारित किए और चुकाए जाने हैं;
- वह रीति, जिससे धारा 20 के उपबन्धों के अधीन जारी किए गए समनों की तामील की जानी है, और उन व्यक्तियों के, जिन्हें इस अधिनियम के उपबन्धों के अधीन समन किया गया है या जिनकी परीक्षा की गई है, व्ययों का और ऐसी परीक्षा से आनुषंगिक किसी व्यय का दिया जाना;
- धार्मिक प्रयोजनों के लिए न्यासों का और उन न्यासों का, जिनमें कारबार का प्रबन्ध चलाया जाना अन्तर्वलित है, शासकीय न्यासी द्वारा स्वीकार किया जाना; तथा
- इस अधिनियम का कोई अन्य विषय जिसके विहित किए जाने का निदेश दिया गया है ।
(3) इस धारा के उपबन्धों के अधीन बनाए गए नियम, राजपत्र में प्रकाशित किए जाएंगे और तब ऐसे प्रभावी होंगे मानो वे इस अधिनियम में अधिनियमित हों ।
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- 1917 के अधिनियम सं. 5 की धारा 6 और अनुसूची द्वारा खंड (ङङ) का निरसन किया गया ।
(3क) इस धारा के अधीन राज्य सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने पर यथाशीघ्र, राज्य विधान-मंडल के समक्ष रखा जाएगा ।
(4) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।
- [प्रेसीडेन्सी का प्रान्तों में विभाजन]- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा निरसित ।
- भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 के उपबन्धों की व्यावृत्ति - इस अधिनियम में अन्तर्विष्ट किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह भारतीय रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1908 (1908 का 16) के उपबन्धों को प्रभावित करती है ।
[32क. व्यावृत्ति - (1) इस अधिनियम के वे संशोधन, जो जनवरी, 1950 के छब्बीसवें दिन प्रवृत्त हुए हैं, उस तारीख को किसी न्यायालय में लंबित किन्हीं विधिक कार्यवाहियों को प्रभावित नहीं करेंगे, और न ही उनका यह अर्थ लगाया जाएगा कि वे किसी सम्पत्ति को एक शासकीय न्यासी से किसी अन्य शासकीय न्यासी को स्वतः अन्तरित करते हैं, किन्तु इस धारा की किसी बात का यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि वह, इस अधिनियम के अन्य उपबन्धों में से किसी उपबन्ध के अनुसार, ऐसी किसी सम्पत्ति के अन्तरण को रोकती है ।
- 1983 के अधिनियम सं. 20 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-3-1984 से) अंतःस्थापित ।
- 1964 के अधिनियम सं. 48 की धारा 14 द्वारा अंतःस्थापित ।
- 1983 के अधिनियम सं. 20 की धारा 2 और अनुसूची द्वारा (15-3-1984 से) प्रतिस्थापित ।
- भारत शासन (भारतीय विधि अनुकूलन) आदेश, 1937 द्वारा अंतःस्थापित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा उपधारा (1) के रूप में पुनःसंख्यांकित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा गवर्नमेंट आफ इंडिया ऐक्ट, 1935 के भाग 3 के प्रारम्भ पर के स्थान पर प्रतिस्थापित ।
(2) इस अधिनियम के वे संशोधन, जो जनवरी, 1950 के छब्बीसवें दिन प्रवृत्त हुए हैं, ऐसी किसी विधिक कार्यवाही को लागू नहीं होंगे जो किसी भाग ख राज्य के किसी व्यक्ति को इस अधिनियम के लागू होने से उद्भूत होती हो तथा उक्त तारीख को किसी न्यायालय में लंबित हो और न ही वे ऐसे किसी व्यक्ति कि किसी ऐसी सम्पत्ति या सम्पदा के, जो उस तारीख के ठीक पहले इस अधिनियम के अधीन किसी शासकीय न्यासी में निहित हो गई थी, प्रशासन को प्रभावित करेंगे, तथा इस अधिनियम के उपबन्ध, उक्त संशोधनों के होते हुए भी, यथास्थिति, ऐसी कार्यवाहियों अथवा ऐसी सम्पत्ति या सम्पदा के सम्बन्ध में, आवश्यक उपान्तरों सहित, लागू बने रहेंगे ।
32ख. राज्यों के पुनर्गठन से प्रभावित कुछ शासकीय न्यासियों के बारे में विशेष उपबन्ध - इस अधिनियम के वे संशोधन, जो 1 नवम्बर, 1956 को प्रवृत्त हुए हैं, उस तारीख को किसी न्यायालय में लम्बित किसी विधिक कार्यवाही को प्रभावित नहीं करेंगे, और जहां राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 (1956 का 37) अथवा बिहार और पश्चिमी बंगाल (राज्यक्षेत्रों का अन्तरण) अधिनियम, 1956 (1956 का 40) के अधीन राज्यों के पुनर्गठन के कारण कोई सम्पूर्ण राज्य या उसका कोई भाग किसी अन्य राज्य को अन्तरित किया गया है वहां उस राज्य के राज्यक्षेत्र के ऐसे अन्तरण से यह अर्थ नहीं लगाया जाएगा कि कोई सम्पत्ति शासकीय न्यासी से किसी अन्य शासकीय न्यासी को स्वतः अन्तरित हो गई है, किन्तु यदि राज्यक्षेत्र के ऐसे अन्तरण के कारण केन्द्रीय सरकार को यह प्रतीत होता है कि सम्पत्ति का सम्पूर्ण भाग या कोई भाग, जो किसी शासकीय न्यासी में निहित है, किसी अन्य शासकीय न्यासी में निहित होना चाहिए तो वह सरकार निदेश दे सकेगी कि वह सम्पत्ति उस प्रकार निहित हो और तब वह उस अन्य शासकीय न्यासी और उसके उत्तरवर्तियों में इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए ऐसे पूर्ण और प्रभावकारी रूप में निहित हो जाएगी मानो वह इस अधिनियम के अधीन उसमें मूलतः निहित हो गई थी ।
33. [निरसित] निरसन अधिनियम, 1927 (1927 का 12) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।
अनुसूची – [निरसित अधिनियमितियां] - निरसन अधिनियम, 1927 (1927 का 12) की धारा 2 और अनुसूची द्वारा निरसित ।
- विधि अनुकूलन आदेश, 1950 द्वारा अंतःस्थापित ।
- विधि अनुकूलन (सं. 2) आदेश, 1956 द्वारा अंतःस्थापित ।

