दामोदर घाटी निगम अधिनियम, 1948
(1948 का अधिनियम संख्यांक 14)
[27 मार्च, 1948]
बिहार और पश्चिमी बंगाल प्रान्तों में दामोदरघाटी के
विकास के लिए एक निगम की स्थापना एवं
उसके विनियमन का उपबन्ध
करने के लिए
अधिनियम
बिहार और पश्चिमी बंगाल प्रान्तों में दामोदर घाटी के विकास के लिए एक निगम की स्थापना एवं उसके विनियमन का उपबन्ध करना समीचीन है;
और भारत शासन अधिनियम, 1935, अर्थात् गवर्नमेंट आफ इंडिया ऐक्ट, 1935 (26 जार्ज 5, अ० 2), की धारा 103 के अनुसरण में, उक्त प्रान्तों के प्रान्तीय विधान-मंडलों के सभी सदनों द्वारा इस आशय के संकल्प पारित किए गए हैं कि इस अधिनियम में वर्णित कतिपय मामलों का, जो प्रान्तीय विधायी सूची में उल्लिखित हैं, उन प्रान्तों में विनियमन डोमिनियन विधान-मंडल के अधिनियम द्वारा किया जाना चाहिए;
अतः एतद्द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित किया जाता है :--
भाग 1
प्रारम्भिक
1. संक्षिप्त नाम, विस्तार और प्रारम्भ-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम दामोदर घाटी निगम अधिनियम, 1948 है ।
(2) इसका विस्तार बिहार और पश्चिमी बंगाल राज्यों पर है ।
(3) यह उस तारीख को प्रवृत्त होगा जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे ।
2. निर्वचन-इस अधिनियम में, जब तक विषय या संदर्भ में कोई बात विरुद्ध न हो,-
(1) निगम" से दामोदर घाटी निगम अभिप्रेत है;
(2) दामोदर घाटी" के अन्तर्गत दामोदर नदी और उसकी सहायक नदियों की द्रोणी आती है;
(3) सदस्य" से निगम का सदस्य अभिप्रेत है, और इसके अन्तर्गत अध्यक्ष भी है;
(4) भाग लेने वाली सरकारों" से केन्द्रीय सरकार तथा बिहार की राज्य सरकार और पश्चिमी बंगाल की राज्य सरकार अभिप्रेत हैं;
(5) विहित" से धारा 59 के अधीन बनाए गए नियमों द्वारा विहित अभिप्रेत है;
(6) राज्य सरकार" से, यथास्थिति, बिहार की सरकार या पश्चिमी बंगाल की सरकार अभिप्रेत है और राज्य सरकारों" से बिहार और पश्चिमी बंगाल की सरकार अभिप्रेत हैं;
(7) विनियम" से धारा 60 के अधीन निगम द्वारा बनाए गए विनियम अभिप्रेत हैं ।
भाग 2
निगम की स्थापना
3. निगम-(1) ऐसी तारीख से, जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त नियत करे, दामोदर घाटी निगम के नाम से एक निगम स्थापित किया जाएगा ।
(2) उक्त निगम शाश्वत उत्तराधिकार और सामान्य मुद्रा वाला एक निगमित निकाय होगा और उक्त नाम से वह वाद लाएगा और उस पर वाद लाया जाएगा ।
4. निगमन का गठन- [(1) निगम निम्नलिखित से मिलकर बनेगा-
(क) अध्यक्ष;
(ख) एक सदस्य (तकनीकी) और एक सदस्य (वित्त);
(ग) केन्द्रीय सरकार से एक प्रतिनिधि;
(घ) दो प्रतिनिधि, जिनमें से झारखंड और पश्िचमी बंगाल की राज्य सरकारों से प्रत्येक का एक-एक प्रतिनिधि;
(ङ) तीन स्वतंत्र विशेषज्ञ, जिनमें से सिंचाई, जल प्रदाय और विद्युत उत्पादन या परेषण अथवा वितरण के क्षेत्र से प्रत्येक का एक-एक प्रतिनिधि; और
(च) सदस्य-सचिव ।
(1अ) उपधारा (1) के खंड (क), खंड (ख), खंड (घ) और खंड (च) के अधीन अध्यक्ष और सदस्यों की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा संबंधित राज्य सरकारों के परामर्श से की जाएगी, जबकि खंड (ग) और खंड (ङ) के अधीन सदस्यों की नियुक्ति केन्द्रीय सरकार द्वारा, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, की जाएगी ।
(1आ) उपधारा (1) के खंड (क), खंड (ख) और खंड (च) के अधीन अध्यक्ष और सदस्य पूर्णकालिक होंगे, जबकि खंड (ग), खंड (घ) और खंड (ङ) के अधीन सदस्य अंशकालिक होंगे ।
(1इ) अध्यक्ष, निगम का मुख्य कार्यकारी अधिकारी होगा ।
(1ई) उपधारा (1इ) में अंतर्विष्ट उपबंधों पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना सदस्य-सचिव निगम के साधारण प्रशासन और कारबार विकास का भारसाधक होगा ।]
(2) कोई व्यक्ति निगम का सदस्य नियुक्त किए जाने या बने रहने के लिए निरर्हित होगा, यदि-
(क) वह [संसद्ट या किसी राज्य विधान-मंडल का सदस्य है, अथवा
(ख) निगम के साथ की गई किसी अस्तित्वशील संविदा या उसके लिए किए जा रहे किसी कार्य में उसका, किसी निगमित कम्पनी में (निदेशक से भिन्न) शेयरधारक होने के सिवाय, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः कोई हित हो, परन्तु यदि वह शेयरधारक है तो वह सरकार को यह प्रकट करेगा कि उस कम्पनी में उसके किस प्रकार के और कितने शेयर हैं ।
(3) निगम का कोई भी कार्य या उसकी कार्रवाई केवल इसी कारण अविधिमान्य नहीं होगी कि उसमें उसके सदस्यों का कोई स्थान खाली था या उसके किसी सदस्य की नियुक्ति में कोई त्रुटि थी ।
5. सदस्यों की सेवा की शर्तें- । । । । ।
(2) सदस्यों का पारिश्रमिक और सेवा की अन्य शर्तें वे होंगी जो विहित की जाएं ।
6. अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति- । । । । ।
(3) निगम उन अन्य अधिकारियों और सेवकों की नियुक्ति कर सकेगा जिन्हें वह अपने कृत्यों का दक्षतापूर्वक पालन करने के लिए आवश्यक समझे ।
7. अधिकारियों और सेवकों की सेवा की शर्तें-निगम के अधिकारियों और सेवकों के वेतन और सेवा की अन्य शर्तें,-
। । । । । ।
(ख) अन्य अधिकारियों और सेवकों के लिए, वे होंगी जो विनियमों द्वारा अवधारित की जाएं ।
[8. सदस्यों के कृत्य और कर्तव्य-सदस्यों के कृत्य और कर्तव्य वे होंगे, जो विहित किए जाएं ।]
9. सभी अधिकारियों और सेवकों की सामान्य निरर्हताएं-कोई व्यक्ति, जिसका निगम द्वारा या उसकी ओर से की गई किसी संविदा में, स्वयं या अपने भागीदार या अभिकर्ता की मार्फत, या निगम के किसी अधिकारी या सेवक की हैसियत से भिन्न, निगम के अधीन, उसके द्वारा या उसकी ओर से किसी नियोजन में, प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः कोई अंश या हित है, निगम का अधिकारी या सेवक नहीं बनेगा या रहेगा ।
10. सलाहकार समिति की नियुक्ति-धारा 59 के अधीन बनाए गए नियमों के अधीन रहते हुए, नियम, अपने कृत्यों के दक्षतापूर्वक निर्वहन को सुनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ, और विशिष्टतः यह सुनिश्चित करने के प्रयोजनार्थ कि वे कृत्य विशिष्ट स्थानीय क्षेत्रों की परिस्थितियों और अपेक्षाओं का सम्यक् ध्यान रखते हुए किए जाएं, समय-समय पर एक या अधिक सलाहकार समितियां नियुक्त कर सकेगा ।
भाग 3
निगम के कृत्य के शक्तियां
सामान्य
11. दामोदर घाटी की सीमाएं और कार्यक्षेत्र-(1) केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में, अधिसूचना द्वारा, दामोदर घाटी की सीमाएं विनिर्दिष्ट कर सकेगी ।
(2) निगम अपने सभी या किन्हीं कृत्यों का पालन और अपनी सभी या किन्हीं शक्तियों का प्रयोग दामोदर घाटी के भीतर करेगा ।
(3) केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकारों से परामर्श करने के पश्चात् राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, यह निदेश दे सकेगी कि निगम ऐसे कृत्य का पालन और ऐसी शक्ति का प्रयोग उस अन्य क्षेत्र में करेगा, जो अधिसूचना में विनिर्दिष्ट की जाए, और इस प्रकार विनिर्दिष्ट क्षेत्र निगम का कार्यक्षेत्र कहा जाएगा ।
12. निगम के कृत्य-निगम के कृत्य निम्नलिखित होंगे-
(क) सिंचाई जल-प्रदाय और जल-निकास की किस्मों का सम्प्रवर्तन तथा कार्यान्वयन,
(ख) जल-विद्युत और तापीय दोनों प्रकार की विद्युत-ऊर्जा के उत्पादन, पारेषण और वितरण के लिए स्कीमों का सम्प्रवर्तन और कार्यान्वयन,
(ग) दामोदर नदी और उसकी सहायक नदियों तथा उन जल-सरणियों में, यदि कोई हों, जो स्कीम के संबंध में निगम द्वारा खुदवाई गई हों, बाढ़-नियंत्रण तथा हुगली नदी में प्रवाह की दशाओं के सुधार के लिए स्कीमों का सम्प्रवर्तन और कार्यान्वयन,
(घ) दामोदर नदी और उसकी सहायक नदियों तथा जल-सरणियों में, यदि कोई हों, नौपरिवहन का सम्प्रवर्तन और नियंत्रण,
(ङ) दामोदर घाटी में वनरोपण का सम्प्रवर्तन और मिट्टी के कटाव का नियंत्रण, और
(च) दामोदर घाटी और उसके कार्यक्षेत्र में लोक-स्वास्थ्य तथा कृषि, औद्योगिक, आर्थिक और सामान्य कल्याण-कार्यों का सम्प्रवर्तन ।
सिंचाई और जल-प्रदाय
13. सिंचाई और जल-प्रदाय के लिए उपबन्ध- निगम, संबद्ध राज्य सरकार के अनुमोदन से, जो बिना समुचित कारण के रोका नहीं जाएगा, नहरों और वितरक-नदियों का निर्माण कर सकेगा, उन्हें बनाए रख सकेगा तथा क्रियाशील रख सकेगा :
परन्तु राज्य सरकार, सूचना देने के पश्चात् और उचित प्रतिकर का भुगतान कर देने पर, ऐसी किसी नहर या वितरक-नदी को बनाए रखने तथा क्रियाशील रखने का कार्य अपने हाथ में ले सकेगी ।
14. सिंचाई के लिए जल-प्रदाय की दरें-(1) निगम, संबद्ध राज्य सरकार से परामर्श करने के पश्चात्, सिंचाई के लिए उस सरकार को थोक मात्रा में जल-प्रदाय की दरें अवधारित और उद्गृहीत कर सकेगा तथा जल की वह न्यूनतम मात्रा भी नियत कर सकेगा जो उस प्रयोजन के लिए उपलब्ध की जाएगी ।
(2) वे दरें, जिन पर वह जल राज्य सरकार द्वारा कृषकों तथा अन्य उपभोक्ताओं को दिया जाएगा, निगम से परामर्श करने के पश्चात्, उस सरकार द्वारा नियत की जाएंगी ।
15. औद्योगिक और घरेलू प्रयोजनों के लिए जल के प्रदाय की दरें- निगम औद्योगिक तथा घरेलू प्रयोजनों के लिए थोक मात्रा में जल के प्रदाय की और वितरण की फुटकर दरें अवधारित और उद्गृहीत कर सकेगा और ऐसी दरों की वसूली की रीति विनिर्दिष्ट कर सकेगा ।
16. जिन व्यक्तियों का जल-प्रदाय रोक दिया गया है या कम कर दिया गया है उन्हें जल का प्रदाय-यदि, अपनी स्कीमों को कार्यान्वित करने की दृष्टि से निगम ने कृषि, औद्योगिक या घरेलू प्रयोजनों के लिए किसी भी व्यक्ति को जल के ऐसे प्रदाय को रोक दिया है या कम कर दिया है जिसका उपभोग वह व्यक्ति, ऐसे रोके जाने या कम किए जाने से पूर्व, किसी चिरभोगाधिकार के आधार पर कर रहा था तो निगम पूर्ववर्ती निबन्धनों पर ही ऐसे जल-प्रदाय की व्यवस्था करेगा ।
17. निगम के अनुमोदन के सिवाय बांध, आदि के निर्माण का प्रतिषेध-जैसा अन्यथा विहित है उसके सिवाय, कोई भी व्यक्ति, निगम की सहमति के बिना, जल निकालने के लिए दामोदर घाटी में कोई बांध या अन्य कार्य या प्रतिष्ठापन न तो निर्मित करेगा और न ही उसे क्रियाशील करेगा या बनाए रखेगा ।
विद्युत-ऊर्जा का प्रदाय और उत्पादन
18. विद्युत-ऊर्जा का प्रदाय और उत्पादन-भारतीय विद्युत अधिनियम, 1910 (1910 का 9) में या तद्धीन प्रदत्त किसी अनुज्ञप्ति में किसी बात के होते हुए भी,-
(i) कोई भी व्यक्ति, निगम की पूर्व अनुज्ञा के बिना-
(क) दामोदर घाटी में, जहां उपभोक्ता द्वारा ऊर्जा 30,000 वोल्ट या उससे अधिक दाब पर ली जाती है, किसी उपभोक्ता को विद्युत-ऊर्जा नहीं बेचेगा;
(ख) 30,000 वोल्ट या उससे अधिक दाब पर विद्युत-ऊर्जा दामोदर घाटी में पारेषित नहीं करेगा;
(ग) पूर्व से पश्चिम तब खींची जाने वाली किसी ऐसी सीधी रेखा के, जो बाईस डिग्री, चौदह मिनट और सैंतालीस सैकेन्ड के अक्षांश और सत्तासी डिग्री, इक्यावन मिनट और बयालीस सैकेन्ड के देशान्तर पर पड़ने वाले किसी बिन्दु से होकर गुजरती हो, उत्तर में स्थित दामोदर घाटी के किसी भाग में, सिवाय बर्दमान के नगरपालिका क्षेत्र के उस भाग के, जो उस सीधी रेखा के उत्तर में पड़ता हो, 10,000 किलोवाट से अधिक की संकलित क्षमता वाले किसी प्रतिष्ठापन में कोई विद्युत-ऊर्जा उत्पादित नहीं करेगा :
परन्तु उपखंड (ग) की कोई बात किसी ऐसे व्यक्ति को, जो इस अधिनियम के प्रारम्भ पर, विद्युत-ऊर्जा ऐसे किसी प्रतिष्ठापन में उत्पादित कर रहा था जिसकी संकलित क्षमता 10,000 किलोवाट से अधिक हो, तब तक लागू नहीं होगी जब तक कि उस प्रतिष्ठापन की क्षमता बढ़ाईन जाए :
परन्तु यह भी कि उपखण्ड (ग) की कोई बात सिन्दरी के उर्वरक कारखाने के किसी विद्युत केन्द्र प्रतिष्ठापन को, जिसकी संकलित क्षमता 80,000 किलोवाट हो, जब तक उस प्रतिष्ठापन की क्षमता बढ़ाकर 80,000 किलोवाट से अधिक न कर दी जाए, लागू नहीं होगा ।
(ii) निगम, दामोदर घाटी में किसी भी उपभोक्ता को विद्युत-ऊर्जा बेच सकेगा, किन्तु ऐसी कोई बिक्री, संबद्ध राज्य सरकार की अनुज्ञा के बिना किसी ऐसे उपभोक्ता को नहीं की जाएगी, जो 30,000 वोल्ट से कम के दाब पर प्रदाय की अपेक्षा करता हो;
(iii) निगम, संबद्ध राज्य सरकार की अनुज्ञा से, अपनी पारेषण-प्रणाली दामोदर घाटी से परे किसी क्षेत्र तक विस्तारित कर सकेगा और उस क्षेत्र में विद्युत-ऊर्जा बेच सकेगा ।
19. विद्यमान अनुज्ञप्तियों पर प्रभाव-(1) जहां भारतीय विद्युत अधिनियम, 1910 (1910 का 9) के अधीन प्रदत्त कोई अनुज्ञप्ति धारा 18 के उपबन्धों के आधार पर, पूर्णतः या अंशतः प्रवर्तनशील नहीं रह जाती वहां अनुज्ञप्ति इस प्रकार प्रतिसंहृत या उपान्तरित की गई समझी जाएगी कि वह उन उपबन्धों से संगत हो जाए ।
(2) जहां कोई अनुज्ञप्ति उपधारा (1) के अधीन प्रतिसंहृत की गई समझी जाती है वहां निगम अनुज्ञप्तिधारी के उपक्रम को खरीद लेगा और जहां कोई अनुज्ञप्ति उस उपधारा के अधीन उपान्तरित की जाती है वहां निगम, अनुज्ञप्तिधारी के विकल्प पर, या तो उस उपक्रम को खरीद लेगा या उसे उचित प्रतिकर अदा करेगा ।
(3) उपधारा (2) के अधीन निगम द्वारा संदेय क्रय-कीमत या प्रतिकर की रकम वह होगी जिस पर निगम और अनुज्ञप्तिधारी के बीच सहमति हो जाए, या असहमति की दशा में वह होगी जो माध्यस्थम् द्वारा अवधारित की जाए ।
20. विद्युत-ऊर्जा के प्रदाय के लिए प्रभार-निगम, विद्युत-ऊर्जा के प्रदाय के लिए प्रभारों की एक अनुसूची नियत करेगा, जिसके अन्तर्गत थोक मात्रा में और फुटकर वितरण के लिए प्रदाय की दरें सम्मिलित हैं और ऐसे प्रभारों की वसूली की रीति विनिर्दिष्ट करेगा:
परन्तु निगम विद्युत-ऊर्जा के थोक मात्रा में प्रदाय की किसी संविदा में ऐसे निबंधन और शर्तें जिनके अन्तर्गत फुटकर दर अनुसूची भी है, जिन्हें वह विद्युत-ऊर्जा के उपयोग को प्रोत्साहित करने के लिए आवश्यक या वांछनीय समझे, अधिरोपित कर सकेगा ।
अन्य कार्यकलाप
21. निगम के अन्य कार्यकलाप-(1) निगम निम्नलिखित के लिए प्रयोग और अनुसंधान करने के निमित्त प्रयोगशालाएं, प्रयोग तथा अनुसंधान केन्द्र, और फार्म स्थापित कर सकेगा, उन्हें बनाए रख सकेगा चालू रख सकेगा: -
(क) दामोदर घाटी के विकास के लिए, जल, विद्युत-ऊर्जा तथा अन्य साधनों का उपयोग ऐसी रीति से करना कि अधिक से अधिक बचत हो सके,
(ख) यह अवधारित करना कि हुगली नदी में प्रवाह की दशाओं पर निगम के कार्य का क्या प्रभाव पड़ता है,
(ग) कलकता पत्तन पर नौपरिवहन की दशाओं में सुधार करना,
(घ) धारा 12 के अधीन विनिर्दिष्ट किसी अन्य कार्य का सम्पादन करना ।
(2) निगम स्वयं अपनी आयोजना, डिजाइन, निर्माण और प्रचालन संबंधी अभिकरणों को स्थापित कर सकेगा, या भाग लेने वाली सरकारों, स्थानीय प्राधिकारियों, शिक्षा और अनुसंधान संस्थाओं, या वास्तुकार, इंजीनियर, या ठेकेदार का कारबार करने वाले किसी व्यक्ति के साथ उनके लिए व्यवस्था कर सकेगा ।
शक्तियां
22. निगम की सामान्य शक्तियां-(1) निगम को ऐसा कोई भी कार्य करने की शक्ति होगी जो इस अधिनियम के अधीन उसके कृत्यों का पालन करने के प्रयोजनार्थ आवश्यक या समीचीन हो ।
(2) पूर्वोक्त उपबन्ध की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, उक्त शक्ति के अन्तर्गत निम्नलिखित विषयक शक्तियां भी हैं-
(i) ऐसी जंगम और स्थावर सम्पत्ति का अर्जन और धारण, जिसे वह आवश्यक समझे, तथा ऐसी किसी सम्पत्ति को पट्टे पर देना, बेचना या अन्यथा अन्तरित करना;
(ii) ऐसे बांधों, बराजों, जलाशयों, बिजली-घरों, बिजली संरचनाओं, विद्युत-पारेषण लाइनों और उपकेन्द्रों, नौपरिवहन संकर्मों सिंचाई, नौपरिवहन और जल-निकास नहरों और ऐसे अन्य संकर्मों तथा संरचनाओं का, जो भी आवश्यक हों, निर्माण करना या करवाना;
(iii) अपने नियंत्रणाधीन जल को दूषित होने से बचाना और जल में ऐसे बहिःस्रोतों को गिरने से रोकना, जो जल-प्रदाय, सिंचाई, लोक स्वास्थ्य या मत्स्य-जीवन के लिए हानिकर है;
(iv) अपने जलाशयों और जलमार्गों में मछली का स्टाक रखना तथा अपने नियंत्रणाधीन जल में से मछलियों का निकाला जाना विनियमित करना या प्रतिषिद्ध करना;
(v) बांधों, जलाशयों के लिए भूमि के अर्जन और वाटरशेडों की संरक्षा से विस्थापित हुई आबादी को फिर से बसाने की व्यवस्था करना;
(vi) निगम द्वारा उपलभ्य की गई सुविधाओं के और बेहतर उपयोग के लिए सहकारी सोसाइटियों तथा अन्य संगठनों की स्थापना में मदद देना;
(vii) मलेरिया के निवारण के लिए उपाय करना ।
23. सड़कों तथा खुली जगहों को बन्द करने की शक्ति-(1) निगम, संबद्ध व्यक्तियों या जन-साधारण को सूचना देने के पश्चात्-
(क) किसी सड़क या उसके किसी भाग को मोड़ सकेगा, या उसकी दिशा बदल सकेगा या उसका सार्वजनिक उपयोग रोक सकेगा या उसे स्थायी रूप से बन्द कर सकेगा;
(ख) किसी खुली जगह या उसके किसी भाग के सार्वजनिक उपयोग को रोक सकेगा या उसे स्थायी रूप से बन्द कर सकेगा ।
(2) जब कभी निगम किसी सड़क या खुली जगह के सार्वजनिक उपयोग को रोक दे या स्थायी रूप से बन्द कर दे तब निगम ऐसे प्रत्येक व्यक्ति को उचित प्रतिकर देगा,-
(क) जो उस सड़क या खुली जगह या उसके भाग को पहुंच-मार्ग के रूप में, अनुज्ञप्तिधारी होने से अन्यथा, प्रयोग में लाने का हकदार था; अथवा
(ख) जिसकी स्थावर सम्पत्ति को, ऐसी खुली जगह या उसके भाग के कारण हवा और प्रकाश मिल रहा था, और जिसने,-
(i) खंड (क) के अन्तर्गत आने वाले किसी मामले में, ऐसे रोके जाने या बन्द किए जाने के कारण, और
(ii) खंड (ख) के अन्तर्गत आने वाले किसी मामले में, इस कारण कि निगम ने उस खुली जगह या भाग का उपयोग किया है,
नुकसान उठाया है ।
(3) उपधारा (2) के अधीन किसी व्यक्ति को संदेय प्रतिकर का अवधारण करते समय, निगम ऐसे किसी लाभ को विचार में ले सकता है जो उस व्यक्ति को उस समय या उस समय के आस-पास जब वह सड़क या खुली जगह या उसका भाग, जिस मद्धे प्रतिकर दिया जाना है, रोक दिया या बंद कर दिया जाता है, किसी अन्य सड़क या खुली जगह के निर्माण, उसकी व्यवस्था या उसमें सुधार किए जाने से हुआ हो ।
(4) जब उपधारा (1) के अधीन किसी सड़क या खुली हुई जगह या उसके किसी भाग को स्थायी रूप से बन्द कर दिया जाता है तब, निगम उसके उस भाग को बेच सकेगा या छोड़ सकेगा जो उसके प्रयोजनों के लिए अपेक्षित नहीं है ।
24. कतिपय अन्य अधिनियमितियों के अधीन शक्तियां-(1) अनुसूची के भाग 1 के स्तम्भ (1) में विनिर्दिष्ट अधिनियमों में किसी बात के हेते हुए भी, निगम उन अधिनियमों के उस अनुसूची के स्तम्भ (2) में स्तम्भ (1) की प्रत्येक मद के सामने, विनिर्दिष्ट उपबन्धों के अधीन दामोदर घाटी में राज्य सरकार के सभी या किन्हीं भी कृत्यों का पालन और उसकी सभी या किन्हीं भी शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा ।
(2) अनुसूची के भाग 2 के स्तम्भ (1) में विनिर्दिष्ट अधिनियमों में किसी बात के होते हुए भी, निगम द्वारा प्राधिकृत कोई अधिकारी, उन अधिनियमों के अनुसूची के स्तम्भ (2) में, स्तम्भ (1) की प्रत्येक मद के सामने, विनिर्दिष्ट उपबन्धों के अधीन दामोदर घाटी में, यथास्थिति, नहर अधिकारी, कलक्टर, या वन अधिकारी के सभी या किन्हीं भी कृत्यों का पालन और उसकी सभी या किन्हीं भी शक्तियों का प्रयोग कर सकेगा ।
जलमग्नता का बचाया जाना तथा सहयोग
25. जलमग्नता से हुई असुविधा को न्यूनतम कर देने के लिए अन्य प्राधिकारियों के साथ सहयोग-निगम, ऐसी असुविधा को, जिसका सड़कों और संचार-साधनों के जलमग्न होने के कारण होना संभाव्य है, न्यूनतम कर देने की दृष्टि से, भाग लेने वाली सरकारों, रेल प्राधिकारियों और स्थानीय प्राधिकारियों तथा निकायों के साथ सहयोग करेगा और उनकी पुनः सीध बांधने का, या यदि ऐसी जलमग्नता के कारण आबादी का फिर से बसाया जाना आवश्यक हो गया है तो उसका भी, खर्च वहन करेगा ।
26. कोयला खानों को जलमग्न होने से निगम द्वारा बचाया जाना-निगम, कोयले या खनिज निक्षेपों को जलमग्न होने से बचाने का प्रत्येक प्रयास करेगा और कोयला खानों में भराई के प्रयोजनों के लिए बालू की सप्लाई बनाए रखना सुनिश्चित करने की दृष्टि से तथा, कोयला खनन उद्योग को होने वाली असुविधा को अन्य तरीकों से न्यूनतम कर देने के लिए, कोयला खनन उद्योग और भाग लेने वाली सरकारों द्वारा स्थापित निकायों के साथ सहयोग करेगा ।
भाग 4
वित्त, लेखे और लेखापरीक्षा
27. निगम के स्थापित होने तक व्यय-निगम की स्थापना की तारीख तक उसकी स्थापना के लिए और उसके संबंध में केंद्रीय सरकार द्वारा किया गया समस्त व्यय केन्द्रीय सरकार द्वारा निगम को दी गई पूंजी समझा जाएगा और ऐसी पूंजी का समायोजन भाग लेने वाली सरकारों के बीच धारा 30 से धारा 36 तक के उपबन्धों के अनुसार किया जाएगा ।
28. निगम में सम्पत्ति का निहित होना-निगम की स्थापना से पूर्व दामोदर घाटी की स्कीम के प्रयोजनों के लिए अर्जित सभी सम्पत्ति और निर्मित सभी संकर्म निगम में निहित हो जाएंगे और इस निमित्त प्राप्त सभी आय और किए गए सभी व्यय निगम की बहियों में लिखे जाएंगे ।
29. निगम की निधि-(1) निगम की अपनी निधि होगी और निगम की सभी प्राप्तियां उस में जमा की जाएंगी और निगम द्वारा सभी भुगतान उसी में से किए जाएंगे ।
(2) जैसा कि केन्द्रीय सरकार द्वारा अन्यथा निदेश दिया गया हो उसके सिवाय उस निधि का समस्त धन भारतीय रिजर्व बैंक या भारतीय रिजर्व बैंक अभिकर्ताओं के पास जमा किया जाएगा या ऐसी प्रतिभूतियों में विनिहित किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा अनुमोदित की जाएं ।
30. निगम के लिए पूंजी की व्यवस्था करने के, भाग लेने वाली सरकारों के दायित्व-निगम द्वारा हाथ में ली गई किसी भी परियोजना को पूरा करने के लिए, भाग लेने वाली सरकारें निगम द्वारा अपेक्षित समस्त पूंजी की, जैसा इसमें इसके पश्चात् विनिर्दिष्ट है, व्यवस्था करेंगी ।
31. भाग लेने वाली सरकार द्वारा, विनिर्दिष्ट तारीख को, भुगतान-प्रत्येक भाग लेने वाली सरकार, पूंजी के अपने अंश की व्यवस्था निगम द्वारा विनिर्दिष्ट तारीखों को करेगी और यदि कोई सरकार ऐसी तारीखों को अपने अंश की व्यवस्था नहीं करती तो निगम उस कमी को पूरा करने के लिए, संबद्ध सरकार के खर्चे पर, धन उधार ले सकेगा ।
32. ऐसे उद्देश्यों पर व्यय जो सिंचाई, बिजली और बाढ़-नियंत्रण से भिन्न हों-निगम को ऐसे उद्देश्यों पर जो सिंचाई, बिजली और बाढ़-नियंत्रण से भिन्न हों, और इस अधिनियम के अधीन प्राधिकृत हों, उतनी धनराशि व्यय करने की शक्ति होगी जितनी वह ठीक समझे और ऐसी धनराशि धारा 33 के अधीन आबंटन से पूर्व निगम की निधि में से संदेय सामान्य व्यय समझी जाएगी ।
33. मुख्य उद्देश्यों पर परियोजना को प्रभार्य व्यय का आबंटन-किसी परियोजना को प्रभार्य समस्त पूंजी-व्यय तीन मुख्य उद्देश्यों अर्थात् सिंचाई, बिजली और बाढ़-नियंत्रण के बीच निम्नानुसार आबंटित किया जाएगा, अर्थात्: -
(1) ऐसे व्यय, जो उन उद्देश्यों में से अकेले किसी एक पर हुआ माना जा सकता है, और जिसके अन्तर्गत ऊपरी खर्चों और साधारण प्रभारों का आनुपातिक अंश भी है, उस उद्देश्य पर प्रभारित किया जाएगा, और
(2) ऐसा व्यय, जो उक्त उद्देश्यों में से दो या अधिक के संबंध में सामान्य है, और जिसके अन्तर्गत ऊपरी खर्चों और साधारण प्रभार का आनुपातिक अंश भी है, ऐसे प्रत्येक उद्देश्य के लिए उस व्यय के अनुपात में, जो निगम के प्राक्कलनों के अनुसार, एकमात्र उस उद्देश्य के लिए किसी पृथक् संरचना के निर्माण में हुआ होता, उस उद्देश्य की बाबत खंड (1) के अधीन अवधारित रकम को कम करके आबंटित किया जाएगा ।
34. सिंचाई के लिए आबंटित पूंजी-सिंचाई के लिए आबंटित पूंजी की कुल रकम में, राज्य सरकारों का अंश निम्नानुसार होगा, अर्थात्: -
(1) संबद्ध सरकार अपने राज्य में एकमात्र सिंचाई के लिए निर्मित संकर्मों की पूंजी-लागत के लिए जिम्मेदार होगी; और
(2) बिहार और पश्चिमी बंगाल दोनों राज्यों के लिए सिंचाई पर होने वाली पूंजी-लागत के अतिशेष में राज्य सरकारों का अंश, कृषि प्रयोजनों के लिए उन्हें प्रत्याभूत वार्षिक जल-ग्रहण के अनुपात में, होगा:
परन्तु इस खंड के अधीन विभाज्य पूंजी-लागत में उनका अनन्तिम अंश, उनके अपने-अपने प्रत्याभूत जल-ग्रहण संबंधी पूर्व घोषित आशय के अनुसार होगा और तदनुसार किए गए कोई भी भुगतान प्रत्याभूत जल-ग्रहण के अवधारण के पश्चात् समायोजित किए जाएंगे ।
35. बिजली के लिए आबंटित पूंजी-बिजली के लिए आबंटित पूंजी की कुल रकम में तीनों भाग लेने वाली सरकारों का अंश बराबर-बराबर होगा ।
36. बाढ-नियंत्रण के लिए आबंटित पूंजी-बाढ़ नियंत्रण के लिए आबंटित कुल चौदह करोड़ रुपए तक की पूंजी की रकम में केन्द्रीय सरकार और पश्चिमी बंगाल सरकार का अंश बराबर-बराबर होगा और जो भी रकम उसके आधिक्य में होगी, उसे वहन करने का दायित्व पश्चिमी बंगाल की सरकार का होगा ।
37. लाभ और घाटे का निपटाया जाना-(1) धारा 40 की उपधारा (2) के अधीन रहते हुए, शुद्ध लाभ, यदि कोई हो, जो तीनों मुख्य उद्देश्यों, अर्थात् सिंचाई, बिजली और बाढ-नियंत्रण में से प्रत्येक से हुआ माना जा सकता है, उस उद्देश्य के लिए हुई मानी जा सकने वाली कुल पूंजी-लागत में भाग लेने वाली सरकारों के उनके अपने-अपने अंशों के अनुपात में, उन सरकारों के नाम जमा किया जाएगा ।
(2) किसी भी उद्देश्य की बाबत यदि कोई शुद्ध घाटा होगा तो उसकी पूर्ति, उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट अनुपात में, संबद्ध सरकारों द्वारा की जाएगीः
परन्तु बाढ-नियंत्रण के सम्बद्ध में शुद्ध घाटे की पूर्ति पूर्णतः बंगाल सरकार द्वारा की जाएगी और ऐसे घाटे में केंद्रीय सरकार का कोई भी अंश नहीं होगा ।
38. ब्याज का संदाय-प्रत्येक भाग लेने वाली सरकार ने जितनी पूंजी की व्यवस्था की होगी उस पर निगम ऐसी दर से ब्याज देगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर नियत की जाए और ऐसा ब्याज निगम के व्यय का भाग समझा जाएगा ।
39. ब्याज की रकमों तथा अन्य व्ययों का पूंजी लागत में जोड़ा जाना और प्राप्तियों का पूंजी लागत में हुई कमी के रूप में माना जाना-यदि निगम घाटे में चलता है तो निगम की स्थापना से पन्द्रह वर्ष से अनधिक की अवधि तक, ब्याज की रकमें तथा अन्य व्यय पूंजी लागत में जोड़ दिए जाएंगे, और सभी प्राप्तियां उसी पूंजी लागत को कम करने में लगाई जाएंगी ।
40. अवक्षयण और आरक्षित तथा अन्य निधियों की व्यवस्था-(1) निगम अवक्षयण और आरक्षित तथा अन्य निधियों की व्यवस्था ऐसी दरों और ऐसे निबन्धनों पर करेगा जो, भारत के महालेखापरीक्षक द्वारा, केन्द्रीय सरकार के परामर्श से विनिर्दिष्ट किए जाएं ।
(2) धारा 37 के प्रयोजनों के लिए शुद्ध लाभ का अवधारण उक्त व्यवस्था करने के पश्चात् किया जाएगा ।
41. राज्य सरकारों द्वारा सुधारार्थ उद्ग्रहण में निगम का अंश-यदि कोई सुधारार्थ उद्ग्रहण किसी राज्य सरकार द्वारा अधिरोपित किया जाए तो उसके आनुपातिक आगम, वहां तक जहां तक वे निगम के कार्यों से हुए समझे जाएं, निगम के नाम जमा किए जाएंगे ।
42. धन उधार लेना- निगम इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के प्रयोजनार्थ खुले बाजार में या अन्यथा, केन्द्रीय सरकार के अनुमोदन से, धन उधार ले सकेगा ।
43. केन्द्रीय करों का भुगतान करने का दायित्व-(1) निगम केन्द्रीय सरकार द्वारा उद्गृहीत आय-कर देने के लिए उसी रीति से और उसी सीमा तक दायी होगा जैसे कि कोई कम्पनी होती है ।
(2) राज्य सरकारें निगम द्वारा दिए गए उक्त करों के किसी प्रतिदाय की हकदार नहीं होंगी ।
44. बजट-(1) निगम, प्रति वर्ष अक्तूबर में, आगामी वित्तीय वर्ष के लिए एक बजट ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, [सदस्य (वित्त)] के परामर्श से, तैयार करेगा जिसमें प्राक्कलित प्राप्तियां और व्यय दिखाए जाएंगे तथा वे रकमें भी दिखाई जाएंगी जो तीनों भाग लेने वाली सरकारों में से प्रत्येक से उस वित्तीय वर्ष के दौरान अपेक्षित होंगी ।
(2) बजट की मुद्रित प्रतियां तीनों भाग लेने वाली सरकारों मे से प्रत्येक को प्रतिवर्ष 15 नवम्बर तक उपलब्ध कर दी जाएंगी ।
(3) बजट, बनाए जाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र [संसद्] और संबद्ध राज्य विधान-मंडलों में रखा जाएगा ।
45. वार्षिक रिपोर्ट-(1) निगम ऐसे प्ररूप में, जो विहित किया जाए, प्रत्येक वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पश्चात् छह मास के भीतर एक वार्षिक रिपोर्ट, जिसमें पूर्वतन वित्तीय वर्ष के दौरान उसके कार्यकलाप का सही-सही और यथार्थ विवरण दिया होगा, विशेषतया निम्नलिखित का निदेश करते हुए, तैयार करेगा, -
(i) सिंचाई;
(ii) जल-प्रदाय;
(iii) विद्युत-ऊर्जा;
(iv) बाढ़-नियंत्रण;
(v) नौपरिवहन;
(vi) वनरोपण;
(vii) मिट्टी का कटाव;
(viii) भूमि का उपयोग;
(ix) विस्थापित आबादी का फिर से बसाया जाना;
(x) स्वच्छता और लोक स्वास्थ्य संबंधी कार्य; और
(xi) जनता का आर्थिक और समाजिक कल्याण ।
(2) वार्षिक रिपोर्ट में पूर्वतन वित्तीय वर्ष के दौरान हुई आय और व्यय का, उन शुद्ध रकमों का जो तीनों मुख्य उद्देश्यों में से प्रत्येक के लिए मानी जा सकती हैं, और तीनों भाग लेने वाली सरकारों के बीच लागत पूंजी के वितरण का सही-सही और यथार्थ विवरण भी दिया जाएगा और उसमें निगम की स्थापना से लेकर आनुक्रमिक योग तथा अद्यतन वित्तीय परिणाम दिखाए जाएंगे ।
(3) तीनों भाग लेने वाली सरकारों में से प्रत्येक के द्वारा, बजट प्राक्कलनों के आधार पर अस्थायी रूप से किए गए भुगतानों का समायोजन, यथासम्भव शीघ्र, वार्षिक रिपोर्ट में किए गए आबंटन के अनुसार, किया जाएगा ।
(4) वार्षिक रिपोर्ट की मुद्रित प्रतियां तीनों भाग लेने वाली सरकारों में से प्रत्येक को प्रतिवर्ष अक्तूबर के पन्द्रहवें दिन तक उपलब्ध करा दी जाएंगी ।
(5) वार्षिक रिपोर्ट, उसके बनाने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र 2[संसद्] और संबद्ध राज्य विधान-मंडल में रखी जाएगी ।
46. अन्य वार्षिक वित्तीय विवरण-(1) निगम ऐसे अन्य वित्तीय विवरण ऐसे प्ररूप में, और ऐसी तारीखों तक, जो विहित की जाएं, तैयार करेगा ।
(2) ऐसे प्रत्येक वार्षिक वित्तीय विवरण की मुद्रित प्रतियां तीनों भाग लेने वाली सरकारों में से प्रत्येक को ऐसी तारीख तक उपलब्ध करा दी जाएंगी जो विहित की जाए ।
47. लेखे और लेखापरीक्षा-निगम के लेखे ऐसी रीति से रखे और परीक्षित किए जाएंगे, जो भारत के महालेखापरीक्षक के परामर्श से, विहित की जाए ।
भाग 5
प्रकीर्ण
48. केन्द्रीय सरकार द्वारा निदेश-(1) अपने कृत्यों के निर्वहन में निगम नीति के प्रश्न पर उन अनुदेशों के आधार पर कार्य करेगा जो केन्द्रीय सरकार द्वारा उसे दिए जाएं ।
(2) यदि केन्द्रीय सरकार और निगम के बीच यह विवाद उठता है कि कोई प्रश्न नीति का प्रश्न है या नहीं तो केन्द्रीय सरकार का विनिश्चय अन्तिम होगा ।
49. निगम और सरकारों के बीच विवाद-(1) इस अधिनियम में जैसा कि स्पष्टतः उपबन्धित है उसके सिवाय, निगम और भाग लेने वाली सरकारों में से किसी के बीच इस अधिनियम के अन्तर्गत आने वाले, या उससे संबंधित या उद्भूत होने वाले किसी मामले में कोई विवाद उस मध्यस्थ को निर्दिष्ट किया जाएगा जिसकी नियुक्ति भारत का मुख्य न्यायाधिपति करे ।
(2) मध्यस्थ का विनिश्चय अन्तिम होगा और पक्षकारों पर आबद्धकर भी ।
50. निगम के लिए भूमि का अनिवार्य अर्जन-इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के लिए निगम द्वारा अपेक्षित किसी भी भूमि के बारे में यह समझा जाएगा कि वह सार्वजनिक प्रयोजन के लिए आवश्यक है और ऐसी भूमि निगम के लिए वैसे ही अर्जित की जाएगी मानो भूमि अर्जन अधिनियम, 1894 (1894 का 1) के भाग 7 के उपबन्ध उसे लागू हों और निगम उक्त अधिनियम की धारा 3 के खंड (ङ) के अर्थ में कम्पनी हो ।
51. केन्द्रीय सरकार का नियंत्रण-(1) केंद्रीय सरकार निगम से किसी भी ऐसे सदस्य को हटा सकेगी जो उसकी राय में,-
(क) काम करने से इन्कार करता है;
(ख) काम करने में असमर्थ हो गया है;
(ग) सदस्य के रूप में अपनी स्थिति का इतना दुरुपयोग कर चुका है कि निगम में उसका बना रहना जनता के लिए अहितकर है; अथवा
(घ) सदस्य के रूप में बने रहने के लिए अन्यथा अनुपयुक्त है ।
(2) केन्द्रीय सरकार किसी भी सदस्य को, उसके विरुद्ध जांच के दौरान, निलम्बित कर सकेगी ।
(3) इस धारा के अधीन हटाए जाने का कोई आदेश तब तक नहीं दिया जाएगा जब तक संबद्ध सदस्य को अपना स्पष्टीकरण केन्द्रीय सरकार को प्रस्तुत करने का अवसर न दे दिया गया हो, और जब ऐसा आदेश दिया जाएगा तब हटाए गए सदस्य का स्थान रिक्त घोषित कर दिया जाएगा और उस रिक्त स्थान को भरने के लिए धारा 4 के अधीन कोई अन्य सदस्य नियुक्त किया जा सकेगा ।
(4) ऐसा सदस्य जिसे हटाया गया है, सदस्य के रूप में या किसी अन्य हैसियत से निगम में पुनः नियुक्ति का पात्र नहीं होगा ।
(5) केन्द्रीय सरकार किसी ऐसे संव्यवहार को शून्य घोषित कर सकेगी जिसके संबंध में किसी सदस्य को उपधारा (1) के अधीन हटाया गया है ।
(6) यदि निगम अपने कृत्यों का पालन नहीं करता या इस अधिनियम के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा जारी किए गए निदेशों का पालन नहीं करता तो केन्द्रीय सरकार को निगम के अध्यक्ष और सदस्यों को हटाने और उनके स्थान पर अन्य अध्यक्ष और सदस्य नियुक्त करने की शक्ति होगी ।
52. भारतीय वन अधिनियम, 1927 के कतिपय उपबन्धों का निगम के वनों को लागू होना-भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 का 16) की धारा 26 के अधीन किसी आरक्षित वन के बारे में प्रतिषिद्ध सभी कार्य ऐसी किसी वन की बाबत प्रतिषिद्ध हुए समझे जाएंगे जो निगम के स्वामित्वाधीन हो या उसके पर्यवेक्षण या नियंत्रण में हों, और ऐसे वन के संबंध में सभी अपराध उक्त अधिनियम के अधीन वैसे ही दण्डनीय होंगे मानो वे किसी आरक्षित वन के संबंध में किए गए हों ।
53. शास्ति-जो कोई इस अधिनियम की धारा 17 और धारा 18 के उपबन्धों या इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम का उल्लंघन करेगा वह कारावास से, जिसकी अवधि छह मास की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दंडनीय होगा ।
54. अभियोजन की प्रक्रिया-कोई भी न्यायालय इस अधिनियम के अधीन किसी अपराध का संज्ञान, निगम द्वारा उस निगम के ऐसे किसी अधिकारी की शिकायत पर करने के सिवाय नहीं करेगा जो निगम द्वारा इस निमित्त प्राधिकृत किया जाए ।
55. प्रवेश की शक्ति-निगम द्वारा सामान्यतया या विशेषतया प्राधिकृत उसका कोई अधिकारी या सेवक हर उचित समय पर किसी भूमि या परिसर पर प्रवेश कर सकेगा और वहां ऐसे काम कर सकेगा जो उसके किसी कार्य को विधिपूर्वक करने, या इस अधिनियम के अधीन निगम द्वारा अपनी शक्तियों का प्रयोग और कृत्यों का पालन करने के लिए प्रारम्भिक या आनुषंगिक कोई सर्वेक्षण, परीक्षण या अन्वेषण करने के प्रयोजनार्थ युक्तियुक्त रूप से आवश्यक हो ।
56. निगम के सदस्यों, अधिकारियों और सेवकों का लोक सेवक होना- निगम के सभी सदस्य, अधिकारी और सेवक, चाहे वे केन्द्रीय सरकार द्वारा नियुक्त किए गए हों या निगम द्वारा, जब वे इस अधिनियम के किसी उपबन्ध के अनुसरण में कार्य कर रहे हों या उनका इस प्रकार कार्य करना तात्पर्यित हो तब, भारतीय दंड संहिता (1860 का 45) की धारा 21 के अर्थ में लोक सेवक समझे जाएंगे ।
57. इस अधिनियम के अधीन की गई कार्रवाई के लिए संरक्षण-(1) कोई भी वाद, अभियोजन या विधिक कार्यवाही किसी भी ऐसी बात के बारे में, जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए तात्पर्यित हो, निगम के नियोजनाधीन किसी व्यक्ति के विरुद्ध न होगी ।
(2) जैसा इस अधिनियम में अन्यथा उपबन्धित है उसके सिवाय, कोई भी वाद या अन्य विधिक कार्यवाही किसी ऐसी बात से, जो इस अधिनियम के अधीन सद्भावपूर्वक की गई हो या की जाने के लिए तात्पर्यित हो, हुए किसी नुकसान के लिए, या ऐसे किसी नुकसान के लिए, जिसका इस प्रकार होना सम्भाव्य है, निगम के विरुद्ध न होगी ।
58. अन्य विधियों का प्रभाव-इस अधिनियम या तद्धीन बनाए गए किसी नियम के उपबन्ध इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति में, या इस अधिनियम से भिन्न किसी अधिनियमिति के आधार पर प्रभाव रखने वाली किसी लिखत में, किसी बात के होते हुए भी, प्रभावी होंगे ।
59. नियम बनाने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित सभी या किन्हीं भी विषयों का उपबन्ध करने के लिए राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी, अर्थात्: -
(1) सदस्यों, ॥। के वेतन और भत्ते तथा उनकी सेवा की शर्तें;
(2) [सदस्यों] के कृत्य और कर्तव्य;
(3) बांध या अन्य संकर्म या प्रतिष्ठापन, जो निगम के अनुमोदन के बिना निर्मित किए जाएं;
(4) बजट के प्ररूप, वार्षिक रिपोर्ट और वार्षिक वित्तीय विवरण तथा वे तारीखें, जिन तक वार्षिक वित्तीय विवरणों की प्रतियां भाग लेने वाली सरकारों को उपलब्ध कराई जाएंगी;
(5) वह रीति, जिससे निगम के लेखे रखे जाएंगे और उनकी लेखापरीक्षा की जाएगी;
(6) सलाहकार समिति की नियुक्ति; और
(7) इस अधिनियम के अधीन बनाए गए किसी नियम को भंग करने पर दंड ।
60. विनियम बनाने की शक्ति-(1) निगम, इस अधिनियम के अधीन अपने कृत्यों का पालन करने के निमित्त विनियम, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, केन्द्रीय सरकार की पूर्व मंजूरी से, बना सकेगा ।
(2) विशिष्टतया और पूर्वगामी शक्ति की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना, निगम इन विनियमों में निम्नलिखित के लिए उपबन्ध कर सकेगा, -
(क) अपने अधिकारियों और सेवकों की नियुक्तियां करना और उनकी प्रोन्नति करना;
(ख) अपने अधिकारियों और सेवकों की सेवा की अन्य शर्तों को विनिर्दिष्ट करना;
(ग) उस रीति को विनिर्दिष्ट करना जिससे जल की दरें और विद्युत-ऊर्जा के प्रभार वसूल किए जाएंगे;
(घ) अपने नियंत्रणाधीन जल के दूषण को रोकना;
(ङ) अपने नियंत्रणाधीन जल में से मछलियों के निकाले जाने का विनियमन करना;
(च) अपनी कार्यवाहियों और कारबार का विनियमन करना;
(छ) किसी विनियम के भंग होने की दशा में दंड विहित करना ।
(3) उपधारा (1) और (2) के अधीन बनाए गए सभी विनियम यथासंभव शीघ्र राज्य सरकारों के राजपत्रों में भी प्रकाशित किए जाएंगे ।
अनुसूची
(धारा 24 देखिए)
भाग 1
|
अधिनियम |
स्तम्भ (1) में विनिर्दिष्ट अधिनियमों के उपबन्ध |
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(1) |
(2) |
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1. दि कैनाल्स ऐक्ट, 1864 (1864 का बंगाल अधिनियम 5) |
धारा 6 (पथ कर की दरें नियत और परिवर्तित करने की राज्य सरकार की शक्ति) ।
धारा 8 (राज्य सरकार की पथ कर संग्रह करने के लिए व्यक्तियों को नियुक्त करने की शक्ति, जो चाहे तो ठेके पर संग्रह करा सकते हैं) । |
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अधिनियम |
|
स्तम्भ (1) में विनिर्दिष्ट अधिनियमों के उपबन्ध |
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(1) |
|
(2) |
|
2. भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 16) धारा 35 (विशेष प्रयोजनों के लिए वनों का संरक्षण) । धारा 36 (वनों के प्रबन्ध को हाथ में ले लेने की शक्ति) । |
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अधिनियम |
स्तम्भ (1) में विनिर्दिष्ट अधिनियमों के उपबन्ध |
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(1) |
(2) |
|
|
भाग 2 |
|
1. दि बंगाल इरीगेशन ऐक्ट, 1876 (1876 का बंगाल अधिनियम 3) । |
भाग 3 (नहरों को बनाए रखने की शक्ति) । भाग 4 की धारा 41 (बाधा खड़ी करने वाले व्यक्ति को सूचना जारी करने की नहर अधिकारी की शक्ति) । भाग 4 की धारा 42 (बाधा को हटवाने की नहर अधिकारी की शक्ति) ।
|
|
2. दि बंगाल एम्बैंकमेन्ट ऐक्ट, 1882 (1882 का बंगाल अधिनियम 2) । |
भाग 2 (कलक्टर की शक्तियां और तत्संबंधी प्रक्रिया) । भाग 3 (जीवन और सम्पत्ति को आसन्न संकट होने की दशाओं में कलक्टर की शक्तियां) । |
|
3. भारतीय वन अधिनियम, 1927 (1927 का 16) । |
धारा 36 (वनों के प्रबन्ध को हाथ में ले लेने की शक्ति) । |
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