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विभागीय जांच (साक्षियों को हाजिर कराना तथा दस्तावेज पेश कराना) अधिनियम, 1972 ( Departmental Inquiries (Enforcement Of Attendance Of Witnesses And Production Of Documents) Act, 1972 )


 

विभागीय जांच (साक्षियों को हाजिर कराना तथा दस्तावेज पेश कराना) अधिनियम, 1972

(1972 का अधिनियम संख्यांक 18)

[31 मई, 1972]

कतिपय विभागीय जांचों में साक्षियों को हाजिर कराने और

दस्तावेज पेश कराने का तथा उससे संबंधित या

आनुषंगिक विषयों का उपबन्ध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के तेईसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

1. संक्षिप्त नाम तथा विस्तार-(1) इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम विभागीय जांच (साक्षियों को हाजिर कराना तथा दस्तावेज पेश कराना) अधिनियम, 1972 है ।  

(2) इसका विस्तार जम्मू-कश्मीर राज्य के सिवाय सम्पूर्ण भारत पर है ।

2. वे विभागीय जांच जिनको यह अधिनियम लागू होगा-इस अधिनियम के उपबन्ध निम्नलिखित के सम्बन्ध में की गई प्रत्येक विभागीय जांच को लागू होंगे,- 

(क) संघ के कार्यकलाप से सम्बद्ध लोक सेवाओं या पदों पर नियुक्त व्यक्ति; 

(ख) वे व्यक्ति जो संघ के कार्यकलाप से सम्बद्ध लोक सेवा अथवा पद पर नियुक्त किए जाने के पश्चात् निम्नलिखित की सेवा में हैं या उनसे वेतन प्राप्त कर रहे हैं,-

(i) किसी संघ राज्यक्षेत्र में कोई स्थानीय प्राधिकारी,-

(ii) किसी केन्द्रीय अधिनियम द्वारा या उसके अधीन स्थापित और केन्द्रीय सरकार के स्वामित्व अथवा नियंत्रण में कोई निगम, 

(iii) कम्पनी अधिनियम, 1956 (1956 का 1) की धारा 617 के अर्थ के अन्तर्गत कोई ऐसी सरकारी कम्पनी जिसमें इक्यावन प्रतिशत से अन्यून समादत्त शेयर पूंजी केन्द्रीय सरकार द्वारा धृत है अथवा कोई ऐसी कम्पनी जो ऐसी सरकारी कम्पनी की समनुषंगी है, 

(iv) सोसाइटी रजिस्ट्रीकरण अधिनियम, 1860 (1860 का 21) के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई ऐसी सोसाइटी जो केन्द्रीय सरकार के नियंत्रण के अधीन है । 

3. परिभाषाएं-इस अधिनियम के प्रयोजनों के लिए,-

(क) विभागीय जांच" से किसी ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध, जिसे यह अधिनियम लागू है, ईमानदारी की कमी के अभिकथन की ऐसी जांच अभिप्रेत है जो,-

(i) संसद् द्वारा बनाई गई किसी विधि या तदधीन बनाए गए किसी नियम के, अथवा 

(ii) भारत के संविधान के अनुच्छेद 309 के परन्तुक के अधीन बनाए गए अथवा अनुच्छेद 313 के अधीन जारी रखे गए किसी नियम के, अधीन और उसके अनुसार की जाएं; 

(ख) जांच प्राधिकारी" से केन्द्रीय सरकार द्वारा अथवा उस सरकार के अधीनस्थ किसी अधिकारी या प्राधिकारी द्वारा कोई विभागीय जांच करने के लिए नियुक्त अधिकारी या प्राधिकारी अभिप्रेत है और इसके अन्तर्गत ऐसा कोई अधिकारी या प्राधिकारी भी है जो ऐसी जांच करने के लिए, उस समय प्रवृत्त किसी विधि अथवा नियम द्वारा या उसके अधीन, सशक्त है; 

(ग) ईमानदारी की कमी" के अन्तर्गत रिश्वत लेना अथवा भ्रष्टाचार भी हैं । 

4. धारा 5 में विनिर्दिष्ट शक्तियों के प्रयोग को प्राधिकृत करने की केन्द्रीय सरकार की शक्ति-(1) जहां कि केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी विभागीय जांच के प्रयोजनार्थ किसी वर्ग या कोटि के व्यक्तियों को साक्षी के रूप में समन करना अथवा उनसे किसी दस्तावेज की मांग करना आवश्यक है वहां वह, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, जांच प्राधिकारी को, ऐसे वर्ग अथवा कोटि के भीतर आने वाले किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में, धारा 5 में विनिर्दिष्ट शक्तियों का प्रयोग करने के लिए प्राधिकृत कर सकेगी और तदुपरि जांच प्राधिकारी विभागीय जांच के  किसी भी प्रक्रम पर ऐसी शक्ति का प्रयोग कर सकेगा ।

(2) उपधारा (1) द्वारा केन्द्रीय सरकार को प्रदत्त शक्ति का प्रयोग ऐसे प्राधिकारी द्वारा भी किया जा सकेगा जो उस व्यक्ति के सम्बन्ध में, जिसके विरुद्ध विभागीय जांच की जा रही है, नियुक्ति प्राधिकारी से अवर प्राधिकारी न हो और जिसे केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, इस निमित्त विनिर्दिष्ट करे ।

5. साक्षियों को हाजिर कराने और दस्तावेज पेश कराने की प्राधिकृत जांच प्राधिकारी की शक्ति-(1) धारा 4 के अधीन प्राधिकृत प्रत्येक जांच प्राधिकारी को (जिसे इसमें इसके पश्चात् प्राधिकृत जांच प्राधिकारी" कहा गया है) निम्नलिखित विषयों के बारे में, अर्थात् :-

(क) किसी साक्षी को समन करने और हाजिर कराने तथा शपथ पर उसकी परीक्षा करने; 

(ख) किसी दस्तावेज या ऐसी अन्य सामग्री के जो साक्ष्य के रूप में पेश किए जाने योग्य है, प्रकटीकरण और पेश किए जाने की अपेक्षा करने; 

(ग) किसी न्यायालय या कार्यालय से किसी लोक अभिलेख की अध्यपेक्षा करने,

के बारे में वे ही शक्तियां होंगी जो सिविल न्यायालय को सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 (1908 का 5) के अधीन, किसी वाद का विचारण करते समय होती हैं । 

(2) उपधारा (1) में किसी बात के होते हुए भी, प्राधिकृत जांच प्राधिकारी भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, भारतीय स्टेट बैंक (समनुषंगी बैंक) अधिनियम, 1959 (1959 का 38) की धारा 2  के खण्ड (ट) में यथापरिभाषित किसी समनुषंगी बैंक अथवा बैंककारी कम्पनी (उपक्रमों का अर्जन तथा अन्तरण) अधिनियम, 1970 (1970 का 5) के अधीन गठित किसी तत्स्थानी नए बैंक को इस बात के लिए विवश नहीं करेगा कि वह,-

(क) किन्हीं ऐसी लेखा पुस्तकों या अन्य दस्तावेजों को पेश करे जिसके बारे में भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय स्टेट बैंक, समनुषंगी बैंक या तत्स्थानी नया बैंक गोपनीय प्रकृति का होने का दावा करता है; अथवा 

(ख) ऐसे किन्हीं पुस्तकों या दस्तावेजों को विभागीय जांच की कार्यवाही के अभिलेख का भाग बनाए; अथवा 

(ग) ऐसी किन्हीं पुस्तकों या दस्तावेजों का, यदि उन्हें पेश किया जाए तो, निरीक्षण, अपने समक्ष के किसी पक्षकार को अथवा किसी अन्य व्यक्ति को करने दे ।

(3) किसी साक्षी की हाजिरी के लिए या किसी दस्तावेज के पेश किए जाने के लिए प्राधिकृत जांच प्राधिकारी द्वारा निकाली गई प्रत्येक आदेशिका उस जिला न्यायाधीश के माध्यम से तामील और निष्पादित की जाएगी जिसकी अधिकारिता की स्थानीय सीमाओं के भीतर साक्षी अथवा अन्य व्यक्ति जिसके विरुद्ध आदेशिका तामील या निष्पादित की जानी है, स्वेच्छया निवास करता है या करबार करता है या अभिलाभ के लिए स्वयं काम करता है, और ऐसी किसी आदेशिका की अवज्ञा के लिए कोई कार्रवाई करने के प्रयोजनार्थ, ऐसी प्रत्येक आदेशिका जिला न्यायाधीश द्वारा निकाली गई आदेशिका समझी जाएगी ।

(4) इस अधिनियम के अधीन कोई विभागीय जांच करने वाला प्रत्येक प्राधिकृत जांच प्राधिकारी दण्ड प्रक्रिया संहिता, 1898 (1898 का 5) की धारा 480 और 482 के प्रयोजनार्थ सिविल न्यायालय समझा जाएगा । 

6. वे राज्यक्षेत्रीय सीमाएं जिनमें धारा 5 में विनिर्दिष्ट शक्तियों का प्रयोग किया जा सकेगा-धारा 5 में विनिर्दिष्ट शक्तियों का प्रयोग करने के प्रयोजनार्थ, प्रत्येक प्राधिकृत जांच प्राधिकारी की राज्यक्षेत्रीय अधिकारिता का विस्तार उस राज्यक्षेत्र की सीमाओं तक होगा जिस पर इस अधिनियम का विस्तार है ।

7. नियम बनाने की शक्ति-(1) इस अधिनियम के उपबन्धों को प्रभावी बनाने के प्रयोजनार्थ केन्द्रीय सरकार, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) इस धारा के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात्, यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात्, वह ऐसे परिवर्तित रूप में प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

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