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गोवा, दमण और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 ( Goa, Daman and Diu Reorganisation Act, 1987 )


 

गोवा, दमण और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987

(1987 का अधिनियम संख्यांक 18)

[23 मई, 1987]

गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के पुनर्गठन का और

उससे संबंधित विषयों का उपबंध

करने के लिए

अधिनियम

                भारत गणराज्य के अड़तीसवें वर्ष में संसद् द्वारा निम्नलिखित रूप में यह अधिनियमित हो :-

भाग 1

प्रारंभिक

1. संक्षिप्त नाम-इस अधिनियम का संक्षिप्त नाम गोवा, दमण और दीव पुनर्गठन अधिनियम, 1987 है ।

2. परिभाषाएं-इस अधिनियम में, जब तक कि संदर्भ से अन्यथा अपेक्षित न हो,-

                (क) प्रशासक" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 239 के अधीन नियुक्त प्रशासक अभिप्रेत है ;

(ख) नियत दिन" से वह दिन अभिप्रेत है जो केन्द्रीय सरकार, अधिसूचना द्वारा, नियत करे ;

(ग) अनुच्छेद" से संविधान का अनुच्छेद अभिप्रेत है ;

(घ) सभा निर्वाचन-क्षेत्र" और संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र" के वही अर्थ हैं जो लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) में हैं ;

(ङ) निर्वाचन आयोग" से राष्ट्रपति द्वारा अनुच्छेद 324 के अधीन नियुक्त निर्वाचन आयोग अभिप्रेत है ;

(च) विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र" से नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र अभिप्रेत है ;

(छ) विधि" के अंतर्गत विद्यमान संपूर्ण संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग में नियत दिन के ठीक पूर्व विधि का बल रखने वाली कोई अधिनियमिति, अध्यादेश, विनियम, आदेश, उपविधि, नियम, स्कीम, अधिसूचना या अन्य लिखत है ;

(ज) अधिसूचना" से राजपत्र में प्रकाशित अधिसूचना अभिप्रेत है ;

(झ) गोवा राज्य और संघ के संबंध में जनसंख्या अनुपात" से 42 : 3.25 का अनुपात अभिप्रेत है ;

(ञ) लोक सभा या विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के संबंध में, आसीन सदस्य" से वह व्यक्ति अभिप्रेत है जो नियत दिन के ठीक पूर्व उस सदन या उस विधान सभा का सदस्य है ;

(ट) खजाना" के अंतर्गत उप खजाना है ।

भाग 2

गोवा, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र का पुनर्गठन

3. गोवा राज्य की रचना-नियत दिन से ही, एक नए राज्य की रचना की जाएगी जिसका नाम गोवा राज्य होगा जिसमें वे राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे, जो उस दिन के ठीक पूर्व विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में समाविष्ट थे ।

4. दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र की रचना-नियत दिन से ही, एक नए संघ राज्यक्षेत्र की रचना की जाएगी जिसका नाम दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र होगा जिसमें वे राज्यक्षेत्र समाविष्ट होंगे जो उस दिन के ठीक पूर्व विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के दमण और दीव जिले में समाविष्ट थे ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

 

 

भाग 3

विधान-मंडलों में प्रतिनिधित्व

राज्य सभा

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

7. गोवा राज्य को आबंटित स्थान भरने के लिए निर्वाचन-नियत दिन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, गोवा राज्य को राज्य सभा में आबंटित स्थान को भरने के लिए निर्वाचन किया जाएगा ।

लोक सभा

8. लोक सभा में स्थानों का आबंटन-नियत दिन से ही, लोक सभा में गोवा राज्य को दो स्थान तथा दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र को एक स्थान आबंटित किया जाएगा और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की प्रथम अनुसूची तद्नुसार संशोधित की गई समझी जाएगी ।

9. दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र का संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र-संपूर्ण दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र एक ही संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र होगा जो दमण और दीव संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र कहलाएगा और नियत दिन के पश्चात्, यथाशक्यशीघ्र, उस निर्वाचन-क्षेत्र से प्रतिनिधि निर्वाचित करने के लिए लोक सभा का निर्वाचन ऐसे किया जाएगा मानो उस निर्वाचन-क्षेत्र से लोक सभा के लिए निर्वाचित सदस्य का स्थान रिक्त हो गया हो और ऐसे निर्वाचन के संबंध में लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 (1951 का 43) की धारा 149 के उपबंध, यावत्शक्य लागू होंगे ।

10. संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र-नियत दिन से ही,-

                (क) पणजी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र, दमण और दीव विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों को अपवर्जित करके, और विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र में मोरमुगाव संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र गोवा राज्य के संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र समझे जाएंगे और तदनुसार संसदीय और विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्र परिसीमन आदेश, 1976 की अनुसूची 26 के भाग स्त्र्कऱ् में 12-कुम्बारजुआ, 13-संतोआंद्रे, 29-दमण और 30-दीव" अंकों और शब्दों के स्थान पर 12-कुम्बारजुआ, और 13-संतोआंद्रे" अंक और शब्द रखे जाएंगे,

                (ख) विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र में दमण और दीव विधान सभा निर्वाचन-क्षेत्रों के बारे में यह समझा जाएगा कि वे दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र बनाते हैं ।

11. आसीन सदस्यों के बारे में उपबंध-(1) पणजी संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र का जो नियत दिन को धारा 10 के खंड (क) के उपबंधों के आधार पर परिवर्तित हो जाता है और गोवा राज्य का संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र बन जाता है, प्रतिनिधित्व करने वाला लोक सभा का आसीन सदस्य उस दिन से इस प्रकार परिवर्तित उस निर्वाचन-क्षेत्र से उस सदन के लिए सम्यक्तः निर्वाचित सदस्य समझा जाएगा ।

(2) मोरमुगाव संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र का, जो नियत दिन को धारा 10 के खंड (क) के उपबंधों के आधार पर गोवा राज्य का संसदीय निर्वाचन-क्षेत्र बन जाता है, प्रतिनिधित्व करने वाला लोक सभा का आसीन सदस्य उस दिन से उस राज्य में उस निर्वाचन-क्षेत्र से उस सदन का सम्यक्तः निर्वाचित सदस्य समझा जाएगा ।

विधान सभा

12. विधान सभा के बारे में उपबंध-नियत दिन से ही, गोवा राज्य की विधान सभा में सभा निर्वाचन-क्षेत्रों से प्रत्यक्ष निर्वाचन द्वारा चुने गए व्यक्तियों द्वारा भरे जाने वाले स्थानों की कुल संख्या चालीस होगी और लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 (1950 का 43) की द्वितीय अनुसूची तदनुसार संशोधित की गई समझी जाएगी ।

13. अनंतिम विधान सभा-(1) इस अधिनियम में किसी बात के होते हुए भी, (जिसके अंतर्गत गोवा राज्य की विधान सभा की सदस्य-संख्या से संबंधित उपबंध भी हैं), जब तक उस राज्य की विधान सभा का सम्यक् रूप से गठन नहीं हो जाता और उसे प्रथम सत्र के लिए आहूत नहीं कर दिया जाता तब तक नियत दिन से ही एक अनंतिम विधान सभा होगी, जिसमें-

                (क) दमण और दीव के प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्यों से भिन्न, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा के लिए प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों से निर्वाचित सदस्य होंगे ; और

                (ख) उस विधान सभा में नामनिर्देशित सदस्य होंगे ।

(2) अनुच्छेद 172 के खंड (1) में निर्दिष्ट पांच वर्ष की अवधि, उपधारा (1) में निर्दिष्ट अनंतिम विधान सभा की दशा में, उस तारीख से प्रारंभ हुई समझी जाएगी जिस तारीख को विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा की अवधि संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 5 के अधीन प्रारंभ हुई है ।

(3) इस धारा के अधीन गठित अनंतिम विधान सभा जब तक विद्यमान रहती है तब तक,-

                (क) वह संविधान के अधीन सम्यक् रूप से गठित गोवा राज्य की विधान सभा समझी जाएगी और संविधान के अधीन उस राज्य की विधान सभा के सभी कृत्यों का निर्वहन करने के लिए सक्षम होगी ; और

                (ख) उपधारा (1) के खंड (क) में निर्दिष्ट उसके सदस्य गोवा राज्य की विधान सभा के, संविधान के अधीन सम्यक् रूप से निर्वाचित सदस्य समझे जाएंगे ।

 ।                             ।                              ।                              ।                              ।                              ।                              ।

15. अनंतिम विधान सभा का अध्यक्ष-वह व्यक्ति जो नियत दिन से ठीक पूर्व विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा का अध्यक्ष है, उस दिन से ही अंनतिम विधान सभा का अध्यक्ष होगा ।

16. प्रक्रिया के नियम-विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा की प्रक्रिया और कारबार के संचालन के नियम, जैसे कि नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त हैं, जब तक अनुच्छेद 208 के खंड (1) के अधीन नियम नहीं बनाए जाते तब तक धारा 13 में निर्दिष्ट अनंतिम विधान सभा की प्रक्रिया और कारबार के संचालन के नियम, ऐसे उपांतरणों और अनुकूलनों के अधीन रहते हुए होंगे जो अध्यक्ष उनमें करे ।

निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन

17. निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन-(1) निर्वाचन आयोग, धारा 12 के अधीन गोवा राज्य की विधान सभा के लिए, नियत दिन से पूर्व या उसके पश्चात्, समनुदिष्ट स्थानों को एक सदस्यीय प्रादेशिक निर्वाचन-क्षेत्रों में, इसमें उपबंधित रीति से, वितरित करेगा और उनका परिसीमन संविधान के उपबंधों को और निम्नलिखित उपबंधों को ध्यान में रखते हुए करेगा, अर्थात् :-

                (क) सभी निर्वाचन-क्षेत्र, यथासाध्य, भौगोलिक रूप से संहृत क्षेत्र होंगे और उनका परिसीमन करते समय उनकी प्राकृतिक विशेषताओं, प्रशासनिक इकाइयों की विद्यमान सीमाओं, संचार की सुविधाओं और सार्वजनिक सुविधा को ध्यान में रखना होगा ; और

                (ख) वे निर्वाचन-क्षेत्र जिनमें अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए स्थान आरक्षित किए जाते हैं, यथासाध्य, उन क्षेत्रों में अवस्थित होंगे जहां कुल जनसंख्या के अनुपात में उनकी जनसंख्या सर्वाधिक है ।

(2) निर्वाचन आयोग, उपधारा (1) के अधीन अपने कृत्यों के पालन में अपनी सहायता के प्रयोजन के लिए, सहयुक्त सदस्यों के रूप में निम्नलिखित को अपने साथ सहयुक्त करेगा, अर्थात् :-

                (क) धारा 11 में निर्दिष्ट लोक सभा के आसीन सदस्य ; और

                (ख) यथास्थिति, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा या धारा 13 में निर्दिष्ट अनंतिम विधान सभा के ऐसे छह सदस्य जिन्हें अध्यक्ष नामनिर्दिष्ट करे :

                परन्तु किसी सहयुक्त सदस्य को मत देने का या निर्वाचन आयोग के किसी विनिश्चय पर हस्ताक्षर करने का अधिकार नहीं होगा ।

(3) यदि सहयुक्त सदस्य का पद मृत्यु या पदत्याग के कारण रिक्त हो जाता है तो वह, यदि साध्य हो तो, उपधारा (2) के उपबंधों के अनुसार भरा जाएगा ।

(4) निर्वाचन आयोग,-

                (क) निर्वाचन-क्षेत्रों के परिसीमन के लिए अपनी प्रस्थापनाएं, किसी ऐसे सहयुक्त सदस्य की विसम्मत-प्रस्थापनाओं सहित, यदि कोई हों, जो उनका प्रकाशन चाहता है, राजपत्र में और ऐसी अन्य रीति से, जिसे आयोग ठीक समझे, प्रकाशित करेगा और साथ-साथ एक सूचना भी प्रकाशित करेगा जिसमें प्रस्थापनाओं के संबंध में आक्षेप और सुझाव आमंत्रित किए गए हों और वह तारीख विनिर्दिष्ट हो जिसको या जिसके पश्चात् प्रस्थापनाओं पर उसके द्वारा आगे विचार किया जाएगा ;

                (ख) उन सभी आक्षेपों और सुझावों पर विचार करेगा जो उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख से पहले प्राप्त हुए हों ;

                (ग) उसे इस प्रकार विनिर्दिष्ट तारीख के पहले प्राप्त सभी आक्षेपों और सुझावों पर विचार करने के पश्चात्, एक या अधिक आदेश द्वारा, निर्वाचन-क्षेत्रों का परिसीमन अवधारित करेगा और ऐसे आदेश या आदेशों को राजपत्र में प्रकाशित करवाएगा और ऐसे प्रकाशन पर वह आदेश या वे आदेश विधि का पूर्ण बल रखेंगे और उसे या उन्हें किसी न्यायालय में प्रश्नगत नहीं किया जाएगा ।

(5) सभा निर्वाचन-क्षेत्र से संबंधित ऐसा प्रत्येक आदेश, ऐसे प्रकाशन के पश्चात् यथाशीघ्र, यथास्थिति, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा या धारा 13 में निर्दिष्ट अनंतिम विधान सभा के समक्ष रखा जाएगा ।

18. निर्वाचन आयोग की परिसीमन आदेशों को अद्यतन रखने की शक्ति-(1) निर्वाचन आयोग, समय-समय पर, राजपत्र में अधिसूचना द्वारा,-

                (क) धारा 17 के अधीन किए गए किसी आदेश में किसी मुद्रण संबंधी भूल को या उसमें अनवधानता से हुई भूल या लोप के कारण हुई किसी गलती को ठीक कर सकेगा ;

                (ख) जहां ऐसे किसी आदेश में उल्लिखित किसी प्रादेशिक खंड की सीमाओं या नाम में परिवर्तन हो जाए वहां ऐसे संशोधन कर सकेगा जो ऐसे आदेश को अद्यतन करने के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हों ।

(2) किसी सभा निर्वाचन-क्षेत्र के संबंध में इस धारा के अधीन प्रत्येक अधिसूचना, निकाले जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, यथास्थिति, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की विधान सभा, धारा 13 में निर्दिष्ट अनंतिम विधान सभा या गोवा राज्य की विधान सभा के समक्ष रखी जाएगी ।

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भाग 4

उच्च न्यायालय

20. महाराष्ट्र, गोवा, दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव के लिए एक ही उच्च न्यायालय-(1) नियत दिन से ही,-

                (क) महाराष्ट्र और गोवा राज्यों तथा दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्रों के लिए एक ही उच्च न्यायालय होगा जिसका नाम मुंबई उच्च न्यायालय होगा (जिसे इसमें इसके पश्चात् सामान्य उच्च न्यायालय कहा गया है) ;

                (ख) मुंबई उच्च न्यायालय के (जिसे इसमें इसके पश्चात् विद्यमान उच्च न्यायालय कहा गया है) वे न्यायाधीश जो उस दिन के ठीक पूर्व पद धारण कर रहे थे, जब तक कि वे अन्यथा चयन न करें, उस दिन से सामान्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश हो जाएंगे ।

(2) सामान्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के वेतनों और भत्तों की बाबत व्यय महाराष्ट्र और गोवा राज्यों तथा संघ के बीच ऐसे अनुपात में आबंटित किया जाएगा जो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, अवधारित करे ।

(3) नियत दिन से ही, सामान्य उच्च न्यायालय को उन राज्यक्षेत्रों के संबंध में, जो महाराष्ट्र और गोवा राज्यों तथा दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्रों में समाविष्ट हैं, ऐसी सभी अधिकारिता, शक्तियां और प्राधिकार होगा, जैसा नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि के अधीन उन राज्यक्षेत्रों की बाबत मुंबई उच्च न्यायालय द्वारा प्रयोक्तव्य हैं ।

21. अधिवक्ताओं के बारे में उपबंध-(1) नियत दिन से ही,-

(क) अधिवक्ता अधिनियम, 1961 (1961 का 25) की धारा 3 की उपधारा (1) के खंड (गगग) के स्थान पर निम्नलिखित खंड रखा जाएगा, अर्थात् :-

(गगग) महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के लिए और दादरा और नागर हवेली तथा दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्रों के लिए महाराष्ट्र और गोवा विधिज्ञ परिषद् के नाम से ज्ञात एक विधिज्ञ परिषद् होगी ; " ;

(ख) महाराष्ट्र विधिज्ञ परिषद्, महाराष्ट्र और गोवा विधिज्ञ परिषद् समझी जाएगी और गोवा राज्य का महाधिवक्ता उसमें पदेन सदस्य होगा ।

                (2) कोई व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व अधिवक्ता है और विद्यमान उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने का हकदार है, सामान्य उच्च न्यायालय में अधिवक्ता के रूप में विधि व्यवसाय करने का हकदार होगा ।

                (3) सभी व्यक्ति जो नियत दिन के ठीक पूर्व महाराष्ट्र विधिज्ञ परिषद् की नामावली के अधिवक्ता हैं, उसी दिन से महाराष्ट्र और गोवा विधिज्ञ परिषद् की नामावली के अधिवक्ता हो जाएंगे ।

                (4) सामान्य उच्च न्यायालय में सुनवाई का अधिकार वैसे ही सिद्धांतों के अनुसार विनियमित किया जाएगा जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान उच्च न्यायालय में सुनवाई की बाबत प्रवृत्त हैं :

                परन्तु महाराष्ट्र और गोवा राज्यों के महाधिवक्ताओं के बीच सुनवाई का अधिकार अधिवक्ता के रूप में उनके नामांकन की तारीखों के प्रति निर्देश से अवधारित किया जाएगा ।

22. सामान्य उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया-इस भाग के उपबंधों के अधीन रहते हुए, विद्यमान उच्च न्यायालय में पद्धति और प्रक्रिया की बाबत नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरणों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।

23. सामान्य उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा-विद्यमान उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा के संबंध में नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरणों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय की मुद्रा की अभिरक्षा के संबंध में लागू होगी ।

24. रिटों और अन्य आदेशिकाओं का प्ररूप-विद्यमान उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों तथा अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप की बाबत नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि आवश्यक उपांतरणों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त की जाने वाली, जारी की जाने वाली या दी जाने वाली रिटों तथा अन्य आदेशिकाओं के प्ररूप के संबंध में लागू होगी ।

25. न्यायाधीशों की शक्तियां-विद्यमान उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति एकल न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों की शक्तियों के संबंध में तथा उन शक्तियों के प्रयोग के आनुषंगिक सभी विषयों के संबंध में, नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरणों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।

26. सामान्य उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान और बैठकों के अन्य स्थान-(1) सामान्य उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान उसी स्थान पर होगा जिस पर विद्यमान उच्च न्यायालय का मुख्य स्थान नियत दिन के ठीक पूर्व अवस्थित है ।

(2) राष्ट्रपति, अधिसूचित आदेश द्वारा, ऐसे राज्यक्षेत्रों के भीतर जिन पर उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार है, उच्च न्यायालय के मुख्य स्थान से भिन्न एक या अधिक स्थानों पर सामान्य उच्च न्यायालय के स्थायी न्यायपीठ या न्यायपीठों की स्थापना के लिए और उससे संबंधित विषयों के लिए उपबंध कर सकेगा :

परन्तु इस उपधारा के अधीन कोई आदेश निकालने के पूर्व राष्ट्रपति सामान्य उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायमूर्ति और उस राज्य के राज्यपाल से परामर्श करेगा जिसमें न्यायपीठ या न्यायपीठों को स्थापित करने का प्रस्ताव है ।

(3) उपधारा (1) या उपधारा (2) में किसी बात के होते हुए भी, सामान्य उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और खंड न्यायालय, उन राज्यक्षेत्रों के भीतर जिन पर उस उच्च न्यायालय की अधिकारिता का विस्तार है, ऐसे अन्य स्थान या स्थानों पर बैठक कर सकेंगे जो मुख्य न्यायमूर्ति संबद्ध राज्य के राज्यपाल या संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासक के अनुमोदन से नियत करे ।

27. उच्चतम न्यायालय को अपीलों के बारे में प्रक्रिया-विद्यमान उच्च न्यायालय तथा उसके न्यायाधीशों और खंड न्यायालयों से उच्चतम न्यायालय को अपीलों के संबंध में नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त विधि, आवश्यक उपांतरणों सहित, सामान्य उच्च न्यायालय के संबंध में लागू होगी ।

28. कार्यवाहियों का सामान्य उच्च न्यायालय को अंतरण-(1) विद्यमान उच्च न्यायालय में नियत दिन के ठीक पूर्व लंबित सभी कार्यवाहियां ऐसे दिन से सामान्य उच्च न्यायालय को अंतरित हो जाएंगी ।

(2) उपधारा (1) के अधीन अंतरित प्रत्येक कार्यवाही सामान्य उच्च न्यायालय द्वारा इस प्रकार निपटाई जाएगी मानो ऐसी कार्यवाही उस उच्च न्यायालय द्वारा ग्रहण की गई थी ।

29. निर्वचन, आदि-(1) धारा 28 के प्रयोजनों के लिए, -

(क) किसी न्यायालय में कार्यवाहियां तब तक लंबित समझी जाएंगी जब तक वह न्यायालय उसके पक्षकारों के बीच सभी विवाद्यकों का, जिनके अंतर्गत कार्यवाहियों के खर्चे के कराधान की बाबत कोई विवाद्यक भी है, निपटारा नहीं करता है और उसके अंतर्गत अपीलें, उच्चतम न्यायालय को अपील के लिए इजाजत के लिए आवेदन, पुनर्विलोकन के लिए आवेदन, पुनरीक्षण के लिए अर्जियां और रिटों के लिए अर्जियां भी हैं ; और

(ख) किसी उच्च न्यायालय के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उनके अंतर्गत उसके किसी न्यायाधीश या खंड न्यायालय के प्रति निर्देश हैं ; और किसी न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा किए गए किसी आदेश के प्रति निर्देशों का अर्थ यह लगाया जाएगा कि उनके अंतर्गत उस न्यायालय या न्यायाधीश द्वारा किए गए दंडादेश, निर्णय या पारित डिक्री के प्रति निर्देश भी हैं ।

(2) किसी ऐसे व्यक्ति को, जो नियत दिन के ठीक पूर्व अधिवक्ता है और जो विद्यमान उच्च न्यायालय में विधि व्यवसाय करने का हकदार है और उस उच्च न्यायालय से सामान्य उच्च न्यायालय की धारा 28 के अधीन अंतरित किन्हीं कार्यवाहियों में उपस्थित होने या कार्य करने के लिए प्राधिकृत था, उन कार्यवाहियों के संबंध में सामान्य उच्च न्यायालय में, यथास्थिति, उपस्थित होने या कार्य करने का अधिकार होगा ।

30. व्यावृत्ति-इस भाग की कोई बात संविधान के किन्हीं उपबंधों के सामान्य उच्च न्यायालय को लागू होने पर प्रभाव नहीं डालेगी और इस भाग का प्रभाव किसी ऐसे उपबंध के अधीन रहते हुए होगा, जो नियत दिन को या उसके पश्चात् उस उच्च न्यायालय की बाबत किसी विधान-मंडल या ऐसे उपबंध करने के लिए शक्ति रखने वाले किसी अन्य प्राधिकारी द्वारा किया जाए ।

 

भाग 5

व्यय का प्राधिकृत किया जाना और राजस्व का वितरण

31. व्यय का विधान-मंडल द्वारा उसकी मंजूरी के लंबित रहने तक प्राधिकृत किया जाना-(1) राष्ट्रपति, नियत दिन के पूर्व किसी भी समय, गोवा राज्य की संचित निधि में से ऐसा व्यय, आदेश द्वारा, प्राधिकृत कर सकेगा जो वह गोवा राज्य की विधान सभा द्वारा ऐसे व्यय की मंजूरी के लंबित रहने तक नियत दिन को प्रारंभ होने वाली छह मास से अनधिक की अवधि के लिए आवश्यक समझे:

परंतु गोवा का राज्यपाल, नियत दिन के पश्चात्, किसी अवधि के लिए जो छह मास की उक्त अवधि के परे की नहीं होगी, गोवा राज्य की संचित निधि में से ऐसा अतिरिक्त व्यय, आदेश द्वारा, प्राधिकृत कर सकेगा जो वह आवश्यक समझे ।

(2) यथास्थिति, राष्ट्रपति या गोवा का राज्यपाल विभिन्न वित्तीय वर्षों के अंतर्गत आने वाली अवधियों की बाबत उपधारा (1) के अधीन पृथक् आदेश करेगा ।

(3) राष्ट्रपति, नियत दिन के पूर्व या पश्चात् किसी भी समय, भारत की संचित निधि में से ऐसा व्यय, आदेश द्वारा, प्राधिकृत कर सकेगा जो वह दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के क्रियाकलाप के प्रशासन के लिए संसद् द्वारा ऐसे व्यय की मंजूरी लंबित रहने तक, नियत दिन को प्रारंभ होने वाली छह मास से अनधिक की अवधि के लिए आवश्यक समझे ।

32. विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं से संबंधित रिपोर्ट-(1) नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के लेखाओं के संबंध में संघ राज्यक्षेत्र शासन अधिनियम, 1963 (1963 का 20) की धारा 49 में निर्दिष्ट भारत के नियंत्रक-महालेखापरीक्षक की रिपोर्टें गोवा के राज्यपाल और राष्ट्रपति को प्रस्तुत की जाएंगी जो उन्हें, यथास्थिति, राज्य की विधान सभा या लोक सभा के समक्ष रखवाएगा ।

(2) राज्यपाल, आदेश द्वारा, -

(क) वित्तीय वर्ष 1987-88 के दौरान नियत दिन के पूर्व की किसी अवधि की बाबत किसी सेवा पर विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र की संचित निधि में से या किसी पूर्वतर वित्तीय वर्ष की बाबत उस सेवा के लिए अनुदत्त रकम से अधिक और उपधारा (1) में निर्दिष्ट रिपोर्ट में यथाप्रकटित उस वर्ष के लिए उपगत कोई व्यय, सम्यक् रूप से प्राधिकृत किया गया घोषित कर सकेगा, और

                (ख) उक्त रिपोर्टों से उद्भूत होने वाली किसी बात पर की जाने वाली किसी कार्रवाई के लिए उपबंध कर सकेगा ।

33. राजस्व का वितरण-राष्ट्रपति, गोवा राज्य के राजस्व के सहायता अनुदान और उस राज्य का संघ के उत्पाद-शुल्क, संपदा शुल्क और आय पर करों में अंश, आदेश द्वारा, अवधारित करेगा और उस प्रयोजन के लिए उसके द्वारा अतिरिक्त उत्पाद-शुल्क (विशेष महत्व का माल) अधिनियम, 1957 (1957 का 58), संघ उत्पाद-शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1979 (1979 का 24), संपदा शुल्क (वितरण) अधिनियम, 1962 (1962 का 9) और संविधान (राजस्व वितरण) आदेश, 1985 के सुसंगत उपबंधों का ऐसी रीति से संशोधन करेगा जो वह ठीक समझे ।

भाग 6

आस्तियां और दायित्व

34. परिभाषा-इस भाग में संघ के प्रयोजन" से सरकार के वे प्रयोजन अभिप्रेत हैं जो संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची 1 में उल्लिखित विषयों में से किसी से संबंधित हैं ।

35. भूमि और माल-(1) इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के शासन के प्रयोजनों के लिए संघ द्वारा नियत दिन के ठीक पूर्व धारित सभी भूमि तथा सभी सामान, वस्तुएं और अन्य माल, यदि ऐसी भूमि, सामान, वस्तुएं या माल विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के दमण और दीव जिलों में स्थित नहीं हैं या संघ के प्रयोजनों के लिए धारित नहीं हैं तो, उस दिन से ही गोवा राज्य को संक्रांत हो जाएंगे:

परन्तु जहां केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि किसी माल या किसी वर्ग के माल का वितरण माल के अवस्थान के अनुसार न होकर अन्यथा होना चाहिए वहां केन्द्रीय सरकार ऐसे माल के न्यायसंगत और साम्यापूर्ण वितरण के लिए ऐसे निदेश दे सकेगी जो वह ठीक समझे ।

(2) विनिर्दिष्ट प्रयोजनों के लिए, जैसे कि विशिष्ट संस्थाओं, कर्मशालाओं या उपक्रमों में या सन्निर्माणाधीन विशिष्ट संक्रमों पर प्रयोग या उपयोग के लिए रखे हुए सामान संघ द्वारा रखे जाएंगे, यदि ऐसी संस्था, कर्मशाला, उपक्रम या संकर्म विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के दमण और दीव जिलों में स्थित है ।

(3) इस धारा में, भूमि" शब्द के अंतर्गत प्रत्येक प्रकार की स्थावर संपत्ति तथा ऐसी संपत्ति में या उस पर कोई अधिकार है ।

36. नकद अतिशेष-विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के सभी खजानों, भारतीय रिजर्व बैंक, भारतीय स्टेट बैंक और किसी अन्य राष्ट्रीयकृत बैंक में नियत दिन के ठीक पूर्व कुल नकद अतिशेष को गोवा राज्य और संघ के बीच जनसंख्या के अनुपात में विभाजित किया जाएगा:

परंतु ऐसे विभाजन के प्रयोजनों के लिए किसी खजाने से किसी अन्य खजाने को नकद अतिशेष का अंतरण नहीं किया जाएगा और प्रभाजन भारतीय रिजर्व बैंक की बहियों में अतिशेष का समायोजन करके किया जाएगा ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में अतिशेष" के अंतर्गत नामे अतिशेष हैं ।

37. करों की बकाया-(1) विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में स्थित किसी संपत्ति पर किसी कर या शुल्क की बकाया (जिसके अंतर्गत भू-राजस्व की बकाया भी है) को वसूल करने का अधिकार गोवा राज्य का होगा ।

(2) उपधारा (1) में विनिर्दिष्ट कर या शुल्क से भिन्न किसी कर या शुल्क की बकाया को वसूल करने का अधिकार गोवा राज्य का होगा, यदि उस कर या शुल्क के निर्धारण का स्थान विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में सम्मिलित है ।

38. उधार और अग्रिमों को वसूल करने का अधिकार-संघ द्वारा विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में किसी स्थानीय निकाय, सोसाइटी, कृषक या अन्य व्यक्ति को नियत दिन के पूर्व दिए गए उधार या अग्रिम को वसूल करने का अधिकार गोवा राज्य का होगा:

परन्तु प्रशासक द्वारा किसी सरकारी सेवक को नियत दिन के पूर्व दिए गए उधार या वेतन तथा यात्रा भत्ते की अग्रिम को वसूल करने का अधिकार गोवा राज्य को संक्रांत हो जाएगा, यदि ऐसा सरकारी सेवक उस राज्य को आबंटित किया जाता है ।

39. कतिपय निगमित निकायों में विनिधान और उनको उधार, आदि-जहां किसी केन्द्रीय अधिनियम या राज्य अधिनियम के अधीन विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए गठित कोई निगमित निकाय, भाग 2 के उपबंधों के आधार पर, अंतरराज्यिक निगमित निकाय हो गया है वहां, संघ द्वारा नियत दिन से पूर्व ऐसे किसी निकाय में किया गया विनिधान या उसे दिए गए उधारों या अग्रिमों का गोवा राज्य और संघ के बीच विभाजन ऐसी रीति से किया जाएगा जो नियत दिन से एक वर्ष की समाप्ति से पूर्व उनके बीच करार पाई जाए या ऐसे करार के अभाव में ऐसी रीति से किया जाएगा जो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निदेश करे ।

40. राज्य उपक्रमों की आस्तियां और दायित्व-विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के किसी वाणिज्यिक उपक्रम से संबंधित आस्तियां और दायित्व, -

                (क) यदि ऐसा उपक्रम विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में स्थित है तो गोवा राज्य को संक्रांत हो जाएंगे,

                (ख) यदि ऐसा उपक्रम विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले और साथ ही दमण और दीव जिलों में स्थित है तो ऐसी रीति से विभाजित किए जाएंगे जो गोवा राज्य और संघ के बीच नियत दिन से एक वर्ष की समाप्ति से पूर्व करार पाई जाए या ऐसे करार के अभाव में ऐसी रीति से किए जाएंगे जो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निदेश करे ।

41. आधिक्य में वसूल किए गए करों का प्रतिदाय-संघ का, -

(क) संपत्ति पर आधिक्य में वसूल किए गए किसी कर या शुल्क के जिसके अंतर्गत भू-राजस्व भी है, प्रतिदाय करने का दायित्व गोवा राज्य का होगा, यदि ऐसी संपत्ति विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में स्थित है;

(ख) आधिक्य में वसूल किए गए किसी अन्य कर या शुल्क के प्रतिदाय करने का दायित्व गोवा राज्य का होगा, यदि उस कर या शुल्क के निर्धारण का स्थान विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में सम्मिलित है ।

42. कतिपय निक्षेप-किसी सिविल निक्षेप या स्थानीय निधि की बाबत संघ का दायित्व, नियत दिन से ही, गोवा राज्य का दायित्व होगा, यदि निक्षेप विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में किया गया है ।

43. भविष्य-निधि-(1) विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संबंध में नियोजित और नियत दिन को सेवा में होने वाले सरकारी सेवक के भविष्य निधि खाते की बाबत संघ का दायित्व, नियत दिन से ही, गोवा राज्य का दायित्व होगा, यदि वह सरकारी सेवक स्थायी रूप से उस राज्य को आबंटित किया जाता है ।

(2) किसी ऐसे सरकारी सेवक के जो विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के प्रशासन के संबंध में नियोजित था और जो नियत दिन से पूर्व सेवानिवृत्त हो गया है, भविष्य निधि खाते की बाबत संघ का दायित्व प्रथमतः गोवा राज्य का दायित्व होगा तथा गोवा राज्य और संघ के बीच उसका समायोजन जनसंख्या के अनुपात के अनुसार किया जाएगा ।

44. प्रशासक द्वारा मंजूर की गई पेंशनें, आदि-(1) उपधारा (4) में उल्लिखित समायोजनों के अधीन रहते हुए, गोवा राज्य, प्रशासक द्वारा नियत दिन के पूर्व मंजूर की गई पेंशनों की बाबत, पेंशनों का संदाय विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले के खजानों से निकाल कर करेगा ।

(2) उपधारा (4) में उल्लिखित समायोजनों के अधीन रहते हुए, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के कार्यों के संबंध में नियोजित ऐसे सरकारी सेवकों की पेंशनों की बाबत दायित्व जो नियत दिन के पूर्व सेवानिवृत्त हो जाते हैं या सेवानिवृत्ति पूर्व छुट्टी पर चले जाते हैं, किंतु जिनके पेंशनों के दावे उस दिन के ठीक पूर्व बकाया हैं, गोवा राज्य का दायित्व होगा ।

(3) नियत दिन के पूर्व प्रशासक द्वारा मंजूर की गई और विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के बाहर किसी खजाने से निकाली गई पेंशनों की बाबत संघ का दायित्व उपधारा (4) के अनुसार किए जाने वाले समायोजनों के अधीन रहते हुए उसी प्रकार गोवा राज्य का दायित्व होगा मानो ऐसी पेंशनें उपधारा (1) में निर्दिष्ट खजानों से निकाली गई थीं ।

(4) नियत दिन को प्रारंभ होने और 31 मार्च, 1988 को समाप्त होने वाली अवधि की बाबत और प्रत्येक पश्चात्वर्ती वित्तीय वर्ष की बाबत उपधारा (1) और उपधारा (2) में निर्दिष्ट पेंशनों की बाबत गोवा राज्य द्वारा किए गए कुल संदाय, गोवा राज्य और संघ के बीच जनसंख्या के अनुपात में प्रभाजित किए जाएंगे ।

(5) विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के कार्यों के संबंध में नियत दिन के ठीक पूर्व नियोजित और नियत दिन को या उसके पश्चात् सेवानिवृत्त होने वाले किसी सरकारी सेवक की पेंशन की बाबत दायित्व, यथास्थिति, गोवा राज्य या संघ का होगा किंतु नियत दिन के पूर्व किसी ऐसे सरकारी सेवक की सेवा की अवधि की बाबत पेंशन का भाग, गोवा राज्य और संघ के बीच जनसंख्या के अनुपात में प्रभाजित किया जाएगा ।

(6) इस धारा में पेंशन के प्रति किसी निर्देश का अर्थ यह लगाया जाएगा कि इसके अंतर्गत पेंशन के संराशीकृत मूल्य के प्रति निर्देश भी है । 

45. संविदाएं-(1) जहां संघ ने अपनी कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के किन्हीं प्रयोजनों के लिए कोई संविदा नियत दिन से पूर्व की हो, वहां वह संविदा-

(क) यदि संविदा के प्रयोजन, नियत दिन से ही, अनन्यतः उस राज्य के प्रयोजन हों तो गोवा राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में; और

(ख) यदि संविदा के प्रयोजन, उसी दिन से ही, अनन्यतः विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के दमण और दीव जिलों में किसी क्षेत्र के प्रयोजन में हों तो गोवा राज्य की कार्यपालिका शक्ति के प्रयोग में,

की गई समझी जाएगी और वे सब अधिकार और दायित्व जो किसी ऐसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हों या हो सकते हों, उस सीमा तक, गोवा राज्य के अधिकार या दायित्व होंगे, जिस तक वे संघ के अधिकार या दायित्व होते:

                परंतु खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रकार की दशा में, इस उपधारा द्वारा किए गए अधिकारों और दायित्वों का प्रारंभिक आबंटन ऐसे वित्तीय समायोजनों के अधीन होगा जो गोवा राज्य और संघ के बीच करार पाया जाए या, ऐसे करार के अभाव में, जो केंद्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निदेश करे ।

                (2) इस धारा के प्रयोजनों के लिए, यह समझा जाएगा कि ऐसे दायित्वों के अंतर्गत जो किसी संविदा के अधीन प्रोद्भूत हुए हों या हो सकते हों, निम्नलिखित हैं: -

(क) संविदा से संबंधित कार्यवाहियों में किसी न्यायालय या किसी अन्य अधिकरण द्वारा किए गए आदेश या अधिनिर्णय की तुष्टि करने का कोई दायित्व; और

                                (ख) ऐसी किन्हीं कार्यवाहियों में या उनके संबंध में उपगत व्ययों की बाबत कोई दायित्व ।

                (3) यह धारा, उधारों, प्रत्याभूतियों और अन्य वित्तीय बाध्यताओं की बाबत दायित्वों के प्रभाजन से संबंधित इस भाग के अन्य उपबंधों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी ।

46. अनुयोज्य दोष की बाबत दायित्व-जहां नियत दिन से ठीक पूर्व संघ पर संविदा भंग से भिन्न किसी अनुयोज्य दोष की बाबत विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के शासन के संबंध में कोई दायित्व है, वहां वह दायित्व-

(क) यदि वाद हेतुक पूर्णतया विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले के भीतर पैदा हुआ हो तो गोवा राज्य का दायित्व होगा; और

(ख) किसी अन्य दशा में, प्रथमतः गोवा राज्य का दायित्व होगा, किंतु यह ऐसे वित्तीय समायोजनों के अधीन होगा जो गोवा राज्य और संघ के बीच करार पाया जाए या, ऐसे करार के अभाव में जो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निदेश करे ।

47. सहकारी सोसाइटियों का प्रत्याभूतिदाता के रूप में दायित्व-जहां नियत दिन के ठीक पूर्व, संघ पर, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के शासन के संबंध में किसी रजिस्ट्रीकृत सहकारी सोसाइटी या अन्य व्यक्ति के किसी दायित्व के बारे में प्रत्याभूतिदाता के रूप में दायित्व हो, वहां संघ का दायित्व-

(क) यदि उस सोसाइटी या व्यक्ति का कार्यक्षेत्र विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में राज्यक्षेत्रों तक सीमित हो तो, गोवा राज्य का दायित्व होगा, और

(ख) यदि उस सोसाइटी या व्यक्ति का कार्यक्षेत्र संपूर्ण विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र तक हो तो, गोवा राज्य का दायित्व होगा:

परन्तु खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रकार की दशा में, इस धारा के अधीन दायित्वों का प्रारंभिक आबंटन ऐसे वित्तीय समायोजनों के अधीन रहते हुए होगा जो गोवा राज्य और संघ के बीच करार पाया जाए या, ऐसे करार के अभाव में, जो केन्द्रीय सरकार, आदेश द्वारा, निदेश करे ।

48. उचंत मद-यदि कोई उचंत मद अंततः इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में से किसी में निर्दिष्ट प्रकार की आस्ति या दायित्व पर प्रभाव डालने वाली पाई जाए तो उसके संबंध में उस उपबंध के अनुसार कार्यवाही की जाएगी ।

49. अवशिष्टीय उपबंध-संघ की ऐसी आस्तियों या दायित्वों का, जो विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के शासन के संबंध में है और जिनके बारे में इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में व्यवस्था नहीं की गई है, फायदा या भार दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के शासन के प्रयोजनों के लिए संघ द्वारा प्रतिधारित कर लिए जाएंगे ।

50. आस्तियों या दायित्वों का करार द्वारा प्रभाजन-जहां गोवा राज्य और संघ यह करार करें कि किसी विशिष्ट आस्ति या दायित्व के फायदे या भार का उनके बीच प्रभाजन ऐसी रीति से किया जाना चाहिए जो उससे भिन्न है जो इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों में दी गई है वहां उन उपबंधों में किसी बात के होते हुए भी, उस आस्ति या दायित्व के फायदे या भार का प्रभाजन उस रीति से किया जाएगा जो करार पाई जाए ।

51. केन्द्रीय सरकार की कुछ मामलों में आबंटन या समायोजन के लिए आदेश देने की शक्ति-जहां संघ इस भाग के उपबंधों में से किसी के आधार पर किसी संपत्ति का हकदार हो जाता है, या कोई फायदा प्राप्त कर लेता है या गोवा राज्य किसी दायित्व के अधीन हो जाता है और नियत दिन से तीन वर्ष की अवधि के भीतर गोवा राज्य द्वारा निर्देश किए जाने पर केन्द्रीय सरकार की यह राय है कि यह न्यायसंगत तथा साम्यापूर्ण है कि वह संपत्ति या वे फायदे गोवा राज्य को अंतरित किए जाने चाहिएं या उसमें से उसे अंश मिलना चाहिए या उस दायित्व मद्धे संघ द्वारा अभिदाय किया जाना चाहिए वहां उस संपत्ति या फायदों का आबंटन ऐसी रीति से किया जाएगा या संघ उसकी बाबत गोवा राज्य को ऐसा अभिदाय करेगा जो केन्द्रीय सरकार गोवा की सरकार से परामर्श के पश्चात्, आदेश द्वारा, अवधारित करे ।

भाग 7

व्यवस्थाओं, निगमों और अन्तरराज्य करारों के बारे में उपबंध

52. कुछ व्यवस्थाओं का बना रहना-जहां विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के दमण और दीव जिलों में किसी क्षेत्र के लिए विद्युत शक्ति के प्रदाय अथवा जल के प्रदाय के बारे में या गोवा राज्य में भाग 2 के उपबंधों द्वारा सम्मिलित किसी क्षेत्र से ऐसे प्रदाय के लिए किसी परियोजना के निष्पादन के बारे में कोई व्यवस्था विद्यमान है वहां ऐसी व्यवस्था तब तक बनी रहेगी जब तक कि वह ऐसे निबंधनों और शर्तों के अनुसार, जो नियत दिन से एक वर्ष की अवधि के भीतर गोवा राज्य की सरकार और संघ द्वारा परस्पर करार पाई जाए, परस्पर करार द्वारा समाप्त न कर दी जाए और जहां कोई ऐसा करार ऐसी अवधि के भीतर न हो पाए वहां केन्द्रीय सरकार, राज्य सरकार या संबंधित प्राधिकारी को पूर्व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए, यावत्साध्य, ऐसे निदेश दे सकेगी, जो वह ठीक समझे ।

53. सहकारी बैंकों के बारे में उपबंध-बैंककारी विनियमन अधिनियम, 1949 (1949 का 10) की धारा 22 में किसी बात के होते हुए भी, जहां भाग 2 के उपबंधों के आधार पर नियत दिन को या उसके तीन मास के भीतर गोवा राज्य या दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र में कोई नया सहकारी बैंक बनाया जाए, वहां वह उस धारा के अधीन भारतीय रिजर्व बैंक से अनुज्ञप्ति प्राप्त किए बिना बैंककारी कारबार शुरू कर सकेगा और तब तक चला सकेगा जब तक कि ऐसी अनुज्ञप्ति न दे दी गई हो या भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा उसे यह इत्तिला नहीं दे दी गई हो कि उसे ऐसी अनुज्ञप्ति नहीं दी जा सकती :

परंतु यह तब जब ऐसा बैंक भारतीय रिजर्व बैंक से ऐसी अनुज्ञप्ति के लिए आवेदन बैंक के बनाए जाने की तारीख से तीन मास की अवधि के भीतर करे ।

54. कानूनी निगमों के बारे में साधारण उपबंध-(1) जहां विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र या उसके किसी भाग के लिए केन्द्रीय अधिनियम, राज्य अधिनियम या प्रांतीय अधिनियम के अधीन गठित कोई निगमित निकाय भाग 2 के उपबंधों के आधार पर अंतरराज्यिक निगमित निकाय हो गया है वहां वह निगमित निकाय, नियत दिन से ही, जब तक उस निगमित निकाय के बारे में विधि द्वारा अन्य उपबंध न किया जाए, उन क्षेत्रों में जिनकी बाबत वह नियत दिन के ठीक पूर्व कार्य कर रहा था, ऐसे निदेशों के अधीन रहते हुए, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा समय-समय पर दिए जाएं, कार्य करता रहेगा ।

(2) ऐसे किसी निगमित निकाय की बाबत उपधारा (1) के अधीन केन्द्रीय सरकार द्वारा दिए गए किसी निदेश के अंतर्गत ऐसा निदेश भी हो सकेगा कि कोई ऐसी विधि, जिसके द्वारा उक्त निकाय शासित होता है, उस निगमित निकाय को लागू होने में ऐसे अपवादों और उपांतरों के अधीन रहते हुए प्रभावी होगी जो उस निदेश में विनिर्दिष्ट किए जाएं ।

55. कुछ विद्यमान सड़क परिवहन परमिटों के बने रहने के बारे में अस्थायी उपबंध-(1) मोटर यान अधिनियम, 1939 (1939 का 4) की धारा 63 में किसी बात के होते हुए भी, विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र में अनुदत्त परमिट, यदि ऐसा परमिट नियत दिन के ठीक पूर्व किसी क्षेत्र में विधिमान्य और प्रभावी था, उस अधिनियम के उपबंधों के अधीन रहते हुए जो तत्समय उस क्षेत्र में प्रवृत्त हो, उस क्षेत्र में 31 मार्च, 1988 तक विधिमान्य तथा प्रभावी बना रहा समझा जाएगा और उस क्षेत्र में उपयोग के लिए उसे विधिमान्य करने के प्रयोजनार्थ ऐसे किसी परमिट का किसी राज्य या प्रादेशिक परिवहन प्राधिकारी द्वारा प्रतिहस्ताक्षरित किया जाना आवश्यक नहीं होगा :

परन्तु केन्द्रीय सरकार, गोवा राज्य की सरकार से परामर्श के पश्चात्, उन शर्तों में, जो परमिट अनुदत्त करने वाले प्राधिकारी द्वारा परमिट से संलग्न की गई हो, परिवर्धन, संशोधन या परिवर्तन कर सकेगी ।

(2) ऐसे किसी परमिट के अधीन गोवा राज्य या दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र में से किसी में चलाने के लिए 31 मार्च, 1988 तक की अवधि के लिए, जिसके अंतर्गत यह तारीख भी है, किसी परिवहन यान की बाबत कोई पथकर, प्रवेश फीस या वैसी ही प्रकृति के अन्य प्रभार उद्गृहीत नहीं किए जाएंगे, यदि उस यान को उस दिन के ठीक पूर्व विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के भीतर चलाने के लिए पथकर, प्रवेश फीस या अन्य प्रभारों के संदाय से छूट प्राप्त हो:

परंतु केन्द्रीय सरकार, गोवा राज्य की सरकार से परामर्श के पश्चात्, यथास्थिति, ऐसे किसी पथकर, प्रवेश फीस या अन्य प्रभारों के उद्ग्रहरण को प्राधिकृत कर सकेगी ।

56. कुछ मामलों में छंटनी प्रतिकर के संबंध में विशेष उपबंध-जहां भाग 2 के उपबंधों के आधार पर, किसी केन्द्रीय अधिनियम, राज्य अधिनियम या प्रांतीय अधिनियम के अधीन गठित कोई निगमित निकाय, सहकारी सोसाइटियों से संबंधित किसी विधि के अधीन रजिस्ट्रीकृत कोई सहकारी सोसाइटी या कोई वाणिज्यिक या औद्योगिक उपक्रम किसी रीति से पुनर्गठित या पुनर्संगठित किया जाता है या किसी अन्य निगमित निकाय, सहकारी सोसाइटी या उपक्रम में समामेलित किया जाता है या विघटित किया जाता है और ऐसे पुनर्गठन, पुनर्संगठन, समामेलन या विघटन के परिणामस्वरूप ऐसे निगमित निकाय या किसी ऐसी सहकारी सोसाइटी या उपक्रम द्वारा नियोजित कोई कर्मकार किसी अन्य निगमित निकाय या किसी अन्य सहकारी सोसाइटी या उपक्रम को अंतरित, या उसके द्वारा उसमें पुनर्नियोजित किया जाता है, वहां औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 25च, धारा 25चच या धारा 25चचच में किसी बात के होते हुए भी ऐसा अंतरण या पुनर्नियोजन उसे उस धारा के अधीन किसी प्रतिकर का हकदार नहीं बनाएगा :

परन्तु यह तब जबकि-

(क) ऐसे अंतरण या पुनर्नियोजन के पश्चात् कर्मकार को लागू होने वाले सेवा के निबंधन और शर्तें अंतरण या पुनर्नियोजन के ठीक पूर्व उसे लागू होने वाले निबंधनों और शर्तों से कम अनुकूल न हों; और

(ख) उस निगमित निकाय, सहकारी सोसाइटी या उपक्रम से, जहां कर्मकार अंतरित या पुनर्नियोजित हो, संबंधित नियोजक करार द्वारा या अन्यथा उस कर्मकार को उसकी छंटनी की दशा में, औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 (1947 का 14) की धारा 25च, धारा 25चच या धारा 25चचच के अधीन प्रतिकर इस आधार पर देने के दायित्वाधीन हो कि उसकी सेवा बनी रही है और वह अंतरण या पुनर्नियोजन से विच्छिन्न नहीं हुई है ।

57. आय-कर के बारे में विशेष उपबंध-जहां इस भाग के उपबंधों के अधीन कारबार करने वाले किसी निगमित निकाय की आस्तियों, अधिकारों और दायित्वों को किन्हीं अन्य निगमित निकायों को अंतरित किया जाता है, जो उस अंतरण के पश्चात् वही कारबार करते हैं, वहां प्रथम वर्णित निगमित निकाय को हुई लाभ या अभिलाभों की ऐसी हानियां, जिन्हें ऐसे अंतरण के अभाव में, आय-कर अधिनियम, 1961 (1961 का 43) के अध्याय 6 के उपबंधों के अनुसार अग्रनीत की जाने या मुजरा की जाने के लिए अनुज्ञात किया जाता, केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त बनाए जाने वाले नियमों के अनुसार अंतरिती निगमित निकायों में प्रभाजित की जाएंगी और ऐसे प्रभाजन पर प्रत्येक अंतरिती निगमित निकाय को आबंटित हानि के अंश के संबंध में कार्यवाही उक्त अधिनियम के अध्याय 6 के उपबंधों के अनुसार की जाएगी, मानो ऐसी हानि स्वयं अंतरिती निगमित निकाय को अपने द्वारा किए गए कारबार में उन वर्षों में हुई हो जिनमें वे हानियां वास्तव में हुई थीं ।

58. कुछ संस्थाओं में विद्यमान सुविधाओं का बना रहना-नियत दिन से ही, गोवा सरकार, गोवा राज्य में स्थित तकनीकी संस्थाओं के संबंध में, दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र में समाविष्ट राज्यक्षेत्रों के निवासी व्यक्तियों को, सुविधाएं देती रहेगी जो किसी भी प्रकार से उनसे कम अनुकूल नहीं होगी, जो उन्हें उसी दिन से ठीक पूर्व दी जा रही थी और ये ऐसे निबंधनों और शर्तों पर होंगी    (जिनके अंतर्गत ऐसी सुविधाओं के प्रबंध के लिए किए जाने वाले किसी अभिदाय या संदाय से संबंधित निबंधन और शर्तें भी हैं)          जो 1 अप्रैल, 1988 के पूर्व गोवा राज्य और संघ के बीच करार पाई जाएं या यदि कोई ऐसा करार उक्त तारीख तक नहीं होता है तो जो केन्द्रीय सरकार के आदेश द्वारा तय की जाएं ।

भाग 8

सेवाओं के बारे में उपबंध

59. अखिल भारतीय सेवाओं के संबंध में उपबंध-(1) इस धारा में, राज्य काडर" पद का, -

                (क) भारतीय प्रशासनिक सेवा के संबंध में वही अर्थ है, जो भारतीय प्रशासनिक सेवा (काडर) नियम, 1954 में है;

                (ख) भारतीय पुलिस सेवा के संबंध में वही अर्थ है, जो भारतीय पुलिस सेवा (काडर) नियम, 1954 में है; और

                (ग) भारतीय वन सेवा के संबंध में वही अर्थ है जो भारतीय वन सेवा (काडर) नियम, 1966 में है ।

(2) गोवा राज्य काडर की सदस्य संख्या और संरचना, नियत दिन से ही, ऐसी होगी जो केन्द्रीय सरकार द्वारा राज्य सरकार के परामर्श से अवधारित की जाए ।

(3) उक्त सेवाओं में से प्रत्येक के ऐसे सदस्य, जो नियत दिन के ठीक पूर्व संघ राज्यक्षेत्रों के काडर में थे, संघ राज्यक्षेत्र की उसी सेवा के काडर में बने रहेंगे जिसमें वे नियत दिन के पूर्व आबंटित किए जाते हैं ।

(4) इस धारा की कोई बात, नियत दिन को या उसके पश्चात्, उक्त सेवाओं के राज्य काडरों के संबंध में और उन सेवाओं के ऐसे सदस्यों के संबंध में जो उक्त काडरों में हैं, अखिल भारतीय सेवा अधिनियम, 1951 (1951 का 61) या उसके अधीन बनाए गए नियमों के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी ।

60. अन्य सेवाओं के संबंध में उपबंध-(1) प्रत्येक व्यक्ति जो विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के गोवा जिले में, नियत दिन के ठीक पूर्व, संघ राज्यक्षेत्र या गोवा राज्य के कार्यकलाप के संबंध में नियोजित है और सेवा कर रहा है, उस दिन से ही, -

                (क) गोवा राज्य के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करता रहेगा, और

                (ख) उक्त राज्य के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने के लिए अंतिम रूप से आबंटित किया गया समझा जाएगा:

                परन्तु खंड (ख) की कोई बात ऐसे व्यक्ति को, जिसको धारा 59 के उपबंध लागू होते हैं या किसी राज्य से प्रतिनियुक्ति पर किसी व्यक्ति को, लागू नहीं होगी ।

(2) नियत दिन के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, केन्द्रीय सरकार, साधारण या विशेष आदेश द्वारा, यह अवधारित करेगी कि क्या उपधारा (1) के खंड (ख) में निर्दिष्ट प्रत्येक व्यक्ति गोवा राज्य में या दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के कार्यकलाप के संबंध में संघ के अधीन सेवा के लिए अंतिम रूप से आबंटित होगा और वह तारीख, जिससे ऐसा आबंटन प्रभावी होगा या प्रभावी हुआ समझा जाएगा, अवधारित करेगी ।

(3) प्रत्येक व्यक्ति को, जो उपधारा (2) के उपबंधों के अधीन अंतिम रूप से गोवा राज्य या संघ को आबंटित किया जाए, यदि वह उनमें या उनके अधीन पहले ही सेवा न कर रहा हो तो उस राज्य में या संघ के अधीन ऐसी तारीख से, जो गोवा राज्य और संघ के बीच करार पाई जाए या ऐसे करार के अभाव में जो केन्द्रीय सरकार अवधारित करे, सेवा के लिए उपलब्ध किया जाएगा ।

(4) केन्द्रीय सरकार द्वारा उपधारा (2) के निबंधनों के अनुसार किसी कर्मचारी को अंतिम रूप से आबंटित करने वाले आदेश पारित करने के पश्चात् यथाशक्यशीघ्र, गोवा राज्य या संघ, ऐसे विशेष या साधारण आदेशों या अनुदेशों के अनुसार, जो केन्द्रीय सरकार द्वारा इस निमित्त समय-समय पर जारी किए जाएं, अपने नियंत्रण के अधीन सेवाओं में उसे एकीकृत करने के उपाय करेगी ।

(5) केन्द्रीय सरकार निम्नलिखित के संबंध में अपनी सहायता के प्रयोजनार्थ आदेश द्वारा एक या अधिक सलाहकार समितियां स्थापित कर सकेगी: -

                (क) गोवा राज्य और संघ के बीच सेवाओं का विभाजन; और

                (ख) इस धारा के उपबंधों द्वारा प्रभावित सभी व्यक्तियों के साथ ऋजु और साम्यापूर्ण व्यवहार सुनिश्चित करना और ऐसे व्यक्तियों द्वारा किए गए किसी अभ्यावेदन पर उचित विचार करना:

परंतु तत्समय प्रवृत्त किसी विधि या नियम में उसके प्रतिकूल किसी बात के होते हुए भी, इस अधिनियम के अधीन सेवाओं के विभाजन और एकीकरण से उद्भूत होने वाले विषयों पर सक्षम प्राधिकारी द्वारा पारित किए गए किसी आदेश के विरुद्ध ऐसे आदेश के प्रकाशन या तामील की तारीख से, जो भी पूर्ववर्ती हो, तीन मास की समाप्ति पर कोई अभ्यावेदन नहीं होगा:

परन्तु यह और कि पूर्ववर्ती परंतुक में किसी बात के होते हुए भी, केन्द्रीय सरकार, स्वप्रेरणा से या अन्यथा और उनके लिए जो कारण हैं उन्हें लेखबद्ध करके, किसी मामले पर पुनः विचार कर सकेगी और उस पर ऐसे आदेश पारित कर सकेगी जो उसे समुचित प्रतीत हों, यदि उसका यह समाधान हो जाता है कि किसी प्रभावित कर्मचारी के संबंध में घोर अन्याय का निवारण करने के लिए ऐसा करना आवश्यक है ।

(6) इस धारा की कोई बात नियत दिन को या उसके पश्चात् गोवा राज्य या संघ के कार्यकलाप के संबंध में सेवा करने वाले व्यक्तियों की सेवा की शर्तों के अवधारण के संबंध में संविधान के भाग 14 के अध्याय 1 के उपबंधों के प्रवर्तन पर प्रभाव डालने वाली नहीं समझी जाएगी:

परंतु उपधारा (1) या उपधारा (2) में निर्दिष्ट किसी व्यक्ति के मामले को नियत दिन के ठीक पूर्व लागू सेवा की शर्तों में केन्द्रीय सरकार के पूर्व अनुमोदन के बिना उसके लिए कोई अलाभकारी परिवर्तन नहीं किया जाएगा ।

(7) विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के कार्यकलाप के संबंध में उपधारा (2) के अधीन आबंटित किसी व्यक्ति द्वारा नियत दिन के पूर्व की गई सभी सेवा, उसकी सेवा की शर्तों की बाबत नियमों के प्रयोजनों के लिए उस राज्य या संघ के जिसको वह अंतिम रूप से आबंटित किया गया है, कार्यकलापों के संबंध में की गई समझी जाएगी ।

(8) उपधारा (1) के खंड (क) से भिन्न इस धारा के उपबंध किसी ऐसे व्यक्ति के संबंध में, जिसे धारा 59 के उपबंध लागू होते हों, लागू नहीं होंगे ।

61. अधिकारियों के उन्हीं पदों पर बने रहने के बारे में उपबंध-प्रत्येक व्यक्ति, जो नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के कार्यकलापों के संबंध में कोई पद या अधिकार-पद धारण कर रहा है या उसके कर्तव्यों का निर्वहन कर रहा है, उसी पद या अधिकार-पद को धारण करता रहेगा और उस दिन से ही, यथास्थिति, गोवा राज्य या संघ की सरकार या उसके अन्य समुचित प्राधिकारी द्वारा नियुक्ति के उन्हीं निबंधनों और शर्तों पर और उसी अवधि के लिए उसी पद या अधिकार-पद पर सम्यक् रूप से नियुक्त किया गया समझा जाएगा :

परन्तु इस धारा की किसी बात से यह नहीं समझा जाएगा कि वह किसी सक्षम प्राधिकारी को नियत दिन को या उसके पश्चात् ऐसे व्यक्ति के संबंध में कोई ऐसा आदेश जो ऐसे पद या अधिकार-पद पर उसके बने रहने को प्रभावित करता हो, पारित करने से निवारित करती है ।

62. केन्द्रीय सरकार की निदेश देने की शक्ति-केन्द्रीय सरकार इस भाग के पूर्वगामी उपबंधों को प्रभावी करने के प्रयोजन के लिए राज्य सरकार को ऐसे निदेश दे सकेगी, जो उसे आवश्यक प्रतीत हों और उक्त सरकार ऐसे निदेशों का पालन करेगी ।

भाग 9

विधिक और प्रकीर्ण उपबंध

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66. विधियों का राज्यक्षेत्रीय विस्तार-भाग 2 के उपबंध उन राज्यक्षेत्रों में कोई परिवर्तन करने वाले नहीं समझे जाएंगे जिन पर नियत दिन के ठीक पूर्व प्रवृत्त कोई विधि विस्तारित है या लागू होती है और विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के प्रति ऐसी किसी विधि में राज्यक्षेत्रीय निर्देशों का, जब तक किसी सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्यथा उपबंध न किया जाए, अर्थ यह लगाया जाएगा कि वे नियत दिन के पूर्व विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र के भीतर के राज्यक्षेत्रों के प्रति निर्देश हैं ।

67. विधियों के अनुकूलन की शक्ति-नियत दिन के पूर्व बनाई गई किसी विधि के गोवा राज्य या दमण और दीव के संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में लागू करने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए, समुचित सरकार, उस दिन से दो वर्ष के भीतर, आदेश द्वारा, ऐसी विधि में निरसन या संशोधन के रूप में ऐसे अनुकूलन और उपांतरण कर सकेगी जो आवश्यक या समीचीन हो और तब ऐसी प्रत्येक विधि इस प्रकार किए गए अनुकूलनों और उपांतरणों के अधीन रहते हुए तब तक प्रभावी रहेगी जब तक उसे सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा परिवर्तित, निरसित या संशोधित नहीं कर दिया जाता है ।

स्पष्टीकरण-इस धारा में, समुचित सरकार" पद से संविधान की सातवीं अनुसूची को संघ सूची में प्रगणित विषयों से संबंधित किसी विधि की बाबत केन्द्रीय सरकार और किसी अन्य विधि की बाबत, -

                (i) गोवा राज्य को लागू होने के संबंध में, राज्य सरकार, और

                (ii) दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र को लागू होने के संबंध में, केन्द्रीय सरकार,

अभिप्रेत है ।

68. विधियों के अर्थान्वयन की शक्ति-इस बात के होते हुए भी कि नियत दिन के पूर्व बनाई गई किसी विधि के अनुकूलन के लिए धारा 67 के अधीन कोई उपबंध नहीं किया गया है या अपर्याप्त उपबंध किया गया है, ऐसी विधि को प्रवृत्त करने के लिए अपेक्षित या सशक्त कोई न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण गोवा राज्य के संबंध में या दमण और दीव संघ राज्यक्षेत्र के संबंध में उसको लागू करने को सुकर बनाने के प्रयोजन के लिए उस विधि का अर्थान्वयन ऐसी रीति से कर सकेगा, जो उसके सार पर प्रभाव न डालती हो और जो, यथास्थिति, ऐसे न्यायालय, अधिकरण या प्राधिकरण के समक्ष किसी विषय के संबंध में आवश्यक या उचित प्रतीत हो ।

69. न्यायालयों, आदि के बने रहने के बारे में उपबंध-नियत दिन के ठीक पूर्व विद्यमान संघ राज्यक्षेत्र में सर्वत्र या उसके किसी भाग में विधिपूर्ण कृत्यों का निर्वहन करने वाले सभी न्यायालय और अधिकरण तथा सभी प्राधिकरण जब तक कि उनका बना रहना इस अधिनियम के उपबंधों से असंगत न हो या जब तक कि सक्षम विधान-मंडल या अन्य सक्षम प्राधिकारी द्वारा अन्य उपबंध नहीं कर दिया जाता है, अपने-अपने कृत्यों का प्रयोग करते रहेंगे ।

70. अन्य विधियों से असंगत अधिनियम के उपबंधों का प्रभाव-इस अधिनियम के उपबंध किसी अन्य विधि में इससे असंगत किसी बात के होते हुए भी प्रभावी होंगे ।

71. कठिनाइयों को दूर करने की शक्ति-(1) यदि इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने में कोई कठिनाई उत्पन्न होती है तो राष्ट्रपति, आदेश द्वारा, ऐसी कोई बात कर सकेगा जो ऐसे उपबंधों से असंगत न हों और जो उस कठिनाई को दूर करने के प्रयोजन के लिए उसे आवश्यक या समीचीन प्रतीत हो:

परन्तु ऐसा कोई आदेश नियत दिन से तीन वर्ष की समाप्ति के पश्चात् नहीं किया जाएगा ।

(2) इस धारा के अधीन किया गया प्रत्येक आदेश संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष रखा जाएगा ।

72. नियम बनाने की शक्ति-(1) केन्द्रीय सरकार, इस अधिनियम के उपबंधों को प्रभावी करने के लिए, अधिसूचना द्वारा, नियम बना सकेगी ।

(2) इस धारा के अधीन बनाया गया प्रत्येक नियम, बनाए जाने के पश्चात् यथाशीघ्र, संसद् के प्रत्येक सदन के समक्ष, जब वह सत्र में हो, कुल तीस दिन की अवधि के लिए रखा जाएगा । यह अवधि एक सत्र में अथवा दो या अधिक आनुक्रमिक सत्रों में पूरी हो सकेगी । यदि उस सत्र के या पूर्वोक्त आनुक्रमिक सत्रों के ठीक बाद के सत्र के अवसान के पूर्व दोनों सदन उस नियम में कोई परिवर्तन करने के लिए सहमत हो जाएं तो तत्पश्चात् वह ऐसे परिवर्तित रूप में ही प्रभावी होगा । यदि उक्त अवसान के पूर्व दोनों सदन सहमत हो जाएं कि वह नियम नहीं बनाया जाना चाहिए तो तत्पश्चात् वह निष्प्रभाव हो जाएगा । किन्तु नियम के ऐसे परिवर्तित या निष्प्रभाव होने से उसके अधीन पहले की गई किसी बात की विधिमान्यता पर प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा ।

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