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वैध विवाह से जन्मे बच्चे की वैधता को चुनौती देने हेतु डीएनए टेस्ट का आदेश नहीं दिया जा सकता; सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया


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05 Jun 2026
Categories: Hindi News

सुप्रीम कोर्ट की न्यायमूर्ति प्रशांत कुमार मिश्रा एवं न्यायमूर्ति विपुल एम. पंचोली की खंडपीठ ने महत्वपूर्ण निर्णय देते हुए कहा है कि भारतीय साक्ष्य अधिनियम की धारा 112 के अंतर्गत प्राप्त वैधता की वैधानिक धारणा को खंडित किए बिना केवल आपराधिक आरोपों की जांच के लिए डीएनए परीक्षण का आदेश नहीं दिया जा सकता। न्यायालय ने मद्रास हाईकोर्ट द्वारा पारित डीएनए प्रोफाइलिंग संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया।

मामले में शिकायतकर्ता महिला ने आरोप लगाया था कि उसके पति अब्दुल लतीफ के उपचार के दौरान डॉक्टर आर. राजेन्द्रन से उसके संबंध स्थापित हुए, जिसके परिणामस्वरूप एक बच्चे का जन्म हुआ। बाद में डॉक्टर द्वारा संबंध सार्वजनिक करने से इनकार करने पर उसने धोखाधड़ी एवं उत्पीड़न की शिकायत दर्ज कराई। जांच के दौरान डीएनए परीक्षण की मांग की गई और मद्रास हाईकोर्ट ने आरोपी डॉक्टर, महिला तथा बच्चे के डीएनए नमूने लेने का निर्देश दिया।

अपीलकर्ता की ओर से तर्क दिया गया कि डीएनए परीक्षण केवल असाधारण परिस्थितियों में ही कराया जा सकता है। धारा 112 साक्ष्य अधिनियम के अनुसार वैध विवाह के दौरान जन्मा बच्चा पति की वैध संतान माना जाता है, जब तक कि पति-पत्नी के बीच “नॉन-एक्सेस” अर्थात सहवास की संभावना न होने का ठोस प्रमाण प्रस्तुत न किया जाए।

सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि शिकायतकर्ता यह सिद्ध करने में पूरी तरह विफल रही कि गर्भधारण की अवधि में उसका अपने पति से कोई संपर्क नहीं था। इसके विपरीत जन्म प्रमाणपत्र, स्कूल अभिलेख एवं अन्य दस्तावेजों में अब्दुल लतीफ को ही बच्चे का पिता दर्शाया गया था। न्यायालय ने कहा कि किसी अन्य व्यक्ति के साथ संबंध होने का आरोप मात्र धारा 112 की वैधानिक धारणा को समाप्त नहीं कर सकता।

पीठ ने गौतम कुंडू, भबानी प्रसाद जेना, इवान रथिनम, के.एस. पुट्टस्वामी और इनायत अली सहित अनेक निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि डीएनए परीक्षण व्यक्ति की निजता, गरिमा एवं शारीरिक स्वायत्तता पर गंभीर अतिक्रमण है। ऐसा आदेश तभी दिया जा सकता है जब उसकी अत्यावश्यक आवश्यकता हो और न्यायिक संतुलन उसके पक्ष में हो।

न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि इस मामले में पितृत्व का प्रश्न धोखाधड़ी और उत्पीड़न के आरोपों के निर्धारण के लिए केवल एक सहायक (collateral) तथ्य था। अतः डीएनए परीक्षण का आदेश न तो आवश्यक था और न ही संवैधानिक रूप से उचित।

फलस्वरूप, सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए मद्रास हाईकोर्ट के डीएनए परीक्षण संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया।

Case Details:
Case: Criminal Appeal No. 1013 of 2021
Bench: Justice Prashant Kumar Mishra and Justice Vipul M. Pancholi
Appellant: R. Rajendran
Respondents: Kamar Nisha & Others



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