इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जेएम फार्मा का टेंडर रद्द करने और भुगतान रोकने के स्वास्थ्य विभाग के आदेश को असांविधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया है। यह आदेश न्यायमूर्ति अजित कुमार और न्यायमूर्ति स्वरूपमा चतुर्वेदी की खंडपीठ ने जेएम फार्मा की याचिका पर दिया है।
कोर्ट ने कहा कि सरकारी विभाग अपनी मर्जी से किसी भी ठेकेदार को ब्लैकलिस्ट कर भुगतान से वंचित नहीं कर सकते। उन्हें कार्यवाही से पहले प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करना अनिवार्य है। याचिका के मुताबिक जेएम फार्मा ने कानपुर नगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी कार्यालय की ओर से डायग्नोस्टिक सामग्री के लिए निकाले गए टेंडर में हिस्सा लिया था। सामान की आपूर्ति के बाद विभाग ने प्राप्ति और स्वीकृति प्रमाण पत्र भी जारी कर दिया।
जब 1.60 करोड़ के भुगतान की बारी आई तो विभाग ने एक आंतरिक जांच बैठा दी और दावा किया कि आपूर्ति की गई सामग्री घटिया है। प्रक्रिया में भ्रष्टाचार हुआ है। इसी आधार पर चार मार्च 2025 को टेंडर रद्द कर दिया गया। सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पाया कि दो अलग-अलग जांच रिपोर्ट थीं। पहली रिपोर्ट में मात्रा सही बताई गई थी, जबकि दूसरी रिपोर्ट में सामान को घटिया बता दिया गया।
विभाग ने सामान को घटिया तो कहा पर इसके समर्थन में कोई भी लैब टेस्टिंग रिपोर्ट पेश नहीं की। कोर्ट ने चार मार्च का आदेश रद्द करते हुए दो सप्ताह के भीतर नए सिरे से स्वतंत्र जांच समिति का गठन करने का आदेश दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस समिति का अध्यक्ष अतिरिक्त सचिव स्तर का अधिकारी होना चाहिए। लेकिन, इसमें उन जिलों के अधिकारी न हों जहां का यह विवाद है।
फर्म को विस्तार से कारण बताओ नोटिस दिया जाए और उसे अपनी बात रखने का पूरा मौका दिया जाए। जब तक नई जांच पूरी नहीं होती, फर्म को भविष्य के टेंडरों में भाग लेने से नहीं रोका जाएगा। कोर्ट ने भारत सरकार के वित्त मंत्रालय के तीन जुलाई 2020 के कार्यालय आदेश का हवाला दिया। भुगतान 10 दिनों के भीतर भुगतान करना अनिवार्य है। यदि देरी होती है तो विभाग को एक प्रतिशत प्रति माह की दर से दंडात्मक ब्याज देना पड़ सकता है।
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