झारखंड हाईकोर्ट ने दुमका के एक भूमि विवाद मामले में फैसला सुनाते हुए निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया है। हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एसके द्विवेदी की कोर्ट ने कहा कि जब रिकॉर्ड ऑफ राइट्स (खतियान) अंतिम रूप से प्रकाशित हो चुका है, तो उसके बाद दायर किया गया मुकदमा कानूनन मान्य नहीं है। हाईकोर्ट ने कहा कि Santhal Pargana Settlement Regulation, 1872 की धारा 24, 25 और 11 के अनुसार रिकॉर्ड ऑफ राइट्स के प्रकाशन के 6 महीने बाद वह अंतिम (conclusive) हो जाता है। उसके बाद बिना नई बंदोबस्ती (fresh settlement) या राज्य सरकार की अनुमति के उसे चुनौती नहीं दी जा सकती।
दरअसल यह मामला दुमका जिले के बारा करैला और गजांदा गांव की जमीन से जुड़ा है। याचिकाकर्ता केदार बैद की माता के नाम पर जमीन का अंतिम रिकॉर्ड (Record of Rights) वर्ष 1998 में प्रकाशित हुआ था। प्रतिवादी (लोबिन मांझी एवं अन्य) ने वर्ष 2006 में एक टाइटल सूट दायर किया। इसमें जमीन पर अपने अधिकार और कब्जा की मांग की गई। जबकि कानून के अनुसार, रिकॉर्ड प्रकाशित होने के 6 महीने के भीतर ही आपत्ति की जा सकती थी।
क्या कहा हाईकोर्ट ने
"हाईकोर्ट ने कहा कि प्रतिवादी ने न तो 6 महीने के भीतर आपत्ति की न ही 1998 के अंतिम प्रकाशन को चुनौती दी। इसलिए 2006 में दायर मुकदमा समय-सीमा से बाहर और कानूनन वर्जित (barred) माना गया। यहां बता दें कि दुमका की सब-जज अदालत ने इस वाद को खारिज करने से इनकार कर दिया था। हाईकोर्ट ने इसे गलत बताते हुए रद्द कर दिया। हाईकोर्ट ने 12।05।2010 के निचली अदालत के आदेश को रद्द (set aside) कर प्रार्थी की याचिका स्वीकार कर ली और इससे संबंधित टाइटल सूट खारिज (plaint rejected) कर दी।
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