Govind Swami (@ Gopi And Others Wrongly ... vs State Of Chhattisgarh

Citation : 2026 Latest Caselaw 106 Chatt
Judgement Date : 26 February, 2026

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Chattisgarh High Court

Govind Swami (@ Gopi And Others Wrongly ... vs State Of Chhattisgarh on 26 February, 2026

                                                                  1/4
                                                      (Cr. M. P. No.-606 of 2026)




                                                                                        2026:CGHC:10084

                                                                                                           अप्रतिवेद्य

                                                    छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर

                                             दाण्डिक प्रकीर्ण याचिका क्रमांक-606/2026



                            गोविंद स्वामी (प्रश्नाधीन आदेश के वाद शीर्षक में 'उर्फ गोपी एवं अन्य' त्रुटिवश अंकित

                             किया गया है) पिता-स्वर्गीय श्री आर०के ० स्वामी, उम्र-लगभग 46 वर्ष, निवासी-

                             एल.आई.जी.-86, कै लाश नगर, हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी, पुलिस थाना-जामुल, जिला-

                             दुर्ग, छत्तीसगढ़ (प्रश्नाधीन आदेश के वाद शीर्षक में 'उक्त पता' भी त्रुटिवश अंकित किया

                             गया है)

                                                                                     -----याचिकाकर्ता/अभियुक्त

                                                                  विरूद्घ

                            छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा ज़िलाधीश, दुर्ग, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़

                                                                                              -----उत्तरवादी/राज्य



                      याचिकाकर्ता/अभियुक्त द्वारा       :    श्री प्रसून अग्रवाल, अधिवक्ता ।

                      उत्तरवादी/राज्य                   :    सुश्री सुनिता मानिकपुरी, शासकीय अधिवक्ता ।



                                        माननीय न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल, न्यायाधीश

                                                       !! आदेश पीठ पर पारित !!

                  26/02/2026


                  1.

उभयपक्ष की सहमति से याचिका पर अंतिम तर्क सुना गया ।



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         2026.02.26
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                              (Cr. M. P. No.-606 of 2026)



2. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 528 के तहत प्रस्तुत इस याचिका में, पुनरीक्षण न्यायालय-प्रथम अपर सत्र न्यायाधीश, दुर्ग, जिला-दुर्ग, छत्तीसगढ़ द्वारा दाण्डिक पुनरीक्षण प्रकरण क्रमांक-08/2026 "गोविंद स्वामी विरूद्घ छत्तीसगढ़ शासन"

में पारित आदेश दिनांक-30/01/2026 को चुनौती दी गई है ।

3. प्रकरण के तथ्य संक्षेप में इस प्रकार हैं कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध विचारण न्यायालय--

न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी, दुर्ग, जिला दुर्ग (छत्तीसगढ़) के समक्ष दाण्डिक प्रकरण क्रमांक 33968/2025, शीर्षक "छत्तीसगढ़ शासन विरुद्ध गोविंद स्वामी उर्फ गोपी एवं अन्य", अंतर्गत धारा 426, 420, 120(ख) सहपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के तहत लंबित है । उक्त प्रकरण में याचिकाकर्ता को इस न्यायालय द्वारा MCRCA No. 1490 of 2024 (Govind Swami v. State of Chhattisgarh) में आदेश दिनांक 20/12/2024 के माध्यम से अग्रिम जमानत प्रदान की गई थी, जिसमें कु छ शर्तें आरोपित की गई थीं; तथापि न तो उसका पासपोर्ट जब्त किया गया था और न ही पासपोर्ट के संबंध में कोई विशिष्ट शर्त निर्धारित की गई थी ।

4. याचिकाकर्ता द्वारा विचारण न्यायालय के समक्ष यह आवेदन प्रस्तुत किया गया कि उसका पासपोर्ट क्रमांक J2800218 की समयावधि दिनांक 08/05/2021 को समाप्त हो चुकी है, अतः उसके नवीनीकरण की अनुमति प्रदान की जाए । उक्त आवेदन पर विचार करते हुए विचारण न्यायालय ने आदेश दिनांक 19/12/2025 के माध्यम से आवेदन इस आधार पर निरस्त कर दिया कि याचिकाकर्ता पर लगभग ₹80,00,000/- की राशि के बेईमानीपूर्वक दुरुपयोग का आरोप है, जो एक गंभीर आर्थिक अपराध की श्रेणी में आता है । विचारण न्यायालय ने यह भी उल्लेख किया कि याचिकाकर्ता द्वारा यह स्पष्ट नहीं किया गया 3/4 (Cr. M. P. No.-606 of 2026) कि वर्तमान में भारत से बाहर जाने की क्या आवश्यकता है । ऐसी स्थिति में यदि उसे विदेश जाने की अनुमति प्रदान की जाती है, तो उसके फ़रार होने की संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता । अतः आवेदन निरस्त कर दिया गया ।

5. विचारण न्यायालय द्वारा पारित उक्त प्रश्नाधीन आदेश को याचिकाकर्ता द्वारा पुनरीक्षण में चुनौती दी गई, किन्तु पुनरीक्षण न्यायालय ने आदेश दिनांक 30/01/2026 के माध्यम से उसका पुनरीक्षण निरस्त कर दिया ।

6. विचारण न्यायालय तथा पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा पारित प्रश्नाधीन आदेशों को चुनौती देते हुए, याचिकाकर्ता के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि अग्रिम जमानत प्रदान करते समय इस न्यायालय द्वारा पासपोर्ट जमा करने अथवा विदेश न जाने संबंधी कोई प्रतिबंध आरोपित नहीं किया था । जिस पासपोर्ट की समयावधि समाप्त हो चुकी है, उसका नवीनीकरण कराना याचिकाकर्ता का अधिकार है । जब याचिकाकर्ता पासपोर्ट के नवीनीकरण हेतु संबंधित प्राधिकरण के समक्ष उपस्थित हुआ, तब उससे लंबित आपराधिक प्रकरण के संबंध में जानकारी मांगी गई । विचाराधीन प्रकरण की जानकारी देने पर उससे विचारण न्यायालय से अनापत्ति प्रमाण-पत्र प्रस्तुत करने हेतु कहा गया, जो अब तक प्रदान नहीं किया गया है । इस प्रकार, विचारण न्यायालय एवं पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा पारित आदेश वैध और उचित नहीं हैं । अतः उक्त आदेशों को अपास्त करते हुए याचिकाकर्ता को पासपोर्ट के नवीनीकरण की अनुमति प्रदान की जाए।

7. उत्तरवादी/राज्य के विद्वान ने याचिका का विरोध करते हुए तर्क दिया है कि विचारण न्यायालय तथा पुनरीक्षण न्यायालय का प्रश्नाधीन आदेश वैध और उचित है । अतः याचिका निरस्त किया जाए ।

4/4

(Cr. M. P. No.-606 of 2026)

8. उल्लेखनीय है कि याचिकाकर्ता के पासपोर्ट की वैधता वर्ष 2021 में समाप्त हो चुकी है । इस स्तर पर यह विचार करना उपयुक्त नहीं होगा कि भविष्य में याचिकाकर्ता को विदेश जाने की आवश्यकता पड़ेगी अथवा नहीं? क्योंकि जब इस न्यायालय द्वारा उसे अग्रिम जमानत प्रदान की गई थी, तब पासपोर्ट के संबंध में कोई शर्त आरोपित नहीं की गई थी । तथापि, याचिकाकर्ता के विरुद्ध ₹80,00,000/- की राशि के बेईमानीपूर्वक दुरुपयोग का आरोप है । ऐसी स्थिति में यह न्यायालय पाती है कि याचिकाकर्ता को कु छ शर्तों के अधीन पासपोर्ट के नवीनीकरण की अनुमति प्रदान किया जाना उपयुक्त होगा ।

9. अतः याचिका प्रारंभिक स्तर पर स्वीकार की जाती है । विचारण न्यायालय तथा पुनरीक्षण न्यायालय द्वारा पारित प्रश्नाधीन आदेशों को अपास्त किया जाता है । याचिकाकर्ता को अपना पासपोर्ट नवीनीकरण कराने की अनुमति इस शर्त के साथ प्रदान की जाती है कि विचारण न्यायालय के समक्ष मामला लंबित रहने की अवधि के दौरान यदि वह भारत से बाहर जाना चाहता है, तो इसके लिए विचारण न्यायालय से पूर्वानुमति प्राप्त करना आवश्यक होगा ।

10. रजिस्ट्री को निर्देशित किया जाता है कि इस आदेश की प्रति यथाशीघ्र विचारण न्यायालय को सूचनार्थ व पालनार्थ प्रेषित की जाए ।

11. उपरोक्तानुसार, इस दाण्डिक प्रकीर्ण याचिका का निराकरण किया जाता है ।

सही/-

(संजय कु मार जायसवाल) न्यायाधीश पोमन