Chattisgarh High Court
Sujit Gupta vs State Of Chhattisgarh on 1 April, 2026
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{Cr. A. No.-1756 of 2025}
2026:CGHC:15022
अप्रतिवेद्य
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय, बिलासपुर
निर्णय सुरक्षित दिनांक-13/03/2026
निर्णय उद्घोषित दिनांक-01/04/2026
दाण्डिक अपील क्रमांक-1756/2025
1.सुजीत गुप्ता पिता-अजय गुप्ता, उम्र-लगभग 21 वर्ष, निवासी-शिकारी रोड, अंबिकापुर, पुलिस थाना-अंबिकापुर, जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़,
2. अजीत गुप्ता पिता-अजय गुप्ता, उम्र-लगभग 21 वर्ष, निवासी-शिकारी रोड, अंबिकापुर, पुलिस थाना-अंबिकापुर, जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़
-----अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण विरूद्घ छत्तीसगढ़ राज्य, द्वारा पुलिस थाना-अंबिकापुर, जिला-सरगुजा, छत्तीसगढ़
-----उत्तरवादी/राज्य अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण द्वारा : श्री एच.एस. अहलूवालिया, अधिवक्ता । उत्तरवादी/राज्य द्वारा : श्री कु लेश साहू, पैनल अधिवक्ता ।
न्यायमूर्ति श्री संजय कु मार जायसवाल !! सी.ए.वी. निर्णय !!
1. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा-415 (2) के तहत प्रस्तुत इस दाण्डिक अपील में विचारण न्यायालय-विशेष न्यायाधीश {अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति Digitally signed by POMAN POMAN DEWANGAN DEWANGAN Date:
2026.04.01 17:25:33 +0530 2 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 के तहत गठित न्यायालय, जिसे आगे संक्षेप में "विशेष अधिनियम" से संबोधित किया जा रहा है}, सरगुजा, अंबिकापुर (छत्तीसगढ़) द्वारा विशेष सत्र (विशेष अधिनियम) प्रकरण क्रमांक 25/2022 "छत्तीसगढ़ राज्य विरुद्ध सुजीत गुप्ता एवं एक अन्य" में पारित निर्णय दिनांक 28/07/2025 को चुनौती दी गई है । जिसके तहत अपीलार्थीगण को निम्नानुसार दोषसिद्ध कर दण्डित किया गया है ।
जिसे आगे संक्षेप में "प्रश्नाधीन निर्णय" से संबोधित किया जा रहा हैः-
अपीलार्थी का नाम दोषसिद्धि दण्डादेश
06 माह का सश्रम कारावास एवं
5,000/-रूपये का अर्थदण्ड तथा
धारा-427/34 भारतीय
अर्थदण्ड राशि अदा न करने की दशा में 01
दण्ड संहिता, 1860
माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास की
सजा ।
सुजीत गुप्ता
01 वर्ष का सश्रम कारावास एवं 5,000/-
धारा-452/34 भारतीय रूपये का अर्थदण्ड तथा अर्थदण्ड राशि अदा एवं दण्ड संहिता, 1860 न करने की दशा में 01 माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास की सजा ।
अजीत गुप्ता
07 वर्ष का सश्रम कारावास एवं
10,000/-रूपये का अर्थदण्ड तथा
धारा-307/34 भारतीय
अर्थदण्ड राशि अदा न करने की दशा में 03
दण्ड संहिता, 1860
माह का अतिरिक्त सश्रम कारावास की
सजा ।
सभी मूल सजाएं साथ-साथ चलेंगी ।
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2. उपरोक्त "प्रश्नाधीन निर्णय" के तहत विचारण न्यायालय द्वारा अपीलार्थीगण को धारा-294, 506 (भाग-दो) भारतीय दण्ड संहिता, 1860 एवं "विशेष अधिनियम" की धारा-3(2)(v) के अपराध में दोषमुक्त किया गया ।
3. अभियोजन मामला संक्षेप में इस प्रकार है कि आहत संजय चेरवा (अ.सा.-2), निवासी बौरीपारा, अंबिकापुर, अपने आवासीय परिसर के अन्य कमरों को किराये पर दिए हुए था ।
घटना दिनांक 27/02/2022 की रात्रि लगभग 08:00 बजे उसने किरायेदार बिल्लू के घर के पास शोर सुनकर वहाँ जाकर देखा, जहाँ अपीलार्थी सुजीत गुप्ता उससे विवाद करने लगा, जिसे उसने समझा-बुझाकर वापस भेज दिया, परंतु उसी रात्रि लगभग 11:00 बजे पुनः तोड़-फोड़ की आवाज सुनकर बाहर आने पर पाया कि अपीलार्थीगण, जो आपस में भाई हैं, उसे गंदी गालियाँ देते हुए बाहर निकलने को कह रहे थे तथा जान से मारने की धमकी देते हुए दरवाजा पीटकर धक्का देकर आँ गन में घुस गए, अपीलार्थीगण द्वारा उसके स्कॉर्पियो वाहन के शीशों को भी तोड़कर नुकसान पहुँचाया गया और हत्या करने की नियत से धारदार चाकू से उसके पेट में वार कर दिया, जिससे उसकी आँ तें बाहर निकल आईं और अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा; इस दौरान उसकी पत्नी सियासी देवी (अ.सा.-1), पड़ोसी नरेन्द्र रजक (अ.सा.-7) एवं किरायेदार विशाल आदि मौके पर आ गए, जिसके पश्चात उसे उपचार हेतु अस्पताल ले जाया गया जहाँ उसका ऑपरेशन किया गया । पत्नी सियासी देवी की सूचना पर दिनांक 28/02/2022 को प्रथम सूचना पत्र (प्रदर्श पी-1) दर्ज की गई, घटनास्थल का नक्शा (प्रदर्श पी-2) तैयार किया गया, प्रार्थी का जाति प्रमाण-पत्र जब्त किया गया, अपीलार्थी अजीत गुप्ता के प्रकटीकरण कथन के आधार पर चाकू तथा अपीलार्थी सुजीत गुप्ता के प्रकटीकरण कथन के आधार पर ईंट का टुकड़ा जब्त किया गया, जब्त वस्तुओं को रासायनिक परीक्षण हेतु भेजा गया, मौका-नक्शा एवं 4 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} नुकसानी पंचनामा (प्रदर्श पी-23) तैयार कर साक्षियों के कथन लिए गए, तथा अपीलार्थीगण को गिरफ्तार कर विवेचना पूर्ण करते हुए अभियोगपत्र प्रस्तुत किया गया ।
4. विचारण के दौरान आरोप के प्रमाणन हेतु अभियोजन की ओर से अपने पक्ष समर्थन में कु ल 11 साक्षियों का परीक्षण कराया गया तथा 28 दस्तावेज प्रदर्शित चिन्हांकित कराए गए । धारा 313 दण्ड प्रक्रिया संहिता के तहत कथन में अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण ने अपने विपरीत आए, साक्षियों के कथनों को इंकार करते हुए स्वयं को निर्दोष होना बताया और कहा है कि प्रार्थी द्वारा अपीलार्थी सुजीत गुप्ता के साथ मारपीट की गई थी जिससे वह अस्पताल में भर्ती था उसी अपराध से बचने वास्ते प्रार्थी पक्ष के द्वारा उनके विरूद्घ शंका और डर के कारण से झूठी रिपोर्ट लिखाई गई है । बचाव में कोई साक्ष्य प्रस्तुत नहीं किया । उभयपक्ष काे सुना जाकर विचारण न्यायालय द्वारा अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण को इस निर्णय की कण्डिका-1 के अनुसार दोषसिद्ध कर दण्डित किया गया है । जिसे इस अपील में चुनौती दी गई है ।
5. अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि आहत संजय चेरवा (अ.सा.-2) को के वल एक ही चोट कारित हुई है । प्रथमदृष्टया हत्या के प्रयास का अपराध नहीं बनता । यह भी तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अपीलार्थी अजीत गुप्ता लगभग 04 वर्ष से अधिक समय से अभिरक्षा में है । यह भी तर्क किया गया है कि वह मात्र 19 वर्षीय नवयुवक है, जिसका कोई पूर्व आपराधिक इतिहास नहीं है, उस पर पारिवारिक दायित्व हैं तथा प्रार्थी पक्ष से उसका कोई पूर्व वैमनस्य या विवाद भी नहीं रहा है । यदि उसे दोषी पाया जाता है तो भारतीय दण्ड संहिता की धारा 307 के अंतर्गत निर्धारित कारावास को कम करते हुए उसकी अभिरक्षा अवधि तक सीमित किया जाना न्यायोचित होगा ।
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6. अपीलार्थी पक्ष के विद्वान अधिवक्ता का अपीलार्थी सुजीत गुप्ता के संबंध में तर्क है कि उसका प्रार्थी पक्ष से कोई पूर्व वैमनस्य नहीं रहा है, जिसे स्वयं प्रार्थी पक्ष द्वारा भी स्वीकार किया गया है । घटना के दौरान स्वयं प्रार्थी द्वारा सुजीत गुप्ता के साथ मारपीट की गई, जिससे उसे चोटें आईं, तथा प्रार्थी संजय ने भी उसे थप्पड़ मारना स्वीकार किया है, जिसकी पुष्टि अभियोजन साक्षी कपिलदेव चेरवा (अ.सा.-9) द्वारा भी की गई है । यह भी तर्क किया है कि अपीलार्थी सुजीत गुप्ता से किसी चाकू की जब्ती नहीं हुई है । प्रार्थी ने उसके विरूद्घ बढ़ा-चढ़कार कथन किया है । उसे के वल सह-अभियुक्त अजीत गुप्ता के साथ सामान्य आशय (धारा 34 भा.दं.सं.) के आधार पर धारा 307 भा.दं.सं. के अंतर्गत दोषी ठहराया गया है, जबकि न तो उसने आहत संजय चेरवा को कोई चोट कारित की है और न ही सह-अभियुक्त के साथ उसका कोई सामान्य आशय प्रमाणित है । अतः उसके विरुद्ध धारा 307/34 भा.दं.सं. के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि विधिसंगत नहीं है और अपास्त किए जाने योग्य है । वैकल्पिक रूप से यह निवेदन किया गया है कि यदि उसे किसी अन्य अपराध के लिए दोषी पाया जाता है, तो उसकी कारावास अवधि, जो लगभग 10 माह 07 दिन है, तक ही सीमित की जाए । विद्वान अधिवक्ता द्वारा अपने तर्क के समर्थन में न्यायदृष्टांत Mithu Singh v. State of Punjab, (2001) 4 SCC 193 तथा Constable 907 Surendra Singh & Another v. State of Uttarakhand, (2025) 5 SCC 433 का हवाला दिया गया है ।
7. राज्य/उत्तरवादी के विद्वान अधिवक्ता का तर्क है कि आहत संजय चेरवा (अ.सा.-2) ने अभियोजन मामले का पूर्ण समर्थन किया है, जिसके कथनों की पुष्टि मौके के साक्षियों, जैसे उसकी पत्नी सियासी देवी (अ.सा.-1), पुत्री कु मारी सुहानी चेरवा (अ.सा.-3) एवं पड़ोसी कपिलदेव चेरवा (अ.सा.-9) के कथन, साथ ही चिकित्सीय साक्ष्य एवं रासायनिक 6 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} परीक्षण प्रतिवेदन से होती है । संपूर्ण साक्ष्य से यह स्पष्ट है कि प्रथम घटना के पश्चात दोनों अपीलार्थीगण, जो आपस में सगे भाई हैं, सामान्य आशय निर्मित कर चाकू से सुसज्जित होकर रात्रि लगभग 11:00 से 11:30 बजे प्रार्थी के घर पहुंचे और घर में अनाधिकृ त प्रवेश कर न के वल स्कॉर्पियो वाहन को क्षतिग्रस्त किया, बल्कि प्रार्थी संजय चेरवा के पेट में चाकू से प्रहार कर उसकी हत्या का प्रयास किया, जिससे उसे गंभीर चोटें आईं और उसके आं तरिक अंग बाहर निकल आए । समस्त साक्ष्य के आधार पर अपीलार्थी सुजीत गुप्ता का भी सामान्य आशय पूर्णतः प्रमाणित होता है । अपराध की प्रकृ ति अत्यंत गंभीर होने के कारण अपीलार्थी पक्ष के तर्क स्वीकार योग्य नहीं हैं, प्रश्नाधीन दोषसिद्धि एवं दण्डादेश पूर्णतः विधिसम्मत एवं उचित हैं, इसलिए अपील खारिज किया जाए ।
8. उभयपक्ष का तर्क श्रवण किया गया और अभिलेख का सूक्ष्मतापूर्वक परिशीलन किया गया ।
9. सर्वप्रथम अपीलार्थी अजीत गुप्ता के संबंध में विचार करने पर यह स्पष्ट होता है कि आहत संजय चेरवा (अ.सा.-2) ने अपने न्यायालयीन कथन में अभियोजन मामले की पुष्टि करते हुए बताया है कि दिनांक 27/02/2022 की रात्रि लगभग 11:00 से 11:30 बजे दोनों अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण उसके परिसर के गेट का ताला तोड़कर प्रवेश किए और वहाँ खड़े स्कॉर्पियो वाहन के शीशे तोड़कर नुकसान पहुँचाया; शोर सुनकर जब वह बाहर निकला, तब अपीलार्थी अजीत गुप्ता ने उसके पेट में चाकू से प्रहार किया । उस समय अपीलार्थी सुजीत गुप्ता भी चाकू लिए हुए था और उसने भी उस पर वार करने का प्रयास किया, किं तु चाकू नीचे गिर गया, तथा बाद में अजीत द्वारा घोपें चाकू को पकड़कर सुजीत गुप्ता ने उसे घुमाने का प्रयास किया, परंतु वह सफल नहीं हो सका । चाकू के वार से उसके पेट की गंभीर चोट के कारण आँ तें बाहर निकल आईं और अत्यधिक रक्तस्राव होने लगा, 7 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} जिसके पश्चात उसकी पत्नी एवं पड़ोसियों द्वारा उसे उपचार हेतु मिशन अस्पताल, अंबिकापुर ले जाया गया ।
10. मौके की साक्षी के रूप में आहत संजय चेरवा की पत्नी सियासी देवी (अ.सा.-1) ने अपने कथन में घटनाक्रम की पुष्टि करते हुए बताया है कि अपीलार्थीगण उसके घर में घुसकर उसके पति के साथ चाकू से मारपीट किए तथा स्कॉर्पियो वाहन में तोड़-फोड़ की । इस साक्षी ने स्पष्ट रूप से कहा है कि अपीलार्थी अजीत गुप्ता ने उसके पति के पेट में चाकू से प्रहार किया था, जिसका खण्डन नहीं हो सका है । उसके द्वारा लिखाई गई प्रथम सूचना पत्र (प्रदर्श पी-1) में भी इस तथ्य का स्पष्ट उल्लेख है कि अपीलार्थी अजीत गुप्ता द्वारा प्रार्थी संजय चेरवा के पेट में चाकू से वार किया गया था ।
11. चिकित्सक अर्चना ऑर्थर (अ.सा.-5) ने अपने न्यायालयीन कथन में यह बताया है कि संजय चेरवा के परीक्षण में उसके पेट के ऊपरी भाग के बाईं ओर लगभग 4 इंच का घाव पाया गया, जो भीतर तक घुसा हुआ था तथा पेट की आं तरिक झिल्ली (ओमेंटम) बाहर निकली हुई थी । आगे यह भी बताया है कि दिनांक 28/02/2022 को ऑपरेशन के दौरान छोटी आं त में दो स्थानों पर कु ल चार छेद पाए गए, जो गंभीर प्रकृ ति की चोटें थीं । इस प्रकार, आहत संजय चेरवा को कारित चोटों की प्रकृ ति, उनकी गंभीरता तथा शरीर के अत्यंत संवेदनशील अंग--पेट--पर धारदार हथियार से प्रहार किए जाने की परिस्थिति को दृष्टिगत रखते हुए यह स्पष्ट होता है कि उस पर प्राणघातक हमला किया गया, जो हत्या के प्रयास की श्रेणी में आता है ।
12. आहत संजय चेरवा की पुत्री कु मारी सुहानी चेरवा (अ.सा.-3), पड़ोसी नरेन्द्र रजक (अ.सा.-7) तथा कपिलदेव चेरवा (अ.सा.-9) के बयान से भी यह स्पष्ट होता है कि यद्यपि उन्होंने चाकू से प्रहार करते हुए प्रत्यक्ष रूप से नहीं देखा, तथापि वे घटना के तत्काल 8 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} पश्चात स्थल पर पहुंचे थे । वहाँ अभियुक्त अजीत गुप्ता की उपस्थिति पाई गई थी, जिसे पकड़कर रखा गया था तथा बाद में पहुँची पुलिस उसे अपने साथ ले गई । इस प्रकार उपलब्ध साक्ष्य से यह संदेह से परे स्थापित होता है कि घटना में अभियुक्त अजीत गुप्ता मुख्य अभियुक्त के रूप में संलिप्त था । अतः विचारण न्यायालय द्वारा उसके विरुद्ध धारा 307, 452 एवं 427 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि में कोई त्रुटि परिलक्षित नहीं होती है । जहाँ तक दण्डादेश का प्रश्न है, उसके संबंध में आगे विचार किया जायेगा ।
13. अपीलार्थी/अभियुक्त सुजीत गुप्ता के संबंध में प्रार्थी संजय चेरवा (अ.सा.-2), मौके की साक्षी उसकी पत्नी सियासी देवी (अ.सा.-1), पुत्री कु मारी सुहानी चेरवा (अ.सा.-3) तथा पड़ोसी नरेन्द्र रजक (अ.सा.-7) एवं कपिलदेव चेरवा (अ.सा.-9) के समग्र बयान का अवलोकन करने पर यह स्पष्ट होता है कि जिस समय अपीलार्थी अजीत गुप्ता ने रात्रि में प्रार्थी के घर में जबरन प्रवेश कर स्कॉर्पियो वाहन को क्षति पहुँचाई एवं प्रार्थी संजय चेरवा के पेट में चाकू से प्रहार कर उसकी हत्या का प्रयास किया, उस समय उसका भाई अपीलार्थी सुजीत गुप्ता भी उसके साथ उपस्थित था । समस्त साक्ष्य से यह भी प्रतिपादित होता है कि दोनों अपीलार्थीगण पूर्व तैयारी के साथ रात्रि में प्रार्थी के घर में प्रवेश कर तोड़-फोड़ करते हुए वाहन को नुकसान पहुँचाए थे, अतः धारा 452 एवं 427 भारतीय दण्ड संहिता के अपराध में अभियुक्त अजीत गुप्ता के साथ-साथ अभियुक्त सुजीत गुप्ता की संलिप्तता भी समान रूप से प्रमाणित होती है, जिसके संबंध में अपीलार्थी द्वारा दोषसिद्धि के विषय में कोई विशेष आपत्ति भी नहीं की गई है ।
14. प्रार्थी संजय चेरवा की हत्या के प्रयास में अपीलार्थी पक्ष के विद्वान अधिवक्ता द्वारा यह तर्क प्रस्तुत किया गया है कि अपीलार्थी सुजीत गुप्ता का कोई सामान्य आशय नहीं था । इस तर्क पर उपलब्ध साक्ष्य के आलोक में सूक्ष्मतापूर्वक विचार किया जाना आवश्यक है । 9 / 16
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15. धारा-34 भारतीय दण्ड संहिता, 1860 जिसमें कि सामान्य आशय को बताया गया है वह निम्नानुसार हैः-
"34. सामान्य आशय को अग्रसर करने में कई व्यक्तियों द्वारा किए गए कार्य
-- जबकि कोई आपराधिक कार्य कई व्यक्तियों द्वारा अपने सब के सामान्य आशय को अग्रसर करने में किया जाता है, तब ऐसे व्यक्तियों में से हर व्यक्ति उस कार्य के लिए उसी प्रकार दायित्व के अधीन है, मानाे वह कार्य अके ले उसी ने किया हो ।"
16. 'सामान्य आशय' की अवधारणा के संबंध में माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा विभिन्न निर्णयों में अपने अभिमत व्यक्त किए हैं । इस संदर्भ में Mithu Singh (पूर्वोक्त) के निर्णय में प्रतिपादित सिद्धांत मार्गदर्शक है, जिसकी कण्डिका-06 में निम्नलिखित अभिव्यक्ति की गई है--"
"6. To substantiate a charge under Section 302 with the aid of Section 34 it must be shown that the criminal act complained against was done by one of the accused persons in furtherance of the common intention of both. Common intention has to be distinguished from same or similar intention. It is true that it is difficult, if not impossible, to collect and produce direct evidence in proof of the intention of the accused and mostly an inference as to intention shall have to be drawn from the acts or conduct of the accused or other relevant circumstances, as available. An inference as to common intention shall not be readily drawn; the culpable liability can arise only if such inference can be drawn with a certain degree of assurance. At the worst Mithu Singh, accused-appellant, knew that his co-accused 10 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} Bharpur Singh was armed with a pistol. The knowledge of previous enmity existing between Bharpur Singh and the deceased can also be attributed to Mithu Singh. But there is nothing available on record to draw an inference that the co-accused Bharpur Singh had gone to the house of the deceased with the intention of causing her death and such intention was known to Mithu Singh, much less shared by him. Simply because Mithu Singh was himself armed with a pistol would not necessarily lead to an inference that he had also reached the house of the deceased or had accompanied the co-accused Bharpur Singh with the intention of causing the death of Gurdial Kaur. In our opinion, an inference as to Mithu Singh, accused-appellant having shared with Bharpur Singh a common intention of causing the murder of the deceased Gurdial Kaur cannot be drawn. His conviction under Sections 302/34 IPC cannot be sustained and must be set aside."
17. Constable 907 Surendra Singh & Another (पूर्वोक्त) के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कण्डिका-30 में निम्नानुसार विधि सिद्धांत प्रतिपादित किया गया है--
"30. By now it is a settled principle of law that for convicting the accused with the aid of Section 34IPC the prosecution must establish prior meetings of minds. It must be established that all the accused had pre- planned and shared a common intention to commit the crime with the accused who has actually committed the crime. It must be established that the criminal act has been done in furtherance of the common intention of all the accused. Reliance in support of the aforesaid 11 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} proposition could be placed on the following judgments of this Court in the cases of:
(i) Ezajhussain Sabdarhussain v. State of Gujarat, (2019) 14 SCC 339;
(ii) Jasdeep Singh v. State of Punjab, (2022) 2 SCC 545;
(iii) Gadadhar Chandra v. State of W.B., (2022) 6 SCC 576; and
(iv) Madhusudan v. State of M.P., (2024) 15 SCC
757."
18. उपरोक्त न्यायदृष्टांतों के आलोक में वर्तमान प्रकरण के तथ्य एवं साक्ष्य का सूक्ष्म परीक्षण करने पर यह परिलक्षित होता है कि प्रार्थी संजय चेरवा (अ.सा.-2) का न्यायालयीन कथन है कि घटना की रात्रि लगभग 09:00 बजे अपीलार्थी सुजीत गुप्ता उसके आवासीय परिसर में पूर्व से उपस्थित था, जो उससे विवाद करने लगा एवं अश्लील गाली-गलौज करने लगा, जिस पर उसने उसे थप्पड़ मारकर परिसर से बाहर निकाल दिया और ताला बंद कर अंदर चला गया । इसके पश्चात रात्रि लगभग 11:00 से 11:30 बजे अपीलार्थीगण ताला खोलकर घुसे, स्कॉर्पियो वाहन को क्षतिग्रस्त कर उसे चाकू मारें । सुजीत गुप्ता के हाथ में चाकू था और उसने उस पर वार करने का प्रयास किया, किं तु चाकू नीचे गिर गया । तथापि, यह उल्लेखनीय है कि विवेचना के दौरान घटनास्थल से कोई चाकू बरामद नहीं किया गया तथा विवेचक उपनिरीक्षक प्रमोद कु मार पाण्डेय (अ.सा.-10) ने भी अपीलार्थी सुजीत गुप्ता से किसी चाकू की जब्ती नहीं बताई है । सुजीत गुप्ता के प्रकटीकरण कथन के आधार पर के वल ईंट का आधा टुकड़ा जब्त किया जाना बताया है, जो अभियोजन कथनानुसार स्कॉर्पियो वाहन को क्षतिग्रस्त करने में प्रयुक्त हुआ । यह भी महत्वपूर्ण है कि आहत संजय का यह कथन है कि अजीत द्वारा मारे गए चाकू को सुजीत ने घुमाने का प्रयास किया, जिसका उल्लेख न तो उसके पुलिस कथन (प्रदर्श डी-2) में है और न ही प्रथम 12 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} सूचना पत्र (प्रदर्श पी-1) में है । यद्यपि प्रथम सूचना पत्र में दोनों अपीलार्थीगण द्वारा चाकू से प्रहार करने का उल्लेख है, तथापि चिकित्सक अर्चना ऑर्थर (अ.सा.-5) द्वारा आहत के शरीर पर चाकू का एक ही घाव पाया जाना इस तथ्य को संदिग्ध बनाता है । अतः आहत संजय चेरवा तथा उसकी पत्नी सियासी देवी (अ.सा.-1) का यह कथन कि अपीलार्थी सुजीत गुप्ता ने भी चाकू से प्रहार करने का प्रयास किया, विश्वसनीय नहीं पाया जाता, विशेषतः तब जब उसके पास से कोई चाकू बरामद नहीं हुआ है और न ही प्रारंभिक कथन में इस आशय का स्पष्ट उल्लेख है ।
19. उपरोक्त न्यायदृष्टांतों के आलोक में उपलब्ध साक्ष्य का परीक्षण करने पर यह स्पष्ट होता है कि प्रार्थी संजय चेरवा (अ.सा.-2), उसकी पत्नी सियासी देवी (अ.सा.-1) एवं अन्य साक्षियों के कथन से प्रथम घटना रात्रि लगभग 08:00-09:00 बजे के मध्य घटित होना स्थापित है, जब अपीलार्थी सुजीत गुप्ता प्रार्थी के आवासीय परिसर में उपस्थित पाया गया तथा वाद-विवाद की स्थिति में उसके द्वारा जातिगत एवं अश्लील गाली-गलौज कर धमकी दी गई, जिस पर स्वयं आहत संजय ने उसे थप्पड़ मारकर भगा दिया । उक्त घटना मूल अपराध का हेतुक प्रतीत होती है । इसके पश्चात रात्रि में घटित दूसरी घटना, जिसमें अपीलार्थीगण द्वारा घर में प्रवेश कर स्कॉर्पियो वाहन को क्षति पहुँचाने तथा सह-अभियुक्त अजीत गुप्ता द्वारा आहत संजय के पेट में चाकू से प्रहार किया गया, उसके संबंध में संपूर्ण साक्ष्य से यह स्पष्ट रूप से स्थापित नहीं होता कि अपीलार्थी सुजीत गुप्ता को यह जानकारी थी कि उसका भाई अजीत गुप्ता चाकू से सुसज्जित था । सामान्य आशय के गठन हेतु "पूर्व सहमति" आवश्यक होती है, किन्तु साक्ष्य में ऐसा कोई तथ्य परिलक्षित नहीं होता कि सुजीत गुप्ता ने अपने भाई को चाकू से प्रहार करने हेतु उकसाया हो या प्रहार के समय किसी प्रकार से उसका सहयोग किया हो, जैसे कि आहत को पकड़कर रखना । इसके 13 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} विपरीत, पड़ोसी साक्षी कपिलदेव चेरवा (अ.सा.-9) के कथन से यह तथ्य भी उभरकर आता है कि सुजीत गुप्ता को भी चोटें आई थीं, जिससे यह तो प्रमाणित होता है कि वह घटना स्थल पर उपस्थित था, किन्तु अजीत गुप्ता द्वारा चाकू से प्रहार करने में उसका कोई सक्रिय सहयोग या सामान्य आशय स्थापित होना प्रमाणित नहीं होता । आहत संजय द्वारा अपने कथन में यह कहा जाना कि सुजीत का हाथ पकड़ने से उसकी हथेली कट गई तथा सुजीत ने दाँत से उसके अंगूठे को काट लिया, ऐसी किसी भी चोट का चिकित्सक साक्षी अर्चना ऑर्थर (अ.सा.-5) द्वारा समर्थन नहीं किया गया है । इस प्रकार, समस्त साक्ष्य से यह प्रमाणित नहीं होता कि अपीलार्थी सुजीत गुप्ता का अपने भाई सह-अभियुक्त अजीत गुप्ता के साथ प्रार्थी संजय चेरवा की हत्या के प्रयास के लिए सामान्य आशय निर्मित हुआ था । अतः विचारण न्यायालय द्वारा धारा 307 सहपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत सुजीत गुप्ता की दोषसिद्धि उचित नहीं है । परिणामतः अपीलार्थी सुजीत गुप्ता की धारा 427 एवं 452 सहपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि की पुष्टि की जाती है, जबकि धारा 307 सहपठित धारा 34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि को अपास्त करते हुए उसे उक्त आरोप से दोषमुक्त किया जाता है ।
20. जहाँ तक दण्ड के प्रश्न का संबंध है, मोहम्मद गियासुद्दीन बनाम आं ध्र प्रदेश राज्य, (1977) 3 एस.सी.सी. 287 के प्रकरण में माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने दण्ड निर्धारण के संदर्भ में सुधारात्मक सिद्धांत को विशेष महत्व देते हुए George Bernard Shaw के विचारों का उद्धरण किया है, जो इस प्रकार है--"यदि आप किसी व्यक्ति को प्रतिशोधात्मक रूप से दण्डित करना चाहते हैं, तो आपको उसे आहत करना होगा; किन्तु 14 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} यदि आप उसे सुधारना चाहते हैं, तो आपको उसे बेहतर बनाना होगा, और मनुष्य चोट पहुँचाने से बेहतर नहीं बनते।" उक्त निर्णय की कण्डिका-9 निम्नुसार है--
"9. Western jurisprudes and 'sociologists, from their own angle have struck a like note. Sir Samual Romilly, critical of the brutal penalties in the then Britain, said in 1817 :
"The laws of England are written in blood". Alfieri has suggested : 'society prepares the crime, the criminal commits it'. George Nicodotis, Director of Criminological Research Centre, Athens, Greece, maintains that 'Crime is the result of the lack of the right kind of education.' It is thus plain that crime is a pathological aberration, that the criminal can ordinarily be redeemed, that the State has to rehabilitate rather than avenge. The sub-culture that leads to anti-social behaviour has to be countered not by undue cruelty but by re-culturisation. Therefore, the focus of interest in penology is the individual, and goal is salvaging him for society. The infliction of harsh and savage punishment is thus a relic of past and regressive times.
The human today views sentencing as a process of reshaping a person who has deteriorated into criminality and the modern community has a primary stake in the rehabilitation of the offender as a means of social defense. We, therefore consider a therapeutic, rather than an in 'terrorem' outlook, should prevail in our criminal courts, since brutal incarceration of the person merely produces laceration of his mind. In the words of George Bernard Shaw : 'If you are to punish a man retributively, you must injure him. If you are to 15 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} reform him, you must improve him and, men are not improved by injuries'. We may permit ourselves the liberty to quote from Judge Sir Jeoffrey Streatfield : "If you are going to have anything to do with the criminal Courts, you should see for yourself the conditions under which prisoners serve their sentences."
21. उपरोक्त न्यायदृष्टांत के प्रकाश में अपीलार्थी सुजीत गुप्ता की दोषसिद्धि धारा 452/34 एवं 427/34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत उचित पायी गयी है तथा उसके विरुद्ध कोई पूर्व आपराधिक आचरण भी अभिलेख पर परिलक्षित नहीं होता । यह भी तथ्यगत है कि वह विचारण एवं अपील की लंबित अवधि के दौरान लगभग 10 माह 07 दिन तक अभिरक्षा में रहा है । अतः धारा 427/34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि एवं दण्डादेश की पुष्टि की जाती है, जबकि धारा 452/34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत प्रदत्त कारावास को घटाकर उसकी पूर्व में व्यतीत की गई अभिरक्षा अवधि, अर्थात् 10 माह 07 दिन, तक सीमित किया जाता है । अर्थदण्ड की राशि यथावत रखी जाती है ।
22. जहाँ तक अपीलार्थी अजीत गुप्ता के दण्डादेश का संबंध है, धारा 452/34 एवं 427/34 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत की गई दोषसिद्धि एवं दण्डादेश की पुष्टि की जाती है । धारा 307 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत दण्डादेश का प्रश्न है, यह परिलक्षित होता है कि घटना के समय उसकी आयु लगभग 19 वर्ष थी, घटना वर्ष 2022 की है, उस पर पारिवारिक दायित्व हैं, गिरफ्तारी पत्रक (प्रदर्श पी-19) के अनुसार वह स्नातक स्तर तक शिक्षित है तथा उसके विरुद्ध कोई पूर्व आपराधिक आचरण अभिलेख पर नहीं है । इन समस्त परिस्थितियों को दृष्टिगत रखते हुए धारा 307 भारतीय दण्ड संहिता के अंतर्गत आरोपित 07 वर्ष के कारावास को घटाकर उसकी अब तक व्यतीत की गई अभिरक्षा अवधि, जो दिनांक 28/02/2022 से निरंतर अभिरक्षा में रहते हुए लगभग 04 वर्ष 01 16 / 16 {Cr. A. No.-1756 of 2025} माह 03 दिन हो चुकी है, तक सीमित किया जाता है तथा शेष सभी दण्डादेश, विशेषकर अर्थदण्ड की राशि, यथावत रखी जाती है ।
23. अपीलार्थीगण/अभियुक्तगण को जेल में निरूद्घ बताया गया है । यदि उनकी अन्य मामले में आवश्यकता न हो तो उन्हें तत्काल रिहा किया जाए ।
24. निर्णय की प्रति के साथ विचारण न्यायालय को मूल अभिलेख तथा निर्णय की सत्यप्रतिलिपि संबंधित जेल अधीक्षक को आवश्यक कार्यवाही हेतु सूचनार्थ एवं पालनार्थ शीघ्रतापूर्वक प्रेषित हो ।
सही/-
(संजय कु मार जायसवाल) न्यायाधीश पोमन