हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने बच्चों के अधिकारों को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि माता-पिता के बीच तलाक के समय हुआ कोई भी आपसी समझौता या सहमति उनके नाबालिग बच्चों के भरण-पोषण (गुजारा भत्ता) के अधिकार को जीवनभर के लिए सीमित या समाप्त नहीं कर सकती है। समय और बदलती परिस्थितियों के अनुसार बच्चे अपने पिता से बढ़ी हुई राशि की मांग कर सकते हैं। न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने कहा कि समझौता माता-पिता के बीच हुआ था, इसलिए इसमें नाबालिग बच्ची की स्वतंत्र सहमति नहीं थी।
माता-पिता का आपसी समझौता बच्चे के कानूनी अधिकारों को नहीं छीन सकता। कोर्ट ने कहा कि साल 2020 में 1500 की राशि तय हुई थी और आज साल 2026 में 2,000 भी एक बेहद मामूली रकम है। बढ़ती उम्र और बुनियादी जरूरतों को पूरा करने के लिए बेटी गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी की पूरी हकदार है।
एक पिता होने के नाते याचिकाकर्ता अपनी बेटी को संभालने और उसका भरण-पोषण करने की जिम्मेदारी से बिल्कुल भी पीछे नहीं हट सकता। अदालत ने फैमिली कोर्ट के फैसले को पूरी तरह सही, न्यायसंगत और उचित ठहराते हुए तिलक राज की याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने अपनी बेटी को दिए जाने वाले गुजारा भत्ते में बढ़ोतरी का विरोध किया था। याचिकाकर्ता और उनकी पत्नी का साल 2020 में हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 (बी) में आपसी सहमति से तलाक हो गया था। उस दौरान दोनों के बीच एक समझौता हुआ था, जिसमें पिता अपनी नाबालिग बेटी के पालन-पोषण के लिए हर महीने 1,500 की राशि देने पर राजी हुआ। बाद में बढ़ती महंगाई और खर्चों को देखते हुए बेटी ने अपनी मां के माध्यम से शिमला के फैमिली कोर्ट के समक्ष धारा 127 सीआरपीसी में गुजारा भत्ता बढ़ाने की अर्जी दी। फैमिली कोर्ट ने राहत देते हुए इस राशि को 1,500 से बढ़ाकर 2,000 प्रति माह कर दिया। पिता ने फैमिली कोर्ट के इसी आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
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