दिल्ली के मशहूर होटल हयात रीजेंसी और एग्सन ग्लोबल से जुड़े लोन सेटलमेंट के मामलों में एक बड़ा मोड़ आया है। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने हयात रीजेंसी के मामले में बैंकों के रवैये पर बेहद सख्त रुख अपनाते होटल की लोन और वन टाइम सेटलमेंट प्रक्रिया से जु़ड़े डॉक्यूमेंट्स को रिकॉर्ड पर रखने को कहा है। सुनवाई के दौरान, सर्वोच्च अदालत ने सरकारी कंपनी एनएआरसीएल (NARCL) की लोन सेटलमेंट नीतियों को पर भी सवाल खड़े किए हैं। आइये जानते हैं क्य है ये पूरा मामला…

हयात रीजेंसी मामले में नियमों की अनदेखी

बता दें कि ये मामला दिल्ली के भीकाजी कामा प्लेस में स्थित पांच सितारा होटल हयात रीजेंसी से जुड़ा है, जिसका स्वामित्व एशियन होटल्स (नॉर्थ) लिमिटेड के पास है। वहीं, होटल प्रबंधन पर पंजाब नेशनल बैंक और बैंक ऑफ महाराष्ट्र सहित 6 बैंकों का कर्ज था। कर्ज न चुका पाने के कारण इस नामी होटल के जब्त होने की नौबत आ चुकी थी। वहीं, जब्ती से बचने के लिए होटल प्रबंधन ने बैंकों को वन टाइम सेटलमेंट (OTS) का प्रस्ताव दिया।

रिजर्व बैंक के नियमों के अनुसार 100 करोड़ रुपये से अधिक के फंसे कर्ज (Stressed Assets) के लिए खुली नीलामी अनिवार्य है। दोनों बैंकों ने इस अनिवार्य नीलामी प्रक्रिया को दरकिनार करके OTS का रास्ता चुन लिया। अब इसी सेटलमेंट प्रक्रिया पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने अब कड़ा रुख अपनाते हुए बैंकों के ओरिजिनल दस्तावेज और वैल्यूएशन रिपोर्ट तलब की है।

होटल के वैल्यूएशन में भारी गिरावट

साल 2021 में होटल की बाजार कीमत करीब 2,600 करोड़ रुपये आंकी गई थी। साल 2025 में वन टाइम सेटलमेंट के दौरान इस प्रॉपर्टी की वैल्यू घटाकर सिर्फ 750 से 865 करोड़ रुपये कर दी गई। सुप्रीम कोर्ट ने कमी पर हैरानी जताया। अदालत ने बैंकों के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए कहा कि आम जनता और विधवा महिलाओं के लोन पर सख्त बैंक बड़े होटलों को मनमानी छूट दे रहे हैं।

एग्सन ग्लोबल केस और बैंकों का आपसी विवाद

एग्सन ग्लोबल प्राइवेट लिमिटेड के प्रमोटर अप्रेस गर्ग पर 11 बैंकों के कंसोर्टियम का कुल 2,172 करोड़ रुपये का कर्ज बकाया था। सरकारी कंपनी एनएआरसीएल (NARCL) ने इस कर्ज को महज 579 करोड़ रुपये में सेटल करने की तैयारी कर ली थी। इस कंसोर्टियम में शामिल इंडियन बैंक के पास केवल 2।47 प्रतिशत का छोटा हिस्सा था। इंडियन बैंक ने इस भारी नुकसान वाले सेटलमेंट का विरोध किया। बैंक ने नियमों के तहत नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT) में कंपनी के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया (Insolvency) शुरू कर दी।

बोली न कराने से बड़ा नुकसान

एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनियों के लिए प्राइस डिस्कवरी की प्रक्रिया अपनाना सबसे बेहतर माना जाता है। खुली बोली के जरिए बैंक अक्सर फंसे हुए कर्जों की अधिकतम कीमत वसूल कर पाते हैं। एनएआरसीएल ने एग्सन ग्लोबल के मामले में बिना किसी खुली बोली के सीधे सेटलमेंट का फैसला किया। इस जल्दबाजी के कारण सरकारी खजाने और जनता के पैसे को सीधे तौर पर 1,600 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हुआ। खुली नीलामी होने पर इस कर्ज के लिए आसानी से 1,000 या 1,500 करोड़ रुपये की बोली मिल सकती थी।

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सरकारी बैंकों के पास मौजूद पैसा देश की आम जनता का है। बैंकों के व्यावसायिक फैसलों का मुख्य उद्देश्य जनता के पैसों की सुरक्षा होना चाहिए। अदालत ने हयात रीजेंसी मामले में बैंकों से मूल वैल्यूएशन रिपोर्ट और लोन से जुड़े सभी दस्तावेज तलब किए हैं।

Source Link

Picture Source :