संपत्ति विवादों से जुड़े मामलों में अक्सर बेदखली के मुकदमे वर्षों तक चलते रहते हैं। कई बार मुकदमे की शुरुआत जिस स्थिति में होती है, फैसला आते आते हालात पूरी तरह बदल जाते हैं। ऐसा ही एक दिलचस्प मामला बॉम्बे हाई कोर्ट में सामने आया, जहां एक किराएदार ने मुकदमे के दौरान ही संपत्ति का हिस्सा खरीद लिया और फिर उसी आधार पर बेदखली की कार्रवाई रुकवा दी। मामले की शुरुआत साल 2002 में हुई थी। मकान मालिक वरेल (Varel) ने कुमार (Kumar) नाम के किराएदार के खिलाफ अदालत में याचिका दायर की। आरोप था कि किराएदार ने मकान में अवैध निर्माण किया, कुछ हिस्सा किसी और को किराए पर दे दिया और नियमित किराया भी नहीं चुकाया। इन आरोपों के आधार पर उसे मकान से बाहर निकालने की मांग की गई।
सुनवाई कई साल तक चलती रही। इसी दौरान कुमार को एक ऐसा मौका मिला जिसने पूरे केस की दिशा बदल दी। संपत्ति के एक सह मालिक के कानूनी वारिसों ने अपना हिस्सा बेचने का फैसला किया और कुमार ने 22 अप्रैल 2016 को रजिस्टर्ड कन्वेयंस डीड (Conveyance Deed) के जरिए उस हिस्से को खरीद लिया। कन्वेयंस डीड एक कानूनी दस्तावेज होता है, जिसके जरिए किसी संपत्ति का मालिकाना हक एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को आधिकारिक रूप से ट्रांसफर किया जाता है। जब कोई मकान, जमीन या संपत्ति खरीदी जाती है, तो कन्वेयंस डीड यह साबित करती है कि नया खरीदार अब उसका वैध मालिक है।
इस खरीद के बाद कुमार सिर्फ किराएदार नहीं रहा। वह उसी संपत्ति का 50 फीसदी हिस्सा रखने वाला सह मालिक बन गया। इसके बाद उसने अदालत में दलील दी कि अब उसका दर्जा बदल चुका है और उसके खिलाफ किराएदार के तौर पर चल रही बेदखली की कार्रवाई जारी नहीं रह सकती।
7 अप्रैल 2026 को बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस मामले में अहम फैसला सुनाया। अदालत ने माना कि मुकदमे के दौरान संपत्ति में हिस्सेदारी खरीदने के बाद कुमार सह मालिक बन चुका है। ऐसे में उसके खिलाफ किराएदार के रूप में बेदखली की कार्रवाई जारी रखना कानूनन सही नहीं होगा। अदालत ने कहा कि जैसे ही कोई किराएदार संपत्ति में मालिकाना हक हासिल करता है, उसका दर्जा बदल जाता है। अब वह सिर्फ किराएदार नहीं रहता बल्कि मालिकाना अधिकार भी रखता है। इस स्थिति में उसके खिलाफ किराया कानून के तहत बेदखली की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ सकती।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों का भी लिया सहारा
हाई कोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के पुराने मामलों का हवाला दिया। अदालत ने कहा कि सामान्य परिस्थितियों में किसी संपत्ति का एक सह मालिक बाकी सह मालिकों की तरफ से बेदखली की कार्रवाई शुरू कर सकता है। इसके लिए सभी सह मालिकों की लिखित मंजूरी जरूरी नहीं होती। लेकिन अगर बाद में संपत्ति के मालिकाना ढांचे में बदलाव आ जाए और किराएदार खुद सह मालिक बन जाए तो स्थिति पूरी तरह बदल जाती है। ऐसे हालात में बेदखली का आधार कमजोर पड़ जाता है।
“डुअल कैपेसिटी” बनी जीत की वजह
अदालत ने कहा कि कुमार की स्थिति “डुअल कैपेसिटी” यानी दोहरी भूमिका वाली हो गई थी। एक तरफ वह पुराने किरायानामे के आधार पर किराएदार था और दूसरी तरफ संपत्ति का 50 फीसदी हिस्सा खरीदने के बाद सह मालिक भी बन गया था। कोर्ट ने साफ किया कि मालिकाना अधिकार किराएदारी अधिकार से ऊंचा अधिकार माना जाता है। इसलिए जैसे ही उसने संपत्ति का हिस्सा खरीदा, उसके मालिकाना अधिकारों ने पुराने मकान मालिक और किराएदार वाले रिश्ते को काफी हद तक खत्म कर दिया।
पार्टिशन केस ने भी मजबूत किया पक्ष
सुनवाई के दौरान यह भी सामने आया कि कुमार ने संपत्ति के बंटवारे यानी पार्टिशन (Partition) से जुड़ी कानूनी कार्यवाही भी शुरू कर दी थी। इससे यह साबित हुआ कि वह सिर्फ कागजों पर नहीं बल्कि वास्तविक रूप से सह मालिक के अधिकारों का इस्तेमाल कर रहा था। अदालत ने माना कि जब एक सह-मालिक बेदखली का विरोध कर रहा हो और दूसरा सह मालिक अपना हिस्सा उसी किराएदार को बेच चुका हो, तब बेदखली की कार्रवाई जारी रखना उचित नहीं होगा।
आखिर में क्या हुआ
बॉम्बे हाई कोर्ट ने निचली अपीलीय अदालत के फैसले को रद्द कर दिया और ट्रायल कोर्ट के उस पुराने आदेश को बहाल कर दिया जिसमें बेदखली की याचिका खारिज कर दी गई थी। इस फैसले ने साफ कर दिया कि अगर किसी किराएदार को मुकदमे के दौरान संपत्ति में मालिकाना हिस्सा मिल जाता है, तो कई मामलों में उसका कानूनी दर्जा पूरी तरह बदल सकता है। यही बदलाव इस 24 साल पुराने बेदखली विवाद में किराएदार की सबसे बड़ी ताकत बन गया और आखिरकार पूरा मामला उसके पक्ष में पलट गया।
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