मद्रास उच्च न्यायालय की मदुरई पीठ ने 1 जून 2026 को एक ऐतिहासिक सामूहिक आदेश पारित करते हुए तीन आपराधिक मूल याचिकाएं स्वीकार कीं और एक का निस्तारण किया। न्यायालय ने POCSO अधिनियम के मानवीय एवं बाल-केंद्रित क्रियान्वयन हेतु व्यापक संस्थागत दिशा-निर्देश भी जारी किए।

चारों प्रकरणों में POCSO न्यायालयों में दायर आरोप-पत्रों को निरस्त करने की मांग की गई थी। सभी मामलों में यह उभरकर आया कि नाबालिग पीड़ित बच्चों को पारिवारिक विवादों, वैवाहिक कलह अथवा गुटीय शत्रुता के चलते वयस्कों द्वारा झूठी शिकायत दर्ज कराने हेतु भावनात्मक रूप से दबाव में लाया गया था।

याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि अभियोजन पूर्णतः मनगढ़ंत है और पीड़ित बच्चों ने स्वयं अपने बयानों में आरोप वापस ले लिए। राज्य का पक्ष था कि POCSO के तहत गंभीर अपराधों में केवल समझौते के आधार पर कार्यवाही रद्द नहीं की जा सकती।

न्यायालय ने कहा कि POCSO अधिनियम का वास्तविक उद्देश्य दोषसिद्धि नहीं, बल्कि बच्चे की गरिमा, भावनात्मक सुरक्षा, मनोवैज्ञानिक उपचार और सामाजिक पुनर्एकीकरण सुनिश्चित करना है। न्यायालय ने कहा — "बचपन वयस्कों की प्रतिशोधभावना का युद्धक्षेत्र नहीं है।" साथ ही "सिंगापेन संवेदीकरण कार्यशाला" नामक राज्यव्यापी प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित करने का निर्देश दिया।

न्यायालय ने State of Haryana v. Bhajan Lal (1992) के सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय पर भरोसा करते हुए अंतर्निहित अधिकारिता का प्रयोग उचित ठहराया।

Case Details:

Case No.: Crl.O.P.(MD) Nos. 3924, 3628, 3769 of 2026 & 21788 of 2025
Bench: Hon'ble Mrs. Justice L. Victoria Gowri
Petitioners: Mikavel, Narendra Prasath, Ibrahim, S. Muniyandi & C. Ayyapan
Respondents: State of Tamil Nadu & Others
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